रविवार, 27 मार्च 2011

आइए एक साधारण आदमी की नज़र से कमला प्रसाद को देखें

कमला प्रसाद जी के बारे में सोचने-लिखने और याद करने लायक मेरे पास बहुत है। यही वजह होगी कि मैंने जबसे उनके चले जाने की खबर सुनी है उनसे जुड़े अनेक भावों और स्मृतियों से भरा हूँ। लेकिन उबर पाने के लिए ही सही लिख कुछ भी नहीं पा रहा हूँ। दो दिन बाद आज थोड़ा तटस्थ हुआ हूँ तो कमला प्रसाद के बारे में एक साधारण इंसान के नज़रिए से कुछ साझा करना चाहता हूँ। कृपया इसे किसी साहित्यिक रचना की तरह न देखें। यह केवल एक याद है। यह वैसी ही याद है जैसे जब कमला प्रसाद जी के निधन की खबर रेडियो पर प्रसारित हुई तो गाँव में भाभी और माँ को मेरी याद आई। उन्होंने सोचा कि कमला प्रसाद पाण्डेय गुज़र गए हैं तो यह मुझे इतनी दूर तमिलनाडु में पता है कि नहीं। हो सकता है इसी बहाने उन्होंने मुझे याद किया हो कि मैं कैसे गाँव के घर में रहकर इन सब भोपाल,दिल्ली के साहित्यकारों के ही गुन गाता रहता था। आप यकीन मानिए यह मेरे कहानीकार मन की कमजोरी भी है कि किसी बड़े से बड़े आदमी को आम शख्स की निगाह से पहले देखो। विचार करो की वह लोगों की स्मृति में कैसा है। क्योंकि समय बड़ा अजीब हो चला है टीवी और अखबारों से भी पता नहीं चलता कि आम आदमी क्या सोच रहा है। एक साहित्यकार की छोड़ दें तो सब पहले रसूखदारों की सुनते हैं। मीडिया का छोटे से छोटा आदमी भी यदि आप कुछ नहीं हैं तो भाव नहीं देता।

मैं बीएससी करने के बाद जब अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सन् 2000 में एमए करने गया तो कमला प्रसाद 1998 में ही सेवानिवृत्त होकर भोपाल बस चुके थे। विभाग में पढ़ाने के लिए एकमात्र ढंग के अध्यापक आज के चर्चित कवि दिनेश कुशवाह थे। वे कहा करते मुझे कमला प्रसाद ही इस विभाग में लाए। मैं उनके साथ रहूँ तो रगों में नया खून आ जाता है। मन में दुगुनी ताक़त भर जाती है। मैं दिनेश कुशवाह की प्रेरणा से गणित छोड़कर हिंदी में आ गया था। कौशल प्रसाद मिश्र विभागाध्यक्ष थे। उन्हें इसी रूप में रीवा में जाना और माना जाता था। वे कमला प्रसाद के मनसा विरोधी थे और तब के म.प्र. के विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी जी के बड़े कृपापात्र थे। डाक्टर बारेलाल जैन संविदा व्याख्याता थे। उन्हें कमला प्रसाद ने 1994 में रिसर्च एसोसिएट के रूप में नियुक्त किया था। वे आज भी वैसे ही कभी संविदा तो कभी अतिथि विद्वान के नामों से टेंपोरेरी सेवाएँ दे रहे हैं। इन सबके मुह से मैं कमला प्रसाद के किस्से आए दिन सुनता रहता। सब संस्मरणों में कमला प्रसाद की बड़ी बड़ाई होती। उनके कद और काम के प्रति नमन होता। इन सबने कमला प्रसाद के लिए मेरे मन में बड़ी श्रद्धा भर दी थी। लेकिन मुझे वास्तविक संतोष तब मिला जब विभाग के ही चपरासी अशोक तिवारी से बतियाने की लत लग गई।

अशोक तिवारी बड़े विनम्र और सहृदय इंसान थे। उनमें ब्राह्मण होने के बावजूद अपनी नौकरी को लेकर कोई हीन भावना नहीं थी। बल्कि कभी कभार हमारे हाथ से भी गिलास,कप,प्लेट जबरन धोने के लिए छीन लेते यह कहकर कि यह मेरी ड्यूटी है। मुझे बुरा तब मानना चाहिए जब विभाग के बाहर कोई मुझसे यह काम करवाए। तनख्वाह लेता हूँ तो कैसी शर्म ? अशोक जी ने अपनी सादगी और शुभकामनाओं से धीरे धीरे मेरे मन में जगह बना ली। मैं खाली पीर्यड में विभाग के सामने पत्थर पर बैठा होता तो उनके पास चला जाता। वे दबी ज़बान में मन की बातें बोला करते।

शुरुआत ऐसे होती-“आपको यकीन नहीं होगा यह विभाग क्या था जब पाण्डेय जी अध्यक्ष थे। मैं विभाग का ताला बाद में खोलता दरवाजे पर सूटकेस लिए लोग पहले खड़े मिलते। पूछने पर बताते दिल्ली,भोपाल,बनारस आदि जाने किन किन जगहों से आए हैं। जब समय होता और कार्यक्रम शुरू होते तब पता लगता कि सुबह यूँ ही कमला जी का इंताज़ार कर रहे व्यक्ति कितने बड़े साहित्यकार हैं। दूसरे विभागों से भी लोग जुट आते।” अशोक तिवारी आगे बताते “कमला प्रसाद जी को जब विभाग मिला था तो यह भवन नहीं था। रसायन विभाग में एक कुर्सी टेबल दो आलमारी और कुछ विद्यार्थी ही थे। वहीं कक्षाएँ चलती। बाद में धीरे धीरे उन्हीं के प्रयासों से यह भवन बना। एम फिल की कक्षा शुरू हुई और इतनी विशाल लाइब्रेरी बनी। और केंद्रीय पुस्तकालय के सामने विशाल अंतर्भारती की स्थापना हुई जिसमें आज कबूतर बोलते हैं और विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं में जो प्रेमी हैं उनके लिए खंडहर का काम करता है। क्या तो कुलपति और क्या तो रजिस्ट्रार सब कमला जी की मानते थे। उनके पीछे पीछे कमला जी को किसी न नहीं देखा। बड़े स्वाभिमानी इंसान थे। अपनी गरिमा हरदम बचाकर रखते।

कमला जी भले कहीं जा रहे हों या कहीं से आये हों पर यदि आफिस बंद होने का समय नहीं हुआ है तो क्लास ज़रूर पढ़ाते। ये दिनेश कुशवाहा जी भी तब कितना काम करते थे और कमला जी के लिए एक पैर पर खड़े रहते। यह जो आज आप अध्यक्ष के कमरे में तंबाकू की गंध और पान की पीक देखते हैं उसी कुर्सी में बैठे हुए कमला जी एक से एक साहित्यिक चर्चाएँ करते। कमला जी के जाने के बाद रमाकांत श्रीवास्तव जी भी बर्दाश्त नहीं कर पाए और इस्तीफ़ा देकर चले गए खैरागढ़।”

अशोक तिवारी के भीतर जैसे आत्मीयता और सम्मान की झिर थी। वे कमला प्रसाद के बारे में बोलते नही थकते थे। रोज़ नया और ताज़ा पानी। उनके पास कृतज्ञता के कुछ निजी किस्से भी थे। जिसमें दो का अक्सर ज़िक्र करते। पहले किस्से में वे बताते “मैंने बेटी की शादी की तो कमला जी को निमंत्रण दिया। मौके पर तो नहीं पहुँच पाए पाण्डेयय जी लेकिन बाद में एक दिन पहुँच ही गए। नहीं पहुँच पाने का सच्चा अफसोस जाहिर किया। व्यवहार दिया।” यह बताते हुए अशोक भावुक हो जाते “बताइए कहां हम और कहाँ इतने बड़े पाण्डेय जी।कितने व्यस्त रहने वाले इंसान। पर उतने ही स्नेही। उतना ही याद रखनेवाले। कोई ऐसे ही इतना सम्मान नहीं पाता। जनता सबसे बड़ी अदालत होती है।कमला जी की निंदा करनेवाले कुंठित हैं।”

दूसरा किस्सा जब अशोक तिवारी बताते तो यह ज़रूर कहते “हो सकता है मैं यह आपको बता चुका होऊँ पर मैं इसे कभी भूलता नही हूँ। पाण्डेय जी दूसरे के अन्न-जल का बराबर ध्यान रखनेवाले अधिकारी थे। हमेशा सबकी मर्यादा और सम्मान का खयाल रखते। वे ऐसे नहीं होते तो मेरी नौकरी कब की जा चुकी होती।”

वाकया यह था-एक दिन कमला प्रसाद जी ने अशोक तिवारी को वि.वि. में ही स्थित इलाहाबाद बैंक में जमा करने के लिए पचास हज़ार रुपये का चेक दिया।वे चेक लेकर बैंक पहुँचे। वहां भीड़ थी तो किसी ने प्रस्ताव रखा कि चलिए पान खा लेते हैं। अशोक पान खाने पहुँच गए। पान लगानेवाला काफ़ी मजाकिया इंसान था। और क्या पता दुष्ट ही रहा हो। उसने अशोक से कहा कि दिखाइए उसे जिस काम की वजह से इतनी जल्दी में हैं। अशोक ने उसे देखने के लिए चेक दे दिया। पानवाले के हाथ में चेक आया तो उसने नया मज़ाक शुरू कर दिया कि इसे पान की तरह कैंची से काट दिया जाय तो क्या हो ? अशोक ने कातर होकर कहा लाओ चेक रोजी काट दोगे क्या? पर वह जाने किस रौ में था कैंची चला दी। चेक बीच से दो टुकड़े।

अशोक यहां पहुँचकर जरा देर साँस खींचते। “मुझे चीरो तो खून नहीं। वहाँ खड़े लोग भी भौचक्के रह गए। पर क्या करता। चेक के दोनों टुकड़े लिए जैसे अपनी नौकरी की लाश हो विभाग की ओर चला। पाँव नहीं बढ़ रहे थे। लेकिन पाण्डेय जी का सामना करने से बचने का भी कोई उपाय नहीं था। विभाग पहुँचा तो कमला प्रसाद जी मेरा ही रास्ता देख रहे थे। बोले विभाग बंद करो कहाँ रह गए थे इतनी देर तक? मैंने दोनों हाथ जोड़ दिए सर,बहुत बड़ी गलती हो गई। पता नहीं अब मेरा क्या होगा? अब सबकुछ आपके ही हाथ में है। कमला प्रसाद जी ने पूछा क्या हुआ तो मैंने उन्हें सब बता दिया। वे सुनकर कुछ नहीं बोले। बस एक सांस भरी और एक ही वाक्य कहा- हद करते हो भई।

अशोक किस्से के जब इस हिस्से पर आते तो उनमें सिहरन साफ़ दिखती थी। लेकिन वे अगले पल ही चहक उठते। गजब अधिकारी थे पाण्डेय जी। उसके बाद न कुछ पूछा न कुछ किया। बाद में नया चेक मैं ही जमा करने गया। तब भी नहीं। मिश्रा जी होते तो नौकरी हर लेते।

अशोक तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं। कई साल हुए उन्होंने पारिवारिक वजहों से गले में फंदा डालकर आत्म हत्या कर ली। मैंने उनकी मौत की बात कमला जी को फोन पर बतायी थी। वे बोले थे बहुत बुरा हुआ। अशोक अत्यंत भरोसेमंद आदमी था। जब भी मेरी उन दिनों बात होती कमला प्रसाद जी यह पूछना नहीं भूलते थे कि विभाग में सब कैसे हैं ?

मैंने बहुत सोचकर यह नहीं लिखा है। अशोक तिवारी कोई विद्वान व्यक्ति नहीं थे जिनकी बातों को कोई बहुत महत्व देगा। बस यह खयाल रहा कि जब कमला प्रसाद जी की नज़र में अशोक एक सच्चा और भरोसेमंद इंसान था तो उसी की नज़र में कमला प्रसाद कैसे थे क्यों न देखा जाय…

कहानियाँ गुमसुम,कविताएँ उदास


प्रलेसं के राष्ट्रीय महासचिव,प्रगतिशील वसुधा के प्रधान संपादक और प्रसिद्ध आलोचक,संगठक स्वर्गीय कमला प्रसाद जी के प्रति ओम द्विवेदी का यह श्रद्धांजली स्मरण नयी दुनिया में 26 मार्च को प्रकाशित हुआ।यहाँ इसे हम उनके ब्लॉग मीठी मिर्ची से साभार ले रहे हैं ।


२५ मार्च को सुबह-सुबह युवा कवि और कहानीकार शशिभूषण का मोबाइल पर संदेश आया कि-'' हम सबके कमला प्रसादजी सुबह ६ बजे नहीं रहे।'' कुछ देर बाद यही संदेश युवा कवि हनुमंत के मोबाइल से आया। दोपहर में योगेन्द्र ने कमलाजी के बारे में पूछा। कुछ सूझ नहीं रहा था कि किसी को क्या उत्तर दूँ और उनके बारे में क्या बात करूँ । एकलव्य की ही तरह तकरीबन १८ वर्ष तक मैं उनका शिष्य रहा। तथाकथित अर्जुनों और युधिष्ठिरों ने नहीं चाहा, वरना मैं भी अंतिम समय में उनसे मिल सकता था। जब तक उनकी बीमारी के बारे में पता चलता तब तक वे कोमा में एम्स पहुँच चुके थे। खैर! उनके आशीर्वाद ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है। करता रहेगा।


