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मंगलवार, 8 अगस्त 2023

साम्राज्यवाद विरोधी प्रगतिशील राष्ट्रवाद का प्रसार ज़रूरी : विनीत तिवारी

भारतीयता राष्ट्रवाद और साहित्य : परिसंवाद

देवास, 6 अगस्त 2023


'हिरोशिमा दिवस' के उपलक्ष्य में प्रगतिशील लेखक संघ की देवास इकाई द्वारा "भारतीयता राष्ट्रवाद और साहित्य" विषय पर परिसंवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने साहित्य, समकालीन राजनीति एवं अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में मौजूदा समस्याओं को समझने, उनका विश्लेषण करने का प्रयास किया।
आयोजन के प्रमुख वक्ता प्रलेसं के राष्ट्रीय सचिव, कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रवाद की प्रगतिशील सोच ने ही देश से अंग्रेजों को भगाया था। आजादी के लिए चले आंदोलन में 1857 के राष्ट्रवाद का उपयोग किया गया था। भारतीयता भौगोलिक नहीं हो सकती। देश की संकल्पना का एक आधार राजनीतिक भी होता है। भारत के संदर्भ में अलग-अलग संकल्पनाएँ सामने आई हैं। 1947 का राष्ट्रवाद विस्तारवादी नहीं था। व्यक्ति और देश की सदैव एक ही पहचान नहीं रहती। बावजूद इसके आज पहचान के आधार पर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है। भाषा, भोजन, पहनावे के नाम पर आपस में लड़वाया जाता है। वर्गीय पहचान ही व्यक्ति की अंतिम पहचान होती है। जिन्हें शोषित और शोषक के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। राष्ट्र के स्तर पर तीसरी दुनिया के रूप में भारत की पहचान है, जो गुटनिरपेक्ष आंदोलन, ब्रिक्स एवं सार्क संगठन के माध्यम से अभिव्यक्त हुई है। पीड़ित राष्ट्रों के पक्षधर के रूप में भी भारत की पहचान रही है। मानवता ही राष्ट्रीयता होना चाहिए। सांप्रदायिकता से लड़ने वालों को अपनी लड़ाई साम्राज्यवाद की ओर मोड़नी होगी, क्योंकि वही सभी समस्याओं के मूल में है। फ़िदेल कास्त्रो ने इसीलिए तीसरी दुनिया के देशों की एकता की बात की थी क्योंकि तीसरी दुनिया के मुल्क़ इकट्ठे होकर साम्राज्य्वाद को कड़ी चुनौती दे सकते हैं। कुछ प्रगतिशील लोग भी यह समझते हैं कि भारत में सांप्रदायिक शक्तियों के उभार और सत्ता में आने का कारण उनकी पिछले नौ दशकों की मेहनत रही है। विनीत ने कहा कि मैं इसे सच नहीं मानता। सच तो यह है कि वैश्विक साम्राज्यवादी शक्तियों ने जब देश की पूँजीवादी उदारवादी सत्ता में अपनी उम्मीद खो दी तब उन्होंने देश के भीतर की सांप्रदायिक शक्तियों को पोषित करना शुरू किया। हालात बताते हैं कि हम आज जितने अमेरिका के नज़दीक हैं, उतने पहले कभी नहीं रहे।

विनीत ने कहा कि हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम के विस्फोट के संदर्भ में वर्ष 1995 में नए तथ्य उद्घाटित हुए। बम विस्फोट से पहले ही जापान आत्मसमर्पण कर चुका था उसके बाद भी यह नरसंहार क्यों किया गया? परमाणु बम का प्रयोग नागरिक आबादी से दूर करने का सुझाव वैज्ञानिकों ने दिया था बावजूद इसके अमेरिका ने जापान की नागरिक आबादी पर यह प्रयोग किया। अगर यह प्रयोग ही था तो दो दिन के बाद नागासाकी पर पुनः बम क्यों डाला गया? इन बमों के माध्यम से अमेरिका सोवियत संघ और उस काल में उभरे समाजवादी राष्ट्रों को अपनी ताकत के जरिए डराना चाहता था। विश्व के शांतिप्रिय नागरिकों को मानवता की रक्षा के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद से निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी।

उज्जैन प्रलेसं इकाई के शशिभूषण ने अज्ञेय और पाश की रचनाओं के माध्यम से भारतीयता को परिभाषित करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि हम गलत अध्ययन के शिकार रहे हैं। वर्तमान की समस्याओं का हल अतीत के पास नहीं है। अतीत से हम सबक ही ले सकते हैं। भारतीयता सनातन से नहीं गौतम बुद्ध काल से पहचानी गई है। बुद्ध से प्रारंभ हुई सहिष्णुता ही भारतीयता में बदली है जिसे सम्राट अशोक ने विस्तारित किया। भक्ति आंदोलन ने राष्ट्रीय एकता के लिए बड़ा काम किया है। बकौल मुक्तिबोध वर्तमान में संतो के उस आंदोलन को "भक्तों?" ने हथिया लिया है। डॉक्टर लोहिया को उद्धृत करते हुए शशिभूषण ने कहा कि धर्म दीर्घकालीन राजनीति रहा है। अंग्रेजों को पराजित करने में धर्म की कोई भूमिका नहीं थी। भारत के राष्ट्रवाद ने अब धार्मिक स्वरूप ले लिया है। धर्म को राष्ट्रवाद बताना बड़ा खतरा है। धार्मिक राज्य की परिकल्पना असमानता आधारित वर्ण-आश्रम व्यवस्था है। आज गीता और बुद्ध एक दूसरे के सामने खड़े हैं। राष्ट्रवाद भारतीयता के लिए कैंसर के समान ही रोग है।

गोष्ठी में कबीर भजनों के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गायक प्रहलाद टिपाणियां ने कहा कि वर्तमान में सच बोलना खतरनाक हो गया है। कबीर के माध्यम से देशवासियों की आन्तरिक पीड़ा को मैंने महसूस किया है। मानवता के लिए एकजुट होना जरूरी है।

प्रलेस इंदौर इकाई के हरनाम सिंह ने कहा कि वर्तमान में हिंदुत्व को ही भारतीयता बताया जा रहा है, जिसके कारण स्वतंत्रता संग्राम की विरासत खतरे में है। रवींद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रवाद की आलोचना करते हुए कहा था कि वह शक्ति और अतीत की कल्पनाओं से संचालित होता है। हिटलर के राष्ट्रवाद के परिणाम दुनिया ने भुगते हैं। आयोजन के बारे में इकाई सचिव राजेंद्र सिंह राजपूत ने कहा कि सांप्रदायिकता और घृणा के माहौल में यह परिसंवाद आयोजित किया गया है। स्वागत उद्बोधन एवं गोष्ठी का संचालन इकाई अध्यक्ष कुसुम बागडे ने किया। आभार माना राजेंद्र राठौड़ ने। आयोजन में प्रलेसं इकाई के वरिष्ठ सदस्य मेहरबान सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस अवसर पर डॉक्टर प्रकाश कांत, बहादुर पटेल, ज्योति देशमुख, वरिष्ठ चित्रकार मुकेश बिजौले ,अजीज रोशन, श्री गहलोत, एफ बीमानेकर, प्रोफेसर त्रिवेदी, रामप्रसाद सोलंकी, एस एल परमार, भागीरथ सिंह मालवीय, वाणी जाधव, नंदकिशोर कोरवाल, श्री वागडे़, राम सिंह राजपूत, मोहन जोशी आदि उपस्थित थे।

-हरनाम सिंह
मो. 9229847950

शनिवार, 13 मई 2023

कुमार अम्बुज से अनौपचारिक संवाद

नयेपन की रचनात्मकता ही मौलिकता है 

क्लब फ़नकार आर्ट गैलरी, उज्जैन में म.प्र. प्रलेसं, उज्जैन की ओर से 'बातचीत और रचना पाठ' अंतर्गत सुप्रसिद्ध लेखक कुमार अम्बुज से अनौपचारिक-आत्मीय संवाद संभव हुआ। छह मई की शाम छह बजे एकत्र उज्जैन के साहित्यकार एवं विद्वानों ने अपनी जिज्ञासाएँ रखीं।

कार्यक्रम की शुरुआत कुमार अम्बुज की मानीखेज़ कविता "दैत्याकार संख्याएँ" की शशिभूषण के वाचन में डिजिटल प्रस्तुति से हुई। 'उपशीर्षक' काव्य-संग्रह से संक्षिप्त काव्य-पाठ के बाद मौलिकता विषयक सवाल पर कुमार अंबुज ने कहा कि नयेपन का रचनात्मक प्रयास ही मौलिकता है। किसी विषय पर आप जिस नयेपन से लिखते हैं वही मौलिकता है। हमारी भाषा और विश्व साहित्य सहित अन्य कलाओं के सानिध्य से लेखक को अपनी चुनौतियों का भी अहसास हो सकता है।

सिनेमा चयन संबंधी प्रश्न पर उन्होंने कहा, मेरे लिए सिनेमा साहित्य का ही एक विस्तार है। कौन-सी फ़िल्म देखें यह हम अपनी रुचि अनुसार ख़ुद ही कुछ खोज और चयन की दिलचस्प यात्रा पर निकल सकते हैं। चित्रकार अक्षय आमेरिया के सवाल का जवाब देते अम्बुज ने सहमति व्यक्त की कि विश्व सिनेमा देखने की शुरुआत ईरानी सिनेमा से की जा सकती है। इस खोजने-देखने के क्रम में कुछ फ़िल्मों को देखते हुए सहसा मुझे लगा कि कुछ फ़िल्मों पर लिखा जाना चाहिए। लेकिन यह लेखन समीक्षा या कथासार न रह जाए। इसलिए कोशिश रही कि उनसे समकालीन समय और यथार्थ का एक संबध रेखांकित हो सके। यही कारण है यह लेखन सर्जनात्मक निबंध की तरह है।

पिलकेन्द्र अरोरा और नरेंद्र जैन ने कुमार अम्बुज को अतीत स्मृतियों(नॉस्टेल्जिया) में गोते लगवाये। चालीसेक साल पुरानी बातें और संदर्भ उकेरे-उरेहे गए। पूरक कथन के रूप में नरेंद्र जैन ने उन्हें कई प्रसंग, बीच-बीच में स्मरण कराये। कुमार अम्बुज का कृतज्ञता भरा स्वर, रु-ब-रु हुए श्रोताओं को महसूस हुआ। व्यंग्यकार पिलकेन्द्र अरोड़ा ने कुमार अंबुज के एक जवाब पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हमने अभी तक पढ़ा था कि दो पंक्तियों के बीच मायने होते हैं। लेकिन आज जाना कि दृश्यों के पीछे भी अनंत अभिप्राय होते हैं। इसे अंबुज जी के सिनेमा पर लेखन में एक महत्वपूर्ण पक्ष की तरह हर कोई अनुभव कर सकता है।

कुमार अंबुज ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि अराजनीतिक कुछ भी नहीं है। जो कहता है मैं राजनीति में नहीं हूँ वह भी परोक्षत: या चतुराई पूर्वक राजनीति में है। राजनीति न करना भी राजनीति है। मुक्तिबोध की पंक्ति- जो है उससे बेहतर चाहिए के संदर्भ से देखें तो व्यवस्थाओं में मनुष्योचित, बेहतर बदलाव हमेशा संभव हैं।

लेखन में बचपन की, स्मृति की भूमिका होती है। हम लगातार सीखते हैं। यह प्रक्रिया अनवरत जारी रहती है। लेकिन हमें अध्ययन द्वारा अधिक से अधिक सीखने की कोशिश करनी चाहिए।

एक सवाल के उत्तर में कुमार अंबुज ने कहा- लेखन के लिए सबसे प्रेरक है व्यग्रता। कुल मिलाकर तीन चीज़ें आवश्यक हैं- पहली, व्यग्रता। मेरे लिए यह मूलभूत है। दूसरा, सामाजिक ग्लानिबोध और तीसरा, हमारे समय की विडंबनाएँ। साहित्य एक सर्जनात्मक हस्तक्षेप भी है।

हमेशा ही जितना सोचते हैं उतना नहीं कर पाते। मैंने सोचा था शताधिक फिल्मों पर लिखूँगा। लेकिन अभी तक बीस-बाईस फिल्मों पर ही लिख पाया हूँ।

