गीतकार, गायक, अभिनेता, रंगकर्मी पियूष मिश्र को सुनना उनसे सवाल पूछना और बाद में कुछ बातचीत कर पाना कल के दिन की ख़ास उपलब्धि रहीं।

पहला सवाल मैंने पूछा -आप जेएनयू के बारे में क्या सोचते हैं? पियूष जी ने जवाब दिया- देखो मेरा आईक्यू लेवल जेएनयू के लेवल का नहीं है। मैं जेएनयू को नहीं समझ पाता। मैं लेफ्टिस्ट नहीं हूँ। नास्तिक नहीं हूँ। मैं आस्तिक हूँ। भगवान को मानता हूँ। लेफ्टिस्ट होने के लिए नास्तिक होना ज़रूरी है। मैं आस्तिक हूँ।





5 मेरे उम्मीद नरेंद्र मोदी से थी। मैं उन्हें नेताओं में पसंद करता हूँ। मुझे लगा था कुछ होगा। नोटबंदी से लगा बात होगी। लेकिन अब जो देख रहा हूँ। गरीब परेशान हैं। बच्चे परेशां हैं। लोग मर रहे हैं। दिल कहता है ये हो क्या रहा है? यह नहीं होना था। तो अब मेरा उनसे भी यानी मोदी जी से भी हो चुका है। अब ख़त्म ही हो चुका है भरोसा। अब और उम्मीद नहीं लगती। बस ही है अब। बहुत हुआ।
6 ये मेरे असिस्टेंट हैं। इनके बिना मेरा कार्यक्रम नहीं हो सकता। लेकिन इनका नाम सुनेंगे आप तो इनपर से आपका भरोसा उठ जायेगा। नाम है राहुल गांधी।
और बहुत सी बातें हैं जो ज़ेहन में हैं; जिन्हें यहाँ दर्ज करने में अधिक विस्तार हो जाने का खतरा है। पियूष मिश्र ने अपने कई गीत सुनाए। इक बग़ल में चाँद होगा, गणेश वंदना आदि। उन्होंने एक बच्ची पर कविता भी सुनाई जिसका आशय था अंकल मत आया करो मुझे डर लगता है।
पियूष मिश्र के ठीक बाद साहित्य का सत्र शुरू हुआ जिसे प्रभु जोशी मॉडरेट कर रहे थे। आप तस्वीर में देख सकते हैं पियूष जी किस तरह लोगों को बिठा रहे हैं।
भोजनावकाश में मुझे भी पियूष जी से बात करने का मौका मिला। मैं कहानीकार वंदना राग, उपन्यासकार महुआ माजी और निर्मला भुराड़िया जी के साथ बैठा था। बातें हो रहीं थी कि पियूष जी आये। वंदना जी और महुआ जी को देख बैठ गए। उनका खाना हुआ और साथ में बातें हुईं। गीत इक बग़ल में चाँद...फ़िल्म रिवाल्वर रानी के चरित्र और पिंक के संवादों को लेकर। पियूष जी ने माना कि रिवाल्वर रानी में मैंने अच्छे से अभिनय किया है।
इसके बाद नए सत्र शुरू हुए। पियूष जी अलग-अलग जगहों में हो रहे सब सत्रों में आये-गए। अरुण कमल और लीलाधर जगूड़ी, सरोज कुमार के गीत संबंधी सत्र में उन्होंने सवाल भी पूछा और गीतकार मनोज मुन्तशिर ने अपने सत्र में मंच से पियूष जी को नमस्कार किया।
कुल मिलाकर पियूष जी से जो लगाव था वह असहमति के बावजूद अब बहुत गाढ़ा हो चुका है। मेरा मानना है पियूष मिश्र जैसे कलाकार विरल होते हैं। उनके जैसे कलाकार बैसाखी के सहारे आये नहीं होते। उनमें जो अपना होता है वह बहुत तीखा और असहज कर देनेवाला होने के बावजूद आपके सर चढ़कर बोलता है। पियूष जी ने अपनी जो जगह बनाई है वह ज़मीन ही उनकी थी। उसे कोई अपने नाम नहीं करा सकता था। उनका क्षेत्रफल बढ़ता रहे ऐसी दिली कामना करता हूँ।
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