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शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

पहले भाषा बाद में ज्ञान इंसान है तो देश महान

अगर आप चाहते हैं कि बच्चों की भाषा अच्छी रहे, वे शब्दों का मतलब समझें, सोचा हुआ बोल सकें, सोचा-बोला लिख सकें, सही-सही पढ़ सकें, भाषा द्वारा बेवक़ूफ़ बनाये जाने बाहर धक्का दे दिए जाने से बच सकें तो कुछ उपाय हैं-

1. पढ़ने को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं। टीवी देखते या कुछ भी करते दिखते हैं तो घर में पढ़ते भी दिखें बच्चों को। पढ़ते-लिखते इंसान बच्चों को अच्छे लगते हैं।

2. लिखें चाहे हिसाब-किताब ही लिखें; पर इतना लिखें कि बच्चे आपको लिखता देखें। आपको लिखावट से पहचान सकें।

3. सही बोलें। जिस शब्द का मतलब नहीं जानते उसे न बोलें। यह सोचकर बोलें कि कोई सुने न सुने बच्चे तो आपको सुन ही रहे हैं। घर में किसी के ग़लत उच्चारण पर या बोले हुए शब्द के मतलब न जानने पर टोकें। शब्दकोश घर में रखें। रोज़ पढ़ना शुरू करें।

4. माँ बोली में बोलें। अंग्रेज़ी में बोलें। हिंदी में या चाहे जिस भाषा में बोलें मगर यह ख़याल रखें बच्चे आपसे सही उच्चारण सुन रहे हैं। उन्होंने आपसे ग़लत उच्चारण लीक- टेक पकड़ ली तो उन्हें शब्दों को बोलने के सही रास्ते पर कभी नहीं ला पाएंगे।

5. दो-चार दिन पर कोई नयी कविता पढ़ें। महीने- पन्द्रह दिन पर कोई नयी कहानी पढ़ें। साल में 12 नहीं तो कम से कम तीन नयी किताब पढ़ें। क्योंकि इतनी तो ऋतुएं भी होती हैं। इतनी बार तो आप साल में बाज़ार में ठगे भी जा चुके होते हैं जिनमें धन ही जाता है।

6. किताबें उपहार में दें। बच्चों को उपहार में मिली किताबों को सम्हालना सिखाएं। अगर किसी किताब ने आपकी ज़िंदगी में कुछ बेहतर किया था, किसी किताब ने आपको सम्हाला था या कि कोई किताब आज भी आपका सहारा है, तो उसके बारे में बच्चों को ज़रूर बताएं। यह किन्हीं अच्छे अंकल- आँटी, महा विकास पुरुषों के बारे में बताने से अधिक ज़रूरी है।

7. बच्चों को रिमोट, माउस और चार्जर के भरोसे न छोड़ें न रहने दें। वे आपकी अनुपस्थिति में किसी ख़तरे से कम नहीं। मोबाईल आपको ख़राब कर ही रहा है, बच्चों का तो सत्यानाश ही कर देगा। इतनी छोटी स्क्रीन की लत के बाद वे कभी आपका उतरा हुआ चेहरा भी ज़रूरत से बड़ा सिनेमा हॉल समझेंगे और मोबाईल पर ही कुछ देख लेना पसंद करेंगे।

8. कोई भी भाषा हो उसमें हर चीज़ के लिए शब्द होते हैं। इसका कारण यह है कि मनुष्य समाज-घर ही नहीं बनाते शब्द भी बनाते हैं। लोगों को सुनें। बोलचाल का महत्व समझें। अच्छे, गहरे, विश्वसनीय शब्द टीवी और पॉपुलर लोगों को सुनकर नहीं आम लोगों को सुनने से मिलते हैं। बच्चों को सुनने के लिए, सम्मान करने के लिए तैयार करें।

9. सोशल मीडिया या डिजिटल माध्यमों का संवाद भाषा नहीं सिखाता। क्योंकि वहां मैसेजिंग है। वहां सब कुछ एक महा व्यापार में शामिल है। चैट बातचीत नहीं हो सकती। इसलिए मोबाईल पर हर वक़्त पुट-पुट करने की बजाय बच्चों से कुछ चुटुर-पुटुर बातें करें। वे स्माईली की जगह बोलने वाले का चेहरा देखेंगे तो सचमुच की ख़ुशी पाएंगे।

10. केवल भाषा की पढ़ाई ही भाषा का ज्ञान नहीं है। दुनिया का हर ज्ञान किसी न किसी भाषा में ही होता है। ऐसा मत सोचें कि गणित या साइंस या सोशल साइंस में पिछड़ा बच्चा भाषा में अच्छा हो सकता है। हो सकता है वह भाषा में कमज़ोर होने के कारण ही इन विषयों में लद्धड़ हो। क्योंकि जानने-सीखने का रास्ता तो भाषा ही है। जो रास्ता नहीं जानता वो उड़कर भी कहीं कैसे पहुंचेगा अकेले ? जन्म-मृत्यु और पढ़ाई अकेले पर ही आते हैं।

11. अगर आप पढ़े-लिखे नहीं हैं, पढ़ना चाहते थे मगर पढ़ नहीं पाए इस कारण आर्थिक हैसियत से लाचार हैं तो बच्चों से छुपे-छुपाएं नहीं इसे ज़रूर बताएं। इस बात को जितनी ईमानदारी से बताएंगे बच्चे की भाषा उतनी ही सम्पन्न, अनेक आयामी होगी। क्योंकि इस सम्वाद- भाषा से जो ज्ञान मिलता है, प्रेरणा मिलती है, शिक्षा मिलती है उसके आगे बड़े-बड़े स्कूल छोटे हैं, बड़ी-बड़ी किताबें छोटी हैं।

12. बच्चों को भाषा का सम्मान करना सिखाएं। सम्भव है आप स्वयं शिक्षकों से भी स्मार्ट-सफल हों, किसी भाषा के माहिर हों, लेकिन याद रखें आप शिक्षक नहीं हैं, स्कूल नहीं हैं। पेशे से शिक्षक भी हों तो अपने बच्चे के शिक्षक नहीं हैं। आपसे सीखने के बाद ही बच्चे को और सीखने की ज़रूरत है। तभी वह आपसे बेहतर बनेगा। किसी देश के राष्ट्रपति के बच्चे को भी आम बच्चों के साथ इसलिए पढ़ना चाहिए ताकि दूसरा बच्चा भी एक दिन बड़े होकर राष्ट्रपति बन सके।

13. विशेष मौक़े पर किताब ख़रीदें। कोई अवसर हो तो बच्चों को किताब उपहार में दें। गीत-संगीत कला से परिचय कराएं उन्हें जीवन का अंग बनाएं। अच्छे गीत बेहतर भाषा सिखाते हैं। जो कला की भाषा समझता है समझिये उस बच्चे से दुनिया सुंदर है।

यदि उपर्युक्त बातों का ख़याल रखते हैं तो आपका बेटा या बेटी भाषा में कभी कमज़ोर मजबूर नहीं होगा। परीक्षा के सेल्समैन या एडुकेशन कम्पनियों के कस्टमर केयर सेंटर द्वारा किन्हीं विषयों को मेजर सब्जेक्ट और भाषा को गौण समझे जाने की मानसिकता से भरसक सावधान रहें।

हमेशा ध्यान रहे:
पहले भाषा बाद में ज्ञान
माँ पहले बाद में भगवान
जाति धरम देश मत ठान
इनसे बड़ा है बन्धु इंसान
इंसान है तभी देश महान

बात अच्छी लगी हों तो केवल फॉरवर्ड न करें; ग्रहण करें। अमल में लाएं।

- शशिभूषण, उज्जैन
ई मेल - gshashibhooshan@gmail.com

बुधवार, 9 जून 2021

डरो, डर पर जीत की प्रखर कविता

विष्णु खरे की एक कविता है, ‘डरो’। सेतु प्रकाशन, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित विष्णु खरे की संपूर्ण कविताओं में इस कविता के शीर्षक के नीचे 12 जुलाई 1976 की तारीख़ मिलती है।

मैं कविता और उक्त तारीख़ पढ़कर हैरान हूँ। 12 जुलाई 1976, मेरे जन्म से पहले और आज 6 जून 2021 से चौवालीस साल पहले की तारीख़ है। लेकिन कविता की विषयवस्तु के बारे में कहना ही होगा यह वर्तमान देशकाल का यथार्थ है। झकझोरता हुआ यथार्थ। सत्ता प्रवृत्ति पर घुप जाने वाला यथार्थवादी बयान।

कविता डरो आज का ऐसा बयान है जिसमें एक ओर राजसत्ता निर्मित डर के प्रमुख रूप चेतावनी बनकर प्रकट हैं वहीं दूसरी ओर जनता की निरुपायता, क्षोभ, घुटन और दुख प्रत्यक्ष हैं।

डर राज व्यवस्था का शक्तिशाली शोषक और दमनकारी हथियार है। इसके प्रभाव से जन प्रतिरोध अक्सर पैदा होने से पहले ही मर जाता है। कविता की प्रत्येक पंक्ति इसका प्रमाणिक दस्तावेज़ीकरण करती है। इसमें व्यक्ति मन से लेकर सांविधानिक माननीयों तक की दुनिया के डर वर्णित हैं। डर निपटान के प्रबंध संकेत रूप में चित्रित हैं। डर की बारिकियां कविता को प्रभावी के साथ-साथ अध्ययन-विश्लेषण के लायक बनाती है।

कविता के शीर्षक के नीचे 12 जुलाई 1976 की तारीख़ पहली बार में सोचने को विवश करती है कि देशकाल में आखिर क्या बदलाव हुआ ? कुछ भी तो नहीं। यदि देश में आज़ादी और अभिव्यक्ति अधिक ख़राब होते गये तो बिल्कुल आज का नागरिक बयान 12 जुलाई 1976 की तारीख़ में कैसे दर्ज़ होता है ? हमारी नागरिकता पीछे जा रही है या राजसत्ता आगे खिंच आयी ? राज व्यवस्था के लगातार भयावह होते जाने, बुरा वक्त आ गया कि वे सब चेतावनियाँ कहाँ हैं ?

जैसा कि कहा, यह पहली बार का मोटा-मोटी सोचना ही है। अधिक सोचने पर 1975 के राष्ट्रीय आपातकाल की याद आती है। तब पता चलता है कवि ने अपने दौर के हालात को केवल दर्ज़ किया था। संभव है कवि विष्णु खरे ने इस यथार्थ का काव्य दस्तावेज़ीकरण करते हुए यही सोचा हो कि इस घोर समय की स्मृति दर्ज़ होनी चाहिए। ताकि सनद रहे। साहित्य समाज या जन समाज भूलने की मार से बच-निकल पावे। कवि किसी अधिक भयावह भविष्य की आहट पाकर कविता को कालजयी बनाने का उपक्रम कर रहा था ऐसा सोचना बचकाना होगा। कविता में आत्मालाप सी पीड़ा अपने ही समय की सूचक है।

कविता ‘डरो’ को पढ़ते हुए बिल्कुल नहीं लगता कि इसमें नागरिक समाज का आज का कोई डर मसलन मॉबलिंचिंग को ही ले लें जोड़ देने से यह विशेष रूप से 2021 की काव्य स्मृति बन जायेगी। बल्कि गौर करें तो यह उद्घाटित होता है कि इसके डर में आज की मॉबलिंचिग की प्रायोजित हत्याएं और उसके प्रतिरोध के डर भी कविता के अभिप्राय में समाहित हैं। नि: संदेह यह 2021 के डरों को भी घनीभूत रूप में प्रकट कर रही है। 2021 में लिखे जाने पर करती या नहीं इस विषय में कहना मुश्किल है। बल्कि यह खुशी होती है कि कविता डर की महास्मृति और समकाल दोनो है। कविता की दीर्घजीविता का यही रहस्य है। कविता डरो जेब में रख लेने लायक है।

अब प्रश्न उठता है, क्या 2021 में भी कोई राष्ट्रीय आपातकाल है ? उत्तर है, आज तक इसकी घोषणा नहीं हुई है। यह कह सकते हैं 2021 में भी निर्वाचित सरकार पिछले कई साल से भारत को हर संभव जल्द से जल्द हिंदू राष्ट्र देखना चाहती है। कोरोना महामारी की आपदा से अवसरों में एक यह अवसर भी हासिल किया जाना प्रतीत होता है। पूरी तैयारी दिखती है। कोशिश है इस निर्माण का विरोध करने वाले स्वर मज़बूत-संगठित न होने पायें। लगता तो यही है कि यह असंभव है लेकिन इस असंभव की आकांक्षा से बहुत सी बातें निकल रही हैं, देश बदल रहा है। क्योंकि भारत धर्मनिरपेक्ष संघ गणराज्य है। 

एक धर्म निरपेक्ष संघ गणराज्य के सरकार प्रमुख चाहते हैं कि भारत हिंदू धर्म-राष्ट्र बने। ऐसा वह घृणा में नहीं लोकतांत्रिक कृतज्ञता-कर्मठता में चाहते हैं। क्योंकि वे ऐसी ही चाह वाले आंदोलनों से सरकार बनाने वाले लगभग अपराजेय दल बन सके हैं। उनके खाने के दाँत औऱ हैं दिखाने के और। उनके मुँह में सबका साथ सबका विकास है बगल में हिंदूराष्ट्र। यही करण है कि जानकार मानते हैं, आज परिस्थितियाँ आपातकाल से भी बदतर हैं। क्योंकि देश में बोलने वालों और असहमति रखने वालों की नागरिकता, सत्यनिष्ठा और देशभक्ति पर कभी भी सवाल उठ सकते हैं।

कमाल देखिये, सत्तारूढ़ दलों के सरकार प्रमुखों की निजी महत्वाकांक्षा हिंदू राष्ट्र के जो डर को अमोघ अस्त्र की तरह इस्तेमाल करती है सामने आते ही किस प्रकार एक कविता 1976 को इतिहास से निकालकर सामाजिक का 2021 बना देती है। कहना चाहिए सचेत कवि इस सार्वजनीनता को हमेशा पहचानता है। लिपिबद्ध करता है ताकि डर पैदा करने वाली ताक़त को पहचानने में चूक न हो। समय कोई दूसरा हो सकता है। आश्वासन विकास का भी हो सकता है दमन का फल देने वाला। जिसके बारे में जनता इतना ही जानती है, यही होता है। यही होता आया है। किसी का राज हो। यहीं कविता व्याख्या से अधिक सुनाये जाने की अधिकारी बन जाती है।

‘डरो’ कविता सुनते-पढ़ते हुए आप भी ध्यान दें क्या-क्या लगता है-

डर क्यों लगा कि बोल दिया ? नहीं बोलते तो किसके पूछने का डर था मुँह क्यों नहीं खोलते ?

क्या सुना कि अपने कान देने से डर गये ? ऐसा-इतना सुनने को क्यों है कि नहीं सुन पाये तो ग्लानि होगी ? कौन पूछेगा सुनते क्यों नहीं ? क्या बहरे हो ?

कौन हैं कर्ता-धर्ता ? कितना हृदय विदारक फैला है कि लगता है मेरे साथ भी हो जायेगा अगर देख लिया ? न देखो तो किनके लिये डर है गवाही देकर बचा लेने लायक कैसे मुँह बचा रहेगा ?

ऐसा क्या सोचते हो जो दिल में है मगर चेहरे पर लाने से डरते हो ? चेहरे पर आ गया सोचना तो किस बात का डर है ? चेहरा सम्हाल लेने पर और अधिक सोचने की परीक्षा से क्यों गुज़रना पड़ेगा ?

क्या पढ़ने लगे जिसे सबके सामने नहीं पढ़ते ? किताबों के ख़िलाफ़ कौन गवाही देंगे ? नहीं पढ़ते दिखना भी ख़तरनाक क्यों है ? क्यों पढ़ने की तलाशी ली जायेगी ?

किसको लिखने से डरते हो ? मनचाहे अभिप्राय निकालने वाले सत्ता में कैसे हैं ? शिक्षा विमुख कैसे है ? दूसरी पहचान थोपने के काम क्यों आती है ?

