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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

सेब का लोहा:गीत चतुर्वेदी

गीत चतुर्वेदी की यह कविता मुझे प्रिय है.इससे एक याद भी जुड़ी हुई है.

जिन दिनों मैं इंदौर में था एक दिन कथाकार सत्यनारायण पटेल ने कहा कि मैं गीत से मिलने आईआईएम जा रहा हूँ चलना हो तो चलो.मैंने कहा कि आप मुझे ले चलें यह बड़ी खुशी की बात होगी,चलिए.

हम बाईक से आईआईएम पहुँचे जहाँ गीत चतुर्वेदी दैनिक भास्कर के एक प्रबंधन संबंधी प्रशिक्षण के सिलसिले में ठहरे हुए थे.मेरी उनसे यह पहली भेंट थी.हम लोगों में काफ़ी बातें हुईं.गीत चतुर्वेदी से मिलने के काफ़ी पहले से मैं उन्हें पढ़ता रहा हूँ.मिलकर मेरी वह धारणा पुष्ट हो गई कि गीत जी लेखन के क्षेत्र में काफ़ी तैयारी से आए हैं.जैसा कि कई बार आगे चलकर महत्वपूर्ण समझे जाने वाले लेखकों के साथ भी हुआ है गीत ने किसी रौ में लिखना शुरू नहीं कर दिया होगा.

उस दिन जो बातें हुई उनके केंद्र में यही था कि लेखन एक सुनियोजित,दीर्घसूत्रीय काम है.सफल लेखक पहले से इस बात के प्रति भी तैयार होता है कि भविष्य में कैसा रेसपांस मिलने वाला है.कौन कौन सी शुरुआती प्राथमिकताएँ निर्णायक साबित होती हैं.ज़ाहिर है हम प्रसिद्धि के किन्हीं चालू टाइप नुस्खों पर बात नहीं कर रहे थे मेरे अनुभव में यह लिखे जा रहे के संबध में गंभीर अकादमिक बातें थीं.
सत्यनारायण पटेल अपनी परिचित ज़मीनी जिदों के साथ थे.गीत अपने निरंतर अद्यतन होते रहनेवाले विजन के साथ.उन्होंने अपने अध्ययन,मेधा तथा जल्द ही हावी हो जानेवाली तर्क पद्धति से मुझे जितना चौंकाया उतना ही संतुष्ट भी किया.मैंने शुरू में ही कहा था गीत जी आपको पढ़ते हुए लगता है कि आपके पास लिखने को काफ़ी है.

बात आगे बढ़ी तो आजकल के अत्यंत सफल,लोकप्रिय अंग्रेज़ी लेखक चेतन भगत के बारे में उन्होंने बताया कि इस लेखक ने अपने उपन्यास लिखने के पहले बाक़ायदा सर्वे करवाये कि कैसे उपन्यासों को लोगों ने अब तक पसंद किया है,उनकी खास बातें क्या थीं?इस संबध में निकलकर आयीं दस प्रमुख बातों को केंद्र में रखकर चेतन भगत ने अपने प्लाट बुने.सबसे सफल यह युक्ति अपनाई कि उपन्यास सुखांत ही रखे.हिंदी का लेखक ऐसी तैयारी के साथ अपना काम क्यों नहीं कर सकता?.फिर उन्होंने नाम लेकर कहा कि हिंदी के कई अच्छे लेखक इसी व्यावसायिकता के साथ लिख रहे हैं.हमें उन्हें मिशनरी या समाजसेवक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए.मैं तब गीत के इस फैसला देनेवाली बात से असहमत था.उन्हें भी अंदाज़ा होगा ही कि यह स्थापना कितनी विवादास्पद हो सकती है.पर इसकी सच्चाई से इंकार जितना मुझे तब था अब नहीं रह गया है.और लगातार कम ही हो रहा है.

सेब का लोहा, उसी रात डॉ.जया मेहता के घर में मैंने गीत जी से सुनी थी.वहाँ मौजूद थे रवींद्र व्यास,विनीत तिवारी,उत्पल बैनर्जी,कृष्षकांत निलोसे और सारिका.कविता सुनते सुनते ही दिलो-दिमाग़ में बैठ गई थी.आप गौर करेंगे कि इस कविता के कहन में सूक्तियों की अंतर्धारा है.जब कवि इतनी अपनी और गाढ़ी पंक्तियाँ कहने लगता है तो उसकी बातों में यह सोचकर भरोसा पैदा होता है कि दुनिया देखने की यही सिद्ध दृष्टि आज होनी चाहिए.पाठक का यह सोच अगर कवि के बहाने साथ साथ विकसित हो यानी वह पहले से मानकर न चल रहा हो कि कवि महान है हमें सिर्फ़ हृदयंगम करना है तो इसे आगे बढ़ना ही है.