कविताओं की आँखों से आंसुओं का सोता फूट पड़ा हैं, कहानियाँ गुमसुम-सी हैं, उपन्यास उदास। शब्द थके-हारे से, जैसे किसी ने उनसे अर्थ निचोड़ लिया हो।...जैसे उनका रहनुमा चला गया हो। 'वसुधा' बेहाल है। कवियों और लेखकों की जमात स्तब्ध और हैरान। हरिशंकर परसाई का 'कमांडर', उन्हीं के पास पहुँच गया है। आलोचना का एक अध्याय ख़त्म हो गया है। ज़िंदगी के बेहद मज़बूत क़िले में मौत की काली बिल्ली कूद पड़ी है। व्यवस्था के कैंसर का इलाज करते-करते एक सुखेन वैद्य काया के कैंसर से हार गया है। कमला प्रसाद नाम के फ़ौलाद को मृत्यु ने तोड़ दिया है। अब किसी भी साहित्यिक आयोजन में उनकी ऊर्जावान उपस्थिति देखने को नहीं मिलेगी। अब नए लेखकों को कविताएँ और कहानियाँ लिखने का हुनर कौन बताएगा। रचना शिविर के लिए क़स्बों-क़स्बों और शहरों-शहरों कौन दौड़ा-दौड़ा जाएगा। अब दोस्त किसे इज्ज़त देंगे, दुश्मन किसे गालियाँ देंगे। अब कौन तपाक से फोन उठाएगा और पूछेगा कि आजकल क्या लिख-पढ़ रहे हो। कौन बार-बार समझाएगा कि अच्छा लेखक होने के लिए अच्छा इंसान होना ज़रूरी है। कौन कहेगा कि पार्टनर अपनी प्रतिबद्घता तय करो। प्रगतिशील लेखक संघ को संजीवनी देने के लिए कौन अपना रात-दिन एक करेगा। कमांडर! अभी तो तुम्हारे सिपाहियों ने युद्घ का ककहरा भी नहीं सीखा था और तुम मोर्चा छोड़कर चल दिए।


मेरे जैसे बहुतेरे लोगों ने उन्हें जब भी देखा चलते देखा, उनके बारे में जब भी सुना चलते सुना। कभी किसी आयोजन के लिए तो कभी किसी संघर्ष के लिए। न उनकी चाल में दिखावट और थकावट दिखी न उनके हाल में। विश्वविद्यालय और कला परिषद जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर सरकारी फ़ाइलों के बीच रहे, लेकिन उनका व्यक्तित्व फ़ाइलों का ग़ुलाम नहीं हुआ, उनमें नत्थी नहीं हुआ। उनके पास से जो फ़ाइलें आईं वे रचनात्मकता की कोख बन गईं और उन्होंने किसी जनपक्षधर आयोजन को जन्म दिया। नब्बे के दशक में वे रीवा विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष थे। जब मेरा उनसे परिचय हुआ तब वे केशव शोध अनुसंधान केंद्र को ओरछा जाने से रोकने के लिए एक-एक रुपए का चंदा कर रहे थे और अदालत की लड़ाई लड़ रहे थे। कालांतर में वे उस लड़ाई में आधा ही सही सफल हुए। उनकी उपस्थिति से रीवा विवि हिंदी प्रेमियों की चौपाल बन गया। हर हफ्ते किसी नामचीन साहित्यकार से मिलने और उन्हें सुनने का मौका मिलने लगा। रशियन विभाग में भीष्म साहनी का व्याख्यान चल रहा है तो हिंदी विभाग में काशीनाथ सिंह छात्रों से रूबरू हो रहे हैं। नागार्जुन और त्रिलोचन अपनी कविताई पर बोल रहे हैं, राजेन्द्र यादव कहानियों पर तो नामवर सिंह हिंदी आलोचना पर अपनी बात कह रहे हैं। खगेन्द्र ठाकुर, सत्यप्रकाश मिश्र, अजय तिवारी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रभाष जोशी जब चाहे तब चले आ रहे हैं। कभी राजेश जोशी, कुमार अंबुज और हरिओम राजोरिया कविताएँ सुना रहे हैं तो कभी देवास से नईम गीत सुनाने चले आ रहे हैं। कभी बद्रीनारायण की कविता का नया स्वाद मिल रहा है तो कभी सुदीप बनर्जी, चंद्रकांत देवताले और लीलाधर मंडलोई जैसे वरिष्ठ कवि युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं। शिवमंगल सिंह सुमन को भी मैंने पहली बार विवि के शंभूनाथ सभागार में ही सुना।


उसी दौर में रीवा जैसी छोटी जगह में हबीब तनवीर ने नाटकों पर ४५ दिन की वर्कशाप की और 'देख रहे हैं नयन' जैसे बड़े नाटक को स्थानीय कलाकारों के साथ किया। अलखनंदन, आलोक चटर्जी ने भी वर्कशाप की। राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय का शिविर लगा। भारतीय जन नाट्‌य संघ (इप्टा) के माध्यम से एक रंग आंदोलन रीवा में खड़ा हो गया। कमलाजी कभी खड़े होकर नुक्कड़ नाटक के लिए ताली बजाते मिल जाते तो कभी रिहर्सल देखते हुए। कवियों और कहानीकारों की तरह कई रंगकर्मी भी उस छोटी जगह से निकले। इसमें एक बड़ा योगदान कमलाजी का था। भोपाल के भारत भवन की तर्ज़ पर वे रीवा में एक सांस्कृतिक केंद्र विकसित करना चाहते थे। अर्जुनसिंह के मानव संसाधन विकास मंत्री रहते उन्होंने इस स्वप्न को तक़रीबन साकार कर लिया था, लेकिन बाद में राजनीतिक संकल्प शक्ति के अभाव में वह स्वप्न स्वप्न ही रह गया। विवि में रहते हुए ही उन्होंने 'विन्ध्य भारती' के संग्रहणीय अंकों का संपादन किया। उन्हीं के रहते 'वसुधा' रीवा से प्रकाशित होना शुरू हुई और बाद में उनके भोपाल आने के बाद भोपाल आ गई। कला परिषद भोपाल में उप सचिव रहते हुए 'कलावार्ता' को एक नई ऊह्णचाई उन्होंने दी और लोकोत्सवों की एक परंपरा शुरू की। यह उनकी राजनीतिक प्रतिबद्घता ही थी कि प्रदेश में भाजपा की सरकार आने के बाद उन्होंने उप सचिव की कुर्सी तत्काल छोड़ दी।


प्रगतिशील लेखक संघ को खड़ा करने और उसे लगातार सक्रिय बनाए रखने में कमलाजी के योगदान को उनके घोर निंदक भी नकार नहीं सकते। उनकी सांगठनिक क्षमता की मान्यता मैंने प्रलेस और इप्टा के कई राष्ट्रीय अधिवेशनों में देखी है। हालाँकि उनके ऊपर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे सेवकों का ही भला करते हैं, लेकिन मैंने उनको जितना देखा और समझा है तो वे सभी का भला करते ही दिखे हैं। जो चालाक चेले थे उन्होंने केवल उनका दोहन किया और उनके संबधों का अपने कॅरियर के लिए इस्तेमाल किया। कमाल यह था कि संगठन के लिए कमलाजी बिना किसी तर्क-वितर्क के अपना दोहन करवाते रहते थे। नए रचनाकारों को उन्होंने जितना अधिक रेखांकित किया और सतत मंच दिया, शायद ही किसी और ने किया हो। अपने अंतिम दिनों तक वे हम जैसे बिलकुल अनगढ़ रचनाकारों से लिखने के लिए कहते रहते थे। अर्जुनसिंह से उनकी मित्रता जग जाहिर थी, वे अपने समय के कद्दावर नेता थे, उस समय भी कमलाजी जब उनसे बात करते थे तो उतना ही झुकते थे, जितने में विनम्रता दिखे, चापलूसी नहीं।


व्यक्तिगत रूप से वे अपने मित्रों और दोस्त शिष्यों को कितना ख़्याल रखते थे, इसके लिए मेरे पास बेहद निजी उदाहरण हैं। १९९६ में जब मेरे पिताजी की मृत्यु हुई और मैं गाँव में था। उस समय तक गाँव में दूरभाष और मोबाइल की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। कमलाजी को पिताजी की मृत्यु के बारे में पता चला तो उन्होंने बहुत ही सांत्वनाभरा पोस्टकार्ड लिखा। यह भी लिखा कि टूटना मत मैं अभी ज़िंदा हूँ। तब से वे मुझे हमेशा पिता की तरह ही लगे। पिता की तरह ही उनसे प्रेम भी करता था और नाराज भी था।


नामवर सिंह की तरह वे बड़े आलोचक भले न रहे हों, लेकिन वक्ता उनकी टक्कर के थे। समझ उनसे उन्नीस नहीं थी। संगठन खड़ा करने और लोगों को जोड़ने में तो वे इक्कीस नहीं पचास थे। मुझे लगता है कि वे स्वर्गलोक जाकर यमराज को भी समझा रहे होंगे कि तू गरीबों को बहुत मारता है और अमीर भ्रष्टों को बख्श देता है। जरा समानता का व्यवहार कर। तू भी अच्छा इंसान बन। कमलाजी वहाँ पहुँचते ही परसाई और मुक्तिबोध से मिल आए होंगे। नागार्जुन, सुदीप बेनर्जी, हबीब तनवीर, भीष्म साहनी और नईम आदि के साथ कविता, कहानी और रंगमंच के नए अंदाज़ पर बात करने लग गए होंगे। हो न हो जाते ही वहाँ कोई रचना शिविर लगा बैठे हों। नर्क को स्वर्ग बनाने का कोई आंदोलन छेड़ दिया हो। वे वहाँ कुछ भी कर रहे हों, भी कर रहे हों, यहाँ तो सूनापन छोड़ गए हैं। विनम्र श्रद्घांजलि!

-ओम द्विवेदी

शनिवार, 26 मार्च 2011

मध्‍य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ का शोक प्रस्‍ताव


कमला प्रसाद जी ने पूरे देश के प्रगतिशील और जनपक्षधरता वाले रचनाकारों को उस वक्त देश में इकट्ठा करने का बीड़ा उठाया जब प्रतिक्रियावादी, अवसरवादी और दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता, यश और पुरस्कारों का चारा डालकर लेखकों को बरगलाने का काम कर रहीं हैं। उनके इस काम को देश की विभिन्न भाषाओं और विभिन्न संगठनों के तरक्कीपसंद रचनाकारों का मुक्त सहयोग मिला और एक संगठन के तौर पर प्रगतिशील लेखक संघ देश में लेखकों का सबसे बड़ा संगठन बना। इसके पीछे दोस्तों, साथियो और वरिष्ठों द्वारा भी कमांडर कहे जाने वाले कमला प्रसाद जी के सांगठनिक प्रयास प्रमुख रहे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से लेकर, पंजाब, असम, मेघालय, प बंगाल और केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में संगठन की इकाइयों का पुनर्गठन किया, नये लेखकों को उत्प्रेरित किया और पुराने लेखकों को पुनः सक्रिय किया। उनकी कोशिशें अनथक थीं और उनकी चिंताएं भी यही कि सांस्कृतिक रूप से किस तरह साम्राज्यवाद, सांप्रदायिकता और संकीर्णतावाद को चुनौती और शिकस्त दी जा सकती है और किस तरह एक समाजवादी समाज का स्वप्न साकार किया जा सकता है। ‘वसुधा’ के संपादन के जरिये उन्होंने रचनाकारों के बीच पुल बनाया और उसे लोकतांत्रिक संपादन की भी एक मिसाल बनाया।


कमला प्रसाद जी रीवा विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे, मध्य प्रदेश कला परिषद के सचिव रहे, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के अध्यक्ष रहे और तमाम अकादमिक-सांस्कृतिक समितियों के अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे, अनेक किताबें लिखीं, हिंदी के प्रमुख आलोचकों में उनका स्थान है, लेकिन हर जगह उनकी सबसे पहली प्राथमिकता प्रगतिशील चेतना के निर्माण की रही। उनके न रहने से न केवल प्रगतिशील लेखक संघ को, बल्कि वंचितों के पक्ष में खड़े होने और सत्ता को चुनौती देने वाले लेखकों के पूरे आंदोलन को आघात पहुंचा है। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संगठन तो खासतौर पर उन जैसे शुरुआती कुछ साथियों की मेहनत का नतीजा है। उनके निधन से पूरे देश के लेखक, रचनाकार, पाठक, साहित्य व कलाओं का वृहद समुदाय स्तब्ध और शोक में है।


कमला प्रसाद जी ने जिन मूल्यों को जिया, जिन वामपंथी प्रतिबद्धताओं को निभाया और जो सांगठनिक ढांचा देश में खड़ा किया, वो उनके दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ने वाले लोग सामने लाएंगे। साथ ही प्रेमचंद, सज्जाद जहीर, फैज, भीष्म साहनी, कैफी आजमी, परसाई जैसे लेखकों के जिन कामों को कमला प्रसाद जी ने आगे बढ़ाया था, उन्हें और आगे बढ़ाया जाएगा। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य कार्यकारिणी उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है।

-पुन्नी सिंह, अध्‍यक्ष
विनीत तिवारी, महासचिव
शैलेंद्र शैली, कार्यकारी महासचिव

शनिवार, 19 मार्च 2011

सभी सुखों के वाक्य में, दुःख का एक हलंत।जीवन के इस चक्र में हरदम कहाँ वसंत।।

इस बार की होली में मस्ती,चिंतन और कवित राग से भरपूर ओम द्विवेदी के फागुनी दोहे।पढ़ने के लिए कोई निर्धारित समय सीमा नहीं है।होली एक दिन का त्यौहार भी नहीं।चैन से पढ़िए,मन भर गुनिए।और हाँ कवि के लिए आप चाहे जितनी दाद सोचें मुझे तब बधाई दीजिएगा जब बिल्कुल मजबूर हो जाएँ।इस पोस्ट के साथ साल भर की गारंटी है।अगली होली में इनमें से कोई न कोई दोहा ज़रूर याद आएगा।जो दोहा न रुचे उसे दोहे से ही बदलने का ज़िम्मा हमारा। -ब्लॉगर