तुम डरते हो ? क्यों डरते हो ? डर तो कोई है नहीं अब। क्यों डरते हो का डर कौन ला रहा है ? नहीं डरने वालों को आदेश क्यों मिलेगा डर ? डर वरना जेल में सड़।

अंत में कहा जा सकता है कि कविता केवल डर नहीं बताती बल्कि ऐसे सवाल पूछती है जिनके जवाब देने वाले का डर ख़त्म हो जायेगा। कविता ‘डरो’ डर के वर्णन की कविता नहीं है। कविता का लक्ष्य है डर को डराने वाली सत्ता के मुँह पर दे मारो। डर पर जीत की प्रखर कविता है ‘डरो’। पूरी कविता इस प्रकार है-


डरो
(12 जुलाई 1976)


कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो

सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाज़िमी तो नहीं था

देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे

सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें

पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो तलाशेंगे क्या पढ़ते हो

लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नयी इबारत सिखायी जाएगी

डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुकुम होगा कि डर

सेतु समग्र : कविता, विष्णु खरे
संपादक : मंगलेश डबराल

शनिवार, 5 जून 2021

पत्रकार-बुद्धिजीवी सफ़ाई वाला बनें

मैं कम पढ़ा-लिखा रह गया। इसका बड़ा अफ़सोस है। इसके दो कारण हैं। जीवन की शुरुआत में पढ़ाई के उतने साधन नहीं थे। बाद में जब शिक्षा के साधनों तक पहुंचा तब तक दुनिया में इन्टरनेट आ गया। मेरे नौकरी करके जीने का समय हो गया। मीडिया और सोशल मीडिया ने मिलकर मेरे पढ़ने-जानने के लिए उड़ने वाले पंख कतर दिए। जो काम मजबूरी न कर पायी थी उसे कथित सुविधा ने कर दिखाया। अब मैं ज़्यादातर पोस्ट बराबर पढ़ता हूँ और ट्वीट बराबर लिखता हूँ। यह आत्महंता लत है।

लेकिन मैं मानता हूँ किसी भी भाषा-देश के पत्रकार को बहुत पढ़ा-लिखा इंसान होना चाहिये। मेरे ख़याल से पढ़ने-जानने का पत्रकारिता से सम्बन्ध ऐसा है कि आप एक सीमा से आगे जैसे ही जानेंगे आप पत्रकार होते जाएंगे। जाने और ख़ुलासा न करे अथवा जाने और शासन न करना चाहे ऐसा इंसान के साथ कम ही होता है। साहित्य का सम्बंध अनुभूति से है मगर पत्रकारिता का सम्बंध जानने से है। जिस साहित्य में जानना अधिक हो उसे पत्रकारीय साहित्य भी कह सकते हैं। हालांकि यहां पत्रकारीय साहित्य कहकर साहित्य का अवमूल्यन करना मेरा उद्देश्य नहीं। मूल बात पर लौटते हैं। जैसे अनुभूति विवश कर देती है जानना भी बेचैन कर देता है।

तुलना करने की छूट मिल जाये तो कहूँगा आप अनुपम मिश्र से अच्छा उनसे आगे का पत्रकार तभी हो सकते हैं जब उनसे अधिक समझने-जानने लगेंगे। नल बन्द करने की जागरूकता और पृथ्वी के जल की चिंता में धरती आसमान का अंतर है। हालांकि कोई मसखरा कह सकता है कि आपको अनुपम मिश्र से बड़ा पत्रकार बनने के लिए उनसे बड़ा गांधीवादी होना पड़ेगा। हालांकि इस मसखरी में भी एक संदेश होगा। गांधी जैसे मनुष्य समाज के लिए जल जितने ही ज़रूरी हैं। कोई अधिक सयाना यह भी कह सकता है, श्रेष्ठ पत्रकार होने के लिए सन्त होना आवश्यक नहीं। वेद प्रताप वैदिक भी अच्छे पत्रकार हैं।

एक विचित्र कम पढ़े लिखों जैसा ही उदाहरण दें तो कह सकते हैं पत्रकार होना जानने के बल पर सफ़ाई वाला होना है। जैसे शरीर के बल पर सफ़ाई वाला मनुष्य होना। कब कहाँ किस नाले, मैनहोल, गन्दगी में उतरना पड़े पता नहीं। इनकार का कोई स्थान नहीं। साधन के नाम पर अंततः बच्चों के दूध की क़ीमत पर खरीदी गयी सिर्फ़ सस्ती शराब की बेहोशी का सहारा। जीवन में कुछ नहीं केवल ज़िंदा रहने भर की मजदूरी और कभी भी मर जाने का स्वीकार। सोचिए कितने गन्दे समाज होंगे जहां के महा नगरों में सफ़ाई वाले गंदे और घृणा तथा मृत्यु के सन्निकट रखे जाते हैं !

आमतौर पर पत्रकार को बुद्धि बल से इशारे या पूछकर सफ़ाई कर देने वाला माना जाता है। मगर कम लोग हैं जो जानते हैं किसी प्रकार की सफ़ाई के लिए अपना मोह छोड़ना पड़ता है। सफ़ाई का यहां मतलब सफ़ाई से ही है, सफाया नहीं। पत्रकार स्वतंत्र मष्तिष्क, आत्मनिर्भर, सफ़ाई वाला होता है। तभी वह समाचार से समाज -संसार में स्वच्छता ला सकता है।

मैं जब बड़े-बड़े पत्रकारों को देखता हूँ तो मुझे वे नगर निगम के सफ़ाई कर्मचारियों के कम पढ़े लिखे अधिक बलिष्ठ सरदार नज़र आते हैं। जिन पर शासन और शोषण तथा क्रूरता का टनों सदियों पुराना बोझ होता है। इन सरदारों के रहते शहर में गंदगी का क्या आलम होता है आप जानते ही हैं। कभी-कभी आपने देखा होगा ये नाला साफ़ कर सड़क में ही कूड़े की मेड़ बना देते हैं। कहना चाहिए कम पढ़े लिखे बड़े पत्रकार लढ़े अधिक होते हैं। वो कहावत है न, पढ़ा कम लढ़ा ज़्यादा।

अजीब लगेगा। मूर्खता पूर्ण लगने की अधिक संभावना है फिर भी कहूँगा, बिना सर्वाधिक जाने सन्त हुए आप पत्रकार या बुद्धिजीवी नही हो सकते। माफ़ करें सन्त होने का मेरा अभिप्राय महान बनना नहीं है। बल्कि एक ऐसी जीवन शैली अपनाना है जिसमें स्वस्थ और करुणावान रहते सफ़ाई जैसा काम प्रेमपूर्वक मेहनत से और लगातार किया जा सकता है।

यह सन्तोष की बात है कि हिंदुस्तान अच्छे पत्रकारों का देश रहा है। लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि आजकल पत्रकारों में सरदार ही सरदार नज़र आते हैं। मीडिया हाउस समाचारों के बूचड़खाने हैं। पत्रकार होकर लोग नागरिकों, राजनीतिकों से भी कम पढ़े लिखे हैं। पढ़ाई बहुत ज़रूरी है। इससे मनुष्यता आती है। उस देश की शिक्षा का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं जहां कम पढ़े-लिखे पत्रकार अंत में राज्यसभा पहुँचकर ही अपनी नासमझी छुपा पाते हैं।

मैं जानता हूँ पत्रकार मेरी इन बातों पर बाज जैसे टूट पड़ें अगर वे मान लें मेरे प्रसिद्ध हो जाने अथवा न होने से अधिक ज़रूरी है ऐसे उपदेश का विरोध जिसमें दावा हैसियत से ज़्यादा है। मगर ऐसा कुछ नहीं होगा। मेरी बातें वाक़ई कम पढ़े लिखे इंसान के मन की बाते हैं। केवल शीर्षक को अति आत्मविश्वास वाली थोड़ी चतुराई दे दी गयी है। कोई बात नहीं।

आप केवल इतना ध्यान रखें चीज़ गन्दी हो जाये तो उसे साफ़ कर देना चाहिए। इंसान बदला न जा सके तो उसे हरा देना चाहिए। सफ़ाई भी लड़ाई है। गंदगी की सफ़ाई करें। गंदगी फैलाने वालों से लड़ें भी। सबसे अधिक ज़रूरी है सफाया करने वालों से धरती की सफ़ाई। लोकतांत्रिक फ़ासीवाद और धार्मिक राष्ट्रवाद गंदगी हैं। इसे साफ़ करने के लिए आगे आएं और पत्रकार-बुद्धिजीवी बनें। धन्यवाद !


शशिभूषण

रविवार, 25 अक्टूबर 2020

नवीन सागर एक बड़ी कहानी जैसे हैं, जिसका एक टुकड़ा हमने बयान किया; बाकी टुकड़ा कोई दूसरा बयान करेगा

“अभी बेड रेस्ट पर हूँ। रेस्ट तो बेड ही कर रहा है मैं तो उस पर एक बीड़ी के लिए तरसती हुई घुटन सा पड़ा हूँ। माँ आ गयी है। जो दिन में पच्चीस बार मेरे कमरे में डरकर झाँकती है। वे भगवान से नाराज़ हैं। कि उन्हें कभी कोई बीमारी नहीं हुई जबकि उनके बेटों को कुछ भी हो जाता है।” एक पत्र में नवीन सागर। 

ऊपर ही उपर से देखने पर उपर्युक्त पत्रांश ममता की जीवनी है। माँ होने की करुणा। लेकिन हिंदी साहित्यिक जगत में यह माँ, हिंदी कहानी है। नवीन सागर कहानीकार। इससे अधिक क्या कहा जा सकता है कि नवीन सागर (29 नवंबर 1948 – 14 अप्रैल 2000) का पहला कविता संग्रह ‘नींद से लंबी रात’ उनके जीवन के 48वें साल 1996 में प्रकाशित हुआ। कहानीकार (पहला संग्रह ‘उसका स्कूल’ 1989) के रूप में आज उनका कहीं नाम नहीं लिया जाता। जबकि अनेक कुलेखकों की कट्टा भर किताबें प्रकाशित हैं। कई अलेखकों के घर पुरस्कारों से भरे हैं। यह अनायास ही होगा कि जिन्होंने नवीन सागर को पढ़ा होगा फिर चाहे कविताएँ हों या कहानियाँ उन्हें मुक्तिबोध, रेणु और स्वदेश दीपक की याद आ जायेगी। रेणु को अपना उपन्यास ‘मैला आँचल’ खुद छपवाना पड़ा। कालांतर में उन्हें आंचलिक कथाकार के अकादमिक बस्ते में डाल दिया गया। स्वदेश दीपक का कहीं कोई समाचार नहीं है कि वे अब कहाँ हैं ? मुक्तिबोध के बारे में यह तसल्ली की बात हो सकती है कि साहित्य-समाज कम से कम जानता तो है कि उनके साथ क्या-क्या हुआ ! यहीं यह दर्ज़ करना उपयुक्त होगा कि कहानीकार नियति में मुक्तिबोध और नवीन सागर में मार्मिक साम्य है। आज तक मुक्तिबोध को कहानीकार की तरह नहीं पुकारा जाता जबकि उन्होंने नयी कहानी के दौर के किसी कहानीकार से कम यादगार कहानियां नहीं लिखीं। यही कहानीकार नवीन सागर के साथ है। बतौर लेखक नवीन सागर की पहली महत्वपूर्ण किताब ‘उसका स्कूल’ कहानी संग्रह ही है। इस संग्रह की कहानियाँ सत्तर-अस्सी के दशक के किसी हिंदी कहानीकार की कहानियों से कमतर नहीं हैं। बल्कि कहना चाहिए कि नवीन सागर के कहानीकार की उपेक्षा का उनके समकालीन कहानीकारों को फ़ायदा ही मिला। नवीन सागर की कहानियों की भूमि वाली उनसे कमज़ोर कहानियाँ चर्चा में बनी रहीं। 

नवीन सागर ऐसे हैं भी कि अगर उनकी कविताओं का ध्यान करें तो कहानियों के बारे में मन चला जाता है। अगर कहानियों पर राय बनाने बैठें तो कविताएं दोहराने का दिल हो आता है। कहीं जो कविता कहानी दोनों के विषय में खुद को समेटने के प्रयास में बैठें तो उनका बाल साहित्य और चित्र आमंत्रित करने लगते हैं। इतना ही नहीं इंसान नवीन सागर का प्रेम, मैत्री, सपने, बड़प्पन, परिश्रम अपने जादुई प्रभाव में ही खींच लेते हैं। हृदय में लालसा भर जाती है काश ! हम भी नवीन सागर हो पाते। कुछ-कुछ हम भी ऐसी ही फितरत वाले हैं हाय पूरे ही नवीन सागर क्यों न हुए! वैसे ही सुदर्शन होते। वैसे ही दोस्त, प्रेमी, पिता और मेज़बान हो पाते। नवीन सागर को कम उम्र मिली तो क्या हुआ जीवन-लेखन ऐसा ही जिजीविषा-संवेदना से भरा होना चाहिए। कमाल की बात यह है कि यह सब मेरे भीतर की फीलिंग्स हैं। मैं नवीन सागर से कभी मिला नहीं। मैंने नवीन सागर को कभी दूर से भी नहीं देखा। बल्कि कहिए नवीन सागर यह नाम ही मैंने उनकी मृत्यु के 10 साल बाद सुना। लेकिन जब सुना, पढ़ा और जाना नवीन सागर मेरी आत्मा के मित्र हो गए। इस प्रेम में डूबते चले जाने में जिन लेखकों व्यक्तियों का बड़ा हाथ है उनमें से कुछ के नाम हैं- विष्णु खरे, कमला प्रसाद, ज्योत्सना मिलन, उदय प्रकाश, विष्णु नागर, राजकुमार केसवानी, मुकेश वर्मा, विनीत तिवारी, प्रयाग शुक्ल, समता सागर, और स्वयं नवीन सागर का रचना संसार। 

विरले साहित्यकार हुए हैं जिन्होने कविता, कथा, बाल साहित्य, चित्रकला चारों प्रकार की मिट्टी में अपने लेखकीय श्रम, कला प्रतिभा, रचनात्मकता और प्रतिबद्धता से संवेदना, मनुष्यता, सौंदर्य, शिल्प, प्रयोग, व्यंजना का हरापन पैदा किया, भावत्मकता को सींचा और उसे विचार पुष्ट लहलहाया है। जाने-माने कवि समीक्षक विष्णु खरे नवीन सागर के बारे में लिखते हैं- “यदि हम मुक्तिबोध को सूर्य मानें और शमशेर बहादुर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल और नवीन सागर को उनसे अपने-अपने तरीक़े से ऊर्जा पाने वाले ग्रह तो हम पायेंगे कि स्वायत्त होते हुए भी, शमशेर अपनी परिक्रमा में मुक्तिबोध के सबसे नज़दीक आ जाते हैं, विनोद उनसे कम और नवीन विनोद से भी कम।“ विष्णु खरे अपनी इसी बात को अधिक स्पष्ट करते हुए फिर एक जगह लिखते हैं- “मुक्तिबोध और नवीन सागर को परस्पर समकक्ष ठहराना दोनों के प्रति एक मूर्खतापूर्ण अन्याय होगा लेकिन निम्नमध्यमवर्गीय विपन्नता, यंत्रणा, असुरक्षा, आतंक और अकेला कर दिए जाने को दोनों अपनी कविता में मार्मिक रूप से लाते हैं।“ 

किसी कहानी की इससे बेहतर समीक्षा नहीं हो सकती कि उसे सुना दिया जाये। कहानी सुनाने में अगर यह प्रयत्न शामिल हो कि कहानी बिल्कुल वैसे ही सुनाई जाये जैसी कि वह है यानी कहानी का कोई संकेत, मंतव्य और मर्म छूटने न पाये तो कहने की ज़रूरत नहीं कि कहानी भूलने लायक नहीं है। यदि कहानी सुनाने की यह अभिलाषा और लालसा किसी ग़ैर पेशेवर वाचक, आलोचक, नागरिक, शिक्षक और पालक में मिले तो समझिए कहानी सफल है। अकादमिक जगत में, आलोचकों की दुनिया में उस कहानी का चाहे जो मूल्यांकन होता हो या फिर हुआ ही न हो फिर भी वह कहानी बड़े काम की है। ऐसी कहानियों की ज़रूरत समाज को हमेशा पड़ती है। बल्कि कहना चाहिए ऐसी कहानियों से ही समाज अपने भीतर झांकता है। बदलाव लाता है। इसे मज़बूती से कहना चाहिए कि नवीन सागर के पास ऐसी सुनाने की आकांक्षा पैदा करने वाली कहानियों की संख्या ही अधिक है। उनके पास अविस्मरणीय कहानियों की संख्या भी उन कहानीकारों से कम नहीं हैं जिन्होंने सत्तर-अस्सी के दशक में कहानीकार की प्रसिद्धि हासिल की। इतना ही नहीं नवीन सागर की कहानियाँ पढ़ते हुए अमरकांत, विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश, स्वयं प्रकाश, शिवमूर्ति की बरबस याद आती रहती है। कहीं-कहीं भावनात्मक रूप से लगता है कि नवीन सागर ऐसा ही चमकता कहानी का एक नक्षत्र था जो असमय आसमान से टूट गया। मृत्यु ने इस गहरी नवीन कथायात्रा को बीच में ही रोक दिया। यद्यपि नवीन सागर का एक ही कहानी संग्रह ‘उसका स्कूल’ जानने में आता है। लेकिन उनकी जो कहानियाँ पढ़ने के बाद हमारे मन में टंक जाती हैं और अपने वक्त को पहचानने के लिए हमें दृष्टि देती हैं उनमें से कुछ के नाम हैं- उसका स्कूल, मोर, पत्थर, घोड़ा का नाम घोड़ा, तीसमार खाँ, लौटा तो कहीं नहीं, मूँछ, माँ, अंतहीन, हत्यारा, किसी की शक्ल, बोझ, घर, क्षेपक, अपनी ज़मीन और सत्यकथा। किसी एक संग्रह वाले कहानीकार की इतनी महत्वपूर्ण कहानियों की फेहरिश्त समय-समाज की ही नहीं हिंदी कहानी आलोचना की कहानी भी कहती है। 

