बुधवार, 15 मार्च 2017

बदलाव

संपत राम जाड़े की ऋतु में बस से लौटते हुए रास्ते में रोज़ अमरुद खाते थे। उनकी बस बीच में पड़नेवाले एक क़स्बे के छोटे बस स्टैंड पर चलते चलते रुकती थी। बस ठिठकती गुज़र जाती उसके पहले ही संपत राम 10 रुपये का नोट निकाल कर हाथ में रख लेते थे। खिड़की से रुपये ठेलेवाले को पकड़ा देते। इशारे के आधार पर वह दो अमरुद छांटकर उन्हें दे देता। संपत राम बेचनेवाले को अमरुद वापस करते- काटकर दे दो। बेचनेवाला पूछता- मसाला लगा दूँ क्या? संपत राम कहते- लगा दो। यह रोज़ मानो किसी जैविक नियम के अधीन अनिवार्य रूप से होता था।

लेकिन जैसे ही संपत राम अमरुद खाना शुरू करते अफ़सोस से भर जाते। बुदबुदाकर कहते- मसाला नहीं लगवाना था। मसाला बिलकुल ख़राब है। नमक ही नमक और लाल मिर्च। मसाला, अमरुद को बदमज़ा कर देता है। संपत राम का यह सोचना और तय करना कि कल मसाला नहीं लगवाएंगे, फिर यंत्रचालित सा हां बोल देना, अफ़सोस से भर जाना भी रोज़ मानो किसी जैविक नियम के अधीन अनिवार्य रूप से होता था।

बस, स्टैंड पर आकर धीमे धीमे खिसकने लगी थी। सम्पतराम को नींद लग गयी थी। अमरुद बेचने वाले ने उन्हें खिड़की का कांच खटखटा कर जगाया। जब तक वे नोट उसे पकड़ाते बेचनेवाला अमरुद काट चुका था। उसने पूछा - मसाला लगा दूँ क्या? लगा दो संपत राम ने कहा।

बस सड़क पर पहुँच चल पड़ी। संपत राम ने अमरुद की चौथी फांक से एक छोटा टुकड़ा कुतर लिया। फिर वही भुनभुनाहट- मसाला नहीं लगवाना था। अमरुद बदमज़ा हो जाता है। कल नहीं लगवाऊंगा।

उस दिन जाने क्या हुआ कि सम्पतराम को मिर्च लग गयी। गले में नमक सना अमरुद अच्छी तरह चबाने के बावजूद फंस गया। जोर की खांसी आयी तो आँख में आंसू भी आ गए। उन्होंने पानी की बोतल निकाली। तभी बस ने स्पीड ब्रेकर पार किया। हाथ का संतुलन बिगडा और सम्पतराम मुंह से नहा गए। वे इतना झल्ला गए कि उन्होंने अमरुद के साथ बेख़याली में पानी का बोतल भी खिड़की से बाहर फेंक दिया। अगल-बगल की सवारी उनकी यह हरकत देखकर हंस पड़ी।

संपत राम पहले तो खूब पछताए। फिर सोचते हुए गुस्साकर बस रुकवाई। भीड़ चीरकर नीचे लगभग कूद गए। दौड़कर बोतल उठा ले आये। जब तक बस नहीं चली खिड़की से सड़क किनारे पड़े अमरुद के टुकड़ों को पछतावे और अजीब दयनीय निगाहों से देखते रहे। बस चल पड़ी तो संपत राम ने सोचा

बात क्या है आखिर!!! रोज़ सोचता हूँ मसाला नहीं लगवाना। बेचनेवाला रोज़ पूछता है मसाला लगा दूँ क्या? मैं रोज़ कहता हूँ- लगा दो। हूँ हाँ भी नहीं साफ़ साफ़ लगा दो कहता हूँ। फिर खाता हूं। रोज़ वही बेकार स्वाद!!!फिर वही पछतावा मसाला नहीं लगवाना था। यह आखिर क्या है? इसका समाधान क्या है? और आज जो तमाशा हो गया उसमें ग़लती किसकी है? कल को कोई बड़ी बात हो जाये तो किसे दोष देंगे?

संपत राम देर तक बड़ बड़ाते रहे। फिर वे सचेत होकर चुप हो गए। बिलकुल चुप। चारों ओर निगाह दौड़ाकर आँखें मूंद ली। अपेक्षाकृत नीची सीट पर गर्दन टिका ली।

लेकिन घटना थी कि सम्पतराम को बेध रही थी। अंत में उन्होंने खुद को चिकोटी काटकर ताक़ीद की- अनुशासन ज़रूरी है। दूसरों को सुधारने या किन्ही हालात के बारे में शिकायत करने से पहले ज़रूरी है कठोर अनुशासन से खुद को धीरे-धीरे ठीक करना। अपनी गलतियां ठीक नहीं होती और अपेक्षा ज़माने भर कीं। ग़लत है यह।

संपत राम ने ख़ुद से पक्का किया-कल अमरुद में मसाला नहीं लगेगा मतलब नहीं लगेगा और मन ही मन हंस पड़े। बस ने रफ़्तार पकड़ ली थी।

-शशिभूषण

जेएनयू में साक्षात्कार

यूजीसी ने फैसला किया। जेएनयू(केंद्रीय विश्वविद्यालय) सबसे पहले अपनाने जा रहा है। नियम यह है कि एक औपचारिक पात्रता परीक्षा के बाद पात्र परीक्षार्थियों के साक्षात्कार लिए जाएंगे। केवल इसी साक्षात्कार के अंकों की मेरिट के आधार पर उनका अध्ययन के लिए प्रवेश हो पायेगा।

कुछ बातें मैं भी रखना चाहता हूँ:-

1. उच्च शिक्षा में अध्ययन के लिए प्रवेश पाने के लिए ही पात्रता परीक्षा के बाद साक्षात्कार की अनिवार्यता भारत की खोखली उच्च शिक्षा का अत्यंत साफ़ आइना है। ख़ासकर तब और जब भारत एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुका हो जिसमें किसी प्रकार की शिक्षा के बाद लगभग न के बराबर रोज़गार होंगे।

2. मेरे ख़याल से केंद्रीय संस्थानों में किसी प्रकार के प्रवेश या नियुक्ति में आरक्षण के नियमों का मानक स्तर पर अनुपालन किया जाता है। जेएनयू में साक्षात्कार के अंकों के पूर्ण अधिभार के मसले को पूर्णतः स्पष्ट रूप में सामने आना चाहिए। सवाल यह है कि प्रवेश हेतु जब सीट आरक्षण के तहत सभी वर्गों के लिए नियत होंगी तब साक्षात्कार के अंकों के आधार पर केवल वंचित तबके के परीक्षार्थियों को कैसे बाहर किया जा सकेगा? क्या वे सीट सामान्य श्रेणी के परीक्षार्थियों से भरी जाएँगी या जेएनयू में एडमिशन में आरक्षण है ही नहीं? प्रबुद्ध लोगों को या जेएनयू के मामलों के जानकार लोगों को इस स्थिति को अविलंब स्पष्ट करना चाहिए।

3. यूजीसी में इस नियम पर मुहर प्राध्यापकों के अनुमोदन या सहमति के बाद ही लगी होगी। यानी नीति निर्माण के स्तर पर यह निर्णय उच्च शिक्षा के शिक्षकों द्वारा ही कार्यान्वयन के स्तर तक पहुंचा होगा। माना जाना चाहिए कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों में पिछड़े, दलित, आदिवासी तबके के लोग पर्याप्त संख्या में होंगे। अलग अलग नामों वाले उनके यूनियन भी होने ही चाहिए। यूजीसी में भी इनकी उपयुक्त संख्या से शायद ही इंकार किया जा सके। तो क्या ये शिक्षक इस मसले पर कोई संयुक्त बयान निर्मित कर सकने की स्थिति में सचमुच हैं? या माना जाये कि शिक्षा और पद की इस अवस्था में भी सवर्ण दवाबों से मुक्ति असंभव है!!! फिर किससे उम्मीद के जा सकती है?

4. यह बहुत चौंकानेवाला डर या यथार्थ हो सकता है कि यदि साक्षात्कार अनिवार्य पात्रता शर्त हुआ तो विश्वविद्यालयों में दलित, पिछड़े, आदिवासी विद्यार्थी प्रवेश से छांट दिए जाएंगे। क्या यह माना जाना चाहिए कि साक्षात्कार समिति में सब सवर्ण ही होंगे?

5. हवाई उत्कृष्टता के नाम पर भारत में रोज़गार विहीन पढ़ाई के लिए यह बेतुका नियम और घमासान अत्यन्त हास्यास्पद है। इस नियम को हटाए जाने के सम्बन्ध में केवल जेएनयू के कुछ विद्यार्थियों द्वारा आन्दोलन या आमरण अनशन किया जाना अत्यन्त दुखद है। स्थिति की दयनीयता मानो सबकुछ चीख चीख कर कह रही है। दुनिया में भारतीय उच्च शिक्षा को देखने वाले अगर लोग होंगे तो उनका कितना अधिक मनोरंजन हो रहा होगा इसका भी केवल अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है।

6. उच्च शिक्षा में प्रवेश को लेकर साक्षात्कार की अनिवार्यता के सम्बन्ध में शिक्षाविद माने जाने वाले लोगों और मीडिया की चुप्पी अचरज में डालनेवाली है। परिस्थिति की भीषणता का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि ऐसा तब हो रहा है जब भारत के विद्वान या प्राध्यापक ज्ञान विज्ञान में पूरी पृथ्वी या अखिल ब्रह्माण्ड को झुका देने के दावे करते रहते हैं। उनके अध्ययन, शोध और यात्राओं में सरकार द्वारा बेशुमार दौलत ख़र्च की जाती है। निजी विश्वविद्यालयों के मनीषियों के तो कहने ही क्या?

