शुक्रवार, 10 मई 2019

साहित्य का तकाज़ा और नामवर सिंह


"यद्यपि जिन रचनाओं की चर्चा वे कर रहे थे, वे मेरी नहीं हरिशंकर परसाई की लिखी थीं। पर विषय बदलने के डर से तथा अपनी सहज नम्रतावश मैंने उनके कथन में सुधार करना उचित नहीं समझा। सोचा चलने दो, कौन यह नामवर सिंह है, जिसकी भूलें सुधारना साहित्य का तकाजा हो।" - शरद जोशी, 'कहहुँ लिखि कागद कोरे' शीर्षक व्यंग्य का अंश।

मैंने अपने विद्यालयी दिनों में यानी बालिग़ होने से पहले तत्कालीन लागू हिंदी पाठ्यपुस्तक में शरद जोशी के व्यंग्य 'कहहुँ लिखि कागद कोरे' के इसी अंश में पहली बार रीवा जैसे शहर में 'नामवर सिंह' लिखा पढ़ा था। तब तक मेरे लिए नामवर सिंह को जानना या उन्हें सुन रखना दोनों का सवाल ही नहीं उठता था। मैंने अपने हिंदी शिक्षक से पूछा नहीं कि नामवर सिंह कौन हैं ? इस व्यंग्य का क्या अभिप्राय है ? शिक्षक ने मानो केवल इतना ही कहा- नामवरों का क्या भरोसा ! मैंने चौंकते हुए अपनी बाल बुद्धि से सोचा- नामवर सिंह यानी साहित्य का तीसमारखाँ टाईप। यदि आगे साहित्य में डूबना है तो नामवर सिंह से सतर्क रहना होगा अथवा उनकी भूल सुधार सकने की तैयारी रखनी होगी। 

इसके बाद मैंने राज्य और संघ लोक सेवा आयोग के हिंदी विषय लेने वाले प्रतियोगियों से नामवर सिंह की उद्धरणों वाली बाक़ायदा चर्चा सुनी- ये कहा, वो कहा, इस पर विवाद है, इस स्थापना को कोई काट नहीं सकता आदि आदि। मैं प्रभावित हुआ। होना ही था। फिर मैथ्स ग्रेड्यूएशन के बाद हिंदी से एम ए करने विश्विद्यालय गया तो नामवर सिंह को विधिवत पढ़ा - लेख, भाषण, किताबें जो भी प्रो कमला प्रसाद की बनायी हिंदी विभाग की उस लाइब्रेरी में उपलब्ध था। आगे उन्हें सुनने का भी मौका मिला। उन्हीं सालों एक मशहूर शेर मेरे जेहन से टकराया था- हुए नामवर बेनिशां कैसे कैसे/ ज़मी खा गयी आसमां कैसे कैसे। लेकिन नामवर सिंह तो अमर हैं, ख्याति में सर्वोपरि। आलोचकों में सिरमौर। विद्वानों में बादशाह। इनका कभी अंत न होगा- ख़याल आता।

कुछ भी हो शरद जोशी की इस एक पंक्ति ने असर निर्णायक किया, करती है इसमें दो मत नहीं। व्यंग्य का प्रभाव अमिट होता ही है। मेरे भीतर नामवर सिंह की भूलें तजवीज करने की प्रवृत्ति यहीं से आयी। यह हुआ तो नामवर सिंह के प्रति श्रद्धा विकलांग होने से बची रही। मैंने गौर किया नामवर सिंह की मुस्कुराती तस्वीरें व्यंग्य, आक्रामकता और बेपरवाह दृढ़ता की तस्वीरें हैं। उनके चेहरे में हजारी प्रसाद द्विवेदी के चेहरे की उदात्त सौम्यता की जगह व्यंग्य है। यह अनायास नहीं है कि नामवर सिंह ने बड़े बड़ों को ध्वस्त करने के लिए व्यंग्यपूर्ण बारीक विवेचना और किसी को भी स्थापित करने के लिए उदार व्याख्या का सहारा लिया। आइए संक्षेप में नामवर सिंह की कुछ भूलों पर गौर करते हैं -

