रविवार, 26 मार्च 2017

अनारकली ऑफ़ आरा देख लीजिए, देश के लिए

मैंने भी फ़िल्म 'अनारकली ऑफ़ आरा' देख ली। लगता नहीं कि अब यह भूल पायेगी। बिहार के आरा की सुन्दर, साहसी और ख़ुद्दार लोक गायिका और नाचनेवाली अनारकली की जिंदादिली, संघर्ष, दुःख और सपने दिल में उतर गए हैं। लगता है एक उम्मीद से भरे मार्मिक आख्यान से गुज़र कर आये हैं। घर, सड़क, गलियां, रसिकों का हुजूम भीतर पैठ सा गया है।

बिहार का लोक, शिक्षा, संगीत, कला, राजनीति, जवाबदेही और सिनेमा सब जैसे घुल मिल साँस लेते हुए भीतर से गुज़र गए हैं। मन में जितना ख़ालीपन है उतना ही भराव। समझ नहीं आ रहा यह चैत की चमकीली उदासी गुज़री है या सिनेमा की भरी पूरी ऋतुएँ। याद नहीं आता कब ऐसा सिनेमा देखा था जिसमें अपने हिस्से की लड़ाई लड़कर हारी हुई सी जीती लड़की सुनसान सड़क पर अकेली चलती हुई 'जो हुआ' उसे फिल्म के पार्श्व संगीत में आखिरी बार हुए बदलाव से झटका देकर दर्शक के भीतर संकल्प और उम्मीद में बदल जाती है।

बहुत पहले, कहना चाहिए सालों पहले वी शांताराम की फ़िल्म 'पिंजरा' देखी थी। तब से वह दिल में उतरी हुई है। जब कभी याद आती है तो लगता है कल ही देखी थी। या कि सालों हो गए एक बार और देख लेते हैं। इसी तरह बासु भट्टाचार्य की मशहूर फ़िल्म 'तीसरी क़सम' जब देखी तो दिल में आया था- लगता नहीं इससे बेहतर फ़िल्म कोई और हो सकती है। अनारकली ऑफ़ आरा भी इन्हीं की सगी बहन फ़िल्म है। एक वाक्य में कहना चाहें तो कह सकते हैं किसी आधुनिक लोककथा जैसी मार्मिक फ़िल्म है।

वी शांताराम की फ़िल्म 'पिंजरा' में गानेवालियों का एक औपन्यासिक आख्यान दिखता है। फ़िल्म, केवल देखकर ही जाना जा सकता है कि जीवन के कितने रूप और रंग हो सकते हैं। नियति या समाज या नियंता या सत्ता क्या-क्या दिन दिखा देंगे किसी के न जानने में आ सकता है न वश में है। अनारकली के साथ भी क्या-क्या होगा अनुमान में नहीं आता। आगे क्या होगा की सचमुच की उत्सुकता फ़िल्म की बहुत बड़ी खूबी है। लेकिन अनारकली का जो प्रतिरोध है वह हिंदी सिनेमा में इतनी मार्मिकता से मैंने पहले नहीं देखा। इस लिहाज़ से यह फ़िल्म एक शुरुआत भी है। चुनौती है और ज़िम्मेदारी भी। यह स्त्री शक्ति-स्त्री शक्ति के नारेबाज़ी वाले समाधान से बहुत आगे की सोद्देश्य दिशा है।

एक बात विशेष रूप से गौर करने की है कि इस फ़िल्म में एक लोक गायिका के सामने जो शत्रु या विलेन है वह विश्वविद्यालय का कुलपति है। यानी अब भारत की उच्च शिक्षा, राजनीति और पुलिस के साथ मिलकर लोक गायिका का शील हड़प लेना चाहती है। संगीत और मनोरंजन के लिए जीनेवाली को रंडी बना देना चाहती है। जब नहीं बना पाती तो झूठ से बना डालती है। लेकिन जिसे रंडी कहा जा रहा है वह तो ठेठ गायिका और नर्तकी है। मनोरंजन से कहीं बहुत गहरे बहन है, दोस्त है, सहकर्मी है और सबसे बढ़कर स्त्री है। गायकी और गायिका मां की स्मृति ही उसकी दौलत हैं।

शिक्षा और विश्वविद्यालयों को इस तरह समाज विरोधी रूप में सामने ला देने के लिए मैं अविनाश दास को कभी नहीं भूल पाउँगा और मेरे दिल में इस एक फ़िल्म से ही फ़िल्मकार के लिए जो लेखक भी हैं कभी इज़्ज़त कम नहीं होगी। यह सचमुच बहुत बड़ा क़दम है। यदि छूट लेकर कहूँ तो विश्वविद्यालय में गया पत्रकार कोई और नहीं अविनाश दास स्वयं हैं। एक सचमुच का पत्रकार ही विश्वविद्यालय को ऐसा देख सकता है। यह केवल फ़िल्मकार के बस की बात न थी।

फ़िल्म में संगीत और गाने और आवाज़ बिलकुल देशज हैं। भीतर रच-बस जानेवाले। जिसने कभी भी लोक की संगत में कुछ उम्र गुज़ारी होगी वह इस संगीत के जादू में खो जाए बग़ैर नहीं रह सकेगा। 2017 में यह फ़िल्म लोक के प्रति अपने ऋण उतारने की तरह है। एक ज़िद की तरह है और सिनेमा को सिनेमा के कपड़े पहनाने की तरह है। फ़िल्म के दृश्य, पात्रों की भाषा और भाव इतने बारीक़ और सूक्ष्म हैं कि कह सकते हैं अविनाश दास ने यह फ़िल्म कैमरे से नहीं दिल से भीगी ज़िंदा आंख से देखे और दिखाये हैं।

यह भी दर्ज़ करने लायक अनुभव है कि पीवीआर कल्चर ने बहुत तरसा कर फ़िल्म देखने दी। यदि इस फ़िल्म को शाम का भी कोई शो टाइम मिलता तो हम जैसे छोटे शहरों के लोग भी बड़ी संख्या में देख पाते। लेकिन अब यक़ीन से लगता है सचमुच की फ़िल्में इसी तरह से हार हार कर अंत में जीतती होंगी। क्योंकि ये केवल मनोरंजन के लिए नहीं हैं। इनमें सार्थकता, सोद्देश्यता और मनोरंजन बराबर हैं। ये केवल इंटरटेनमेंट, इंटरटेनमेंट, इंटरटेनमेंट मार्का कमाऊ फिल्में नहीं हैं। अनारकली ऑफ़ आरा हस्तक्षेप में गहरे राजनीतिक है। देश के लिए, केवल हंसाने के लिए नहीं है बल्कि फ़िल्म का एक तीखा डायलॉग और बयान है।

फ़िल्म के उस दृश्य से बात ख़त्म करना ठीक रहेगा कि अनारकली ऑफ़ आरा फ़िल्म में कुलपति अंत में रोता है। अकेला बचता है। यह रोना फ़िल्म, फ़िल्मकार और दर्शक तीनों के लिए दौलत सरीखा है। यह दृश्य बताता है कि फ़िल्म को किसी व्यावसायिक फॉर्मूले के तहत नहीं पूरा कर दिया गया है, पूरी फ़िल्म में दिखनेवाली अनिश्चितता हो या नयापन सब परिपक्वता से, समझ से, अच्छे संपादन से रचे गए हैं। इतना ही नहीं फ़िल्म की पूर्णता में भीतर गहरी राजनीतिक, कलात्मक और जवाबदेह प्रतिज्ञा दिखाई पड़ती है।

मारे जाने वाले बुरे लोगों से रोनेवाले खलनायक समाज में बेहतरी की दृष्टि से अधिक काम के होते हैं यह इस फ़िल्म का सार्थक दावा है। यह दृश्य मंच पर और मंच से नीचे तथा दर्शकों के घर तक यादगार था। हमेशा रहेगा।

फ़िल्म में स्वरा भास्कर का अभिनय उनके लिए हमेशा चुनौती रहेगा। इसे लांघना तो संभव नहीं हाँ इसके और आयाम अवश्य हो सकते हैं। यह रेखा के लिए उमराव जान जैसा रोल था वक़्त स्वरा के लिए भी साबित करेगा। दूसरे कलाकारों के बारे में भी यही कहा जा सकता है कि वे जो बने हैं वही लगे हैं। 
इस फ़िल्म में दिल को छू लेने वाली बात यह भी है कि फ़िल्मी बहुत कम है। यथार्थ भी कहीं चुभता या खटकता नहीं है।

अनार का साथी अनवर और संरक्षक चाचा तो फ़िल्म 'अनारकली ऑफ़ आरा' की भारतीय दुआ सरीखें हैं। वे हमेशा सलामत रहें यही प्रार्थना की जानी चाहिए। फ़िल्म के गाने अपने मिजाज़ के लिए सब बेजोड़ हैं लेकिन सबके लिहाज़ से 'मन बेकैद हुआ...' साल के चुनिंदा अच्छे गानों में शुमार होना चाहिए। यह कह देना भी ठीक रहेगा कि 'जोगीरा सा रा रा' अब सिनेमाई धरोहर भी है।

अंत में यही गुज़ारिश है कि फ़िल्म लोक के लिए है लेकिन 'देश के लिए' बड़े काम की है। जिन्हें भारत का सेंसर बोर्ड देखने से नहीं रोकता उन्हें ज़रूर देखनी चाहिए। और घर के बच्चे बड़े हो जाएं उससे पहले यह सलाह ज़रूर बचाकर रख लेनी चाहिए कि ऐसा सिनेमा देखना चाहिए।

-शशिभूषण

सोमवार, 20 मार्च 2017

बॉस-चमचा नीतिकथा

बॉस किसी एक का होकर नहीं रहता। वह नहीं जानता वफ़ा क्या है? चमचा नहीं जानता उसने वफ़ा के सिवा क्या किया?

