मैंने भी फ़िल्म 'अनारकली ऑफ़ आरा' देख ली। लगता नहीं कि अब यह भूल पायेगी। बिहार के आरा की सुन्दर, साहसी और ख़ुद्दार लोक गायिका और नाचनेवाली अनारकली की जिंदादिली, संघर्ष, दुःख और सपने दिल में उतर गए हैं। लगता है एक उम्मीद से भरे मार्मिक आख्यान से गुज़र कर आये हैं। घर, सड़क, गलियां, रसिकों का हुजूम भीतर पैठ सा गया है।"सबसे शुद्ध पल हैं भय रहित पल / निर्भय स्वास्थ्य है / जो भय लाता है उससे निर्भय मिलें / भयभीत से करें प्रेम निर्बल के लिये बोलें / भय राज नरक है." -शशिभूषण
रविवार, 26 मार्च 2017
अनारकली ऑफ़ आरा देख लीजिए, देश के लिए
मैंने भी फ़िल्म 'अनारकली ऑफ़ आरा' देख ली। लगता नहीं कि अब यह भूल पायेगी। बिहार के आरा की सुन्दर, साहसी और ख़ुद्दार लोक गायिका और नाचनेवाली अनारकली की जिंदादिली, संघर्ष, दुःख और सपने दिल में उतर गए हैं। लगता है एक उम्मीद से भरे मार्मिक आख्यान से गुज़र कर आये हैं। घर, सड़क, गलियां, रसिकों का हुजूम भीतर पैठ सा गया है।बुधवार, 28 दिसंबर 2016
दंगल पर व्यक्तिगत हो चली अंतिम टीप
सोमवार, 26 दिसंबर 2016
जहां का खाप वहीं से दंगल
शनिवार, 24 दिसंबर 2016
खेल भावना की राष्ट्रीय फ़िल्म है दंगल
शनिवार, 18 जून 2016
उड़ता पंजाब
फिल्म केवल पंजाब की नहीं है। बिहार की भी है। सभी प्रांतों की है। पंजाब में ड्रग्स है क्योंकि वहाँ संपन्नता है। निर्धन समाज में ड्रग्स का कारोबार नहीं फैल सकता। ग़रीब इलाक़ों में तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, गांजा, अफ़ीम, शराब का धंधा है। नशा व्यक्ति को नष्ट कर देता है थोड़े ना नुकुर के बाद हर कोई मान लेगा।
फिल्म कोई छूट नहीं लेती। अगर लेती तो एक दो भांगड़ा, आईटम सांग ज़रूर होते। प्रेम प्रसंग भी परिणति तक पहुँचते। फ़िल्म में दो लड़कियो को हम देखते हैं। एक डॉक्टर। दूसरी मज़दूर। दोनों अच्छी लड़किया हैं। खूब संघर्ष करती हैं। डॉक्टर लड़की जिस सादगी से पुलिस के सहायक निरीक्षक को अपने कर्तव्य की याद दिला देती है वह महत्वपूर्ण है।
आलिया भट्ट ने यादगार काम किया है। वे जब अपने हॉकी खिलाड़ी होने का हवाला देकर पीड़ा से बोलती हैं तो अपने सतत शोषण में भी सत्ता को अमिट चुनौती देती हैं। किसी पीड़ित लडकी की व्यथा में समकालीन राजनीतिक सत्य को देखना हो तो इससे बेहतर दृष्य नहीं हो सकता। उड़ता पंजाब चुनाव और कुछ जुमलों के शानदार इस्तेमाल से राजनीतिक बनी है। हो सकता है इसकी परेशानियाँ भी इसी कारण रही हों।
शाहिद कपूर ने वही काम किया जो उन्होंने फिल्म हैदर में बखूबी सीखा था।
फिल्म में कुछ भी ग़लत नहीं है। इसकी कल्पना करना भी बहुत तकलीफ़देह है कि इसमें 80 से अधिक कट के सुझाव थे। वह लड़ाई जो इस फिल्म ने लड़ी फिल्म को अलग पहचान देती है। अदालत की टिप्पणी ने फिल्म को लोगों तक पहुँचने में मदद की इसमें शक नहीं।