इससे पहले कि नवीन सागर की कुछ उल्लेखनीय कहानियों की विवेचना करें उनकी कहानियों की उन विशेषताओं का उल्लेख आवश्यक है जिनसे यह जानने में आसानी हो कि नवीन सागर की कहानियां कैसी हैं- 

1. नवीन सागर की कहानियों में फैंटेसी मिलती है। यह फैंटेसी कहानियों के देशकाल को विस्तृत कर देती है। इन्हें पढ़ते हुए मुक्तिबोध की याद आना स्वाभाविक है। 

2. नवीन सागर की कहानियों में प्रतिबद्धता और विचार वैसे ही हैं जैसे कुम्हार की सानी हुई मिट्टी से बने बर्तन में रूप। कहना मुश्किल ही रहेगा कि बर्तन का यह रूप पानी से मिला, चाक से, मिट्टी से, हाथों से या फिर आंवा की आग से। 

3. संवेदना, उसूल और सुधार नवीन सागर की कहानियों के केंद्र में हैं। शायद ही कोई ऐसी कहानी मिले जिसके कथा चरित्रों से हमारी संवेदना का रिश्ता न बन जाये। 

4. नवीन सागर की कहानियों की भाषा में काव्यात्मकता वहीं है जहाँ काव्यात्मक स्थल हैं। संवाद ऐसे हैं कि यकीन हो जाता है जीते जागते इंसानों की बातचीत चल रही। बिल्कुल वैसा ही टोन, विट और ह्यूमर। 

5. यथार्थ को नवीन सागर ने कहानियों में वैसे ही बरता है कि उनकी कहानियाँ बिल्कुल यथार्थ लगती हैं लेकिन यथार्थ की मात्रा उतनी ही है जैसा कि नामवर सिंह कहते हैं कि यथार्थ नमक की तरह होता है उसे कहानियों में वैसे ही इस्तेमाल करना चाहिए। 

6. नवीन सागर की कहानियों में व्यंग्य नहीं मिलेगा लेकिन भाषा हँसमुख मिलेगी। कहीं कहीं इतनी विनोदिनी भाषा कि हँसते–हँसते पेट में बल पड़ जायें। मन निर्मल हो जाए। इसी बीच आँखों के कोर भी भीग जायें। 

7. मनुष्यता, बराबरी, न्याय, प्रेम, मैत्री, सहकार और परिवर्तनकामना नवीन सागर की कहानियों में सहज मिलते हैं। मर्म, व्यंजना और चोट की अप्रतिम कहानियों के कृतिकार हैं नवीन सागर। 

8. नवीन सागर की कहानियों में आज की हिंदी कहानी में लगभग अनुपस्थित किस्सागोई मिलती है। 

‘उसका स्कूल’ नवीन सागर की कुछ-कुछ वैसी ही मार्मिक कहानी है जैसी स्वयं प्रकाश की ‘बलि’, शिवमूर्ति की ‘केशर कस्तूरी’ और प्रकाशकांत की ‘अमर घर चल’। चूँकि कोई भी दो कहानियाँ एक सी नहीं होतीं इसलिए कुछ-कुछ वैसी ही कहने का अभिप्राय यह है कि इस कहानी में आयी व्यवस्था विडंबना, सामाजिक निरुपायता और मानवीय दुख बोध भी वैसे ही हैं। ‘उसका स्कूल’ एक घरेलू नौकरानी की बच्ची की कहानी है। बाई, मालिक के आग्रह पर जो प्रोफेसर हैं अपनी बच्ची को उनके घर में बच्चों की देखभाल के लिए भेजना शुरू कर देती है। प्रोफेसर की पत्नी को नयी नयी नौकरी मिली है। उसके सामने शर्त है कि वह नौकरी छोड़ दे या कोई छोटे बच्चों की देखभाल करे। नौकरानी की बच्ची इसके लिए तैयार नहीं है। वह स्वयं स्कूल जाना चाहती है। उसे स्कूल प्यारा है। बच्ची की माँ उसे मनाती है। बच्ची बेमन से जाती है। एक दिन वह अपना बस्ता भी ले जाती है। वहाँ उसकी किताबें फट जाती हैं। बच्ची रोती है। माँ को बताती है। माँ उसे डाँटती है -बस्ता लेकर क्यों गयी ? बच्ची के मना करने के बावजूद मजबूर माँ बेटी को प्रोफेसर के घर बच्चों की देखभाल के काम में भेजती है। इसी में बच्ची का अपना स्कूल छूट जाता है। बच्चों की देखभाल में लगाये जाने के कारण किसी बच्ची का स्वयं पढ़ न पाना, अभिलाषा के बावजूद उसके स्कूल छूट जाने की यह कहानी पढने-सुनने वाले का मन भिगो देती है। यहीं ऊपर की वह बात दुहराई जा सकती है कि सुनाने लायक कहानी है ‘उसका स्कूल’। जो पढ़ेगा, सुनाना चाहेगा। जो सुनेगा, वह समझ लेगा। कहानी भीतर रह जायेगी। स्कूल न जा पा रही बच्ची बार-बार याद आयेगी। यहीं लगता है नवीन सागर बच्चों का मसीहा कथाकार है। आज शिक्षा और बच्ची की माँ में कोई अंतर नहीं। 

‘घोड़े का नाम घोड़ा’ ऐसी प्यारी कहानी है कि जान फूँक दे। ऐसा गुदगुदाए कि मनहूस भी हँस पड़े। कठोर से कठोर हृदय इंसान भी बच्चों पर जान छिड़कने लगे। कहीं कोई अपने बेटे-बेटी से दूर रहता हो तो रो ही पड़े। इस कहानी की भाषा और मर्म जहाँ एक ओर रवींद्र नाथ ठाकुर की याद दिलाते हैं तो दूसरी ओऱ मन्नू भंडारी की। कहानी क्या है बाल-किशोर मन, खिलौनों, बचपन, भाई-बहन, माँ-बाप, पास-पड़ोस, बालश्रम, सख्य भाव और स्मृतियों की करुणा भरी हिरनी है। जिसके साथ-साथ मन दौड़ता जाए मगर थके-भरे न। अंत में पछताए हाय ओझल हो गयी। कहानी की शुरुआत से पहले ही दर्ज़ नोट मानीखेज है- यह दुनिया एक बड़ी कहानी जैसी है, जिसका एक टुकड़ा हमने बयान किया। बाकी टुकड़ा कोई दूसरा बयान करेगा। ‘घोडे का नाम घोड़ा’ मूलत: एक लड़की की कहानी है जो खिलौने बनाकर बेचने वाले लड़के से एक घोड़ा खरीदती है। वह जैसे ही घोड़ा घर लाती है भाई उसे पाना चाहते हैं। पड़ोस की एक प्यारी लड़की उसे लेना चाहती है। मगर घोड़ा लड़की को बहुत प्रिय है। लेकिन एक दिन ऐसा होता है कि उसे वह घोड़ा पड़ोस की दोस्त लड़की को देना पड़ता है। आगे की कहानी इसी खिलौना घोड़े के साथ साथ एक पूरी प्यारी स्मृति का चक्र पूरा करती है। घोड़ा खरीदने का यह शुरुआती अंश ही कहानी की सामर्थ्य, प्रभाव का पता देता है- 

वह विनती करता सा बोला, “दोनो ले लो, नहीं तो जोड़ी टूट जायेगी।” 

मैंने कहा, “जोड़ी टूट जायेगी तो क्या अकेला घोड़ा तुम्हारे पास रोयेगा ?” 

वह बोला, “एक आपके पास भी रोयेगा।” 

मैंने कहा, “मैं उसके आँसू पोंछ दूँगी।” 

वह मुस्कुराने लगा तो देखा उसके आगे के दो दाँत नहीं हैं। 

मैंने पूछा, “तुम्हारे दो दाँत कहाँ गये ?” 

वह बोला, “मैं जब सो रहा था चूहे ले गये।” 

अच्छा ! मैंने कहा, “बाकी दाँत क्यों छोड़ गये ?” 

वह हँसकर बोला, “वे जल्दी में थे पिर कभी आकर बाकी भी ले जायेंगे।” 

‘मोर’ नवीन सागर की ही नहीं हिंदी की मील का पत्थर कहानी है। इसके बारे में आलोचक कमला प्रसाद ने बिल्कुल ठीक लिखा है- ‘मोर’ यथार्थ की कालातीत गाथा है। वे आगे लिखते हैं ‘यह विजयदान देथा की कथा परंपरा की याद दिलाती है। मोर लोक की वाचिक परंपरा से अपना शिल्प गढ़ती हुई अपने प्रभाव को लोककथा के प्रभाव के समकक्ष निर्मित कर लेती है।‘ इस कहानी में हिंदी कहानी की लुप्त होती पठनीयता और किस्सागोई है। संभवत: ‘मोर’ आपातकाल के दौर को बयान करती हिंदी की सबसे सशक्त प्रतीकात्मक कहानी है। इस कहानी का थानेदार पुलिसिया क्रूरता, हिंसा, हत्या का चरम निष्करुण रूप संभव करता है। यद्यपि कहानी का नायक अमर लोक नायक ‘मोर’ ही है लेकिन मुख्य पात्र हुल्ले काछी है जो मोर की हत्या का ज़िम्मेदार पुलिस को मानता है। वह थाने जा जाकर जीवन पर्यंत जब तक कि मार नहीं दिया जाता थानेदार को गालियाँ देता है, धिक्कारता है। उसे बार-बार पीटा जाता है, घसीटा जाता है, उसकी पत्नी, उसे भी मार तक दिया जाता है मगर वह यह विरोध-भर्त्सना जीवित रहते नहीं छोड़ता भले थानेदार बदल गये, भले दवा तक के पैसे नहीं, भले अंग-अंग भंग किये गये। कहानी के अंत में उसी कुएँ से जिसमें हुल्ले काछी की गर्भवती पत्नी मरी थी लंबे अरसे बाद बाल्टी में फँसकर एक सांवला बच्चा निकलता है। पूछने पर वह बताता है कि मैं हुल्ले काछी का बेटा हूँ। लेकिन इतना लंबा वक्त गुज़र चुका है कि लोग हुल्ले काछी, थाने सब को भूल चुके हैं। यहीं प्रतिरोध अखंड और सार्वभौमिकता प्राप्त कर लेता है। उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानी ‘टेपचू’ की याद आ जाती है। 

नवीन सागर की कहानियाँ अपने वक्त की सीमा को लाँघकर आज की कहानियाँ लगती हैं। इसका कारण यही समझ में आता है कि कहानीकार ने यथार्थ को समाज, देश, व्यवस्था, नागरिकों, संबंधों, प्रेम, सपनों, बदलाव, सुधार, निर्माण की ऐतिहासिक धारावाहिकता में गलाया है। समाजवादी निष्ठा से भरे कहानीकार नवीन सागर दृष्टि संपन्न कथाकार हैं। उनके कथा कौशल में दृष्टा होना मुख्य है। वे विचार-सिद्धांत का अनुयायी या प्रवक्ता प्रतीत नहीं होते। उनमें दार्शनिक तटस्थता, कलाकार की उदारता और कवि की हृदयस्पर्शिता तथा कहानीकार की कल्पना एवं परकाया प्रवेश सामर्थ्य हैं। जैसा कि अक्सर होता है नवीन सागर की कहानियाँ किसी एक भाव, घटना, दृश्य, विचार, प्रसंग की फोटोग्राफ़ या वीडियो या इतिवृत्त या स्टोरी नहीं हैं बल्कि वे उस किस्सागो के आख्यान की तरह हैं जो जानता है कि कुछ चीज़ें अवश्य बदल जायेंगी लेकिन कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलेंगी। मनुष्य समाज में जो सतत प्रवहमान रहते हैं उस सभ्यता, संवेदना, संबंधों, प्रतिरोध, एकाकीपन, अदम्य मनुष्यता, मैत्री को नवीन सागर की कहानियों में अपराजेय स्थान मिला है। यही कारण है कि भाषा, शिल्प, प्रयोग और किस्सागोई को नवीन सागर ने कभी नहीं छोड़ा। बल्कि वे उसे पुनर्नवा करते रहे। 

नवीन सागर की कहानियाँ ‘पत्थर’, ‘तीसमार खाँ’ और ‘लौटा तो कहीं नहीं’ बीते समय की ही दस्तावेज़ी कहानियाँ नहीं है। आज का भारत जिस हिंसा, बेकारी, नागरिक अकेलेपन, सांस्कृतिक विघटन, लोकतांत्रिक पूँजीवाद, धार्मिक राष्ट्रवाद, धूर्त बड़बोलेपन, उपमहाद्वीपीय स्वप्न भंग की गिरफ्त में हैं उसे डिकोड करने की दृष्टि से भी उल्लेखनीय हैं। मेरे विनम्र मत में देर से ही सही यह नवीन सागर को हिंदी कहानी की चर्चा और बहस में शामिल करने का सही वक्त है। हिंदी के इस अत्यंत महत्वपूर्ण कवि-कहानीकार की चली आती उपेक्षा असह्य है। 

दीपक ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा औऱ बोला, “ सुनाओ जनार्दन” जनार्दन बोला, “सुनो” 


ओ मेरे आदर्शवादी मन 

ओ मेरे सिद्धांतवादी मन 

अब तक क्या किया 

जीवन क्या जिया 

उदरम्भरि बन... 

यहाँ तक आते-आते जनार्दन की जीभ ऐंठ गयी। दूसरे ही क्षण उसने उल्टी कर दी। वह कुर्सी पर गिर पड़ा। फिर कुर्सी ज़मीन पर गिर पड़ी। वह धूल में औंधा पड़ा ओकने लगा। (तीसमार खाँ) 

“दद्दा, गाय विष्ठा खाती है। मंदिर के सामने घूरे बना लिए हैं। माँ-बाप को लात मारते हैं। आप समझते हैं आप ही यह सब भोग रहे हैं। अरे सब भोग रहे हैं।” (पत्थर) 


- शशिभूषण, उज्जैन, म.प्र. 
  मो. 9424624278 
(लमही, कथा-समय विशेषांक अक्टूबर-दिसंबर2019 में प्रकाशित)

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

मुफ़्तख़ोर कौन है ?

कल रास्ते में चौबे जी मिल गए। दुःख भरे खीझ खीझकर कहने लगे, जनता मुफ़्तखोर हो गयी है। जनता को सब मुफ़्त में चाहिए। मैंने पूछा, जनता को क्या मुफ़्त में चाहिए ? उसे मुफ़्त में कौन देता है ? चौबे जी झल्लाए, बनिये मत। आपको इतना भी नहीं मालूम ? जनता को बच्चों की शिक्षा मुफ़्त चाहिए। घर में बिजली मुफ़्त चाहिये। पानी मुफ़्त चाहिए। इतना ही नहीं घर की औरतों के लिए बस ट्रेन का किराया भी मुफ़्त चाहिए। जो जो मिल जाये सब मुफ़्त चाहिए। काम तो कुछ करना नहीं चाहते लोग। मैंने पूछा, मुफ़्त में देता कौन है ? चौबे जी चीखे, आजकल के कुछ देशद्रोही, आतंकवादी नेता। मुझे अचरज हुआ। लेकिन फिर मैं कुछ कुछ समझ गया। मैंने चौबे जी से पूछा, चौबे जी शिक्षा, बिजली, पानी की बात आपको जल्दी समझ में आएगी नहीं। इसलिये उस बात से शुरू करते हैं जो आपको समझ में आती है। चौबे जी ने मुझे तरेरा, क्या कहना चाहते हैं आप ? आप बड़े ज्ञानी हैं ?