सूरज ने जबसे किया, फागुन को उद्दंड।
पानी-पानी लाज से, हुई बेचारी ठंड॥

गेर खेलने सड़क पर, निकले सातों रंग।
फागुन हंसता देखकर, चांद संवारे अंग॥

आँखों-आँखों सज गया, फागुन का बाजार।
दिल वाले करने लगे, सपनों का व्यापार॥

सपने सब टेसू हुए, केसर-केसर रूप।
अंग-अग फागुन हुआ, बदन उलीचे धूप॥


ढोल, मजीरे, मसखरी, रंग, गीत, सत्कार।
प्रेम पंथ में आज भी, फागुन है त्योहार॥

आंखें प्यासी हो रहीं, तन-मन तपे बुखार।
फागुन के बीमार का, फागुन ही उपचार॥

कली-कली का रूप अब, आंखें रहीं सहेज।
फागुन चुपके से बना, सपनों का रंगरेज॥

बहकी-बहकी-सी लगे, हवा छानकर भंग।
गाल गुलाबी देखकर, बहक रहे हैं रंग॥

अपने कर पाते नहीं, अपनों की पहचान।
रंगों ने जबसे किया, सबको एक समान॥

अचरज करते ही मिले, सारे वैद्य-हकीम।
फागुन से मिलकर गले, मीठी हो गई नीम॥

धरती से आकाश तक, पुख्ता सभी प्रबंध।
तितली ने फिर भी किया, फूलों से संबंध॥

नुक्कड़-नुक्कड़ पर लगी, रंगों की चौपाल।
गाल शिकायत कर रहे, छेड़े हमे गुलाल॥

बहते पानी में नहीं, ठहरे कोई रंग।
ठहरा पानी ही करे, रंगों से सत्संग॥


महंगाई को देखकर, उड़ा रंग का रंग।
फागुन करे गुलाल से, नए तरह की जंग॥

जगल की परजा सभी, देख-देखकर दंग।
गीदड़ पाता जा रहा, शेर सरीखा रंग॥

रंग तोड़ने लग गए, फागुन का कानून।
लाल-लाल पानी हुआ, काला-काला खून॥

सपने, आंखें, भूख सब, हैं बाजार अधीन।
रंग, अबीर, गुलाल से, कैसे हों रंगीन॥

राजा-परजा साथ में, मिलकर खेलें फाग।
परजा डूबी प्रेम में, राजा करता स्वांग॥

दिल्ली में ही कैद हैं, सुख के सभी वसंत।
जो कुछ आया यहां, लूट गए श्रीमंत।

सभी सुखों के वाक्य में, दुःख का एक हलंत।
जीवन के इस चक्र में, हरदम कहां वसंत॥


चेहरे पर झुर्री दिखी, हो गए बाल सफेद।
ऋतु वसंत की उम्र से, व्यक्त कर रही खेद॥

रंगों को होने लगा, मजहब का अहसास।
फागुन सिर पर हाथ रख, बैठा मिला उदास॥


गुपचुप किया विपक्ष ने, राजा से संवाद।
रही सलामत होलिका, भस्म हुआ प्रहलाद॥

वेदपाठ भगवा करे, बोले हरा अजान।
फगुआ गाए प्रेम से, मिलकर हिंदुस्तान॥

रंगों से है कर रहा, फागुन यह अनुरोध।
आपस में करना नहीं, आगे कभी विरोध॥

-ओम द्विवेदी
१६९- ए, अन्नपूर्णा सेक्टर, सुदामा नगर, इंदौर, म.प्र.

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

क्या मुझे इस मसले पर बोलने का हक़ है ?

मैंने महसूस किया था कि जब से उदय प्रकाश को इस बार के साहित्य अकादमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है कुछ जगह आँसू और गालियाँ जमा हो रहे हैं.लोग विलाप करना चाहते हैं.छाती कूटना चाहते हैं.वे जगह-जगह मौके की ताक में सुगबुगी पैदा करते,मन टटोलते,प्रतिबद्धता,क्रांतिकारिता की दूसरों की बुनी चादरें ओढ़े घूम रहे हैं.उनमें से अधिकांश का कृतित्व अभी तक इतना ही है कि वे किसी भी रचना में खामी खोज सकते हैं उसे दो कौड़ी का सिद्ध कर सकते हैं.भले ही इस उपक्रम में उघड़ जाएँ. हास्यास्पद हो जाएँ.अपनी किसी टीका को रचना से ऊँचे फहरा सकते हैं.इस बात की कोई ईमानदार खुशी ही नहीं दिख रही थी इन विकल वाग्वीरों में कि निर्मल वर्मा के कहानी संग्रह के बाद पहली बार कोई अकेली कहानी सम्मानित हुई है.यह आगे कितना बड़ा साहित्यिक चैलेंज होने जा रहा है इससे इन लोगों को कोई फर्क नही पड़ रहा था.

आज जब हर पुरस्कार घोषित होते ही संदिग्ध हो जाता है,पुरस्कार पाने जितना ही पुरस्कार स्थापित करने की होड़ है तब इस अकादमी पुरस्कार की अपार स्वीकार्यता से भी इन्हें सबक नहीं मिल पा रहा था.लेकिन कोई अचूक मौका नहीं मिल पा रहा था.आपने भी उनको देखा होगा वे समय-समय पर काफ़ी विनम्र भी हो जा रहे थे...आलोचक,विश्लेषक,समीक्षक की मुद्रा में जो थे.कह रहे थे कि उदय प्रकाश की रचना धर्मिता से हमें कोई शिकायत नहीं लेकिन उक्त सम्मान की वजह से इस लेखक ने हमारे दिलों में बनायी जगह तोड़-फोड़ डाली है.यह हो रहा था और इसी फेसबुक में.ब्लॉग,वेबसाइट्स में हो रहा था.इसकी असलियत यह थी कि इनकी कुछ बद्धमूल नारजगियाँ जो बैर में कबकी बदल चुकी थी कुलबुला रही थी.मैं भी शिकार बना था.इसी कवि की एक प्रिय छोटी रचना जो मारना शीर्षक से है और मेरे ब्लॉग हमारी आवाज़ में भी है अपनी वाल पर लगा दी थी.वे मुझे भी उदय प्रकाश का भक्त,चाटुकार,सवर्ण,मनुवादी जाने क्या क्या कह रहे थे.कुछ आतुर अवसरवादी उन्हें पसंद कर रहे थे.

मैं ग़लतफहमी में था कि वह मौक़ा नही आएगा जब फिर से निंदा,चरित्र हनन की पुरानी गंध फैलेगी.उदय प्रकाश काफ़ी संतुलित भी दिख रहे थे.लेकिन इस मिसाल बन चुके लेखक की एक बड़ी कमज़ोरी है.यह अमूर्त,गूढ़ बौद्धिक प्रतिवाद नहीं कर पाता बल्कि साफ़-साफ़ दोटूक शब्दों में सीधे बुरी नीयत पर चोट करता है.आखिर उदय प्रकाश जी को उकसाने में वह सफलता मिल ही गई जिसका लोग इंतज़ार कर रहे थे (इस पर भी हँसेगे वे.मुझे शातिर कहेगे कि उदय प्रकाश इतने भोले ठहरे कि उन्हें उकसा दिया जाए).उन्होंने ग्वालियर में होनेवाले कविता समय के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी.जिसने बोधिसत्व जी को आहत कर दिया.वे आपे से बाहर हो गए.चूँकि यह पूरा विवाद एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य रखता है,एक पुरानी घटना की कमज़ोरी से उपजा है इसलिए यह बोधिसत्व जी की जितनी नाराज़गी है उससे अधिक किन्हीं लोगों के हाथ सेंकने का अवसर है.फिर भी मुझे आश्चर्य है कि बोधिसत्व जी इस हद तक विचलित हो गए.यदि वे प्रतिवाद करना ही चाहते थे तो उनके पास अनुभव,धैर्य और समर्थ रचनाकार की अपनी शिष्ट भाषा है.

मुझे ताज्जुब है कि कोई मोहनदास को स्तरहीन कहानी मानता है,कोई मैगोसिल को मनुष्य विरोधी कहानी.कोई इस कथाकार को चरित्र हनन करनेवाला शिकारी कथाकार कहता है,किसी को यह लेखक हमेशा रोते रहनेवाला आक्रामक,आत्म दया से पीड़ित लगता है,किसी को आत्ममोह का मरीज़,किसी को नकलची.किसी को इसकी आत्मा तक कुंठा के दलदल में धँसी हुई प्रतीत होती.कोई इस सचमुच के जनपक्षधर अद्वितीय लेखक को पतित मानता है और..और फिर भी बड़ा लेखक कहते नहीं थकता,विभिन्न आयोजनों में बुलाना भी चाहता है.पत्रिकाओं में बधाइयाँ देता है.जबकि मैं रपटें पढ़ने का भी आदी हूँ मैने देखा है उदय प्रकाश करीब करीब कहीं जाने से बचनेवाले साहित्यकार हैं.साथ ही उन्होंने शायद ही किसी से कहा हो कि मेरी अमुक रचना की समीक्षा कर दीजिए.लेकिन हमारे यहाँ आजकल यह पाखंड चरम पर है कि पहले हर स्तर का विरोध करो फिर सम्मान देकर प्रशंसा करके वैचारिक उदारता का परिचय दो.

सब पढ़े-लिखे लोग जानते हैं कि उदय प्रकाश कम से कम पच्चीस बार लिख-कह चुके हैं कि गोरखपुर का आयोजन कोई सम्मान समारोह नहीं था उनके बड़े भाई की मरणोंपरांत सालभर बाद होनेवाली बरषी का पारिवारिक आयोजन था.लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया.

यदि उदय प्रकाश की कोई कहानी किसी पर केंद्रित प्रतीत होती है तो इसका यह मतलब नहीं कि वे गुनहगार हैं.अंतत:हर कहानी किसी न किसी पर लिखी ही जाती है.पात्र-घटनाए इसी ज़मीन पर उपजती हैं.हिंदी में ऐसी कहानियों की लंबी फेहरिश्त भी है.ऐसे कहानीकारों के सम्मान में भी कोई कसर नहीं बरती गई है.

उदय जी ने ग्वालियर के आयोजन के संबंध में जो कहा है उन्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए था.लेकिन उन्हें ऐसा कहने के लिए बाकायदा मजबूर किया गया है.इसे देख पाना मुश्किल नहीं.मैं अपने अनुभव से जानता हूँ कि वे उलझें इसका इंतज़ार किया जा रहा था.

सब जानते हैं आशीर्वाद देने के लिए बड़ा होना पड़ता है लेकिन गालियाँ देने के लिए कोई छोटा नहीं होता.आश्चर्यजनक ढंग से उदय प्रकाश के निंदक प्रशंसक बराबर हैं.

हम जो उदय प्रकाश को पसंद करते है और उनकी निंदा से काफ़ी दुखी होते हैं नादान लोग नहीं है.न ही चाटुकार हैं.हम इसी समय में अमरकांत,विनोद कुमार शुक्ल,श्रीलाल शुक्ल,मन्नू भंडारी,कृष्णा सोबती,काशीनाथ सिंह,असगर वजाहत,संजीव,शिवमूर्ति,प्रियंवद,अखिलेश आदि को उतना ही मान देनेवाले लोग हैं.यदि किन्हीं निंदा प्रवीण महत्वाकांक्षियों को लगता है कि हम टुँटपुजिए हैं तो यही सही पर सच्चाई वे भी जानते हैं कि उदय प्रकाश को पढ़ना,उनसे बातचीत करना कैसा अनुभव होता है.

उदय प्रकाश के बारे में बोधिसत्व जी का कहना है- बाबू साहब सारे संसार से नाराज है। वे खुश है तो केवल सम्मान,पुरस्कार-राशि, सेवकों और संरक्षकों से। सम्मान दे तो दंगाई की भी स्तुति कर आते हैं...वे साहित्य को जंगल समझ कर घूम रहे हैं अपनी कविता के सिंह की तरह पूँछ उठाकर। वे भूल गए हैं कि पूँछ उठाकर घूमने से किसी का भी अंग-विशेष दिखने लगता है। बाबू साहब को उनकी नंगई मुबारक....हम परजा हैं हमें हमारे हाल पर छोड़ दें राजाधिराज... आप...दोहाई है....

आज तक किसी दलित, पिछड़े और मुसलमान हिंदी लेखक को साहित्य अकादमी सम्मान नहीं मिला। राही मासूम रजा, गुलशेरखान शानी, मंजूर एहतशाम, अब्दुल बिस्मिल्लाह, असगर वजाहत, ओम प्रकाश बाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, सूरजपाल चौहान, यहाँ तक कि राजेन्द्र यादव ...और शिवमूर्ति जैसे कथाकार भी अब तक अपनी योग्यता नहीं सिद्ध कर पाए.... क्या बाबू साहब को मिले अकादमी सम्मान से ऊपरोक्त वंचित लेखकों के साथ न्याय हो गया है....क्या बाबू साहब इन सारे लेखकों से कहीं बढ़कर हैं...और आज तक किसी दलित और मुसलमान युवा कवि को भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार नहीं मिला.....उम्मीद करते हैं कि अब तो उधर भी कुछ प्रकाश फैलेगा.....क्यों बाबू साहब..आपकी यह बाम्हन प्रजा ठीक समझ रही है न...

बाबू साहब इतने पवित्र हैं वे चाहते हैं कि हम उनके मूत्र का आचमन चरणामृत समझ कर करें..


मैं बोधसत्व जी की इस प्रतिक्रिया से हतप्रभ हूँ..मैंने उन्हें बहुत मिलनसार,मान देनेवाले और स्नेही व्यक्ति के रूप में जाना था.उनके फेसबुक की वाल पर के इस कथन से अन्य लोग भी सन्न हैं.कुछ लोगों ने कहा कि मुझे भी उदय प्रकाश की कविता समय संबंधी टिप्पणी से असहमति है मैं बोधिसत्व के उक्त कथन पर ठहाका लगा सकता हूँ लेकिन आत्मा गवाह नहीं देती.यह शैतानी खुशी होगी.गाली-गलौज का समर्थन नहीं किया जा सकता.

