रविवार, 26 मई 2019

रवीश आप नहीं हारे हैं

प्रिय रवीश जी,
नमस्ते !

मैंने आपका लेख 'क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूँ' ध्यान से पढ़ा। चूंकि आपके लेख का शीर्षक बिना प्रश्नवाचक चिन्ह के एक सवाल की तरह है इसलिए मैं पहले जवाब ही देना चाहता हूं- नहीं, आप बिल्कुल नहीं हारे हैं। आप हैं तो बहुत कुछ है। हम लोग अकेले नहीं हैं। कमज़ोर नहीं है। लोगों की समझ पर चारों तरफ़ से हमले हैं मगर वे आपको देख सुनकर अपनी समझ ठीक कर सकते हैं। रवीश कुमार अकेला ही आज की राजनीति का ईमानदार अटल विपक्ष है। मैं व्यक्तिगत रूप से इतने सालों में आपके लिखे बोले दिखाए से काफ़ी मजबूत हुआ हूँ। मेरे आत्मबल में वृद्धि हुई है। मैंने अनेक बार महसूस किया है कि मैं अपने काम को प्यार करने लगा हूँ। मुझमें निडरता आ गयी है। दृढ़ता, आत्मीयता, प्रतिबद्धता और मैत्री बढ़ी है। मैंने रवीश कुमार को देखते हुए जाना है कि कैसे विषम परिस्थिति में भी रचनात्मक, दोस्ताना, खुशमिजाज़ रहा जा सकता है। कैसे एक साथ बच्चों जैसा सुकुमार और परम दृढ़ हुआ जा सकता है। मैंने रवीश कुमार के कठोर राजनीतिक दृष्टि सम्पन्न मनुष्य और किसी फिल्मी गाने पर मचलते किशोर रूप को देखा है। 

मैं आज आपसे एक बात साझा करना चाहता हूं। मुझे अपनी इस उम्र में आकर एक इंसान मिला है जिसे मैं प्यार कर सकता हूँ। जिसकी हर बात पर यकीन कर सकता हूँ। मुझे गहराई से लगता है कि वह इंसान झूठ नहीं कह सकता। आप उस इंसान का नाम जानना चाहेंगे ? उसका नाम है सिद्धार्थ गौतम। सिद्धार्थ गौतम को दुनिया बुद्ध के नाम से जानती है। दुर्भाग्य से दुनिया ने एक गलत पाठ भी रट लिया है कि बुद्ध भगवान थे। अवतार थे। उन्होंने कोई धर्म चलाया। जबकि सच यह है कि बुद्ध इंसान थे। उन्होंने इंसानी संदेश दिए। बुद्ध कदाचित दुनिया के सबसे प्यारे और खरे इंसान हैं। उन्होंने एक बात कही है कि मैत्री, प्रेम से श्रेष्ठ है। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा होगा क्योंकि हम विराट विश्व में रहते है। प्रकृति से लेकर मनुष्य तक सबके प्रति मैत्री ही श्रेष्ठ और दोषरहित मानवीय गुण है। इसी से करुणा उत्पन्न होती है। मनुष्य में करुणा आ जाए तो वह सबका मित्र हो जाता है। उससे किसी का अहित नहीं हो सकता। रवीश जी मैंने महसूस किया है कि आपमें करुणा है। पत्रकारिता में रहते हुए इसी करुणा से आपकी भाषा बड़ी मैत्रीपूर्ण और मार्मिक हो गयी है। आपने इतना विरोध और धमकियां झेली हैं कि आपकी भाषा सहज ही दिल को छूने वाली और दोस्ताना है। उसमें विश्वास है। वह अपनी ओर खींचती है। आपकी भाषा में दर्द है। उसमें खुशमिजाजी भी है। क्योंकि आप उम्मीद से भरे हुए हैं। 