नामवर सिंह का लिखना छोड़कर बोलने पर आ जाना कालांतर में उनके आलोचक की हार साबित हुई। वे लोकप्रिय व्याख्याता रह गए। नामवर सिंह चाहते तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तरह इतिहास लिख सकते थे। लिखने पर केंद्रित रहते उन विरोधाभासों, अंतर्विरोधों परस्पर विरोधी निष्पत्तियों, परिवर्तनशील स्थापनाओं को स्वतः संपादित कर उस दोष से बच सकते थे जो बोलने के साथ जुड़े होते हैं। यह कहना अच्छा लगता है कि नामवर सिंह ने हिंदी साहित्यालोचन में ओशो का दर्जा हासिल किया। लेकिन इसके ख़तरे भी सर्वविदित हैं। अध्यात्म का सम्बंध परमात्मा से है और साहित्य का यथार्थ से। परमात्मा किसी को नहीं मिलता। यथार्थ सबका अपना होता है। ओशो अंत में ध्यान कराते थे और साथ नृत्य भी करते थे। लेकिन नामवर सिंह को हमेशा अपने श्रोताओं को उनके हाल पर छोड़कर अकेले ही प्रोफेसर, कुलपति आदि रहना पड़ा। छूटे हुए कुछ श्रोता, पाठक भी थे और स्वयं लेखक भी। वे सुनकर मुग्ध हो सकते थे तो बाद में चिढ़ भी सकते थे। ऐसा हुआ भी। यह अब तक का शुक्र है कि नामवर सिंह हरिशंकर परसाई और कांतिकुमार जैन के वैसे हत्थे नहीं चढ़े जैसे रजनीश। इसके पीछे दो कारण हैं पहला परसाई अब हैं नहीं दूसरा कांतिकुमार जैन प्रोफेसर रह चुके हैं। वे शिवमंगल सिंह सुमन सरीखा यानी मरने के पहले और मरने के बाद जैसा दांव नामवर सिंह के साथ नहीं खेल सकते।

नामवर सिंह भले ही राजेन्द्र यादव से टकराते रहे हों मगर वे अपनी वाचिक प्रतिष्ठा के शिखर पर स्नोवा बार्नो को स्त्री कहानीकार की तरह ही महत्वपूर्ण मान पाए। यह बाक़ायदा शोध का विषय है कि नामवर सिंह जैसा विमर्श विरोधी आलोचक एक पुरुष को स्त्री नाम से लिखता पाकर उसे बड़ी स्त्री कहानीकार मान बैठा और बाद में सब कुछ जानने के बावजूद अनजान बना रहा। इतना ही नहीं नामवर सिंह ने ज्योति कुमारी की किताब के लोकार्पण में भी काफ़ी कुछ बोला और नाना प्रकार की दूसरी किताबों, साहित्यकारों पर भी भाषण दिए जो बाद में सही नहीं उतरे।

हिंदी दलित लेखन भी नामवर सिंह के मज़बूत हाथ न पा सका। काफ़ी बाद में उन्होंने यह स्वीकार किया कि दलित आत्मकथाओं का यथार्थ गंभीर और विचारणीय है मगर वे इस पर डंटे रहे कि साहित्य की कसौटी में केवल स्वानुभूति को मुख्य नहीं माना जा सकता। इसके पीछे यही कारण समझ में आता है कि नामवर सिंह आत्माभिव्यक्ति की भावना को छायावाद युगीन प्रवृत्ति मानते रहे। जहाँ साहित्यिक उदात्तता थी। चूंकि वे छायावाद में उस व्यक्तिवादी भावना का उभार लक्षित कर ही चुके थे जिसमें आत्मकथा लेखन की परंपरा सी चल पड़ी थी इसलिए वे दलित लेखन से साहित्यिक कलात्मक उत्कृष्टता की मांग पर अडिग रहे किंतु दलित साहित्य को सामाजिक यथार्थ के अध्ययन के लिए उपयुक्त भी मानते रहे।