मैं भी सचमुच चाहता हूँ कि ग्वालियर का आयोजन सफलता पूर्वक संपन्न हो.जहाँ चंद्रकांत देवताले जी जैसे वरिष्ठ कवि और कुमार अनुपम जैसे युवा कवि को सम्मानित होना है वह आयोजन किन्हीं व्यक्तिगत छींटाकशी की वजह से चर्चा का विषय न बने.

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

अच्छी स्त्री

रेल में सफ़र करते हुए विश्वास कर लेने से बचने की सलाह दी जाती है.ट्रेन में आए दिन ऐसी ऐसी वारदातें,हादसे सुनाई देते रहते हैं कि लोगों द्वारा इस सलाह को आदत बना लेने में बुराई भी नहीं दिखती.लेकिन सच तो यही है कि रेल में दो चार को छोड़कर बाक़ी अच्छे मनुष्य ही होते हैं.मैं सोचता हूँ यात्रा में इंसान अपने मन के अधिक क़रीब होता है.इसी फ़ितरत को ध्यान में रखकर अपराधियों ने ट्रेन का इस्तेमाल शुरू किया होगा.इस पर विस्तार से सोचा जा सकता है.

मेरे साथ उल्टा होता रहा है.हर बार कोई न कोई दिलचस्प इंसान,यादगार शख्सियत मिल ही गयी.उनमें से कइयों से तो आज मेरा दोस्ताना है.अपनी इसी उपलब्धि और कमज़ोरी के चलते मैंने स्लीपर बोगी में ही चलने का नियम बना लिया है.साधारण डिब्बे में बहुत मुश्किल होती है.बैठना हो ही नहीं सकता वरना मेरा खूब मन होता है कि वहीं बैठें.जैसा नौकरी से पहले करते रहे हैं.लोगों को देखें,उनसे बातें हो...पिछले तीन सालों में मैंने हज़ारों किलोमीटर लंबी-लंबी रेल यात्राएँ की हैं.पचास-पचास घंटे ट्रेनों में बैठा हूँ.दर्जनों इंसान हैं जो इन यात्राओं में मेरे लिए यादगार रहे हैं.सब पर लिखने का मन भी होता है जो क्लासिक ही लिखने की सपने देखने जैसी प्रवृत्ति में जाने कब पूरा हो या न भी हो.

लेकिन आज मैं केवल पंद्रह मिनट के सफ़र के कुछ क्षण बाँटने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ.मैं आजकल तमिलनाडु में हूँ.यहाँ के तक्कोलम क़स्बे में रहते हुए जब मैं किसी काम से अरक्कोणम जाता हूँ और लौटते हुए पाँच बज रहे हों तो पाँच बजे की ही लोकल पकड़कर तिरवलंगाडु होते हुए घर लौटता हूँ.चेन्नै सेंट्रल जानेवाली इस लोकल को पकड़ लें तो ठीक पंद्रह मिनट में तीसरा स्टॉप तिरुवलंगाड़ु है.वहाँ से कैंपस में ही स्थित अपने घर के लिए सी.आई.एस.एफ. की शिफ्ट गाड़ी मिल जाती है...यानी छह बजने से पहले कुल दो रुपये के किराए में घर.

उस दिन मैं टिकट लेकर चार नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा था.जब दस मिनट रह गए तो सोचा अब बैठते हैं.सामने की ही बोगी में खिड़कीवाली सीट खाली थी.बैठे हुए बाहर झाँकने में मैंने अंदाज़ किया कि एक स्त्री खाली सीट के लिए इसी बोगी में आना चाहती है.मैने उसे ग़ौर से देखा.उसका बुर्का पीठ पर उल्टा लटक रहा था.गेहुँआ रंग,भरे चेहरे की वह औरत मुझे अत्यंत सौम्य और शांत स्वभाव की लगी.वह जिस तरह देख रही थी उससे मुझे अनुमान लगाने में देर न लगी कि वह इसी बोगी में आएगी.सोच तो मैंने यहाँ तक लिया कि हो सकता है वह मेरे सामने की खाली सीट पर ही बैठना चाहे.कुछ मिनटों में वैसा ही हुआ.वह आ गई.इधर उधर नज़र दौड़ाने के बाद वह मेरे सामने खड़ी थी.मैंने देखा उसके साथ एक पंद्रह सोलह साल की लड़की,अधेड़ स्त्री-पुरुष भी थे.चारों मेरे सामने की सीट पर बैठ गए.लेकिन जब चार जन का बैठना मुश्किल लगा तो पुरुष मेरी बगल में आ बैठा.ट्रेन चल दी.सरकती ट्रेन के बाहर से मूँगफली बेंचनेवाले ने एक पैकेट बढ़ाया जिसे उस स्त्री ने हाथ बढ़ाकर पकड़ लिया.लड़की जैसे तैयार ही थी उसने पाँच रुपये का सिक्का बढ़ा दिया.

स्त्री पैकेट से निकालकर तीनों को फलियाँ दे रही थी.मैं असहज हो जाने से बचने के लिए कि वह मुझे भी मूँगफली देने लगी तो मुझे इंकार करना पड़ेगा मैं खिड़की से बाहर देखने लगा था.क्योंकि मुझे लग रहा था कि वह मुझसे भी ज़रूर पूछेगी.बाहर देखते हुए मैने महसूस किया कि खुला हुआ पैकेट मेरे सामने है.स्त्री मुँह से आग्रह करने की हिम्मत नहीं कर पा रही है.मेरी किसी तरह की प्रतिक्रिया न पाकर उसने लड़की की ओर पैकेट बढ़ा दिया.

उसका घूमता हुआ हाथ एक बार फिर मेरे सामने था.मैंने इस बार पैकेट को देखा और स्त्री को भी.वह कुछ नहीं बोली.मैंने सकुचाते हुए कहा धन्यवाद...आप लोग लीजिए.स्त्री तब भी पैकेट मेरे सामने किए रही.पुरुष ने कहा-ले लीजिए.ट्रेन में मूँगफली अच्छी लगती है.मैंने झिझकते हुए कुछ फलियाँ उठा लीं.सौजन्यता दिखाते हुए स्त्री से पूछा-आप लोग सेंट्रल जा रहे हैं ? नहीं पेरंबूर तक जाएँगे.मेरा अगला सवाल था-आपको हिंदी आती है ? उसने मुस्कुराकर कहा-थोड़ा थोड़ा.

वह मुझे काफ़ी सुंदर,समझदार लगी.अब मैने तीनों को ठहरकर देखा.मुझे उनकी की शक्ल ने चकित कर दिया.मैंने स्त्री से पूछा-यह आपकी बेटी है ? उसने कहा –हाँ.मैंने अगला सवाल किया-और ये आपकी मां हैं ? उसने सिर हिलाया.मैं चहककर बोला-आप तीनों की शक्लें इतनी मिलती हैं कि कोई भी झट से जान लेगा और सच तो यह है कि इतनी मिलती-जुलती शक्लें मैंने आज तक देखी ही नहीं.वह मुस्कुराई.उसने बताया यह मेरी एक ही लड़की है.नौ क्लास में पढ़ती है.मैं भी मां की अकेली हूँ.मुझे इस संयोग और समरूपता पर खासी खुशी हुई.

लड़की से मैंने उसका स्कूल पूछा.वह बताकर इयर फ़ोन लगाने में व्यस्त हो गई.आप कहाँ से हैं ? स्त्री ने मुझसे पहला सवाल किया.मेरे म.प्र. का बताने पर उसकी मां ने जोड़ा कि यहाँ खाने-बोलने में तो बहुत दिक्कत होता होगा.मैंने कहा कि अब उतनी नहीं होती.स्त्री ने मुझसे जानना चाहा मैं कहाँ उतरूँगा.मैंने बताया बस अगले ही स्टॉप पर.अच्छा....कहकर वह उबली हुई जड़ों का एक गट्ठर निकालने लगी.

इस जड़ को जो नीचे से मोटी और ऊपर पतली होती जाती है तमिलनाडु में लोग खूब खाते हैं.मैंने उसे देखा तो बहुत था पर खाया कभी नहीं था.वह मुझे भी देने लगी.मैंने पूछा यह क्या है?उसने नाम बताया.कई बार पूछने-बताने पर भी उसका उच्चारण मेरी पकड़ में नहीं आया (आज तक मैं उसका नाम नहीं याद कर पाया हूँ.तमिल अब तक सीख न पाने की एक बड़ी वजह यह भी है कि वह बोलने में बड़ी संक्षिप्त और उलझाऊ है.मेरी वैसी जीभ ही नहीं लटक पाती.) मुझे तो पता भी नहीं इसे कैसे खाते हैं.मैंने कहा.उसने एक जड़ को तोड़कर,छीलकर मुझे खाना समझा दिया.साथ ही एक छीला हुआ टुकड़ा भी पकड़ा दिया.मुझे उसका स्वाद उबले सिंघाड़े से मिलता जुलता लेकिन थोड़ा कसैला लगा.अच्छा है...मेरे कहने पर उसने कहा मुझे मालूम है आपको अच्छा नहीं लगा होगा...लेकिन थोड़ा बाद मे पसंद आने लगेगा...

यह स्त्री वाकई समझदार,अच्छी और कितनी निश्छल है !..

ट्रेन धीमी होने लगी थी.मैं अपना बैग कंधे में टाँगकर खड़ा हो गया.चलने लगा तो उसने टोका आपका झोला.मैंने शुक्रिया कहा और उतर गया.

मैं प्लेटफार्म पर खड़े खड़े एक बार उस स्त्री को देखना चाहता था.पर लोकल चलते ही रफ्तार पकड़ लेती है.वह चाहकर भी मेरी मदद नहीं कर सकती थी.खिड़की पर उसकी बेटी बैठी थी.लड़की ने मुझे हँसमुख बाय किया था...

घर लौटने के बाद और कई बार अरक्कोणम स्टेशन पर मुझे वह स्त्री याद आई.उसके बारे में सोचते हुए मुझे अपना यह सोचना अजीब लगता है कि वह इतनी सुंदर और अच्छी है कि उसने ज़रूर ज़िंदगी में बड़े धोखे खाए होंगे.लेकिन उसे भूल कोई नहीं पाया होगा...साथ ही कुछ लोगों के इस कहने पर चीख पड़ने का मन होता है कि मुसलमानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता....



गुरुवार, 13 जनवरी 2011

जन्मना

जन्मना सवर्ण बुजुर्ग ने जन्मना दलित बुद्धिजीवी से कहा -गांधी,तत्कालीन भारत के सच्चे और सबसे बड़े नेता थे.पर उनकी राजनीति जिस त्याग और सत्यनिष्ठा पर आधारित थी उसकी कद्र करनेवाला समय अब नहीं रहा. दुर्भाग्य से आनेवाला समय उन्हें राजनीतिक संत के रूप में ही श्रद्धा से देखेगा.लेकिन अंबेडकर भविष्य के नेता हैं.क्योंकि वंचितों को अभी उनकी ज़रूरत है,उन्हें आगे आना है.वे धीरे धीरे जाग रहे हैं, उठ रहे हैं.अंबेडकर का चिंतन आवश्यकता के अनुरूप अग्रगामी है..आने वाला समय अंबेडकर का है

यह सुनकर जन्मना दलित बुद्धिजीवी असहमत हो गए-गांधी के प्रति आपका सोच अपेक्षा के अनुरूप है पर आपके अंबेडकर के प्रति इस सम्मान से ब्राह्मणवाद की बू आती है.यह मूलत: सवर्ण मानसिकता से प्रेरित है.जिसका आधार होता है सायास महिमामंडन.इस भविष्यवादी महिमामंडन से यथास्थितिवादी तर्क पैदा होता है कि यह अंबेडकर का समय नहीं है वह भविष्य में आएगा.अंबेडकर गांधी के ही समय में उनसे बड़े नेता थे.हम भविष्य नहीं वर्तमान चाहते हैं.

कैसे? जन्मना सवर्ण बुजुर्ग चौंक गए.

क्योंकि आप जन्म से सवर्ण हैं.सवर्णों के भीतर से जीवन भर जाति की ही ग्रंथि नहीं जा पाती.वे हमेशा से भिखारी के वेश में दाता रहे हैं.गांधी की तुलना में अंबेडकर को सदैव एक छवि देने की कोशिश में देखे गए हैं.ऐसी छवि जिसे दोयम की भूमिका के साथ निर्मित किया जाता है.भविष्य आदि के अमूर्तन सवर्ण मानसिकता के बुर्ज हैं.जहाँ अंबेडकर को भी क़ैद कर देने की साजिशें नव दलित चेतना अब खूब समझती हैं.हम मँहगे त्याग,अहिंसा को तब तक बड़ा मूल्य नहीं मान सकते जब तक अपने सारे वाजिब हक़ पा नहीं लेते.इसकी मोटी समझ तो आपको अंबेडकर और गांधी के पहनावे से ही आ जानी चाहिए थी.दलित उभार को स्थगित रखने की महिमामंडन की नींव पर बनी समर्थन की पू्र्वपीठिका हम उखाड़ फेंकेंगे.जन्मना दलित बुद्धिजीवी ने तैश में आकर कहा

आप इतने समझदार हैं तो यह भी जानते ही होंगे कि अंबेडकर के गुरु भी सवर्ण थे.आज बहुत से अंबेडकरवादी भी सवर्ण हैं.तो क्या आप इससे भी लड़ेंगे?जन्मना सवर्ण बुजुर्ग ने जैसे पत्थर से सिर बचाने के लिए ऐतिहासिक,सामयिक तथ्य की ओट ली

जन्मना दलित विमर्शकार ने ज़ोर देकर कहा-अंबेडकर ने मेरे जानते यही एक बड़ी ग़लती की.यह ग़लती भी नहीं एक मजबूर ऐतिहासिक स्थिति है.सवर्ण अंबेडकरवादी काफ़ी नुकसान पहुँचा रहे हैं.लेकिन आप चिंता न कीजिए हम इस पाखंड को भी नहीं चलने देंगे.