मैं दोहराता हूँ कि आप बिलकुल नहीं हारे हैं। जो लोग जीते हैं वे जीते नहीं हैं उन्होंने बस कुछ चीजों पर कब्ज़ा कर लिया है। वे विजेता नहीं हैं कब्जेदार हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में बहुमत पर कब्ज़ा करना आसान है अगर मीडिया, पूंजी और धर्म मिल जाएं। मत जीतना असम्भव। उसके लिए गांधी बनना पड़ता है। गांधी ने बिल्कुल शुरुआत में ही विश्व के महानतम मानवतावादी तोल्स्तोय और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का दिल जीत लिया था। मैं गंगा में खड़े होकर कह सकता हूँ कि मोदी जी चाहे जो और जितना जीत लें वे दुनिया के किसी भी महान मानवतावादी का दिल कभी नहीं जीत पाएंगे। उनमें वे खुबिया नहीं हैं। मोदी जी को अब तक हो चुके भारत के महान संतो का कभी समर्थन नहीं मिल सकता। यहीं मैं आपसे हार जीत के संबंध में एक पौराणिक यथार्थ को साझा करना चाहता हूँ। इसे ध्यान से पढ़ियेगा-

पुराणों में जिन्हें राक्षस कहा लिखा गया उनके पास सब हुआ करता था। रावण का ही उदाहरण ले लीजिए, तो उसके पास महा सत्ता थी, अकूत सोना था और विराट सेना यानी महा शक्ति थी। रावण परम तपस्वी था। वह महा उद्यमी था। लंका में विभीषण को छोड़कर शायद ही कोई था जिसने उसका विरोध किया हो अथवा प्रजा में विद्रोह भड़काया हो। संसार में शायद ही कोई रहा हो जिसके पास उससे बड़ी प्रभुता हो। वह क्या दृष्टि थी कि पुराणों के राक्षसों के पास सब कुछ था । वे युद्ध में कभी हारते नहीं थे। उन्हें जिस देवता से जो वरदान चाहिए वह मिलता था ? उनकी प्रजा कभी विद्रोह नहीं करती थी। फिर राक्षस कैसे हारते थे ? उनका अंत कैसे होता था ? वे कब हारते थे ? इन सवालों का पुराणों में एक ही उत्तर मिलता है कि राक्षस हमेशा जीतते। उनकी ताक़त, उनकी दहशत दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जाती। वे पराजित कब होते थे ? इसका उत्तर है वे अंत में हारते थे। राक्षसों के अंत में ही हारने की प्रवृत्ति या नियम पुराणों में मिलते हैं। तो क्या पुराणों में अंत में ही हारने के लिए राक्षसों की कल्पना की गयी अथवा यह प्रकृति का कोई शाश्वत नियम है ? जो भी हो अब कोई भी जवाब देने के लिए कोई पुराणकार हमारे बीच नहीं है। फिर इस चर्चा का औचित्य क्या है ? इस चर्चा का अभिप्राय यह है कि पुराणकारों ने उद्धारकों की आवश्यकता को प्रमुख बना दिया। उन्होंने यह नियम बना दिया कि कोई नायक आएगा जो हमेशा जीतने वाले राक्षस राजा का अंत करेगा। बिना नायक के ऐसा असम्भव है। प्रजा अपने बलबूते ऐसा नहीं कर सकती यही स्थापना पुराणों की इस देश को सबसे भयानक देन है। यही कारण है कि पुराणों में प्रजा के विद्रोह की कोई कहानी नहीं मिलती। वहां सदैव नायक आता है। तो क्या यह व्यवस्था जान बूझकर है ? नायकों का पुराणकर्ताओं से कोई रिश्ता है ? इन दोनों का एक ही उत्तर है कि पुराण कथाओं के जितने भी नायक हैं वे पुराण लिखने कहने वाले ऋषियों के माता पिता, बंधु, सखा, गुरु हैं।