बॉस की नज़र में चाटुकार का भविष्य नहीं अपना करियर होता है। चमचे की निगाह में बॉस ही विधि-विधान होता है।

बॉस अपने आराम के लिए चाटुकार को पसंद करता है। चमचा जाल में ख़ुद फंसता है।

बॉस डराना, लड़ाना और पटाना जानता है। चमचा समझता है बॉस एक दिन कुछ भी कर सकता है।

बॉस को चुगली पसंद होती है लेकिन वह अपनी चुगली से चिढ़ता है। चमचा दूसरों के द्वारा की गयी बॉस की तारीफ़ पर कुढ़ता है।

बॉस जानता है चाटुकार पीठ पीछे घोर निंदक होता है। वह सबसे अधिक चमचे की जासूसी करता है। चमचा केवल बॉस की जुराबें सूंघता है।

बॉस विरोधी कर्मचारी की निंदा सुनना चाहता है लेकिन निंदक पर शक भी करता है। चमचा प्रतियोगी को ठिकाने लगाना चाहता है और बॉस पर संदेह करता है।

बॉस दुश्मनी के बावजूद उन कर्मचारियों को अहम काम सौंपता है जो ईमानदार होते हैं। चमचा खुश होता है कि पिंड छूटा। अब ग़ैर ग़लती करें और भुगतें।

बॉस को मसखरी अच्छी लगती है लेकिन वह चमचों को अपने राज़ नहीं बताता। वह अश्लील चुटकुले सुनता है। चमचा उसे व्रत त्यौहार का महत्त्व भी बताता है।

बॉस समझता है स्टाफ़ के बीच घुसपैठिये चमचे अंत अंत तक नुकसान पहुंचा सकते हैं। चमचा जानता है अंत में बॉस काम नहीं आएगा।

बॉस होशियार कर्मचारियों से दूरी रखते हुए भी उनपर घृणा की नज़दीकी रखता है। बॉस अलोकप्रिय होता है और चमचा मिलनसार।

बॉस अपने चमचों को विरोधियों से अधिक पेरता, निचोड़ता और कूटता है। चमचा संतोष में होता है कि चलो इसी बहाने सीख रहे।

बॉस जानता है मेरा भी बॉस हैं और फाइनली कोई किसी का बॉस नहीं होता। सब नौकर हैं। चमचा भी यह मानता है।

बॉस अगर भ्रष्ट हो तो अंत में अपने सब कुकर्म चमचों पर थोपकर चंपत हो जाता है।

बॉस आमतौर पर लंपट होता है। वह कैरेक्टर फुल लेडी से दूर रहता है। लेकिन मौक़ा आने पर चमचे के घर की इज्ज़त पर भी हाथ डालता है।

बॉस को बोल्ड और बिंदास लेडी अच्छी लगती हैं। वह उन्हें फ़िगर और ड्रेस के लिए एप्रिशिएट करता है। वहीँ चमचों की वफ़ादारी का डंका पीटता है।

बॉस हार्ड वर्कर होता है। चमचा डबल वर्कर होता है। दोनों मिलकर संस्था को फूहड़ और कामचोर बना देते हैं।

बॉस अगर चोर हो तो सबसे अहम चोरी चमचे के हाथों करवाता है। सबूत नष्ट करने में बॉस केवल खुद को रखता है।

बॉस अगर क्रोध में आये तो अपने विरोधियों को डराने के लिए भी अपने चमचे को ही दौड़ाता और पीटता है।

बॉस विजिट बहुत करता है। चमचा बॉस को कंपनी देता है।

बॉस लंबी मीटिंग बहुत लेता है। फंस न जाने के लिए सबको आगाह करता रहता है। वह मिसाल के तौर पर कभी कभी अपने चमचे को ही फंसाकर उसे बचा लेता है।

बॉस जानता है उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। चमचा बताता है बॉस का सब बिगड़ा हुआ ही है। इसी रस्साकसी में कभी कभी बॉस का सबकुछ बिगड़ जाता है।

बॉस जब जेल जाता है तो उसके बीवी बच्चे बहुत रोते हैं। लेकिन चमचा बहुत खुश होता है। बॉस के फंस जाने की ख़बर ज़माने भर में चमचों से ही फैलती है

बॉस खाता तो चमचे के साथ है, हँसता ब्रोकर के साथ है, खेलता अपने बॉस के साथ है, सोता प्रेमिका के साथ है। लेकिन बॉस रोता हमेशा बीवी के सामने है। चमचा बॉस का यह अंजाम जानता है।

बॉस अपनी भाषा हमेशा अच्छी रखता है, खुद को सम्मोहन और परामर्श का अधिकारी मानता है। लेकिन चमचे का व्याकरण और ड्राफ्टिंग बॉस से भी अच्छे होते हैं।

बॉस फॉर एवर रोमेंटिक होता है। उसे गर्ल फ्रेंड्स की कमी नहीं होती। शादीशुदा तो उससे मिलते ही दिल दे बैठती हैं। चमचा इस सबको बड़ी झंझट मानता है।

चाटुकार अकाल मौत तब मारा जाता है जब वह बॉस के लव पर डोरे डालता है या बॉस की बीवी के भी काम ठीक से नहीं कर पाता।

बॉस और चमचे का संग जनम जनम का होता है। चमचा अगर सफल हो तो बॉस बनता है और असफल हो तो चिरकुट का चिरकुट ट्रांसफर लेकर चला जाता है।

बॉस अंत में बहुत पछताता है।

चमचा अंत में खुद को मजबूर पाता है।

अंत में बॉस और चमचे बिछड़ जाते हैं। दोनों अपने अपने अच्छे दिनों को खूब याद करके लोगों को इंप्रेस करते हैं।

लेकिन बॉस और चमचे के रिश्ते कभी ख़त्म नहीं होते। वे अलग रूपों में अलग अलग जगह फलते फूलते रहते हैं।

इसलिए कृपया सोच समझकर चलें। बॉस और चमचों से बचकर रहें। अपने काम से काम रखें। किसी भी हालात में बाल बच्चों और रोज़ी से खिलवाड़ ठीक नहीं।

शशिभूषण, फेसबुक वाल से

हमसईद, सईद की याद, सईद के सरोकार

दिल्ली से शुरुआत कर भोपाल में पत्रकारिता कर चुके और इन्दौर के पत्रकारिता जगत में बहुत कम समय में ही काफ़ी लोगों का प्यार और इज्जत हासिल कर लेनेवाले, भाषा पर अच्छी पकड़ रखनेवाले, देश दुनिया से लेकर शहर-मोहल्ले की दुरुस्त जानकारी रखनेवाले, पायनियर, डेकन क्रॉनिकल, हिन्दुस्तान टाइम्स आदि में अनेक वर्षों तक जनपक्षधर, हस्तक्षेपकारी पत्रकारिता करनेवाले पत्रकार सईद खान को विगत 13 मार्च को गुज़रे हुए एक साल पूरा हुआ। सईद की स्मृति को ज़िंदा रखने, यादों को ताज़ा रखने, खुशी-खुशी याद करने के लिए 19 मार्च 2017 को इन्दौर के प्रेस क्लब में ‘सईद की याद...सईद के सरोकार..: हमसईद’ कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य कोरी श्रद्धान्जलि के स्थान पर सईद को ऐसे याद करना था कि उन सरोकारों को अपने भीतर फिर से जीवित महसूस करना जिन्होंने सईद को ईमानदार, विश्वसनीय एवं सबका चहेता बनाया। दुखद है कि आम लोगों के जीवन को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले सईद का 46-47 वर्ष की आयु में पिछले वर्ष कैंसर से जूझते हुए असमय निधन हुआ। जब सईद लिवर कैंसर से जीवन की लड़ाई लड़ रहे थे तब उनके चाहने वालों और दोस्तों ने ‘हमसईद’ सहायता समूह बनाया था।

सईद खान का परिचय देते हुए इन्दौर प्रेस क्लब के महासचिव नवनीत शुक्ला ने कहा- सईद, दोस्त, साथी पत्रकार ही नहीं हमारे लिए सलाहकार जैसे भी थे। हर हाल में किसी भी अवसर पर उनकी सलाहे हमें उबारती थीं, आगे बढने का हौसला देतीं थीं औऱ समृद्ध करतीं थीं। हमने तय किया है कि उनकी स्मृति में इंदौर प्रेस क्लब की ओर से हर वर्ष खोजी पत्रकारिता के लिए एक सम्मान दिया जाएगा। यह सम्मान प्रतिवर्ष प्रेस क्लब के वार्षिक समारोह में 9 अप्रैल को दिया जायेगा। पुरस्कार की राशि 11 हज़ार रुपये होगी।

सईद के भाई एवं पायनियर के पत्रकार रहे अकबर खान ने कहा- मैं इस दिन के लिए तैयार नहीं था। आप एक उम्र में आकर अपने बुज़ुर्गों के न रहने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन सईद ऐसे बेवक़्त चला जाएगा, ये मैंने कभी नहीं सोचा था और आज तक भी इस पर यक़ीन कर पाना मुश्किल होता है। कभी खयाल भी नहीं आया कि उसकी याद में ऐसे बोलने का दिन आयेगा। सईद और मैं भाई, दोस्त और जोड़ीदार थे। हमारे वालिद भी लेखक थे। मुम्बई में हमारे घर में उस वक़्त देश के सबसे बड़े पत्रकारों का आना जाना लगा रहता था। बचपन से ही हम दोनों को शायद वहीं से पत्रकारिता के प्रति दिलचस्पी पैदा हुई होगी। खूब पढ़ने की हम लोगों को लत थी। सईद को हमारे वालिद से सीख मिली कि हमें आम भाषा में लिखना है, अपनी अंग्रेज़ी का प्रदर्शन करने के लिए नहीं। सईद पैदल खूब चलता था। वह सड़क से जुड़ा था। पैदल चलने के कारण सड़क के लोगों से उसका वास्ता था। वह उनके सरोकारों के बहुत करीब था। उसने तरक्की के बारे में कभी नहीं सोचा।लोग दिल्ली जाते हैं वह दिल्ली, भोपाल छोड़कर इन्दौर आ गया। उसके भीतर सरोकार इस तरह समा गये थे कि सरोकार ही सईद थे। उसके सरोकार में बच्चे, सड़क के लोग, पेड़, पानी ही थे। वह खुद को सड़क गड्ढों का, पेड़ पानी का पत्रकार कहता था। थोडे समय में ही इन्दौर और सईद एक ही हो गये थे। सईद अब हमारा ही नहीं रहा। वह आप सबका हो गया।