जन्मना सवर्ण बुजुर्ग परेशान हो गए-बड़ी मुश्किल है,मैं तो यह भी नहीं कह सकता कि आप जन्म से दलित ठहरे.बड़बड़ाते हुए अंबेडकर चौराहे से अटल द्वार की ओर मुड़ गए.आपका ज़माना गया,मिसालें नहीं यथार्थ जीतेगा सोचते जन्मना दलित बुद्धिजीवी बहन जी निवास की तरफ़ जानेवाली सड़क पर बढ़ गए.

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

पाथेय:संघर्षरत साथियों के लिए

कविता जड़िया की यह रचना आप सबके लिए नये साल की हार्दिक शुभकामनाओं सहित-ब्लॉगर



साथी,
मैं जानती हूँ
तुममें कुव्वत है
तुम्हारा हुनर
मुक्तिबोध के मेहतर की तलाश की परिणति

सपने देखते हुए तुम
नहीं भूलते ज़मीं पर
बुलंदी से पाँव जमाना
दुआएँ माँगने के लिए
उठाते हुए फौलादी हाथ
उपेक्षित नहीं करते राह पड़े पत्थरों को
जानते हो उन्हें लाँघकर
बच निकलना
समकालीनों की तरह
जीवन की मूल आवश्यकताओं के त्रिकोण में
या सफलता के चालू उद्यमों में
नहीं बँधना चाहती तुम्हारी काया

मुझे मालूम है
शून्य से शुरू होकर
बनोगे तुम विशाल वृत्त
समेटोगे अपनी परिधि में दुनिया को
तुम्हारी आत्मा में समायी
महापुरुषों की सीखें
नहीं होने देंगी तुम्हें स्वपोषी या परजीवी
क़ीमतें तुम्हें नाप नहीं पाएँगी
सत्ताएँ तुम्हें क़ैद नहीं रख पाएँगी.

फिर भी मुझे डर है
तुम्हारे बदल जाने का नहीं
ज़माने के विमुख हो जाने का
कि रोक नहीं सकते तुम
स्वार्थी परिवर्तनों को

मिट्टी के क्षरण और अपरदन
पर्वतों के टूटकर चट्टान बनने
चट्टानों के बिखरकर कंकण होने को
रोक नहीं सका है संसार का महानतम शिल्पी भी

झुठलायी नहीं जा सकती
बहती धारा की शक्ति
छोटे पौधें हों या तने ठूँठ
हारना ही पड़ा है उन्हें
विपरीत धारा के प्रवाह से

इससे पहले कि चमकीले चाँद का खुरदुरापन
तुम्हें उदास कर दे
इससे पहले कि थककर तुम भी मानो
बचे रहने को ही इंसान का पहला तर्क
बाँधना चाहती हूँ मैं
तुम्हारी विजय यात्रा का पाथेय

साथी,
तुम भूलना मत
कूबड़ निकालकर कुरूप हुआ भोला ऊँट भी
जानता है भली-भाँति यह सच
कि ज़रूरी है-सँजो लेना
अपने भीतर जल रेतीले सफ़र में
मृगमरीचिका से बचने के लिए

मैं यही चाहूँगी
तुम थको,न रुको,न झुको,न टूटो कभी.

-कविता जड़िया

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

कहानी का अपहरण संभव नहीं



हाईजैक की गई युवा कहानी इस शीर्षक से पाखी के पिछले अंक में एक बातचीत है.इस बातचीत में काशीनाथ सिंह,रोहिणी अग्रवाल,बलराज पांडेय,गोपेश्वर सिंह,राकेश बिहारी,प्रेम भारद्वाज और आशीष त्रिपाठी शामिल वार्ताकार हैं.नामवर सिंह की मौजूदगी में हुई इस पूरी बातचीत में न केवल उनकी राय अनुपस्थित है बल्कि कहानी की विवेचना की वह पद्धति भी ग़ायब है जिसे कहानी:नयी कहानी में उन्होंने विकसित करने का प्रयास किया था.

इस शिकायत के बारे में भी कहा जा सकता कि यहाँ नयी कहानी पर नहीं युवा कहानी पर बात हो रही है.हालांकि पूरी बातचीत में नयी कहानी की उपेक्षा नहीं की गई है.उसी को आधार मानकर निष्कर्ष निकाले गए हैं.यह युवा कहानी कैसी है इसके बारे में पूरी बातचीत का निष्कर्ष यह है कि इसे कुछ कहानीकारों ने हाईजैक कर लिया है.इसे सच मान लें तो एक नये क़िस्म की आधुनिक समस्या से परिचय होता है कि कहानी भी हाईजैक की जा सकती है.वह भी तब जब कहानीकार और संपादक के रूप में राजेन्द्र यादव,ज्ञानरंजन,संजीव,अखिलेश,स्वयं प्रकाश,प्रियंवद जैसे मील के पत्थर कहानी के विकास में अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह बखूबी कर रहे हैं.यदि इस संकट को सच मान लिया जाए तो फिर कहानी को बचाने की अपील भी वैसी ही होगी जैसा विमान अपहरण के बाद यात्रियों को बचाने संबंधी अटल बिहारी वाजपेयी के सामने लगायी गई गुहार थी.

दुर्भाग्य से पूरी बातचीत उन्हीं पर केन्द्रित है जिन्हें युवा कहानी का हाईजैकर कथाकार कहा गया है.रोहिणी अग्रवाल ने कुछ कहानियों के हवाले से सन्दर्भ सहित नतीजे निकालने का प्रयास भी किया तो पूरी बातचीत में उसे बढ़ाने की कोशिश नहीं की गई.बल्कि इस तरह के चालू,महत्वाकांक्षी खयालों को प्रश्रय दिया गया कि हाईजैकर कथाकारों का इस्तेमाल इन्सट्रूमेंट की तरह कथा परिदृस्य से उदय प्रकाश,अखिलेश जैसे महत्वपूर्ण कथाकारों को हटाने के लिए किया गया और इन हाईजैकर कथाकारों ने अपना इस्तेमाल होने दिया.एक भिन्न विधा के हवाले से इस दूर की कौड़ी लगनेवाली वाचालता को समझने की कोशिश करें तो बकौल उदय प्रकाश प्रगतिशील वसुधा द्वारा ज़ारी पिछले तीस वर्षों की कवियों की सूची में उनका नाम नहीं है.तो सवाल है उन्हें मुख्यधारा से हटाने की कोशिश कहा हो रही है?ये हाईजैकर कथाकार तो संयोग से उदय प्रकाश को अपना आदर्श ही मानते हैं.

मैं मानता हूँ कि युवा कहानी जिसे मैं कथाकार के अतिरिक्त विद्यार्थी की तरह भी देखता हूँ के अच्छे कहानीकारों की सूची लंबी है.उन कहानीकारों और कहानियों से किसी भी तरह इन तथाकथित हाईजैकर कथाकारों को भी नहीं अलग किया जा सकता.लेकिन जिसे काशीनाथ सिंह कहानीकारों का ग्लोबल होता देशज समूह कहते हैं उनकी चर्चा किसी बड़े मंच पर,धारावाहिकता में कहानी का न कोई हरकारा करता है,न सुरक्षाकर्मी करता है और न ही कहानी का कोई सुरक्षा अधिकारी.सिर्फ़ संन्दर्भ बन चुके ऐसे कहानीकार केवल तब याद आते हैं जब कथित हाईजैकर कथाकारों को कोई संदेश देना हो.सच तो यह है कि कहानी का रक्षा मंत्रालय ही निर्दोष नहीं रहा.यदि इस पर यक़ीन कर लें कि युवा कहानी हाईजैक हो गई है तो इसमें उसकी भूमिका पर भी सवाल उठेंगे ही.

पूरे प्रसंग में मैं एक उदाहरण से बात रखना चाहता हूँ.पिछले दिनों वसुधा के संपादक और आलोचक कमला प्रसाद ने एक बात कही थी(शायद जनसत्ता में) जिसका आशय था कि रवींद्र कालिया के द्वारा एक ग़ैर प्रतिबद्ध,लगभग व्यावसायिक कथाकार पीढ़ी तैयार हुई है,जिसने सरोकारों की बजाय सफलता को मुख्य मान लिया है.उनके इस कथन के आलोक में मुझे वसुधा का समकालीन कहानी विशेषांक याद आया जिसे जयनंदन संपादित कर रहे थे.जब वह अंक छपकर आया तो उसमें वही सब कथाकार थे जो रवींद्र कालिया के संपादन में अमूमन होते हैं.चाहे वह वागर्थ हो या नया ज्ञानोदय.

कई बार विश्लेषण की शक्ल में महज समर्थक टिप्पणी भी बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है.मसलन काशीनाथ सिंह के समर्थन में जिस साईकिल कहानी को यहाँ लगभग मनुष्य विरोधी ही मान लिया गया है उसी कहानी के बारे में यह भी जाँचने का अवकाश नहीं दिखता कि स्वयं काशीनाथ सिंह उस कहानी के बारे में क्या लिख चुके हैं.ये आलोचक कहानी आलोचना में भी सक्रिय नहीं हैं.तब इनकी स्थापना की वैधता क्या सिर्फ़ समर्थन की ही है?एक तरफ़ देवेंन्द्र की कहानी क्षमा करो हे वत्स को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है.दूसरी तरफ़ चंदन पाण्डेय को हाईजैकर कहा जा रहा है इसी बीच मुझे याद आ रही है काशीनाथ सिंह की रेखाचित्र में धोखे की भूमिका कहानी की देवेन्द्र की कहानी क्षमा करो हे वत्स से ही तुलना.

मैं काशीनाथ सिंह पर बहुत भरोसा करता हूँ.वे मेरे प्रिय लेखक हैं.कोई अनुवाद निर्भर या पलटवार विवेचना उन्हें हिंदी में अवमूल्यित नहीं कर सकती.मैं जानता हूँ कि वे आधारहीन,ध्यानखींचू जुमलों पर यक़ीन भी नहीं करते.फिर भी चाहे इसे भी अनादर ही क्यों न समझ लिया जाए पर मैं कहना चाहता हूँ कि जैसे पूरी बातचीत में उनकी खीझ ही मुख्य है.उनके जैसे साहित्यकार का यह आरोप भी चंदन या कुणाल को ज़रूरत से ज्यादा बड़ा आँकना है.युवा कहानी में आज सबकी अपनी अपनी पसंद है और इस मिली जुली पसंद के चंदन और कुणाल भी कथाकार हैं.दोनों ने अच्छी कहानियाँ लिखी हैं.अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है.मैंने पढ़ने से पहले सोचा तक नहीं था कि पूरी बातचीत इन्हीं दोनों पर सिर्फ़ खारिज करने के लिए सिमट जाएगी.उस सोद्देश्य अपेक्षा पर भी हँसी आई जिसमें नामवर सिंह जी से आग्रह है कि वे चंदन पाण्डेय पर कुछ अवश्य कहें.

इस पूरी बातचीत में गीत चतुर्वेदी का कहीं नाम नहीं है.कैलास वनवासी,अरुण कुमार असफल का ज़िक्र नहीं है.रणेन्द्र,गौरीनाथ,भालचंन्द्र जोशी,मनीषा कुलश्रेष्ठ,राकेश मिश्र,दिनेश कर्नाटक,विपिन कुमार शर्मा का कोई स्मरण नहीं है.क्या ऐसा किसी उपेक्षा की भावना के तहत है?क्या वजह है कि विचारधारा की अपेक्षा के साथ कहानी पर बात शुरू होती है और सबसे ज्यादा उन्हीं पर केन्द्रित हो जाती है जिन्हें बाज़ारू कहकर खारिज करने की कोशिश की जाती है.महिला कथाकारों में भी क्या वजह है कि सुधा अरोड़ा, मधु कांकरिया और उर्मिला शिरीष तक बात आने ही नहीं पाती.

इतना ही नहीं मैं पूछना चाहता हूँ कि आपमें से कितने लोगों ने प्रभु जोशी की कहानी पितृ ऋण पढ़ी है.किसने कथाकार कैलास चन्द्र का नाम भी सुना है? जबकि कैलास चन्द्र सारिका की कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत होने से लेकर आज तक निरंतर लिख रहे हैं और हंस,पहल आदि पत्रिकाओं में छपते भी रहे हैं.जब कहानी के हाईजैकरों की चर्चा हो रही हो तब यह बताना और ज़रूरी हो जाता है कि कौन कौन गुमनाम रहकर भी कहानी को बचाए हुए हैं.

मैं तो यह भी जानना ही चाहता हूँ कि कहानी की सारी प्रतिबद्ध मांगों के बीच कब कब हरिशंकर परसाई या राहुल सांकृत्यायन जैसा कहानीकार होने की ज़रूरत बताई गई ?ये कहानीकार थे और माफ़ कीजिए लोग इन्हें आप सबकी मौजूदगी में ही भूलते जा रहे हैं.

इस पूरी बातचीत से मेरी अपेक्षा सिर्फ़ इतनी थी कि सार्थक कहानियों की बात होगी.इसी बहाने अच्छी कहानियों को अपनी डायरी में नोट किया जा सकेगा.पर यह कुछ नहीं मिला.वर्तनी की ग़लतियाँ भी ऐसी की हर वह कहानी जिसका ज़िक्र है या तो शीर्षक ही ग़लत है या अधूरा.मेरी मांग है कि ऐसे खतरों की ओर लोगों का ध्यान न मोड़ा जाए जो अगर हों भी तो नुकसान पहुँचाने ज्यादा समय नहीं टिकते.सबक सिखाने की भावना साहित्य को नुकसान ही पहुँचाती है.

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

नीरा राडिया के बारे में यह दलीलें हो तो इनके जवाब क्या होगें?

नीरा राडिया अपराधी हैं.हम निडर तथा निष्पक्ष होकर नीरा राडिया को अपराधी मानें.उनके सारे कर्मों पर एक ठोस पक्ष बना लें जिसमें लैंगिक निरपेक्षता भी अवश्य हो.यह थोड़ा जल्दी हो क्योंकि नीचे दी गई दलीलें शुरू हो जाने में देर नहीं.यदि किसी को आभासी देर दिख भी रही है तो उनके लिए एक जानी पहचानी चेतावनी कि देर सबेर ऐसी दलीलें आएंगी.वह तबका जो बहस को खेल समझता है और हर तरह के न्याय की मांग को तर्कों में उलझा देता है चुप नहीं बैठेगा.फिर जो लोग नीरा राडिया को बचाना चहेंगे वे क़तई मामूली नहीं हैं.सवाल उनकी साख और प्रतिष्ठा का भी है.