नामवर सिंह की आलोचना विरासत भी जो अब हमारे सामने है वह उनकी भयंकर भूलों से भरी हुई है। इसमें दो तरह की प्रवृत्तियां मुख्य हैं। पहली वह जिसमें नामवर सिंह ने दूसरे आलोचकों को सामने नहीं आने दिया अथवा विनम्रता में दबकर कहना चाहिए उनके तेज में दूसरे मंद ही रहे और कालांतर में बुझ गए। दूसरी वह प्रवृत्ति जिसके आधे में वे आलोचक हैं जो हैं तो नामवर अनुगामी लेकिन वे आलोचना को दूसरी परम्परा से आगे नहीं ले जा पाए यानी नामवर सिंह की उत्तराधिकारी आलोचना की अनुपस्थिति। यहीं कमाल यह है कि जहां कुछ टीकाकार बाद के आलोचकों को नामवर सिंह की जेब से निकला पाते हैं वहीं कुछ को उनकी जेब फाड़कर निकला। कुल मिलाकर इसमें नामवर सिंह की भूलें भी बराबर की उत्तरदायी मानी जायेगी कि वे हिंदी और साहित्य के लोकतंत्र में अधिनायक बनकर रहे। उन्होंने अपनी इंटेलिजेंट स्थापनाओं से हिंदी समाज को जितना चमत्कृत किया उतना ही शब्दों को भी यथावसर बारीक पकड़ने वाली विदग्धता से किसी को भी उठाया गिराया। उदाहरण के लिए यह नामवर सिंह ही थे जो कह सकते थे- कविता एक खेल है। उन्होंने ज़रूरत पड़ने पर शब्दों से खेल सकने वाले को भी बड़ा कवि साबित किया।

नामवर सिंह ने कृतियों के मूल्यांकन के संबंध में भी भूलें की। उन्होंने धर्मवीर भारती के कालजयी नाटक 'अंधा युग' को सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज़ कर दिया था क्योंकि लेखक की विचारधारा दूसरी थी। यह अच्छा है कि अब पुरानी किताबों मे गोते लगाने को अच्छा नहीं माना जाता वरना नामवर सिंह की पुरानी किताब इतिहास और आलोचना उनके माथे आ जाती। हिंदी में भला वह कौन होगा जो अंधा युग के लिए आलोचक को माफ़ कर दे वो भले नामवर सिंह ही क्यों न हो। क्या यह कहना गप होगा कि भारत में जितने अंधा युग के मंचन हो चुके और होते जा रहे उतने तो नामवर सिंह ने व्याख्यान भी न दिए होंगे। ध्यान रहे इसी के समांतर उन्होंने निर्मल वर्मा को ख़ूब सराहा। यह अलग बात है कि निर्मल वर्मा को मोहन राकेश जैसा पाठकों का प्यार न मिला। शैलेश मटियानी जैसा उनका लोक महत्व तो शायद ही कभी स्थापित हो पाए। नामवर सिंह ने शिवमूर्ति और संजीव को भी कम ही पहचाना। 

उठाना गिराना, खंडन महिमामंडन, विवाद, सत्ता संधान नामवर सिंह के आजीवन प्रिय कर्म रहे। उन्होंने जिसे निशाने पर लिया उसे लगभग बिरादरी बाहर होना पड़ा। यह नामवर सिंह की खासियत रही कि उन्होंने जिसे लक्ष्य किया उसे देखते हुए अपनी एक आँख सदैव दबाकर रखी। व्यंग्य और अचूक प्रसंगों से ऐसा बेधा भेदा कि उन्हें पढ़ने के बाद संबंधित साहित्यकार में पाठक की रुचि ख़त्म हो जाये। यक़ीन न हो तो रामविलास शर्मा, अशोक वाजपेयी आदि के कृतित्व पर उन्हें पढ़ लीजिये। अशोक वाजपेयी को कवि और रामविलास शर्मा को आधुनिक प्रगतिशील मानने में सदैव संकोच रहेगा। इस प्रवृत्ति का अपवाद भी नामवर सिंह में ही मिलता है। उन्हें पढ़ने के बाद आपको अज्ञेय की 'नाच' कविता से प्रेम हो जाएगा। यह नामवर सिंह ही हैं जिनके कारण अगर आप अवसरवादी हैं तो आपको अटल जी से नफ़रत और राजनाथ सिंह से मोहब्बत साथ साथ हो सकती है। बावजूद इसके एक भाजपा का संस्थापक सदस्य रहा है दूसरा अध्यक्ष। यहां इस बात का कोई खास मतलब नहीं है कि अशोक वाजपेयी नामवर सिंह को ही अचूक अवसरवादी कहते हैं। यह सर्वविदित है कि नामवर सिंह न होते तो मुक्तिबोध को गांधीवादी साबित कर डालने में अशोक वाजपेयी को कोई रोक न पाता।