इस कविता की पहली ही पंक्ति अपनी आत्मीय व्याप्ति में हमें मुरीद बना लेती है.यह जितनी सच है उतनी ही बेधक है.पहली ही लाइन से इस तरह शुरु होने वाली कविताएँ कम हैं.यह एक व्यक्ति की कविता है.कविता में जिसके बारे में खुलकर कह दिया गया है पत्थर आग पानी और जानवर अभिनय नहीं जानते/मैं जानता हूं

यह व्यक्ति ऐसे समय में है जिसमें लोग किधर के हैं यह तय करना कठिन हो गया है.सर्वग्रासी देशकाल में जहां बनायी हुई परिस्थितियाँ हर तरह की निष्ठा पचा लेती हैं यह भीतर ही भीतर प्रतिबद्ध होना चाहने पर हार रहे व्यक्ति के आत्मस्वीकार की कविता है.यह व्यक्ति फिर भी आत्मकेंद्रित होने से बचा हुआ है.जब कविता का मैं अपने बारे में कहता है-मैं भय विनाश भूख और त्रासदी से निकला हूं/सिर्फ़ एक अनुभव से नहीं समझा जा सकता जिन्हें.तो व्यक्ति की भीतरी टूटन सभ्यता के उस हिस्से का एक्स रे बनकर दिखती है जहाँ इंसान जनमता और मरता है.

व्यवस्था के सामने व्यक्ति की इससे बड़ी असमर्थता क्या होगी कि-सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाक़ू नहीं बनता.व्यक्ति के द्वंद्वों को अनुभूतिपरक सफलता के साथ सामने लानेवाली यह कविता वैयक्तिकता की हामी नहीं है.यह वास्तव में उस व्यक्तिवाद के खिलाफ़ है जो सामूहिकता से खुद को पृथक कर लेने के अपराधबोध को आत्मविश्लेषण से कम करता है.अपनी आत्मकेंद्रीयता को भी लड़ाई का मोर्चा समझने की भूल करता है.पलायन कोई पक्ष नहीं होता बल्कि एक तर्क होता है.व्यक्ति कितने पलायन-तर्कों से भरा हुआ है जिनमें से ज्यादातर उसके ही गढ़े हुए हैं आप इस कविता में नोट कर सकते हैं.फिर भी अपनी परिणति में यह बचे हुए,जूझ रहे व्यक्ति की कविता है.

कविता का यह कथन कि शरीर में लोहे की कमी है सड़कों और खदानों में नहीं/मैं इसीलिए अपने हिस्से का सेब कभी नहीं फेंकता.सबमें मौजूद पर स्थगित निर्णय की ओर इशारा करता है.सेब का लोहा बड़ा व्यंजक प्रतीक है.पूरी कविता कई बार पढ़ने का जैसे आमंत्रण देती है.


गीत चतुर्वेदी कविता के मौलिक,रचनात्मक अध्येता भी हैं.इस अर्थ में कि उन्होंने कुछ यादगार कविताओं के संप्रेष्य को पंक्तियों समेत पिरोकर कथा स्थितियाँ बुनी हैं.इस कविता को पढ़ते हुए आप कल्पना करें कि किसी नहीं लिखी गई लंबी कहानी का फ़कीर अपने होने और समझे जाने के फर्क को स्पष्ट करता हुआ अपना पक्ष रख रहा है.


सेब का लोहा


पत्थर भी अपने भीतर थोड़ी मोम बचा कर रखता है
ख़ुद आग में होता है बुझ जाने का हुनर
जब वह अपने आग होने से थक जाती है
गिरते हुए कंकड़ को अभय दे
अंगुल भर खिसक जाता है समुद्र एक दिन
सबसे हिंसक पशु की आंखों की कोर पर एक गीली लकीर
धीरे-धीरे काजल की तरह दिखने लगती है
सबसे क्रूर इंसान भी रोता है
और प्रार्थना में एक दिन उठाता है हाथ

पत्थर आग पानी और जानवर अभिनय नहीं जानते
मैं जानता हूं

मुझे सेब की फांक पर उग आया लोहा कह लो
या पहिए और पटरी के बीच से कभी फ़ुरसत से निकली चिंगारी
या तमाम माफि़यों से भरी वह प्रार्थना जिसका मसौदा सदियों से अपनी जेब में रखते आया
पढ़े जाने के माकूल वक़्त का इंतज़ार करते