कोई फिल्म किसी राजनीतिक दल के लिए असुविधाजनक हो सकती है। हो सकता है किसी राजनीतिक दल को उससे फायदा मिलता हो। यह गौंड़ बात है। हमारे यहाँ बहुदलीय प्रणाली है। सभी दल संतुष्ट हो जायें इसकी कामना ठीक नहीं। फ़िल्म अधिक पारखियों के लिए मामूली भी हो सकती है। लेकिन इंसानो की सोचिए तो फ़िल्म नेकी का संदेश देती है इसमें संदेह नहीं। लोकप्रिय कलाकर किस तरह ग़लत आदतों को प्रचलित कर देते हैं फ़िल्म में खूब दिखाया गया है।
नशे को लेकर हमारे समाज में दोहरे मापदंड हमेशा से रहे हैं। नशे के खिलाफ़ पूरा भारतीय समाज एक दिन में खड़ा हो जायेगा इसकी आशा करना ठीक नहीं। फिल्म यह बताने में सफल रही है कि नशा एक राजनीतिक कारोबार भी है। इससे अच्छी फिल्में भी होंगी। मगर उड़ता पंजाब की नीयत या स्तर पर संदेह करना ठीक न होगा।
कुल मिलाकर फ़िल्म उड़ता पंजाब देखी जानी चाहिए। आखिर उन लोगों ने भी फ़िल्म देखी ही जिन्होंने आधा स्टार दिया। हर किसी को स्टार देने का अपना अधिकार सुरक्षित रखना चाहिए।
शुक्रवार, 17 जून 2016
सैराट

मैंने भी मराठी फ़िल्म 'सैराट' देखी। मुझे मराठी नहीं आती। अंग्रेज़ी में लिखे आ रहे संवाद समझ नहीं आये। इस तरह यह अनोखी फ़िल्म थी जिसमे किसने किससे क्या कहा मैने नहीं समझा।
मैंने दृश्य देखे और कहानी में, चरित्रों में पूरी तरह डूब गया। जब फ़िल्म ख़त्म हुई तो मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था। क्रोध, शोक और करुणा की त्रिवेणी में मैं स्तब्ध और निःशब्द रह गया। मेरे भीतर हाहाकार और सन्नाटा दोनों बराबर थे।
नन्हे शिशु के सूनी सड़क पर असहाय, भविष्यहीन कदम और घर में उसके मां बाप की निर्दोष, निरापद, स्वावलंबी ज़िन्दगी की निर्मम हत्या से पैदा मौत ने ऐसा कर दिया था कि लगा यह सब अभी-अभी अपने घर में घटा है।
कुछ बड़ा कहने की आज भी स्थिति नहीं न ही सामर्थ्य। सिर्फ़ यही कह सकता हूँ कि यह फ़िल्म प्रेम, क्रोध, शोक और करुणा की अनमोल सामाजिक कृति है। जो भी देखेगा अपने भीतर बदलाव अवश्य पायेगा।
इससे पहले कि सुधारगृहों के चौकीदार, व्यापारी चिकित्सकों के सहयोग से निर्मित कोई नयी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बांचकर फ़िल्म को सुधार की खोखली, नकली कोशिश साबित कर दें आप फ़िल्म देख लें।
जब आप फ़िल्म देख चुकें तो कहीं गवाही देने मत दौड़ें। एक गिलास पानी पियें और मौन टहलने निकल जाएँ। यदि टहलना मुनासिब नहीं तो संभव एकांत में कुछ देर एकाकी गुनें
-शशिभूषण
रविवार, 11 मार्च 2012
पान सिंह तोमर केवल एक फ़िल्म का नाम नहीं है
पान सिंह तोमर के जीने, लड़ने और मरने को इरफा़न ख़ान ने जिस तरह अभिनय से इस फिल्म में साकार किया है केवल उनके पसीने का टीका बहुतों को अभिनेता बना सकता है। उनकी प्रतिभा को और चरित्र के भीतर प्रवेश को छू सकने वाला दूसरा अभिनेता नहीं हो सकता।
तिग्मांशु धूलिया ने फिल्म के रूप में एक बेहतरीन आईना जो सामने आते ही तमाचा जड़ देता है इस देश को सौंपा है। बुंदेली टोन वाले संवाद और प्यार-झगड़े तथा गँवई दृश्य ऐसे कि आप चीख उठें यह फिल्म नहीं ऐसा सचमुच होता है! मेरा यक़ीन है इस फिल्म को देखने के बाद आप पान सिंह तोमर जैसा जीना चाहेंगे। उसके जैसा बोलना, चलना, अपनी माँ, बीवी और बच्चों तथा खेतों को प्रेम करना चाहेंगे।