7. सब बखूबी जानते हैं कि 2017 के भी आनेवाले शुरूआती दो तीन महीने सेमिनारों और शोध तथा शैक्षणिक परिचर्चाओं के लिए ही नहीं व्यय के लिए भी कुख्यात होंगे। ऐसी हालत में भी यह उम्मीद व्यर्थ ही है कि यूजीसी के ताज़ा प्रवेश नियम के सम्बन्ध में कोई आम सहमति बन पायेगी।

8. ऊपरी तौर पर यह समस्या बड़ी विकराल लगती है। फेसबुक पर तो इस संबंध में हो रही बहसों के मार्च से उड़नेवाली धूल से आसमान ढँक गया है। इसी मसले पर रवीश कुमार को सुधीर चौधरी के साथ एक ही तराजू में चढ़ा देने की दिलीप मंडल जी जैसे अन्य पक्षधरों की आक्रामकता से तो यही लगता है कि बड़ा भूचाल आ जायेगा और बौद्धिक तबका अम्बेडकरवादी और प्रगतिशील अलग अलग धड़े में पूर्णरूपेण दो फाड़ हो जायेगा। लेकिन ठहरकर सोचने पर यही लगता है इस मुद्दे से भी बड़ा प्रसंग यानी उत्तर प्रदेश का चुनाव बौद्धिकों को रह रहकर खींच रहा है।

9. उत्तर प्रदेश में बहु प्रतीक्षित विधान सभा के चुनाव होने हैं। मीडियाकर्मी, बहसबाज़, टीकाकार और राजनीतिक विश्लेषक अपने दल बल के साथ इसी मसले पर लंबे प्रवास में हैं। वे अब तक एक कथित समाजवादी परिवार की महा संघर्ष गाथा से भारत का विवेक समृद्ध कर चुके हैं। आगे वे इस सत्य की खोज में हैं कि यदि वहां अमुक या तमुक को हरा दिया गया या जिता दिया गया तो किस प्रकार भारत का दुर्भाग्य टल जायेगा।

10. एक बहुत मामूली चिंता या साफ़ गोई यह है कि भारत की इन दिनों की उच्च शिक्षा ही कई सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं की जड़ है। जिस प्रकार भारतीय लोकसभा बहस के नाम पर केवल वक़्त की बर्बादी और सफलतम अवस्था में निरा जूतम पैजार कर सकती है उसी प्रकार उच्च शिक्षा भी पाठ्यक्रम बदलते बदलते केवल परीक्षा के नियम या प्रवेश के नियम बदल सकती है। मौजूदा उच्च शिक्षा से किसी शैक्षिक सामाजिक बदलाव की उम्मीद करना रेत से तेल निकालने के सामान है या एक और मुहावरे में चील के घोंसले में मांस मिलने जैसा है।

उपर्युक्त कुछ बातें अनधिकार ही हैं। लेकिन अराजक वाचाल विमर्श भीड़ में आख़िर अपनी विनम्र बौद्धिक बारी का इंतज़ार कब तक किया जाये?

-शशिभूषण

गणतंत्रिये

मुझसे भी लोग पूछने से नहीं चूकते। आज एक गणतंत्रिये ने भी पूछ लिया
आप तो नौकरी करते हैं फिर कैसे लिखते रहते हैं? दिक़्क़त नहीं आती?
मैंने कहा- दिक्कत तो आती ही है। समय कम मिल पाता है। सोचता हूँ दिन रात पढूं, दिन रात लिखूं, गला दुखने तक बहस करूँ और घोड़े बेंचकर सोऊं। लेकिन हो नहीं पाता।
मैं वो बात नहीं कर रहा। मेरा मतलब है कोई क़ानूनी अड़चन, नियम संबंधी बाध्यता? कोई शिकायत कर दे तो?
अरे! मैं तो यह चाहता ही हूँ। हा हा..ज़रूरत पड़ेगी तो किसी वकील से पूछ लूंगा। उसकी वकालत चल जायेगी। मेरा लेखन।
मेरा मतलब है आपके बॉस ने कभी आपको टोका नहीं? आजकल अफसर नज़र रखते हैं।
भई, मैं न लिखने की नौकरी नहीं करता। मास्टर हूँ। पढ़ना लिखना मेरा काम है। मैं नहीं लिखूंगा पढूंगा तो क्या आढ़तिये पढ़ेंगे? गौरक्षक लिखेंगे?
गण तंत्री भाई का मुंह खुला रह गया। लेकिन उन्होंने चांस पूरा ले लिया। बोले
आपने सब सही कहा। लेकिन ये जो आपने अभी बीच में गौरक्षकों का अपमान कर दिया मैं उसकी कह रहा था?
मैंने कहा - मांस की जीभ है, इंसान का दिल है लोहे की रेल नहीं कि ताव न खायेगी। आप ही कहिये कोई बुरा ही मानने घूमे तो क्या कर सकते हैं?
गणतंत्री भाई ने जोर का ठहाका लगाया, हाथ मिलाकर चल दिए।
मैं खिसियाकर रह गया।

-शशिभूषण

लौटना

मुंह पर कभी कुछ नहीं कहा
हमेशा बड़े सौजन्य से पेश आये
लेकिन गांधी को गाली दी कि नहीं?
अच्छी किताब को गन्दा कहा या नहीं?
निर्दोष के लिए चुपाई साध गये कि नहीं?
सोये कूकुर को पत्थर मारा था कि नहीं?
भिखारी को रुपये की जगह उपदेश दे दिया
हँसते खेलते बच्चे को गाल नोच रुलाया
सीधे सीधे चोट नहीं पहुंचाई सही है
जब गालियां ओट लेकर पड़ती हैं
तब हिंसा मुस्कुराकर आती है
अगर ख़याल नहीं रखते
तो नफ़रत नहीं करते
क्रूरता तभी जाती है
जब लौटता है प्रेम

-शशिभूषण

जाति जाति का खेल

छत्तीसगढ़ के बस्तर में काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया कुछ दलित बौद्धिकों की नज़र में सवर्ण महिला हैं। महानगरों में टिके हुए इन चिंतकों को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि बेला भाटिया छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में आदिवासी महिलाओं और वंचित तबके के लिए हर क़िस्म का जोख़िम उठाकर काम कर रही हैं।

उल्लेखनीय है कि बेला भाटिया को एक दिन पहले ही उनके घर में गोलबंद दबंगों द्वारा कुछ ही घंटों में छत्तीसगढ़ छोड़ देने की बेशर्त धमकी मिली है। इस प्रसंग में पुलिस से लेकर राज्य सरकार तक बेला भाटिया के ख़िलाफ़ हैं। समाचार तो ऐसे आ रहे हैं कि पुलिस के सबसे बड़े अधिकारी बेला भाटिया की महिला वकील को भी अश्लील धमकी दे रहे हैं।

इस आशंका को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता कि ऐसे घोर दमन के वक़्त और परिवेश में यदि बेला भाटिया के ख़िलाफ़ कुछ अप्रिय किया जाता है तो उन्हें समय रहते कोई मदद मिल भी पायेगी या नहीं!!!

हाल के कुछ वर्षों में जब वाम और दलित एकता की सबसे अधिक आवश्यकता महसूस की जा रही है तब वंचितों की ओर से कुछ ख़ास तरह के परिवर्तनकामी अम्बेडकरवादी जन्मना दलित या पिछड़े उभरकर सामने आये हैं। इनमें पत्रकार, शिक्षक से लेकर प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं।

दलित, पिछड़ों के मध्यवर्ग से सम्बन्ध रखने वाले ये अधिकांश विचारक किसी को भी जो जन्मना दलित या पिछड़ा नहीं है हमेशा जातिवाद के मोर्चे पर खींचकर बहस करना चाहते हैं। यह एक विचित्र धुन है जो अधिकतर कटुता को ही जन्म देती है। इनके लिए जाति ही सत्ता है। सत्ता के कुल चरित्र को इन्होंने केवल जाति से ही इस तरह नत्थी कर दिया है जैसे किसी ज़माने में लंगोट ही चरित्र की कसौटी हुआ करता था।

ऐसा खासतौर पर तब अतिरिक्त उत्साह से किया जाता है जब सामने कोई जन्मना सवर्ण हो। इसमें आसानी यह होती है कि बिना किसी तर्क के भी ब्राह्मणवादी आया ब्राह्मणवादी आया कहकर या तो बहस को काबू में किया जा सकता है या कम से कम भटकने को विवश किया ही जा सकता है।

इस नए क़िस्म के प्रायोजित दलित बौद्धिक कार्य व्यापार में एक मज़बूत आधार यह होता है कि कोई सचमुच का प्रगतिशील जन्मना सवर्ण गिरी हालत में भी दलित विरोधी बात नहीं कह पायेगा और जन्मना सवर्ण जातिवादी नहीं हो सकता दलित बौद्धिक कभी यह मानेंगे नहीं न मानने देंगे।

फिर क्या है? एक विचित्र विवेचना शुरू होती है जिसमें नेहरू केवल जनेऊधारी हैं। एक ओर गांधी के भी विखंडन की ज़बरदस्त तैयारी है तो वहीं दूसरी ओर ऐसे समकालीन कुख्यात नेताओं की वक़ालत की विवशता है जो कभी न घर के रहे हैं न कभी घाट के होंगे।

समकालीन राजनीति के ही वार, पलटवार के उपकरणों, सूचनाओं और लेखन कौशल से अपनी बौद्धिकता का समर्थन निर्मित कर रहे जनाधार पलट देने की महत्वाकांक्षा रखनेवाले कुछ नव दलित एक्टिविस्टों से बहस करते हुए यदि जातिवादी कहे जाने की व्यक्तिगत और निजी तक़लीफ़ छोड़ दी जाए तो आमतौर पर आगे कोई बड़ी चुनौती नहीं मिलती।

हर ऐतिहासिक उदाहरण को केवल खारिज़ करने की ज़िद तो खूब मिलती है लेकिन निर्मिति में दक्षता नहीं होती। सिर्फ़ इंकार और निंदा। तोड़ो और तोड़ो। मानो निर्माण और सहकार दैवी कृपा से अपने आप होता जायेगा।