वे दलीले ऐसी हो सकती हैं.पुरुषों ने अब तक इतने कारनामें किए.राजनीति ही दुर्गंध है उनके हाथों.सारे विश्वयुद्ध उन्होंने किए.नरसंहारों और भ्रष्टाचारों का इतिहास उनका है.राजनीति की विकराल गाथा पुरुष वर्चस्व की ही राम कहानी है.एक औरत नीरा राडिया ने यदि वह सब किया जो अब तक पुरुष ही करते आ रहे थे.पुरुषों की ही दुनिया में संभव था वह सब तो उसे सज़ा ज़रूर मिलेगी क्योंकि वह स्त्री है.उसे लेकर यदि न्याय के पुजारी इतने सक्रिय हैं,तीव्र जाँचे,त्वरित छापे हैं तो इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि वह स्त्री है.उसने स्त्री होकर इतना सब किया इसे पुरुष वरचस्ववादी न्यायप्रिय समाज बर्दाश्त ही नहीं कर पा रहा.

यदि मीडिया में भी किसी स्त्री की जगह सिर्फ़ पुरुष की ही संदिग्ध भूमिका होती पूरे मामले में तो भी इतना बवाल नहीं मचता.आखिर यही सुनाई दे रहा है न बरखा..बरखा और बरखा..वीरों को तो जैसे भूल ही गए सब.भ्रष्ट पुरुष की तुलना में भ्रष्ट स्त्री को सज़ा अधिक आसान है.मान लीजिए अमेरिका जैसे देशों की तरह जहाँ राजनीतिक लॉबीईंग वैध है यदि भारत में भी इसे क़ानूनी मान्यता होती तो क्या नीरा राडिया एक मिसाल नहीं होती?एक स्त्री का विदेश की नौकरी छोड़कर अपने वतन आना और इतनी कमाई खड़ी करना गर्व की बात नहीं होती?जिस भारतीय स्त्री के जीवन में देहरी के भीतर से केवल प्राण पखेरू ही उड़ जाने के उदाहरण हों उसका अपनी विमान सेवा का मालिक होना तो युगांतरकारी ही माना जाता.

यह भारत का पिछड़ापन नहीं तो और क्या है जहाँ राजनीति संबंधी कारपोरेट दलाली के संबंध में कोई नीति ही नहीं है.नीरा राडिया ने ऐसा क्या किया है जो आनेवाले समय में भी अपराध माना जाएगा?सोचिए जिस दिन भारत का लोकतांत्रिक पूँजीवाद समग्र विकास या समाजवाद जैसी अड़चनों को पार कर सिर्फ़ विकास के मुकाम पर पहुँचेगा उस दिन नीरा राडिया जैसी लॉबीईस्ट ही तो सरकारे बनाएँगी.कोई उजबक बताए कि आज किस मंत्री के बनाए जाने में लॉबीइंग नहीं है.जिस तरह से नेता चुने जाते हैं,खरीद फरोख्त से गठबंधन करते हैं फिर सवाल पूछने तक के लिए घूस लेते हैं तो वह क्या बिना दलाली के संभव है.पहली बार यदि किसी स्त्री ने कार्पोरेट और अपराध को मिलाजुलाकर सरकार गठन का कोई अचूक नुस्खा निकाला है तो देशभर को क्यों तक़लीफ़ हो रही है.अरे बुड़बको कुछ तो शर्म करो.नीरा राडिया स्त्री है.सदियों की ग़ुलाम आबादी.ग़ुलाम की आज़ादी के पहले चरण में नैतिकता देखना सोची समझी साज़िश है.स्त्री जाग रही है.नीरा राडिया आनेवाले भारतीय लोकतांत्रिक युग की आहट है.वह दिन दूर नहीं जब लॉबीईंग को क़ानूनी मान्यता मिल जाएगी.तब देखना नीरा के नाम से विश्वविद्यालय होंगे.पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में बरखा दत्त की वैसी ही मूर्तियाँ लगाई जाएँगी जैसी दलित नेत्रियों की लगती हैं.एक दलित स्त्री की सफलता को जैसे नोटों की माला कलंकित नहीं कर सकती वैसे ही नीरा की बेशुमार कमाई एक ग़ुलाम आधी आबादी का प्रतिशोध है.

यह मेरा वहम भी हो सकता है कि ऐसी दलीलें दी जाएँगी.पर यदि ऐसा हुआ तो हमारे जवाब क्या होंगे?

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

कठोर करुणा

पढ़ाने के अनुभव बड़े जीवंत होते हैं.कई बार बच्चों की बातें,जिज्ञासाएँ,तर्क गहरे सोचने पर मजबूर कर देते हैं.जो बातें बड़े बड़ों के मुख से ही सुनी जा सकती हैं.सुनी जाने के बाद भी प्रभावित नहीं कर पातीं लगभग वही बात जब कोई बच्चा अपनी ताजगी के साथ रखता है तो दिल-दिमाग़ जैसे एकबारगी आश्चर्य मिश्रित आनंद के साथ विनत हो जाते हैं.कहीं अंदर से एक मार्मिक स्वीकृति पैदा होती है.अपना तर्क-वितर्क में बेहद उलझा रहनेवाला सोच भी तुरंत मानने के लिए तैयार हो जाता है कि हाँ ऐसा क्यों नहीं हो सकता?मैंने अक्सर महसूस किया है कि बच्चे जब अपनी पूरी रौ में होते हैं तो सीखते नहीं बहुत सिखाते हैं.बच्चों से ही मैंने जाना कि महानता ज़रूर हँसमुख और शरारती होगी.कितना अच्छा हो यदि हम बच्चों के अनुयायी बनें.ऐसे बहुत से बचपन के दुर्लभ छड़ जिनसे मनुष्य का विवेक समृद्ध होता है,जिजीविषा बढ़ती है अध्यापक होने के नाते मेरी पूँजी हैं.धन्या एक ऐसी ही लड़की है.उसकी लगन की मेरे जानने में दूसरी मिसाल नहीं.हालांकि मैं पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि उसमें मैंने कुछ विलक्षण नहीं देखा.वह इतनी साधारण है और नि:शक्त भी कि कोई उसे देखे तो जीवटता का कोई गूढ़ या संपन्न अर्थ खोजने की कभी ज़िंदगी में कोशिश ही न करे.

एस.धन्या उसका पूरा नाम है.वह इस साल दसवीं में पढ़ती है.उसकी मातृभाषा मलयालम है.दो साल पहले जब मैं तमिलनाडु के छोटे से क़स्बे तक्कोलम मे आया था तो वह आठवीं कक्षा में थी.स्टॉफ़ रूम में बैठे हुए या कक्षाओं के लिए निकलते समय गैलरी में उसे धीमी लगभग टटोलती चाल में आते जाते देखता था तो मन में सवाल कौंधता था कि इसका देखना कम है क्या?वह इतनी विनम्र और शांत रहती थी.इतना चुपचाप चलती थी कि उसकी इस कमी पर सोचना तक संभव नहीं था.जब संदेह होता तो कार्यक्रमों में उसकी सहभागिता देखकर यह शंका इतनी क्रूर लगती कि कभी पूछ ही नहीं पाया.पहली बार मुझे तब पता चला जब परीक्षा में उसके प्रश्नपत्र की एनलार्ज फोटोकॉपी होते देखी.पढ़ने के लिए वे इतने बड़े अक्षर थे कि मेरे मुह से निकल गया ओह!.. मेरा अंदेशा सही था... इतनी अक्षम है वह बच्ची!...

फिर अप्रैल में ही शुरू हुए अगले सत्र में वह नवमीं में मेरे क्लास में आई.मैंने देखा-उसके पास पढ़ने के लिए एक दूरबीन जैसी लेंस लगी पाईप होती.मैं जब हिस्से किताब से पढ़ता तो वह वही दूरबीन लगाकर देखती रहती.वह इतना झुककर लिखती-पढ़ती कि सामान्य आँखों को तब दिखना बंद हो जाए.पढ़ते या लिखते बिल्कुल थक गई है साफ़ दिखता.फिर भी उसके सारे काम चाहे वह क्लास वर्क,होमवर्क हो या असाइनमेंट,प्रोजेक्ट हों सब समय पर होते हैं.कभी सोच भी नहीं सकते कि वह सौंपे गए काम के लिए बहाना करेगी.नहीं हुआ तो एक ही उत्तर नहीं हो पाया सर.सॉरी!..अभी कर दूँगी.पर कोई झूठी कोशिश नहीं.वह पढ़ने में भी अच्छी है.अपनी धुन,समझदारी और मेहनत में वह इतनी परिपक्व है कि बच्चों जैसा कुछ कर ही नहीं पाती.उसे जो बनना है उसमें शायद उसे हर बात के लिए कई गुना समय और श्रम चाहिए.जैसे क्रूर नियति ने उसे बचपने के लिए अवकाश ही नहीं दिया.

यह भी मुझे बाद में पता चला कि पाँच विषय की दो-दो नोटबुक समय से कंप्लीट करना उसके वश का नहीं है.लिखने का काम वह खुद नहीं कर पाती है.घर में माँ या स्कूल में उसके साथ बैठनेवाली या कोई दूसरी लड़की उसके लिए यह करती है.हाँ परीक्षाओं में वही लिखती है.इसके लिए उसे थोड़ा ज्यादा समय चाहिए होता है जो विद्यालय से मिल जाता है.सुनने में यह आसान लगता है कि किसी दूसरे से लिखवा लो पर इसके लिए जिस सज्जनता की दरकार होती है वह मैंने धन्या में ही देखी.वह कितनी भली होगी कि जिसने भी लिखने की ज़िम्मेदारी ली उस लड़की के चेहरे में मैंने सचमुच का खेद देखा जब धन्या नोटबुक जमा करने में देरी कर गई.

वह अवसर मिलने पर अपने विचारों को इतनी ईमानदारी से रखती है कि पता चलता है कहने का सच्चा तरीक़ा कैसा होता है.एक बार वह लड़कियों के साथ होनेवाली ग़ैर बराबरी पर बोलते हुए भावुक हो गई थी.अपनी कमज़ोरियों से लड़कर रोज़ जीतना कैसा होता है मैंने उसी बच्ची में देखा.चेहरे में कोई शिक़ायत नहीं.पूरे व्यक्तित्व में कैसी भी उद्दंडता नहीं.प्रात:कालीन सभा में कॉपीयरिंग भी वह अच्छा करती है.लेकिन जिस बात के लिए मैं धन्या के बारे में तबसे ज्यादा शुभकामनाओं से भर गया हूँ वह अपनी ही ज्यादती का एक छोटा सा प्रसंग है.

उस दिन कक्षा में किसी बच्चे ने कुर्सी तोड़ दी थी.मैं जानना चाहता था कि वह कौन है पर कोई मुँह खोलने को तैयार नहीं था.सिर्फ़ इतना पता चल सका कि यह लंच ब्रेक में हुआ.उस वक़्त क्लास में सिर्फ़ तोड़नेवाला ही रहा होगा कुल मिलाकर बदमाश द्वारा मैनेज किया हुआ यही नतीज़ा निकल रहा था.तभी लड़कियों में से किसी ने बताया कि धन्या को मिलाकर हम तीन थीं कक्षा में पर हमने नहीं देखा.धन्या आगे बैठी थी सो मैंने उसी से पूछा-तुमने देखा किसने तोड़ी कुर्सी? वह कुछ बोलती कि साथ बैठी लड़की ने कहा कि सर,धन्या थोड़ी दूर का भी देख नहीं पाती.मैंने ज़ोर से पूछा क्या इतनी दूर का भी नहीं यानी जहाँ मैं था उस वक्त.वही लड़की बोली हाँ सर वह तो अभी आपको भी नहीं देख पा रही है.मेरे दूसरी तरफ़ घूमते ही धन्या ने उसे बताया था.मैंने पूछा धन्या क्या सचमुच?

वह खड़ी हो गई.उसकी आँख से आँसू बह चले थे.सर,मैं आपको नहीं देख पा रही मुझे आपकी जगह कोई सफ़ेद छाया दिख रही है बस...उस दिन मैंने सफ़ेद सर्ट पहन रखी थी.उसकी यह बात मुझे भीतर तक छू गई थी.पर जैसे क्रूरता आती है तो अपनी सीमा खुद तय करती है.मैने उससे कहा तुम किसी अच्छे अस्पताल में क्यों नहीं दिखाती अपनी आँख ? वह बोली सर,चेन्नई के शंकर नेत्रालय में दिखा चुकी हूँ.डॉक्टर ने कहा मेरी आँख के लिए कोई चश्मा नहीं बन सकता.मैं स्तब्ध रह गया था.यह क्या कह रही है...शंकर नेत्रालय से अच्छा अस्पताल तो भारत में दूसरा नहीं.इसका मतलब है मैं एक नि:शक्त बच्ची को अनजाने ही तक़लीफ़ दे रहा हूँ.जैसे मेरे हाथ पांव ढीले पड़ गए.बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई.टूटी हुई कुर्सी से शुरू होकर.मैंने सोचा.वह तब तक रोने लगी थी.मैंने उसे चुप कराया और बोला दुखी मत हो.कोई न कोई रास्ता निकलेगा.तुम चिंता मत करो,हिम्मत रखो भगवान सब ठीक करता है.तुम इतनी ईमानदार और मेहनती हो कि तुम्हारी कोई तक़लीफ़ हमेशा नहीं रहेगी.मैं जाने क्या क्या बोल रहा था और मेरा गला भर रहा था.मैंने देखा दो और लड़कियों की आँखें गीली हो गई हैं.कक्षा में सन्नाटा है.

