बुधवार, 15 मार्च 2017

गणतंत्रिये

मुझसे भी लोग पूछने से नहीं चूकते। आज एक गणतंत्रिये ने भी पूछ लिया
आप तो नौकरी करते हैं फिर कैसे लिखते रहते हैं? दिक़्क़त नहीं आती?
मैंने कहा- दिक्कत तो आती ही है। समय कम मिल पाता है। सोचता हूँ दिन रात पढूं, दिन रात लिखूं, गला दुखने तक बहस करूँ और घोड़े बेंचकर सोऊं। लेकिन हो नहीं पाता।
मैं वो बात नहीं कर रहा। मेरा मतलब है कोई क़ानूनी अड़चन, नियम संबंधी बाध्यता? कोई शिकायत कर दे तो?
अरे! मैं तो यह चाहता ही हूँ। हा हा..ज़रूरत पड़ेगी तो किसी वकील से पूछ लूंगा। उसकी वकालत चल जायेगी। मेरा लेखन।
मेरा मतलब है आपके बॉस ने कभी आपको टोका नहीं? आजकल अफसर नज़र रखते हैं।
भई, मैं न लिखने की नौकरी नहीं करता। मास्टर हूँ। पढ़ना लिखना मेरा काम है। मैं नहीं लिखूंगा पढूंगा तो क्या आढ़तिये पढ़ेंगे? गौरक्षक लिखेंगे?
गण तंत्री भाई का मुंह खुला रह गया। लेकिन उन्होंने चांस पूरा ले लिया। बोले
आपने सब सही कहा। लेकिन ये जो आपने अभी बीच में गौरक्षकों का अपमान कर दिया मैं उसकी कह रहा था?
मैंने कहा - मांस की जीभ है, इंसान का दिल है लोहे की रेल नहीं कि ताव न खायेगी। आप ही कहिये कोई बुरा ही मानने घूमे तो क्या कर सकते हैं?
गणतंत्री भाई ने जोर का ठहाका लगाया, हाथ मिलाकर चल दिए।
मैं खिसियाकर रह गया।

-शशिभूषण

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