शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

असावधान भाषा की सांस्कृतिक ठेस


चर्चित उपन्यासकार और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति वी एन राय के नया ज्ञानोदय में प्रकाशित विवादास्पद साक्षात्कार से हिंदी साहित्यिक समाज दो खेमों में बट गया है.एक चाहता है कि श्री राय को सज़ा मिले उनकी बर्खास्तगी हो दूसरे का मानना है कि उनके माफ़ी मांग लेने के बाद पूरे प्रकरण को खत्म समझा जाए.दोनों समूहों में एक दूसरे के स्टैंड को लेकर भी परस्पर आरोप-प्रत्यारोप ज़ारी हैं.ऐसे में यह विमर्श लगभग गायब ही है कि वी एन राय के उक्त बयान के पीछे कौन सी चली आती हुई खतरनाक समकालीन प्रवृत्ति है?इस प्रवृत्ति के शिकार लोगों के लिए क्या सचमुच क्षमा नहीं है की ऐसी ही ताक़तवर आवाज़ें उठती रही हैं या आलोकधन्वा की एक पुरानी बात कि सिर्फ़ मृत लोग ग़लतियाँ नहीं करते मनुष्य से गलती करने का अधिकार सदा के लिए छीन लेना भी एक तरह की तानाशाही है पर भी विचार किया जाना चाहिए?.मैं सोचता हूँ प्रसिद्ध लेखक-चित्रकार प्रभु जोशी का यह ज़रूरी लेख इस प्रसंग में समर्थन-विरोध से परे परिदृश्य को समझने के लिए विवेकपूर्ण सावधान पाठ के लिए आमंत्रित करता है. -ब्लॉगर

सुपरिचित कथाकार और सम्प्रति महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति श्री विभूतिनारायण राय ने ज्ञानपीठ से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय‘ में प्रकाशित अपने एक साक्षात्कार में ‘समकालीन स्त्री विमर्श’ के केन्द्र में चल रही ‘वैचारिकी‘ पर बड़ी मारक टिप्पणी करते हुए यह कह डाला कि लेखिकाओं का एक ऐसा वर्ग है, जो अपने आपको बड़ा ‘छिनाल‘ साबित करने में लगा हुआ है। कदाचित् यह टिप्पणी उन्होंने कुछेक हिन्दी लेखिकाओं द्वारा लिखी गई आत्म कथात्मक पुस्तकों को ध्यान में रख कर ही की होगी। हालांकि इसको लेकर दो तीन दिनों से प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों ही मीडिया में बड़ा बवण्डर खड़ा हो गया है। लेकिन, हिन्दी भाषा-भाषी समाज में यह वक्तव्य अब चौंकाने वाला नहीं रह गया है। इस शब्दावलि से अब कोई अतिरिक्त ‘सांस्कृतिक-ठेस‘ नहीं लगना चाहिए। क्योंकि, ‘कल्चर-शॉक‘ का वह कालखण्ड लगभग अब गुजर चुका है।

उत्तर औपनिवेश समय ने हमारी भाषा के ’सांस्कृतिक स्वरूप’ को इतना निर्मम और अराजक होकर तोड़ा है कि ‘सम्पट‘ ही नहीं बैठ पा रही है कि कहां, कब क्या और कौन-सा शब्द बात को ‘हिट‘ बनाने की भूमिका में आ जायेगा। हमारे टेलिविजन चैनलों पर चलने वाले ’मनोरंजन के कारोबार’ में भाषा की ऐसी ही फूहड़ता की जी-जान से प्राण-प्रतिष्ठा की जा रही है। ‘भीड़ू‘, ‘भड़वे‘ और ‘कमीने‘ शब्द ‘नितान्त‘ ‘स्वागत योग्य‘ बन गये हैं। ‘इश्क-कमीने‘ शीर्षक से फिल्म चलती है और वह सबसे ज्यादा ’हिट’ सिद्ध होती है। संवादों में गालियां संवाद का कारगर हिस्सा बनकर शामिल हो रही हैं। इसलिए ‘छिनाल‘ या ‘छिनाले‘ शब्द से हिन्दी बोलने वालों के बीच तह-ओ-बाल मच जाये, यह अतार्किक जान पड़ता है। क्योंकि इस विस्मृति के दौर में ‘भाषा की भद्रता‘ को मसखरी में बदल जा रहा है, वहां ऐसे शब्दों को लेकर ‘बहस‘ हमें यह याद दिलाती है कि आखिर हम कितने दु-मुंहे और निर्लज्ज हैं कि एक ओर जहां हम ‘स्लैंग‘ के लिए हमारे जीवन में संस्थागत रूप से जगह बनाने का काम कर रहे हैं, तो फिर अचानक इस फूहड़ता पर आपत्तियां क्यों आती हैं ?