पान सिंह जब छुपकर छावनी में बेटे के सामने खड़ा होकर पूछता है सुना है तुम्हारी शादी हो रही है। मेरी वजह से कोई दिक़्कत तो नहीं है? जब आइसक्रीम लेकर फोन पर अफ़सर से कहता है यह सबसे बड़ा मैडल है मेरे लिये। जब वह पत्नी से आखिरी बार मिलकर लौटता है तो कलेजा मुँह को आता है।
यह महज़ डायलाग नहीं है जो पान सिंह तोमर अपने कोच से कहता है मुझे गाली देना पर माँ की गाली कभी मत देना। माँ को गाली दी तो गोली चल जाती है हमारे यहाँ। हम भी तो जीवन से इतना चाहते ही हैं कि हमारी माँ को गाली देने वाला ज़िंदा न रहे हमारी आँखों के सामने। फिर खेत छीन लेने वाले और बूढ़ी माँ को बंदूक के कुंदे से पीटने वाले को गोली मारकर चंबल के बीहड़ों में भटकता पान सिंह डाकू कैसे हुआ? पान सिंह न केवल बाग़ी है बल्कि वह हमें सिखाता है कि बाग़ी होना किसे कहते हैं। वह हमें धिक्कारता है हम बाग़ी क्यों नहीं हैं?
हम डकैत नहीं बाग़ी हैं। डकैत तो संसद में होते हैं। पान सिंह तोमर का पत्रकार को दिया यह बयान इस फिल्म की रीढ़ है। और यह फ़िल्म एक राजनीतिक फ़िल्म है। फ़िल्म का नाम राजनीति होने से वह सही राजनीतिक फ़िल्म नहीं बनती। जब तक अन्याय और उसके प्रतिरोध की सही और हिम्मतवर समझ न हो फ़िल्म यथार्थ बनकर रह जाती है। उससे कला और चेतना के पाँव आगे नहीं बढ़ते। वह सीने में संकल्प शक्ति बनकर नहीं रहती।
फिल्म का मर्म वहां है जहाँ पान सिंह तोमर को सेना में अधिक खाने की वजह से स्पोर्ट्स में भेज दिया जाता है। वह अधिक खाता है इसलिये खिलाड़ी बन जाता है। उसमें ग़ुस्सा है। ग़लत की पहचान है पान सिंह को इसलिये उसकी शक्ति ख़र्च होनी चाहिये वरना विद्रोह हो सकता है। इस कारण उसे निशानेबाज़ी से हटाकर धावक बनाया जाता है।
लेकिन एक दिन उसका कोच उससे कहता है तुम पाँच हज़ार मीटर की फ़ाइनल दौड़ नहीं दौड़ोगे? क्यों? क्योंकि अफ़सर के बेटे से कोच की बेटी की शादी होने वाली है और यह दौड़ उसे ही जीतनी है। कोच पान सिंह तोमर को समझाता है तुम पीछे हट जाओ मैं तुम्हें बाधा दौड़ का नेश्नल चैंपियन बना दूँगा। पान सिंह तोमर मान जाता है। वह बाधा दौड़ का प्रशिक्षण लेता है और नेश्नल चैंपियन बनता है। अपने इस कौशल और सामर्थ्य में केवल एक अंतर्राष्ट्रीय दौड़ वह हारता है जिसमें उसे कंटीले जूते पहनने पड़ते हैं। वह अपने कोच से कहता है इन जूतों में तो मैंने कभी अभ्यास ही नहीं किया। मैं नंगे पैर दौड़ लूँगा। उसे इसकी अनुमति नहीं मिलती। वह दौड़ के बीच में ही जूते उतारकर नंगे पैर दौड़ता है फिर भी हार जाता है।
अगर इस फिल्म की किसी फ़िल्म से तुलना की जा सकती है तो वह है बैंडिट क्वीन। लेकिन मैं समझता हूँ दलितों और स्त्रियों के प्रति अन्याय सहज ही हमारी संवेदना को जगा देता है। कोई भी पानीदार इंसान इस बात से विचलित हुये बिना नहीं रह पाता कि स्त्रीत्व का अपमान हो रहा है। लेकिन यदि यह अन्याय ज़मीन और अधिकारों के साथ हो रहा हो तो बैंडिट क्वीन जैसी संवेदना जगाने के लिये जिस कलात्मक सामर्थ्य की ज़रूरत पड़ती है उसी का नाम है फ़िल्म पान सिंह तोमर। यहीं दोनों फिल्मों का एक साझा पाठ किया जा सकता है कि आत्मसमर्पण के बाद भी मारी जाने वाली स्त्री होती है और हर वह शख्स मारा ही जाता है जो अन्याय से लड़ता है। पर बाग़ी सूबेदार पान सिंह तोमर मरकर भी मरता नहीं हमारे दिल में, फ़िल्म इस कोटि की है।