आदिवासी हकों, शिक्षा और पर्यावरण के मसलों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राहुल बनर्जी ने सईद के साथ अपने संस्मरणों के बीच में कहा- सईद खबरों की बाईलाईन में अपना नाम नहीं देता था। लेकिन पढ़कर सईद का लिखा हमेशा पहचान में आ जाता था। सईद प्रेरणाओं से भरा हुआ था। उसका व्यक्तित्व चाय के प्याले की अंतिम बूँद पीनेवाले व्यक्ति का था। वो शहर के भीतर के ही नहीं बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी काम कर रहे लोगों को ढूंढता और उनके काम के महत्त्व को रेखांकित कर उन्हें नयी ऊर्जा और गौरव का भाव देता था। उन्होंने धार का एक किस्सा सुनाया कि किस तरह टवलाई में जहां हम आराम के लिए रुके, सईद ने वहां से नर्मदा बचाओ आंदोलन के उद्गम की कहानी निकाल ली और वो स्टोरी हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुई।

दिल्ली से आये विभिन्न अखबारों एवं बीबीसी के लिए लिख रहे सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार-संपादक संजीव माथुर ने कहा- हम अपने आपको इंदौर स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म के विद्यार्थी कहते थे क्योंकि यहां राजेन्द्र माथुर जैसे अद्भुत पत्रकार हुए हैं। । हम कुछ पत्रकार साथियों ने इंदौर में स्टडी सर्कल एवं चर्चा-परिचर्चा का सिलसिला शुरू किया था जिसमे सईद भी हमेशा आते थे। हमने सईद में न केवल देखा बल्कि उनसे सीखा कि पत्रकारिता में प्रोफेशनली अपग्रेड रहते हुए कभी झुकना नहीं है। साथ ही हमारी विचारधारा का प्रभाव हमारी रिपोर्टिंग पर नहीं होना चाहिए। सईद जानते थे कि दमन के बीच टिके रहना बिना सरोकार और वैचारिकता के नहीं हो सकता। आज पत्रकारिता में संपादकीय मूल्य छीज रहे हैं, रिपोर्टिंग खत्म की जा रही है, डेस्क हावी हो रहा है ऐसे समय में भी सईद से ही यह मिसाल बनती है कि मेहनत और ईमानदारी के साथ ही रस्ते निकलते हैं।

'हमसईद' कार्यक्रम में यादों के गंभीर, वैचारिक सिलसिले में मार्मिक पड़ाव तब आया जब इंदौर के पूर्व नगर निगम आयुक्त और ज़िले के वर्तमान कलेक्टर नरहरि सभा में अचानक ही पहुंचे। उन्हें जब सईद की याद में बोलने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा- सईद से मेरा दोस्ताना था। हम हमेशा संवाद में रहे। कभी सईद याद कर लेते तो कभी मैं। मैं 2004-05 में इंदौर से गया तो सईद यहीं रहे। मैं जब दुबारा कलेक्टर बनकर आ रहा था तो उम्मीद थी कि सईद से फिर संवाद रहेगा। मुझे बहुत दुख हुआ जब पता चला कि सईद लिवर कैंसर के इलाज के लये दिल्ली हैं। नरहरि जी ने कहा कि अपने सोलह साल के करियर में यह पहला कार्यक्रम है जिसमें मैं बिना बुलाये आया हूँ। मुझे समाचारों से पता चला तो मैं यहाँ आने से खुद को रोक नहीं पाया। सईद जैसे पत्रकार निस्वार्थ पत्रकार होते हैं। हमें ऐसे कार्यक्रम तो करने ही चाहिए साथ ही यह भी होना चाहिए कि जब ऐसे लोग जीवित हों तो उनको साथ और सच्चे सहयोग मिले।

नईदुनिया, इंदौर में उपसंपादक और सईद के करीबी रहे पत्रकार अभय नेमा ने अनेक किस्से याद करते हुए कहा- सईद ने जान बूझकर गाड़ी नहीं ली थी। वे चाहते तो गाड़ी गिफ्ट में ही मिल जाती लेकिन उन्होने अपनी ईमानदारी से कभी समझौता नहीं किया। निर्भीक पत्रकारिता की, कमज़ोर लोगों का हमेशा खयाल रखा। वे हमेशा घूमते रहते थे, लोगों से बातचीत कर करके खबरें निकालते थे। जब ट्रेजर आईलैंड बन रहा था तो सईद एक दिन ऊपरे माले पर पहुँच गये। यों ही बात चीत शुरू कर दी और तब उन्हें पता लगा यह माला अवैध है। इसके बाद उन्होंने कई स्टोरी कीं और बिल्कुल नहीं झुके न ही कोई प्रलोभन स्वीकार किया। सईद अपनी ऐसी सफलताओं की कभी डींग नहीं हाँकते थे। वे किसी को डरा देने, दवाब में ले लेने के किस्से सुनानेवाले पत्रकार नहीं थे। उनकी कमी ने आज इंदौर की पत्रकारिता में बड़ी कमी उपस्थित कर दी है। देश भर में पत्रकारिता अब सेल्फी जर्नलिज्म और संबंधाश्रित होती जा रही है, ऐसे में सईद जैसे लोग पत्रकार साथियों के लिए भी आइना दिखाते थे।

इंदौर में कई वर्षों से रह रहे व्यापारी और सईद के अभिन्न मित्र फ़िलिस्तीनी मूल के आमिर खान ने कहा - वह बहुत अच्छा दोस्त था। उससे मेरी दोस्ती फुटपाथ पर हुई थी। वह इंदौर को इंदौर के लोगों से बेहतर ही नहीं जानता था बल्कि फिलिस्तीन को भी मुझसे बेहतर जानता था। मैं समझता हूँ वह पत्रकारिता में और जीवन में बड़ा रिसर्च करनेवाली शख्सियत थी।

अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता जया मेहता ने कहा कि मुझे सईद का काम, उनके लिखने की शैली पसंद थी। मैं चाहती थी कि सईद मेरे साथ काम करे। मैं तो अपनी मार्क्सवादी पहचान हमेशा ज़ाहिर करती हूँ तो वे कहते कि मैं तो मार्क्सवादी नहीं हूँ तो फिर कैसे काम होगा। सईद मुझसे कहते थे मैं राजनीतिक नहीं हूँ लेकिन उनके इंकार के बावजूद मैं उनके काम में अपनी पॉलिटिक्स का रिफ्लैक्शन देखती थी। वे अपने काम से मेरी राजनीति के काफी नज़दीक थे। सईद को अपने काम में छोटी-छोटी चीज़ों को अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के साथ रखने में महारथ हासिल थी। सईद का महिलाओं के संघर्ष के प्रति बहुत रूचि और सम्मान था। वे हर महिला दिवस पर महिला फेडरेशन की महासचिव सारिका को फोन करके बधाई देते थे और हमसे कुछ न कुछ जानने की इच्छा रखते थे कि पिछले वर्ष भर में कामकाजी महिलाओं के क्या संघर्ष हुए और आगे क्या योजनाएं हैं। शाहबानो के केस में सईद ने बड़ी मार्मिकता और प्रतिबद्धता के साथ लिखा। उसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। हम सईद को इसलिए याद कर रहे हैं क्योंकि जब व्यक्ति चला जाता है तो उसकी यादें भी हमें ज़िदा रखती हैं। आज मेनस्ट्रीम मीडिया में अल्टरनेटिव जर्नलिज्म को जगह नहीं है लेकिन हमें ब्रेख्त की बात याद रखनी चाहिए जो वे ड्रामा के विषय में कहते हैं। ब्रेख्त ने कहा है ड्रामा केवल एक्टर से नहीं बनता। बल्कि ड्रामा पूरा होता है अपने एक्टर और आडिएंस से। यही बात पत्रकारिता पर भी लागू होती है। मैं अभी सोशल मीडिया की समस्या पर बात नहीं करूँगी केवल इतना कहूँगी कि रीडरशिप का अधिकार भी पत्रकारिता को सुधार सकता है। रीडरशिप का अधिकार बहुत महत्वपूर्ण होता है।

प्रेस क्लब के सभागार में सईद की अनेक तस्वीरें लगी थीं। एक तस्वीर में सईद की उँगलियों में फंस हुआ सिगार भी है। उस ओर इशारा करके जया ने सईद की जिंदादिली से जुड़ा एक संस्मरण भी सुनाया। उन्होंने बताया- मैं जब पहली बार २० साल पहले क्यूबा गयी थी तो सिगार का एक डिब्बा लेकर आई थी। घर में कोई स्मोकर न होने से वो पड़ा रहा और सालों बाद फिर एक दिन सामान इधर-उधर करने, सहेजने के दौरान वह डिब्बा मिल गया। बीस साल बाद क्यूबाई सिगार का वह डिब्बा अचानक मिला तो हम सब दोस्तों ने उसे उत्सव की तरह मनाने को सोचा। दफ्तर से छूटकर रात में करीब 12 - 1 बजे सईद भी मेरे घर आ गए। सिगार पुराने हो जाने से सूख गए थे और जल नहीं पा रहे थे तो सबने सोचा कि कम से कम थोड़ी देर के लिए अपने आपको फिदेल कास्त्रो और चे गुवेरा समझ जाए। सबने बारी-बारी से सिगार को मुंह में लगाया। सब खुद को फिदेल और चेग्वेरा समझते रहे और खुश होते रहे। तब सईद ने उसे वैसे ही मुंह में लगाकर सारिका से तस्वीरें खिंचाई जो यहाँ अभी लगी हैं।

कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने सईद को बड़ी शिद्दत से याद करते हुए कहा- सईद के यों तो अनगिन किस्से हैं। सईद का व्यक्तित्व बड़ा उबड़ खाबड़ लेकिन हरफनमौला था। वह क्रांतिकारिता, ईमानदारी को अलग नहीं मानता था बल्कि इंसानियत में ही क्रांतिकारिता को देखता था। वह जो भी कहता था विनम्रता, ईमानदारी और सरोकार के साथ कहता था। सईद को याद करने का मतलब है खुद को बेहतर इंसान बनाना, सरोकारों के प्रति पूरी मेहनत से समर्पित रहना। मैं आज खुद को बेहतर इन्सान महसूस कर रहा हूँ। वह अपनी पत्रकारिता को सड़क के गड्ढे से खेती तक लेकर आया। वो हम लोगों से खेती के बारे में जानना समझना चाहता था की किस तरह गाँवों में आजीविका का भीषण संकट फैला हुआ है और उसका सही सही कारण क्या है।

हम सईद को आज इस तरह उसके अपनों, उसके काम के साथ याद करते हुए अपने साथ उसे ज़िंदा महसूस कर रहे हैं। कह सकते हैं सईद अगर ज़िंदा होता तो उसके जैसे और लोग हमारे साथ आते, सामूहिकता और सांगठनिकता से बेहतर पत्रकारिता की अनेक मिसालें बनतीं और नए पत्रकारों के लिए प्रेरणा बनती। हमसईद के ज़रिये हम यही करने की कोशिश करेंगे और इस तरह सईद को अपने साथ ज़िंदा रखेंगे। उन्होंने कलेक्टर महोदय से भी कहा कि अब आप भी अपने आपको हमसईद का हिस्सा समझें।

सईद बहुत स्वाभिमानी था और वो किसी भी तरह किसी लालच या दबाव में नहीं आता था। ऐसा जीवन जीने से आप में एक गौरव भाव आता है। सईद कैंसर से भी घबराया नहीं और आखिर वो गया भी तो अपने सम्मान के साथ। सईद शादीशुदा नहीं था। अकबर का परिवार और उसके दोस्त ही उसका परिवार था। उसकी जान अपनी भतीजियों महक, निदा और ज़ोया में बसती थी। बच्चियां सईद को सईदसईद कहती थीं और बदले में सईद भी उनका दो बार नाम लेते थे। अपने प्यारे सईद सईद के बारे में सुनकर और उनकी तस्वीरें देखकर बार बार उनकी आँखों में आँसू छलक आ रहे थे। लेकिन सईदसईद को तस्वीरों में मुस्कुराता देखकर वो अपने आँसू पोंछ लेती थीं और मुस्कुराने लगतीं थीं।

जया मेहता ने एक दिन पहले ही दिवंगत हुईं भारती जोशी को भी याद किया। उन्होंने कहा भारती जी बहुत अच्छी शिक्षिका थीं। वे बहुत अच्छा पढ़ाती थीं और बोलती थीं। भारती जी की आवाज़ बहुत अच्छी थी। उन्होंने बहुत अच्छे नाटक भी बनाये थे। सभा में उपस्थित लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर उनके प्रति भी अपनी श्रद्धांजलि और प्रेम प्रकट किया।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में पत्रकार, साहित्यकार, स्वजन एवं अलग अलग क्षेत्रों की शख्सियतें उपस्थित रहीं। उपस्थित लोगों में प्रमुख रूप से भोपाल से आईं सईद की भाभी फौज़िया, प्रेस क्लब इंदौर के अध्यक्ष अरविन्द तिवारी, पूर्व अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल, अजय लागू, सुलभा लागू, सारिका श्रीवास्तव, रुद्रपाल यादव, प्रमोद बागड़ी, संजय वर्मा, कैलाश गोठानिया, कल्पना मेहता, कविता जड़िया, अनुराधा तिवारी, हसन भाई, जावेद आलम आदि उपस्थित थे। प्रलेसं, इप्टा, सन्दर्भ, रूपांकन, इन्दौर प्रेस क्लब एवं मेहनतकश के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में रूपांकन इंदौर की ओर से अशोक दुबे द्वारा पत्रकारिता पर केंद्रित पोस्टर प्रदर्शनी भी लगायी गयी। इस कार्यक्रम का संचालन विनीत तिवारी ने किया।

प्रस्तुति-शशिभूषण

योग हुए, योगी भए गावहुँ मंगलचार

हम स्कूली नागरिक शास्त्र की पतली सी किताब में पढ़ा करते थे कि अशिक्षा के कारण भारत में मतदाता उदासीन रहते हैं। वे सोचते-बोलते हैं- 'कोउ नृप होय हमें का हानि।'

उसी किताब में उपाय लिखा मिलता था यदि नागरिकों को शिक्षित किया जाये तो वे ऐसे विचार त्याग कर सच्चे लोकतान्त्रिक नागरिक बन सकते हैं। बल्कि बनाये ही जाने चाहिए।

अब इतना जीवन देख लेने के बाद, थोड़ा बहुत लोकतंत्र, टेलीविजन देख बूझ और झेल लेने के बाद लगता है-नागरिक अबूझ नहीं थे। उन्हें गहरा बोध था। वे जानते थे जो लादा जायेगा उसे ही ढोना है। शेष बेमतलब का रोना है।

याद आता है पिछले दिनों उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में मिली भारी जीत के बाद भारत वर्ष के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी ने भी बड़े सांकेतिक और बड़े खुले रूप में जो कहा वह कुछ यों था-

'हमारी सरकार सबकी सरकार है। जिन्होंने हमें चुना उनकी भी। जो सामने रहे उनकी भी। हमारी सरकार सबकी सरकार है।' (कृपया आगे समझे बेट्टा अपने मन से न पढ़ें।)

गोवा में सरकार गठन के दौरान इस बात का मर्म निकला। मैं अक्सर सोचता हूँ भारत के लोग भारत वर्ष के प्रधान सेवक जी की बातों को गौर से नहीं सुनते। यदि श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी को केवल सुन ही लिया जाये तो उसमें बड़ी योजनाएं दिख जाती हैं। खैर,

दैनिक उपयोग की वस्तुओं और योग के सबसे बड़े भारतीय कारोबारी बाबा रामदेव जी से थोड़े भिन्न मिजाज़ के योगी आदित्यनाथ जी के उ प्र का मुख्यमंत्री बनाये जाने की ख़बर है।

मानो बाक़ायदा रचे गए खुले रहस्य से सरेआम पर्दा उठ रहा है। मुझे लगता है टीवी की दुनिया में सबसे अधिक ख़ुश और संतुष्ट अंजना कश्यप को होना चाहिए। उनका अनुमान सही निकला है। बहन नेहा पन्त और ज़ी छाप एंकर्स को अभी और परिश्रम की दरकार है।

याद रखें, श्री योगी आदित्यनाथ जी ने बहन अंजना कश्यप से स्पष्ट कहा था- अयोध्या में आप लोगों की भावनाओं के अनुरूप ही राममंदिर बनेगा।

आगे चाहे जो हो लेकिन एंकर, बहन अंजना कश्यप को बधाई देने का मन होता है। यह बधाई बा हैसियत वैध या अवैध नहीं है। इसके कई और मतलब भी नहीं।

रहे भारत के लोग तो अब भारतवर्ष का नागरिक शास्त्र ही सबके माथे आ चुका है। मामूली स्वीकार नहीं होता- 'कोउ नृप होय हमें का हानि।'
-शशिभूषण

इतिहास में अभागे

हर साल नयी किताबें छपती हैं। हर साल नए पढ़नेवाले आते हैं। संस्कृति का यह ऐसा सातत्य है जो विद्या, विनय, मनुष्यता, संवेदना और विवेक को हर साल कुछ कदम आगे ले जाता है। 

हर साल कुछ किताब ऐसी आती हैं जिनके बारे में अतिशयोक्तिपूर्ण या विज्ञापनी भाषा में न कहें तो कह सकते हैं वे समय समाज की चौखट पर खड़े होकर अपने किताब होने की दस्तक देती हैं। अपने साथ बहुत सा इंसानी और उम्मीद भरा समेटे हुए पढ़े जाने का इंतज़ार करती हैं।

ये किताबें उस ताक़ीद और आशा के लिए सबसे उपयुक्त होती हैं जिनमे कहा जाता है आइये किताबें पढ़ें। पढ़िए किताबें अगर ज़माने में अकेले हैं या ज़माने में ही खोए हैं। लीजिये, ये किताब अगर हिसाबी किताबी ही हो चले हैं। 

'इतिहास में अभागे' एक ऐसी ही नयी किताब का नाम है। कविताओं की यह नयी किताब जाने-माने कवि दिनेश कुशवाह के नाम से है। दिनेश कुशवाह इस दौर में सचमुच के विरल कवि हैं। इसे ख़ूबी कहें, सीमा कहें या प्रतिबद्धता दिनेश कुशवाह के परिचय में चाहे जो जो लिखा हो लेकिन हैं वे केवल कवि।

कोई चाहे तो उन्हें टोक सकता है, कोई चाहे तो उनसे ईर्ष्या कर सकता है, कोई चाहे तो उन्हें पढ़ते हुए सराह सकता है, कोई दिनेश कुशवाह को ललकार सकता है कि कविजी इस वर्सटाइल एज में आप और भी कुछ क्यों न हुए!!!