जो कुछ छोड़े जा रहा हूं
क्‍या उसके बदले सिर्फ़ एक माफ़ी काम की होगी
जिसे पढ़ना होगा पुरखों नहीं संततियों के आगे
बताना होगा कि मेरी हथेलियां बहुत छोटी थीं
छिटकते समय को सहेज लेने के वास्ते

सिर्फ़ एक रास्ता काफ़ी नहीं इस जगह से घर को
सिर्फ़ एक जड़ से नहीं मिला छतनार को जीवन
सिर्फ़ एक बार नहीं बना था परमाणु बम
सिर्फ़ एक अर्थ से नहीं चलता रोज़गार शब्‍दों का
सिर्फ़ नीयत ही काफ़ी नहीं होती हर बार
बिना चले गठिया का पता नहीं चलता

मैं भय विनाश भूख और त्रासदी से निकला हूं
सिर्फ़ एक अनुभव से नहीं समझा जा सकता जिन्हें
सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाक़ू नहीं बनता

कोई आता है हांक लगाता पुकारता मेरा नाम
एक उबासी से करता हूं उसका स्वागत फिर ढह जाता हूं
एक दिन वह बना लेता है उपनिवेश
मेरी देह और दिमाग़ के टू-रूम फ़्लैट में
फिर छिलके-सा उतार दिया जाता हूं
किसी आरोप या बिना किसी आरोप के
मेरी राजनीतिक उदासीनता राजनीतिक नासमझी में बदल जाती है
हर इच्छा एक नागरिक उदासीनता की तरफ़ ले जाती है

शरीर में लोहे की कमी है सड़कों और खदानों में नहीं
इसीलिए अपने हिस्से का सेब कभी नहीं फेंकता मैं
थोड़ा-सा मनुष्य भी है मुझमें
जो सदियों पुरानी धुनों पर गाता है भ्रम के गीत

कोई और रहता है मेरे भीतर

जो लिखता है कविता या गाता है
जब वह मेरे सामने आता
मिलता नहीं कोना जहां अकेले बैठ थोड़ी देर सचमुच रो सकूं मैं
अभिशप्‍त भटकता हूं
जैसे लिखे जाने से पहले खो गई किसी पंक्ति की तलाश में
तभी झमाझम बरसती हैं स्मृतियां
भूल जाता हूं पिछली बार कहां रख छोड़ा था छाता

शब्‍द के उच्चारण या नाद से निकली सृष्टि में
क्‍यों बार-बार भूल जाना कि
इतिहास से पहले भी जीवन था
बोली जाने वाली भाषा से पहले समझी जाने वाली
उससे भी पहले एक आंसू उससे भी पहले एक पीड़ा
उन्हीं के अवशेषों की भाषा लिखता हूं

मुझको पढ़ना बार-बार पढ़ी जा चुकी किताब-सा आसान नहीं
मेरा हर व्यवहार एक विचार है
हर हरकत एक इशारा
मैं आधी समझी गई पंक्ति हूं
अभी आधा काम बाक़ी है तुम्‍हारा.
(आलाप में गिरह संग्रह से)

-गीत चतुर्वेदी

गुरुवार, 25 मार्च 2010

शंभु गुप्त की कविता:उदाहरण

अच्छे कवि के लिए आलोचकीय विवेक संपन्न होना जितना आवश्यक है कवि का आलोचक हो जाना स्वयं के कवि-कर्म के लिए उतना ही बाधक है.ऐसा हम हिंदी के उन चोटी के आलोचकों को देखते हुए कह सकते हैं जो अपने शुरुआती दौर में कवि भी रहे.पर धीरे-धीरे उनका कविता लिखना छूट गया.अब वे कविताएँ शोधार्थियों,विशेषांक के संपादकों या जीवनीकारों के लिए ही महत्व की बचीं हैं.स्वयं का अत्यधिक रचना-सजग होना भी रचनाकर्म से दूर करता है या ठीक ठीक कहें तो रचनाकार को स्थगित करता है क्योंकि सिर्फ़ विश्लेषण,बौद्धिकता और स्मृति के सहारे कविता,कहानी लिखने को विवश हो जाना असंभव है.उसके लिए थोड़ी सी मासूमियत और ढेर संवेदनशीलता बचाये रखना ज़रूरी होता है.खैर यहाँ हमारा मक़सद आलोचकों के अकवि हो जाने के कारणों की पड़ताल करना नहीं है.बल्कि एक समर्थ आलोचक के कवि होने को आपसे बाँटना है.