मैं : चौबे जी आप चौबे हैं या चतुर्वेदी ?
चौबे : हम चौबे हैं।
मैं : आपके दादा जी चौबे थे या चतुर्वेदी?
चौबे : दादा जी भी चौबे थे। लेकिन हमारे पुरखे चतुर्वेदी थे।
मैं : चौबे होने के लिए दादा जी ने कोई शुल्क दिया था ?
चौबे : कैसे मूर्ख हैं आप ? कुल नाम के लिए कोई फीस देता है?
मैं : क्या आपकी बेटी भी चौबे है ?
चौबे : वह शुक्ला है ?
मैं : ऐसा क्यों ?
चौबे : उसकी शादी हो चुकी।
मैं : शादी दहेज देकर हुई या बिन दहेज?
चौबे : बड़े मनई कोई शादी बिन दहेज करते हैं?
मैं : फिर आपकी बहू चौबे होगी ?
चौबे : हां, बहू चौबे है।
मैं : पहले भी चौबे थी ?
चौबे : पहले दुबे थी।
मैं : बेटे की शादी में दहेज मिला था या... ?
चौबे : क्या हम कंगले हैं जो बिन दहेज बेटा देंगे ?
मैं : चौबे जी आपके घर के लड़कों को सरनेम मुफ़्त है ?लेकिन लड़कियों के सरनेम में लेन-देन जुड़ा है ऐसा क्यों ?
चौबे : आपकी मति भ्रष्ट है तो क्या बताएं ? यह रिवाज़ है।
मैं : फिर तो आपको बहुत कुछ विरासत में मिला होगा ?
चौबे : क्यों नहीं ? घर, ज़मीन जायदाद, सब विरासत में ही तो मिला।
मैं : आप कह रहे हैं कि आपको ज़मीन जायदाद मुफ़्त मिली ?
चौबे : इसे मुफ़्त आप जैसा कोई गद्दार ही कह सकता है।
मैं : नाराज़ मत होइए। रिवाज़ और नियम क्या एक ही हैं ?
चौबे : विरासत भी नियम हैं। रिवाज़ भी क़ानून है।
मैं : अच्छा, क्या नेता भी रिवाज़ बना सकते हैं ?
चौबे : नेता क़ानून बना सकते हैं।
मैं : इसीलिए कोई नेता जनता को बुनियादी चीजें मुफ़्त दे रहा होगा। इससे जनता मुफ़्तखोर कैसे हुई ?
चौबे : आप महा मूर्ख हैं। नेता बाप दादा नहीं होता। वह नेता होता है।
मैं : जनता औलाद नहीं होती; जनता होती है।
चौबे : हाँ।
मैं : कोई नेता जनता को औलाद माने तो ?
चौबे : अच्छी बात है। लेकिन वह जनता को मुफ़्तखोर नहीं बना सकता।
मैं : जनता को मुफ़्त देने में वैसे दिक़्क़त क्या है ?
चौबे : जनता को सब मुफ़्त बांट देने से देश में बचेगा क्या ?
मैं : जनता बचेगी।
चौबे : बाक़ी कंगाल हो जाएंगे। ख़ज़ाना ख़ाली हो जाएगा।
मैं : जनता बचेगी। जनता ख़ुद ख़ज़ाना है।
चौबे : आप बकवास कर रहे हैं। अब आपसे कोई बात नहीं हो सकती। मुफ़्तख़ोरी देश को बर्बाद कर देगी। देश के टुकड़े- टुकड़े कर देगी।
मैं : ख़ुशहाल जनता देश को बनाएगी बचाएगी या शिक्षा, पानी, दवा को तरसती जनता ?
चौबे : आपसे बहस बेकार है। आप असभ्य हैं। नक्सली हैं। टुकड़े टुकड़े गैंग के सदस्य हैं।
मैं : चौबे जी बस कीजिए। पहले अपनी मुफ़्तख़ोरी से बाज आइये। पैतृक संपत्ति के बल पर तीन तिकड़म से थोड़ा बहुत उसमें जोड़कर मूछों में ताव दिए घूमते हैं।
चौबे : चौबे होना मुफ़्तख़ोरी है ? आपसे बड़ा मूर्ख , धर्म का दुश्मन दूसरा कोई मिलेगा धरती पर ?
मैं : सेंत के चौबे लोगों को यही लगेगा।
चौबे : चोप्प ! मुँह बंद रखना अब। हिन्दू विरोधी कहीं के।

आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इसके बाद क्या हुआ होगा। चौबे जी ने मुझे बड़ी भद्दी भद्दी सुनायी। जनता के साथ साथ मुझे भी ज़ाहिल और आलसी कहा। उनका बस चलता तो मुझे मारते भी। लेकिन मैं चुप लगा गया और जल्दी ही वहां से चला आया। मुझे अफ़सोस चौबे जी से गाली खाने का उतना नहीं है जितना उन्हें न समझा पाने का है। चौबे जैसे लोग दरअसल कुछ समझना ही नहीं चाहते। उन्हें जो जो मिला उसे अपना अधिकार, योग्यता समझते हैं। लेकिन जनता को जो नागरिक होने के नाते सरकार से स्वतः मिलना चाहिए उसे मुफ़्तख़ोरी समझते हैं।

चौबे लोगों की यही समस्या है। उनके जैसे नेताओं की भी यही समस्या है। वे जनता को मुफ़्तख़ोर बता कर भी अपने लिए माल मत्ता कमाना चाहते हैं। बल्कि बेशुमार कमा भी लेते हैं। यह गड़बड़ रामायण रुकनी चाहिए। ग़रीब जनता को सरकार से वह सब मिलना चाहिए जो उन्हें पुरखों से नहीं मिला। जिसके लिए वे मोहताज़ हैं। सरकार पालनहार होती है। उसे जनता को पालना पोषना और जोड़कर रखना चाहिए।

- शशिभूषण

शुक्रवार, 10 मई 2019

साहित्य का तकाज़ा और नामवर सिंह


"यद्यपि जिन रचनाओं की चर्चा वे कर रहे थे, वे मेरी नहीं हरिशंकर परसाई की लिखी थीं। पर विषय बदलने के डर से तथा अपनी सहज नम्रतावश मैंने उनके कथन में सुधार करना उचित नहीं समझा। सोचा चलने दो, कौन यह नामवर सिंह है, जिसकी भूलें सुधारना साहित्य का तकाजा हो।" - शरद जोशी, 'कहहुँ लिखि कागद कोरे' शीर्षक व्यंग्य का अंश।

मैंने अपने विद्यालयी दिनों में यानी बालिग़ होने से पहले तत्कालीन लागू हिंदी पाठ्यपुस्तक में शरद जोशी के व्यंग्य 'कहहुँ लिखि कागद कोरे' के इसी अंश में पहली बार रीवा जैसे शहर में 'नामवर सिंह' लिखा पढ़ा था। तब तक मेरे लिए नामवर सिंह को जानना या उन्हें सुन रखना दोनों का सवाल ही नहीं उठता था। मैंने अपने हिंदी शिक्षक से पूछा नहीं कि नामवर सिंह कौन हैं ? इस व्यंग्य का क्या अभिप्राय है ? शिक्षक ने मानो केवल इतना ही कहा- नामवरों का क्या भरोसा ! मैंने चौंकते हुए अपनी बाल बुद्धि से सोचा- नामवर सिंह यानी साहित्य का तीसमारखाँ टाईप। यदि आगे साहित्य में डूबना है तो नामवर सिंह से सतर्क रहना होगा अथवा उनकी भूल सुधार सकने की तैयारी रखनी होगी। 

इसके बाद मैंने राज्य और संघ लोक सेवा आयोग के हिंदी विषय लेने वाले प्रतियोगियों से नामवर सिंह की उद्धरणों वाली बाक़ायदा चर्चा सुनी- ये कहा, वो कहा, इस पर विवाद है, इस स्थापना को कोई काट नहीं सकता आदि आदि। मैं प्रभावित हुआ। होना ही था। फिर मैथ्स ग्रेड्यूएशन के बाद हिंदी से एम ए करने विश्विद्यालय गया तो नामवर सिंह को विधिवत पढ़ा - लेख, भाषण, किताबें जो भी प्रो कमला प्रसाद की बनायी हिंदी विभाग की उस लाइब्रेरी में उपलब्ध था। आगे उन्हें सुनने का भी मौका मिला। उन्हीं सालों एक मशहूर शेर मेरे जेहन से टकराया था- हुए नामवर बेनिशां कैसे कैसे/ ज़मी खा गयी आसमां कैसे कैसे। लेकिन नामवर सिंह तो अमर हैं, ख्याति में सर्वोपरि। आलोचकों में सिरमौर। विद्वानों में बादशाह। इनका कभी अंत न होगा- ख़याल आता।

कुछ भी हो शरद जोशी की इस एक पंक्ति ने असर निर्णायक किया, करती है इसमें दो मत नहीं। व्यंग्य का प्रभाव अमिट होता ही है। मेरे भीतर नामवर सिंह की भूलें तजवीज करने की प्रवृत्ति यहीं से आयी। यह हुआ तो नामवर सिंह के प्रति श्रद्धा विकलांग होने से बची रही। मैंने गौर किया नामवर सिंह की मुस्कुराती तस्वीरें व्यंग्य, आक्रामकता और बेपरवाह दृढ़ता की तस्वीरें हैं। उनके चेहरे में हजारी प्रसाद द्विवेदी के चेहरे की उदात्त सौम्यता की जगह व्यंग्य है। यह अनायास नहीं है कि नामवर सिंह ने बड़े बड़ों को ध्वस्त करने के लिए व्यंग्यपूर्ण बारीक विवेचना और किसी को भी स्थापित करने के लिए उदार व्याख्या का सहारा लिया। आइए संक्षेप में नामवर सिंह की कुछ भूलों पर गौर करते हैं -

नामवर सिंह का लिखना छोड़कर बोलने पर आ जाना कालांतर में उनके आलोचक की हार साबित हुई। वे लोकप्रिय व्याख्याता रह गए। नामवर सिंह चाहते तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तरह इतिहास लिख सकते थे। लिखने पर केंद्रित रहते उन विरोधाभासों, अंतर्विरोधों परस्पर विरोधी निष्पत्तियों, परिवर्तनशील स्थापनाओं को स्वतः संपादित कर उस दोष से बच सकते थे जो बोलने के साथ जुड़े होते हैं। यह कहना अच्छा लगता है कि नामवर सिंह ने हिंदी साहित्यालोचन में ओशो का दर्जा हासिल किया। लेकिन इसके ख़तरे भी सर्वविदित हैं। अध्यात्म का सम्बंध परमात्मा से है और साहित्य का यथार्थ से। परमात्मा किसी को नहीं मिलता। यथार्थ सबका अपना होता है। ओशो अंत में ध्यान कराते थे और साथ नृत्य भी करते थे। लेकिन नामवर सिंह को हमेशा अपने श्रोताओं को उनके हाल पर छोड़कर अकेले ही प्रोफेसर, कुलपति आदि रहना पड़ा। छूटे हुए कुछ श्रोता, पाठक भी थे और स्वयं लेखक भी। वे सुनकर मुग्ध हो सकते थे तो बाद में चिढ़ भी सकते थे। ऐसा हुआ भी। यह अब तक का शुक्र है कि नामवर सिंह हरिशंकर परसाई और कांतिकुमार जैन के वैसे हत्थे नहीं चढ़े जैसे रजनीश। इसके पीछे दो कारण हैं पहला परसाई अब हैं नहीं दूसरा कांतिकुमार जैन प्रोफेसर रह चुके हैं। वे शिवमंगल सिंह सुमन सरीखा यानी मरने के पहले और मरने के बाद जैसा दांव नामवर सिंह के साथ नहीं खेल सकते।

नामवर सिंह भले ही राजेन्द्र यादव से टकराते रहे हों मगर वे अपनी वाचिक प्रतिष्ठा के शिखर पर स्नोवा बार्नो को स्त्री कहानीकार की तरह ही महत्वपूर्ण मान पाए। यह बाक़ायदा शोध का विषय है कि नामवर सिंह जैसा विमर्श विरोधी आलोचक एक पुरुष को स्त्री नाम से लिखता पाकर उसे बड़ी स्त्री कहानीकार मान बैठा और बाद में सब कुछ जानने के बावजूद अनजान बना रहा। इतना ही नहीं नामवर सिंह ने ज्योति कुमारी की किताब के लोकार्पण में भी काफ़ी कुछ बोला और नाना प्रकार की दूसरी किताबों, साहित्यकारों पर भी भाषण दिए जो बाद में सही नहीं उतरे।

हिंदी दलित लेखन भी नामवर सिंह के मज़बूत हाथ न पा सका। काफ़ी बाद में उन्होंने यह स्वीकार किया कि दलित आत्मकथाओं का यथार्थ गंभीर और विचारणीय है मगर वे इस पर डंटे रहे कि साहित्य की कसौटी में केवल स्वानुभूति को मुख्य नहीं माना जा सकता। इसके पीछे यही कारण समझ में आता है कि नामवर सिंह आत्माभिव्यक्ति की भावना को छायावाद युगीन प्रवृत्ति मानते रहे। जहाँ साहित्यिक उदात्तता थी। चूंकि वे छायावाद में उस व्यक्तिवादी भावना का उभार लक्षित कर ही चुके थे जिसमें आत्मकथा लेखन की परंपरा सी चल पड़ी थी इसलिए वे दलित लेखन से साहित्यिक कलात्मक उत्कृष्टता की मांग पर अडिग रहे किंतु दलित साहित्य को सामाजिक यथार्थ के अध्ययन के लिए उपयुक्त भी मानते रहे।

नामवर सिंह की आलोचना विरासत भी जो अब हमारे सामने है वह उनकी भयंकर भूलों से भरी हुई है। इसमें दो तरह की प्रवृत्तियां मुख्य हैं। पहली वह जिसमें नामवर सिंह ने दूसरे आलोचकों को सामने नहीं आने दिया अथवा विनम्रता में दबकर कहना चाहिए उनके तेज में दूसरे मंद ही रहे और कालांतर में बुझ गए। दूसरी वह प्रवृत्ति जिसके आधे में वे आलोचक हैं जो हैं तो नामवर अनुगामी लेकिन वे आलोचना को दूसरी परम्परा से आगे नहीं ले जा पाए यानी नामवर सिंह की उत्तराधिकारी आलोचना की अनुपस्थिति। यहीं कमाल यह है कि जहां कुछ टीकाकार बाद के आलोचकों को नामवर सिंह की जेब से निकला पाते हैं वहीं कुछ को उनकी जेब फाड़कर निकला। कुल मिलाकर इसमें नामवर सिंह की भूलें भी बराबर की उत्तरदायी मानी जायेगी कि वे हिंदी और साहित्य के लोकतंत्र में अधिनायक बनकर रहे। उन्होंने अपनी इंटेलिजेंट स्थापनाओं से हिंदी समाज को जितना चमत्कृत किया उतना ही शब्दों को भी यथावसर बारीक पकड़ने वाली विदग्धता से किसी को भी उठाया गिराया। उदाहरण के लिए यह नामवर सिंह ही थे जो कह सकते थे- कविता एक खेल है। उन्होंने ज़रूरत पड़ने पर शब्दों से खेल सकने वाले को भी बड़ा कवि साबित किया।

नामवर सिंह ने कृतियों के मूल्यांकन के संबंध में भी भूलें की। उन्होंने धर्मवीर भारती के कालजयी नाटक 'अंधा युग' को सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज़ कर दिया था क्योंकि लेखक की विचारधारा दूसरी थी। यह अच्छा है कि अब पुरानी किताबों मे गोते लगाने को अच्छा नहीं माना जाता वरना नामवर सिंह की पुरानी किताब इतिहास और आलोचना उनके माथे आ जाती। हिंदी में भला वह कौन होगा जो अंधा युग के लिए आलोचक को माफ़ कर दे वो भले नामवर सिंह ही क्यों न हो। क्या यह कहना गप होगा कि भारत में जितने अंधा युग के मंचन हो चुके और होते जा रहे उतने तो नामवर सिंह ने व्याख्यान भी न दिए होंगे। ध्यान रहे इसी के समांतर उन्होंने निर्मल वर्मा को ख़ूब सराहा। यह अलग बात है कि निर्मल वर्मा को मोहन राकेश जैसा पाठकों का प्यार न मिला। शैलेश मटियानी जैसा उनका लोक महत्व तो शायद ही कभी स्थापित हो पाए। नामवर सिंह ने शिवमूर्ति और संजीव को भी कम ही पहचाना। 