मैंने महसूस किया अनजाने ही मुझसे अन्याय हो गया.मैं जैसे माफ़ी मागने के लिए बोल रहा था.तुम सबों को सही ग़लत का शऊर नहीं और एक यह लड़की है जो इतनी अक्षमता में भी सच्ची,मेहनती और नेक है.

उस दिन मुझे पहली बार अपनी कक्षा में रुलाई आ गई थी.अपनी वह कठोरता और उसके बाद की करुणा मैं भूल नहीं पाता.मेरी दिली कामना है इस बच्ची की आँख ठीक हो जाए.उसके पढ़ने लिखने तक हमारे देश की विकराल बेरोज़गारी थोड़ी कम ही हो जाए और उसे एक बहुत अच्छी नौकरी मिले...

शनिवार, 20 नवंबर 2010

अच्छा लगता है.....

अच्छा लगता है
सबके होंठों पर एक मुस्कान लाना
सबके दिलों को छूकर वहाँ घर बनाना
सबको खुशी के बदले खुशी देना
अच्छा लगता है

अच्छा लगता है
फूलों को देखकर साथ-साथ झूमना
उन्हें हथेलियों से सहलाना
उन पर बैठती तितलियों को देखकर
उनकी सुंदरता में खो जाना
अच्छा लगता है

अच्छा लगता है
बड़ों की डाँट सुनना
सुनकर अपने को सुधारना
सुधारना कि कुछ ऐसा कर सकूँ
जो सबकी खुशी का कारण बन सके
अच्छा लगता है

अच्छा लगता है
लहरें देखकर उनमें खो जाना
खोकर उनकी गहराइयाँ अनुभव करना
लहरें जो हमें ज़िंदगी के बदलते रूप को
दिखाती हुई आती हैं और चली जाती हैं

अच्छा लगता है
गाना,जो मेरी हर साँस में बसता है
अच्छा लगता है.

-अनुश्री घोष

बुधवार, 17 नवंबर 2010

सुनाऊँगा कविता


बहादुर पटेल कवि हैं.देवास में रहते हैं.उनका पहला कविता संग्रह बूँदों के बीच प्यास अंतिका प्रकाशन से छपकर आया हैं.यह हमारे समय के महत्वपूर्ण कथाकार प्रकाशकांत को समर्पित है.वे युवा कवि हैं कि नहीं यह बड़े लोग जानें पर मेरी नज़र में वे अच्छी कविताएँ लिखते हैं.उनकी कविताएँ अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं.जब तक साहित्य में ऐसी धारणाएँ क़ानून नहीं बन जातीं कि महानगरों में ही अच्छी कविताएँ लिखी जाती हैं.अपनी तरफ़ का युवा ही अच्छा कवि होता है तब तक तो आपको भी यह कहने में हर्ज़ नहीं होना चाहिए कि कविता वहां भी है जहाँ तक विशेषांको की अनुक्रमणिका नहीं जाती.साहित्यिक केंद्रों की सिटी बसें नहीं पहुँचतीं.जिन्हें उदारता लाभ नहीं मिलता.एक ज़माने में इलाहाबाद में अच्छा साहित्य लिखा जाता था.अब वहां किसी प्राचीन स्मारक से अमरकांत जी के अगल बगल लोग अफसर होते हैं.फिर बनारस का साहित्य बढ़िया माना गया.अब वहां काशीनाथ सिंह जी जैसे स्तंभ की छोड़ दें तो प्रचुरता में टीकाएँ,कुंजियाँ,लिखी जाती हैं.आजकल तो जो दिल्ली से नहीं लिखता वह भी कोई साहित्यकार है?किसी आयोजन के निमंत्रण भी भेजने हों तो डाक दिल्ली ही जाती है.हालांकि कुछ ज़िद्दी,कहीं भी बस जाने को विवश यहां वहां भी साहित्य होने की तस्दीक करते रहते हैं.पर यह फुटकल है.नक्शे में लखनऊ,भोपाल,जबलपुर के आगे देखना नहीं हो पाता.सवाल उठता है साहित्य का केंन्द्र शहरों को कौन बनाता है?किसके भीतर कहीं से भी कविता सुनाने की धुन कम नहीं होती.बहरहाल यहाँ दो कविताएँ बहादुर पटेल की.इसी संग्रह से.इस उम्मीद के साथ कि आपको भी अच्छी लगेंगी.

सुनाऊँगा कविता


शहर के आखिरी कोने से निकलूंगा
और लौट जाउंगा गाँव की ओर
बचाऊँगा वहां की सबसे सस्ती
और मटमैली चीज़ों को
मिट्टी की खामोशी से चुनूंगा कुछ शब्द

बीजों के फूटे हुए अंखुओं से
अपनी आँखों के लिए
लूंगा कुछ रोशनी

पत्थरों की ठोकर खाकर
चलना सीखूंगा
और उन्हें दूंगा धन्यवाद
उनके मस्तक पर
लगाउंगा खून का टीका

किसान जा रहे होंगे
आत्महत्या के रास्ते पर
तब उन्हें रोकूंगा
सुनाउंगा अपनी सबसे अंतिम
और ताज़ा कविता
वे लामबंद हो चल पड़ेंगे
अपने जीवन की सबसे दुरूह पगडंडी पर।


टापरी


वो देखो वहां कभी हुआ करती
ठीक कुंए के बगल में टापरी
तब दादा भी हुआ करते
बनाई भी उन्होंने ही थी
अपनी मेहनत के मोतियों से

इकट्ठा किया था उन्होंने
ईंट, गारा और चूना
जिससे खड़ी की थीं चारों ओर दीवारें
सुरक्षा का एक घेरा बनाया था
बिछा दी थी दीवारों पर
कुछ सीमेंट की चादरें
नीचे से बल्लियों के टेकों पर

बहिन कमली अक्सर लीप दिया करती
पीली मिट्टी और गोबर से
कैसा दिपदिपाता था अंदर
जैसे सोने सा

धूप के कुछ पहिंए
मंडराते थे वहां दिन में कुछ ढूंढ़ते से
और रात में चांदनी
अपने करतब दिखाती

अमावस की रात जब भारी पड़ती
तो गुलुप जलता
या फिर किरासिन की चिमनी
ही होती आँखों का सहारा

यह तब की बात है
जब कुंए में हुआ करता था
लबालब सागर सा पानी
दादा अक्सर किस्सा सुनाते
कि कैसे जब चड़स में बैलों को जोतकर
निकाला जाता पानी

कैसे सोते फूट पड़ते
कल-कल संगीत के साथ
बैलों की कांसट करती उनकी संगत
यह कैसी कहानी थी
जिसमें कविता का वास था
संगीत का वास था
फिर कैषा हलवाहा अपनी
तान छेड़ता तो नहा जाती हवाएं
बहा ले जातीं दूर तक मिठास

कैशा तब भी गाता था जब
पहली बार बिजली से पानी निकाला गया
फिर वह गाने को
किस्से में बदलने लगा
ऐसे किस्से सुनाता कि कुंए के
सोते धार-धार रोते से लगते

इसे हम दूस रे टापरी कहते
और यदि होते पास तो खोली
गांव से दूर खेत पर थी यह
ऐसी कई टापरियां थीं
कई-कई खेतों पर
सबका मिजाज़ होता अलग-अलग
सबकी अलग-अलग थी गंध
सबका अलग-अलग था संसार

इनका उपयोग ऐसा कि
जैसे खाली पेट को खाना
प्यासे को पानी
मदन, मंशाराम, दादा, दादी,
माँ, पिता और हम भाई बहन कर रहे होते
खेतों में काम
तो बार-बार हर छोटे-मोटे काम के लिए
गाँव के घर न जाने की सुविधा
थी यह टापरी

काम करते तो सुस्ताते इसी में
थकान को धोते इसी की छाया से
मौसम की मार में हमेशा तैयार
गर्मी देती ठंडक
बारिश में छिपा लेती हमें
ठंड में रजाई सी होती गरम
हर मर्ज़ की दवा
सौ तालों की एक चाबी

गाँव के घर की उपशाखा
जिसमें कुछ खास चीज़ों को छोड़कर
था सबकुछ
जैसे एक लकड़ी का संदूक
जिसमें फुटबॉल, पाईप पर लगाने के क्लिप,
स्टार्टर की पुरानी रीलें, बिरंजी, नट-बोल्ट,
कुछ पाने, पिंचिस, पेंचकस, टेस्टर,
बिजली के तार, फेस बांधने का वायर,
सुतलियां, नरेटी, सूत के दोड़ले
और साइकिल के पुराने ट्यूब इत्यादि
ये सारे ब्यौरे किसी न किसी काम से नस्ती थे

यह एक ऐसा कबाड़खाना था कि
इससे बाहर कोई काम नहीं था
या कि किसी काम के लिए इसके
अलावा कोई विकल्प की ज़रूरत नहीं

कोने में पड़ी रहती खटिया
जिस पर दिन में एक तरफ ओंटा
हुआ चिथड़ा बिस्तर
जो रात में काम आता
रखवाली के समय
ठंड के दिनों में
पाणत करते तो इसी में दुबक जाते

खटिया के नीचे था रहस्यमय संसार
खाली बोरे, खाद की थैलियों के बंडल,
कुछ पल्लियां
जब अनाज पैदा होता तो
इन्हीं में बरसता
सब्जियां मंडी जातीं तो इन्हीं में
इनके सहयोगी होते
कुछ टोकनियां, छबलिये
और बड़े डाले, गेंती, फावड़े, कुल्हाड़ी
दरांते, सांग, खुरपियां
कितना कुछ था इस टापरी के भीतर
खेती किसानी का पूरा टूलबॉक्स

यही नहीं इसके पिछवाड़े
बल्लियां, बांस, हल, बक्खर, डवरे,
जूड़ा पड़े रहते
छांव में पड़ी होती पुरानी साइकिल

हां यहीं तो था यह सबकुछ
कैसे स्मृति में रपाटे मारती हैं सारी चीज़ें
कहां गया यह सब

देखो भाई
यह खोड़ली सड़क
जब से यहां से निकली है
सबकुछ खा गई यह डाकिन
यह देखो अपने साथ
कैसा विकास का पहिया लेकर आयी
कुचल दिया सबकुछ

यह पेट्रोल पंप
वह चौपाल सागर
ये बड़ी-बड़ी मषीनों से भरी फैक्ट्रियां
बड़ा भयावह दृष्य है यह
बाज़ार और पूंजी के पंजों को देखो
अदृष्य हैं ये
इनके वार ने खोद दी है
ऐसी कई टापरियों की जड़ें
एक सागर में तब्दील होता जा रहा है
सारा मंजर
जिसमें डूबता जा रहा है सबकुछ



-बहादुर पटेल

रविवार, 14 नवंबर 2010

कृति हमेशा नयी होती है और कसौटियाँ पुरानी


यह लेखक और चित्रकार प्रभु जोशी द्वारा ज्ञान चतुर्वेदी के नया ज्ञानोदय में प्रकाशित व्यंग्य लेखों की ज्ञानपीठ से छप रही किताब का ब्लर्ब है.गाढ़ा और व्यंजक.आलोचनात्मक संकेतों तथा सूक्तियों से गुँथा ऐसा ब्लर्ब मैंने नहीं पढ़ा अब तक.ज्ञान जी का मैं नियमित पाठक हूँ.कह सकता हूँ कि प्रभु जोशी जी की कही हुई एक भी बात झूठ नहीं है.जिस त्रयी की बात उन्होंने कही है सचमुच उसकी सिद्धि ज्ञान जी में मौजूद है.कृति हमेशा नयी होती है और कसौटियाँ पुरानी तो अद्भुत बात है.जितना एकल उद्धृत हिस्सा है वह सब तो अलग अलग लेखों की मांग करता है.थोड़ा लिखा है बहुत समझना की टेक को कहना चाहता हूँ बहुत को थोड़े में सचमुच कह दिया गया है.मुझे नहीं पता कि समकालीन आलोचना के पास ज्ञान जी पर ऐसी सार्थक बात समझने का भी कोई अभ्यास है.यह मेरा आरोप नहीं सदिच्छा है.समकालीन आलोचना सचमुच विरोधाभासों के आभासी उजाले में आसक्तों के दाग धो रही है.मुझे इस बात की भी खुशी है कि यह ब्लर्ब हमेशा किताब के साथ-साथ रहेगा.-ब्लॉगर

इस उत्तर-औपनिवेशिक समय में, ‘बाज़ार के आशावाद‘ को बेचती पत्रकारिता के आग्रह पर, इन दिनों अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं के व्यंग्य-स्तम्भों में, जो कुछ भी ‘लिखा‘ जा रहा है, आलोचनात्मक-विवेक से देखने पर, उसका ‘अधिकांश‘ मात्र एक ‘अभ्यस्त मसख़री का सतही उत्पाद‘ भर जान पड़ता है। ऐसे में कमोबेश उसके लिए ‘कृति‘ का दर्ज़ा हासिल करना, तो सर्वथा असंभव ही होगा। यदि, उसे ‘आलोचना की आँख‘ की थोड़ी-बहुत उदारता से भी खँखालने का उपक्रम करें, तो, हम पायेंगे कि उसे सिर्फ़ अपने पाठकों के मनोरंजन की टहल में जुटी पत्रकारिता के ख़ाते में ही दर्ज़ किया जा सकता है, जिसमें कभी-कभी और कहीं-कहीं, ‘साहित्यिक-संस्कार की छायाओं का मिथ्याभास‘ होता रहता है। अधिक-से-अधिक हम, उसे ऐसा प्रीतिकर और ‘पठनीय-वाग्जाल‘ भर कह सकते हैं, जिसमें ‘भाषा का मनोरंजनमुखी‘ मंसूबा ही, उसका आखि़री प्रतिपाद्य है। बस.... इसे ही अपनी सबसे बड़ी अर्हता मानने की वजह से, वह सारा का सारा ‘लिखा जा रहा‘, सृजन का वरेण्य पुरुषार्थ प्राप्त नहीं कर पा रहा है।