इस फ़िल्म के और पहलुओं पर चर्चा हो सकती है, आगे होगी भी। बाग़ी पान सिंह तोमर का यह सवाल पूरे भारतीय अतीत को निरुत्तर करने और शर्म से सर झुका लेने को मजबूर कर देने वाला है कि मुझसे खेल का मैदान क्यों छीन लिया? जीवन भर बीहड़ में भटकने को क्यों छोड़ दिया? मैं इस स्वीकार के साथ कि इस फिल्म का एक-एक मिनट क़ीमती है एक सामयिक सवाल पूछना चाहता हूँ जिसका संबंध दर्शकों से है कि यह फिल्म मल्टी प्लेक्सेस में बड़े पैमाने पर क्यों नहीं दिखायी जा सकी? छोटे बजट की ऐसी फ़िल्मों को हर क़िस्म के दर्शकों तक पहुँचाने का जिम्मा किसका होना चाहिए? क्या दर्शक केवल सुंदर अभिनेत्रियों के मुजरे देखने के लिये बने हैं? क्या उनके शौक़ को बेलगाम छोड़ दिया गया है कि बालीवुड की स्त्रियाँ महज़ देह और इंटरटेनमेंट हो जायें? ऐसे दर्शकों की ज़िंदगी में किसी बाग़ी की बीवी के आँसू क्यों नहीं पहुँचते?
बुधवार, 1 फ़रवरी 2012
हमारी तटस्थता की शिकार फिल्मों में ‘थैंक्स माँ’ भी है
कभी फिल्म देखना आवारगी हुआ करती थी। लोग पैसे बचाकर फिल्में देखते थे और बदनाम रहते थे। फिल्मी गाने गानेवाले नौजवानों को लड़कियाँ पसंद करती थीं लेकिन उनके साथ उठना-बैठना मंज़ूर नहीं करती थीं। आज जब किसी को सिर्फ़ शौक के लिए फिल्में देखने को भागते, लंबी लाइन में घंटे भर खिसकते देखता हूँ तो मन लगाव से भर जाता है। कोई बौद्धिकता नहीं, कोई दावा नहीं। फिल्में देखनी हैं कि देखे बिना नहीं रह सकते। अकेले देखने से सख्त गुरेज़। जो ज्ञान के लिए फिल्में देखें वे चूतिया।
हिंदी में शानदार फिल्मों की कमी नहीं। ऐसी दर्जनों फिल्में हैं जिनमें आंदोलित करने की क्षमता है। वे हमारे भीतर की जड़ताएँ तोड़ने में सक्षम हैं। जो चुपचाप अपना काम करती रहती हैं। तमाम भुलावों और भव्य विज्ञापनों को छोड़कर हम ऐसी फिल्मों की शरण में जाते हैं। वे हमें बिना शर्त अपनी गोंद ले लेती हैं। हम उनकी करुणा में भीग भीग जाते हैं। उनके क्रोध में जबड़े भींच लेते हैं। वे हमें हँसना-रोना-लड़ना-प्यार करना और अपना हक़ लेना सिखाती हैं। लेकिन देखने में यह आता है कि हमारा समाज ऐसी परिवर्तनकामी, सच्ची फिल्मों का साथ नहीं देता। जिनके ऊपर ऐसी फिल्मों को प्रकाश में लाने की सामर्थ्य और ज़िम्मेदारी है वे कृपण हो जाते हैं। ऐसी फिल्मों के अभिनेता स्टार नहीं कहलाते। इनके निर्देशक वाजिब पहचान नहीं पाते। जैसा कि जीवन में होता है लोग ईमानदारों को छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं ये फिल्में भी हमारी तटस्थता की शिकार हो जाती हैं। जबकि होना यह चाहिए कि बिना किसी गुणा भाग के सहज फिल्मों को प्रश्रय मिले। उनके पक्ष में अच्छा माहौल बने। वे लोगों तक बार-बार पहुँचें।