उठाना गिराना, खंडन महिमामंडन, विवाद, सत्ता संधान नामवर सिंह के आजीवन प्रिय कर्म रहे। उन्होंने जिसे निशाने पर लिया उसे लगभग बिरादरी बाहर होना पड़ा। यह नामवर सिंह की खासियत रही कि उन्होंने जिसे लक्ष्य किया उसे देखते हुए अपनी एक आँख सदैव दबाकर रखी। व्यंग्य और अचूक प्रसंगों से ऐसा बेधा भेदा कि उन्हें पढ़ने के बाद संबंधित साहित्यकार में पाठक की रुचि ख़त्म हो जाये। यक़ीन न हो तो रामविलास शर्मा, अशोक वाजपेयी आदि के कृतित्व पर उन्हें पढ़ लीजिये। अशोक वाजपेयी को कवि और रामविलास शर्मा को आधुनिक प्रगतिशील मानने में सदैव संकोच रहेगा। इस प्रवृत्ति का अपवाद भी नामवर सिंह में ही मिलता है। उन्हें पढ़ने के बाद आपको अज्ञेय की 'नाच' कविता से प्रेम हो जाएगा। यह नामवर सिंह ही हैं जिनके कारण अगर आप अवसरवादी हैं तो आपको अटल जी से नफ़रत और राजनाथ सिंह से मोहब्बत साथ साथ हो सकती है। बावजूद इसके एक भाजपा का संस्थापक सदस्य रहा है दूसरा अध्यक्ष। यहां इस बात का कोई खास मतलब नहीं है कि अशोक वाजपेयी नामवर सिंह को ही अचूक अवसरवादी कहते हैं। यह सर्वविदित है कि नामवर सिंह न होते तो मुक्तिबोध को गांधीवादी साबित कर डालने में अशोक वाजपेयी को कोई रोक न पाता।

नामवर सिंह की चुप्पियां भी उनकी भूल मानी गयी हैं। लेकिन उन्होंने इतना बोला है कि उनकी चुप्पियों का ग़लत अर्थ निकालना असंभव है। इस संबंध में काशीनाथ सिंह के एक दृष्टांत का स्मरण ही उचित होगा कि नामवर सिंह उस शेर की तरह रहे जो उठकर बोला तो जंगल में सब चुप हुए, शांति हुई और जब जंगल में शोर बढ़ा तो नामवर चुप ही रहे। क्योंकि जब सब बोल रहे हों तो शेर चुप ही रहता है। अपनी भूलों और खूबियों के शिखर से बने नामवर सिंह के आखिरी दिनों का यही चित्र उभरता है -

जिसमें मज़बूत तना, ठूंठ डालें पर हरहराते फुनई (शीर्ष) रह जाते हैं नदी किनारे के ऐसे पुराने पीपल सरीखे रह गए हैं नामवर सिंह। उनकी उपलब्धि जड़ों को ढंके मिट्टी सदृश हिंदी समाज के कगार बड़ी छोटी लहरों के साथ टूटकर -घुलकर नदी में मिल रहे हैं। गिनी जा सकने वाली नामवर सिंह की देह की नसें हिंदी की धमनी-शिरा हैं। संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी-उर्दू की मनीषा और विश्व साहित्य की हवा पानी से ऊंचे उठे इस पीपल की पत्तियां आज भी सामाजिक -राजनीतिक- सांस्कृतिक वायुमंडल की आती -जाती सांस पर डोलती हैं। चुप्पियां तोड़ती हैं। ऐसे पेड़ हैं नामवर सिंह जिनकी बची -खुची पत्तियों के लिए आज भी हँसिया, कुल्हाड़ी, रस्सी लेकर चढ़ते हैं कुछ महत्वाकांक्षी, कुछ सामंती, कुछ वर्चस्ववादी अकादमिक दुनिया के, कुछ बेरोजगार, भूमिहीन युवा और कुछ विस्तारवादी साहित्यिक सामंत। फिर भी नामवर सिंह है कि आज भी केवल अपने कह सकने की आन पर रहते हैं। चाहे वक्तव्य कितनी ही बड़ी भूल या कायरता साबित होने जा रहा हो। वो नामवर सिंह ही हैं जो कन्नड़ लेखक एम एम कलबुर्गी की दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी ताकतों द्वारा नृशंस हत्या के बाद लेखकों के सम्मान वापसी आंदोलन को लोकप्रियता प्राप्ति का उद्यम बताकर मौन साध लेते हैं।

पंचतंत्र की एक उक्ति के अनुसार जो विद्वान या व्यक्ति राजा को प्रिय होगा वह लोक की नजर में दुष्ट होगा। जो लोक को प्रिय होगा वह राजा की नजर में संदिग्ध होगा। हिंदी के नामवर सिंह इसके अपवाद हैं। वे जितने हिंदी समाज में स्वीकृत हुए उतने ही संस्थानों, विश्वविद्यालयों और साहित्य के या भाषा के सत्ता केंद्रों में। नामवर सिंह के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने जितना दिया उससे कई गुना ज्यादा पाया। यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है लेकिन सच्चाई यही है। आरक्षण पर नामवर सिंह की राय कि क्या सवर्णों के बच्चे भूखों मरेंगे, कटोरा लेकर भीख मांगेंगे ? उनकी आखिरी भूल मानी जा सकती है। दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से जिसे हमारे समय के फासीवाद की ओर झुके पूंजीवादी लोकतंत्र ने 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण देकर स्थायी कर दिया। यह हिंदी का सौभाग्य होगा कि सेलेब्रेटी का जीवन जीकर गए पब्लिक इंटेलेचुअल नामवर सिंह की भूलों को सुधारा जाए । मगर इसकी संभावना कम ही है कि ऐसी किसी भावना तक को मूर्खता, कृतघ्नता अथवा छोटा मुँह बड़ी बात नहीं समझ लिया जाएगा। इसलिए अंत में नामवर सिंह को ही प्रिय रहा एक शेर-

हमको सज़ा मिली है ये हयात से
समझ हरेक राज़ को मगर फ़रेब खाएजा

- शशिभूषण

(उद्भावना, जनवरी-मार्च 2019 में प्रकाशित)

सिल्क स्मिता हो या हिटलर दुखी मरते हैं


किसी भी प्रकार से, किसी भी रास्ते से, किसी भी प्रकार के उद्योग द्वारा ,भले तो भले बुरे कर्मों के द्वारा भी जीवन में सबसे बड़ी उपलब्धि, सबसे अधिक धन, सबसे बड़ा पद और सबसे अधिक यश पाने की महत्वाकांक्षा रखने वालों को ज्यादा नहीं एक बार फिल्म 'डर्टी पिक्चर' ही देख लेनी चाहिए। इस फिल्म में फ़िल्मी डांसर सिल्क स्मिता का चरित्र है। सिल्क स्मिता फिल्मी व्यावसायिक कामुकता की नृत्यांगना थी। जिसने फिल्मों को इसलिए चुना कि उसे पैसा और प्रसिद्धि मिल सके। वह महत्वाकांक्षा का शिकार थी। उसने अभिनय की बजाए, चरित्र निभाने की बजाए अपने युवा अंगो का उत्तेजक प्रदर्शन करना स्वीकार किया। उसने ऐसा नृत्य करना स्वीकार किया जो दर्शकों की वासना यानी उनकी काम उत्तेजना को उद्दीप्त कर दे। इस प्रकार उसे कुछ लोग मिले जिन्होंने उसे अत्यंत प्रोत्साहित किया। उन्होंने सिल्क स्मिता को इस तरह प्रोत्साहित किया कि वह कभी समझ ही नहीं पायी मैं उनकी स्वार्थसिद्धि का साधन हूँ। फिर क्या था उसे सब कुछ मिला, और उसने किसी की परवाह नहीं की। आलोचकों और नेक सलाहकारों को ठेंगे पर रखा। उसने फ़िक्र की ही नहीं। किसी की भी नहीं। उसे दर्शकों की सीटियां, सीत्कार, कामुक हंसी और उत्तेजक दशाएं बड़ी प्रिय विजयी लगीं। वह कथित सफलता की सीढ़ी चढ़ती गयी। 

लेकिन धीरे-धीरे उसकी यह महत्वाकांक्षा विकृत होती गयी। उसमें अहंकार भी चढ़ता गया। हिंसा, छल, दूसरों को अपमानित करने, नीचा दिखाने का भाव बढ़ता गया। उसने घर तोड़े। उसने प्रतियोगियों को जलाया। उसे यकीन हो चला था कोई मेरा क्या कर लेगा ? वह प्रतिहिंसा और बदले की भावना में भी बहुत कुछ कर गुजरने में धँसती चली गयी। बिना कुछ सोचे। बिना परिणाम की चिंता किये। सिर्फ आगे, और आगे देखती गयी। अंत में क्या हुआ? इसी फ़िल्म में एक शांत स्मृति यानी मित्र का स्मरण है। वह कहता है- उसकी यानी सिल्क की जिंदगी में सब ठीक चल रहा था। लेकिन तभी तक जब तक उसने लोगों के बारे में नहीं सोचा। अपने बारे में लोगों की राय के बारे में नहीं सोचा। वह आगे बढ़ती गयी। सफलता के पायदान चढ़ती गयी। फिर उसकी जिंदगी में ढलान आया। इसी बीच उसने लोगों की राय पर ध्यान दिया। वह पलटकर सोचने लगी। अवसाद में घिर गयी। उसका सब बिखरने लगा। टूटने लगा। उसका आत्मविश्वास और खुद पर यक़ीन ध्वस्त हो गया। एक दिन वह अपने घर में मृत मिली। 

सिल्क स्मिता की यह कहानी बहुत कुछ कहती है। इसमें बड़े बड़े संकेत हैं। ग़ौर से देखिये कोई चैंपियन आपके आसपास भी तो अपने बारे में लोगों की राय याद नहीं कर रहा ? वह सहानुभूति बटोरने दूसरों की केवल निंदा तो नहीं करता जा रहा? यदि हाँ तो समझ लीजिए। इतना इशारा काफ़ी है। यह हताशा है। अपनी भविष्यहीनता की मुनादी है। ध्यान रखिये हिटलर मारे नहीं जाते। वे आत्महत्या करते हैं। जिसने भी ग़लत राह चुनी उसकी सज़ा उसे खुद से मिलती है। यदि आप हिटलर के अंतिम 6 महीनों का किस्सा जानेंगे तो आपको यकीन हो जाएगा कि उस नृशंस तानाशाह ने यही सोचा था लोग मुझे कायर समझेंगे ? मैंने इतने लाख लोग मौत के घाट उतार दिए फिर भी मुझे कायर पराजित समझा जाएगा। बदले में उसने क्या किया ? खुद को वैसी ही मौत दी जैसी उसके कुत्ते को मिली। यही होता है। यही होता आया है। ग़लत इंसान दुख पाता है। जिसके हृदय में अवैर और करुणा है वह सुख पाता है। यही संसार का नियम है। सिल्क स्मिता हो या हिटलर दुखी मरते हैं। उन्हें कोई सुख और शांति नही दे सकता।

- शशिभूषण 

रविवार, 17 सितंबर 2017

कहानीकार गीताश्री और उनकी कहानियाँ

गीता श्री कहानीकार हैं। आजकल यह सरल वाक्य अधूरा लग सकता है। इसके बावजूद कहना चाहिए गीता श्री कहानीकार हैं। जैसा इधर का चलन है यदि कहा जाये कि गीताश्री महिला कथाकार हैं तो दस्तूर के मुताबिक बात पूरी लगेगी। लेकिन इस सायास परिचय का ख़ालीपन लेखकीय मन को उदास कर सकता है। बल्कि उदास करना चाहिए। भले, हालात बाक़ायदा ऐसे रूढ़ हो चले हों कि कहने वाले विशेषण जोड़कर पूरी बात कहेंगे- गीताश्री ने कहानी में स्त्री विमर्श को नया आयाम दिया है।

कहने का सामयिक अभिप्राय यानी समकालीन समीक्षा का अनुभूत अर्थात यह है कि स्त्री हैं तो महिला कथाकार हैं, और महिला कथाकार हैं तो स्त्री विमर्श की पैरोकार हैं। लगे हाथ कहानियों के प्रकाशन की शुरुआत भी राजेन्द्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’ से हुई हो, लेखिका में फ़ेमिनिस्ट आग्रह भी हों तो क्या कहने ! फिर समीकरण बड़ा सीधा है। दायां, बायां बराबर सिद्ध है। मज़े की बात यह है कि यह समीकरण राजेंद्र यादव से पहले की कथा लेखिकाओं पर भी आज के समीक्षकों द्वारा संतुलित है। हाथों हाथ इति सिद्धम है। इसलिए है तो गुस्ताख़ी की तरह ही लेकिन मेरा वाक्य सरल है कि गीताश्री कहानीकार हैं। कहानीकार यद्यपि स्त्रीलिंग नहीं है। लेकिन क्या करें अपनी हिंदी में महापुरुष का स्त्रीलिंग महास्त्री भी तो सुनने में अब तक के अभ्यस्त कानों के लिए अजीब ही है। 

यह सच है कि गीताश्री कहानी में देर से आई। उनके लेखन की शुरूआत वाया पत्रकारिता है। वे कहानीकार से पहले पत्रकार हैं। इस मूलनिवास और पुनर्वास फिर पारस्परिक आवाजाही को उनकी कहानियों में अलग से देखा जा सकता है, खूबियों खामियों समेत दिखता भी है; लेकिन मैं अभी चाहता हूँ कि यह देखा जाये गीताश्री किस तरह की कहानीकार हैं?