कुल मिलाकर इस सब से वास्तव में कोई बड़ी तोड़ फोड़ तो नहीं दिखती लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण बात तो है ही कि अपने करियरिस्ट लेखन और ज़बरदस्त बायोडाटा के बल पर ये कुछ नए सफलताकामी लोगों के भीतर गहरी सामाजिक तैयारी के स्थान पर अकारण जातीय दुराव पैदा करने में किंचित सफ़ल रहते हैं।

महान स्वप्न दृष्टा अम्बेडकर के प्रति अटूट और आलोचना से परे आस्था रखते दिखने वाले ये नव दलित चिंतक भूल ही जाते हैं कि इनकी आपस की बहसें, असहमतियां और झगडे कितने क्रूर और पश्चगामी हैं।

इनका झगड़ा विश्व के सबसे बड़े माने जानेवाले दक्षिण पंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से है लेकिन ये फौरी तौर पर वामपंथियों को निशाने में रखना चाहते हैं क्योंकि कभी आंबेडकर ने संघ के प्रति उपेक्षा बरती थी।

शुक्र है कि अपने आरंभिक दौर में भी दलितवाद के पास ज्योतिबा फुले से लेकर प्रो तुलसी राम और ओमप्रकाश वाल्मीकि, शीतल साठे जैसे प्रकाश स्तंभ हैं। वरना केवल जाति की पहचान करके ही उग्र या शांत हो जानेवाली इनकी सक्रियता कितने विभ्रम रचती इसका अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है।

एक तरफ़ छत्तीसगढ़ में बेला भाटिया हैं दूसरी तरफ़ जेएनयू में दिलीप यादव। इन दोनों के बीच में दलित, वाम सत्ता विमर्श। फ़ायदा चाहे जिसका हो लेकिन दूरी बेला और दिलीप के बीच ही बढ़ रही है इतना साफ़ है।

मज़े में हैं वे ताक़तें जो दलित और वाम एकता से संकट में हो सकती थीं।

-शशिभूषण

बोल वचन

उन्होंने किसी अनोखी तरंग में ताल ठोंककर कह दिया-मुक्तिबोध के बाद हिंदी में कोई कवि ही नहीं हुआ।

माहौल में साहित्यिक सन्नाटा फैल गया। सब किंकर्तव्यविमूढ़। इससे पहले कि वे किसी और विधा की खिड़की में हथौड़ा पीट दें किसी ने टोका- माफ़ कीजिये। ग़लत है बात। आपने हल्की बात कह दी।

वे चिढ गए- आप गहरी बात कह दीजिए। ही ही। रसिक फिस फिसा उठे। किसी ने गिलासों में अगला पैग ढाल दिया।

कोई और बोला- मैं तो कहता हूँ, कबीर के बाद ही कोई कवि न हुआ। कुल ढाई कवि हुए भारत के काव्य- इतिहास में अब तक। पहला वाल्मीकि, दूसरा कबीर। आधे में शेष सब गधे।

किसी ने चुटकी ली- ये हुई न बात! और कातो चरखा सालों !!! न खादी पहनी न विचार ओढ़ा। बेमतलब की खाली खिटर खिटर।

कोई दहाड़ा- निराशा की बात नहीं। हर वक़्त का अपना कबीर होता है। अन्ना हैं हमारे कबीर। अन्ना की जय जय!!!

कोई और बोला-सब बकवास है। अब कविता की ज़रूरत ही क्या है? साहित्य में ही धरा क्या है? पढता ही कौन है? हरामखोर पब्लिक को चाहिए मनोरंजन, झूठ, धोखा और पिछवाड़े एक जोर की लात!

किसी ने जोड़ा- उचित है, मनोरंजन चाहे सनी लियोनी करे चाहे मोदी जी। पब्लिक को फ़र्क़ नहीं पड़ता। बड़े बड़े उड़ गए, दुकौड़ी लाइन लग गए।

कोई ज़ोर से चिल्लाया- हर बात में मोदी!!! साला कहीं चैन नहीं। टीवी देखो तो...हरामी लेखकों को देखो तो... कोई पानी भी मिलायेगा भोs...केs...

जैसा की होता है संगत थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयी। सबने एक दूसरे को देखा। फिर सब ठठाकर हंस पड़े।

अगले दिन इस प्रसंग की एक बढ़िया पोस्ट फेसबुक पर लिखी गयी। जिसे कम ही लोगों ने पसंद किया।

उन्होंने, जिनने ऐतिहासिक बोल वचन कहे थे कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। कारण? वे मरी फेसबुक पर हैं ही नहीं।

-शशिभूषण

माइंड योर बिजनेस. आई एम डूइंग माई जॉब

प्रगतिशीलों, क्रांतिकारियों, गांधीवादियों, समाजवादियों, अम्बेडकरवादियों, सरकारी कर्मचारियों और हिंदी समर्थकों का मज़ाक उड़ाते आपने भी लोगों को पढ़ा देखा सुना होगा।

जहाँ उचित है वहां आलोचना होनी चाहिए। क्यों नहीं होनी चाहिए? हमारी राय में भी ज़रूर होनी चाहिए, फ़ौरन होनी चाहिए। बल्कि यदि आवश्यक हो तो भर्त्सना भी होनी चाहिये।

लेकिन जब बात समाज सुधार की, ज़रूरी राष्ट्रीय हस्तक्षेप की हो तो ऐसे आलोचकों के सम्बन्ध में एक सावधानी, सतर्कता भी बरतनी चाहिए।

वह ज़रूरी कदम यह हो सकता है कि जो उपर्युक्त आलोचना या निंदा में संलग्न पाये जाएँ उनका बायोडाटा एक बार देख लेना चाहिये। यदि संभव हो तो ऐसे लोगों की एक यथासंभव छोटी बड़ी सूची बना लेनी चाहिए।

जब यह सूची आप बना लेंगे तो एक दिलचस्प चीज़ देखने में आएगी। ऐसे लोग किसी कारोबारी कंपनी, किसी एनजीओ या किसी मीडिया संस्थान के वेतन या पैकेज भोगी कर्मचारी होंगे।

इन जॉबधारियों की प्राथमिक प्रतिबद्धता यह होती है कि यदि दूसरी जगह पांच रुपये अधिक मिलें तो पहली जगह जॉब तुरंत छोड़ देंगे।

मान लीजिए ऐसे लोग यदि धर्म की आलोचना कर रहे हैं तो आप देखेंगे इनके ही सेठ या तो अत्याधुनिक मंदिर बनवा रहे होंगे या कल्पना कीजिये यदि वे होटल या ट्रांसपोर्ट व्यवसाय में होंगे तो धर्मस्थलों से बिजनेस कर रहे होंगे।

यह छोटा सा उदाहरण है। आप अपने अनुसार भी चेक कर सकते हैं। नतीज़े दिलचस्प निकलेंगे यह तय है।
-शशिभूषण

किताब विरोधी प्रवृत्तियां

इस साल मशहूर लेखक-कवि यतीन्द्र मिश्र की वाणी प्रकाशन से भारत रत्न लता मंगेशकर पर केंद्रित एक अत्यंत पठनीय, महत्वपूर्ण, उपयोगी और प्रेरक किताब लता सुर-गाथा आई।

इस किताब को पढ़ चुके पाठकों ने खूब सराहा। लेकिन यह किताब हिंदी के कुछ वाचाल लेखकों, समीक्षकों के बीच बहस-विरोध का विषय बनी।

इस बहस-विरोध आदि से गुज़रकर दो बातें मेरे ख़याल में आईं-
1. अमिताभ बच्चन आदि अभिनेताओं पर अंग्रेजी में किताब लिखने वाले लेखक जल्द ही सेलिब्रेटी का दर्ज़ा पा जाते हैं। उन्हें बड़े-बड़े साहित्यिक महोत्सवों में बुलाया जाता है, पत्र पत्रिकाओं के रंगीन पृष्ठों पर उनके साक्षात्कार छपते हैं और हिंदी पाठकों के बीच भी वे लेखक बड़ा सम्मान पाते हैं।

2. भारत की कई पीढ़ियों के दिलों पर एक साथ राज करने वाली जीवित किंवदंती लता मंगेशकर पर हिंदी में आई एक स्तरीय और पठनीय किताब प्रशंसा तो दूर क़ायदे का स्वागत भी न पा सकी। इस किताब के बारे में ऐसे मीन-मेख निकाले गए कि जिसने यह किताब नहीं पढ़ी है वह इस किताब को खरीदने से पहले पढ़ने के बारे में कई बार सोचे।

ऊपर की दो बातों से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास आदि को छोड़कर अन्य विषयों पर किताबें पढ़ने का चलन नहीं है तो यह अपने आप नहीं हुआ।

किताबें धीरे-धीरे पाठकों से दूर हो रही हैं तो यह स्वाभाविक ही है। हमारे लेखकों के बीच परस्पर इस बात पर आम सहमति सी है कि किसकी किताब की तारीफ़ करनी है किसके किताब की निंदा। किताब भले कैसी भी हो और चाहे पलटी तक न गयी हो।

आज हिंदी में ठीक ठाक माने जाने वाले समीक्षकों में भी किसी किताब के बारे में ऐसी टिप्पणी लिखने की प्रवृत्ति सायास ग़ायब होती है कि किताब प्रचलित हो और पढ़ी जाये।

हिंदी किताबों के बारे में उत्साह जनक माहौल का अभाव और ख़त्म होते जा रहे पुस्तकालय आनेवाले गंभीर संकट का स्पष्ट संकेत हैं। इसके लिए वे टीकाकार, शिक्षक, संपादक ख़ासतौर से ज़िम्मेदार हैं जो भरपूर श्रम और तैयारी से लिखी गयी किसी किताब के बारे में अपने पूर्वाग्रहों को भी निर्णयात्मक ढंग से प्रकट करते हैं।