शंभु गुप्त जी समकालीन हिंदी आलोचना के जाने-माने हस्ताक्षर हैं.पिछले कुछ समय से लगातार कहानी आलोचना के चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में सक्रिय हैं.मुठभेड़ करना और आलोचना के रास्ते में किसी की परवाह न करना मेरे जानने में उनकी खासियत है.यदि आप इसे आलोचक होने की ही शर्त मानते हों तो इतना अवश्य जोड़ दूँ वे यह शर्त बा-खूबी पूरी करते हैं.इस बारे में खुद की परवाह भी नहीं करते हुए मैंने उन्हें देखा है.मौक़ा था देवास में प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति जी के कहानी पाठ का.शंभू जी कहानी सुन चुकने के बाद रूमाल लेकर बाथरूम की ओर भागे.सार्वजनिक तौर पर कहा भी शिवमूर्ति भाई तुम बहुत रुलाते हो...लेकिन उसी कहानी केसर कस्तूरी पर जब बोले तो इस प्रभाव को जिससे सभी अभिभूत थे कोई मूल्य नहीं दिया.बल्कि इसी भावप्रवणता को आधार बनाकर कहानी को कमज़ोर सिद्ध किया.मेरे लिए यह विचलित करनेवाला रहा.मैंने शंभु जी से अनधिकार पूछा भावुकता अगर कहानी का कमज़ोर पक्ष है तो आप यह जानते हुए क्यों भावुक हुए?उन्होंने बलपूर्वक इसके पीछे अपने संवेदनशील मनुष्य होने को कारण बताया.साथ ही कहा-लेकिन मैं आलोचक होने के नाते जो तय करता हूँ उसे अपनी कमज़ोरियों,पसंद-नापसंद से भी बचाने की कोशिश करता हूँ.

मैं काफ़ी समय से शंभु गुप्त जी को पढ़ता सुनता रहा हूँ.फ़ोन पर बेतकल्लुफ़ लंबी लंबी बातें भी होती हैं.पर हाल ही में उन्हीं से पता चला कि वे कविताएँ भी लिखते हैं.संकोच तो करते ही हैं धीरे से बताया कि आलोचक रहते छपवाने से डरता भी हूँ.मुझे उनकी कई बातों की तरह यह डर काफ़ी मानीखेज लगा.मैंने यह सोचकर अपना आग्रह रखा कि चूँकि मेरे ब्लाग के पाठक अधिक नहीं होंगे इसलिए ज्यादा डरने की ज़रूरत नहीं.वे मान गए.कुछ कविताएँ भेजीं.जिन्हें संदीप पाण्डेय ने यूनीकोड में बदलकर यहाँ छापने लायक बनाया.उन्हीं में से यह एक कविता आप सब के लिए.इसके बारे में आप ही सोचें.



उदाहरण

विचारहीनता की इस दुल्हन-सी सजी नाव में
मस्ती है जादू है निखालिस आनन्द है मांसलता है
और अन्यमनस्कता है

आयातित कपड़ों और गहनों और सपनों में लकदक यह दुल्हन
मारू है
जो देखे वही डोल जाए

ज़िन्दगी में आगे बढ़ते हुए एक दिन मैंने पाया
यह विचारहीनता निर्विकल्प है

इसकी सीढ़ियाँ चढ़कर मैं वहाँ पहुँच जाऊँगा
जो कभी मेरे सीमित एजेंडे में नहीं रहा

इससे आँखें चार होते ही मैंने पाया
मैं तो बहुत पिछड़ गया हूँ
अब जल्दी-जल्दी मुझे मंज़िलें फलाँगनी चाहिए.

ऐसी ही एक मंज़िल फलँगते हुए
जब मेरे पैरों के नीचे
कुछ मरणासन्न लोग आए जो कभी मेरे स्वजन थे
और जो बचा लेने की गुहार मचाए थे

मैंने उनकी तरफ़ उदात्त निगाहों से देखा
और हाथ झाड़ते हुए बोला-
ज़िन्दगी और मौत पर भला किसका वश है!

इस तरह एक के बाद एक सीमाएँ तोड़ते हुए
विचारहीनता के गर्भगृह की ओर मैं अग्रसर था
मेरी आँखों में सितारे जगमगा रहे थे

सारे अवरोध पार करते हुए
एकदम स्मृतिविहीन और मुक्त होकर
जब मैं अन्तिम पड़ाव पर पहुँचा
मैं क़तई भौंचक नहीं था

दरअसल अब मैं एक भिन्न संसार में था
वहाँ इतनी ज़्यादा रौशनी की चकाचौंध थी कि
निरावृत आँखों से उसे देखा नहीं जा सकता था
अतः सबसे पहली उपलब्धि मुझे यह हुई कि मैं
नितान्त दृष्टिहीन हो गया

उसके बाद क्या-क्या हुआ
मुझे नहीं मालूम
मुझे सिर्फ़ इतना महसूस होता रहा कि
वे मुझे हिदायतें देते रहे और तदनुसार
मैं सक्रिय होता रहा