ये बातें मैं एक खास फिल्म को ध्यान में रखकर कह रहा हूँ। फिल्म का नाम है थैंक्स माँ। आपमें से अधिकांश ने जो फिल्मों पर पढ़ने के आदी होंगे यह फिल्म ज़रूर देखी होगी। इरफान कमाल की यह पहली फिल्म मार्च 2010 के पहले सप्ताह में रिलीज़ हुई थी। यू/ए सर्टिफिकेट के साथ। हालांकि यह फिल्म शिशुओं पर है और मुख्य कलाकार भी बच्चे ही हैं इसमें। रघुवीर यादव, जो फिल्म की कहानी के केंद्र एक अस्पताल में गार्ड की यादगार भूमिका में हैं को छोड़ दिया जाये तो एक भी जाना-माना नाम बड़ी भूमिका में नहीं है इस फिल्म में।
फिल्म शुरू होती है रेलवे प्लेटफार्म के एक दृश्य से। एक बच्ची जिस पर से माँ-बाप की नज़र अभी-अभी हटी है पटरी की ओर बढ़ रही है। सीटी बजाती ट्रेन प्लेटफार्म में लगने ही वाली है। यात्रियों की भीड़ आ-जा रही है पर किसी को बच्ची की परवाह नहीं है। वह तेज़ी से घुटनों के बल ट्रेन की तरफ़ जा रही है। यह दृश्य पूरा होते-होते कलेजा मुह को आता है कि बच्ची पटरियों पर अब गिरेगी और ट्रेन आ जायेगी। नसीब की बात माँ की नज़र उस पर पड़ जाती है। वह बदहवास दौड़कर बच्ची को मौत के मुँह से खींच लेती है। स्क्रीन पर दो शब्द उभरते हैं थैंक्स माँ और फिल्म शुरू होती है।
फिल्म का नायक है दस-बारह साल का बच्चा मुन्सिपल्टी। उसके साथी हैं सोडा मास्टर, कटिंग, डेढ़ शाणा, और सुरसुरी। ये सब चोर हैं। मवाली हैं। प्लेटफार्म पर जेबें काटते हैं, सामान छीनकर भागते हैं। परस्पर दोस्तनुमा दुश्मन और दुश्मननुमा दोस्त हैं। मुन्सिपल्टी के नामकरण की कहानी यह है कि उसकी माँ उसे म्यूनिसिपैल्टी के अस्पताल में छोड़ गयी थी इसलिए वह मुन्सिपल्टी है। वह अक्सर उस अस्पताल में गार्ड के लिए शराब की रिश्वत लेकर इस उम्मीद में जाता है कि उसकी माँ उसे खोजते अस्पताल जब आयेगी तो गार्ड उसे माँ से मिला देगा। अपनी माँ से मिलना मुन्सिपल्टी का सबसे बड़ा सपना है। इसी सपने के साथ रोज़ी-रोटी के अधम प्रयास में एक दिन उसे पुलिस पकड़ ले जाती है। वह बाल सुधारगृह पहुँचा दिया जाता है। वहाँ उसका सामना एक अधिकारी से होता है जो उसे नहा धो लेने को साबुन देता है। उसके इरादे मुन्सिपल्टी भाँप लेता है। वह खुद को छुड़ाता हुआ वहाँ से भागता है। रात में मुन्सिपल्टी छत से कूदकर भागने की जुगत में है तो क्या देखता है कि एक कुत्ता है जो कपड़े में लिपटे शिशु को सूँघ रहा है और भौंक रहा है। एक टैक्सी में कोई औरत अभी अभी बैठकर जा रही है। मुन्सिपल्टी कुत्ते को भगाकर शिशु को सीने से चिपटा लेता है। टैक्सी नज़रों से ओझल हो जाती है।
सही मायने में फिल्म की कहानी यहीं से शुरू होती है। मुन्सिपल्टी शिशु का नाम रखता है कृष्ण। वह उसकी माँ को खोज रहा है। वह उसे चर्च के अनाथालय में नहीं देना चाहता। हिजड़ों के यहाँ से भी भाग आता है। वह तय करता है कि शिशु की पहचान छिन जाये इससे अच्छा होगा जब तक माँ नहीं मिल जाती मैं ही देखभाल करूँ।
उसकी खोज के दौरान वेश्या आती है जिसने इस शिशु को खरीदकर छोड़ दिया था। क्योंकि यह लड़का था। बुढ़ापे में उसका दलाल हो सकता था।