लेकिन यह पत्थर की लकीर जैसी ही शानदार बात है कि दिनेश कुशवाह इस घोर वक़्त में निरे कवि ही हैं। जिन अर्थों में कोई किताब किताब कहलाती है उन अर्थों में कवि।

इस संग्रह में एक से बढ़कर एक कविताएँ हैं और सबसे बढ़कर है किताब होने का एहसास। इस एहसास को और मार्मिकता देती है हमारे समय के अद्वितीय विरल कथाकार शिवमूर्ति की ब्लर्बनुमा तस्दीक। 

समय मिले और संभव हो तो आप पूरी किताब ज़रूर पढ़ियेगा। शुरुआत के लिए मेरी इस वाल पर इस कविता से गुज़रना अच्छा रहेगा। प्रस्तुत है इसी किताब की शीर्षक कविता- शशिभूषण

इतिहास में अभागे

इतिहास के नाम पर मुझे
सबसे पहले याद आते हैं
वे अभागे
जो बोलना जानते थे
जिनके खून से
लिखा गया इतिहास
जो श्रीमंतों के हाथियों के पैरों तले
कुचल दिए गए
जिनके चीत्कार में
डूब गया हाथियों का चिंघाड़ना

वे अभागे कहीं नहीं हैं इतिहास में
जिनके पसीने से जोड़ी गयी
भव्य प्राचीरों की एक-एक ईंट
पर अभी भी हैं मिस्र के पिरामिड
चीन की दीवार और ताजमहल।

सारे महायुद्धों के आयुध
जिनकी हड्डियों से बने
वे अभागे
कहीं भी नहीं हैं इतिहास में।

पुरातत्ववेत्ता जानते हैं
जिनकी पीठ पर बने
बकिंघम पैलेस जैसे महल
वे अभागे भूत-प्रेत-जिन्न
कुछ भी नहीं हुए इतिहास के।

इतिहास के नाम पर मुझे
याद आते हैं वे अभागे बच्चे
जो पाठशालाओं में पढ़ने गए
और इस जुर्म में
टांग दिए गए भालों की नोक पर।

इतिहास के नाम पर मुझे
याद आती हैं वे अभागी बच्चियां
जो राजे-रजवाड़ों के धायघरों में पाली गयीं
और जिनकी कोख को कूड़ेदान बना दिया गया।

इतिहास के नाम पर मुझे
याद आती हैं वे अभागी
घसिआरिन तरुणियां
जिनसे राजकुमारों ने किया प्रेम
और बाद में उनके सिर के बाल
किसी तालाब में सेंवार की भाँति तैरते मिले।

इतिहास के नायकों का
भरण-पोषण करने वाले
इनके अभागे पिताओं के नाम पर
नहीं रखा गया
हमारे देश का नाम भारतवर्ष।

हमारी बहुएँ और बेटियाँ
जिन्हें अपनी पहली सुहागिन-रात
किसी राजा-सामंत
या मंदिर के पुजारी के
साथ बितानी पड़ी
इस धरती को उनके लिए
नहीं कहते भारत माता।

-दिनेश कुशवाह

बुधवार, 15 मार्च 2017

सार्वजनिक उपक्रमों का दुश्मन मीडिया

किसी भी मीडिया घराने को सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो जाये तो वह जार जार रोता है। अगर उसे सरकारी कृपा न प्राप्त हो तो थोड़ी दूर भी चल नहीं पाता।

लेकिन मीडिया का अभियान एक ही होता है हर प्रकार के सार्वजनिक संस्थान को संदिग्ध बनाना। उसे देखने में इतना उजाड़ देना कि कोई सेठ उसे तुरंत बसाने के लिए आगे आ सके। इस संबंध में हिंदी फिल्मों का वह दृश्य सटीक है कि आग लगवा दो और फिर सबसे पहले बुझाने पहुंचो। मोटर कार से।

एक से एक पढ़े लिखे, अंग्रेजी के जानकार खोजी पत्रकार सार्वजनिक उपक्रमों की कमियों के तिल को ताड़, राई को पहाड़ बनाते रहते हैं। उनके ज्ञान ध्यान को देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्हें फरिश्तों वाले गुण प्राप्त हैं।

एक भी मौक़ा नहीं छोड़ा जाता। जब कोई कमी न मिले तो अफ़वाह से काम चलाया जाता है। यही पत्रकार किसी निजी संस्थान की कमियों के बारे में अंधे बहरे बन जाते हैं। ये भारतीय रेलवे पर धारावाहिक स्टोरी लिखते हैं। लेकिन अगर किसी प्राइवेट बस का कंडक्टर इन्हें दो की सीट पर तीसरा बैठा लेने को लप्पड़ भी मार दे तो किसी से नहीं बताते।

सार्वजनिक संस्थानों को चुन चुन ख़त्म कर निजी क्षेत्र के विस्तार के लिए प्राइवेट मीडिया संगठित गिरोह की तरह काम करता है। इस मसले पर लगभग सारे अख़बार डाकू जैसे हैं। पैसा लूटकर गरीबों को ज्ञान बांटते हैं।

यदि सरकारी संस्थाएं एक एककर निजी क्षेत्र में चली जाएँगी तो यह उम्मीद करना मूर्खता ही है कि भारतीय संविधान का कोई मूल अधिकार ठीक से बचा रह पाएगा।

जितना संभव हो और जितना कर पाएं उतने उद्यमों में सार्वजानिक संस्थानों की प्रतिष्ठा के लिए हर संभव कोशिश करें।

एक सरकारी अस्पताल या विद्यालय अभावग्रस्त हो सकता है और किसी हद तक बुरा भी। लेकिन कोई भी निजी उपक्रम प्रथम दृष्टया ही क्रूर होता है। उसके जाल से निकलने का रास्ता फिर कोई विदुर नहीं बता पाता।

सुना है अब मीडिया में अंतर्राष्ट्रीय पूंजी निवेश भी है। वह आपके सामाजिक न्याय, समता, समान अवसरों वाली और लोकतान्त्रिक समाजवाद वाली राष्ट्रीयता का भला सोचने से पहले कोई अनाथालय न खोलना चाहेगा!!!

-शशिभूषण

राजभवन में ब्रह्मचर्य

कल की एक खबर(मेघालय के राज्यपाल षणमुगनाथन का इस्तीफ़ा)मुझे नहीं भूली। इस ख़बर में आज के भारत का वह सब एक जगह है जो अलग अलग ख़बरों में टुकड़े टुकड़े में ही दिखता है।

इस खबर में पूर्वोत्तर है। राजभवन है। दक्षिण भारत है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है। पिछड़ा वर्ग है। लेखक है। दक्षिणपंथी सत्ताधारी राजनीति है। ब्रह्मचर्य है। स्त्री के प्रश्न हैं। नौकरशाही की बग़ावत है। पद का दुरूपयोग है। न केवल अरुणाचल प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार है बल्कि आज की भारतीय राजनीति की सबसे असंभव बात राज्यपाल जैसे पद से इस्तीफ़ा है।

अब इस खबर की हालत देखिये कि न यह नेशनल दस्तक है, न मीडिया विजिल है, न लल्लन टॉप है। इसके जागरण ख़बर होने का तो सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि इस ख़बर के साथ साथ संजय लीला भंसाली की निंदनीय पिटाई है और बहुजन बेटी के मिस यूनिवर्स होने की उम्मीद है।

आप यक़ीन कीजिये आज यह ख़बर मुझे बीबीसी हिंदी पर ही खोजने से मिली है।

आप पूछेंगे मुझे इस खबर में इतना क्या खास लगता है? जो मैं घर का न घाट का टाइप से सबको कटघरे में लाकर खड़ा कर देनेवाली इस खबर पर इस हद तक केंद्रित हूँ।

तो मैं आपसे डेढ़ बात कहना चाहूंगा। यानी एक पूरी और दूसरी आधी। पूरी बात यह कि इस खबर में सबसे चौकानेवाली लेकिन उम्मीद की बात यह है कि भारत के किसी राज्य के राजभवन के लगभग सब कर्मचारियों ने मिलकर राज्यपाल के विरुद्ध चिट्ठी लिखी। ख़ुलासा किया। इतनी एकजुटता और साहस भारत के नौकरशाही के इतिहास में सुन्दर अक्षरों में लिखी जानेवाली घटना है। वरना आप जानते हैं कि भारत में इस वक़्त बेरोज़गारी इतनी अधिक है कि कोई अकेला नौजवान भी यह कहने की जुर्रत नहीं करता कि मेरे बॉस का जुकाम ठीक ही नहीं हो रहा।

आधी बात यह है साथियो कि यह जो घटना घटी है इसमें शर्मिंदगी और ज़िम्मेदारी लेने की हिम्मत और नेकनीयत अलग अलग कारणों से मंद ही रहेगी।

आप पूछेंगे मैंने किस तीसमारी में इस खबर का संज्ञान लेने का फैसला कर लिया तो मैं इतना ही कहूंगा खबर को तौलने का एक नज़रिया नागरिक नज़रिया भी होता है। इसे भी अपनी बात कहने का हक़ है।

यदि आप कर सकते हैं तो इस ख़बर को भूलियेगा नहीं। इसमें आज के भारत की तस्वीर है।

-शशिभूषण

बदलाव

संपत राम जाड़े की ऋतु में बस से लौटते हुए रास्ते में रोज़ अमरुद खाते थे। उनकी बस बीच में पड़नेवाले एक क़स्बे के छोटे बस स्टैंड पर चलते चलते रुकती थी। बस ठिठकती गुज़र जाती उसके पहले ही संपत राम 10 रुपये का नोट निकाल कर हाथ में रख लेते थे। खिड़की से रुपये ठेलेवाले को पकड़ा देते। इशारे के आधार पर वह दो अमरुद छांटकर उन्हें दे देता। संपत राम बेचनेवाले को अमरुद वापस करते- काटकर दे दो। बेचनेवाला पूछता- मसाला लगा दूँ क्या? संपत राम कहते- लगा दो। यह रोज़ मानो किसी जैविक नियम के अधीन अनिवार्य रूप से होता था।