बातचीत के अंत में राजनीति, साहित्य और समाज तथा देश से अपेक्षा करते हुए कुमार अम्बुज ने कहा कि जैसे किसी की आस्था को ठेस लगती है तो अनेक लोगों की वैज्ञानिक चेतना को भी ठेस लगती है। आस्तिकता बची रहे तो नास्तिकता के लिए भी जगह बची रहे। लोकतंत्र और स्वतंत्रता बनी रहे।

इस बातचीत में उज्जैन के प्रमुख और चयनित साहित्यिक, बुद्धिजीवी आमंत्रित थे। प्रगतिशील लेखक संघ के इस आयोजन में मुख्य अतिथि या अध्यक्षता की औपचारिकता से पूर्णतः मुक्त बातचीत तृप्तिदायक रही और समय सीमा के कारण कुछ चीजें छूट भी गईं। कुल मिलाकर यह एक अभिनव उपलब्धि रही।

उपन्यासकार प्रमोद त्रिवेदी, साहित्यकार प्रो. अरुण वर्मा, पत्रकार देवेंद्र जोशी, चित्रकार वासु गुप्ता, कविता जड़िया ने भी जिज्ञासा या सवालों के साथ हिस्सा लिया। कार्यक्रम में चित्रकार मुकेश बिजोले, प्रो गुप्ता, पांखुरी जोशी आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम का संचालन-संयोजन कवि-कथाकार शशिभूषण ने किया। वरिष्ठ कवि राजेश सक्सेना ने आभार प्रकट किया।

- शशिभूषण,

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

मुक्तिबोध, चन्द्रकान्त देवताले, नईम स्मरण प्रसंग

कल यानी 8 अप्रैल 2018 को मध्य प्रदेश के देवास में प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में मुक्तिबोध, प्रो. नईम और चंद्रकांत देवताले स्मरण प्रसंग में शामिल होने का सुअवसर मिला।

कार्यक्रम दो सत्र में सम्पन्न हुआ। पहला सत्र विमर्श का था। इसमें मुक्तिबोध, चंद्रकांत देवताले और प्रो. नईम की रचनाओं का पाठ हुआ। प्रसिद्ध कवि और अनुवादक उत्पल बनर्जी ने मुक्तिबोध की कालजयी कविता अंधेरे में के एक अंश का यादगार गायन प्रस्तुत किया। चंद्रकांत देवताले की चुनिंदा कविताओं और प्रो. नईम के दो गीतों का पाठ किया कवि बहादुर पटेल एवं मनीष शर्मा ने। मुक्तिबोध की कहानियों पर शशिभूषण, चंद्रकांत देवताले पर राजेश सक्सेना एवं प्रो नईम पर विक्रम सिंह ने अपने विचार अनुभव बांटे। 

दूसरे सत्र में शशिभूषण, नीलोत्पल, राजेश सक्सेना, उत्पल बनर्जी, ब्रजेश कानूनगो एवं नरेंद्र गौड़ ने अपनी दो दो कविताओं का पाठ किया। इस अवसर पर प्रलेसं के संस्थापकों सहित महाविद्रोही राहुल सांकृत्यायन एवं प्रगतिशील धारा के उन सभी लेखकों, कलाकारों एवं संस्कृति कर्मियों को याद किया गया जिन्होंने लेखकों की एकजुटता एवं अपराजेय संघर्षशीलता के लिए अपना सर्वोत्तम दिया। कुछ लेखकों ने अपनी जान तक गँवाई लेकिन न पीछे रहे न समझौते किये।



प्रलेसं की देवास इकाई की ओर से इस कार्यक्रम का संयोजन किया मेहरबान सिंह ने। संचालन किया कहानीकार एवं जलेस से सम्बद्ध मनीष वैद्य ने। कार्यक्रम के अंत में हॉल के बाहर लगाए गए बुक स्टाल पर सबने अपनी पसंद की किताबें एवं पत्रिकाएँ खरीदीं। बड़ी संख्या में उपस्थित लेखकों, सहृदयों, सुधीजनों एवं ईटी का आभार माना युवा कवि अमेयकान्त ने।



कार्यक्रम की समाप्ति के बाद जैसा कि आमतौर पर देवास में होता ही है चित्रकार मुकेश बिजोले, उत्पल बनर्जी, नीलोत्पल, राजेश सक्सेना, बहादुर पटेल, मनीष वैद्य, मेहरबान सिंह के साथ हम जाने माने कथाकार प्रकाशकांत जी के घर पहुँचे। वहां न केवल देवताले जी के संस्मरणों का आत्मीय विनोदपूर्ण दौर चल निकला बल्कि आयोजन की खूबियों, सीमाओं की सुंदर विवेचना भी हुई।

कुल मिलाकर कुछ ज़रूरी सीखों और कुछ नए संकल्पों के साथ अनवरत चलते रहने वाले प्रलेसं के देश व्यापी अनगिन आयोजनो में एक यह आयोजन भी हमारी स्मृति में दर्ज हो गया। घर लौटते हुए मुकेश बिजोले की गाड़ी में चली लगातार गपशप के बीच कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार दुर्गाप्रसाद झाला जी की अनुपस्थिति एवं मुक्तिबोध की पंक्तियाँ भीतर गूँजती रहीं :

'इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए'

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

लेखन के साथ जीवन में भी ज़रूरी है जनपक्षधरता

कविता कार्यशाला,1-2 अक्टूबर 17, प्रलेस-इप्टा अशोकनगर

प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) एवं भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की मध्य प्रदेश में सर्वाधिक सक्रिय इकाइयों में से एक अशोकनगर इकाई ने संयुक्त रूप से विगत 1-2 अक्टूबर को मुक्तिबोध की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दो दिनी कविता कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला में अनेक वरिष्ठ एवं प्रसिद्ध साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों के साथ दर्जनभर से अधिक युवा कवियों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला नितांत अनौपचारिक, आत्मीय माहौल में साहित्यिक-वैचारिक अनुशासन के साथ संपन्न हुई। दो दिन चलनेवाली इस कार्यशाला की रूपरेखा इस प्रकार तैयार की गयी थी कि नये पुराने कवियों-लेखकों-संस्कृतिकर्मियों का न केवल परस्पर परिचय हो, घुलना-मिलना हो बल्कि उनके बीच नि:संकोच वैचारिक आदान-प्रदान एवं संवाद स्थापित हो ताकि नये कवियों की अपने समय की राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ समकालीन रचनात्मक-कलात्मक-साहित्यिक बारीकियों से भी अंतरंगता विकसित हो सके। 

ऐसे समय में जब संवादहीनता, तटस्थता, गैर जवाबदेह स्वायत्तता एवं आत्मकेन्द्रित वैयक्तिकता से निर्मित विचारहीन, अप्रतिबद्ध रचनात्मकता चरम पर है और उसे इसी रूप में व्यवस्था के हित में प्रोत्साहित भी किया जा रहा है ऐसी कार्यशालाओं का महत्व बढ़ जाता है। इस कार्यशाला के दो दिन बड़े सुनियोजित, संबद्ध एवं व्यस्त रहे। भोजनावकाश के अतिरिक्त दोनो दिन देर रात तक सवाल-जवाब एवं बहसों तथा असहमतियों से लबरेज़ रहे। प्रलेस और इप्टा के आयोजनों की यही खासियत उन्हें रचनात्मक एवं ऊर्जावान बनाती है कि यहाँ महमामंडन नहीं होता, श्रद्धाभाव से तर्कों या प्रस्तुतियों को हृदयंगम नहीं किया जाता बल्कि बड़े से बड़े और वरिष्ठ साथी को भी तीखे सवालों एवं कभी-कभी खारिज कर देनावाली कठोर असहमतियों का सामना करना पड़ता है। इन आयोजनों में नये और पुराने लोग बराबर सीखते हैं और ताप एवं तनाव से बराबर गुज़रते हैं।

इस दो दिन की कार्यशाला में कुल 8 सत्र संपन्न हुए। पंकज दीक्षित की कविता पोस्टर प्रदर्शनी लगायी गयी। जनगीत हुए तथा कविताओं (कबीर, पाश एवं उदय प्रकाश) के गायन की प्रस्तुतियों ने कार्यशाला को जीवंत और सोद्देश्य बनाया। किताबों एवं पत्रिकाओं तथा पुस्तिकाओं के स्टॉल भी पाठकों-लेखकों की गहमा गहमी के केन्द्र रहे। इस स्टॉल के प्रमुख आकर्षण रहे- खोजी पत्रकार राना अयूब की बेस्ट सेलर किताब ‘गुजरात फाइल्स’ का हिंदी संस्करण और उदभावना के अंक। नये पुराने कवियों में पंकज चतुर्वेदी, विनीत तिवारी, बसंत त्रिपाठी, समीक्षा, शिल्पी, कविता जड़िया, मानस भारद्वाज, मयंक जैन, अभिषेक अंशु, अरबाज़, शशिभूषण आदि ने काव्य पाठ किये। वैचारिक सत्रों में प्रमुख रहे- ‘मुक्तिबोध का काव्य विवेक और आज का समय’, ‘मुक्तिबोध की रचना प्रक्रिया और उनका आलोचनात्मक संघर्ष’, ‘कविता की पक्षधरता’, ‘इक्कीसवीं सदी की कविता का वैचारिक स्वप्न’ और ‘जनपक्षधर कविता की पहचान और ज़रूरत’। इन सत्रों में क्रमश: पंकज चतुर्वेदी, बसंत त्रिपाठी, विनीत तिवारी और निरंजन श्रोत्रिय ने विचारोत्तेजक एवं बहस तलब आधार वक्तव्य दिये। वक्ताओं में प्रमुख रहे- सत्येंद्र रघुवंशी, डॉ. अर्चना, सुरेंद्र रघुवंशी, पवित्र सलाल पुरिया, कथाकार आशुतोष, शशिभूषण, सत्यभामा और समीक्षा। सवाल एवं संवाद तथा हस्तक्षेप के अंतर्गत न केवल सवाल, जवाब हस्तक्षेप हुए बल्कि अनेक मुद्दों पर गंभीर विमर्श हुए। वक्तव्य से लेकर काव्य पाठ तक सबमें सवाल, असहमति की अन्त: धारा व्याप्त रही।

कविता कार्यशाला के पहले दिन तीन सत्र सम्पन्न हुए। पहले सत्र का विषय था 'मुक्तिबोध का काव्य विवेक और आज का समय।' दूसरे सत्र का विषय था 'मुक्तिबोध की रचना प्रक्रिया और उनका आलोचनात्मक संघर्ष।' आखिरी सत्र में युवा कवियों ने कविता पाठ किये। शुरुआत पंकज दीक्षित द्वारा बनाये कविता पोस्टर की प्रदर्शनी के उदघाटन से हुई। प्रदर्शनी का उद्घाटन कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी, वरिष्ठ साहित्यकार निरंजन श्रोत्रिय एवं चित्रकार मुकेश बिजोले ने किया। इस अवसर पर इप्टा अशोक नगर की सीमा राजोरिया एवं कलाकारों ने जनगीत प्रस्तुत किये।

'मुक्तिबोध का काव्य विवेक और आज का समय।' विषय पर अपने प्रभावी एवं मार्मिक आलोचनात्मक आधार वक्तव्य में चर्चित कवि एवं आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने कहा -शमशेर ने मुक्तिबोध की सबसे प्रामाणिक किंतु संक्षिप्त आलोचना की। मुक्तिबोध ने हिंदी कविता को पूरी तरह बदल दिया। वे सरल कवि हैं। लेकिन उनका सरलीकरण नहीं किया जा सकता। उनका जीवन और साहित्य विवेक एक ही थे। उनमें किसी स्तर पर द्वैत या फांक नहीं थी। उनमें दुचित्तापन नहीं था। निरंतर द्वंद्वात्मकता और गहन आत्माभियोग या आत्मालोचन उनकी खासियत थे। मुक्तिबोध ने अंधेरे के काले समुद्र का प्रतिकार अपनी बेचैनी एवं रचनात्मक अर्थवत्ता से किया। मुक्तिबोध ने फ़ासीवाद के आगमन की आहट नेहरू की मृत्य के समय ही देख ली थी। उनमें नैतिक बोध बहुत गहरा था।