जबकि, ज्ञान चतुर्वेदी ने कमोबेश, एक दशक से भी अधिक के, अपने स्तंभ-लेखन में समझ, सामर्थ्य और शिल्प की ऐसी ‘त्रयी‘ गढ़ ली है, जिसके चलते उसने व्यंग्य-लेखन की एक अत्यन्त परिष्कृत-प्रविधि को अपना आश्रय बना लिया है। यही वह रचनात्मक युक्ति है, जिसके कारण रचना अपने आभ्यन्तर में, एक वृहद् ‘गल्प-संभावना‘ के विस्तृत मानचित्र को गढ़ने में उत्तीर्ण हो जाती है। प्रकारान्तर से कहूँ कि ज्ञान, ‘अधिकतम लोगों से अधिकतम तादात्म्य‘ बनाने में ही अपने सृजन की अन्तर्व्याप्ति देखता हैं। कदाचित्, इसी को वह अपनी पहली और अंतिम प्राथमिकता भी मानता हैं, जिसके कारण वह ‘भाषा से भाषा‘ में पैदा होने वाले अनुभवों का मायावी स्थापत्य नहीं गढ़ता, बल्कि, इरादतन किफ़ायत के साथ, यथार्थ के पार्श्व में खड़े ‘विसंगत यथार्थ का व्यंग्यात्मकता के माध्यम‘ से विखण्डन करता हैं।

कहने की ज़रूरत नहीं कि ज्ञान का लिखा हुआ आलोचना के आपात-कक्ष की प्राणवायु पर साँस लेता लेखन नहीं है, अलबत्ता इसके ठीक उलट कहा जाए कि वह जिन्दगी के हाट में भीड़ के बीच कंधे रगड़ कर, उम्मीद के लिए जगह बनाता, जन-जन को सम्बोधित सृजन है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उसमें एक ऐसी सम्वाद-क्षम ऊर्जा है, जो उसे अभिव्यक्ति की लड़ाई में पराजय से दूर रखती है। मुझे ज्ञान के व्यवसाय की चिकित्सीय-भाषा के रूपक का सहारा लेते हुए कहने दीजिए कि ज्ञान का इधर का सारा लेखन, जनतांत्रिकता की ड्रिप लगाकर लेटी रूग्ण-व्यवस्था के वक्ष में पलते नासूर की पहचान के लिए लगातार की जा रही मेमोग्राफी है।

ज़ाहिर है कि ज्ञान अपने लेखन में, राजनीतिक शब्दावलियों की कसौटियों से तय की गई प्रतिबद्धता से कतई लदा-फँदा नहीं है, अलबत्ता बहुत मानवीय समग्रता के साथ, पूरी कायनात को कुनबा मानकर चलते हुए, स्वप्न और दुःस्वप्न से भरी बेनींद रात में, अचानक उठ कर बैठ गये आदमी द्वारा, जख़्मी आँख से उस अँधेरे के पार देखने की ज़िद और जिहाद में मुब्तिला है, जहाँ मामूली जीवन जीते आदमी की उम्मीदें अकेली, आहत और लहू-लुहान है।

इसकी पुख़्ता तसदीक उसकी औपन्यासिक कृतियों से की जा सकती है। उसने अपनी अप्रतिम मेधा से ‘सर्वोत्कृष्ट और विपुलता’ के बीच वैमनस्य की धारणा को धराशायी किया है। ज्ञान के यहाँ ये एक-दूसरे में समाहित है। लगभग अन्तर्ग्रथित।

ज्ञान अपनी भाषा को सुविचारित तरीके से न तो मेटानिमिक बनाता है और ना ही कवियों की तरह मेटाफोरिक, बल्कि, इस सबसे अलग दुर्बोधता बनाम् कलात्मक महानता के विरूद्ध लगभग सभी तरह से विषयों को छूती हुई, उसकी एक किस्म की ऐसी भारहीन भाषा है, जो तितली की तरह उड़ती हुई फूल नहीं, उसकी खूबसूरती पर जाकर बैठती है और बाद बैठने के वह खु़द उसका हिस्सा लगने लगती है। यही वह मुश्किल है, कि उसकी भाषा को, उसके पात्र से बाहर निकालना यानी नसों और नब्जों सहित उसकी जीभ उखाड़ लेना है। यहाँ इस बिन्दु पर ख़ासतौर पर एकाग्र किया जाना चाहिए, कि, ज्ञान की तुलना न तो शरद जोशी से की जा सकती है और न ही हरिशंकर परसाई से। वह तो जीवन के निरबंक घसड़-फसड़ से रस-रस करती बस एक कलात्मक अन्तर्दृष्टि से प्राप्त की गई अभिव्यक्ति का अनुपम उदाहरण है।

मुझे ज्ञान को देखकर हमेशा लगता रहा है, जैसे वह ‘अपने ही आकाश के एकान्त‘ में अकेले और चुपचाप टिमटिमाते उस तारे की तरह है, जो आलोचना की आँख में, एक किरकिरी की तरह ‘अपनी‘ और ‘अपने होने’ की बार-बार याद दिलाता रहता है। उसके कान उधर हैं ही नहीं, जहाँ आलोचना अपने आसक्तों की अभ्यर्थनाओं में लगी हुई है और उनकी ऊँचे स्वर में गाये जाने वाले प्रशस्तिगानों के लिए कोई नया छंद गढ़ रही है। बहरहाल, इसे बस वक्त की विडम्बना ही कहें कि आलोचना की हमेशा से यह दिक्कत रही है कि वह अपने समय के सर्वोत्कृष्ट को समझने में हमेशा गफ़लत करती रही है।

अन्त में यही कि शायद, इतने वर्षों से लिखते हुए, ज्ञान ने यह जान लिया है कि कृति हमेशा नयी होती है और कसौटियाँ पुरानी। वे सूखे छिलके की तरह उतरती रहती हैं। इसीलिए, रचना में समग्रता को आत्मनिष्ठता के साथ नाथ कर, कल्पना के ज़रिये रचना-सत्य को खोजने के साथ ही उसे सामान्यजन के सोच के सम्भव मुहावरे में व्यक्त करने की अपनी एक प्रामाणिक-प्रविधि विकसित कर ली है और उसे इस पर पूरा भरोसा भी है। वह आलोचना के कृपासाध्यों की सूची से बाहर है और कृपांकों के सहारे उत्तीर्ण नहीं है, बल्कि लेखन की प्रवीणता उसकी अपनी आत्मसाध्य है।

वह साहित्य के इतिहास के फटे-पुराने मस्टर में अपना नाम दर्ज़ कराने के लिए होती आ रही धक्का-मुक्की से नितान्त दूर, वह वक्त की कोरी दीवार पर, जनता की जानकारी में बहुत परिश्रमसाध्य युक्ति के ज़रिये, व्यंग्य की कलम से, बहुत साफ और सुपाठ्य हर्फों में समकालीन-यथार्थ की एक मुकम्मल इबारत लिख रहा है। यह आकस्मिक नहीं कि उसके ‘रचे हुए‘ में व्याप्त लेखकीय ईमानदारी के चलते उसका लिखा हुआ, चाहे वह पत्र-पत्रिकाओं के साप्ताहिक स्तम्भों में हो या एक ‘औपन्यासिक आभ्यन्तर‘ में हो, निश्चय ही वह हिन्दी साहित्य के पाठकों की स्मृति का अविभाज्य हिस्सा बन कर हमेशा साँस लेता रहेगा और कदाचित् यही उसके लेखन की उत्तरजीविता का सर्वाधिक सशक्त और सार्वकालिक आधार भी होगा।

-प्रभु जोशी
4, संवाद नगर, इन्दौर

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

विनीत तिवारी की कविता:हमें पता है

विनीत तिवारी सामाजिक कार्यकर्ता,संस्कृतिकर्मी,कवि,अनुवादक और प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी हैं.अच्छे वक्ता,स्पष्ट विश्लेषक हैं.मार्क्सवादी दृष्टि के साथ खुशमिजाज़ और दोस्ताना स्वभाव रखते हैं.मैं उन्हें अच्छा वाचिक कथाकार भी मानता हूँ.अपने समय के किसी अच्छे तर्क या व्यक्तितव को यदि वे उद्धृत करने जा रहे हों तो बिल्कुल कथाकार जैसे निर्वाह में आ जाते हैं.रोचक शैली में विदग्धता के साथ किसी मामूली घटना को भी दृष्टांत बना देना उनकी बड़ी खासियत है.उन्हें देखकर मैंने जाना कि दिन रात का कोई भी पहर किसी विशेष काम के लिए नियत नहीं होता.काम करते हुए ये सिर्फ़ बीतते रहने के लिए होते हैं.मसलन शाम को जुलूस-धरने में जाना.आधी रात तक किसी सभा का संयोजन करना.किसी साथी को अस्पताल देखने जाना या रेलवे स्टेशन छोड़ना.रात में ही कोई पर्चा या कार्ड बनाना.फिर याद से कोई छूटा हुआ लेख या वक्तव्य पूरा करना यह सब करते हुए यदि सुबह सामान्य ही रहने की संभावना है तो तीन चार घंटे सो लेना उनका सामान्य रूटीन है.इसमें नहीं सोना और आठ दस घंटे की लगातार ड्राइविंग भी किसी क्षण जुड़ सकते हैं.मैंने उन्हें कविता लिखते,सुनाने की उत्सुकता और अपनी प्रशंसा की आकांक्षा में कभी नहीं देखा.सिर्फ़ निंदा के लिए किसी को याद करते हुए नहीं सुना.किसी तर्क में आकंठ डूबकर वाह वाह में चले जाने की श्रद्धा में नहीं देखा.विनीत तिवारी का संतुलन और तर्कक्षमता को इस अर्थ में देखा मैंने कि हर हाल में उनका एक पक्ष होगा.खुश करने के लिए सहमत या असहमत होनेवाले सहमति का सौजन्य और असहमति की विनम्रता विनीत तिवारी से सीख सकते हैं.उनके बारे में यह भी ज़रूर याद आ जाता है कि वे कम लिखते हैं ज्यादा करते हैं.

विनीत तिवारी की यह कविता मैंने कथाकार और अब बया के संपादक गौरीनाथ द्वारा संपादित हंस के विशेषांक में पढ़ी थी.तब से यह मुझे याद आती रहती है.विनीत तिवारी की एक और कविता है जिसे भुलाया नहीं जा सकता-जब हम चिड़िया की बात करते हैं.हमें पता है तथा जब हम चिड़िया की बात करते हैं ये दोनों कविताएँ यदि एक साथ पढ़ी जाएँ तो कवि के आयाम और ईमानदार कवि किसके लिए और कैसे कहता है बेहतर ढंग से समझे जा सकते है.मेरी नज़र में इस कविता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कवित्व और आलोचना दोनों की आत्मा अपने भीतर सम्हाले हुए है.यह कविता और आलोचना दोनो है.आप पूरी कविता पढ़ जाइए थोड़ी देर गुनिए फिर दोहराइए हमें पता है,देखिए हमको न बताइए.तब आप बिना हँसे नहीं रह सकेंगे.यह हँसी इस बात के लिए होगी कि कविता में जीवन के लिए क्या क्या किया गया.जीवन बचाए रखने वाले,समाज बदलने के दावे करनेवाले कवियों की एक बड़ी जमात झेंपती नज़र आएगी.मैं इसे अपनी समझ के अनुसार एक व्यंग्य कविता मानता हूँ.जो समाज जितना ही रचनाकार समाज के लिए है.
आपकी राय का मुझे इंतज़ार रहेगा.



हमें पता है

देखिए ,हमको न बताइए
कि एक हरी पत्ती बच गई
तो जीवन बचा है अब भी
जीवन के सबूत के लिए कई चीखें,
आँसू,सिसकियाँ,घाव,खून,गालियाँ वगैरह
काफ़ी चीज़ें हैं हमारे इर्द-गिर्द

जीवन का ही सबूत है
तानाशाह के होठों पर उभरी यह मुस्कान
जो सुबह बगीचे में खिलखिलाते फूलों और
सुंदर हरियाली दूब को देख आई है
अगर कविता से प्रेम अतिरिक्त सबूत है जीवन का
तो काफ़ी है सौम्यता में लिपटा
फूलों,पत्तियों,चित्रों,नृत्यों और कविताओं से
खासकर आपकी हरी पत्तीवाली कविता से
तानाशाह का प्रेम

हमें सुनाना बंद कीजिए आप
तितलियों,फूलों,रस,पराग
और जीवन की सुंदरता के लिए इनके मायने
कलियों को खिलता देख जो सम्मोहित हैं भद्रजन
पिछली क्यारी का पानी अभी तक लाल है
उनके हाथ धोने के बाद से
नाक पर रूमाल रखकर बतियाने वाले
इन लोगों की शक्लें हू-ब-हू वही हैं
जो कल रात ईराक में देखे गए थे
और उसके बाद सिर्फ़ मलबा और बारूद की गंध थी
परसों तो वे दिन में ही अफगानिस्तान में थे
जहाँ उन्होंने पिस्ता खाते हुए बयान दिया
कि हमें गुलमोहर,पलाश और बोगनबेलिया के साथ
लोकतंत्र भी बहुत पसंद है
हरी पत्तियो और खुशरंग फूलों के बीच
तरोताज़ा सांस लेकर
अपने भीतर भरकर कुछ बेहतरीन सिंफनियाँ
निकलना है उन्हें फिलिस्तीन,नेपाल
सीरिया,कोरिया,ईरान और,कई और ठिकानों पर

ऐसे में आप हमे बता रहे हैं कि
कविता ही बचाएगी दुनिया को
या बची रहेगी कविता तो बचा रहेगा जीवन
या प्रेम,या वग़ैरह-वग़ैरह
तो मुझे शक होता है
कि या तो आपकी मति मारी गई है
जिसे आप चाहें तो कोशिश करके दुरुस्त कर सकते हैं
या फिर आप उनकी तरफ़ के जासूस हैं
और एक दिन इन सब फूल,पत्तियों,तितलियों इत्यादि के बीच
आप न भी चाहें तो भी
पहचान लिए जाएँगे.