लेकिन जैसे ही संपत राम अमरुद खाना शुरू करते अफ़सोस से भर जाते। बुदबुदाकर कहते- मसाला नहीं लगवाना था। मसाला बिलकुल ख़राब है। नमक ही नमक और लाल मिर्च। मसाला, अमरुद को बदमज़ा कर देता है। संपत राम का यह सोचना और तय करना कि कल मसाला नहीं लगवाएंगे, फिर यंत्रचालित सा हां बोल देना, अफ़सोस से भर जाना भी रोज़ मानो किसी जैविक नियम के अधीन अनिवार्य रूप से होता था।

बस, स्टैंड पर आकर धीमे धीमे खिसकने लगी थी। सम्पतराम को नींद लग गयी थी। अमरुद बेचने वाले ने उन्हें खिड़की का कांच खटखटा कर जगाया। जब तक वे नोट उसे पकड़ाते बेचनेवाला अमरुद काट चुका था। उसने पूछा - मसाला लगा दूँ क्या? लगा दो संपत राम ने कहा।

बस सड़क पर पहुँच चल पड़ी। संपत राम ने अमरुद की चौथी फांक से एक छोटा टुकड़ा कुतर लिया। फिर वही भुनभुनाहट- मसाला नहीं लगवाना था। अमरुद बदमज़ा हो जाता है। कल नहीं लगवाऊंगा।

उस दिन जाने क्या हुआ कि सम्पतराम को मिर्च लग गयी। गले में नमक सना अमरुद अच्छी तरह चबाने के बावजूद फंस गया। जोर की खांसी आयी तो आँख में आंसू भी आ गए। उन्होंने पानी की बोतल निकाली। तभी बस ने स्पीड ब्रेकर पार किया। हाथ का संतुलन बिगडा और सम्पतराम मुंह से नहा गए। वे इतना झल्ला गए कि उन्होंने अमरुद के साथ बेख़याली में पानी का बोतल भी खिड़की से बाहर फेंक दिया। अगल-बगल की सवारी उनकी यह हरकत देखकर हंस पड़ी।

संपत राम पहले तो खूब पछताए। फिर सोचते हुए गुस्साकर बस रुकवाई। भीड़ चीरकर नीचे लगभग कूद गए। दौड़कर बोतल उठा ले आये। जब तक बस नहीं चली खिड़की से सड़क किनारे पड़े अमरुद के टुकड़ों को पछतावे और अजीब दयनीय निगाहों से देखते रहे। बस चल पड़ी तो संपत राम ने सोचा

बात क्या है आखिर!!! रोज़ सोचता हूँ मसाला नहीं लगवाना। बेचनेवाला रोज़ पूछता है मसाला लगा दूँ क्या? मैं रोज़ कहता हूँ- लगा दो। हूँ हाँ भी नहीं साफ़ साफ़ लगा दो कहता हूँ। फिर खाता हूं। रोज़ वही बेकार स्वाद!!!फिर वही पछतावा मसाला नहीं लगवाना था। यह आखिर क्या है? इसका समाधान क्या है? और आज जो तमाशा हो गया उसमें ग़लती किसकी है? कल को कोई बड़ी बात हो जाये तो किसे दोष देंगे?

संपत राम देर तक बड़ बड़ाते रहे। फिर वे सचेत होकर चुप हो गए। बिलकुल चुप। चारों ओर निगाह दौड़ाकर आँखें मूंद ली। अपेक्षाकृत नीची सीट पर गर्दन टिका ली।

लेकिन घटना थी कि सम्पतराम को बेध रही थी। अंत में उन्होंने खुद को चिकोटी काटकर ताक़ीद की- अनुशासन ज़रूरी है। दूसरों को सुधारने या किन्ही हालात के बारे में शिकायत करने से पहले ज़रूरी है कठोर अनुशासन से खुद को धीरे-धीरे ठीक करना। अपनी गलतियां ठीक नहीं होती और अपेक्षा ज़माने भर कीं। ग़लत है यह।

संपत राम ने ख़ुद से पक्का किया-कल अमरुद में मसाला नहीं लगेगा मतलब नहीं लगेगा और मन ही मन हंस पड़े। बस ने रफ़्तार पकड़ ली थी।

-शशिभूषण

जेएनयू में साक्षात्कार

यूजीसी ने फैसला किया। जेएनयू(केंद्रीय विश्वविद्यालय) सबसे पहले अपनाने जा रहा है। नियम यह है कि एक औपचारिक पात्रता परीक्षा के बाद पात्र परीक्षार्थियों के साक्षात्कार लिए जाएंगे। केवल इसी साक्षात्कार के अंकों की मेरिट के आधार पर उनका अध्ययन के लिए प्रवेश हो पायेगा।

कुछ बातें मैं भी रखना चाहता हूँ:-

1. उच्च शिक्षा में अध्ययन के लिए प्रवेश पाने के लिए ही पात्रता परीक्षा के बाद साक्षात्कार की अनिवार्यता भारत की खोखली उच्च शिक्षा का अत्यंत साफ़ आइना है। ख़ासकर तब और जब भारत एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुका हो जिसमें किसी प्रकार की शिक्षा के बाद लगभग न के बराबर रोज़गार होंगे।

2. मेरे ख़याल से केंद्रीय संस्थानों में किसी प्रकार के प्रवेश या नियुक्ति में आरक्षण के नियमों का मानक स्तर पर अनुपालन किया जाता है। जेएनयू में साक्षात्कार के अंकों के पूर्ण अधिभार के मसले को पूर्णतः स्पष्ट रूप में सामने आना चाहिए। सवाल यह है कि प्रवेश हेतु जब सीट आरक्षण के तहत सभी वर्गों के लिए नियत होंगी तब साक्षात्कार के अंकों के आधार पर केवल वंचित तबके के परीक्षार्थियों को कैसे बाहर किया जा सकेगा? क्या वे सीट सामान्य श्रेणी के परीक्षार्थियों से भरी जाएँगी या जेएनयू में एडमिशन में आरक्षण है ही नहीं? प्रबुद्ध लोगों को या जेएनयू के मामलों के जानकार लोगों को इस स्थिति को अविलंब स्पष्ट करना चाहिए।

3. यूजीसी में इस नियम पर मुहर प्राध्यापकों के अनुमोदन या सहमति के बाद ही लगी होगी। यानी नीति निर्माण के स्तर पर यह निर्णय उच्च शिक्षा के शिक्षकों द्वारा ही कार्यान्वयन के स्तर तक पहुंचा होगा। माना जाना चाहिए कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों में पिछड़े, दलित, आदिवासी तबके के लोग पर्याप्त संख्या में होंगे। अलग अलग नामों वाले उनके यूनियन भी होने ही चाहिए। यूजीसी में भी इनकी उपयुक्त संख्या से शायद ही इंकार किया जा सके। तो क्या ये शिक्षक इस मसले पर कोई संयुक्त बयान निर्मित कर सकने की स्थिति में सचमुच हैं? या माना जाये कि शिक्षा और पद की इस अवस्था में भी सवर्ण दवाबों से मुक्ति असंभव है!!! फिर किससे उम्मीद के जा सकती है?

4. यह बहुत चौंकानेवाला डर या यथार्थ हो सकता है कि यदि साक्षात्कार अनिवार्य पात्रता शर्त हुआ तो विश्वविद्यालयों में दलित, पिछड़े, आदिवासी विद्यार्थी प्रवेश से छांट दिए जाएंगे। क्या यह माना जाना चाहिए कि साक्षात्कार समिति में सब सवर्ण ही होंगे?

5. हवाई उत्कृष्टता के नाम पर भारत में रोज़गार विहीन पढ़ाई के लिए यह बेतुका नियम और घमासान अत्यन्त हास्यास्पद है। इस नियम को हटाए जाने के सम्बन्ध में केवल जेएनयू के कुछ विद्यार्थियों द्वारा आन्दोलन या आमरण अनशन किया जाना अत्यन्त दुखद है। स्थिति की दयनीयता मानो सबकुछ चीख चीख कर कह रही है। दुनिया में भारतीय उच्च शिक्षा को देखने वाले अगर लोग होंगे तो उनका कितना अधिक मनोरंजन हो रहा होगा इसका भी केवल अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है।

6. उच्च शिक्षा में प्रवेश को लेकर साक्षात्कार की अनिवार्यता के सम्बन्ध में शिक्षाविद माने जाने वाले लोगों और मीडिया की चुप्पी अचरज में डालनेवाली है। परिस्थिति की भीषणता का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि ऐसा तब हो रहा है जब भारत के विद्वान या प्राध्यापक ज्ञान विज्ञान में पूरी पृथ्वी या अखिल ब्रह्माण्ड को झुका देने के दावे करते रहते हैं। उनके अध्ययन, शोध और यात्राओं में सरकार द्वारा बेशुमार दौलत ख़र्च की जाती है। निजी विश्वविद्यालयों के मनीषियों के तो कहने ही क्या?