इस सत्र में हस्तक्षेप करते हुए सत्येंद्र रघुवंशी, सुरेंद्र रघुवंशी और डॉ अर्चना ने अपने विचार व्यक्त किये। सत्येंद्र रघुवंशी ने कहा- जीवन विवेक ही साहित्य विवेक है यह मुक्तिबोध अपनी सृजनात्मकता से साबित करते हैं। डॉ अर्चना ने कहा कि मुक्तिबोध बहुत सचेत एवं सजग कवि हैं। वे हमें प्रेरित करते हैं कि हम अपनी नैतिकता को उच्च स्तर पर ले जाएं। तभी मुक्तिबोध को आत्मसात किया जा सकता है। इसी सत्र में हस्तक्षेप करते हुए चर्चित कवि बसंत त्रिपाठी ने मुक्तिबोध के जीवन एवं सृजन से संबंधित कुछ अनसुने प्रसंग सुनाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुक्तिबोध की किताब पर प्रतिबंध केवल पाठ्यक्रम में न लेने के संबंध में लगाया गया था। उन्होंने अपने उपन्यास विपात्र में अपने महाविद्यालय के जिन प्रबंधक को मुख्य पात्र बनाया था उन्हीं को अपनी किताब भी समर्पित की। यह उनके जीवन की स्पष्टता थी कि आलोचना और आत्मीयता का स्थान अलग अलग है। इस स्तर पर उनमें संशय नहीं था।

इस अवसर पर श्रोताओं ने अपने सवाल भी रखे। युवा कवि अरबाज़ के सवाल के जवाब में पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि मुक्तिबोध ने अपने डर पर विजय प्राप्त कर, चुनौतियों का सामना करते हुए ख़ुद्दार, प्रतिबद्ध साहित्यिक क़द हासिल किया। हमें भी वैसी नैतिकता एवं ईमानदारी को अपनाना चाहिए। दूसरे सत्र के वक्ताओं में प्रमुख रहे - पवित्र सलालपुरिया, सत्यभामा और कहानीकार आशुतोष। इस सत्र में आधार वक्तव्य दिया बसंत त्रिपाठी ने। दोनों सत्रों का संचालन कवि एवं रंगकर्मी हरिओम राजोरिया ने किया। 

दूसरे सत्र का विषय था-'मुक्तिबोध की रचना प्रक्रिया और उनका आलोचनात्मक संघर्ष।' इस विषय पर चर्चित कवि बसंत त्रिपाठी ने आधार वक्तव्य दिया। बसंत त्रिपाठी ने मुक्तिबोध की कृति ‘एक साहित्यिक की डायरी’ और ‘कामायनी एक पुनर्विचार’ के हवाले से विस्तार से ‘फैंटेसी’ रचना प्रक्रिया एवं उनके आलोचनात्मक संघर्षों पर प्रकाश डाला। इस सत्र में कथाकार आशुतोष ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि संवेदना मुख्य है। सृजन का संबंध इसी से है। आलोचक की लेखकों से निकटता हमेशा रचनात्मक नहीं होती। आलोचना के लिए रचनाकार से ऑब्जेक्टिव दूरी बड़े काम की होती है। लेखकों से निकटता उनकी आलोचना में बाधक भी होती है। इसी दूरी के चलते राम विलास शर्मा अपने समकालीनों में से एक मुक्तिबोध के स्थान पर निराला एवं प्रेमचंद पर बड़ी आलोचना कृतियाँ रच पाये। जेएनयू की छात्रा सत्यभामा ने कहा कि मुक्तिबोध हमेशा नये ढाँचे की खोज में रहे। उन्हें लोगों की उदासीनता बहुत परेशान करती थी। हमारी लिए बड़ी चुनौती यह है कि हम पुरानी चीज़ों को तो खत्म करते आये लेकिन उन्हें नयी चीज़ों से रिप्लेस नहीं कर पाये। 

तीसरे सत्र के विषय ‘कविता की पक्षधरता’ पर कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने यादगार एवं विस्तृत आधार वक्तव्य दिया। स्पष्टता, वैचारिकता, जनपक्षधरता एवं परिवर्तनकारी रचनात्मक कार्यवाई का आह्वान उनके वक्तव्य की रीढ़ रहे। उन्होंने मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष, द्वंद्व एवं सामाजिक संघर्षों का यथार्थपरक खाका प्रस्तुत किया। विनीत तिवारी ने भूतपूर्व विद्रोही का बयान सहित मुक्तिबोध की दो कविताओं का प्रभावी पाठ किया। उन्होने जोर देकर कहा कि हम असफल इसलिए हैं क्योंकि आधे अधूरे मन से थोड़े विद्रोही हैं। अधिकांश श्रोताओं ने महसूस किया इस वक्तव्य को समग्र रूप में पढ़े-सुने जाने की आवश्यकता रहेगी। यदि वक्तव्य की पुस्तिका भी प्रकाशित हो तो मुक्तिबोध को समझने के लिए महत्वपूर्ण द्वार खुलेगा। वक्तव्य में अकादमिक गुंजलकों से मुक्त एक जनशिक्षक के नज़रिए से दर्ज बयान सर्वाधिक काम के हैं। 

कविता कार्यशाला के दूसरे दिन की शुरुआत भी इप्टा अशोक नगर के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत जनगीत से हुई। इस अवसर पर जेएनयू की छात्रा समीक्षा ने अपनी मधुर आवाज में 'हिरना समझ बुझि बन चरना।' का शास्त्रीय गायन पेश का सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यशाला के दूसरे दिन पहले सत्र का विषय था 'इक्कीसवीं सदी की कविता का वैचारिक स्वप्न।' दूसरे सत्र का विषय था 'जन पक्षधर कविता की पहचान और ज़रूरत।' कार्यशाला के अंतिम सत्र में विनीत तिवारी, सुरेंद्र रघुवंशी, शशिभूषण, मानस भारद्वाज, अरबाज़ और हरिओम राजोरिया ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

'इक्कीसवीं सदी की कविता का वैचारिक स्वप्न।' विषय पर अपने आधार वक्तव्य में चर्चित कवि एवं युवा द्वादश के संपादक निरंजन श्रोत्रिय ने कहा - मुक्तिबोध हमारी नई रचनाशीलता के लिए प्रकाश स्तंभ की तरह है। कल अपने वक्तव्य में विनीत तिवारी ने मुक्तिबोध के जीवन, काव्य विवेक एवं आत्मसंघर्ष को समझने के लिए जैसा अकादमिक, साहित्यिक एवं वैचारिक वक्तव्य दिया उसे हमेशा ध्यान में रखने की ज़रूरत है। उन्होंने आगे कहा यह सुखद है कि युवा कवि अपने विचारों एवं सृजन में सुलझे हुए हैं। वे किसी जल्दी में नहीं हैं। कल जिन कवियों मानस भारद्वाज, कविता जड़िया, अरबाज़, बसंत त्रिपाठी आदि ने कविता पाठ किये उनकी रचनात्मकता आस्वास्तिकारक है। इनकी मंजिल ऊंची हैं। वैचारिकता के स्वप्न से संबद्धता को सबसे प्राथमिक एवं ज़रूरी संलग्नता बताते हुए कवि एवं कहानीकार शशिभूषण ने कहा - यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत को बाक़ायदा विचारहीन बनाया गया है। विचारहीनता ही भ्रष्टाचार की शुरुआत है। यह विचारहीनता भारत के लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक समाजवाद के सपने के लिए रोड़ा है। धर्म सत्ता एवं राज सत्ता से आम जन या लोक के लिए, हक़ एवं बराबरी के लिए विचारपरक कविताएं ही जूझ सकती हैं। हमें हमेशा याद रखना चाहिये मुक्तिबोध की बात कि 'मुक्ति सबके साथ है।' भारत को विचार की ओर फिर से ले चलना रमाशंकर विद्रोही के शब्दों में आसमान में धान बोने के समान है। लेकिन हमें यह करना ही होगा।

तीसरे सत्र 'जन पक्षधर कविता की पहचान और ज़रूरत।' में कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने आधार वक्तव्य दिया। उन्होंने दो कविताओं के पाठ के हवाले से कहा ब्रेख्त और पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब(दस्तूर) हमारे पथप्रदर्शक हो सकते हैं । जनपक्षधरता केवल लेखन में नहीं होती। वैसा जीवन भी जीना पड़ता है। आज के युवा रचनाकारों में वैचारिकता और राजनीतिक संलग्नता की कमी महसूस होती है। यह व्यवस्था एवं दक्षिणपंथी राजनीति की एक सफलता ही है कि वह यथास्थितिवाद बनाये रखने हेतु लोगों को छोटे छोटे कामों में उलझाए हुए है। जबकि हमारा बड़ा स्वप्न लोकतंत्र और समाजवाद है। उसके लिए व्यवस्था परिवर्तन की योजना भी हमें अपनी रचनात्मक तैयारी में शामिल करना चाहिए। इस अवसर पर श्रोताओं ने अपने सवाल भी रखे। जिनका विस्तार से जवाब हरिओम राजोरिया, निरंजन श्रोत्रिय एवं विनीत तिवारी ने दिया। तीनों सत्रों का संचालन हरिओम राजोरिया ने किया एवं आभार माना पंकज दीक्षित ने।

कुल मिलाकर ऐसे समय में जब स्वयं के द्वारा घोषित प्रेमचंद के कथित ध्वज वाहकों ने ही उनके कालजयी एवं विश्व प्रसिद्ध भारतीय उपन्यासों में धरोहर सरीखे गोदान को केन्द्रीय हिंदी संस्थान से बाहर का रास्ता दिखा दिया और कुछ दूसरे कथित महा उत्तराधिकारी-आलोचक-संपादक मुक्तिबोध की वैचारिक पहचान छीनकर उन्हें सरकारी आयोजनो पर निर्भर एवं उनका मोहताज बनाकर व्यापक स्वीकार्य बनाने के बहाने बेदखल करवा देने की अघोषित तैयारी में लगे हैं, लेखक संगठनों एवं अन्य जनपक्षधर संगठनों पर चौतरफा विचारहीन अवसरवादी हमले हो रहे हैं तब व्यक्तिगत प्रयासों, सीमित संसाधनों एवं साहित्यिक-सांस्कृतिक सहकार से आयोजित जन्म शताब्दी वर्ष में मुक्तिबोध को समर्पित यह कविता कार्यशाला केवल प्रतिबद्धता ही नहीं बल्कि अपने साहित्यिक-विचारक पुरखों के काम, सपने को ज़िदा रखने की जिद की तरह याद रखे जाने की आवश्यकता पर बल देती है। प्रतिबद्ध सक्रियता की दृष्टि से ही नहीं विनम्र हस्तक्षेप की दृष्टि से भी अशोकनगर जैसे छोटे शहर में संपन्न प्रलेस एवं इप्टा की इस कविता कार्यशाला को याद किया जायेगा।

-शशिभूषण

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

अभिव्यक्ति के ख़तरे उठा रहे लेखकों ने महसूस की भूखंड की तपन

मध्य प्रदेश प्रलेस का बारहवाँ राज्य सम्मेलन, 16-17 सितंबर, 2017, सतना


यह विस्तृत रिपोर्ट साथी हरनामसिंह चांदवानी, साथी संतोष खरे, सत्यम सत्येन्द्र पाण्डे, सत्येन्द्र रघुवंशी, शिवशंकर मिश्र सरस, भगवान सिंह निरंजन, सारिका श्रीवास्तव, नीरज जैन, आरती आदि के नोट्स की मदद से तैयार की गई है - विनीत तिवारी


