रविवार, 7 मई 2017

मारता मीडिया क्या क्या न करता !!!

आज का भारतीय मीडिया पूंजी आधारित उस दक्षिणपंथी राजनीति की रीढ़ है जिसका उभार पूरी दुनिया में देखा जा रहा है। यह राजनीति, धन-बल एवं अपने समर्थक मीडिया के साथ मिलकर सवाल, संदेह, आलोचना और आम जन का हित सर्वोपरि रखने वाली पत्रकारिता को ख़त्म करती चल रही है।

माफ़ कीजिये, यह मीडिया तोड़-मरोड़ और शब्दों का मनचाहा अर्थ निकालने के लिए ही है। लेकिन यह तोड़-मरोड़, मुद्दों को भटकाना, अपने एजेंडे को केंद्र में रखना, केवल इतना ही नहीं है। यह शासन करने और दमन कर पाने की एक सक्षम व सफल राजनीति है। वर्ना अला पार्टी के भ्रष्टाचार, फलां पार्टी के अत्याचार में फ़र्क़ ही क्या और कितना है? उनके समर्थक, पोषक तो एक ही हैं। कमाल देखिये कि वही सेठ बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र में सब दलों के पालक हैं। कब किसे कितना पालना है वह तय कर लेते हैं।

मीडिया का भाषायी खेल और राजनीतिक बिसात वह कार्पोरेट जाल है जिसके लोकतंत्र में पहले से फंसी जनता को और जकड़ लिया गया है। मज़ेदार यह है कि भारतीय मीडिया कर्मी ही नारे गढ़ता है और वही उन्हें जुमला भी साबित करता है। इसे देशज अंदाज़ में कहते हैं अपने पाले तीतर, मुर्गे लड़ाने का खेल, राज और उसी हिंसा का आनंद।

यह केवल भाषा की सरमायेदारी नहीं , शब्दों की ऐयारी नहीं, करुणा की रोज़ की हत्या नहीं सत्ता का गुप्त ढंग का खुला अभियान तथा हथियार है। चन्दन पांडे की एक अच्छी कहानी याद आती है जिसका शीर्षक अब याद नहीं। वह कहानी बताती है कि भाषा अपनी संवेदना में कितने कार्पोरेट महत्व की होती है। किसी सफल कंपनी के लिए कवि कितने काम का होता है।

जिसे आज 24 घंटे सातों दिन का मीडिया कहते हैं वह देशी विदेशी पूंजी निवेश की आत्मनिर्भर खेती है। आशा की बात नहीं मज़ेदार बात यह है कि इसे चौथा खंभा आदि कहनेवाले देर से ही सही अब सच कह रहे हैं। क्योंकि अब विश्लेषण के रोज़गार में भी घोर मंदी और भारी छंटनी जो शुरू हो गयी है। खतरनाक यही है कि पहरेदार भी चोरों की ही चाकरी करे।

इसलिए नए रिपब्लिक में खत्तम के फिनिश्ड अंग्रेजी अनुवाद पर चौंकिए मत। यह जी, आज तक, ओल्ड या न्यू इण्डिया टीवी की भी स्ट्रेटजी है। मुझे तो कम समझने मीडिया जगत का न होने के बावजूद यह कहने में भी संकोच नहीं कि यह भारतीय मीडिया संस्थानों की ही स्ट्रेटजी और प्रोडक्शन है। वे उन्हीं के द्वारा खोले गए अपने ही मालिकों के हितों के लिए हैं।

इसके पीछे एक निजी अनुभव भी है। अपने बचपन के कुछ अजीज़ मित्र जो आज सफल पत्रकार एंकर हैं वे अपनी पढाई के दौरान ऐसा ही कुछ सीखने पर ज़ोर दे रहे थे। कमाल की बात यह कि वे बचपन से ही मामूली बात को मुद्दा जिसे साधारण लोग बात का बतंगण कहते हैं, भावना को तीर साबित कर पाने में सक्षम थे। वे पर्यवेक्षण और अर्थ अन्वेषण के लगभग बैडमिंटन प्लेयर थे। बड़ी खेल भावना से सदाचरण को धूर्तता, अतिथि सत्कार को पीआर और नेट्वर्किंग से नत्थी कर निंदा कर लेते थे। कही हुई बात के आधार पर ही नहीं फ़ोन रिकॉर्डिंग आदि के आधार पर तब बवाल काट लेते थे जब स्टिंग हो या केजरीवाल की सेटिंग थ्योरी दूर दूर तक कहीं न थे।