7. सब बखूबी जानते हैं कि 2017 के भी आनेवाले शुरूआती दो तीन महीने सेमिनारों और शोध तथा शैक्षणिक परिचर्चाओं के लिए ही नहीं व्यय के लिए भी कुख्यात होंगे। ऐसी हालत में भी यह उम्मीद व्यर्थ ही है कि यूजीसी के ताज़ा प्रवेश नियम के सम्बन्ध में कोई आम सहमति बन पायेगी।

8. ऊपरी तौर पर यह समस्या बड़ी विकराल लगती है। फेसबुक पर तो इस संबंध में हो रही बहसों के मार्च से उड़नेवाली धूल से आसमान ढँक गया है। इसी मसले पर रवीश कुमार को सुधीर चौधरी के साथ एक ही तराजू में चढ़ा देने की दिलीप मंडल जी जैसे अन्य पक्षधरों की आक्रामकता से तो यही लगता है कि बड़ा भूचाल आ जायेगा और बौद्धिक तबका अम्बेडकरवादी और प्रगतिशील अलग अलग धड़े में पूर्णरूपेण दो फाड़ हो जायेगा। लेकिन ठहरकर सोचने पर यही लगता है इस मुद्दे से भी बड़ा प्रसंग यानी उत्तर प्रदेश का चुनाव बौद्धिकों को रह रहकर खींच रहा है।

9. उत्तर प्रदेश में बहु प्रतीक्षित विधान सभा के चुनाव होने हैं। मीडियाकर्मी, बहसबाज़, टीकाकार और राजनीतिक विश्लेषक अपने दल बल के साथ इसी मसले पर लंबे प्रवास में हैं। वे अब तक एक कथित समाजवादी परिवार की महा संघर्ष गाथा से भारत का विवेक समृद्ध कर चुके हैं। आगे वे इस सत्य की खोज में हैं कि यदि वहां अमुक या तमुक को हरा दिया गया या जिता दिया गया तो किस प्रकार भारत का दुर्भाग्य टल जायेगा।

10. एक बहुत मामूली चिंता या साफ़ गोई यह है कि भारत की इन दिनों की उच्च शिक्षा ही कई सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं की जड़ है। जिस प्रकार भारतीय लोकसभा बहस के नाम पर केवल वक़्त की बर्बादी और सफलतम अवस्था में निरा जूतम पैजार कर सकती है उसी प्रकार उच्च शिक्षा भी पाठ्यक्रम बदलते बदलते केवल परीक्षा के नियम या प्रवेश के नियम बदल सकती है। मौजूदा उच्च शिक्षा से किसी शैक्षिक सामाजिक बदलाव की उम्मीद करना रेत से तेल निकालने के सामान है या एक और मुहावरे में चील के घोंसले में मांस मिलने जैसा है।

उपर्युक्त कुछ बातें अनधिकार ही हैं। लेकिन अराजक वाचाल विमर्श भीड़ में आख़िर अपनी विनम्र बौद्धिक बारी का इंतज़ार कब तक किया जाये?

-शशिभूषण

गणतंत्रिये

मुझसे भी लोग पूछने से नहीं चूकते। आज एक गणतंत्रिये ने भी पूछ लिया
आप तो नौकरी करते हैं फिर कैसे लिखते रहते हैं? दिक़्क़त नहीं आती?
मैंने कहा- दिक्कत तो आती ही है। समय कम मिल पाता है। सोचता हूँ दिन रात पढूं, दिन रात लिखूं, गला दुखने तक बहस करूँ और घोड़े बेंचकर सोऊं। लेकिन हो नहीं पाता।
मैं वो बात नहीं कर रहा। मेरा मतलब है कोई क़ानूनी अड़चन, नियम संबंधी बाध्यता? कोई शिकायत कर दे तो?
अरे! मैं तो यह चाहता ही हूँ। हा हा..ज़रूरत पड़ेगी तो किसी वकील से पूछ लूंगा। उसकी वकालत चल जायेगी। मेरा लेखन।
मेरा मतलब है आपके बॉस ने कभी आपको टोका नहीं? आजकल अफसर नज़र रखते हैं।
भई, मैं न लिखने की नौकरी नहीं करता। मास्टर हूँ। पढ़ना लिखना मेरा काम है। मैं नहीं लिखूंगा पढूंगा तो क्या आढ़तिये पढ़ेंगे? गौरक्षक लिखेंगे?
गण तंत्री भाई का मुंह खुला रह गया। लेकिन उन्होंने चांस पूरा ले लिया। बोले
आपने सब सही कहा। लेकिन ये जो आपने अभी बीच में गौरक्षकों का अपमान कर दिया मैं उसकी कह रहा था?
मैंने कहा - मांस की जीभ है, इंसान का दिल है लोहे की रेल नहीं कि ताव न खायेगी। आप ही कहिये कोई बुरा ही मानने घूमे तो क्या कर सकते हैं?
गणतंत्री भाई ने जोर का ठहाका लगाया, हाथ मिलाकर चल दिए।
मैं खिसियाकर रह गया।

-शशिभूषण

लौटना

मुंह पर कभी कुछ नहीं कहा
हमेशा बड़े सौजन्य से पेश आये
लेकिन गांधी को गाली दी कि नहीं?
अच्छी किताब को गन्दा कहा या नहीं?
निर्दोष के लिए चुपाई साध गये कि नहीं?
सोये कूकुर को पत्थर मारा था कि नहीं?
भिखारी को रुपये की जगह उपदेश दे दिया
हँसते खेलते बच्चे को गाल नोच रुलाया
सीधे सीधे चोट नहीं पहुंचाई सही है
जब गालियां ओट लेकर पड़ती हैं
तब हिंसा मुस्कुराकर आती है
अगर ख़याल नहीं रखते
तो नफ़रत नहीं करते
क्रूरता तभी जाती है
जब लौटता है प्रेम

-शशिभूषण

जाति जाति का खेल

छत्तीसगढ़ के बस्तर में काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया कुछ दलित बौद्धिकों की नज़र में सवर्ण महिला हैं। महानगरों में टिके हुए इन चिंतकों को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि बेला भाटिया छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में आदिवासी महिलाओं और वंचित तबके के लिए हर क़िस्म का जोख़िम उठाकर काम कर रही हैं।

उल्लेखनीय है कि बेला भाटिया को एक दिन पहले ही उनके घर में गोलबंद दबंगों द्वारा कुछ ही घंटों में छत्तीसगढ़ छोड़ देने की बेशर्त धमकी मिली है। इस प्रसंग में पुलिस से लेकर राज्य सरकार तक बेला भाटिया के ख़िलाफ़ हैं। समाचार तो ऐसे आ रहे हैं कि पुलिस के सबसे बड़े अधिकारी बेला भाटिया की महिला वकील को भी अश्लील धमकी दे रहे हैं।

इस आशंका को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता कि ऐसे घोर दमन के वक़्त और परिवेश में यदि बेला भाटिया के ख़िलाफ़ कुछ अप्रिय किया जाता है तो उन्हें समय रहते कोई मदद मिल भी पायेगी या नहीं!!!

हाल के कुछ वर्षों में जब वाम और दलित एकता की सबसे अधिक आवश्यकता महसूस की जा रही है तब वंचितों की ओर से कुछ ख़ास तरह के परिवर्तनकामी अम्बेडकरवादी जन्मना दलित या पिछड़े उभरकर सामने आये हैं। इनमें पत्रकार, शिक्षक से लेकर प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं।

दलित, पिछड़ों के मध्यवर्ग से सम्बन्ध रखने वाले ये अधिकांश विचारक किसी को भी जो जन्मना दलित या पिछड़ा नहीं है हमेशा जातिवाद के मोर्चे पर खींचकर बहस करना चाहते हैं। यह एक विचित्र धुन है जो अधिकतर कटुता को ही जन्म देती है। इनके लिए जाति ही सत्ता है। सत्ता के कुल चरित्र को इन्होंने केवल जाति से ही इस तरह नत्थी कर दिया है जैसे किसी ज़माने में लंगोट ही चरित्र की कसौटी हुआ करता था।

ऐसा खासतौर पर तब अतिरिक्त उत्साह से किया जाता है जब सामने कोई जन्मना सवर्ण हो। इसमें आसानी यह होती है कि बिना किसी तर्क के भी ब्राह्मणवादी आया ब्राह्मणवादी आया कहकर या तो बहस को काबू में किया जा सकता है या कम से कम भटकने को विवश किया ही जा सकता है।

इस नए क़िस्म के प्रायोजित दलित बौद्धिक कार्य व्यापार में एक मज़बूत आधार यह होता है कि कोई सचमुच का प्रगतिशील जन्मना सवर्ण गिरी हालत में भी दलित विरोधी बात नहीं कह पायेगा और जन्मना सवर्ण जातिवादी नहीं हो सकता दलित बौद्धिक कभी यह मानेंगे नहीं न मानने देंगे।

फिर क्या है? एक विचित्र विवेचना शुरू होती है जिसमें नेहरू केवल जनेऊधारी हैं। एक ओर गांधी के भी विखंडन की ज़बरदस्त तैयारी है तो वहीं दूसरी ओर ऐसे समकालीन कुख्यात नेताओं की वक़ालत की विवशता है जो कभी न घर के रहे हैं न कभी घाट के होंगे।

समकालीन राजनीति के ही वार, पलटवार के उपकरणों, सूचनाओं और लेखन कौशल से अपनी बौद्धिकता का समर्थन निर्मित कर रहे जनाधार पलट देने की महत्वाकांक्षा रखनेवाले कुछ नव दलित एक्टिविस्टों से बहस करते हुए यदि जातिवादी कहे जाने की व्यक्तिगत और निजी तक़लीफ़ छोड़ दी जाए तो आमतौर पर आगे कोई बड़ी चुनौती नहीं मिलती।

हर ऐतिहासिक उदाहरण को केवल खारिज़ करने की ज़िद तो खूब मिलती है लेकिन निर्मिति में दक्षता नहीं होती। सिर्फ़ इंकार और निंदा। तोड़ो और तोड़ो। मानो निर्माण और सहकार दैवी कृपा से अपने आप होता जायेगा।

कुल मिलाकर इस सब से वास्तव में कोई बड़ी तोड़ फोड़ तो नहीं दिखती लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण बात तो है ही कि अपने करियरिस्ट लेखन और ज़बरदस्त बायोडाटा के बल पर ये कुछ नए सफलताकामी लोगों के भीतर गहरी सामाजिक तैयारी के स्थान पर अकारण जातीय दुराव पैदा करने में किंचित सफ़ल रहते हैं।