फिर उन्होंने मुझे अपने अनुयायियों की स्थायी सूची में
पंजीबद्ध कर लिया और एक तमगा मेरे सीने पर टाँग दिया
मैंने सुना कि अब वे मुझे एक उदाहरण के रूप में
विपक्ष के सामने पेश करेंगे।

मित्रो!
मुझे अफ़सोस है कि
तुम्हारे साथ संवाद की
अब मुझे कोई
ज़रूरत नहीं रही.
-शंभु गुप्त
अलवर,राजस्थान

बुधवार, 27 जनवरी 2010

मेरी ज़िद

गाँव से रीवा आए हम सुनते ही थे कि कोई आशीष त्रिपाठी हैं.बड़े मेधावी हैं.बी.एस.सी के बाद हिन्दी में एम.ए. करने गए.एम.ए.किया ही नहीं यू जी सी के जे.आर.एफ़ भी हुए.नाटकों में खाली पी.एच.डी नहीं कर रहे बड़े शौक और सफलता के साथ रंगमंच से भी जुड़े़ रहे हैं.कवि हैं.रेडियो में काम कर चुके हैं.अच्छा मंच संचालन करते हैं.बड़े बड़े साहित्यकारों से साक्षात्कार करते रहते हैं.प्रसिद्ध आलोचक,संगठक,संपादक कमला प्रसाद के बेटे जैसे हैं.उसी लड़की से शादी की है जिससे प्रेम करते थे.गोष्ठियों में बाक़ायदा पिता को भी सेवाराम जी संबोधित करते हैं.कहनेवालों ने तो ठीक मुँह पर यह भी कहा कि कुछ पिता बेटों से जाने जाते हैं जैसे डा.सेवाराम त्रिपाठी.रीवा में जब तक रहा हर साल विश्वविद्यालय के युवा उत्सव में सुनने में आ ही जाता था कि भई,नाटक तो आशीष के समय होता था .मेरे दोस्त उन्हें आशीष भैया बोलते और उनके हवाले से कहते कि हिंदी फटीचर ही नहीं पढ़ते.बेरोज़गारी के इस दौर में आशीष भैया ने प्रोफ़ेसर होकर क्षेत्र को तथा खुद को सिद्ध किया है.मैं जब शैलेश और मुकुल के साथ आशीष त्रिपाठी से मिला तो मन ने बहुत सी बातों की तस्दीक कर दी.यह भी मार्क किया तार्किक हैं आशीष जी.मिलनसार भी.अगर सब कुछ इसी दिशा में चलता रहा तो अच्छे आलोचक होंगे.आजकल काफ़ी दूर आ जाने के कारण आशीष को भैया कहनेवाले दोस्तों से मैं मिल नहीं पाता.उन पर फुर्सत से बात भी नहीं हो पाती.पर कुछ नये दोस्तों से सुनता रहता हूँ.आजकल सबकुछ है आशीष जी के पास.अच्छी नौकरी.अच्छी जीवन साथी,नामवाला शहर.बड़े बड़े संबंध.इधर नामवर जी के अच्छे साक्षात्कार करके महत्वपूर्ण काम किया आशीष सर ने.बी एच यू में आशीष सर बहुत अच्छा पढ़ाने वालों में हैं.बहुत ही ज़रूरी किताबों के संपादन में जुटे हैं.कविता की किताब आने ही वाली है.काशीनाथ सिंह जी जैसे बड़े और पारखी लेखक उन्हें प्यार करते हैं आदि आदि.यह कविता इन्हीं आशीष त्रिपाठी की हैं.आपसे अनुरोध है कि मेरी यादनुमा बातों पर ना जाएँ और इसे ध्यान से पढ़ें.

ज़िद है
कि चमचमाती हुई स्वर्णिम सड़कों पर चलकर भी
पहुँचुगा वहीं
जहाँ पहुँचाती रहीं मुझे पगडंडियाँ
जब बाज़ार मेरे भीतर
बहुत सारी चीज़ों की कर लेगा निशानदेही
बिक सकने वाली वस्तुओं के रूप में
तब भी
मेरी कोई दुकान नहीं होगी
आचार-संहिताओं के बीच
जीवित रखूँगा
थोड़ी सी बचपन की जगह
जगह भटकने की
पागलपन की,जुनून की थोड़ी सी जगह
मंदिर जाने की जगह
किसी विस्मृत सा लोक कवि का
पुराना प्रेम गीत गाउँगा मैं
जब दुनिया के उलझे हुए तारों को
सुलझाने की बहस में डूबे होंगे बौद्धिक
मैं दूर से आते गीत का
बचा हुआ हिस्सा सुनने
प्रवेश कर जाऊँगा सामने फैले अँधेरे में
मेरे घर वे सब आ सकेंगे
जिनकी आँखों में
बच्चों को प्यार करने की ललक बाक़ी होगी
दुर्योधनी और हिटलरी ज़िदों के सामने
मनुष्यता के तने हुए सर की तरह
खड़ी मेरी ज़िद रहेगी
जहाँ मैं हूँ
मेरे साथ होगी.