वे तभी कहते थे पत्रकारिता सरोकार नहीं शुरू से लेकर अंत तक बिजनेस है। यह हमारे लिए अधिक से अधिक प्रोफेशन हो सकती है। मीडिया केवल और केवल बिजनेस ही है। हमने किसी आश्रम में एडमिशन नहीं लिया है सेमेस्टरवाइज मोटी फीस भरी है। आखिरी सेमेस्टर के साथ कहीं न कहीं लगना है। यहाँ निःशुल्क या सेवा जैसा कुछ भी नहीं है। यह बात अलग है कि वे तब साहित्य और विचार में मूल्य एवं सेवा के हामी थे। वे ज़ोर देकर कहते पैसे के लिए साहित्य? न, कभी मत सोचना! अफ़सोस, वे अपने बारे में तब शायद ही जानते थे कि प्रोफेशनल होते होते कमर्शियल हो जायेंगे। मीडिया बिजनेस के साथ-साथ राष्ट्रवाद का आंदोलन हो जायेगा। धार्मिक पत्रकारिता सबसे अच्छा पैकेज हो जायेगा। वे अपने गांव की मिट्टी भी गूगल में देखेंगे। वनस्पतियां गूगल पिक्चर में देखकर लिख पाएंगे। बारिश अपने ही टीवी या अख़बार की खबर से जानेंगे। इसमें उनकी ख़ास गलती भी नहीं। यह उन्हीं के आका लोगों का राज था जिसने शुरुआत से पहले निजीकरण के साथ हर क़िस्म का रोज़गार ख़त्म करना शुरू किया। बेहतर प्रतिभा के लिए बेहतरीन जॉब का सपनीला संसार निर्मित किया। बेरोज़गार मरता, क्या न करता!!!

तो सवाल यह नहीं है कि रिपब्लिक मीडिया में खत्तम की क्या अंग्रेज़ी हो रही है? चिंता यह भी बराबर की करनी है कि अंग्रेज़ी की कौन-कौन सी, कहाँ- कहाँ हिंदी हो रही है? क्योंकि अब कह लीजिये या कहिये पहले से ही मीडिया में अनुवाद और पूंजी ही पत्रकारिता है। आज के किसी भी सफल पत्रकार के कंधे पर यम के दो दूत नहीं बैठते अनुवाद एवं कंप्यूटर देव विराजते हैं। अंत में वही मिलकर पत्रकार को यमलोक नहीं गूगल लोक में छोटे मोटे कुछ पेज दे देते हैं।

यह अनायास नहीं है कि अब ज़रा सा विपक्ष नहीं है। जितना है वह बजरिए मीडिया हास्यास्पद है। मीडिया तोड़-मरोड़ का लोकतांत्रिक सत्ता उद्योग है। भिन्न मत शत्रुता हैं। असहमति का प्रकटीकरण युद्ध की मुनादी। विचार और साहित्य को निगलकर मीडिया झूठ और अफवाह की लुगदी बनाता जा रहा है। पहले नेता कह सकते थे- उदास हूँ। अब मीडिया पूछता है- नेताजी की उदासी का क्या मतलब है? यह प्रवृत्ति नागरिक ही नहीं बड़े साफ़ सुथरे इन्सानी रिश्ते तक घुस आयी है। यदि आप पुरुष हैं, पत्नी की मौजूदगी में घर में रोटी के लिए आटा सान रहे हैं तो पत्रकार पूछ सकती हैं- आटा आप आज ही गूँथ रहे हैं कि हमेशा गूँथते हैं? मीडिया ने घर में बाज़ार घुसने की घोषणा की थी। बाज़ार में ठगे जाकर बेहाल नागरिकों ने जाना दरअसल मीडिया घुसा था। बडा ज़रूरी सवाल है कि पूंजीवाद के सिपाही, सेनापति मीडिया से जनता, सवाल और विपक्ष को कौन बचाने आएगा? उत्तर न भी मालुम चले तब भी कम से कम पूछा तो अवश्य जाना चाहिये।

इसलिए मेरा तो मानना है जब तक यह मीडिया है न नया कुछ बन सकता है और न बुरे का कुछ बिगड़ सकता है। केवल सफल पत्रकार नेताओं, पूंजीपतियों की ऐश चलती रह सकती है और जनता की हद से हद आँख भी फूट सकती है। तवक्को तो उठ ही चुकी है। आप पूछ सकते हैं इस मीडिया को ठीक कौन करेगा तो मोटा जवाब यही है कि आम इंसान का राज!