( अगर सब ठीक चल रहा हो तो कविता-कहानी लिखने वालों की चर्चा के विषय- लेखन में भावपक्ष कैसा हुआ, यथार्थ का परावर्तन कितना हुआ, लेखक की कल्पनाशीलता ने कहाँ तक उड़ान भरी, कौन से नये शिल्प को हासिल किया, शैली में क्या नयापन है, कहाँ तक परंपरा का असर लेखन पर है और कहाँ लेखक, परंपरा से मुठभेड़ कर नई ज़मीन तोड़ रहा है ? आदि में हर्ज़ नहीं। लेकिन जब देश-दुनिया पर, इंसानियत पर संकट के बादल छाए हों तब कला की बारीकियों के सवालों में उलझे रहना और अपने यथार्थ को बदलने की कोशिश न करना बुरा नहीं, बहुत बुरा है। प्रेमचंद ने कहा था- ‘हमें यानी प्रगतिशील लेखक संघ को साहित्य का सौंदर्यशास्त्र (हुस्न का मेयार) बदलना है।‘ हमारे लेखकों ने सिर्फ़ साहित्य के ही नहीं, जीवन के सौंदर्यशास्त्र को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई और जीवन-मूल्यों को भी बेहतर, अधिक मानवीय बनाने के प्रयास किये। सच कहना, लिखना, दिखाना कभी भी बिना खतरे उठाये नहीं हुआ। बेशक मध्यवर्गीय भीरुता ने भी चोर दरवाज़े से घुसपैठ की है लेकिन हमारे ऐसे लेखकों की तादाद भी कम नहीं रही जिन्होंने ख़तरे उठाये। यहाँ तक कि उनके लेखन के असर से डरकर कायरों और झूठों ने उनकी जान भी ले ली।


गौरी लंकेश का क़त्ल हुए ज़्यादा समय नहीं बीता है। गौरी की हत्या ने पूरे देश में अमन और इंसाफ़पसंद लोगों को हिला दिया है। दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्याओं के बाद गौरी लंकेश की हत्या से इस तरह की वहशियाना हरक़त के प्रति पूरे समाज में रोष फैला है। इस बात से ग़ुस्सा और भी बढ़ जाता है जब सत्ता में बैठे लोग उन्हें संरक्षण देते हैं जो इन हत्याओं का मखौल बनाना चाहते हैं और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए शहीद हुए लोगों पर मौत के बाद भी गाली गलौच का कीचड़ उछालते हैं। उस गु़स्से का तापमान प्रगतिशील लेखक संघ के मध्य प्रदेश राज्य सम्मेलन में भी महसूस किया गया। 

पहले से ही तय था कि यह सम्मेलन मुक्तिबोध की जन्मशती के उपलक्ष्य में उन्हें समर्पित किया जाएगा। मुक्तिबोध का नाम आते ही सबसे पहले ही जो पंक्तियाँ नारों की तरह दिमाग में कौंधती हैं, वो हैं- ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?’ और ‘अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।’ इन दोनों पंक्तियों में से पहली पंक्ति तो अपने आप पर, अपने ही साथियों पर सवाल करती है ताकि अपनी पक्षधरता में स्पष्टता रहे, और दूसरी पंक्ति अपना संकल्प बताती है, ख़तरों की आशंकाओं के यथार्थ को मूर्त करती हुई।

मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ का 11वाँ राज्य सम्मेलन 2012 में सागर में हुआ था। उसके पश्चात देश के बदले राजनीतिक परिदृष्य में तेजी से जनता के पक्ष में सोचने, लिखने, पढ़ने या कला के किसी और माध्यम में अपने आपको अभिव्यक्त करने वालों पर हमले हुए। उन्हें प्रताड़ित पहले भी किया जाता रहा था। लेकिन इस दफ़ा उन्हें जान से ही मार डाला गया। इसी बेचैनी के बीच विंध्य क्षेत्र के सतना में 12वें राज्य सम्मेलन (16-17 सितम्बर 17) में प्रदेश के 26 जिलों से एकत्र हुए प्रलेस के प्रतिनिधि कलमकारों ने और अन्य लेखकों ने एकताबद्ध होकर कहा कि ‘‘ज़ुल्म के खि़लाफ़ हम मिलकर लड़ेंगे साथी।’’

हाल ही में दिवंगत हुए प्रलेस संरक्षक मंडल के प्रमुख सदस्य श्री चन्द्रकांत देवताले के नाम पर बनाए गए सभागार में लगातार दो दिनों तक विभिन्न विषयों पर वरिष्ठ लेखकों, प्रलेस प्रतिनिधियों ने विचार विमर्श कर राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय विषयों पर प्रस्ताव पारित कर अपनी मंशा जाहिर कर दी कि उभरते फासिज्म के खिलाफ लेखक, पत्रकार, स्वतंत्रचेता झुकने को तैयार नहीं हैं। मुक्तिबोध जन्म शताब्दी को समर्पित 12वाँ राज्य सम्मेलन चन्द्रकांत देवताले की लंबी कविता के शीर्षक ‘‘भूखण्ड तप रहा है’’ के सूत्र वाक्य पर आधारित था। इसी तपिश को सम्मेलन में भली भाँति महसूस किया गया। 



16 सितम्बर को अधिवेशन का शुभारंभ वरिष्ठ लेखक-आलोचक श्री विश्वनाथ त्रिपाठी (दिल्ली) ने किया। उन्होंने अधिवेशन स्थल पर प्रदेश के रचनाकारों, कलाकारों द्वारा प्रदर्शित कृतियों का अवलोकन किया। अधिवेशन सभागार की दीवारों पर टंगे कविता पोस्टर देश के वर्तमान हालात दर्शा रहे थे। बस्ती (उ. प्र.) से आये छायाकार शाहआलम ने छायाचित्रों के माध्यम से चंबल के बीहड़ों में निवासरत ग़रीबों किसानों की दशा-दिशा पर दर्शकों का ध्यान आकृष्ट किया। उज्जैन के चित्रकार मुकेश बिजौले, अशोकनगर के पंकज दीक्षित, इंदौर के अशोक दुबे, रीवा के के. सुधीर के कविता पोस्टरों और शिल्पज्ञ-चित्रकार प्रोफेसर प्रणय की शिल्पकला को भरपूर सराहना मिली। इन्हीं के साथ किताबों की प्रदर्शनी और विक्रय के स्टॉल पर भी सभी लेखक प्रतिनिधि दिलचस्पी लेकर साहित्य से लेकर लेनिन, क्लारा जेटकिन आदि वाम सिद्धांतकारों की पुस्तकें देखते, पढ़ते और खरीदते रहे। चंद्रकांत देवताले सभागृह में हर तरह से कला की सभी विधाओं से प्रगतिशील संस्कृति का शानदार माहौल बना लिया गया था। 


सम्मेलन की शुरुआत में अशोकनगर इप्टा ने जनगीत प्रस्तुत किए। स्वागत भाषण देते हुए प्रलेस सतना इकाई के अध्यक्ष श्री संतोष खरे ने आपातकाल के दौरान 41 वर्ष पूर्व 1976 में हुए प्रलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन को याद करते हुए कहा कि तब घोषित आपातकाल था और आज अघोषित आपातकाल है। आज फिर लेखकों के सामने अभिव्यक्ति का संकट मुँह बाये खड़ा है। आपने सत्ता की आलोचना की नहीं कि आप देशद्रोही करार दिये जा सकते है। सरकार को ही देश मानने पर मजबूर किया जा रहा है। ऐसे में प्रलेस फिर दमन के खिलाफ मोर्चा लेगा।

उद्घाटन वक्तव्य देते हुए श्री विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि वर्ष 1976 में सतना में ही आपातकाल के दौरान प्रलेस का अधिवेशन हुआ था। उस आपातकाल को तो उठा लिया गया। वर्तमान में अघोषित अपातकाल को कौन हटाएगा? साम्प्रदायिकता अपने विकृत चेहरे को ढंककर संस्कृति की खाल ओढ़कर आती है। मनुष्य विरोधी हर काम के खिलाफ जो भी हैं, हम उनके साथ हैं। उन्होंने कहा कि जो इस भारत को को तोड़कर एक जैसा बनाना चाहते हैं, वे समझ लें कि यहाँ जीवन में इतना सदभाव घुला मिला है कि वे उसे हमेशा के लिए तोड़ नहीं सकते। जो ताक़तें भारत को सिर्फ़ हिंदुओं का देश बनाना चाहती हैं, वे समझ लें कि वे भी चैन से नहीं रह पाएँगी। उन्होंने ‘एकता’ और ‘एकजैसेपन’ यानी ‘यूनिटी’ और ‘यूनिफॉर्मिटी’ के फ़र्क़ को समझने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध को याद करने का अर्थ ही यह है कि हम देश में संस्कृति का लबादा ओढ़े चले आ रहे फ़रेबियों और हत्यारों के ख़िलाफ़ लामबंद हों। वे लोग न केवल हत्या की संस्कृति फैला रहे हैं बल्कि जिस महिला को उसके विचारों की वजह से मारा गया, उस गौरी लंकेश को अपशब्द भी कहे जा रहे हैं। और उससे भी ज़्यादा शर्म की बात यह है कि ख़ुद प्रधानमंत्री उसके ट्विटर पर फॉलोअर हैं। जनता सब देख रही है। निश्चित है कि वो इसका जवाब देगी। 

श्रोताओं में प्रलेस के वरिष्ठ संरक्षक मंडल सदस्य जो बारहवें राज्य सम्मेलन के संरक्षक भी थे और जो विंध्य क्षेत्र के लोकप्रिय प्रगतिशील लेखक रहे हैं, श्री देवीशरण ग्रामीण भी अपनी अस्वस्थता और आयु के बाद भी नागौद से सतना आये थे और अगली कतार में ही बैठे थे। उनसे मंच पर चढ़ते न बना तो विश्वनाथ जी ख़ुद नीचे उतरकर उनसे गले मिलने चले गए। न केवल देवीशरण ग्रामीण जी की आँखें ख़ुशी से भीगी थीं बल्कि सभागृह में मौजूद सभी लोगों की आँखों में अपने दो बुजुर्ग लेखकों का परस्पर सम्मान, प्यार और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता देखकर गीलापन था। ख़ुद विश्वनाथ जी 88 वर्ष की आयु में जबलपुर से सतना तक का सड़क से सफ़र करके आये थे और कह रहे थे कि प्रलेस के साथियों से मिलकर मेरा जीवन रस बढ़ जाता है, इसलिए मैं तो अपने स्वार्थ से आया हूँ। 

जनवादी लेखक संघ के प्रदेश महासचिव श्री मनोज कुलकर्णी ने लेखकों की एकजुटता पर जोर देते हुए कहा कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर फासिज़्म हमारे सामने है। ग़रीबों और अमीरों के बीच खाई बढ़ती जा रही है। देश के सभी आर्थिक संसाधनों पर एक प्रतिशत से भी कम औद्योगिक घरानों का कब्ज़ा हो गया है। जनता की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए सत्ता द्वारा साम्प्रदायिक विद्वेष को बढ़ावा दिया जा रहा है। धार्मिक बहुसंख्यकवाद के नाम पर अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों को प्रताड़ित किया जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी और निजता का अधिकार छीना जा रहा है। जन संस्कृति मंच के महासचिव श्री प्रेम शंकर ने कहा- अब वही जीवित रह पाएगा जो सत्ता के झूठ को स्वीकारेगा। लेखक संगठन अपने अतीत के मतभेदों को स्थगित रखकर एकजुट हों। आज देश में विराट सांस्कृतिक मोर्चा बनाने की जरूरत है। प्रलेस के प्रांतीय अध्यक्ष श्री राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य पुनः निशाने पर है। हिन्दी साहित्य संस्थान से गोदान को हटा दिया गया है। दक्षिणपंथी प्रेमचंद से डरते हैं। 

अंत में सागर सम्मेलन के बाद से प्रलेस, मध्य प्रदेश के दिवंगत हुए साथी लेखकों सर्वश्री श्यामसुंदर मिश्र (जबलपुर), श्री महेंद्र वाजपेयी (जबलपुर), सुश्री नुसरत बानो रूही (भोपाल), श्री गोविंदसिंह असिवाल (भोपाल), श्री प्रेमशंकर रघुवंशी (हरदा), श्री के. के. श्रीवास्तव (दमोह), श्री गेंदालाल सिंघई (अशोकनगर), श्री गिरधर शर्मा (गुना) और श्री चंद्रकान्त देवताले (इंदौर) को श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया।