कहानियां दो तरह की होती हैं। पहली वह जो होती हैं, और संवाद के लिए सुनायी जाती हैं या स्थायित्व के लिए लिख डाली जाती है। दूसरी वह जो सुनाने से या लिखने से कहानी बनती हैं। लिखे जाने से पहले की कहानियां सबके जीवन में होती हैं। अपनी यही कहानियाँ हमें दूसरों की लिखी या सुनायी गयी कहानियों से जोड़ती हैं।

जिसके जीवन में जितनी विविधता होती है, जितने अनुभव होते हैं उसके जीवन में उतनी ही अनलिखी-अनपढ़ी कहानियां होती हैं। ये कहानियां याद आती रहती हैं, दूसरों को सुनाने के लिए उकसाती हैं। दूसरे तरह की कहानियाँ लिखने के दौरान ही जनमती हैं। इनका निर्माण और स्वरूप पूरी तरह कहानीकार की दक्षता और कौशल पर निर्भर करता है। ऐसा कोई लिखित नियम नहीं है कि लिखी गयी कहानी या अनुभव की कहानी में श्रेष्ठ कहानी कौन होगी। लेकिन इतना तय है कि अनुभव की कहानी यदि कहानीकार की सिद्धि का परस पा जाये तो वह यादगार होकर रहती है।

सुनाने के दौर का अंत हो जाने के बाद अब लिखना ही हर किस्म की कहानी की वास्तविक देह है और पढ़ना नियति या परिणति। कहा जा सकता है कि गीताश्री की कहानियां उनके अनुभव में आयी कहानियां हैं जिन्हें उन्होंने कभी जल्दी में तो कभी धैर्य के साथ अधिकतर पत्रकारीय कुशलता से लिखा है। इसीलिए बाक़ायदा लिखी गयी कहानियों की दुनिया में गीताश्री की कहानियां कहीं कम गोल तो कहीं अधिक सिंकी हैं। 

आइये अब इस बात पर चर्चा करते हैं कि गीताश्री की कहानियों की मूल प्रवृत्तियाँ क्या हैं? हिंदी कहानी के वृहद आकाश में उनका स्थान क्या है? जब मैं गीताश्री की कहानियों के विषय में विचार करता हूँ, तो मुझे हिंदी कहानी का बडा परिदृश्य दिखाई पड़ता है। हिंदी कहानी का यह परिदृश्य लगभग सवा सौ साल का है। यह कहते हुए मुझे खुशी भी महसूस होती है और आश्वस्ति भी अनुभूत होती है कि आधुनिक हिंदी कहानी के करीब सवा सौ साल हिंदी की समृद्धि के भी साल हैं। 

इतने वर्षों में एक से एक कथाकार और एक से बढ़कर एक कालजयी कहानियां हमारे सामने आई हैं। जिस दौर में गीताश्री ने कहानियां लिखनी शुरू कीं, वह दौर आत्मकथाओं का दौर था, और विमर्शों का दौर था। लघु पत्रिकाओं की प्रमुख उपस्थिति या वर्चस्व का दौर। यानी जो भी साहित्यिक उपलब्धियाँ थीं, वे विमर्शों के माध्यम से और लघु पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकट हो रही थी। आत्मकथाओं में प्रमुख रूप से दलितों, स्त्रियों की आत्मकथाएँ थीं। कहीं-कहीं आत्मकथ्य की शैली में विमर्श की बात भी परिदृश्य में थी। ये आत्मकथाएं भारतीय भाषाओं से अनूदित होकर हिंदी में आ रही थीं, अंग्रेजी से आ रही थी, और इनके अतिरिक्त विमर्श थे, जिनमें दलित विमर्श और स्त्री विमर्श प्रमुख थे। इस प्रकार लघु पत्रिकाओं के माध्यम से आया सारा नया साहित्य हमारे सामने दो रूप में आया, एक जो विमर्शों से पैदा हो रहा था और दूसरा जो विमर्श पैदा कर रहा था। हालांकि जो कहानियां विमर्श पैदा कर रही थीं, उन्हें उतनी तवज्जो नहीं दी गयी क्योंकि विमर्श खड़े किए जा रहे थे या विमर्श खड़े करना मुख्य ध्येय था। उन्हीं कृतियों के सम्बन्ध में विमर्श की आवश्यकता महसूस हुई। 

गीताश्री की कहानियाँ जब आईं, तो स्त्री विमर्श का दौर था, दलित विमर्श का दौर था। हंस में प्रकाशित कहानी के केंद्र में स्त्री विमर्श था। गीताश्री की कहानियों में स्त्री विमर्श ही मुख्य है। उनकी कहानियों की स्त्री युवती है, विवाहिता है, स्वाबलंबी है, कामकाजी है, जुझारू है, अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीने वाली है। वह अपने स्वायत्त निर्णयों एवं पहल से थोड़ी हलचल पैदा करने वाली भी है। कह सकते हैं आज स्त्री जैसी भी है और समाज में इसकी जो भी भूमिका है, वही स्त्री गीताश्री की कहानियों की धुरी है। हम गीताश्री की कहानियों की स्त्रियों को तत्कालीन आत्मकथाओं की स्त्रियों से सबल, प्रगतिशील और स्वाबलंबी पाते हैं। आत्मकथाओं में जो स्त्रियाँ हैं उनसे बेहतर पाते हैं। आप प्रभा खेतान की आत्मकथा और उसमें वर्णित स्त्री याद कर सकते हैं। वह स्त्री भावुक है। दुखी स्त्री है। हमारी यही धारणा बनती है कि स्त्री आज भी वही है। यानी साहित्य और समाज में अत्यंत सक्रिय प्रभा खेतान, जिनका बड़ा सार्वजनिक जीवन भी था, वो भी जब अपनी आत्मकथा में आती हैं तो कस्बाई, दीनहीन और छली गयी स्त्री से भिन्न नहीं दिखती हैं। इसके उलट गीताश्री की कहानियों में जो स्त्री आती है, वह एकदम भिन्न है। उसे प्रेम में छली गयी, भावात्मक सुकून तलाशती स्त्री ही नहीं कह सकते। 

गीताश्री की पहली कहानी ‘प्रार्थना के बाहर’ में दो स्त्रियाँ हैं। यद्यपि वे सहेली हैं लेकिन प्रकृति से पूर्णतया भिन्न हैं। एक लड़की खुद को कस्बाई और कथित आदर्श समाज में आदर्श स्थापित करने वाली बनाना चाहती है। जिस पर कोई उँगली न उठा सके। उसके बारे में कोई सवाल न खड़ा किया जा सके, वैसी स्त्री खुद को समझती है। वह अपनी साथिन लड़की को लेकर बहुत प्रश्नाकुल है कि कैसी लड़की है यह जो लड़कों के साथ इतना स्वच्छंद व्यवहार करती है। निश्चित ही इसके जीवन में एक दिन प्रश्न ही प्रश्न रह जाएंगे और बुरी तरह पछ्ताएगी। वह अपने जीवन को संयमित बनाने की कोशिश में लगातार रहती है। मगर अंत में होता यह है कि वही लड़की जो अपनी जरूरतों, कल्पनाओं में पूरी तरह से डूबती है, इच्छित साहचर्य जीती है, पढ़ती भी है और सफल होती है। यही लड़की आप कह सकते हैं कि जो प्रभा खेतान हो सकती है एकदम से चौंक जाती है -ये तो हमसे आगे निकल गयी, कहीं न कहीं यही सफल है। मैं तो यों ही रह गयी। 

गीताश्री की कहानियां उन स्त्रियों की कहानियाँ हैं जो जुझारू हैं, समाज में योगदान देने वाली नागरिक हैं। हालांकि गीताश्री की कहानियों पर कई आरोप भी हैं जैसे उन्होंने यौनिकता को आरोपित कर बहुत बढ़ावा दिया है, महिमामंडित कर यौनिकता को केंद्र में रख दिया है। मेरी देह मेरे चुनाव का राग छेड़ दिया है। यौनिकता का केन्द्र में होना स्त्रियों को कमजोर करता है। स्त्री की आकांक्षाओं के आकाश को सीमित कर देता है। मेरी राय में एक अच्छी बात यह है कि गीताश्री की कहानियों की स्त्रियाँ यौनिकता को लेकर स्वच्छंद नहीं अपराधबोध से मुक्त हैं। वे अपने जीवन में आ जाने वाले भरोसे, उल्लास और पुरुष साहचर्य को अकुंठ स्वीकार करती हैं। यही कारण है कि ‘प्रार्थना के बाहर’ की दूसरी लड़की अकादमिक और प्रतियोगी परीक्षाओं और सफलता की दृष्टि से पिछड़ी हुई नहीं है। वह ग्लानि और अपराधबोध में नहीं है। यहीं हम कह सकते हैं कि गीताश्री की कहानियों के केंद्र में स्त्री है। भले ही वह एक गंवई स्त्री के रूप में आ रही हो, मगर वह नागर स्त्री ही है। गीताश्री की कहानियों की संवेदना नागर स्त्री की संवेदना है। उसकी मानसिकता शहरी मध्यवर्ग की ही है। इस दृष्टि से कहानीकार ईमानदार हैं। खुद को अपने अनुभवों से बाहर प्रक्षेपित नहीं करती हैं। वे उस क्षेत्र में जाकर अजूबे निर्णय नहीं लाना चाहती हैं, जो उनके अनुभव क्षेत्र के बाहर के हैं। यहीं आप उस प्रवृत्ति को भी गीताश्री की कहानियों में रेखांकित कर सकते हैं कि जो आत्मकथाओं की लेखिकाएं हैं वे भी अपना अनुभूत सत्य बता रही हैं और गीताश्री अपनी कहानियों में जिन स्त्रियों को ला रही हैं वे भी उनके अनुभव संसार की हैं। कहानीकार गीताश्री का कथासंसार और निजी कार्यक्षेत्र महानगरीय कार्यक्षेत्र है। पत्रकारिता के अनुभव उनके पास हैं। शहरों का अकेलापन, अवसाद, उदासी और एक ऐसी स्थिति जहां थोड़ी सी आत्मीयता से भी प्रेम के अंकुर फूट पड़ते हैं ये सब गीताश्री की कहानियों में दिखाई देते हैं। 

अब यह सवाल उठता है कि क्या गीताश्री केवल स्त्री विमर्श की कहानीकार हैं? निश्चित रूप से किसी भी कहानीकार की प्रतिबद्धता को इससे आंका नहीं जाना चाहिए कि उसमें किसी विशेष विषय को प्राथमिकता दी गयी है। या किसी विमर्श विशेष की बात करने की कोशिश की गयी है। कहानी हमेशा अपने निहितार्थों, परिणति में बड़ी या महत्वपूर्ण होती है। गीताश्री की एक कहानी में महानगरीय दफ्तर का परिवेश है। कहानी मे एक अफसर है, जिसे बॉस कहा जाता है। वह अपने ही दफ्तर की कर्मचारी लड़की के पहनावे पर टिप्पणी करता है। लड़की दुखी होती है लेकिन वह विवश है। सहना ही उसके वश में है। कहानी हमारे सामने बड़े यथार्थ की तरह तब प्रकट होती है जब लड़की खुद को खुली और आज़ाद महसूस करती है। इसी को एन्जॉय करने वह एक न्यूड पार्टी में जाती है। वहां अपने उसी बॉस को देखकर वह चौंक जाती है। अरे, यह तो वही है जो पहनावे को लेकर इतना चीखता है, इतना नैतिक था। इस कहानी में एक पुराना छद्म सामने आता है कि दरअसल स्त्री के लिए जो नैतिकताएं हैं वो गुलाम, उपभोग्य बनाए रखने की ही युक्तियाँ हैं। 

अब विमर्शों की बात करें तो, हम पाएंगे कि हिंदी कहानी ने अनेक आन्दोलनों को देखा है। लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी आन्दोलन हिंदी कहानी में कोई नियामक भूमिका नहीं निभा पाया। जनवादी कहानी, समान्तर कहानी आदि आदि जितने भी आन्दोलन आए, वे नेतृत्वकर्ताओं की निजी धमक से आगे नहीं बढ़ सके। कहानी के बारे में मुझे एक फिल्मी उक्ति बड़ी सच लगती है कि कहानी वह झूठ है जो हमें सच तक लेकर जाता है। जो गल्प है, जैसा कहानी का ताना बाना है, उसके अन्दर आने वाले जो चरित्र हैं, निश्चित रूप से वे किसी बने बनाए खांचे या धारणाओं में नहीं अटते हैं। कहानीकार की दृष्टि, जिद्द, कल्पना शक्ति एवं सृजन क्षमता से ही कोई कथ्य कहानी बनता है। मार्मिकता में ही कहानी सबसे अधिक प्रभावित करती है एवं अमिट होती है। यह एक जांचा परखा पाठकीय सत्य है।

एक दूसरा उदाहरण लेते हैं- मशहूर लेखिका और उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में जो स्त्री है, कस्तूरी कुण्डलि बसै की जो लड़की है, जो माँ है और गीताश्री की कहानी ‘अन्हरिया रात बौरानी…’ में जो स्त्री है तो आप देखेंगे कि साहित्य में आरोप क्या है, अपेक्षाएं क्या हैं और वास्तविकताएं क्या हैं? आरोप लगाने वाली आत्मकथा में आती हैं तो कौन सा यथार्थ प्रकट करती हैं, और जब अपेक्षाओं में उतरती हैं तो कैसे कैसे मांगपत्र पेश करती हैं। यह ऐसे चरित्रों की, सामाजिक सत्यों की मांग सूची होती है जिसे कोई भी कहानीकार पूरा नहीं कर सकता है। मुझे लगता है आज प्रेमचंद भी अपना उपन्यास गोदान लेकर आते तो उन्हें यह सलाह दे देता कोई प्रकाशक कि ये क्या शीर्षक है? गोदान का क्या औचित्य है? कहने का मकसद यह है कि हमें स्त्री यौनिकता के विषय में साफ और निरपेक्ष नज़रिया रखना ही होगा। ‘अन्हरिया रात बैरनिया हो…’ में जो बहू है, भाभी है उसका पति परदेश में है। वह यौन अतृप्ति और विक्षिप्तता में जी रही है। एक दिन इतनी पीड़ित हो जाती है कि बाध्य होकर अपने सुख की खातिर घर छोड़कर ही चली जाती है। यहीं हमें यह समझना होगा कि इस तरह भूत प्रेत की सतायी मानी जानेवाली देवर के साथ भागने को विवश स्त्रियाँ हमारे समाज में क्या जोड़ रही हैं। किन चीज़ों से ऊपर उठने की जद्दोजहद में हैं। क्या वे हमारे समाज को आगे ले जाने की दिशा में सक्रिय हैं? क्या ये हमारी जानी पहचानी लड़कियों जैसी हैं? जब हम ये सवाल खुद से पूछेंगे तो मुझे लगता है कि गीताश्री की कहानियों की वैधता और प्रासंगकिता हमारे बीच स्पष्ट होगी।

किसी कहानीकार से दूसरी बड़ी अपेक्षा होती है कि वह अपने समय की कहानी को शिल्प या रूप की दृष्टि से कितना आगे लेकर जा रहा है? क्योंकि ऐसे तो कहानी बड़ी प्राचीन विधा है। हमेशा से कही जा रही है, हमेशा से सुनी जा रही है, पढी या लिखी जा रही है। लेकिन क्या समाज ही कभी आमूल चूल बदल पाता है? वह पूरी तरह नया हो पाता है? शायद नहीं। यही कारण है कि आज भले ही लोकतंत्र आया हो, हम उत्तर आधुनिक कहे जा रहे हों मगर 2017 में भी हज़ारों करोड़ रूपए के कुम्भ मेले आयोजित हो रहे हैं, संसद को मंदिर कहा जा रहा है, हमारा लोकतांत्रिक रूप से चुना गया प्रतिनिधि उसमें माथा टेक रहा है। तो एक ऐसा समाज जहाँ धर्म प्रतिबद्धता भी हो, जहां अनेक रूपों में मनुष्य का जीवन अनेक सदियों में गति करता हो, वहां फौरी तौर पर यह कह देना कि लेखक आखिर क्या प्रयोग कर रहा है? उसने कहानी में ऐसा नया क्या किया है? तो हमें धैर्य के साथ नए को पुरानेपन में भी देखना होगा। 

इस सवाल के जवाब में कि क्या गीताश्री कहानी को शिल्प के स्तर पर आगे ले आई हैं या वहीं हैं? मैं निर्ममता से यह कहूँगा कि भाषा और शिल्प और कथ्य के स्तर पर गीताश्री ऊँची सीढ़ी चढ़ चुकी कहानीकार नहीं ठहरती हैं। उनकी चिंताएं बड़ी हैं, प्रतिबद्धताएं बड़ी हैं, उनकी साहसिकता बड़ी है, वे एक नागरिक के रूप में स्त्री को सामने ला रही हैं। यही उनका प्रमुख हस्तक्षेप भी है, लेकिन प्रयोग के स्तर पर कहानी को आगे ले जाने की दृष्टि से गीताश्री को अभी लंबी दूरी तय करनी है।

एक अन्य सवाल -क्या गीताश्री का दायरा विमर्श ही हैं या इन विमर्शों से ऊपर उठकर उन्होंने कोई निजता भी हासिल की है? का जवाब है कि गीता श्री को इस दिशा में खुद साबित करना काफी हद तक शेष है। मुद्दों पर कहानी लिखी जा सकती है। जैसे देशद्रोह पर लिखी जा सकती है, गौ रक्षा पर लिखी जा सकती है, नोट्बंदी पर लिखी जा सकती है, लेकिन यह कहानी क्या कहानीकार की उस गरिमा के साथ प्रकट हो पाएगी, जिसका हमें अब तक कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, ममता कालिया आदि की कहानियों में अनुभव हो चुका है? यह महत्वपूर्ण अपेक्षा हो सकती है। गीताश्री की कहानियों की संवेदना नगरीय है, शहरी मध्यवर्ग ही उनकी चिंता के केंद्र में है। यदि इस आलोक में और देखें तो हमारा मध्यवर्ग जो अक्सर गुलाटी खाता रहता है, आज उसके पास न तो कोई क्रांतिकारी नेतृत्व है, न कोई परिवर्तनकारी समझ, जिसमें हम यह उम्मीद देख सकें कि हम वाकई लोकतांत्रिक ऊंचाई छूने जा रहे हैं। उलझा हुआ, आत्ममुग्धता, का, अकेलेपन का शिकार और आत्मकेन्द्रित वैयक्तिकताओं में जीता हुआ हर तरह के मूल्यों के क्षरण को भोगता हुआ जो समाज है, उसमें यथार्थ ही मसाल है। कोई आगे चलती हुई मशाल लेकर चलनेवाला नहीं दिखता है। हमने आन्दोलन देखे, उभरते हुए नेता देखे, पूँजी से भरते हुए धार्मिक, आध्यात्मिक, मीडिया के लोग देखे, नयी राजनीति तक ले जाने के वादे करने वाले और अफवाहों का धंधा करने वाले प्रधानसेवक देखे। अब इतना कुछ देखने के बाद हम कहानीकार से यही अपेक्षा कर सकते हैं कि वह यथार्थ को अभिव्यक्त करे। इस लिहाज़ से हम अपने बीच गीताश्री को एक प्रॉमिसिंग कहानीकार के रूप में देख सकते हैं। उनके कहानी लेखन में समाज के अलग अलग तबकों को शामिल करने की प्रवृत्ति है। हालांकि उन्होंने जितना घूमा है, जितनी दुनिया देखी है, जितना कहानी में समेटा है, उसी से हमें गीताश्री से और भी बेहतर की अपेक्षा है। 