-शशिभूषण



शनिवार, 22 अप्रैल 2017

संवेदना की आँखें हैं वे या फिर प्रिज्म??

पिछले दिनों मध्यप्रदेश में किसानी और किसानों का एक वाकया सामने आया। महीनों की लगन और मेहनत से जब प्याज की फसल तैयार हुई तो किसान उसे ट्रालियों में भरकर बेचने मंडी पहुँचे। मंडी में किसानों ने प्याज के रेट सुने तो उनका दम निकल गया। चेहरे निस्तेज हो गये। लागत, मेहनत, ज़रूरत और सपने की बात छोड़िए प्याज बेंचकर मंडी तक पहुँचने का भाड़ा नहीं निकल रहा था। एक रुपये प्रति किलो से भी कम मूल्य। किसान दुखी हुए। मन ही मन रो पड़े। वापस ले जायें तो फिर उतना ही खर्च। तय किया कि प्याज यहीँ फेंक दी जाये। प्याज सड़क पर फेंक दी गयी। जिसने भी वह प्याज देखी उसका कलेजा फट गया। जिसे जीवन में कभी प्याज नसीब ही नहीं होनी थी वह अपने दुर्भाग्य पर पसीज गया।

बाज़ार में उन दिनों भी दस रुपये प्रति किलो से कम प्याज नहीं बिक रही थी। जनता उस दिन भी प्याज के एक टुकड़े को तरस रही थी। प्याज उस दिन भी सेब जैसी पौष्टिक थी। अपरिहार्य थी। कुछ ही महीनों बाद उसकी कीमत को आसमान छूना था। विदेशों से उसका आयात होना था। वह पहले भी कीमती थी उसे आगे भी मँहगी रहना था। आँसू ला देनेवाले अपने तीखेपन और अबूझ लगनेवाली परतदार संरचना के साथ वह उतनी ही शुद्ध, स्वादिष्ट और सर्वप्रिय थी। प्रभु जोशी की कहानियाँ प्याज की तरह हैं। वे तब भी अच्छी थीं। आज भी हमारे खून के लिए उपयोगी हैं। हुआ यह है कि वे अब दुगुनी लागत से लंबे अंतराल के बाद हम तक दुबारा पहुँच रही हैं। पुरानी समझी जा रही हैं। प्रभु जोशी ने प्याज की किसानी कभी नहीं छोड़ी। जब विस्थापित हुए तो कहानी की बटायीदारी की। उपन्यास और कई सौ लिखे पृष्ट पानी में गल जाते देखे। लेकिन उनके पास फसलों के विकल्प हमेशा रहे। कहा जाता है मालवा की मिट्टी एवं उर्वरा एक ही हैं। प्रभु जोशी जितने हिंदी के हैं उतने ही मालवी मानुष। चूँकि वे चित्रकार, फिल्मकार और रेडियो प्रोग्राम प्रोड्यूसर हैं इसलिए कृति का मूल्य खूब जानते हैं। इधर कथा साहित्य में हुआ यह कि संपादकों, आलोचकों और प्रकाशकों ने नये-नये के सालाना महा विशेषांक त्यौहार में लहसुन-प्याज खाना ही छोड़ दिया। अगर किसी को साहित्य में ऐसे सवर्ण हिंदू साहित्यिक परहेज के लिए छेड़ दिया जाये तो वह बिफर कर कह सकता है लहसुन, प्याज के सेवन के बाद सभा-संगत लोक और शास्त्र विरुद्ध रहे है। हमेशा रहेंगे। 