उद्घाटन सत्र के बाद प्रलेस महासचिव श्री विनीत तिवारी ने अपने वक्तव्य में सागर सम्मेलन के बाद से अब तक के प्रमुख कार्यों की सूची प्रस्तुत की और मध्य प्रदेश प्रलेस द्वारा 11 लेखकों के प्रतिनिधिमंडल की शहीद लेखकों डॉ. नरेंद्र दाभोलकर, कॉमरेड गोविंद पानसरे और प्रोफ़ेसर एम. एम. कलबुर्गी के गृहनगरों की ओर इन लेखकों के परिजनों से मिलने और एकजुटता ज़ाहिर करने के मक़सद से की गई यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने प्रदेश में लगाये गए प्रदेश स्तरीय कविता, कहानी और विचार शिविरों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने ये भी कहा कि आज बेशक हम पहले से ज़्यादा भी हैं और पहले से अधिक सक्रिय भी, लेकिन फ़ासीवाद की चुनौती का सामना करने के लिए हमें और अधिक सक्रियता की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि यदि आज स्वतंत्र विचारों की रक्षा नहीं की गई तो देश में उदारवादी चेहरों का अकाल पड़ जाएगा। उन्होने प्रलेस सचिव मंडल सदस्य श्री बाबूलाल दाहिया द्वारा किसानों की हत्या के विरोध में प्रदेश सरकार के पुरस्कार को ठुकराकर प्रतिरोध की परंपरा को आगे बढ़ाने की सराहना की, साथ ही अपने सचिव मंडल, कार्यकारी दल और विशेष रूप से संगठन को आगे बढ़ाने में सुश्री सुसंस्कृति परिहार, सुश्री सारिका श्रीवास्तव और सुश्री आरती के प्रयासों को रेखांकित किया। श्री तिवारी ने कहा कि सत्ता के संरक्षण के कारण ही कलबुर्गी, दाभोलकर, पानसरे के हत्यारों को अब तक नहीं पकड़ा जा सका और अब गौरी लंकेश के क़त्ल को भी पारिवारिक मामला या नक्सलवादियों का नाम लेकर भरमाया जा रहा है। उन्होंने वर्ष 2015 में विश्व हिन्दी सम्मेलन में लेखकों की उपेक्षा और केन्द्रीय मंत्री की अपमानजनक टिप्पणी और व्यापम घोटाले का भी उल्लेख किया। अपने वक्तव्य में श्री विनीत तिवारी ने सरदार सरोवर बाँध के विस्थापितों के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए उनके आंदोलन का समर्थन किया। इसका महत्त्व इसलिए भी था कि अगले ही दिन यानि 17 सितंबर को मोदी अपने जन्मदिन पर सरदार सरोवर बाँध का पूर्ण कहकर उद्घाटन करने वाले थे जबकि 40 हज़ार परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे का निपटारा अभी तक बाक़ी है। लोगों को डुबोने, किसानों को आत्महत्याओं के लिए मजबूर करने और फिर जनता के सारे असंतोष की दिशा एक दूसरे पीड़ित समूहों की ओर मोड़ने और उन्हें आपस में लड़वाने का फ़ासीवाद का तरीक़ा नया नहीं है लेकिन लेखकों को इसे फिर से लोगों के सामने उजागर करना होगा। उन्होंने अपने वक्तव्य की समाप्ति में कहा कि ‘लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है।’


दोपहर बाद विचार सत्र में मुक्तिबोध के संदर्भ में ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ विषय पर साहित्य एवं राजनीति के अंतर्संबंधों को टटोला गया। सत्र की शुरुआत में दमोह की साथी सुश्री सुसम्मति परिहार ने मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ कविता का अंश ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन, ओ मेरे सिद्धांतवादी मन’ गाकर प्रस्तुत किया। प्रमुख वक्ता प्रो. गार्गी चक्रवर्ती (दिल्ली) ने कहा कि आपातकाल में राज्य के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों पर कार्यवाही होती थी। अब आम जनता को निशाना बनाया जा रहा है। जब सावरकर ने हिंदू राष्ट्र की कल्पना की थी तो रबींन्द्रनाथ ठाकुर ने उसका विरोध किया था। सांप्रदायिकता के प्रवेश के कारण ही रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1905 के बंग-भंग आंदोलन से दूरी बना ली थी। उनका उपन्यास ‘गोरा’ एक तरह से इसी पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है। दक्षिणपंथी लोग आज भी रबीन्द्रनाथ ठाकुर को मौका मिलते ही पाठ्यक्रमों से बाहर करना चाहते हैं। जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई से अपने आपको दूर रखा और अंग्रेजों की चाटुकारिता की, उन्होंने ही गाँधीजी को मारा, रबीन्द्रनाथ ठाकुर को बदनाम करने की कोशिश की और आज फिर हिंदू राष्ट्रवाद को हथियार बनाकर लोगों के हक़ की आवाज़ उठाने वालों या सच्चाई बताने वालों का क़त्लेआम कर रहे हैं। हम भारतीय राष्ट्रवादी हैं, हिन्दू राष्ट्रवादी नहीं। साम्प्रदायिक विचारधारा अब फ़ासीवाद की शक्ल लेती जा रही है। फ़ासीवाद के खिलाफ ही प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ था। उसके खिलाफ लड़ना आज भी ज़रूरी है। 

अलीगढ़ से आये वेदप्रकाश ने कहा कि मध्यवर्ग बदल रहा है। सत्ता का भय कायम है। लोग झुकने के लिए तैयार बैठे हैं। चारों ओर चापलूसी का माहौल है। आम आदमी के मन में राजनीति का गंदा चेहरा स्थापित कर दिया गया है। इस सबमें शिक्षण संस्थानों और मीडिया की भूमिका भी बहुत ही नकारात्मक है। हमें हमारी प्रगतिशील विरासत को आज के संदर्भों से जोड़कर लोगों के समक्ष ले जाने की ज़रूरत है। छत्तीसगढ़ से आये वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे ने कहा कि हर व्यक्ति की पक्षधरता होती है। मनुष्य विरोधी कार्यों के ख़िलाफ़ लड़ने वालों के साथ हम खड़े हैं। अध्यक्ष मंडल सदस्य वरिष्ठ कहानीकार-उपन्यासकार श्री रमाकांत श्रीवास्तव ने कहा कि सत्य पर कोड़े बरसाये जा रहे हैं और अधिकांश बुद्धिजीवी खामोश हैं, जबकि सच के साथ खड़ा होना लेखकों का दायित्व है। उन्होंने परसाई को उद्धृत करते हुए कहा कि जब एक व्यक्ति दूसरे को मार रहा हो तो आप दोनों के प्रति समान भाव नहीं रख सकते। आपको पक्ष लेना होता है। उसी चयन से हमारी पॉलिटिक्स तय होती है। अध्यक्ष मंडल सदस्य वरिष्ठ कहानीकार-उपन्यासकार श्री सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि हमारे राम-राम को बड़ी धूर्तता से षड्यंत्र करके आरएसएस-भाजपा ने जय श्रीराम में बदल दिया है। हमें लोंगों को यह समझाना ज़रूरी है कि हमारे राम गाँधी के राम थे, न कि जिनके नाम पर मंदिर-मस्ज़िद के फ़साद खड़े करके क़त्लेआम और नफ़रत फैलायी जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं कटनी इकाई के अध्यक्ष श्री नंदलाल सिंह ने कहा कि संगठन के सभी सदस्यों को वैचारिक रूप से प्रखर बनाने की ज़रूरत है ताकि हम राजनीति के आगे चलने वाली मशाल की वो भूमिका निभा सकें जो प्रेमचंद ने हमारे लिए निर्धारित की थी। शहडोल के वरिष्ठ साथी श्री सुरेश शर्मा ने कहा कि ये जानते हुए भी कि हमारी लड़ाई लंबी है और हम इसे लड़ते जाएँगे, लड़ने के तरीकों में कुछ बदलाव लाने की दिशा में हमें सोचना चाहिए। इस सत्र का संचालन सचिव मंडल सदस्य श्री तरुण गुहा नियोगी ने किया। 

शाम को एक विशाल रैली निकाली गई जो अस्पताल चौक से प्रारंभ होकर नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई आयोजन स्थल तक पहुँची। रैली में लेखकों ने शहीद लेखकों, पत्रकारों के हत्यारों को गिरफ़्तार करने की माँग करते हुए जनगीत गाये और लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की एकता, अमन, इंसाफ़, इंसानियत, मोहब्बत और इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे लगाये। हरिशंकर परसाई, बलराज साहनी, भीष्म साहनी, हबीब तनवीर, सज्जाद ज़हीर, प्रेमचंद, ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, इस्मत चुगताई आदि लेखकों की तस्वीरों के साथ रैली में दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश के लिए इंसाफ़ माँगने वाले और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा हेतु जनता से अपील करने वाले पोस्टर भी थे। 

सांस्कृतिक रैली के वापस आने के बाद फिर सत्र शुरू हुआ। शुरुआत में सीधी से आये इंद्रावती नाट्य समिति के कलाकारों ने बघेली के लोकगायन का प्रसिद्ध आशु कविता रूप टप्पा गायन प्रस्तुत किया। ट्रेन के 12 घंटे लेट हो जाने की वजह से विशिष्ट अतिथि, प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव श्री राजेन्द्र राजन (बेगुसराय) और प्रलेस के बिहार प्रांत के प्रांतीय महासचिव प्रो. रवीन्द्र नाथ राय (आरा) शाम होते-होते सतना पहुँच सके थे और सीधे ही सत्र में शामिल हो गए। श्री राजेन्द्र राजन ने मध्य प्रदेश प्रलेस के लेखक साथियों को अपना क्रांतिकारी अभिवादन पेश करते हुए मुक्तिबोध का स्मरण करते हुए संक्षेप में फ़ासीवाद के आसन्न संकट के दौर में लेखक संगठन की भूमिका पर अपनी बात रखी। उन्होंने 28-29 अक्टूबर को चंडीगढ़ में होने जा रहे लेखकों के फ़ासीवाद विरोधी राष्ट्रीय सम्मेलन की रूपरेखा भी रखी और मुक्तिबोध के अवदान को याद किया। प्रो. रवीन्द्रनाथ राय ने भी मध्य प्रदेश के सम्मेलन को अपनी शुभकामनाएँ देने के साथ ही नवउदारवाद के दौर में सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। अध्यक्ष मंडल सदस्य और वरिष्ठ कवि श्री कुमार अंबुज (भोपाल) ने इस सत्र में कहा कि जिसे आज नवउदारवाद की संज्ञा दी जा रही है, वह दरअसल नवसंकीर्णतावाद है। हमारे लेखकों को आज प्रतिबद्धता के साथ अपने लेखन के मोर्चे पर तो जुटना ही चाहिए, साथ ही हमारी मौजूदगी के बारे में सहज सांगठनिक विवेक का भी इस्तेमाल करना चाहिए। अगर हम आज ढुलमुल नीति अपनाएँगे तो हमारा आंदोलन कमज़ोर होगा, ख़ुद हमारी पहचान विश्वसनीय नहीं रह जाएगी। 


रात में 9 बजे से कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें प्रदेश के कोने-कोने से आये अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। कवि गोष्ठी रात 1 बजे तक चली जिसका संचालन किया श्री टीकाराम त्रिपाठी (सागर) ने और अध्यक्षता की श्री महेश कटारे ‘सुगम’ (बीना) ने। सर्वश्री शैलेन्द्र शैली, महेंद्र सिंह, रामयश बागरी, बाबूलाल दाहिया, आज़ादवतन वर्मा, श्रीमती उर्मिला सिंह, वृंदावनराम ‘सरल’, गिरीश पटेल, पी. आर. मलैया, सुश्री मीना सिंह, मिथिलेश राम, दीपक अंबुद, केशरीसिंह चिड़ार, वीरेन्द्र प्रधान, हरिनारायण, प्रेमप्रकाश चौबे, यासीन ख़ान, आदि विभिन्न शहरों से आये 27 कवियों ने कविता पाठ किया। 

अधिवेशन के दूसरे दिन की शुरुआत ‘हाशिये का समाज और साहित्य की जिम्मेदारी’ विषय पर परिचर्चा से हुई। सत्र के पूर्व गुना-अशोकनगर से आईं प्रलेस और इप्टा की सदस्या लेखिका व संगीतकार सुश्री रामदुलारी शर्मा ने और अनूपपुर की रचनाकार साथी सुश्री मीना सिंह ने भी जनगीत गाये।