इस नकारात्मक किताब विरोधी प्रवृत्ति का निदान होना ही चाहिए। अन्यथा पुस्तक मेले वायुयान से पहुंचकर झोले भर भरकर किताब लानेवाले पढ़ने का समय नहीं निकाल पाएंगे और सचमुच के पाठकों तक किताब पहुँच नहीं पाएंगी।

-शशिभूषण

हिंदी एक है

कभी पानी ब्राह्मण-शूद्र होता था। कभी इंसान स्वधर्मी-म्लेच्छ होते थे। फिर भारत विभाजन के दौरान ट्रेन हिन्दू-मुसलमान होने लगीं।

अब कुछ बिना दाढ़ वाले ऐसे सयाने मांस भोजी निकले हैं जो कहते फिरते हैं हिंदी भी भगवा या सवर्ण होती है।

ऐसे भोले व्याकुल घाघ लोगों से एक ही बात कहनी है हिंदी भारतीय उपमहाद्वीप में सभी धर्मों, सभी जातियों के आज़ादी, स्वराज्य और तरक्की पसंद इंसानों की राष्ट्रीय आकांक्षा रही है।

आप एक बार ज़रा उन लोगों के नाम ग़ौर से देख लीजिए जो भोजपुरी या राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में जगह दिलाने निकले हैं। मेरे ख़याल से केवल नोटबंदी को ही लेकर त्रस्त आम जनता के प्रति उनकी क्रूर मसखरी को याद कर लेना काफ़ी होगा।

आज जब अंग्रेज़ी की साम्राज्यवादी, पूंजी आधारित नीतियां हिंदी को उसी की ताक़त मानी जानेवाली उपभाषाओं, बोलियों से लड़ाने निकली है तब आप इस आपसी लड़ाई को रोक, हिंदी की आवाज़ बुलंद करने वालों को कलंकित करने का जो प्रयास कर रहे हैं उसे इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा।

थोड़ा सा वक़्त समझने की ख़ातिर आप भी ज़रूर निकालिये कि जब बड़ी आसानी से हिंदी की बोलियों को स्वायत्त कर उन्हें हिंदी से पृथक कर आज़ादी की लड़ाई कमज़ोर की जा सकती थी तब अंग्रेजी यह क्यों नहीं कर पायी होगी? एक से एक मनीषी और भाषा तथा देश सेवी हिंदी की एकता को लेकर क्यों अटूट प्रतिबद्ध रहे होंगे?

याद रखिये हिंदी लेकर जब गुजराती भाषी महात्मा गांधी भारत के कोने कोने में जा रहे थे तब वे साथ में यह भी आह्वान कर रहे थे बचपन से जितना व्यय और श्रम अंग्रेजी सीखने में किया जाता है उससे बहुत कम व्यय और श्रम में स्वाभाविक रूप से हिंदी सीखी जा सकती है। केवल हिंदी ही है जिसमें भारत का प्रतिनिधित्व करने की सामर्थ्य है।

अभी भी वक़्त है भोजपुरी को लेकर जो मुहिम कुछ कथित भली भांति पहचाने जा चुके जन प्रतिनिधियों और छद्म संस्कृति सेवियों द्वारा शुरू हुई है उसे पहचान लें।

वरना आनेवाली पीढियां कहेंगी-
अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गयी खेत

-शशिभूषण

सीखें, जानें, जुड़ें, जोड़ें और निडरता से खड़े हों लेखक -विनीत तिवारी



12 मार्च 2017 को इंदौर स्थित देवी अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय के अध्ययन कक्ष में प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर इकाई द्वारा एक बैठक आयोजित की गई। 

इस बैठक में प्रलेसं के प्रांतीय महासचिव, कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने हाल ही में मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के 11 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल के साथ शहीद लेखकों डॉ नरेंद्र दाभोलकर, कॉ गोविन्द पानसरे और एम एम कलबुर्गी के गृह नगरों क्रमशः सतारा, कोल्हापुर और धारवाड़ की अपनी यात्रा के संस्मरण सुनाए। इस यात्रा का उद्देश्य लेखकों की शहादत के प्रति अपना सम्मान प्रकट करना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर करना एवं शहीद लेखकों के परिजनों के प्रति एकजुटता जताना तथा इस संकल्प का प्रसार करना था कि तर्कशीलता और विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का संघर्ष जारी रहेगा।

लेखकों के प्रतिनिधिमंडल में मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष और 'प्रगतिशील वसुधा' पत्रिका के संपादक श्री राजेन्द्र शर्मा (कवि) तथा महासचिव श्री विनीत तिवारी (कवि-नाटककार और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता) के साथ अध्यक्ष मंडल के सदस्य सर्व श्री हरिओम राजोरिया (कवि-नाटककार), प्रान्तीय सचिव मंडल सदस्य और वरिष्ठ कवि श्री बाबूलाल दाहिया, श्री शिवशंकर मिश्र 'सरस', तरुण गुहा नियोगी, सुश्री सुसंस्कृति परिहार, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार श्री हरनाम सिंह, कहानीकार श्री दिनेश भट्ट, नाट्य निर्देशिका और अभिनेत्री सुश्री सीमा राजोरिया, तथा 'समय के साखी' पत्रिका की संपादक और कवयित्री सुश्री आरती शामिल थे। ये लेखक प्रदेश के भोपाल, इंदौर, अशोकनगर, मंदसौर,सतना,सीधी, जबलपुर, छिंदवाड़ा और दमोह शहरों से आते हैं। 
विनीत तिवारी ने अपने वक्तव्य में महाराष्ट्र, कर्नाटक और गोआ के अनुभवों को विस्तार से साझा किया। शहीद लेखकों के परिजनों से भेंट, फ़िल्म संस्थान के अनुभव एवं गोवा के संस्मरण तथा प्रेस कॉन्फ्रेंस आदि के अनुभव बांटे।

विनीत तिवारी ने बताया- आज सबसे अधिक ख़तरा और पहला हमला विचारकों, शिक्षकों एवं लेखकों पर ही है। एक समय था जब बुद्धिजीवियों का लिहाज़ होता था और बुरी से बुरी परिस्थिति में भी शिक्षकों, लेखकों पर हमला नहीं होता था। लेकिन आज हालात बिलकुल उलटे हैं। विगत वर्षों में मारे गए तीनों शहीद लेखक सत्तर और 80 वर्ष की आयु के वरिष्ठ विचारक ही थे। उनके सिरों में ही गोली मारकर यह स्पष्ट संकेत दिया गया कि हत्यारे, विचारों के ही हंता हैं। चरमपंथियों के निशाने पर प्रगतिशील विचार ही हैं

विनीत ने बताया कि पुणे से सबसे पहले हम लोग डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पत्नी डॉ. शैला दाभोलकर और बेटे डॉ. हमीद दाभोलकर से मिलने सतारा पहुंचे। वहां अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के काम और अभियान को जाना। आत्मीय बातचीत में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पत्नी का अनुभव सुनना संकल्प से भर गया। उन्होंने कहा- मुझे लगता ही नहीं कि नरेंद्र अब नहीं हैं। मैं कुछ भी करने जाऊं तो मन में उन्हीं से पूछ लेती हूँ। उन्होंने बताया कि दशकों तक संघर्ष के बाद आखिर महाराष्ट्र सरकार को ओझा, टोने-टोटके करने वालों के खिलाफ कानून बनाना ही पड़ा। डॉ. दाभोलकर की मृत्यु को 4 वर्ष होने वाले हैं। आंदोलन बढ़ रहा है लेकिन सरकारें धीमे-धीमे काम कर रही हैं। नहीं भूलना चाहिए तीनों शहीद लेखकों के हत्यारे अब तक पकड़े नहीं गए हैं।

विनीत तिवारी ने साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने वाले लेखक और एम एम कलबुर्गी के लिए धारवाड़ में न्याय की लड़ाई लड़ रहे लेखक पद्मश्री गणेश देवी के प्रयासों और दक्षिणायन संगठन के बारे में बताया। गणेश देवी अब गुजरात से धारवाड़ आकर रहने लगे हैं और कन्नड़ के लेखकों और अकादमिक विद्वानों को कलबुर्गी के लिए न्याय की मांग के लिए निर्भय होकर लामबंद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कलबुर्गी विशुद्ध लेखक थे। उन्होंने 120 से ज़्यादा दर्शन और इतिहास विषयक ग्रन्थ लिखे थे। उनके साथ उनके लिए लड़ी जा रही लड़ाई में यदि लेखक शामिल न हुए तो कौन शामिल होगा? कलबुर्गी ने अकेले इतना वैचारिक लेखन किया है जितना कर्नाटक में शताब्दियों में नहीं लिखा गया है। कलबुर्गी का कमरा अब पूरी तरह उनकी तस्वीर एवं पुस्तकों के साथ एक लेखक के स्मृति कक्ष के रूप में उपस्थित है। धारवाड़ में प्रतिनिधिमंडल ने प्रो. कलबुर्गी के परिजनों, उनकी पत्नी उमादेवी, प्रो. गणेश देवी, प्रो. सुलेखा देवी, विख्यात सामाजिक आंदोलनकारी एस.आर. हीरेमठ और कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों से आये 40 कन्नड़ लेखकों से मुलाक़ात की।

कोल्हापुर में गोविन्द पानसरे ने बड़ी संख्या में अलग-अलग संगठन बनाये। उन्होंने जब किसी की तक़लीफ़ जानी तो उस तरह की तक़लीफ़ में पड़े अन्य लोगों को भी खोजा और उन्हें संगठित किया। पानसरे ने अपने संगठन के लोगों के सामने लक्ष्य रखा कि आप लोग उन सामाजिक कार्यकर्ताओं को ढूंढकर उनकी जीवनी परक कम से कम 80 किताबें छापें जो बिना प्रसिद्ध हुए ख़ामोशी से काम करते रहते हैं। यह काम हुआ और कॉमरेड पानसरे ने स्वयं शिवाजी सहित बहुत से विषयों पर आँख खोल देनेवाली, सरकारों को असुविधा पैदा करनेवाली किताबें लिखीं।