प्रभु जोशी के बारे में सबसे अधिक जाननेवाले मेरी नज़र में तीन लोग हैं। बकौल उनके ज्ञानू(ज्ञान चतुर्वेदी), कांत(प्रकाश कांत) और काका(जीवन सिंह ठाकुर)। प्रकाशकांत और जीवन सिंह ठाकुर आमतौर पर राय देते नहीं पाये जाते। कभी-कभार जब वे प्रभु भाई और प्रभु दा की बात ही अलग है बोलकर सांस भरते हैं तो उसी में आजीवन मैत्री और साहित्यिक श्रेष्ठता की तस्दीक हो जाती है। लेकिन अनूठे व्यंग्यकार, अखिलभारतीय लोकप्रिय लेखक ज्ञान चतुर्वेदी को मैंने बाकायदा बोलते सुना। मौका था भोपाल में प्रभु जोशी को मिले वनमाली सम्मान समारोह का। ज्ञान जी ने कहा- प्रभु जोशी, प्रभु जोशी हैं। इनके जैसा दूसरा नहीं। हो ही नहीं सकता। प्रभु, बचपन से मेरे मित्र हैं। कुछ समय हमारे घर में भी रहे। इनकी खूबी देखिए कि मेरे ही घर में मेरी माँ के मुझसे सगे बेटे हो गये थे। माँ इन्हीं से अपने सुख-दुख कहती थी, इन्हीं को किस्से सुनाती। मैं घर में अतिथि लगता। प्रभु जोशी हमेशा लाल लीड से लिखते। लंबी-लंबी चिट्ठियाँ। लंबी-लंबी कहानियाँ। मैं क्लास अटेंड करने जाता। प्रभु लिखने बैठते। मैं लौटता। इनकी बीस पच्चीस पेज की कहानी तैयार। बिना काट-पीट के। छपने भेजते। धर्मयुग और सारिका में खूब छपते। सेलिब्रेटी लेखक की तरह। जब जो धुन सवार हो जाये उसमें डूब जाते। मेडिकल की किताब पढ़ने की धुन सवार हुई तो मेरी मोटी-मोटी किताब रट डालीं। मेरे दोस्त आते तो प्रभु डॉक्टरी डिस्कस करते। नये मित्र इन्हें ही डॉक्टर समझते। इतना ही नहीं यदि कोई बड़ी, नयी बीमारी के बारे में पढ़ा तो खुद को उसका बड़ा शिकार समझते। इसी कारण इनका विवाह देर से हुआ। एक बार इनकी लगभग तय शादी इसलिए न हो सकी कि प्रभु जोशी को लगा इन्हें किडनी की ऐसी असाध्य बीमारी हो चुकी है जिसके कारण चंद दिनों के मेहमान हैं। तब किडनी की वह बीमारी दुर्लभतम थी। ये किसी लड़की को असमय विधवा नहीं बनाना चाहते थे इसलिए पीछे हट गये। जबकि ये अब तक ठीक ठाक हैं। खूब मेहनत कर लेते हैं। प्रभु जोशी को गाने का भी बड़ा शौक था। अभी भी है। खूब गाते और कुमार गंन्धर्व के यहाँ दसेक दिन तक सीखने बैठे रहते। कुल मिलाकर प्रभु जोशी, प्रभु जोशी हैं। जो करें खूब करते हैं। इनका मूल्यांकन होना बाकी है।

ऊपर का यह उद्धरण इसलिए कि कुछ लेखक-कलाकार ऐसे भी होते हैं जिनके कदमों के निशान आलोचना के राजमार्ग पर नहीं मिलते। वे अपनी मिशाल आप होते हैं। उनकी गवाही पाठक देते हैं या समकालीन रचनाकार। प्रभु जोशी ऐसे ही विरल कहानीकार, उपन्यासकार, चित्रकार, फिल्मकार, लेखक और मीडियाकर्मी रहे हैं। वक्ता ऐसे कि बोलना एक यादगार परिघटना हो जाये। प्रभु जोशी के बाद किसी और वक्तव्य की जगह ही न रह जाये। इससे पहले कि उनकी कहानियों पर कोई बात कहूँ एक और प्रसंग-