एक दिन मुन्सिपल्टी अस्पताल प्रबंधन की चालाकी भेदकर और पादरी की मदद से कृष्ण की माँ को खोज लेता है। लेकिन जब वह कृष्ण की माँ से मिलता है तो उसकी माँ पर से श्रद्धा ही मिट जाती है। कृष्ण की माँ का गर्भ उसके पिता का था। इस कारण वह कृष्ण को स्वीकार नहीं सकती। हारा हुआ मुन्सिपल्टी जो बकौल पादरी चोर है और जीवन में पहली बार किसी की चीज़ लौटाना चाहता है बच्चे को बाहों में लिये सड़क में आता है तो एक कार अचानक दबाये गये ब्रेक के कारण उसके पास रुकती है। वह कार में बैठी हुई औरत को देखता है। अगले पल उसकी नज़र एक बड़े होर्डिंग पर लगे पोस्टर पर जाती है। दोनो एक ही हैं। वह चल देता है कि तभी छोटा बच्चा देखकर औरत मुन्सीपल्टी को रूपये देने के लिए हाथ बढ़ाती है। वह इंकार के साथ आगे बढ़ जाता है। मुन्सिपल्टी हारकर अनाथालय में जाता है और बच्चे के माँ-बाप के रूप में अपना नाम लिखने को कहता है।
वह फिल्म के आखिर में अस्पताल पहुँचता है। आज भी उसके हाथ में गार्ड के लिए शराब है। गार्ड कहता है तेरी माँ कभी नहीं आयेगी। मुन्सीपल्टी उठते हुए कहता है लेकिन मैं आता रहूँगा। वह धीरे धीरे चला जाता है। गार्ड शराब की बोतल पटक देता है। फिल्म के बिल्कुल आखीरी दृश्य में वही औरत कार से अस्पताल के परिसर में उतरती है जो मुन्सिपल्टी को रास्ते में मिली थी। जिससे पैसे लेने से उसने इंकार कर दिया था। जो उसकी माँ है।
यह संक्षेप में फिल्म की कहानी का ढाँचा है। फिल्म के दृश्य और संवाद जो कहानी बयान करते हैं उसे देखकर ही जाना जा सकता है। इस फिल्म के संवाद उस जीवन में ले जाते हैं हमें जिससे हम स्लम डॉग मिलेनियर या सलाम बांबे जैसी फिल्मों के माध्यम से परिचित होने का दावा कर सकते हैं।
थैंक्स माँ शिशुओं को फेंकने से लेकर उनके खरीद फरोख्त और हत्याओं तक की अनगिन दारुण गाथाओं को हमारे सामने उजागर कर देती है। यह फिल्म दिखाती है कि भारतीय समाज में शिशुओं के साथ हो रहे अन्याय की कितनी वजहें छुपी हैं और रोज़ पनपती रहती हैं। यदि इस कथा श्रंखला को देखें जिसमें एक स्त्री अस्पताल में अपने पिता से मिला जीवित शिशु छोड़कर आती है। उसे अस्पताल का पेशेवर चोर वेश्या को बेंच देता है। वेश्या उसे इसलिए नहीं पालना चाहती क्योंकि वह लड़का है। एक बारह साल का बच्चा जो खुद अनाथ और चोर है लेकिन उस बच्चे को माँ तक पहुँचाना और एक मुकम्मल पहचान के साथ बड़ा होता देखना चाहता है तो लिंग परीक्षण के पश्चात मारे जाने वाले कन्या भ्रूणों की त्रासदी घोर सामाजिक ताने-बाने की केवल एक पहलू दिखायी देगी। भारतीय समाज अपनी जिस संरचनागत हत्यारी प्रविधि में है उसे चंद सरकारी और एनजीओ संचालित जागरुकताएँ नहीं बदल पायेंगी।
थैंक्स माँ हमारे समय की एक ऐसी फिल्म है जो बड़े सिनेमाघरों में मँहगे पापकार्न और अँग्रेज़ी बोलते वेटरों के अनुरोध के साथ व्यापक पैमाने पर नहीं देखी जा सकी। यद्यपि इसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रशंसा एवं सम्मान बटोरे। लेकिन यह भी फिल्म ही है और जब भी किसी सहृदय के द्वारा देखी जायेगी उसे झकझोरकर रख देगी।