चौंकाता केवल यह है कि एक चर्चित, और गंभीर लेखक अपने वक्तव्य में ऐसी असावधानी का शिकार कैसे हो जाता है ? दरअस्ल, वह कहना यही चाहता था कि आज के लेखन में ‘हेट्रो सेक्चुअल्टी‘ (यौन-संबंधों की बहुलता) स्त्री के साहस का ’अलंकरण’ बन गया है। विवाहेत्तर संबंधों की विपुलता का बढ़-चढ़ कर बखान ‘स्त्री की स्वतंत्रता‘ का प्रमाणीकरण बनने लगा है। यौन संबंधों की बहुलता उसके लिए अपने देह के स्वामित्व को लौटाने का बहुप्रतीक्षित अधिकार बन गई है। हालांकि, इस पर अलग से गंभीरता से बात की जा सकती है। क्योंकि इन दिनों हिन्दी साहित्य में स्त्री-पुरुष संबंधों में ‘एकनिष्ठता‘ को स्त्री का शोषण माना और बताया जाने लगा है। खासकर हिन्दी कथा साहित्य में यह हो गया है। कविता में भी है कि ’उत्तर आधुनिक बेटी’, अपनी मां को दूसरे प्रेमी के लिए कांच के सामने श्रृंगार करते देखती है तो प्रसन्नता से भर उठती है। उसे मां के एक ’अन्य पुरूष’ से होने वाले संबंध पर आपत्ति नहीं है। ऐसी कविता सामाजिक जीवन में एक ‘नई स्त्री की खोज‘ बन रही है तो दूसरी तरफ कथा साहित्य में ‘निष्ठा‘ एक घिसा हुआ शब्द हो चुका है। निष्ठा से बंधी स्त्री को ‘मॉरल फोबिया‘ से ग्रस्त स्त्री का दर्जा दे दिया जाता है। याद दिलाना चाहूंगा, हेट्रो सेक्चुअल्टी को शौर्य बनाने की युक्ति का सबसे बड़ा टेलिजेनिक प्रमाण था, कार्यक्रम ‘सच का सामना‘। जिसमें मूलतः ‘सेक्स‘ को लेकर सवाल किये जाते थे और जिसमें विवाहेत्तर यौन संबंधों की बहुलता का बखान कर दिया, वह पुरस्कार के प्राप्त करने का सबसे योग्य दावेदार बन जाता था। बहरहाल, इसी तरह के घसड़-फसड़ समय को जाक्स देरिदा ने कहा है, ‘टाइम फ्रैक्चर्ड एण्ड टाइम डिसज्वाइण्टेड‘। यानी चीजें ही नहीं, भाषा और समाज टूट कर कहीं से भी जुड़ गया है। भाषा से भूगोल को, भूगोल को भूखे से और भूखे का भगवान से भिड़ा दिया जाता है। इसे ही ‘पेश्टिच‘ कहते हैं। मसलन, अगरबत्ती के पैकेट पर अब अर्द्धनिवर्सन स्त्री, ‘देह के चरम आनंद‘ की चेहरे पर अभिव्यक्ति देती हुई बरामद हो जाती है। हो सकता है सिंदूर बेचने की दूकान का दरवाजा देह-व्यापार की इमारत में खुल जाये। पहले मंदिर जाने के बहाने से प्रेमी से मिला जाता था, लेकिन अब मंदिर प्रेम के लिए सर्वथा उपयुक्त और सु रक्षित जगह है। एक नया सांस्कृतिक घसड़-फसड़ चल रहा है, जिसमें बाजार एक ’महामिक्सर’ की तरह है, जो सबको फेंट कर ’एकमेक’ कर रहा है। अब शयनकक्ष का एकान्त चौराहे पर है। और बकौल गुलजार के बाजार घर में घुस गया है। समाज में एक नया ‘पारदर्शीपन‘ गढ़ा जा रहा है, जिसमें सब कुछ दिखायी दे रहा है और नई पीढ़ी उसकी तरफ अतृप्त प्यास के साथ दौड़ रही है और अधेड़ पीढ़ी ’सांस्कृतिक अवसाद’ में गूंगी हो गई है। उसकी घिग्घी बंध गयी है। और, शायद सबसे बड़ी घिग्घी ‘भाषा के भदेसपन पर बंधी हुई है। अंतरंग को ‘बहिरंग‘ बनाती भाषा के चलते ही, लम्पट-मुहावरे अभिव्यक्ति का आधार बन रहे हैं। और इस पर सबसे ज्यादा सांस्कृतिक ठेस हमारी उस भद्र मध्यमवर्गीय चेतना को लग रही है, जो कभी-कभी मीडिया अपने हित में जागृत कर लेता है। अगर मोबाइल पर युवाओं के बीच की बात को लिखित रूप में प्रस्तुत कर दिया जाये तो हम जान सकते हैं कि भाषा खुद अपने कपड़े बदल रही है। उसे कुछ ‘ज्ञान के अत्यधिक मारे लोग‘ भाषा की ‘फ्रेश लिग्विंस्टिक लाइफ‘ कह रहे हैं। लेकिन, संबंधों को लम्पट भाषा के मुहावरे में व्यक्त किया जा रहा है।