रवीश जी आप पढ़ते बहुत हैं। मैं आपसे बुद्ध का 'धम्मपद' पढ़ने का आग्रह करता हूँ। अम्बेडकर की लिखी बुद्ध की जीवनी पढ़ने का आग्रह करता हूँ। काशीनाथ सिंह का उपन्यास 'उपसंहार' पढ़ने का आग्रह करता हूँ। आप इन्हें ज़रूर पढ़िए। आज गीता से अधिक ज़रूरी है भारत के लोगों का बुद्ध को पढ़ना। सम्भव है जिन बुजुर्ग ने आपको गीता दी उन्होंने आपमें अपना पुत्र देख लिया हो। वे आपकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए हों। सलिये गीता दी। ताकि वह आपके पास रहे तो गौलल्ला आप पर हमले न करें। मैं माफ़ी सहित कहना चाहता हूं गीता आज की किताब नहीं है। गीता में कृष्ण ने अर्जुन से झूठ बोला। महाभारत के बाद अर्जुन को न भोगने लायक धरती मिली न स्वर्ग। महाभारत ने सब नष्ट कर दिया था। सब कुछ। कृष्ण के राजनीतिक जीवन, उसकी महत्वाकांक्षाएँ, सबका खोखलापन और समूर्ण हार जानने के लिए काशीनाथ सिंह का उपन्यास उपसंहार अप्रतिम है। पढ़ियेगा। अम्बेडकर वाली बुद्ध की जीवनी हिंदी में उपलब्ध है। इसकी भूमिका भदंत आनंद कौसल्यायन ने लिखी है। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि जब आप ये किताबें पढ़ लें तो अपने दर्शकों से भी इनकी चर्चा कर लें मुझे संतोष होगा।

आखिरी बात मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि आप हारे नहीं हैं। मोदी जी भी जीते नहीं है। अगर उनकी जीत के बाद भारत हिन्दू राष्ट्र बनता है तो यह भारत की हार होगी। लेकिन मुझे उम्मीद है कि भारत ऐसा ही रहेगा। मोदी जी का नाम केवल लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में ही शुमार होकर रह जाएगा। भारत का विशाल हृदय उन्हें भीतर से बदलेगा भी और जहां आवश्यक होगा रोकेगा भी। होना भी यही चाहिए। मैं उनसे यही चाहता हूँ। मोदी जी आप महा जीते, आपको लोगों का समर्थन मिला। ठीक। आप राज करें। विकास करें। लेकिन हमारे भारत को वैसा ही रहने दें। जैसा बुद्ध, गांधी, भगत सिंह, अम्बेडकर से लेकर टैगोर तक इसे देखना चाहते रहे हैं। इसे नया भारत यानी हिन्दू राष्ट्र न बनाएं। भारत के लोग यह नहीं चाहते। कभी नहीं चाह सकते।

रवीश जी, मैं भविष्य में आपके अधिक सक्रिय तथा प्रतिबद्ध पत्रकारीय जीवन की कामना करते हुए कहना चाहता हूं कि हम सब यहीं हैं। इसी लोकतंत्र और देश में। आप हारे नहीं हैं। क्योंकि महामानव समुद्र भारत का लोकतांत्रिक समाजवादी, पंथ निरपेक्ष सपना हम सबका साझा सपना है। आपके द्वारा चलायी गयी विश्वविद्यालय और नौकरी सीरीज तथा अन्य सीरीज का भारत को ऋणी होना चाहिए। मुझे यक़ीन है कि भारत में कोई दूरदर्शी मनुष्य सत्ता में आया तो वह आपके इन कामों को देखकर ठोस सुधार करना चाहेगा। आप हिंदी पत्रकारिता के एकलव्य हैं। हम जानते हैं आप अपनी शिक्षा पर जियेंगे लेकिन अपना अंगूठा कभी नहीं देंगे। अनंत शुभकामनाओं सहित !
जय हिंद !

आपका
शशिभूषण

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (27-05-2019) को "खुजली कान के पीछे की" (चर्चा अंक- 3348) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. रवीश जी हार ही नहीं सकते

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