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

आज भी खुला है अपना घर फूँकने का विकल्प

(यह लंबी साँस की कविता दिनेश कुशवाह सर ने मेरे आग्रह पर भेजी.अपने पहले रूप में यह वागर्थ के अक्टूबर-09 अंक में प्रकाशित हो चुकी है.उन्हीं की हस्तलिपि में.कविता के पहले ड्राफ्ट और इस रूप में ज़्यादा अंतर नहीं है पर यह कहना ही होगा कि यह पहले से अधिक व्यापक,ज़्यादा बेधक और बिल्कुल अचूक हो गयी है.चूंकि दिनेश कुशवाह एक ही कविता को सालों लिखते हैं.किसी हद तक संपादित करते रहते हैं इसलिए यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि अब यह अंतिम रूप में है.कविता ने मुझे भी बहुत उद्वेलित किया.इसे लेकर जैसा स्वागत और निंदा कवि के हिस्से आए हैं उसके बारे में वे बताते हैं-सबकुछ अभूतपूर्व है.यह सात्विक क्रोध की कविता है.क्रोध अगर सात्विक हो तो खुद पर भी उतना ही टूटता है.निष्कलुष कवित विवेक आत्मालोचन से ही संतुष्ट नहीं होता.वह आत्मोत्थान की नींव भी रखता है.मैं समझता हूँ यह वैसी कविता नहीं है जिस पर वाह वाह किया जाए.सार्थक रचना कहन की सफलता भर नहीं होती.उसके प्रति जवाबदेह भी होना होता है.इस कविता पर बहस होनी चाहिए.साथ ही दिनेश जी को इस कविता के साथ खड़े होने तथा इसकी क़ीमत चुकाने को भी तैयार रहना चाहिए.निश्चित रूप से अब उनके सार्वजनिक कामों,निर्णयों को यहां से भी देखा जाएगा.कथनी करनी की तुलना की जाएगी.ऐसा हुआ भी है लंबे अर्से से क़रीब क़रीब शांत हो चले उनके रचनात्मक जीवन में हलचल पैदा हो गयी है.तारीफ़ और धिक्कार दोनों उन्हें घेरे हुए हैं.एक तरह से यह उनकी पहली कविता है क्योंकि इस महत्वपूर्ण कवि को अब तक निजी प्रेम की संवेदनाओं के कवि के रूप में नितांत सीमित दायरे में देखा जाता रहा है.इस सबने उन्हें ताक़त दी है.दिनेश जी उस कविता को भी पूरी करने में ज़िद के साथ जुट गए हैं जिसे लिखने से वे सचमुच डरते रहे हैं.उम्मीद है आप भी इस कविता पर कुछ न कुछ ज़रूर बोलेंगे-ब्लागर)

उम्र का पहला पड़ाव
जिसे पहले प्यार की उम्र भी कहते हैं
मैंने सबकुछ छोड़कर किया प्यार
और लिखी कविता.

उन दिनों प्यार ही
जीवन की पहली प्राथमिकता थी
कविता उसकी क्षतिपूर्ति
ये तो बाद में पता चला कि
इस ससुरी कविता से
जब न चोला बन सकता है न चोली
तो आप ही बतायें मैं इसका क्या करूँ?

जब चोली से भेंट हुई तो,
चोला ऐसा मगन हुआ कि
चोरों के गिरोह में शामिल होने की अर्जी देने लगा
सिर पर लादकर नून-तेल-लकड़ी.

अपने को ईमानदार चोर घोषित करता हुआ
जब किसी तरह शामिल हुआ चोर-बाज़ार में
तो चोरी की अपनी शर्तें थीं
और चोर की अपनी सीमा
तब जाकर पता चला कि सूर या तुलसीदास
मुझसे अधिक कुटिल-खल-कामी नहीं रहे होंगे
अवसर मिलता तो सब पतितन को टीको हो जाता
हो सकता है कुंभनदास फतेहपुर सीकरी से बैरंग लौटा दिए गये हों
अराजक क़रार देकर.

बहरहाल
मेरी पनहिया कई बार टूटी
पैरों में लुढ़ककर आ गिरी पगड़ी
कई बार
पर मैंने नहीं लिखीं
आत्मालोचन की वैसी कविताएँ.