मुझे यक़ीन है आपने ऊपर मेरा यह लिखा पढ़ चुकने के बाद सारी स्थितियों का आकलन कर ही लिया होगा। लेकिन सवाल यह नहीं है कि इस फिल्म पर मैंने कितने फिल्म संबंधी तकनीकि पहलुओं से विचार किया है। कलात्मक पैमानों पर इसे कसने में कितना सफल रहा हूँ। या यह फिल्म बाकी फिल्मों की तुलना में कितनी उत्कृष्ट है। साथियो, मुद्दा यह है कि यह फिल्म बड़े पैमाने पर क्यों नहीं देखी जा सकी। इसे यदि बच्चों को दिखाना हो तो किस तर्क से दिखाया जाये उन्हे किस तरह से तैयार किया जाये पहले कि वे सार सार को पकड़ सकें? क्योंकि इस फिल्म फलफमें गालियाँ हैं। बड़े तीखे हर क़िस्म के नग्न यथार्थ हैं लेकिन इन सबके बावजूद मैं समझता हूँ यह बूट पालिश या सन आफ इंडिया जैसी फिल्मों से बच्चों के लिये अधिक ज़रूरी है। ऐसी फिल्में जो जनमानस की समझ बढ़ाती हों उपेक्षा के साथ साथ अपेक्षित मानसिक दशा के अभाव की शिकार क्यों हो रही हैं?
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मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010
जिन बच्चों की ज़िंदगी से पिता घट जाए उनकी खातिर दुआ है फ़िल्म 'पा'
लेकिन फ़िल्म मुझे जिन वजहों से पसंद आई उन्हें साहित्यिक ही कहना सही होगा. बड़ी-बड़ी बातें रखने की बजाय पहले ही स्वीकार कर लूँ कि मैं किसी देखी हुई फ़िल्म पर तभी बात कर सकता हूँ जब कहानी और गानों को केंद्र में रखूँ. फ़िल्म की तकनीकि समझ मुझे नहीं है. मसलन मेकअप, सेट, पार्श्व संगीत, सिनेमेटोग्राफ़ी आदि-आदि. मुझे यक़ीन है इन अपेक्षाओं के लिए बहुत से समीक्षकों को ही माफ़ किया जाता रहा है तो मुझ बातूनी दर्शक को भी माफ़ कर ही दिया जाएगा. मुझे पता भी है अपने यहाँ बौद्धिक जगत में जो आसानी से मिल जाए वह माफ़ी ही है.खैर, जब मैंने फ़िल्म देखना शुरू किया तो जैसे ही अरू(यही बच्चा कहानी के केंद्र में है) को देखा तो मुझे झट से लगा कि यह बच्चा अब पूरी फ़िल्म में असाधारण व्यवहार करेगा. अपनी विलक्षणताओं से सबको चकित करेगा. मेरे ऐसा सोच लेने की वजह आप सोच सकते हैं कि मुझे थोड़ा जल्दी ही हमारे समय के महत्वपूर्ण अत्यंत लोकप्रिय कथाकार उदय प्रकाश की मशहूर कहानी 'मैंगोसिल' जिसे पढ़ लेने के बाद शायद ही कोई भूल पाए याद आ गई होगी.
लेकिन जैसे ही फ़िल्म आगे बढ़ी कहानी 'मैंगोसिल' एक कौंध सी तिरोहित हो गई. फ़िल्म का बच्चा जैसा कि उसे होना चाहिए लाचार, असमर्थ ही रहा आया अंत तक. अरु की ज़िद कि अपने लब्धप्रतिष्ठ सफल राजनेता पिता को नहीं बताना कि मैं आपका ही बेटा हूँ जिन विवशताओं से गुज़रती है वे बड़ी कारुणिक हैं. इस त्रासदी को जो सहने लायक बनाए वह मां द्वारा अपना ली गई युक्ति भी कि किसी की हिचकी नहीं बनना बड़ी मार्मिक है. एक बच्चा, वास्तव में बीमार बच्चा इसे जिस खुद्दारी से अपनाता है वह फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता मुझे लगी. पिता जो कदाचित आदर्श नेता है एक नि:शक्त बच्चे के इस प्रण को भांप तक नहीं पाता. यहीं फ़िल्म का गीत हिचकी हिचकी..... भीतर तक छू जाता है. कह सकते हैं कि इस बिंदु पर एक स्त्री अपनी ममता, स्वावलंबन के बल पर पुरुष को बराबरी से जवाब देती है, प्रतिरोध का उदाहरण बनती है.