विनीत तिवारी ने कोल्हापुर में पानसरे की याद में प्रातः होनेवाली निर्भय यात्रा का भी हाल सुनाया कि किस तरह हम लगभग 200 लोग सुबह इस ऐलान के साथ टहलने निकले कि हम डरे हुए नहीं हैं। हमारी लड़ाई जारी है। हम बच-बचाकर नहीं, बल्कि पूरे मन से और समर्पण के साथ एकजुटता में संलग्न है और किसी भी खतरे के लिए तैयार हैं। लोग गीत गाते चले कि"गोल्या लठ्या घाला, विचार नहीं मरणार" (गोली लाठी चला लो लेकिन विचार को नहीं मार पाओगे।)। कोल्हापुर में पानसरे जी का प्रभाव हज़ारों लोगों पर है और वहां उनकी पत्नी उमा पानसरे, बहू मेघा पानसरे, पोते मल्हार और कबीर के साथ ही उनके चाहने वाले हज़ारों लोगों से बहुत ही आत्मीय अभिनन्दन हमें प्राप्त हुआ।

विनीत तिवारी ने पुणे फ़िल्म संस्थान के और पुणे प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा साधना मीडिया सेंटर में हुई पुणे के प्रखर बौद्धिक विचारवंतों के साथ हुई सभा के संस्मरण भी सुनाए। उसके अतीत एवं गौरव पूर्ण उपलब्धियों से परिचय कराया। फ़िल्म निर्माण तकनीकि में काम आनेवाली पुरानी सामग्री के चित्र और पूरी यात्रा के दौरान के अनेक चित्र दिखाये। 

उन्होंने बताया कि गोवा की यात्रा कई मायने में अविस्मरणीय एवं दूरगामी प्रभाव डालनेवाली रही। गोवा में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों लेखकों की उपस्थिति उनके सवालों एवं सहयोग आदि ने आश्वस्त किया।

इसी बीच सरकार द्वारा एक नोटिस का ज़िक्र भी आया जिसमें कहा गया था कि आप लोग मीटिंग में किसी का भी नाम नहीं लेंगे और किसी की निंदा नहीं करेंगे वर्ना आप लोगों को गिरफ्तार कर लिया जायेगा। तब पत्रकार निखिल वागले ने अपने वक्तव्य की शुरुआत ही यह कहकर की कि जिन्होंने हत्या की आप उन्हें पकड़ नहीं रहे उलटे आप हमें ही कह रहे हैं कि हम उनकी आलोचना न करें उनके ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाएं। यह ठीक नहीं। हम संघर्ष नहीं छोड़ सकते। आप लोग हमें डराने की बजाय अपना काम कीजिये। इसके बाद देखा यह गया कि जो पुलिस कर्मी, अधिकारी ग़ुस्से में थे इत्मीनान से बैठ गए और ध्यान से सुनने लगे।

कुलमिलाकर विनीत ने इस बात से अपने वक्तव्य का उपसंहार किया कि आज हर स्वतंत्र सोचने विचारने वाले व्यक्ति के लिए एकजुटता, संलग्नता और संघर्ष ज़रूरी हैं। इस यात्रा के संस्मरणों के प्रकाशन को जल्द ही परिणति दी जायेगी एवं फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ निडर लेखन करनेवाले इन तीनों लेखकों की विचार पुस्तकों को हिंदी में भी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचाया जाएगा। ध्यान रहे, लेखकों के लिए देशाटन आवश्यक इसीलिए बताया गया है ताकि लेखक के अनुभव का दायरा बढ़े। हमने इस यात्रा को सोद्देश्य बनाया और अन्य भाषा-भाषी समाज से सीखा-जाना, उनसे जुड़े, उन्हें जोड़ा और जहाँ ज़रूरत हो वहां खड़े होने की निडरता लेकर लौटे। इस यात्रा के दौरान प्रत्येक दिन हमारे सत्तर साला साथियों ने भी युवाओं के उत्साह और सक्रियता का परिचय दिया। हमने इस यात्रा में बहसें की, योजनाएं बनायीं, वास्तविक अमल की रुपरेखा तैयार की और सभी साथियों को यह भी काफी ऊर्जा देने वाला और एक दूसरे को समृद्ध करने वाला अनुभव लगा। हमारे समूह में तीन महिला साथी भी थीं। उनकी सक्रिय भागीदारी पूरी यात्रा में रही।

बैठक के अंत में विनीत तिवारी ने हाल ही में गिरफ़्तार किये गए पत्रकार - संपादक दीपक 'असीम' के मामले से लोगों को अवगत करवाया कि किस तरह ओशो के एक लेख के पुनर्मुद्रण पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गयी। ये समाज में विरोधी विचार के प्रति कम होती सहनशीलता की प्रवृत्ति को दर्शाता है। इसके लिए हमें निर्भय होकर जनता से अपने विचार साझा करने होंगे और तर्कशील स्वस्थ बहस का वातावरण बनाना होगा।

बैठक में अन्य लोगों ने भी विचार व्यक्त किये। उपस्थित लोगों में ब्रजेश कानूनगो, अभय नेमा, सुलभा लागू, डॉ. कामना शर्मा, शशिभूषण, तौफ़ीक़, प्रशांत, रामासरे पाण्डे आदि प्रमुख थे।

प्रस्तुति- शशिभूषण

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

केवल चलते रहना

लड़की तू चल
तुझे चलाने का चलन है इसलिए चल
पर नापते हुए नयी राहों को कदमों से
अपनी गति, चाल और चलन के तरीके
स्वयं बनाने मत लगना
भूलना मत कि तुझे चलना है, सिर्फ़ चलना
विकल्प नहीं हैं तेरे पास ठहरने या दौड़ने के
सिवाय पूर्व निर्धारित मोड़ों या पड़ावों के
सुस्ताना या मुड़ना नहीं कहीं और
मंज़िल का पता तो हर्गिज़ न पूछना
चलते हुए रखनी है तुझे और भी सावधानियाँ
कि राह के किसी फलदार वृक्ष पर नहीं रीझना
प्यास बुझाने मत रुकना किसी कुएँ की जगत पर
किसी खेत की हरीतिमा देख मन पाखी होने लगे
फिर भी उड़ना मत वहाँ तितलियों और भौंरों संग
चलती हुई पुरवाई संग नाचने मत लगना
जलते हुए सूरज संग पिघलना मत
राह के आरोह अवरोहों से विचलित न होना
कर मत बैठना कभी थकने की शिकायत
पैरों के छाले या माथे के श्रम बिंदु
दिखा मत देना किसी को भोलेपन में बावरी
कि तेरी एक ही औचक भूल से
थम जायेंगे अनगिन बढ़ते क़दम
बदल जायेगा लड़की को चलाने का चलन
भूलना मत कि तुझे चलना है, सिर्फ़ चलना

-कविता जड़िया


रविवार, 15 जनवरी 2017

राष्ट्रभाषा हिंदी नारा नहीं हमारा साझा सपना है

आज जो हिंदी है वह बोलियों का समुच्चय है। हिंदी की बोलियां हिंदी की धमनियां और शिराएं हैं। कई ऐसी बोलियां भी हैं जो हिंदी के बराबर साहित्यिक धारिता वाली हैं। उन्हें बोली कहना भी अटपटा लगता है। वे बड़ी आसानी से न केवल भाषा कहला सकती थी बल्कि संवैधानिक शर्तों पर भाषा बन सकती हैं। कुछ बोलियाँ भाषा बन भी चुकी हैं। लेकिन इसे ही हथियार बना लेने से पूर्व यह नहीं भूलना चाहिए कि बोलियों को बहुत पहले ही हिंदी की उपभाषा के ही अन्तर्गत बोली कहने के पीछे एक विराट, समावेशी, अग्रगामी कामना रही है। वह कामना यह है कि एक दिन इन बोलियों को भाषा की तरह हिन्दी के विरुद्ध ही खड़े हो जाने की नौबत न आ जाये। हिंदी उत्तरोत्तर अपने वास्तविक पद तक पहुँच पाये इसके लिए यह त्याग अपरिहार्य था और आज भी आवश्यक है।

यदि हिंदी की बोलियां भाषा बनती जाएँ तो अंत में हिंदी बचेगी ही नहीं। इसमें दो राय नहीं। मुझे यह बात बहुत अच्छी लगती है कि फणीश्वरनाथ रेणु हों या हरिवंश राय बच्चन इनकी हिंदी में दो बड़ी बोलियों की अंतर्धारा है। हरिवंश राय बच्चन के गद्य में अवधी के शब्दों का जो ठाठ और बाहुल्य है वह उन्हें अत्यन्त लोकप्रिय और बोधगम्य बनाता है। इसी तरह के अनेक उदाहरण हैं जहाँ हिंदी साहित्य में बोलियों की विविधता और वैभव है। हिंदी साहित्य वास्तव में बोली से आये मनीषियों का ही अपूर्व सृजन है।

यदि आगामी कुछ दिनों में ही भोजपुरी भाषा बन जाती है जैसा कि संविधान की आठवी अनुसूची में उसे शामिल करने की तैयारी पूर्ण है तो मैं कहूंगा बघेली भी क्यों नहीं? यदि बघेली भी भाषा बने तो जल्द से जल्द, अधिक से अधिक मुझे क्या मिलेगा? मैं भी तत्काल प्रभाव से बघेली की सेवा करता हुआ बघेलखंड का रत्न बनने में लग जाऊंगा। हिंदी में रहते हुए एक महाद्वीप में हूँ। फिर एक टापू में रहूँगा। कमज़ोर आवाज़ में भी पुकारूंगा तो आवाज़ गूंजेगी।

जैसे ही बघेलखंड या विंध्य प्रदेश नाम से अलग राज्य बनेगा मेरे लिए किसी अकादमी में जगह पाने में कम प्रतियोगिता होगी। लेकिन एक हृदयविदारक घटना यह होगी कि पूरे विंध्य प्रदेश में सौ पचास लोग ही हिंदी भाषी बचेंगे। क्योंकि वहां अभी भी सब बघेली ही बोलते हैं। केवल सार्वजानिक जगहों पर भी बघेली बोलने लिखने की अनिवार्यता की आवश्यकता है।

कुल मिलाकर यह कहने में मुझे संकोच नहीं कि भोजपुरी के भाषा की तरह आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदी कमज़ोर होगी। दूसरी बोलियों के भाषा बनने से और कमज़ोर होगी। बोलियां लड़ाई छेडेंगी। वे भाषा बनेंगी। विश्व में हिंदी भाषी घटते जायेंगे। भारत में नए राज्यों के गठन की मांग उठेगी। इतने अधिक इतने अधिक भाषायी आधार पर नए राज्य भारत में हो सकते हैं कि यह संघ गणराज्य लड़खड़ा भी सकता है। तब उन्हें एक सूत्र में पिरोने कौन सी भाषा आयेगी? अभी हिंदी से तक़लीफ़ किस भाषा को है?