प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा अप्रतिम कहानीकार शिवमूर्ति का कहानी पाठ और आलोचक शंभु गुप्त का व्याख्यान आयोजित होना तय हुआ था। 2007-08 की बात है। परिकल्पना, और आयोजन को अभूतपूर्व बना देने का संकल्प कथाकार, तबके इंदौर इकाई सचिव सत्यनारायण पटेल का था। सत्यनारायण पटेल, प्रलेसं इंदौर के लिए हाड़तोड़ मेहनत करनेवाले, और ज़रूरत आ पड़े तो जान लगा देनेवाले साथी थे। सत्यनारायण पटेल, अपनी धुन और जिद के लिए विख्यात हैं। उनका प्रण था कि मेरे सचिव रहते इकाई के अध्यक्ष की किताब पर भी गोष्ठी इसलिए नहीं होगी कि वे अध्यक्ष हैं। अपने लोग अपने हैं संगठन मुद्दों और ज़रूरी लड़ाइयों के लिए है। खैर, सत्यनारायण पटेल और मैं रोज़ साथ होते। वे रोज़ कहते यह मेरा आखिरी कार्यक्रम है। इसके बाद चाहे जो हो। तुम चाहो तो सचिव बन जाओ। सब एक एककर जाना चाहते हैं। मैं भी थक चुका हूँ। कार्यक्रम तय हुआ। सत्यनारायण पटेल ने शिलालेख तैयार करवाने की तरह कार्ड पर सारी बुद्धि, कल्पनाशीलता झोंक दी थी। सत्यनारायण पटेल की वर्तनी में तब हाथ तंग हुआ करता था। उसके लिए मैं था। दृष्टि और मंतव्य में वे हमेशा साफ़, दूटूक रहे हैं सो उन्हीं ने तय किया था टेक्स्ट। लक्ष्य था कम से कम दाम में अभूतपूर्व कार्ड छपे। एक हज़ार पर्चे भी छपवाये गये थे। मालवी आमंत्रण था- आवजू। सैकड़ों एसएमएस, ईमेल हुए। जब पर्चे पलासिया चौराहे, विश्वविद्यालय परिसर और गांधी हाल में सीताराम येचुरी के कार्यक्रम मे बांटे गये तो मैं भी साथ था। नया नया था सो लपककर पर्चे बाँटने में मुझे शरम आती तो सत्यनारायण पटेल उसी मुद्रा में समझाते जैसे गोर्की किसी युवा लेखक को समझाता होगा। याद रहे सत्यनारायण पटेल ने कहानी में अपने लिए सदा गोर्की जितना ऊँचा लक्ष्य रखा। ज्ञानरंजन और वरवर राव उनके किंचित बड़ी उम्र के दोस्त हैं।