नामवर सिंह की चुप्पियां भी उनकी भूल मानी गयी हैं। लेकिन उन्होंने इतना बोला है कि उनकी चुप्पियों का ग़लत अर्थ निकालना असंभव है। इस संबंध में काशीनाथ सिंह के एक दृष्टांत का स्मरण ही उचित होगा कि नामवर सिंह उस शेर की तरह रहे जो उठकर बोला तो जंगल में सब चुप हुए, शांति हुई और जब जंगल में शोर बढ़ा तो नामवर चुप ही रहे। क्योंकि जब सब बोल रहे हों तो शेर चुप ही रहता है। अपनी भूलों और खूबियों के शिखर से बने नामवर सिंह के आखिरी दिनों का यही चित्र उभरता है -

जिसमें मज़बूत तना, ठूंठ डालें पर हरहराते फुनई (शीर्ष) रह जाते हैं नदी किनारे के ऐसे पुराने पीपल सरीखे रह गए हैं नामवर सिंह। उनकी उपलब्धि जड़ों को ढंके मिट्टी सदृश हिंदी समाज के कगार बड़ी छोटी लहरों के साथ टूटकर -घुलकर नदी में मिल रहे हैं। गिनी जा सकने वाली नामवर सिंह की देह की नसें हिंदी की धमनी-शिरा हैं। संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी-उर्दू की मनीषा और विश्व साहित्य की हवा पानी से ऊंचे उठे इस पीपल की पत्तियां आज भी सामाजिक -राजनीतिक- सांस्कृतिक वायुमंडल की आती -जाती सांस पर डोलती हैं। चुप्पियां तोड़ती हैं। ऐसे पेड़ हैं नामवर सिंह जिनकी बची -खुची पत्तियों के लिए आज भी हँसिया, कुल्हाड़ी, रस्सी लेकर चढ़ते हैं कुछ महत्वाकांक्षी, कुछ सामंती, कुछ वर्चस्ववादी अकादमिक दुनिया के, कुछ बेरोजगार, भूमिहीन युवा और कुछ विस्तारवादी साहित्यिक सामंत। फिर भी नामवर सिंह है कि आज भी केवल अपने कह सकने की आन पर रहते हैं। चाहे वक्तव्य कितनी ही बड़ी भूल या कायरता साबित होने जा रहा हो। वो नामवर सिंह ही हैं जो कन्नड़ लेखक एम एम कलबुर्गी की दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी ताकतों द्वारा नृशंस हत्या के बाद लेखकों के सम्मान वापसी आंदोलन को लोकप्रियता प्राप्ति का उद्यम बताकर मौन साध लेते हैं।

पंचतंत्र की एक उक्ति के अनुसार जो विद्वान या व्यक्ति राजा को प्रिय होगा वह लोक की नजर में दुष्ट होगा। जो लोक को प्रिय होगा वह राजा की नजर में संदिग्ध होगा। हिंदी के नामवर सिंह इसके अपवाद हैं। वे जितने हिंदी समाज में स्वीकृत हुए उतने ही संस्थानों, विश्वविद्यालयों और साहित्य के या भाषा के सत्ता केंद्रों में। नामवर सिंह के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने जितना दिया उससे कई गुना ज्यादा पाया। यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है लेकिन सच्चाई यही है। आरक्षण पर नामवर सिंह की राय कि क्या सवर्णों के बच्चे भूखों मरेंगे, कटोरा लेकर भीख मांगेंगे ? उनकी आखिरी भूल मानी जा सकती है। दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से जिसे हमारे समय के फासीवाद की ओर झुके पूंजीवादी लोकतंत्र ने 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण देकर स्थायी कर दिया। यह हिंदी का सौभाग्य होगा कि सेलेब्रेटी का जीवन जीकर गए पब्लिक इंटेलेचुअल नामवर सिंह की भूलों को सुधारा जाए । मगर इसकी संभावना कम ही है कि ऐसी किसी भावना तक को मूर्खता, कृतघ्नता अथवा छोटा मुँह बड़ी बात नहीं समझ लिया जाएगा। इसलिए अंत में नामवर सिंह को ही प्रिय रहा एक शेर-

हमको सज़ा मिली है ये हयात से
समझ हरेक राज़ को मगर फ़रेब खाएजा

- शशिभूषण

(उद्भावना, जनवरी-मार्च 2019 में प्रकाशित)

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