भारत में इस वक़्त हिंदी से बोलियों की जो लड़ाई केवल शुरू होती प्रतीत हो रही है उसके बारे में प्रभु जोशी जी का वह अंदेशा सही ही प्रतीत होता है कि यह दुश्मन सुरंग कदाचित अंग्रेज़ी द्वारा ही लंबे समय की तैयारी के बाद बहुत अंदर तक पहुंचाई जा चुकी है। बस दिल्ली से समय समय पर कुछ बार मुहर की ज़रूरत है।

इसलिए मैं भी समझता हूँ आज आवश्यकता हिंदी को ही समेकित रूप में समृद्ध करने की है। बोलियों को संपन्न करने की है। उन्हें जो चाहिए वह सब मिले और हिंदी उनसे जितना चाहिए उतना ले। क्योंकि हमारे राष्ट्रनिर्माताओं का वह सपना आज तक हमारा इंतज़ार कर रहा है जो हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहता है।

मैं बोलियों के विरुद्ध नहीं हूँ लेकिन अंग्रेज़ी के भाषायी साम्राज्यवाद और पूर्व परिचित औपनिवेशिक कारगुजारियों से कतई निश्चिन्त नहीं हूँ। आज विश्व स्तर पर हिंदी के ख़िलाफ़ जो कूटनीति और धन बल है उसे कुछ कुछ देख पा रहा हूँ। मैं रोज़ हिंदी को हिंग्लिश में टूटती देखने वाला विवश नागरिक हूँ। हिंदी को राष्ट्रभाषा की तरह देखना मेरा भी एक सपना है। अपनी इस नीयत और कामना का अधिक ख़ुलासा करने के लिए कुछ दिनों पूर्व लिखी एक प्रतिज्ञा आप सबसे बांटना चाहता हूँ-

प्रतिज्ञा

हम भारत के लोग सब भारतीय हैं। हमें अपना देश और भारतीय भाषाएं प्यारी हैं।

हम दुनिया भर में बोली जानेवाली भाषाओं, निवासियों के प्रति अमिट सम्मान रखते हुए हिंदी को सर्वश्रेष्ठ बनाने का संकल्प लेते हैं। हम जिस भाषा को अपनाएंगे उसका व्यवहार पूरी गरिमा से करेंगे।

संसार भर की भाषाओं में विद्यमान सर्वश्रेष्ठ साहित्य,विचार, ज्ञान और विज्ञान के प्रति अपने मस्तिष्क, आँख और कान खुले रखेंगे।

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए भारतीय महामनाओं के सपने और प्रयत्नों को साकार करेंगे।

हिंदी हमारी राजभाषा है। इसे राष्ट्रभाषा बनाने का प्रयत्न और भारतीय संघ गणराज्य के प्रभुत्व की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।

हम सभी भाषाओं की अस्मिता अक्षुण्ण रखते हुए हिंदी की उन्नति के लिए प्रतिबद्ध रहने की प्रतिज्ञा करते हैं।

जय हिंद!

आइये हम हिंदी को केवल बचाने के लिए नहीं उसके लिए आज़ादी की लड़ाई लड़ चुके महापुरुषों के सपनों को साकार करने के लिए भी एक कदम बढ़ाएं।

शशिभूषण

बुधवार, 4 जनवरी 2017

कुछ हालिया सीख


1. पापा और मम्मा, जो भी सुन रहे हैं प्लीज ध्यान दीजिए। बाहर कोई आये हैं। गेट पर खड़े हैं।

क्या हुआ?

अपनी छत पर पतंग आ पड़ी है। निकाल कर दे दीजिए।

समय नहीं है। बाद में देंगे।

दे दीजिए न, आप लोग भले काम करिए वरना लोग नहीं मानेंगे आप दोनों टीचर हैं।

अच्छा? तुम दे दो। स्टूडेंट को भी भलाई करनी चाहिए।

आप लोग को अच्छे से पता है तो याद भी कर लीजिए न मुझे छत का गेट खोलना नहीं आता।


2. पापा, समझदारी से काम लीजिये अब

क्या हुआ?

आपने चश्मा लगा रखा है, लगा रखा है कि नहीं? पावर वाला!

लगा तो रखा है

आपने मोबाईल पर भी हमेशा की तरह आँख गड़ा रखी है तो क्या होगा? सोचिये

क्या होगा?

सवाल से कुछ नहीं होगा

फिर कैसे होगा?

ऐसे होगा कि आप जहाँ समझदारी छोड़कर आ गए हैं वहां से ले आइये

ओह ये बात है

मुश्किल बात नहीं है पापा आप समझ नहीं रहे हैं


3. दिवि आप सयानी हो चुकी हैं

मैं बच्ची हूँ अभी। पांच साल की

सिखाती तो अम्मा की तरह हैं

आप लोग काम ही ऐसे करते हैं

अच्छा ?

हाँ और एक बात और है

क्या ?

सिखा कोई भी सकता है बस पता होना चाहिए।


4. पापा, लीजिए रोल बनाईए

देख रही हो मैं पढ़ाई कर रहा हूँ

एक्टिविटी भी अच्छी होती है

अभी पढाई अधिक ज़रूरी है दिवि

ठीक है फिर सीख न पायें तो मुझे मत कहना

क्या कर रहे हो तुम लोग? दिवि कहां हो?

दिवि प्रो यशपाल कमेटी से आगे निकल गयी हैं

मम्मा मैं यहीं हूँ

000

इस वक़्त दिवि ट्रेन में ऊपर की बर्थ पर सो रही हैं। सुबह जागने पर जब उन्हें सुनाया जायेगा तो वे मोबाईल छीनकर पढ़ना चाहेंगी।

पढ़ने के बाद कह सकती हैं। अच्छा है लेकिन पापा आप अधिक कहानी मत बनाया कीजिये।

हो सकता है मैं कहूँ

अच्छा जी!!!

हम लोग : साहित्य अकादमी - सम्मान और सरोकार- NDTV

एनडीटीवी के कार्यक्रम 'हम लोग' में नासिरा शर्मा को उनके उपन्यास पर मिले साहित्य अकादमी सम्मान के उपलक्ष्य में; मृदुला गर्ग, अल्पना मिश्र और संजीव कुमार को सुनने का मौक़ा मिला।

नासिरा जी अंत तक सबसे संतुलित लगीं। मृदुला जी का तंज तार्किकता के अभाव में निष्प्रभावी लगा। उन्होंने बोलते बोलते मन्नू भंडारी के उपन्यास 'महाभोज' के बारे में बोल दिया इसमें कुछ नहीं। यह सामान्य राय नहीं बल्कि अपनी पसंद नापसंद के अतिरेक में किसी कृति को भी ख़ारिज कर देना है।

यदि, यही दूसरे अन्य सन्दर्भ में कर रहे हों तो फिर शिकायत कैसी? प्रायोजित और गन्दी साहित्यिक राजनीति किस तरह?

मुझे इस बात से बड़ी निराशा हुई कि मृदुला जी की यदि अशोक वाजपेयी से असहमति हो भी तब भी सम्मान वापसी के पूरे दौर को, इससे जुड़े सभी महत्वपूर्ण लेखकों को जो गैर हिंदी भाषी भी रहे; इस तरह ख़ारिज कैसे कर सकती हैं?

एम एम कलबुर्गी की नृशंस हत्या के बाद साहित्य अकादमी की उदासीनता और सरकारी अनुगामिता से व्यथित होकर सम्मान लौटाने से शुरू हुए व्यापक प्रतिरोध और बहस को उन्होंने लेखकों की परस्पर असहिष्णुता या गुटबाज़ी में ग़र्क़ कर दिया।

ऐसे अवसरों पर यह जानना काफ़ी तकलीफदेह होता है कि हमारे उम्रदराज़, सफल लेखक भी विचारहीनता की रचनात्मक स्वायत्तता के लिए कैसे बौना, आत्मकेंद्रित होना स्वीकार कर लेते हैं!!!