आधार वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार व चिंतक श्री रामनारायण सिंह राना, सतना ने कहा कि सामाजिक न्याय से वंचित समाज के बारे में अभी भी बहुत लिखा जाना बाक़ी है। वर्तमान साहित्य के बिम्ब संपन्न समाज के हैं। साहित्य की मुख्यधारा में ऊँची जातियों के लेखकों का दबदबा है। प्रलेस राष्ट्रीय महासचिव श्री राजेंद्र राजन ने कहा कि शोषण के ख़िलाफ़ लिखने वाला ही सच्चा लेखक है। शोषण से मुक्ति टुकड़ों में नहीं मिलती। रचनाकार अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकते। देश में साम्प्रदायिकता, शोषण व ग़रीबी के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने का समय है यह। लेखक के भीतर वैज्ञानिक चेतना हो तो बाकी विषय मायने नहीं रखते। चूँकि प्रलेस का जन्म ही फासीवाद से संघर्ष की पृष्ठभूमि में हुआ इसलिए अन्य सांस्कृतिक संगठनों की तुलना में फासिज़्म से लड़ने की हमारी ज़िम्मेदारी है। लड़ें या घुटने टेकें ? हम घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं हैं। भारत माता को राष्ट्र भक्ति का पैमाना बना दिया गया है। ताक़तवर बाज़ार विवेक को समाप्त कर रहा है। फासिज़्म अब पुराने तरीके से सामने नहीं आएगा। भारत में साम्प्रदायिक्ता के खोल में फ़ासीवाद का चेहरा सामने है। 

अध्यक्ष मंडल सदस्य श्री सेवाराम त्रिपाठी, रीवा ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य में वंचित वर्ग को स्थान दिया है। हाशिये का समाज भी कई वर्गों में बँटा है। श्री महेंद्र सिंह ने कहा कि हाशिये का समाज सदैव ज्ञान से वंचित रहा है। यहाँ तक कि प्रगतिशील लेखकों के भीतर भी अनेक के भीतर जातीय, लैंगिक अथवा धार्मिक भेदभाव के लक्षण हैं। हम लेखकों को लेखन व आचरण में समानता लानी होगी। देश की एक प्रतिशत आबादी के पास 53 प्रतिशत पूँजी है। यह आर्थिक खाई सामाजिक असमानता भी लाती है। आर्थिक मुद्दों पर तो फिर भी कुछ न कुछ होता है लेकिन सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन अब देश में नहीं होते। इस दिशा में प्रलेस को कुछ ठोस करने की आवष्यकता है। सुश्री आरती, भोपाल ने कहा कि नवउदारवाद और पूँजीवाद ने हाशिये के नए समाज बनाए हैं। वंचित वर्ग भी नई अर्थनीतियों का शिकार है। सम्पत्ति पर उत्तराधिकार जैसी कई समस्याएँ आज भी बनी हुई हैं। सुश्री सुसंस्कृति परिहार, दमोह के अनुसार वंचित वर्ग के मार्गदर्शन के लिए प्रलेस का गठन हुआ। किसानों-आदिवासियों के बारे में न केवल लिखा जाना चाहिए अपितु उनके साथ उनके आंदोलनों का हिस्सा भी बनने की ज़रूरत है।

सचिव मंडल सदस्य श्री शैलेंद्र शैली, भोपाल ने कहा कि दलित चेतना का वर्गीय चेतना में रूपान्तरण जरूरी है। सुश्री सारिका श्रीवास्तव, इंदौर के अनुसार आज के दौर में लेखक सिर्फ़ लिखकर ही इतिश्री नहीं कर सकता। उसे अन्य मुद्दों पर भी समाज में अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी। हाशिये के समाज के बारे में उन्होंने कहा कि मर्द और औरत के अलावा समाज में तीसरे लिंग की चर्चा नहीं होती जबकि वे भी मनुष्य ही हैं। उन्होंने महिला लेखिकाओं, लालदेई, डॉ. रशीद जहाँ, नुसरत बानो रूही आदि के लेखकीय अवदान को याद रखने की प्रलेस से अपेक्षा की। श्री फूलचंद बसोर, रीवा ने कहा कि यह भी एक विडंबना है कि हाशिये के बाहर समाज के बारे में गैर दलितों ने अधिक लिखा है और खुद हाशिये के समाज के लोग मौका मिलते ही मुख्यधारा का हिस्सा बन जाना चाहते हैं। श्री रामआसरे पाण्डे, इंदौर ने चुनाव प्रणाली में बदलाव की माँग को रेखांकित करते हुए कहा कि वामपंथ के पास भविष्य का स्वप्न तो है लेकिन उसे हासिल कैसे करना है, उसका कोई कार्यक्रम (प्रोग्राम) नहीं है। सचिव मंडल सदस्य श्री अभय नेमा, इंदौर ने सचेत किया कि हमें प्रायोजित नफ़रत से बचना चाहिए जो इस नये माध्यम सोशल मीडिया द्वारा फैलाई जा रही है। तोड़े-मरोड़े गए थोड़े से सच में भरपूर झूठ मिलाकर लोगों को भरमाया और एक दूसरे के ख़िलाफ़ भड़काया जा रहा है। प्रलेस इस बारे में भी कुछ करे तो अच्छा होगा। श्री सोमेश्वर सोम, सीधी ने कहा कि किसान हर जगह मर रहा है पर साहित्य में उसे स्थान नहीं मिल रहा है। लेखकों के बीच जाति की चर्चा उन्हें बाँटने की साजिश है। हमारा ऐतिहासिक दायित्व पूँजीवाद को ख़त्म करना है। वर्गीय चेतना ही हमारा अस्त्र है। 


पवित्र सलालपुरिया, गुना के अनुसार सोच जाति आधारित नही वर्ग आधारित होना चाहिये। अनिल कुमार सिंह ने कहा कि साहित्य दो अतिवादी विचारो के बीच जी रहा है। मंदसौर के साथी श्री हरनामसिंह ने पठनीयता के संकट पर ध्यान आकृष्ट करवाते हुए साहित्य के संप्रेषण में नई तकनीक के उपयोग पर जोर दिया। इस सत्र में आर. बी सिंह, गणेश कानड़े, खंडवा, नीरज जैन, दतिया, डॉ. विद्याप्रकाश, रीवा ने भी अपने विचार रखे। सत्र का समापन करते हुए महासचिव विनीत तिवारी ने कहा कि लेखक केवल वही नहीं है जो कविताएँ, कहानियाँ लिख रहे हैं। इतिहास, अर्थशास्त्र या अन्य किसी भी विषय में लेखन करने वाले, यहाँ तक कि पत्रकार, ब्लॉगर भी लेखकों की बिरादरी का हिस्सा हैं। हमें इस भावना से बाहर आना चाहिए कि कविता-कहानी लिखने वाला ही लेखक होता है। मारे गए चारों शहीद अपने लिखने-पढ़ने और अपने विचारों को निडरता से व्यक्त करने के लिए ही मारे गए। वे जो लिखते थे, मुक्तिबोध की पंक्ति ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब’ को चरितार्थ करते थे। उनका लिखा शोषकों के चैन में खलल डालने में कामयाब रहा तो उन्हें बेशक बड़ा लेखक मानना ही चाहिए। दूसरी बात यह कि लेखन के खाने बनाना दलित लेखन, महिला लेखन वगैरह ग़लत है। न तो एक लेखक सिर्फ़ इतना लिखना चाहता है जो उसकी जाति या समूह से जुड़ा हुआ हो और न ही पाठक ये अपेक्षा करता है। प्रलेस के अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद या प्रलेस के घोषणापत्र में वंचित और शोषित समुदायों के साथ जुड़ने, अपने लेखन के माध्यम से उनके जीवन के दुःखों और खुशियों को दर्ज करने की बात की गई है, चाहे वे दलित हों, अल्पसंख्यक हों या लैंगिक, भाषिक या क्षेत्रीय आधार पर हाशिये पर हों। सागर सम्मेलन में ही हमने महत्त्वपूर्ण आदिवासी लेखक श्री वाहरू सोनवणे को अपना मुख्य अतिथि बनाया था। किसी ने बात की थी वामपंथ के पास कार्यक्रम की कमी की। प्रलेस के पास कार्यक्रम है। और वो कार्यक्रम है एक शोषणमुक्त समाज की, समाजवादी समाज व्यवस्था की रचना करने में अपना भरसक योगदान देना। इसी लक्ष्य को पाने के लिए यह ज़रूरी है कि हम हाशिये के समुदायों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ करें, बिना यह भूले कि आख़िरकार जातीय, क्षेत्रीय, भाषायी, लैंगिक और सांप्रदायिक भेदभाव पैदा ही इसलिए किए जाते हैं कि मुट्ठीभर तबक़े का सारे संसाधनों पर क़ब्ज़ा रहे। इसलिए आर्थिक आधार पर वर्गीय संरचना को तो बदलना ही होगा लेकिन उतना काफ़ी भी नहीं और बदलने के लिए जो ताक़त चाहिए, वो भी हाशिये पर मौजूद संख्या में बहुत सारे लोगों के एकीकृत संघर्ष में जुड़ाव से ही हासिल होगी। 


दोनों दिन इन खुले सत्रों में अनेक स्थानीय और आसपास के रचनाकारों की भी भागीदारी रही। इस अवसर पर दोनों दिन अनेक लेखकों की पुस्तकों का विमोचन भी हुआ। इनमें श्री देवीशरण ग्रामीण की पुस्तक के साथ ही श्री शिवकुमार ‘अर्चन’ ,भोपाल की पुस्तक ‘ऐसा भी होता है’, श्री बाबूलाल दाहिया, सतना की बघेली पुस्तक ‘पसीना हमारे बद है’, श्री सरोज सिंह परिहार की ‘सूरज के गाँव में’, श्री संतोष खरे, सतना की किताब ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’, श्री कैलाश चन्द्र, रीवा की चार पुस्तकों ‘पतनगाथा’ (उपन्यास), ‘नाम में क्या रखा है’ (उपन्यास), ‘मोहनदास’(उदय प्रकाश) नाट्य रूपांतर और ‘चौराहे’ (नाटक), श्री जाहिद खान (शिवपुरी) की पुस्तक ‘फैसले जो नज़ीर बन गए’ और सुरेश शर्मा, शहडोल की पुस्तक ‘राजनीतिक संकट के विभिन्न आयाम’ का विमोचन सम्मेलन में आये अतिथियों एवं वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा किया गया। सभी प्रतिनिधियों को प्रातिनिधिक सामग्री में गार्गी चक्रवर्ती लिखित पी. सी. जोशी की जीवनी, सारिका द्वारा तैयार किये गए प्रगतिशील लेखकों के छोटे-छोटे पद्यांश या गद्यांश पर बुकमार्क जैसे पोस्टर्स एवं अन्य सामग्री भी दी गई। सारिका द्वारा तैयार किये गए पोस्टर्स का भी विमोचन किया गया। 

दूसरे दिन भोजनोपरांत सांगठनिक सत्र के पहले शिवकुमार ‘अर्चन’ ने तरन्नुम में उम्दा नज़्म सुनाई और इप्टा अशोकनगर के साथियों ने कबीर के पद और जनगीत सुनाये। सांगठनिक सत्र में सर्वसम्मति से नई कार्यकारिणी चुनी गई। श्री राजेन्द्र शर्मा को पुनः अध्यक्ष पद हेतु चुना गया जबकि महासचिव पद की ज़िम्मेदारी सचिव मंडल के वरिष्ठ सदस्य श्री शैलेन्द्र शैली को दी गई। अब विनीत तिवारी राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्य हैं और उन्हें प्रांतीय अध्यक्ष मंडल में भी शामिल किया गया है। संरक्षक मंडल में 9 वरिष्ठ साहित्यकार रखे गए और अध्यक्ष मंडल में 15 साहित्यकारों को रखा गया। सचिव मंडल 14 साहित्यकारों को लेकर गठित किया गया। पहली बार मध्य प्रदेश के प्रांतीय सचिव मंडल में तीन महिला साहित्यकारों को लिया गया। 

सम्मेलन के अंत में निवृत्तमान पदाधिकारियों और नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने स्थानीय आयोजक समूह के सर्वश्री देवीशरण ग्रामीण, संतोष खरे, महेन्द्र सिंह, बाबूलाल दाहिया, रामयश बागरी, तेजभान, उदित तिवारी, आदि साथियों को कामयाब सम्मेलन के लिए बधाई और अच्छी व्यवस्थाओं के लिए धन्यवाद दिया। अपने तेवरों में विद्रोही और सत्ता के दमन के तीव्र विरोध की आभा लिए यह प्रांतीय सम्मेलन भी पूर्व में हुए शानदार और यादगार सम्मेलनों की कड़ी में दर्ज हुआ। सतना में ही नहीं, पूरे प्रदेश में और प्रदेश से बाहर भी इसकी अनुगूँज बनी रहेगी। 