गीताश्री की कहानियों का रास्ता उनका निजी रास्ता है। इन दिनों की दिशाहीन कहानियों, और ऐसी कहानियों के दौर में जिनमें कोई राजनीतिक चेतना नहीं है, परिवर्तन की ललक नहीं है, नायक सिरजने और उन्हें स्थापित करने की कोई ललक नहीं है, और ऐसी कहानियां नहीं लिखी जा रही हैं जो समाज को बदल सकें, ऐसी कोई प्रयत्नशीलता नहीं है, तो छुटपुट जो आलोकभरी कहानियाँ हैं जिसके बारे में हम यह उम्मीद करते हैं कि यही अपने नायक खुद पैदा करेंगी। तो ऐसे दौर की कहानियों में गीताश्री का अपना एक अच्छा स्थान बनता दिखता है। 

यह नहीं भूलना चाहिए कि सक्रिय वैचारिक कहानियों के अपने जोखिम होते हैं। यदि गीता श्री विचार परक कहानियाँ नहीं लिख रही हैं तो इसे किसी बड़ी कमी की तरह ही नहीं देखा जाना चाहिए। मुझे याद आता है कि अपने देश में जब अन्ना आन्दोलन शुरू हुआ था तो अखिलेश ने ‘श्रृंखला’ नाम से एक कहानी लिखी थी। जिस कहानी के विषय में मशहूर लेखक-संपादक रवीन्द्र कालिया ने संपादकीय में कहा था कि यह कहानी हमारे समाज की यथास्थिति में आ रहे बड़े बदलावों के बारे में दिखा रही है। कहानी अपनी रचनात्मकता के साथ आंदोलन के पैदा होने को समग्रता में देख पा रही है। जिस तरह के परिवर्तनकारी आंदोलन का वर्णन कहानी में है संयोग से वैसा ही कुछ देश में घटित होता दिख रहा है। लेकिन दुर्भाग्य से कालिया जी अब हमारे बीच नहीं हैं और हमने उस आन्दोलन की परिणिति चरमपंथी युग में भारत के गर्क होते जाने की दृष्टि से देख रहे हैं। देश उन्नत होने की बजाय गृह युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। लोकतंत्र पर ही अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है। यहीं समझना आवश्यक है कि कहानी जब हमारे सामने एक यथार्थ रखती है, स्वप्न रचती है तो कालांतर में उस यथार्थ एवं स्वप्न के पूरी तरह असफल हो जाने की दशा में भी कहानी को हम इस तरह से भी देखते हैं कि तब ऐसा देखा गया था, या तब ऐसा हुआ था या ऐसा होना चाहिए। जब लोग हमें किसी रूप में दीखते हैं मगर वैसे होते नही हैं तब कहानीकार इसका भी समाज के समक्ष साक्ष्य रख देना चाहता है। यहीं, कहानी स्मृतिपरक दस्तावेज बनती है। यह समृति हमें भविष्य के प्रति सचेत करती है। कहानी का महत्व पूरी तरह सच साबित हो जाने के अतिरिक्त इसमें भी बहुत होता है।

कुल मिलाकर गीताश्री सार्थक कहानियां लिख रही हैं। मैंने उनकी जितनी कहानियां पढ़ी हैं उनमें हमारे समय का विश्वसनीय अक्स है। इस कहानीकार से जितनी उम्मीद है उतना ही इनपर यकीन भी है।

-शशिभूषण



गुरुवार, 24 अगस्त 2017

राष्ट्र के नाम एक नागरिक का संदेश

प्यारे देशवासियो,

भारत एक महान देश है। भारत एक विशाल देश है। भारत की सुंदरता अतुलनीय है। भारत की महानता का पूरा श्रेय यहां की धरती, प्रकृति और निवासियों को जाता है। सदियों से भारत में ऐसे महान इंसान होते आये हैं जिन्होंने भारत को बड़े दिल का देश बनाया। यहां सब प्रेमपूर्वक रह सकें इस लायक बनाया। ऐसा देश जिसके दिल में सबके लिए बराबर जगह हो।

भारत की महानता इसकी प्राकृतिक विविधता में तो है ही इस बात में सबसे अधिक है कि यह संस्कृतियों का महासंगम है। यदि आप अलग-अलग संस्कृति, धर्म, कला, इंसानियत और सहकार की ऊंचाइयों को देखना चाहते हैं और संयोग से भारत में पैदा हुए हैं तो फिर आपको कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है। भारत दर्शन ही जगत दर्शन है। जिहोंने पूरी दुनिया अपनी आंखों से देखी और देशों की महानताओं की तुलना कर सकने लायक जीवन में योग्यता हासिल की उन सबका कहना है कि मनुष्यता की दृष्टि से भारत सबसे महान भूमि है। यहां सब लोग भाईचारे के साथ रह सकें इसके गुण यहां की मिट्टी में ही हैं।

प्यारे देशवासियों, हम सौभाग्य एवं सत्कर्मों की धरती में रहते हैं तो इसका मतलब यह नहीं समझना चाहिए कि दुर्भाग्य और दुष्कर्म हमें घात लगाकर नहीं देखते रहते हैं। बुराइयां हमें नीचा दिखाने और हमारी कमर तोड़ देने के लिए दिन रात कोशिश करती हैं। वे कभी-कभी जीत भी जाती हैं। यही कारण हैं कि हम आज तक स्वावलंबी नहीं हो पाए, हमारे नौजवान बेरोज़गार भटकते हैं, हमारी लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है, दहेज स्त्रियों को ज़िंदा जल देता है, जातिवाद ज़िंदगियां तबाह करता है, कितनी कलियां जाति के बूट में कुचल जाती हैं, साम्प्रदायिकता हंसते-खेलते आंगनों में लाश गिरा देती हैं, आतंकवाद शांति के फूल नोच लेता है और सत्ता के चरमपंथी कंस बीमार बच्चों से प्राणवायु छीन लेते है। मुनाफे का धंधा ग़रीबों का खून चूस लेता है। यह सब हमारे देश को खोखला कर नष्ट करता जा रहा है। यह बताने की ज़रूरत नहीं साफ साफ दिख रहा है। जो आंखों के सामने है, जिस नफ़रत को रोज़ बोया जा रहा है उससे गाफ़िल रखने के झूठे लंबे-लंबे वादे और भाषण और भयानक हैं। राजनीति का स्वार्थी, अलगाववादी, चरमपंथी और भ्रष्ट होते जाना सबसे भयानक त्रासदी है।

प्यारे देशवासियों, लेकिन राहत की ज़िंदादिल बात यह है कि भारत हमेशा से बुराइयों पर विजय पाता आया है। कोई आसुरी सत्ता, लोभी शक्ति यहां अधिक दिन टिकी नहीं है। सबके घमंड चूर हुए हैं। सब नराधमों को भारत ने मिट्टी में मिलते देखा है इसलिये निराश होने की ज़रूरत नहीं है। हारकर बैठने की ज़रूरत नहीं है। आवश्यकता है बड़े मन से, साफ़ हाथों से परिश्रम करने की। भाईचारा रखने और बांटने की। किसी किस्म की नफरत की राजनीति से हमें हमेशा दूर रहना होगा। बांटने की बातें, किसी भी एक धर्म को सर्वश्रेष्ठ समझाने के भीषण छल को हमें मिलकर समय रहते भेदते रहना होगा। नेकी और भलाई के आगे अफवाह और सत्ता लोभ कभी टिकते नहीं हैं। 

प्यारे देशवासियों, धर्म महान हो सकते हैं। धार्मिक स्थल महान हो सकते हैं। लेकिन हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी धार्मिक जगह स्कूल, अस्पताल, खेल के मैदान, खेत खलिहान से भली नहीं हो सकती। जहां अन्न उगता है, जहां बच्चे पढ़ते हैं जहां रोगी चंगे होते हैं उन जगहों में ईश्वर को नहीं बैठाया जा सकता। आज सबसे अधिक ज़रूरत शिक्षा, चिकित्सा और सहिष्णुता की है। आइये हम संकल्प लें कि अपने बच्चों को खूब पढ़ाएंगे, सबको रोज़गार दिलाएंगे और महान भारतीयों के दिल से सब तरह के डर दूर करेंगे। 

प्यारे देशवासियों, हम महान देश के नागरिक हैं। राजनीतिक दलों के ईवीम रूपी कुल्हड़ के सिक्के नहीं हैं। बदली जानेवाली मुद्रा हमारी ईमानदारी का पैमाना नहीं हो सकती। हमारा ईमान हमारी एकता है। हम इसे कम करने के सब प्रयास मिटा कर रहेंगे। सत्ता के भुक्कड़ शैतान हमें तोड़ नहीं सकते। हम इस बात के लिए कृतसंकल्प हों कि मिलकर आगे बढ़ेंगे। अन्याय, ग़ैरबराबरी, अशिक्षा, झूठ, ग़रीबी, फैलायी जानेवाली नफ़रत से मिलकर मुक़ाबला करेंगे। हम अपनी नदियों, हरियाली, खेती और धरती की रक्षा करेंगे।

जय हिंद ! जय भारत!! भारत माता की जय !!!

-शशिभूषण
15 अगस्त 2017
फेसबुक वाल से

सोमवार, 20 मार्च 2017

योग हुए, योगी भए गावहुँ मंगलचार

हम स्कूली नागरिक शास्त्र की पतली सी किताब में पढ़ा करते थे कि अशिक्षा के कारण भारत में मतदाता उदासीन रहते हैं। वे सोचते-बोलते हैं- 'कोउ नृप होय हमें का हानि।'

उसी किताब में उपाय लिखा मिलता था यदि नागरिकों को शिक्षित किया जाये तो वे ऐसे विचार त्याग कर सच्चे लोकतान्त्रिक नागरिक बन सकते हैं। बल्कि बनाये ही जाने चाहिए।

अब इतना जीवन देख लेने के बाद, थोड़ा बहुत लोकतंत्र, टेलीविजन देख बूझ और झेल लेने के बाद लगता है-नागरिक अबूझ नहीं थे। उन्हें गहरा बोध था। वे जानते थे जो लादा जायेगा उसे ही ढोना है। शेष बेमतलब का रोना है।

याद आता है पिछले दिनों उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में मिली भारी जीत के बाद भारत वर्ष के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी ने भी बड़े सांकेतिक और बड़े खुले रूप में जो कहा वह कुछ यों था-

'हमारी सरकार सबकी सरकार है। जिन्होंने हमें चुना उनकी भी। जो सामने रहे उनकी भी। हमारी सरकार सबकी सरकार है।' (कृपया आगे समझे बेट्टा अपने मन से न पढ़ें।)

गोवा में सरकार गठन के दौरान इस बात का मर्म निकला। मैं अक्सर सोचता हूँ भारत के लोग भारत वर्ष के प्रधान सेवक जी की बातों को गौर से नहीं सुनते। यदि श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी को केवल सुन ही लिया जाये तो उसमें बड़ी योजनाएं दिख जाती हैं। खैर,

दैनिक उपयोग की वस्तुओं और योग के सबसे बड़े भारतीय कारोबारी बाबा रामदेव जी से थोड़े भिन्न मिजाज़ के योगी आदित्यनाथ जी के उ प्र का मुख्यमंत्री बनाये जाने की ख़बर है।

मानो बाक़ायदा रचे गए खुले रहस्य से सरेआम पर्दा उठ रहा है। मुझे लगता है टीवी की दुनिया में सबसे अधिक ख़ुश और संतुष्ट अंजना कश्यप को होना चाहिए। उनका अनुमान सही निकला है। बहन नेहा पन्त और ज़ी छाप एंकर्स को अभी और परिश्रम की दरकार है।

याद रखें, श्री योगी आदित्यनाथ जी ने बहन अंजना कश्यप से स्पष्ट कहा था- अयोध्या में आप लोगों की भावनाओं के अनुरूप ही राममंदिर बनेगा।

आगे चाहे जो हो लेकिन एंकर, बहन अंजना कश्यप को बधाई देने का मन होता है। यह बधाई बा हैसियत वैध या अवैध नहीं है। इसके कई और मतलब भी नहीं।

रहे भारत के लोग तो अब भारतवर्ष का नागरिक शास्त्र ही सबके माथे आ चुका है। मामूली स्वीकार नहीं होता- 'कोउ नृप होय हमें का हानि।'
-शशिभूषण

बुधवार, 15 मार्च 2017

सार्वजनिक उपक्रमों का दुश्मन मीडिया

किसी भी मीडिया घराने को सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो जाये तो वह जार जार रोता है। अगर उसे सरकारी कृपा न प्राप्त हो तो थोड़ी दूर भी चल नहीं पाता।

लेकिन मीडिया का अभियान एक ही होता है हर प्रकार के सार्वजनिक संस्थान को संदिग्ध बनाना। उसे देखने में इतना उजाड़ देना कि कोई सेठ उसे तुरंत बसाने के लिए आगे आ सके। इस संबंध में हिंदी फिल्मों का वह दृश्य सटीक है कि आग लगवा दो और फिर सबसे पहले बुझाने पहुंचो। मोटर कार से।

एक से एक पढ़े लिखे, अंग्रेजी के जानकार खोजी पत्रकार सार्वजनिक उपक्रमों की कमियों के तिल को ताड़, राई को पहाड़ बनाते रहते हैं। उनके ज्ञान ध्यान को देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्हें फरिश्तों वाले गुण प्राप्त हैं।

एक भी मौक़ा नहीं छोड़ा जाता। जब कोई कमी न मिले तो अफ़वाह से काम चलाया जाता है। यही पत्रकार किसी निजी संस्थान की कमियों के बारे में अंधे बहरे बन जाते हैं। ये भारतीय रेलवे पर धारावाहिक स्टोरी लिखते हैं। लेकिन अगर किसी प्राइवेट बस का कंडक्टर इन्हें दो की सीट पर तीसरा बैठा लेने को लप्पड़ भी मार दे तो किसी से नहीं बताते।

सार्वजनिक संस्थानों को चुन चुन ख़त्म कर निजी क्षेत्र के विस्तार के लिए प्राइवेट मीडिया संगठित गिरोह की तरह काम करता है। इस मसले पर लगभग सारे अख़बार डाकू जैसे हैं। पैसा लूटकर गरीबों को ज्ञान बांटते हैं।

यदि सरकारी संस्थाएं एक एककर निजी क्षेत्र में चली जाएँगी तो यह उम्मीद करना मूर्खता ही है कि भारतीय संविधान का कोई मूल अधिकार ठीक से बचा रह पाएगा।

जितना संभव हो और जितना कर पाएं उतने उद्यमों में सार्वजानिक संस्थानों की प्रतिष्ठा के लिए हर संभव कोशिश करें।

एक सरकारी अस्पताल या विद्यालय अभावग्रस्त हो सकता है और किसी हद तक बुरा भी। लेकिन कोई भी निजी उपक्रम प्रथम दृष्टया ही क्रूर होता है। उसके जाल से निकलने का रास्ता फिर कोई विदुर नहीं बता पाता।

सुना है अब मीडिया में अंतर्राष्ट्रीय पूंजी निवेश भी है। वह आपके सामाजिक न्याय, समता, समान अवसरों वाली और लोकतान्त्रिक समाजवाद वाली राष्ट्रीयता का भला सोचने से पहले कोई अनाथालय न खोलना चाहेगा!!!