महान स्वप्न दृष्टा अम्बेडकर के प्रति अटूट और आलोचना से परे आस्था रखते दिखने वाले ये नव दलित चिंतक भूल ही जाते हैं कि इनकी आपस की बहसें, असहमतियां और झगडे कितने क्रूर और पश्चगामी हैं।

इनका झगड़ा विश्व के सबसे बड़े माने जानेवाले दक्षिण पंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से है लेकिन ये फौरी तौर पर वामपंथियों को निशाने में रखना चाहते हैं क्योंकि कभी आंबेडकर ने संघ के प्रति उपेक्षा बरती थी।

शुक्र है कि अपने आरंभिक दौर में भी दलितवाद के पास ज्योतिबा फुले से लेकर प्रो तुलसी राम और ओमप्रकाश वाल्मीकि, शीतल साठे जैसे प्रकाश स्तंभ हैं। वरना केवल जाति की पहचान करके ही उग्र या शांत हो जानेवाली इनकी सक्रियता कितने विभ्रम रचती इसका अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है।

एक तरफ़ छत्तीसगढ़ में बेला भाटिया हैं दूसरी तरफ़ जेएनयू में दिलीप यादव। इन दोनों के बीच में दलित, वाम सत्ता विमर्श। फ़ायदा चाहे जिसका हो लेकिन दूरी बेला और दिलीप के बीच ही बढ़ रही है इतना साफ़ है।

मज़े में हैं वे ताक़तें जो दलित और वाम एकता से संकट में हो सकती थीं।

-शशिभूषण

बोल वचन

उन्होंने किसी अनोखी तरंग में ताल ठोंककर कह दिया-मुक्तिबोध के बाद हिंदी में कोई कवि ही नहीं हुआ।

माहौल में साहित्यिक सन्नाटा फैल गया। सब किंकर्तव्यविमूढ़। इससे पहले कि वे किसी और विधा की खिड़की में हथौड़ा पीट दें किसी ने टोका- माफ़ कीजिये। ग़लत है बात। आपने हल्की बात कह दी।

वे चिढ गए- आप गहरी बात कह दीजिए। ही ही। रसिक फिस फिसा उठे। किसी ने गिलासों में अगला पैग ढाल दिया।

कोई और बोला- मैं तो कहता हूँ, कबीर के बाद ही कोई कवि न हुआ। कुल ढाई कवि हुए भारत के काव्य- इतिहास में अब तक। पहला वाल्मीकि, दूसरा कबीर। आधे में शेष सब गधे।

किसी ने चुटकी ली- ये हुई न बात! और कातो चरखा सालों !!! न खादी पहनी न विचार ओढ़ा। बेमतलब की खाली खिटर खिटर।

कोई दहाड़ा- निराशा की बात नहीं। हर वक़्त का अपना कबीर होता है। अन्ना हैं हमारे कबीर। अन्ना की जय जय!!!

कोई और बोला-सब बकवास है। अब कविता की ज़रूरत ही क्या है? साहित्य में ही धरा क्या है? पढता ही कौन है? हरामखोर पब्लिक को चाहिए मनोरंजन, झूठ, धोखा और पिछवाड़े एक जोर की लात!

किसी ने जोड़ा- उचित है, मनोरंजन चाहे सनी लियोनी करे चाहे मोदी जी। पब्लिक को फ़र्क़ नहीं पड़ता। बड़े बड़े उड़ गए, दुकौड़ी लाइन लग गए।

कोई ज़ोर से चिल्लाया- हर बात में मोदी!!! साला कहीं चैन नहीं। टीवी देखो तो...हरामी लेखकों को देखो तो... कोई पानी भी मिलायेगा भोs...केs...

जैसा की होता है संगत थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयी। सबने एक दूसरे को देखा। फिर सब ठठाकर हंस पड़े।

अगले दिन इस प्रसंग की एक बढ़िया पोस्ट फेसबुक पर लिखी गयी। जिसे कम ही लोगों ने पसंद किया।

उन्होंने, जिनने ऐतिहासिक बोल वचन कहे थे कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। कारण? वे मरी फेसबुक पर हैं ही नहीं।

-शशिभूषण

माइंड योर बिजनेस. आई एम डूइंग माई जॉब

प्रगतिशीलों, क्रांतिकारियों, गांधीवादियों, समाजवादियों, अम्बेडकरवादियों, सरकारी कर्मचारियों और हिंदी समर्थकों का मज़ाक उड़ाते आपने भी लोगों को पढ़ा देखा सुना होगा।

जहाँ उचित है वहां आलोचना होनी चाहिए। क्यों नहीं होनी चाहिए? हमारी राय में भी ज़रूर होनी चाहिए, फ़ौरन होनी चाहिए। बल्कि यदि आवश्यक हो तो भर्त्सना भी होनी चाहिये।

लेकिन जब बात समाज सुधार की, ज़रूरी राष्ट्रीय हस्तक्षेप की हो तो ऐसे आलोचकों के सम्बन्ध में एक सावधानी, सतर्कता भी बरतनी चाहिए।

वह ज़रूरी कदम यह हो सकता है कि जो उपर्युक्त आलोचना या निंदा में संलग्न पाये जाएँ उनका बायोडाटा एक बार देख लेना चाहिये। यदि संभव हो तो ऐसे लोगों की एक यथासंभव छोटी बड़ी सूची बना लेनी चाहिए।

जब यह सूची आप बना लेंगे तो एक दिलचस्प चीज़ देखने में आएगी। ऐसे लोग किसी कारोबारी कंपनी, किसी एनजीओ या किसी मीडिया संस्थान के वेतन या पैकेज भोगी कर्मचारी होंगे।

इन जॉबधारियों की प्राथमिक प्रतिबद्धता यह होती है कि यदि दूसरी जगह पांच रुपये अधिक मिलें तो पहली जगह जॉब तुरंत छोड़ देंगे।

मान लीजिए ऐसे लोग यदि धर्म की आलोचना कर रहे हैं तो आप देखेंगे इनके ही सेठ या तो अत्याधुनिक मंदिर बनवा रहे होंगे या कल्पना कीजिये यदि वे होटल या ट्रांसपोर्ट व्यवसाय में होंगे तो धर्मस्थलों से बिजनेस कर रहे होंगे।

यह छोटा सा उदाहरण है। आप अपने अनुसार भी चेक कर सकते हैं। नतीज़े दिलचस्प निकलेंगे यह तय है।
-शशिभूषण

किताब विरोधी प्रवृत्तियां

इस साल मशहूर लेखक-कवि यतीन्द्र मिश्र की वाणी प्रकाशन से भारत रत्न लता मंगेशकर पर केंद्रित एक अत्यंत पठनीय, महत्वपूर्ण, उपयोगी और प्रेरक किताब लता सुर-गाथा आई।

इस किताब को पढ़ चुके पाठकों ने खूब सराहा। लेकिन यह किताब हिंदी के कुछ वाचाल लेखकों, समीक्षकों के बीच बहस-विरोध का विषय बनी।

इस बहस-विरोध आदि से गुज़रकर दो बातें मेरे ख़याल में आईं-
1. अमिताभ बच्चन आदि अभिनेताओं पर अंग्रेजी में किताब लिखने वाले लेखक जल्द ही सेलिब्रेटी का दर्ज़ा पा जाते हैं। उन्हें बड़े-बड़े साहित्यिक महोत्सवों में बुलाया जाता है, पत्र पत्रिकाओं के रंगीन पृष्ठों पर उनके साक्षात्कार छपते हैं और हिंदी पाठकों के बीच भी वे लेखक बड़ा सम्मान पाते हैं।

2. भारत की कई पीढ़ियों के दिलों पर एक साथ राज करने वाली जीवित किंवदंती लता मंगेशकर पर हिंदी में आई एक स्तरीय और पठनीय किताब प्रशंसा तो दूर क़ायदे का स्वागत भी न पा सकी। इस किताब के बारे में ऐसे मीन-मेख निकाले गए कि जिसने यह किताब नहीं पढ़ी है वह इस किताब को खरीदने से पहले पढ़ने के बारे में कई बार सोचे।

ऊपर की दो बातों से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास आदि को छोड़कर अन्य विषयों पर किताबें पढ़ने का चलन नहीं है तो यह अपने आप नहीं हुआ।

किताबें धीरे-धीरे पाठकों से दूर हो रही हैं तो यह स्वाभाविक ही है। हमारे लेखकों के बीच परस्पर इस बात पर आम सहमति सी है कि किसकी किताब की तारीफ़ करनी है किसके किताब की निंदा। किताब भले कैसी भी हो और चाहे पलटी तक न गयी हो।

आज हिंदी में ठीक ठाक माने जाने वाले समीक्षकों में भी किसी किताब के बारे में ऐसी टिप्पणी लिखने की प्रवृत्ति सायास ग़ायब होती है कि किताब प्रचलित हो और पढ़ी जाये।

हिंदी किताबों के बारे में उत्साह जनक माहौल का अभाव और ख़त्म होते जा रहे पुस्तकालय आनेवाले गंभीर संकट का स्पष्ट संकेत हैं। इसके लिए वे टीकाकार, शिक्षक, संपादक ख़ासतौर से ज़िम्मेदार हैं जो भरपूर श्रम और तैयारी से लिखी गयी किसी किताब के बारे में अपने पूर्वाग्रहों को भी निर्णयात्मक ढंग से प्रकट करते हैं।

इस नकारात्मक किताब विरोधी प्रवृत्ति का निदान होना ही चाहिए। अन्यथा पुस्तक मेले वायुयान से पहुंचकर झोले भर भरकर किताब लानेवाले पढ़ने का समय नहीं निकाल पाएंगे और सचमुच के पाठकों तक किताब पहुँच नहीं पाएंगी।

-शशिभूषण