प्रस्ताव जो पारित किये गये- 

1. बर्मा से आये रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार बंद हो। सभी तरह के शरणार्थियों को मानवता के आधार पर शरण, सुरक्षा और सहायता दी जाए।

2. सरदार सरोवर बाँध के विस्थापितों का पूर्ण पुनर्वास किया जाए, मेधा पाटकर एवं अन्य आन्दोलनकारियों पर थोपे गए झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ।

3. केन्द्रीय हिंदी संस्थान द्वारा प्रेमचंद के उपन्यास गोदान को पुनः पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये। 

4. प्रदेश की सभी शासकीय, अशासकीय संस्थाओं में बढ़ते राजनीतिक दखल को रोका जाये।

5. प्रलेस के मध्य प्रदेश महासचिव विनीत तिवारी एवं उनके साथ जाँच दल में मौजूद रही प्रोफ़ेसर नंदिनी सुंदर, प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद, महिला फ़ेडरेशन नेत्री मंजु कवासी, सीपीआई (एम) के छत्तीसगढ़ राज्य सचिव संजय पराते और स्थानीय आदिवासी मंगलू पर छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा थोपे गए झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ और ऐसे झूठे मामले बनाकर आम नागरिकों को फँसाने वाले शासन के अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए।

6. बेंगलुरु की एक कंपनी द्वारा इंटरनेट पर सर्वे कर एक सूची जारी की गई है। ट्विटर पर आये संदेशों में लिखा गया है कि किन-किन कथित ‘देश द्रोहियों’ को ख़ामोश करने की ज़रूरत है, और आगे 66 लोगों की एक सूची है जिसमें सोनिया गाँधी, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह जैसे काँग्रेस के नेताओं के साथ ही केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन, एआईएसएफ नेता कन्हैया कुमार, सर्वोच्च न्यायालय की वकील वृंदा ग्रोवर एवं अन्यों के साथ प्रलेस के प्रांतीय महासचिव विनीत तिवारी का भी नाम है। न केवल नाम है बल्कि उनकी और वृंदा ग्रोवर की तस्वीरें भी डाली गई हैं। यह शुद्ध रूप से धमकी है और विवेकहीन लोगों को इन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए प्रेरित करना है। सोशल मीडिया पर की जाने वाली इस तरह की ट्रोलिंग की हम निंदा करते हैं और माँग करते हैं कि पुलिस इसे साइबर अपराध के तहत दर्ज कर अपराधियों को पकड़े और ऐसे नफ़रत फैलाने वाले अपराधियों को कड़ी सज़ा दी जाए ताकि दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसी वारदात की पुनरावृत्ति न हो। हम ये भी माँग करते हैं कि उक्त चारों हत्याओं के ज़िम्मेदार अपराधियों को पकड़ने में बरती जा रही ढिलाई बंद की जाए और शीघ्रता से अपराधियों को पकड़ा जाए।

7. आसन्न फ़ासीवाद से निपटने के लिए समस्त लेखक, लेखक संगठन और अन्य जनपक्षीय व प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठन सघन विचार-विमर्श से साझा रणनीति तैयार करें और जनता के बीच में इंसानियत, मोहब्बत, इंसाफ़ के जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठित करने हेतु नये सांस्कृतिक आंदोलन का आगाज़ किया जाए।

8. वेनुजुएला, उत्तर कोरिया सहित समस्त राष्ट्रों की सम्प्रभुता का सम्मान किया जाए। अमेरिकी साम्राज्यवाद लगातार इन देशों के भीतर अस्थिरता पैदा करने और युद्ध भड़काने की कोशिशों में लगा हुआ है। हम इस सम्मेलन के माध्यम से इन राष्ट्रों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए वैश्विक समुदाय से आह्वान करते हैं कि इन देशों को अस्थिर करने के लिए किए जा रहे अमेरिकी प्रयासों को बंद करने के लिए अमेरिका पर दबाव बनाएँ। 


*** मध्यप्रदेश विभिन्न क्षेत्रीय पहचानों, बोलियों और संस्कृतियों को समेटे है। इस तरह की विविधताओं के बीच विन्ध्य क्षेत्र के सतना में प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य सम्मेलन में प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों से आये लेखकों, चिंतकों की चिंताएँ समान थीं। राज्य सम्मेलन में मालवा-मेवाड़ क्षेत्र से सटे मंदसौर जिले से लेकर निमाड़ के खंडवा, होल्करों की राजधानी इन्दौर, नवाबी सांस्कृतिक परिवेश के भोपाल के अलावा बुंदेली, बघेली में लिखने-पढ़ने वाले एक छत के नीचे लगातार दो दिनों तक देश के वर्तमान हालात पर विचार-विमर्श करते हुए वर्तमान व भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी सुनिश्चित करते रहे। 

एक तरफ जहां देश में निरंतर बढ़ते फासिज्म के खतरे की पहचान कर प्रतिरोध के रास्ते तलाशे गये वहीं आतंरिक कमजोरी के रूप में हाशिए का समाज और साहित्य की जिम्मेदारी तय करने पर भी चिंतन हुआ। 16 व 17 सितम्बर सतना सम्मेलन का मूल लक्ष्य देश में बढ़ते तानाशाही के खतरे के प्रति लेखकों, बुद्धिजीवियों का ध्यान आकृष्ट कर उससे लड़ने की रणनीति बनाने पर था। लगभग सभी वक्ताओं ने याद दिलाया कि प्रगतिशील लेखक संघ का गठन ही फासिज्म के खिलाफ हुआ था। जब 1936 में मानवता के दुश्मन के रूप में फासिज्म हिटलर, मुसोलिनी, और तोजो के नेतृत्व में सामने आया था। यह फासिज्म जनतांत्रिक पद्धति को समाप्त कर नस्लीय आधार पर दुनिया को संचालित करने का मंसूबा पाले था। ऐसे ही सोच से वर्तमान सरकार का आश्रय प्राप्त शोषक वर्ग देश की सहिष्णुता और सद्भाव की संस्कृति पर कुठाराघात करते हुए उसकी जगह कट्टर हिन्दुत्व को स्थापित करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपना रहा है। साम्प्रदायिकता, जातिगत आधार पर घृणा फैलाने में संलग्न है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने विरोध में उठे स्वर को बलपूर्वक कुचलने में किसी तरह का संकोच नहीं कर रहा है। सतना सम्मेलन को इस रूप में भी याद किया गया कि लगभग 41 वर्ष पूर्व वर्ष 1976 में सतना में ही फासिस्ट विरोधी लेखकों का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था। वर्तमान राज्य सम्मेलन के उद्घाटनकर्ता वरिष्ठ लेखक और आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी वर्तमान अघोषित आपातकालीन परिस्थितियों से चिंतित थे। उन्होंने सवाल उठाया कि वर्ष 1975 में घोषित आपातकाल को उठा लिया गया था लेकिन वर्तमान में जारी अघोषित आपातकाल की परिस्थतियों से कैसे निपटा जाए ?



सम्मेलन में वैचारिक मतभेदों को ताक पर रखकर देश के समस्त लिखने-पढ़ने, चिंतन करने वालों से एकजुटता का आह्वान किया गया। जनवादी लेखक संघ, मध्यप्रदेश के मनोज कुलकर्णी, जन संस्कृति मंच, उत्तरप्रदेश के महासचिव प्रेमशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि अभी अतीत की शिकायतों को स्थगित रखकर देश में विराट सांस्कृतिक मोर्चा बनाये जाने की जरूरत है। सम्मेलन में प्रदेश के लेखकों के अलावा हिन्दी पट्टी के निकटवर्ती प्रदेशों के कई विद्वानों ने शिरकत कर मध्यप्रदेश के लेखको के प्रति अपनी एकजुटता और सहमति जताई। दिल्ली के विश्वनाथ त्रिपाठी के अलावा गार्गी चक्रवर्ती, छाया चित्रकार शाह आलम, उत्तरप्रदेश के प्रेमशंकर व राजेन्द्र यादव, अलीगढ़ के वेदप्रकाश, बिहार के राजेन्द्र राजन, (प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव), बिहार प्रलेस के महासचिव प्रो. रवीन्द्रनाथ राय, छत्तीसगढ़ के महासचिव प्रभाकर चैबे, सम्मेलन में सक्रिय रहे। 

सभी का मानना था कि साम्प्रदायिक विचारधारा के खिलाफ लड़ना जरूरी है। विद्वानों ने मध्यवर्ग की अवसरवादिता, अमीरों और गरीबो के मध्य बढ़ती खाई, किसानों, दलितो, अल्पसंख्यको पर बढ़ते हमलो पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हम लड़ेंगे और हम सत्ता आश्रित साम्प्रदायिकता के सामने घुटने टेकने को तैयार नहीं है। 

सम्मेलन में अपने दिवंगत साथियों को शिद्दत से याद किया गया। विख्यात कवि गजानन माधव मुक्तिबोद्ध जन्म शताब्दी को समर्पित सम्मेलन में हाल ही में दिवंगत हुए प्रलेस संरक्षक मंडल के वरिष्ठ साथी चन्द्रकांत देवताले की स्मृति में उनकी लंबी कविता ‘भूखण्ड तप रहा है’ को ही सम्मेलन का केन्द्रीय विषय बनाकर सम्मेलन की दिशा को स्पष्ट किया गया। मंच के पार्श्व में त्रिलोचन, हरिशंकर परसाई, कमलाप्रसाद, भगवत रावत की तस्वीरों ने संपूर्ण प्रदेश के लेखकों की प्रगतिशील सोच की विरासत को प्रतिनिधित्व प्रदान किया। सम्मेलन में दाभोलकर, कलबुर्गी, पानसरे, गौरी लंकेश की सुनियोजित हत्या में शासकों की भूमिका और हत्यारों को संरक्षण की निंदा करते हुए अपराधियों को गिरफ्तार करने की मांग की गई। सोशल मीडिया के माध्यम से तर्कशील विचारकों को दी जा रही धमकियों पर भी चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से अपराधियों पर कार्यवाही की मांग की गई। इनमें प्रलेस के महासचिव विनीत तिवारी को खामोश करने की धमकियाँ भी शामिल हैं।

सम्मेलन में किसान आंदोलन, नर्मदा बांध के विस्थापितों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के प्रति सरकार के रवैये की निंदा करते हुए शासकों की संवेदनहीनता को रेखांकित किया गया। व्यापम घोटाले में जिस तरह से अपराधियों को बचाया जा रहा है, उस पर भी ध्यान आकृष्ट किया गया। वर्ष 2015 में विश्व हिन्दी सम्मेलन में लेखकों के अपमान की ओर ध्यान दिलाते हुए शासकों के वर्गीय चरित्र को उजागर किया गया। सम्मेलन में प्रदेश में विकल्पहीनता की राजनीति की पहचान करते हुए प्रतिरोध को संगठित कर फासिज्म की प्रवृतियों को आमजन तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया। प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा अक्टूबर माह में चंडीगढ़ में जनतंत्र और संस्कृति की रक्षा के लिए लेखको का राष्ट्रीय सम्मेलन इस दिशा में एक पहल है। निश्चित ही ऐसे आयोजनो की गूँज देश के संवेदनशील, लोकतंत्र प्रेमी नागरिको तक पहुंचेगी। कट्टरपंथी पराजित होंगे और देश खुली अभिव्यक्ति की फिजा में भय मुक्त होकर सांस ले सकेगा।



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शनिवार, 9 सितंबर 2017

सच्चाई राख से भी उठकर खड़ी होगी

गौरी लंकेश की स्मृति में प्रतिरोध सभा में लिया संकल्प - अब बर्दाश्त और नहीं
विनीत तिवारी-सारिका श्रीवास्तव