आज सोचता हूँ कि
मैं अदना सा चोर था
व्यवस्था का चाकर
वे लोग जो पिस रहे थे चक्की में
उनके लिए राजा को गरिआता रहा
और उसकी नर्तकियों की करता रहा मनुहार
भड़वों के पाँव सहलाता रहा.

अगर राजा का तबलची भी हो गया होता
तो तानसेन की पदवी मिली होती
नर्तकियाँ आरती उतारतीं और
भड़वे उस्ताद कहकर तलवे चाटते.

मैं कबीर से पूछने गया
कि क्या करूँ दादा!!
ब्राह्मण से लेकर शूद्र
गांधी से लेकर लोहिया
एम एन राय से लेकर मायावती
सबसे गुहार लगाई
पर जो तब पिस रहे थे चक्की में
आज भी पिस रहे हैं.

अपने को मिलने लगी थी चुपड़ी
पर वो भी खा नहीं सकता
सुगर हो गई है
और छोकरियों के आगे
छछिया भर छांछ पर नाचने में
पहले जैसा उत्साह नहीं रहा.

अब पांड़े और कसाई हो गये
हिन्दू और तुर्कों की राह और बिगड़ गई
तब एक पाहन पूजा जाता था
अब लाखों क़िस्म के पत्थर पूजे जाते हैं
अब ठगनी नैना झपकाती है तो
कालगर्ल बना दी जाती है
राजतंत्र में राजा का बेटा राजा होता था
लोकतंत्र में नेता का बेटा नेता
मंत्री का बेटा मंत्री
राजे-रजवाड़े जननेता.

पचास साल के लोकतंत्र पर गिरी है
वंशवाद,गुण्डागिरी और जाति की गाज
कोढ़ में खाज की तरह कि
अंधे बाँटते हैं रेवड़ी
और चीन्ह चीन्ह कर देते हैं
दुर्योधनों की भीड़ से सभाएँ भरी हैं
मंच से माँ कहते हुए भारत को
रोज ही उसकी साड़ी टॉन रहे हैं दु:शासन
भीष्म,द्रोण और कृपाचार्य
प्रश्न पूछने का पैसा लेते हैं
एकलव्यों के अंगूठे कटते रहें तो
कृष्ण को कोई शिकायत नहीं है
किसी भी समय में इतने धृतराष्ट्र नहीं थे
कारिंदे जो सबसे बड़े चोर हैं वे सबको चोर समझते हैं
स्वाधीनता की दुर्गति तो देखिए
दलाली का इतना बड़ा तंत्र कभी नहीं था
मंजिल उन्हें मिली है
जो सफ़र में कहीं नहीं थे.

कबीर वितृष्णा से मुस्कुराए,कहा-
तुम इस युग के नये ब्राह्मण हो
अपने को अदना कहने में भी
झलकता है तुम्हारा अहंकार
दूसरे की बुनी चादर ओढ़कर
कबीर नहीं बना जा सकता
तुम क्या वाक़ई मेरे पथ पर चलना चाहते हो?
तुम क्या बनोगे कबीरपंथी
जब कबीरपंथी हो गए ब्राह्मण
कम्युनिस्ट हो गए कांग्रेसी
समाजवादी हो गए भाजपायी
ब्राह्मण हो गए बसपायी
रामनाम लेकर तर गए कसाई
यह फिर नये बहाने से
प्रजाओं की तलाश है
समझे प्रोफेसर मध्यवर्गायी!

जाति से ऊपर उठ भी जाओ
तो भारत में अपनी जाति से उबरना
बहुत कठिन है
तुम्हे तो अपनी जाति तब याद आती है
जब कोई उस पर हिकारत से अँगुली उठाता है.

मैं तो कभी नहीं भूला कि
बनारस का जुलाहा हूँ
जबकि मुझे बाभनी का बेटा बताया गया था
पर बताने से होता क्या है इस देश में
कर्ण को भी तो कुंती का बेटा बताया गया था
और मेरे जन्म के पहले से ही
ऋषियों की एक लंबी फेहरिस्त है
शूद्रा माँओं से जन्मने की
तो बताने से कुछ नहीं होता
होता है इससे कि बताने वालों के
कितने काम के हैं आप?
यहाँ माँ से नहीं बाप से तय होती है जाति

जाति धर्म सत्ता के जो थे सरताज
वही हैं आज भी
कुशवाहा जी कहाँ हैं आप?
जाइए-कामरेड ज्योति बसु से पूछिए कि
उनके मंत्रिमंडल में युगों तक
मंत्री क्यों नहीं बना एक भी चर्मकार?
और इंदिरा-सोनिया से पूछिए कि
उनके यहाँ बना भी तो
चमटोली का क्या बना दिया?