यहीं मुझे फिर एक कहानी याद आती है. प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति की कई साल पहले लिखी गयी कहानी सिरी उपमा जोग. इस कहानी में भी एक लड़का है जो शहर दूसरी शादी कर लेने वाले पिता से मिलने आता है. उसके हाथ में एक चिट्ठी है मां की. माँ ने अपनी मुसीबतों के हवाले से चिट्ठी में जो लिखवाया है वह संक्षेप में यह है कि अब अपने इस बेटे की ज़िम्मेदारी सम्हाल लें, बेटी भी व्याह के काबिल हो गई है. यहाँ गाँव में मैं इस लायक नहीं रही अब. कमाल यह है कि यह चिट्ठी बेटा पिता को ही देता है सौंतेली माँ या उसके बच्चों के द्वारा बहुत पूछने पर भी मुह नहीं खोलता. इस कहानी में बेटे को देखकर चिट्ठी पढ़कर बाप केवल परेशान होता है, पिछले दिन याद करता है और बेटे को खाली हाथ ही लौट जाने देता है. बच्चे को कुछ नहीं मिलता. प्यार, अधिकार तो दूर अपने पिता का आत्मीय परिचय भी नहीं. इस तुलना में अरू का फ़िल्मी पिता काफ़ी भला मानुष है. फ़िल्म की कहानी को आदर्शवादी, सुखांत निर्वाह जो मिला है.
यहाँ तक जब बात आ ही गई है तो मैं साहस करके कहूँ फ़िल्म की कहानी दरअसल शिवमूर्ति की ही कहानी है. यहाँ यह क़तई न समझें कि मैं नकल या चोरी का सस्ता आरोप लगाने जा रहा हूँ. बस पा की कहानी में जो औरत है वह बदली हुई है. आज़ादी के इतने दिनों में औरते ही हैं जो कुछ कुछ बदली हैं. समाज और पुरुष वैसे ही हैं. मैं जब कह रहा हूँ कि पा की कहानी शिवमूर्ति की ही कहानी है तो साथ में यह भी कह रहा हूँ कि सिरी उपमा जोग भी शिवमूर्ति की ही कहानी नहीं भारतीय समाज की कहानी है.
हमारे यहाँ ऐसे कितने बच्चे हैं जिन्हें अपने बाप का पता नहीं? अब यदि किसी बच्चे की ज़िंदगी से पिता की पहचान तक घट जाए तो उसे कौन सी बीमारी हो जाएगी कोई नहीं बता सकता. मुझे पूरी फ़िल्म में यही लगता रहा कि अरू की अजीबो गरीब बीमारी फ़िल्म में कहानी को बढ़ाने का उपकरण है. इसके आधुनिक संदर्भ भी हैं इसलिए सब सटीक बैठते हैं. फ़िल्म वास्तव में उन बच्चों के लिए है जिनकी ज़िंदगी में पिता की पहचान नहीं. और माँ का कोई वजूद नहीं. कभी-कभार कुछ माँएं जो यह गुहार लगाती भी हैं कि अमुक रईस या नेता मेरे बेटे का पिता है तो उनपर लोग कैसे हँसते हैं; वे कैसे हारकर अपने अँधेरों में लौट जाती हैं सबको पता है.
सच मानिए मुझे यह फ़िल्म इसी रूप में भली लगी. चूँकि यह फ़िल्म समाज के काम की है इसलिए इसके नायक नेता का आदर्शवादी होना किसी तरह की सीमा का परिचायक नहीं है. अंतत: कुछ अच्छा करनेवालों को आदर्श का दामन पकड़ना ही पड़ता है. रही बात अमिताभ बच्चन और विद्या बालन की तो ये दोनों पूरे वही लगे जो रोल किया है. अभिनय के बारे में इससे ज़्यादा अभी मैं नहीं कह सकता. फ़िल्म देखने की पहली गुज़ारिश मैंने शिवमूर्ति जी से की थी. आपसे भी करता हूँ.
शशिभूषण