दरअस्ल, विभूतिनारायण राय अपनी अभिव्यक्ति में असावधान भाषा के कारण, भर्त्सना के भागीदार हो गये हैं। क्योंकि, वे निष्ठाहीनता को लम्पटई की शब्दावली के सहारे आक्रामक बनाने का मंसूबा रख रहे थे। शायद, वे साहित्य के भीतर फूहड़ता के प्रतिष्ठानीकरण के विरूद्ध कुछ ‘हिट‘ मुहावरे में कुछ कहना चाहते थे। मगर, वे खुद ही गिर पड़े। एक लेखक को, जो वाणी का पुजारी होता है, वही वाणी की वजह से वध्य बन गया। याद रखना चाहिए कि बड़े युद्धों के आरंभ और अंत हथियारों से नहीं, वाणी से ही होते हैं। एक लेखक को शब्द की सामर्थ्य को पहचानना चाहिए। ‘सूअर‘ के बजाये ‘वराह‘ के प्रयोग से शब्द मिथकीय दार्शनिकता में चला जाता है। भाषा की यही तो सांस्कृतिकता है। इसे फलांगे तो औंधे मुंह आप और आपका व्यक्तित्व दोनों ही एक साथ गिरेंगे और लहूलुहान हो जायेंगे। जख्म पर मरहम पट्टी लगाने वालों के बजाय नमक लगाने वालों की तादाद ज्यादा बड़ी होगी।

प्रभु जोशी
4, संवाद नगर
इन्दौर

8 टिप्‍पणियां:

  1. उक्त लेख (४ अगस्त) को यहाँ भी देखें -
    http://streevimarsh.blogspot.com/2010/08/blog-post_05.html

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  2. प्रभु जोशी जी ! आपने कितने विराट फ़लक पर इस मुद्दे को समझने की कोशिश की है!!! .... भाषा का संस्कार निश्चित रूप से होता है और एक लेखक को तो बहुत जरूरी रूप से इसे ध्यान मे रखना चाहिए । इस सांस्कृतिक घसड़ फसड़ मे बिभूति जी को क्षमा दान पर विचार करना चाहिए ,गलती करने का अधिकार एक बार तो सहन है .... ।

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  3. प्रभु जोशी जब तुम्हे Heterosexuality की Meaning नही मालूम फ़िर तुम्हारी बाकी बकवाद पे कुछ भी नही कहना चाहता. तुम्हारे जैसो ने ही हिन्दी की ये दुर्गती की है. विभूति नारायण के बचाव मे तुम जिस तरह उतरे हो वह तुम्हारे चरित्र को उजागर करता है.यदि तुम शेयर दलाली का काम करते तो ज़्यादा बेहतर होता.

    Heterosexuality = romantic attractions to persons of the opposite sex

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  4. Heterosexuality "यौन सम्बन्धो की बहुलता" नही होती. Heterosexuality विपरीत लिंग के प्रति सहज आकर्षण को कहते है.

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  5. @सुशीला पुरी

    क्या बात है, आप घूम-घूम कर विभूति नारायण की पैरवी कर रहीं हैं। जो लोग उनके विरोध में लिख रहे हैं उन पर आप प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढंग से कटाक्ष कर रही हैं। जो चतुराई से उन्हें बचा रहे हैं उनका आप मुखर समर्थन कर रही हैं। किशोर-सुलभ कच्ची भावुकता भरी कविताएं लिखने वाली नारी का यह रूप देखना विस्मयकारी रहा।

    "प्रभु' की हेट्रोसेक्सुअलिटी का हश्र तो आप देख ही रही हैं ! अब आप इस आदमी की समझ का अंदाजा लगाइए और सर पीटिए।

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  6. विभूति नारायण राय को कौन मेहनत की कमाई खानी है, IPS हैं और डंडे की जुबान ही बोल समझ सकते हैं. उन्हें साहित्य में थानेदारी करने की ज़ुरूरत नहीं है

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  7. श्रीमान भुवन जी ! आपने कहाँ से पढ़ लिया कि मै उनकी वकालत कर रही हूँ ? कटाक्ष का तो प्रश्न ही नहीं है ..... । अब आपकी समझ इतनी ही है ,तो मै क्या कहूँ ? और हाँ मेरी कविताओं की बात लाने की यहाँ जरूरत तो नहीं थी पर अब आप अपने महान समझ के बूते ले ही आए हैं तो मै सिर्फ आपका आभार व्यक्त कर सकती हूँ बस....। और हाँ ! इस तरह छुपकर लिखना ठीक नहीं ।

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  8. ये सब परिणाम है इसका कि हमने साहित्य को खानों में बांट कर रख दिया। जब शिष्टाचारा समाज से गायब हो चुका हो तो साहित्य में कैसे दिखाई दे।
    वी0एन0राय जी के साथ-साथ दोष तो ज्ञानोदय के संपादक का भी है। क्या साहित्य के दिन इतने खराब आ गये हैं कि उसे, जिनका कि वह आज तक विरोध करता आ रहा था, उन्हीं बाजारवादी “ाक्तियों से संचालित होने को विवश होना पड़े। अच्छा हो रवीन्द्र कालिया जी इन्द्रसभा जैसी वयस्क पत्रिका के संपादक हो जायें।

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