मृदुला जी यदि काशीनाथ सिंह से सहमति रखती ही हैं, उन्हीं के शब्दों में वे अकादमी की जूरी में रहते उनकी वकालत भी कर चुकी हैं तब क्या उन्हें यह याद कर लेना सचमुच कठिन था कि काशीनाथ सिंह जी भी सम्मान वापस कर चुके हैं? नामवर जी से नासिरा शर्मा जी को भी आपत्ति है माना लेकिन काशीनाथ सिंह से किसी को क्या नाराज़गी हो सकती है? वे तो लेखन में भी आज तक शिथिल नहीं हुए हैं बल्कि कठोर नियमित रचनात्मक और नयी ज़मीन तोड़नेवाले हैं।

बात यदि महिला लेखन या दलित लेखन या अल्पसंख्यक लेखन तक सीमित नहीं रहकर लेखकीय गरिमा की बहाली की ही हो रही हो तब मृदुला जी जैसे कथित तटस्थ वक्तव्य और उलझा ही देते हैं।

हम लोग : साहित्य अकादमी - सम्मान और सरोकार- NDTV

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अपराजेय संघर्षशीलता की कहानियाँ

कहानियों की किताब पर एक पुरानी टीप जो कहीं न छपी लेकिन आज कोई पुराना मेल खोजते मिल गयी। 2007-08 की बात है। तब सत्यनारायण पटेल का अंतिका प्रकाशन से पहला कहानी संग्रह 'भेम का भेरू मांगता कुल्हाड़ी ईमान' आया ही था। छपे न छपे अपना लिखा उतना ही प्रिय होता है। लेखक से नाराज़गी या राजी ख़ुशी हो सकती है लेकिन अपने लिखे से कैसा बिगाड़!!! समय और मन मिले तो पढ़ियेगा। अपने हिसाब से मैंने कुछ ठीक-ठाक बात कहने की कोशिश की है। - ब्लॉगर

सत्यनारायण पटेल का होना हमारे समय में एक ऐसे कथाकार का होना है जिसकी कथाभूमि पूरी तरह से लोक-जीवन हो। यह जीवन बहुरंगी छटा का श्रमिक और किसान जीवन है। संघर्षशील आमजन यहाँ नायकत्व पाता है। इस कथाकार की भाषा में लोक संस्कृति के स्वर हैं, जिसमें लोक की गर्वीली आत्मा बोलती है।

हिन्दी में कई ऐसे महत्वपूर्ण कथाकार हुए हैं जिन्होंने सबसे पहले एक आयडिया चुना फिर उसी को केन्द्र में रख कर कहानी का प्लॉट बुना। यानी तयशुदा थीम की ज़मीन पर कल्पनाशीलता के उपकरणो से संवेदना के बीज बोए। नतीजे में या तो पहले से चला आता हुआ कोई विचार पुष्ट हुआ या नए विचार की कोंपलें फूटीं। चूंकि कहानी स्वायत्त, समय-समाज की चौपाल पर सबसे मार्मिक साक्ष्य होती है इसलिये वह कैसे भी मुकम्मल हो एक उपलब्धि के रूप में ली जाती रही है। उसे उपलब्धि के रूप में स्वीकार भी किया जाना चाहिए।

अभी तक ऐसे कहानीकारों के मूल्यांकन की परंपरा विकसित नहीं हो पाई है जिनकी रचनात्मक जिजीविषा आयडिया या विचार नहीं प्रत्यक्ष जीवन है। ऐसे कथाकारों को कृपांक सा देते हुए आंचलिक आदि सिद्ध कर देने के प्रयास ज़रूर बहुत हो चुके हैं। कभी-कभी कथित ग्लोबल लेखकों के साये में पलती आलोचनाओं ने ऐसे कहानीकारों को प्रकृतवादी कहने की बेशर्मी तक दिखा दी है।

सत्यनारायण पटेल की कहानियों के पात्र और कथा स्थितियाँ खेतिहर, मज़दूर जिंदगी, मालवी धरती और बोली बानी से आए हैं। ये एकदम खरी, जीवंत, भरोसेमंद कहानियाँ हैं। इन्हें पढ़कर आप ये कहने का साहस नहीं कर सकते कि गढ़ी हुई कहानियाँ हैं। जैसे ‘पनही’ कहानी का पूरण जूते गढ़ता है ठीक उसी तल्लीनता, विवरणात्मक संलग्नता और गरिमा के साथ सत्यनारायण पटेल कहानी बुनते हैं। यह कथाकार जैसे कहानियाँ सुनाता है- फुरसत से, पूरी लंबाई में, धीरे-धीरे कदाचित रूक-रूक कर। सत्यनारायण पटेल की कहानियाँ पढ़कर निराशा या अंधेरे वक्त की ऊब महसूस नहीं होती है, बल्कि अनुभवों का भरा-पूरा जिंदादिल संसार सामने आता है। अनुभव जो हमारी समझ के रुके हुए रास्ते खोलते हैं, ताकत देते हैं। इनकी कोई भी कहानी उठा लीजिए चरित्रों का समूह मिलेगा। इस समुह में कोई हमारी बात रखता हुआ सुनाई देगा तो कोई वर्ग शत्रु की क्रूरता के साथ खड़ा मिलेगा। यहां एक सा जीवन जीने वाले, एक सी स्थगित भाषा बोलने वाले जिसमें धर्म, राजनीति, बाजार या सांस्कृतिक सत्ता का व्याकरण होता है, चरित्र नहीं मिलेंगे।

सत्यनारायण पटेल, इन अर्थों में आज के प्रगतिशील कथाकार हैं जिन अर्थों में पहले प्रगतिशील कवि हुआ करते थे। इस कथाकार में परिवर्तन, संघर्ष, समता, सामाजिक न्याय और समाजवाद के प्रति अटूट आस्था मिलती है। कृत्रिम उत्तर आधुनिक शोरगुल वाले परिदृश्य में जब लेखकीय समझ को ही विश्वदृष्टि और विचारधारा कहने की आलोचकों में हड़बड़ी है और समकालीन कथाकारों के विचारधारा निरपेक्ष होने को बड़ी खूबी की तरह प्रचारित करने की चलताऊ कोशिश है; कथाकार सत्यनारायण पटेल मार्क्सवाद की ठोस ज़मीन पर खड़े हुए दिखते है। इनकी मार्क्सवाद या सामाजिक क्रांति के प्रति प्रबल आस्था पर अब तक कोई फर्क नहीं पड़ा है जबकि सत्यानारायण पटेल समाज, राजनीति, इतिहास और सत्ता के सारे समीकरणों के रोज़ रोज़ का तीखा और प्रतिरोधी गवाह हैं। यह सब कहकर मैं इस कथाकार को पुरानी धारा का जनवादी कथाकार नहीं हमारे समय का देशज प्रतिबद्ध प्रगतिशील कथाकार कहना चाहता हूँ।

यह कहानीकार, कहानियों के लिये छद्म वातावरण का निर्माण नहीं करता। इसकी कहानियाँ दिलचस्प वर्णन या बतकही से शुरू नहीं होती। बल्कि विवरण कहीं-कहीं तो खाली छोटे-छोटे संकेत स्थितियों के अनुरूप आते जाते हैं। इसी कारण इनका शिल्प सख्त स्फीत हो गया है। सत्यनारायण पटेल की कहानियों का शिल्प कच्चे नारियल की तरह है। पहले उसे काटना, भेदना पड़ता है। लेकिन एक बार यह हो जाए तो कौन नहीं जानता नारियल पानी की मिठास शीतल पेयों की सजावटी, विज्ञापनी मिठास से बेहतर होती है। यह हमें समृद्ध और मजबूत बनाती है। हमारे समय की केक कहानियों के बीच इनकी कहानी बिनिया कंडे(अनगढ़ उपले) से सिंकी हुई सोंधे अंगाकर(रोटी) हैं।

सतत अनिश्चितता सत्यनारायण पटेल की कहानियों की एक और मुख्य विशेषता है। यह कथाकार परिवेश का कोई टुकड़ा सलीके से उठाता है और उसके सहारे कहानी की पर्ते धीरे-धीरे खोलने लगता है। इनकी कहानियाँ क्रमशः खुलती और आगे बढ़ती हैं। पात्रों का अधिनायकत्व रचने वाले दूसरे कथाकार होंगे। सत्यनारायण के यहाँ उनकी लोकतांत्रिक मौजूदगी देखने को मिलेगी। इस संग्रह की सारी कहानियों में कोई पात्र ऐसा नहीं मिलेगा जिस पर पूरी कहानी निर्भर हो, बल्कि वह केन्द्रीय लगने वाला पात्र भी क्रमश: गौंड़ होने लगता है। और अंतत: दूसरा पात्र उसकी केंद्रीयता को नेपथ्य में कर देता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सत्यनारायण पटेल एक यादगार चरित्र खड़ा करने की बजाय एक सक्रिय समूह खड़ा करने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। इनकी कहानियां अपेक्षाकृत लंबी और औपन्यासिक होती हैं। ‘भेम का भेम मांगता कुल्हाड़ी ईमान’ का अंत याद कीजिए जहां कथा नायक गरम कुल्हाड़ी लेकर आगे बढ़ रहा है और पूरा समुदाय निर्णायक होता जा रहा है जैसे अब जो प्रतिरोध में आगे आएगा वह नायक हो जायेगा। `पनही` का पूरण हो या `गांव और कांकड़ के बीच` का बालू ये सब अंत में सँघर्षशीलों के समूह में पर्यवसित हो जाते हैं। यही वजह है कि सत्यनारायण पटेल की कहानियों में अपराजेय संधर्षशीलता दिखाई पड़ती है।

ऐसा नहीं है कि इस कथाकार को हमारे समय के अंधेरे, नैराश्य, विभ्रम और पराजयों का पता नहीं है। लेकिन यह कथाकार इनके विरूद्ध प्रतिसंसार खोजने में लगता है। जो निश्चित रूप से लड़कर हासिल होगा। यही संघर्ष से प्राप्त प्रतिसंसार इस कथाकार की उपलब्धि है। सत्यनारायण पटेल की कहानियों में दलित और स्त्री जीवन अपने विशिष्ट स्वरूप में संघर्ष चेतना के साथ अभिव्यक्त होता है। वे समकालीन कथा जगत में दलित और स्त्रियों को विमर्शो के फार्मूले सिद्ध करने के लिये इस्तेमाल करने वाले कथाकारों से अलग हैं। वे ब्राम्हणवाद से लड़ने के लिये नारेबाजी का सहारा नहीं लेते, बल्कि वर्गीय अर्न्तविरोध कैसे शोषकों तथा शोषितों के बीच की गुत्थियाँ नहीं सुलझने देते, शोषितों को एकजुट नहीं होने देते इसको परत दर परत उघाड़ने के लिये जीवन का तटस्थ रूपांकन करते हैं। जब वे दलित पृष्ठभूमि उठाते हैं तो पहले से चले आ रहे सिद्धांतो को पुष्ट करने में प्रयासरत् नहीं दिखाई देते, बल्कि दलितों के सुख-दुख, संर्घष, हार-जीत को वर्गीय तेतना के साथ प्रकट करते हैं। सत्यनारायण पटेल की कहानियों की स्त्रियां- पीराक (पनही), केसर(बिरादरी मंदारी की बंदरिया), झन्नू(गांव और कांकड़ के बीच), चत्तर(बोंदा बा), सकीना (भेम का भेरू मांगता कुल्हाड़ी ईमान), व्यक्तित्व संपन्न संघर्षशील स्त्रियाँ हैं।