-शशिभूषण

राजभवन में ब्रह्मचर्य

कल की एक खबर(मेघालय के राज्यपाल षणमुगनाथन का इस्तीफ़ा)मुझे नहीं भूली। इस ख़बर में आज के भारत का वह सब एक जगह है जो अलग अलग ख़बरों में टुकड़े टुकड़े में ही दिखता है।

इस खबर में पूर्वोत्तर है। राजभवन है। दक्षिण भारत है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है। पिछड़ा वर्ग है। लेखक है। दक्षिणपंथी सत्ताधारी राजनीति है। ब्रह्मचर्य है। स्त्री के प्रश्न हैं। नौकरशाही की बग़ावत है। पद का दुरूपयोग है। न केवल अरुणाचल प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार है बल्कि आज की भारतीय राजनीति की सबसे असंभव बात राज्यपाल जैसे पद से इस्तीफ़ा है।

अब इस खबर की हालत देखिये कि न यह नेशनल दस्तक है, न मीडिया विजिल है, न लल्लन टॉप है। इसके जागरण ख़बर होने का तो सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि इस ख़बर के साथ साथ संजय लीला भंसाली की निंदनीय पिटाई है और बहुजन बेटी के मिस यूनिवर्स होने की उम्मीद है।

आप यक़ीन कीजिये आज यह ख़बर मुझे बीबीसी हिंदी पर ही खोजने से मिली है।

आप पूछेंगे मुझे इस खबर में इतना क्या खास लगता है? जो मैं घर का न घाट का टाइप से सबको कटघरे में लाकर खड़ा कर देनेवाली इस खबर पर इस हद तक केंद्रित हूँ।

तो मैं आपसे डेढ़ बात कहना चाहूंगा। यानी एक पूरी और दूसरी आधी। पूरी बात यह कि इस खबर में सबसे चौकानेवाली लेकिन उम्मीद की बात यह है कि भारत के किसी राज्य के राजभवन के लगभग सब कर्मचारियों ने मिलकर राज्यपाल के विरुद्ध चिट्ठी लिखी। ख़ुलासा किया। इतनी एकजुटता और साहस भारत के नौकरशाही के इतिहास में सुन्दर अक्षरों में लिखी जानेवाली घटना है। वरना आप जानते हैं कि भारत में इस वक़्त बेरोज़गारी इतनी अधिक है कि कोई अकेला नौजवान भी यह कहने की जुर्रत नहीं करता कि मेरे बॉस का जुकाम ठीक ही नहीं हो रहा।

आधी बात यह है साथियो कि यह जो घटना घटी है इसमें शर्मिंदगी और ज़िम्मेदारी लेने की हिम्मत और नेकनीयत अलग अलग कारणों से मंद ही रहेगी।

आप पूछेंगे मैंने किस तीसमारी में इस खबर का संज्ञान लेने का फैसला कर लिया तो मैं इतना ही कहूंगा खबर को तौलने का एक नज़रिया नागरिक नज़रिया भी होता है। इसे भी अपनी बात कहने का हक़ है।

यदि आप कर सकते हैं तो इस ख़बर को भूलियेगा नहीं। इसमें आज के भारत की तस्वीर है।

-शशिभूषण

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

सेल्फ़ी की लत यानी आत्मपरक होते जाना

यदि आप यह तस्वीर देखें या अभिनेत्री स्मिता पाटिल, की कोई तस्वीर देखें तो आपके मन में यह ख़याल आ सकता है क्यों न इसे दीवार पर लगा लें! पर्स में रख लें।

इसके बाद आपके मन में आनेवाले ख़याल बहुत सी बातों पर निर्भर करेंगे। इस तस्वीर को लगाने या न लगाने, प्रोफाइल पिक्चर बनाने या न बनाने के निर्णय में आप अपनी भावनात्मक ज़िन्दगी की ही समीक्षा कर बैठें तो आश्चर्य नहीं।

आप सोच सकते हैं पसंद है, चिर सुन्दर है मगर छोड़ो यार अब ऐसी दीवानगी का प्रदर्शन भी क्या? लोग क्या सोचेंगे? आपकी ज़िन्दगी जैसी होगी आप उस अनुपात में कई तरह की बातें सोचेंगे।

आप जो भी सोचें इस तस्वीर पर या जैसा मैंने कहा स्मिता पाटिल की किसी भी तस्वीर पर आपकी नजर ठहर ज़रूर जायेगी।

नज़र ठहर जाना, पलटकर देखना या देखना चाहना या सुन्दर कहते कहते रुक जाना बड़ा स्वाभाविक है। नितान्त इंसानी अरमान। वह सुंदरता ही क्या जिस पर मुंह से बात न निकल जाये!

इस तस्वीर या स्मिता पाटिल की किसी तस्वीर को यदि कोई किशोर या किशोरी देखेगा तो क्या करेगा? मेरे ख़याल से वह अधिक नहीं सोचेगा। यदि उसे सुन्दर लगी तस्वीर तो पलक झपकते या तो वॉलपेपर बना लेगा या प्रोफाइल पिक्चर।

बच्चे या युवा जो भी करेंगे आनन्द से जल्द कर लेंगे। अधिक सोचेंगे नहीं। आपने देखा होगा युवा दीवारों पर अपनी तस्वीर की बजाय अपने स्टार की तस्वीर लगाना पसंद करते हैं।

मुझे यह बात बड़ी अच्छी लगती है। युवक या युवती जो किसी स्टार से खुद कई गुना सुन्दर होते हैं अपनी तस्वीर की बजाय अपने हीरो या हीरोइन की तस्वीर क्यों लगाते हैं? जवाब सरल है क्योंकि उन्हें यह पसंद है। आप पूछकर देखिये यही जवाब मिलेगा।

सचमुच यह बहुत खूबसूरत बात है कि कोई अपने से अधिक दूसरे चेहरे पर नाज़ करने लगे। यह एक उम्र या समय के बाद लगना बंद सा हो जाता है। कभी अचानक हूक उठती है तो हम सोचते हैं छोडो भी। हम तुरंत अपनी तस्वीर लगा लेते हैं या एल्बम से कोई पुराना फ़ोटो निकाल उसे फ्रेम करा टांग लेते हैं।

आपने भी ज़रूर सोचा होगा, सेल्फ़ी ने हमारी नज़र को अपने चेहरे तक केंद्रित कर दिया है। सबसे मज़ेदार तब होता है जब हम किसी चेहरे पर अपनी रीझी हुई नज़र टिका देते हैं लेकिन सेल्फ़ी अपनी लेने लगते हैं। पसंद करना भी अपनी कमियों को भर सकता है। हर वक़्त होने की फ़िक्र अंत में उदास करती है।

यह हो रहा है और बढ़ता जायेगा। इसमें बुराई कोई नहीं है लेकिन यह सुंदरता को आत्मपरक बना देता है। सुंदरता अपने असल रूप में सामाजिक है। उससे सबके मन में आनंद का सोता फूटता है।

भले अपने हाथ में न हो लेकिन किसी का सुन्दर होना भी मामूली बात नहीं। किसी को केवल सुदर्शन कहकर तंज करनेवाले लोग ठीक नहीं होते। मगर सुंदरता पर ही काम धाम भूले लोग भी लोकहित में कुछ खास नहीं कर पाते।

शशिभूषण

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

फ़िल्म से पहले राष्ट्रगान कुछ सवाल

सिनेमा हॉल अब तक मनोरंजन की जगह ही रहे हैं। फ़िल्म कितनी भी क्लासिक या कमर्सियल रही हों उन्होंने मनोरंजन मनोरंजन में ही जो किया होगा किया होगा। सिनेमा घरों में शुरुआत से पहले राष्ट्रगान द्वारा किसी और उद्देश्य की उम्मीद भले राष्ट्रवादी दिखायी दे मगर अंत में उसे भी मनोरंजन के पीछे ही रह जाना होगा। लेकिन अब जब उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका के फैसले में फ़िल्म से पहले राष्ट्रगान गाना और परदे पर तिरंगे का डिस्प्ले अनिवार्य कर दिया है तो मेरे मन में कुछ सवाल हैं(कृपया इन सवालों को अवमानना की तरह न देखें। मैं अधिवक्ता नहीं हूँ। अदालती कार्यवाही में शामिल नहीं था केवल इसीलिए ये सवाल मन में फैसले के बाद उठे।)


1 राष्ट्रगान सार्वजनिक या सरकारी स्थलों पर ही विशेष अवसरों पर गाया जाता रहा है। क्या किसी फीचर फ़िल्म का प्रदर्शन विशेष अवसर के अंतर्गत या राष्ट्रीय महत्त्व के प्रदर्शन का दर्ज़ा सचमुच रखता है?

2 सिनेमा हॉल का नियंत्रण या निगरानी भले सरकारी हो लेकिन वे निजी क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। जब वहां दिन में कम से कम तीन बार राष्ट्रगान गाया जाएगा तो वे निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्थल की तरह गरिमापूर्ण हो जायेंगे। ऐसी स्थिति में उनकी सुरक्षा या वहां दर्शकों की सुरक्षा या आपदा की स्थिति में मुआवजे के क्या राष्ट्रीय प्रावधान होंगे?

3 सिनेमा घरों में चीजों के दाम मनमाने होते हैं। यदि वहां राष्ट्रगान सुनिश्चित हो सकता है तो दामो के निर्धारण के लिए क्या कदम उठाये जायेंगे? क्या देश के सभी सिनेमा घरों में एक से दाम और समान सुविधा हेतु समान भुगतान प्रणाली लागू की जायेगी?

4 सिनेमा घरों में फ़िल्म प्रदर्शन के अतिरिक्त सभा एवं समारोह भी किराए पर आयोजित किये जाते हैं। क्या इन आयोजनों से पहले भी राष्ट्रगान अनिवार्य किया जा सकता है? क्या इनके मिनट्स आदि सिनेमा घरों में रखे जाएंगे?

5 जब अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण किया जा रहा हो तब सिनेमा घरों में राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिए जाने से भारत सरकार निगरानी एवं उत्तरदायित्व का अतिरिक्त बोझ नहीं उठाने जा रही है? क्या इसका निबाह अखिल भारतीय स्तर पर दोष रहित संभव है?

6 फ़िल्म से पूर्व राष्ट्रगान की अनिवार्यता को क्या मनोरंजन को भी सरकारों से नाथ लेने की कवायद की तरह देखा जा सकता है? अब जब फ़िल्में बनेंगी तो उस नए दर्शक की तरह सेंसर बोर्ड देखने को बाध्य नहीं होगा जो पहले ही भारत का राष्ट्रगान गाकर फ़िल्म देखनेवाला है?

7 सिनेमा घरों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता को क्या बाया न्यायालय अंधराष्ट्रवाद की दिशा में गतिमान फ़िल्म उद्योग की तरह देखा जा सकता है? देखा जाना चाहिए?

ये कुछ सवाल हैं जिनके उत्तर तलाशने की कोशिश की जा सकती है। साथ ही यह भी सोचा जा सकता है कि कहीं राष्ट्रीय महत्त्व के सभी धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक स्थलों पर भी दिन की शुरुआत से पहले ही सही राष्ट्रगान करवाये जाने की मांग तो ज़ोर नहीं पकड़ लेगी? क्या यह मांग भी ऐसी ही आलोचना को प्राप्त होगी जैसे यह न्यायालय का आदेश? न्यायालयीन आदेश के प्रति सम्मान सहित उपर्युक्त कुछ सवाल स्वस्थ बातचीत हेतु निवेदित हैं।

शशिभूषण

नोटबंदी का सबसे सरल आकलन बाया उपन्यास राग दरबारी

संसद में विमुद्रीकरण संबंधी बिल से कल नतीज़ा निकल आया. यदि काला धन आपने बताया तो वह आधा ही काला धन है. पहले 45 प्रतिशत था. अब भी वक़्त है आधा रखिये. आधा जमा कीजिये.

यदि आयकर विभाग ने पकड़ा तो 85 प्रतिशत काला धन मान लिया जायेगा. तब 15 प्रतिशत अपने पास रखिये. बाक़ी राजसात हो जायेगा.

कुछ वैसे कुछ हमारे आपके जैसे असल बिस्किट से दूर इसे 50-50 (फिफ्टी फिफ्टी) समाधान कह रहे हैं. उन्हें भी सुनिए. कीजिये हमेशा की तरह अपने मन का.

खैर, अब सवाल यह है कि सरकार का अधिक फ़ायदा किसमें है? मेरे ख़याल से आयकर विभाग द्वारा अधिक से अधिक पकड़ पाने में. आप भी यही सोचते हैं न?

फिर सवाल यह है कि आयकर विभाग का फायदा किसमें है? कहीं यह आयकर विभाग का ग्रीवांस रिड्रेसल तो नहीं थी सारी उठा पटक? आप गूंगे बहरे हो चले थे. धमाका करना पड़ा.

लोग तो लाइन में थे ही पहले बक़ौल प्रधानमंत्री मोदी जी यूरिया के लिए लाइन में लगे थे और अब नोट भंजाने के लिए लाइन में आ लगे हैं.

बिल से क्या खूब पुराना निल बटा सन्नाटा निकला है. श्रीलाल शुक्ल(राग दरबारी) बहुत पहले कह गए.

हर काम लाइन से करो. क्योंकि लाइन दिखती है. जो दिखती है वही तरक्की है. इसके आगे तुम्हें सोचने की ज़रूरत नहीं. उसके लिए दूसरे लोग हैं.

शशिभूषण

भक्त बनाम संविधान

पिछले कुछ सालों में भारत को कुछ मिला हो न मिला हो लेकिन प्रतिरोध का एक शानदार शब्द ज़रूर मिला है। वह शब्द है भक्त।

भक्त, भारत का अब विवेकपूर्ण असहमति का एक स्वीकृत सार्वभौम शब्द है। चरमपंथियों, अतिवादियों, अलगाववादियों, अंध अनुयाइयों, विघटनकारी और पेशेवर धार्मिक उन्मादियों को एक शब्द में बुलाना हो तो भक्त पर्याप्त शब्द है।

मुझे मालुम नहीं इस शब्द को प्रचलन में लाने के लिए सबसे अधिक श्रेय किसे दिया जाना चाहिए। लेकिन इस शब्द की साहित्यिक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आपको याद दिलाना चाहूंगा।

मुक्तिबोध ने बहुत ज़ोर देकर कहा था कि भक्ति आंदोलन जो संतो के सुधार और विराट सामाजिक परिवर्तन का उद्देश्य लेकर अपने चरमोत्कर्ष पर चल रहा था उसे उत्तरार्ध में भक्त कवियों ने हथिया लिया।

उल्लेखनीय है कि भक्त कवि अधिकांश सवर्ण थे और वर्णव्यवस्था के पोषक थे। स्मरण रहे बकौल मुक्तिबोध संतो के खून पसीने से सींचे हुए अखिल भारतीय भक्ति आंदोलन को भक्त अतीत में ऐसा धक्का दे चुके हैं कि वह आज धार्मिक कारोबार में तब्दील हो चुका है। इससे अधिक सत्यानाश और क्या हो सकता है!!!

लेकिन अब डरने की बात नहीं। संविधान अपने साथ है। कुल मिलाकर यही वह ठीक वक्त है जब बिना डरे, बिना झुके भक्तों को भक्त कहा जाये। संविधान की मूल आत्मा को बचाये रखा जाये।

अपनी सीमित समझ के साथ मैं कहना चाहता हूँ कि भक्त कह सकने वाले, भारतीय समावेशी सांस्कृतिक एकता के आलोचकीय प्रतीक हैं। 
शशिभूषण

भाषा का छप्पन भोग

छप्पन भोग सुना होगा आपने। छप्पन भोग की थाली में स्वाद के सब रस होते हैं। कड़वा, कसैला, तीखा और खारा आदि।

छप्पन भोग से बड़ी मेज़बानी क्या होगी? लेकिन छप्पन भोग जिमानेवाले मेज़बान की एक बड़ी मुश्किल होती है।

अतिथि खा सकने की स्थिति में नहीं होते। मेज़बान को असल पुन्न और संतोष कुत्तों को जूठन खिलाने का ही मिल पाता है।

आप गौर से देखिये कुछ लेखक बनने चले व्याकुल टीकाकार भाषा का छप्पन भोग परोसते चलते हैं।

ऐसी टीकाओं में निंदा, प्रशंसा, आह्लाद और अवसाद सहित सभी मनोविकार एक ही स्थान पर मिल जाते हैं।

बधाई हो बधाई का नाच हो या नाश होगा नाश का नृत्य सब। सब, मने सब।

जनता हो या राजा सबका ख्याल रखा गया होता है। सबका मने सबका।

इसे कहते हैं भाषा का छप्पन भोग।

शशिभूषण