मेरे यहाँ आते हैं कभी-कभी
पंडित हजारी प्रसाद,बाबा नागार्जुन
ठाकुर विश्वनाथ प्रताप
कहते हैं कुछ करना चाहते थे हम भी
पर कर नहीं सके बच्चों का विवाह
जाति से बाहर.

आप तो हैं वर्ग की कक्षा के छात्र
वर्ण की मनोहरता लक्ष्मण बंगारू के आका
हिन्दू संत बनिया सम्राट अशोक सिंहल से पूछिए
कि अयोध्या में बन रहे राम मंदिर का
कौन होगा महंथ?
किस जाति का होगा पुजारी?
बताइए न कल्याण सिंह जी
जी! उमा भारती!
या आप ही बाबू कांशीराम?
जाति क्यों है कुछ लोगों के लिए सोने का तमगा
जिसे वे सीने पर सजाये
छाती फुलाये घूमते रहते हैं
और जाति कुछ लोंगों के लिए
क्यों है सफेद कुष्ठ का दाग़
जिसे वे हर घड़ी छिपाते फिरते हैं
आखिर सरकार
क्यों नहीं घोषित करती जाति को राष्ट्रीय शर्म
और अंतर्जातीय प्रेम विवाहों को राष्ट्र-सम्मान.

यह पंडित नेहरू का लोकतंत्र है
और पण्डित राहुल गांधी का सुराज
जहाँ देखो तो कम मजे में नहीं हैं
मुलायम,लालू परसाद या रामविलास पासवान
समझे कि नहीं समझे कुछ
यही कि अलख नहीं है पिया जो बोले सो निहाल.

आदमी से प्रेम हो या देश से
प्रेम तब भी खाला का घर नहीं था
और आज भी खाला का घर नहीं है
दरअसल मैं होऊँ या तुलसीदास
गालियाँ दोनों ने दी हैं
जी जलने पर
पर लिखा है प्रेम पर.

तब लिखने पर खाल खींचकर
भूसा भर दिया जाता था
हाथी के पैरों तले कुचलवा देना थी आम बात
मुझे तो जल समाधि दे दी गयी थी
दो चार डंडा तो पा गये बाबा तुलसी भी
पर उनके पास सुविधा थी
विश्वनाथ मंदिर में महादेव जी से
सही कराने की
जैसे आज सुविधा है आलोचक पटाने की
या काशी के डोम के घर
शंकराचार्यों के जिमाने की
दोनों दो बातें हैं परंतु एक ही राह है
स्वर्ग में जाने की.

अपन तो ठहरे धुनिया-बुनिया बंगा
बुद्धू-लुच्चा-नंगा
और आज इसलिए जिन्दा छोड़ दिये गए हैं
कि हम वोट हैं
नेता अब लोंगों को कहाँ मानते हैं आदमी
सारी जनसंख्या को वे वोट समझते हैं.

ब्राह्मण के पास मन(शास्त्र) है
टाकुर के पास तन(शस्त्र) है
बनिया के पास धन(तंत्र) है
नेताओं के पास है जाति
और जाति को उनने वोट में बदल दिया है
इसलिए आज एक भी
नेता नहीं है जाति के ख़िलाफ़.

एक बात जान लो
आँच साँच पर ही आती है
झूठ का कुछ नहीं बिगड़ता
और जाति है सहस्त्राब्दियों का सबसे बड़ा झूठ
जो सच से बड़ा हो गया है.

फिर सुरक्षित ढंग से जियो जीवन
या करो प्रेम
दोनों ही होंगे बेस्वाद
भले लोग महात्मा को कहते थे बनिया-बक्काल
पर यह सब जानते हैं कि
बापू के मुंह में राम था
बगल में छूरी नहीं थी
आज भी गवाह हैं वरवर राव कि
कविता करता था कबीर
पर उसके जीवन और कविता में दूरी नहीं थी.

वरना किसे नहीं दिखता
किसानों की आत्महत्या और मर-मरकर जीना
पुलिस की गोली और आदिवासियों का सीना
सलवा जुडूम से संतोष नहीं हुआ
तो भूख के खिलाफ़ लगाएँगे सेना.
न जाने कब इस देश में दुबारा
होंगे गौतम बुद्ध,राहुल सांकृत्यायन,भगत सिंह,
चारू मजुमदार,अम्बेडकर और मोहनदास.

कुहासा घना है आज भी
चक्की में पिस रहे लोग छटपटाते हैं
पर अपनी लुकाठी लेकर चलने
और अपना घर फूँकने का विकल्प
आज भी खुला है.
-दिनेश कुशवाह