सकीना को छोडकर सबकी सब प्रतिरोध करती हैं, निर्णय लेती हैं और समय आने पर शोषण के विरूद्ध सामाजिक लड़ाई के सूत्रधार की भूमिका निभाती हैं। इन औरतों को भारतीय ग्रामीण समाज में ढूंढ पाना कोई मुश्किल काम भी नहीं है। ये उन कहानियों की स्त्रियों से भिन्न हैं जो सीधे कहानियों में ही अवतरित् होती है, सुंदर, बौद्धिक, कमाऊ होती हैं। अपनी आर्थिक आजादी के बल पर पुरूष सत्ता को चुनौतियां देती रहती है। चुनाव लड़ती हैं, एन.जी.ओ. चलाती हैं, लिव इन रिलेशन की संमर्थक हैं या अकेली रहती है। विभिन्न संगठनों के माध्यम से स्त्री चेतना का अदान- प्रदान करती हैं। लेकिन अंतत: खुद को शोषितों के बीच ही पाती है। इसके विपरीत ये वो स्त्रियां हैं जो गरीबी और बिरादरी के जालों को भेदने के लिये पति को शोषक माने बिना उसे लड़ने के लिये उकसाती हैं और साथ-साथ खड़ी होती हैं।

सत्यनारायण पटेल की कहानियों में संवाद विशेष महत्व रखते हैं। हालांकि वे लम्बे होते हैं, ज्यादातर पात्रों की स्थानीय बोलियों(मालवी) में होते हैं जिससे कहानी का प्रवाह बाधित भी होता है। फिर भी यह उल्लेख्य खूबी है कि जब समकालीन हिंदी कहानी में अलग-अलग चरित्र करीब-करीब एक जैसी भाषा बोलते हैं तब उनकी कहानियों में चरित्रों की निजता बोलती है।

`पनही` कहानी में पूरण जब पनही गढने के बाद पटेल को देने निकलता हैं तो एक बार उसे गौर से देखता है इस बार उसे पनही की नाथन पर टँके फूल(पत्नी) की आँखें लगे। पनही का ऊपरी हिस्सा जिसके नीचे पांव का पंजा रहता हैं, वह पूडी सा दिखा, पनही की कमर के कटाव को देखकर वह मुग्ध हो गया और पैर की एड़ी ढकने वाला भाग देखकर, पीराक आंखों में उतर आयी। पटेल को पनही देखकर पनही की नाथन पर टंके फूल पटेलन के कानों के सुरल्ये लगे। लेकिन जब पटेल पूरण को शाबासी देने के लिये आगे बढ़ता है तो उसके मुंह से जो बोल फूटते है वह सांमत आवाज है- “किसी को खींचकर मार दो तो जीभ निसरी जाए”

‘पनही’ संग्रह की पहली कहानी है। इसमें चमडे का जूता गढ़ने वाले पूरण का क़िस्सा है। पूरण ग्रामीण मज़दूर है। पनही बनाने का उसका हुनर इलाके भर में मशहूर है। वह हर बार पटेल के लिये नये डिजाईन की पहले से सुंदर पनही गढ़ता है। उसका पनही बनाना किसी कला की साधना जैसा है। लेकिन इस काम से मिलने वाली आमदनी इतनी कम है कि परिवार का पेट पालना मुश्किल है। एक और विडंबना देखिए पनही बनाने वाला पूरण खुद पनही नहीं पहनता। इसकी बिरादरी का कोई भी पनही नहीं पहन सकता। एक बार पूरण नयी बनायी पनही लेकर पटेल के पास जाता है। तो वह मजदूरी बढ़ाने की मिन्नत करता है जिससे पटेल इंकार कर देता है। पूरण आगे की बातचीत से गुस्से में आ जाता हैं और बोल देता है- "ढोर घीसने के काम में इतनो ही तमारे फायदो नजर आवे तो तम करो, म्हारे नी करनू् है।" पटेल आग बबूला हो जाता है।

यहाँ से कहानी उस दिशा में आगे बढ़ती है। जब पूरण की मुश्किलें और उसकी बिरादरी के संघर्ष शुरू होते है। उसके साथी बिरादर एकजुट हो जाते है लेकिन वह पत्नी से कहता है –“तुम लोगो के माथे कटवाओगी।“ पीराक जवाब देती है -"पटेल की पनही पर धरे माथे की क्या आरती उतारें, ऐसा माथा कट जाए तो भला।" पूरण की दुविधा मिट जाती है वह लोगों के साथ इस सपने के लिये लडने को तैयार हो जाता है कि अब हमारी औलादें पढेंगी, पनही पहनेंगी और पटेलों की जी हुजूरी नहीं करेंगी। वह अपने लोगों से कहता है- "अब मेरा मुह क्या देख रहे हो, जाओ टापरे मे जो कुछ हो-लाठी, हँसिया लेकर तैयार रहो पटेलों के छोरे आते ही होंगे और हां उबाडे पगे मत आजो कोई ।"

पूरी कहानी अपनी बनावट में अत्यंत सघन है। मुक्ति कामना की जैसी अनुगूंज कहानी में है वह अद्वितीय उदाहरण है। कहानी हमें खाली झकझोरती ही नहीं हमारी चेतना में इतिहास की भांति दर्ज हो जाती है। जैसे पूरण पीराक और उनके लोग कहानी के पात्र नहीं हमारे पीछे छूट गये संघर्षशील साथी हो, जो दूर दराज कहीं अब भी लड़ रहे होंगे लेकिन हमारी जिंदगी में कहानी हो गये।`पनही` महज कहानी नहीं संघर्ष चेतना का सुंदर, कल्पनाशील आख्यान है।

‘बोंदा बा’ संग्रह की तीसरी कहानी है। दाम्पत्य की मार्मिकताओं का जैसा यथार्थ, गहन चित्रण इस कहानी में हुआ है वह उपलब्धि है। ‘बोंदा बा’ का दुख सार्वभौम सच्चाई है लेकिन उसका प्रतिरोध कलात्मक दृष्टि का सफलतम उदाहरण है। औलाद की क्रूरताओं और पत्नी के असहाय प्रेम मे बोंदा बा का जो चरित्र उभरता है वह दाम्पत्य की विडंबनाओं का प्रतिनिधि चरित्र है। ठंड से बेहाल बोंदा बा ठंड भगाने के लिये जिस तरह घर के कपड़े जला डालने का निर्णय लेता है उसका अपने प्रति अत्याचार के प्रतिकार की यह व्यंजना विलक्षण है। कहानी का अंत होता इस उम्मीद से कि एक एककर कपड़े जल रहे थे, लपटें आसमान छू रहीं थीं और भुनसारा हो रहा था।

`बिरादरी मंदारी की बंदरिया` उस सामाजिक यथार्थ को प्रकट करती है जिसमें बिरादरी शोषक सत्ता और भ्रष्ट व्यवस्था का आचरण करती है। दबंगई कैसे रिश्तों, संबंधों, दोस्तियों, विश्वासों का खून चूसकर बिरादरी की जोंक तैयार करती है जिसके मुँह में इंसान लगातार रक्त क्षीण होते जाते है यह सब कहानी में आप बिना कवित्वपूर्ण शैली और किसी बौद्धिक ताम-झाम के बगैर देख सकते है।

`गांव और काँकड़ के बीच` कहानी के केंद्र में कभी समाप्त न होने वाले जाति संघर्ष है। इन संघषों को धर्म, प्रचलित राजनिति, स्वीकृत दलित-सवर्ण सोच के दायरे में रखकर न देखा जाना एक उपलब्धि है। कहानी बताती है कि वर्तमान सामाजिक संरचना में जाति दरअसल संपत्ति केंद्र हैं। इस समाज में जब भी कोई इंसान जैसा सोचने लगता है तो सबसे पहले उसकी किसी कमजोरी को आधार बनाकर बिरादरी बाहर करने की कोशिश की जाती है। इसके बावजूद जब वह नही मानता यानी जाति, वर्ण के बाहर श्रमिक की जातीयता हासिल कर लेता है, एक समूह का अंग बन जाता है, फिर शोषण को चुनौती देता हैं तो उसे मार दिया जाता है। कहानी की खूबसूरती इसमें है कि वह बताती है- अकेला आदमी मार दिया जा सकता है लेकिन समुदाय नहीं मरता ।

`भेम का भेरू मांगता कुल्हाड़ी ईमान` सत्यनारायण पटेल की कहानी कला को एक नया आयाम देती है जिसमें भाषा और जीवन के संधान की प्रवृत्ति का उत्कर्ष दिखायी पड़ता है।

कुल मिलाकर कहना चाहिए सत्यनारायण पटेल की कहानियाँ जीवनानुभवों की निर्मिति हैं। कोरे अनुभवों या सैद्धांतिकी के आधार पर निर्मित समझ उनकी कहानियों के भीतर धंसने में बाधक होगी। उन्हें इन कहानियों का सच्चा आस्वाद मिलेगा जो अपने-अपने द्वीपों के वासी नहीं होंगे या फिर उन्हे जो कहानियों को जिंदगियाँ बूझने का अचूक उपाय मानते है।

शशिभूषण