5 सितम्बर 2017 को बेंगलुरु की पत्रकार एवं सम्पादक गौरी लंकेश की सम्प्रदायवादियों द्वारा हत्या कर दी गई। इसके प्रति अपना विरोध और आक्रोश दर्ज कराने 7 सितम्बर 2017 को शाम 5 बजे से इंदौर में रीगल चौराहे, गाँधी प्रतिमा पर करीब 400-450 लोग एकत्र हुए। 

नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद इस चौथी हत्या से लोगों में इतना आक्रोश था कि अकेले इंदौर शहर में ही श्रद्धांजलि के तीन अलग-अलग कार्यक्रम हुए। जिनमें से दो कार्यक्रम दो अलग-अलग प्रेस क्लब के ही थे।

शहर के लोगों को श्रद्धांजलि सभा से संतोष नहीं था इसलिए अलग-अलग राजनीतिक दल और संगठन सड़क पर आए और लगातार हो रहे विचारों पर हमले के विरोध में एकजुट होकर करीब दो घण्टे का मौन प्रदर्शन भी किया, जनगीत गाए और मोमबत्ती जलाकर शहीद हुए लेखकों को अपने जज्बे और दुख की सलामी दी।

इस विरोध प्रदर्शन का महत्त्व तब और बढ़ गया जब मेधा पाटकर औऱ नर्मदा आंदोलन के साथियों को हमने इस विरोध प्रदर्शन की इत्तला दी तो मेधा अपने करीब 200 से 250 साथियों के साथ अविलंब इस प्रदर्शन में शरीक हो गईं। करीब तीन दशक से अपने रहने, खाने, कमाने और वजूद के लिए सतत आंदोलन कर रहे नर्मदा आंदोलन के साथी जिनकी इसी दिन कई केस में से एक केस की सुनवाई थी शामिल हुए। नर्मदा बचाओ आंदोलनकारी एनसीए यानी नर्मदा कन्ट्रोल अथॉरिटी में हो रहे भ्रष्टाचार से निपटने और भ्रष्टाचारियों को यह समझाने कि हम गाँव में रहने वाले किसान, मजदूर, मछुआरे लोग जरूर हैं लेकिन अन्याय और शोषण सहित बहुत कुछ समझते हैं और आपके हर तरह के भ्रष्टाचार पर नजर भी रखे हुए हैं; अपने केस की सुनवाई के साथ ही साथ वे एनसीए यानी नर्मदा कन्ट्रोल अथॉरिटी से आमने-सामने बैठ दो-टूक बात करने के लिए मेधा पाटकार के साथ इंदौर आए थे।

इन सबके साथ ही बड़ी संख्या में शहर के युवा, महिलाएँ और बच्चे शरीक हुए। इस विरोध प्रदर्शन में शहर के वरिष्ठ एवं गणमान्य नागरिक, कुछ ऐसे साथी स्वास्थ्य खराब था शरीक हुए और अपनी नाराजगी दर्ज कराई। कॉमरेड पेरिन दाजी, कॉ वसन्त शिंत्रे, इप्टा इंदौर के संस्थापक और वरिष्ठ वकील आनंद मोहन माथुर जैसे साथी जो खड़े रह सकने में भी असमर्थ थे शामिल हुए। युवा साथियों ने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उन्हें बैठने के लिए स्टूल की व्यवस्था की। शैला शिंत्रे, कल्याण जैन के साथ-साथ नर्मदा आंदोलन की जुझारू नेत्री मेधा पाटकर अपने आंदोलन के साथियों सहित पूरे समय उपस्थित रहीं। जोशी एन्ड अधिकारी रिसर्च इंस्टीट्यट, दिल्ली की प्रमुख एवं सामाजिक अर्थशास्त्री जया मेहता, स्वास्थ्य के मुद्दों और ड्रग ट्रायल की डरावनी सच्चाई को सामने लाने वाली और महिलाओं के आंदोलन से जुड़ी कल्पना मेहता, मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव कॉ विनीत तिवारी भी सक्रिय रूप से उपस्थित रहे। इनके अलावा सीपीआई के जिला सचिव कॉमरेड रुद्रपाल यादव, कैलाश गोठानिया, कॉ दशरथ, सी.पी.एम. से कॉ अरुण चौहान, के.के.मिश्रा, एस यू सी आई से कॉ प्रमोद नामदेव, इसी के महिला संगठन से अर्शी, समाजवादी पार्टी से रामस्वरूप मंत्री, प्रगतिशील लेखक संघ से केसरी सिंह चिढार, चुन्नीलाल वाधवानी, मुकेश पाटीदार, मध्य प्रदेश भारतीय महिला फेडरेशन की महासचिव सारिका श्रीवास्तव, इसी की इंदौर इकाई की सचिव नेहा दुबे और अन्य सदस्य सुलभा लागू, पँखुरी, कामना, सुधा कोठारी, भारतीय जन नाट्य संघ से विजय दलाल, प्रमोद बागड़ी, अरविंद पोरवाल, रूपांकन से अशोक दुबे, दीपिका, विकी, नर्मदा घाटी आंदोलन के साथी रहमत, हिम्शी, देवराम भाई, कमलू दीदी, चिन्मय एवम सरोज मिश्र, जनवादी लेखक संघ से रजनीरमण शर्मा, परेश टोककर, सुरेश उपाध्याय, भगत सिंह दीवाने ब्रिगेड से विजय जाटव, शादाब गौरी, शाहरुख, कुछ पत्रकार, कार्टूनिस्ट और कलाकार साथी दीपक असीम, सौरभ बनर्जी, नवनीत शुक्ला, गिरीश मालवीय, हेमन्त मालवीय, सुन्दर गुर्जर, सदभावना एवं शांति एकजुटता संगठन से शफी शेख, मुस्ताख़ भाई बड़नगर वाला, आम आदमी पार्टी से युवराज सिंह और उनके साथी, फ़ाईन आर्ट कॉलेज के विद्यार्थी, पाशा मियाँ इत्यादि भी सम्मिलित हुए।

लोगों की यह उपस्थिति उनके अंदर छुपे दुःख आक्रोश एवं न्याय तथा संघर्ष के प्रति संलग्नता को दर्शाती है। बड़ी संख्या में यह मौजूदगी बताती है कि दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और अब गौरी लंकेश को एक-एक कर खो देने के बाद अब और नहीं। अब तक हम चुप थे लेकिन अब अपना मौन तोड़ते हुए क्रूर हत्यारों और उनकी समर्थक सत्ताओं को चेता रहे हैं कि अब अपने किन्हीं और साथियों को हम नहीं खोएंगे। 

इस विरोध प्रदर्शन में अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले कई राजनीतिक दलों के लोगों के अतिरिक्त सन्दर्भ केन्द्र इंदौर, इप्टा, भारतीय महिला फेडरेशन, प्रगतिशील लेखक संघ, सीपीआई,सीपीआई(एम), जनवादी लेखक संघ, रूपांकन, एसयूसीआई(सी), भगत सिंह दीवाने ब्रिगेड, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं कलाकारों के संगठन और शहर के अनेक शांति एवं न्यायप्रिय तथा संवेदनशील नागरिक शरीक हुए।

रविवार, 3 सितंबर 2017

अमेय कांत और शशिभूषण की रचनाओं का पाठ

'कवि अपने समकाल को रचते हुए इतिहास को दर्ज करने का कार्य भी करता है' – देवी अहिल्या केन्द्रीय पुस्तकालय, इंदौर में २६ अगस्त २०१७ (शनिवार) को आयोजित जनवादी लेखक संघ, इंदौर के ४५ वें मासिक रचनापाठ में युवा कवि अमेय कान्त की कविताओं पर चर्चा करते हुए प्रदीप मिश्र ने कहा। इस अवसर पर अमेय कान्त (देवास) व शशिभूषण (उज्जैन) ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। 

अमेय ने 'गुंजाइश', 'माँ ने एक गीत गाया', 'गए हुए लोग', 'भीमसेन जोशी', 'बाम की पुरानी डिबिया', 'चहचहाहट', 'चौराहों पर कुत्ते', 'छूटी हुई दुनिया' आदि कुछ कविताओं का पाठ किया जबकि शशिभूषण ने अपनी कहानी 'जाति-दण्ड' का पाठ किया।

कविताओं पर चर्चा करते हुए प्रो. पद्मा सिंह ने कहा कि ये पाठक के मन में उतरने वाली कविताएँ हैं जबकि ब्रजेश कानूनगो व प्रदीप कान्त ने इन्हें अनुभूति और भाव की सघनाताओं की कविताएें कहा। वेद हिमांशु ने कविताओं की लोक संवेदना पर चर्चा की तो पुनर्वसु जोशी ने रेखांकित किया कि यह बाजारवाद के युग में आत्मीय मानवीय संबंधों की कविताएँ हैं जो धीरे धीरे समाज से ख़त्म होते जा रहे हैं। विनीत तिवारी ने इन कविताओं के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की और कहा कि कवि स्मृति के सूत्र पकड़कर कविता में जाता है। किन्तु इनमे सांसारिक चिंताओं का असर अभी बाकी है। शशिभूषण ने कहा कि इन कविताओं में जीवन के भीतर उतरने की प्रवृत्ति है। प्रभु जोशी ने भी इन कविताओं पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि कवि को ही सोचना है कि वह क्या छोड़े और क्या दर्ज करे जिससे कविता, कविता की तरह से आए। अमेय की माँ पर लिखी कविताओं पर उन्होंने कहा कि वे मां के प्रेम की छवियाँ लेकर आते हैं और माँ का प्रेम वह है जो भाषा के ठिठकने के बाद शुरू होता है। वरिष्ठ कवि राजकुमार कुंभज ने कहा कि कवि की कविता का ढांचा नया और अलग से दिखना चाहिए और इस मायने में 'भीमसेन जोशी' उनकी एक बड़ी कविता है। 
शशिभूषण की कहानी पर चर्चा करते हुए जीवन सिंह ठाकुर ने कहा कि यह एक सुगठित कहानी है जिसमें पूरा परिवेश ही एक पात्र है। कहानी कई सवाल खड़े करती है। कहानी में उठने वाले सवाल महत्वपूर्ण हैं। प्रकाश कान्त ने इस कहानी में वर्णित शैक्षणिक संस्थानों में फैले ध्रुवीकरण को इंगित किया तो प्रभु जोशी ने कहा कि यह दक्ष कथाकार की कहानी है जो सवर्ण और दलित के द्वैत को बड़ी बारीकी से समर्थ भाषा में बुनती है। कहानी का अंत विशिष्ट है। यह एक मेटाफर की तरह है। विनीत तिवारी ने इस कहानी में कुछ खूबियों के साथ करुणा के अभाव की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा यह अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसमें दलित की उपस्थिति भी होनी चाहिए थी। राजकुमार कुम्भज ने इस कहानी को भाषा और शिल्प की एक बेहतरीन कहानी बताया। उन्होंने कहा हमें बड़ी ख़ुशी है कि एक समर्थ कहानी कार हमारे बीच है। चुन्नीलाल वाधवानी, डॉ रमेश चन्द्र, अशोक शर्मा भारती, सारिका श्रीवास्तव आदि ने भी दोनों रचनाकारों की रचनाओं पर चर्चा की।

कार्यक्रम में राजकुमार कुम्भज के नए कविता संग्रह 'शायद यह जंगल कभी घर बने' का लोकार्पण भी किया गया। हाल ही में दिवंगत हुए कवि चंद्रकांत देवताले की कविता 'यमराज की दिशा' का पाठ कर उनको श्रद्धांजली अर्पित की गयी। साथ ही जलेस इंदौर इकाई ने निर्णय लिया कि अगले एक साल तक सभी कार्यक्रमों की शुरुआत देवताले जी की कविताओं के पाठ से होगी। इस अवसर पर 'पूरा सच' के संपादक रहे पत्रकार रामचंद्र क्षत्रपति को याद किया गया गया जिन्होंने अपने अखबार 'पूरा सच' में सबसे पहले राम-रहीम उर्फ गुरमीत की पोल खोली थी, साध्वी की चिट्ठी छापी थी, जिसके बाद उनको मरवा दिया गया था। साध्वियों और उन सभी लोगों की सराहना की गयी जिन्होंने बलात्कारी बाबा को सज़ा दिलवाने में सक्रिय भूमिका निभायी। कार्यक्रम का संचालन रजनी रमण शर्मा ने किया और आभार देवेन्द्र रिणवा ने माना।


- प्रदीप कांत