कार्यक्रम की तारीख आने में कुछ दिन रह गये होंगे कि प्रभु जोशी को भनक लग गयी। उन्होंने सत्यनारायण पटेल के सामने प्रस्ताव रखा कि मुझे भी दूरदर्शन के लिए शिवमूर्ति का इंटरव्यू करना है। शिवमूर्ति, शहर मे आ ही रहे हैं तो दूरदर्शन पर भी उनका इंटरव्यू प्रसारित होना चाहिए। उन्होने सत्यनारायण पटेल से बात की। क्या पूछा, क्या आग्रह किया मैंने सुना नहीं लेकिन सत्यनारायण पटेल ने फैसला कर लिया था शिवमूर्ति दूरदर्शन नहीं जायेंगे। वे प्रलेसं के कार्यक्रम में आ रहे हैं। हमारे साथी ही उनका इंटरव्यू भी करेंगे। प्रभु जोशी दूरदर्शन के लिए काम करते हैं। दूरदर्शन सक्षम है। उसके पास धन है। शिवमूर्ति को अलग से बुलाएं। जितना लंबा करना हो उतना लंबा इंटरव्यू करें। प्रलेसं का समय साथियों का समय है। ऐसे फैसले मेरी समझ से परे थे। कदाचित मेरी आपत्तियाँ भी बचकानी रही होंगी कि उन्हें कोई भाव नहीं दिया गया। मैं कुछ नहीं कर सकता था फिर भी मेरी बात प्रभु जोशी से हो रही थी। शिवमूर्ति से हो रही थी। शिवमूर्ति जी मुझसे कह रहे थे भाई, मैं धरम संकट में पड़ गया हूँ। प्रभु जोशी मेरे बड़े पुराने मित्र हैं। मैं जाना चाहता हूँ उनके घर और दूरदर्शन। आप लोग आपस में सुलह कीजिए। कोई रास्ता निकल आये तो ठीक रहेगा। ऐसे अलगौझे वाले झगडे ठीक नहीं। मैंने सत्यनारायण भाई साहब से कहना चाहा तो उन्होंने समझाईश वाला आदेश दिया बीच में मत पड़ो। तुम नहीं समझोगे। लोग मुझे खा जायेंगे। यह मेरा आखिरी कार्यक्रम है। कोई समझौता नहीं होगा।
कईयों के फोन इधर उधर बजे। तनातनी, ईर्ष्याएँ और ग्लानियाँ निकलीं। बड़ी-बड़ी बातें उपजीं। समझौता हुआ कि शिवमूर्ति प्रभु जोशी के घर जा सकते हैं लेकिन कार्यक्रम के बाद, देवास के कार्यक्रम से ठीक पहले। प्रभु जोशी को इससे ही संतोष करना पड़ा। फलस्वरूप वे कैमरा लेकर कहानी पाठ शूट करने इंदौर प्रेस क्लब के हॉल आये। दूरदर्शन में ये उनके आखिरी के साल थे। शासकीय सेवा में LTR का वह दौर जब कोई अपनी बची हुई छुट्टियों का आवेदन भी खुद नहीं लिखना चाहता। उस कार्यक्रम में कॉमरेड होमी दाजी को व्हील चेयर के साथ कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ले आये थे। किसी को कोई मध्यस्थता करने का अधिकार नहीं था। एक बार कार्यक्रम तय हो जाये तो उसे वैसा ही होना चाहिए जैसा ठीक समझा गया यह अलिखित नियम था। पहले बहस हो सकती है बीच का हस्तक्षेप नहीं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग आये थे। जिस कार्यक्रम को सुनने व्हील चेयर पर कॉमरेड होमी दाजी आयें उसके बारे में और क्या कहा जाये? कार्यक्रम समाप्ति पर वहीं से शिवमूर्ति प्रभु जोशी के संवाद नगर वाले घर रवाना हुए। उनकी पेंटिंग पायी और वापस हम सब देवास अगले पड़ाव पर चले। इस प्रसंग का उपसंहार यह कि प्रभु जोशी के लोग अगर कायल हैं तो वे भी साहित्यकारों के लिए मान अपमान की परवाह नहीं करते। सत्यनारायण पटेल से अगर कोई काम ठीक से नहीं हो सकता तो वह है प्रशंसा। बावजूद इसके वे कहते हैं प्रभु दा ने अच्छी लंबी कहानियाँ लिखीं। मैं कई बार सत्यनारायण पटेल की बाईक में बैठकर प्रभु जोशी के घर गया।

हिंदी कहानी लगभग सवा सौ सालों में विन्यस्त है। हज़ारों कहानियाँ। कई कहानी युग, कई दौर, कई आंदोलन, कई वाद, कई विमर्श आये और गये। कथ्य को केन्द्र में रखकर देखें तो कहानियों में कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। आज भी कहानी यथार्थ का उद्घाटन कर रही और संदेश दे रही है। शायद अपनी इस आत्मा को वह हमेशा बचाकर रखे। कहानी की भाषा, और रूप में जो बदलाव आये वे अधिकतर युगीन ही रहे। विषय भी खूब नये से पुराने एवं पुराने से नये किये गये। किसी प्रतिज्ञा, विचार में आजीवन निबद्ध कहानीकार कम ही रहे। विचारधारा में प्रशिक्षित कहानीकारों ने भी चरित्रों और घटनाओं को लोकतांत्रिक तरीके से ही विकसित होने पर जोर दिया। कहानी में जितनी विविधता और प्रयोग मुख्य रहे उतनी ही पुरानी इतिवृत्तातमकता और परंपरागत शैली भी। किसी अत्यंत प्रयोगशील कहानी के लोकप्रिय होने के साक्ष्य कम ही मिलते हैं। फौरी तौर पर कोई कहानी या कथाकार भले कहीं से संबद्ध दिखे लेकिन अपनी कथा-प्रकृति में है स्वायत्त। कथा साहित्य में स्थान आज तक ऐसा ही चला आ रहा है कि कोई कथाकार दो तीन कहानी लिखकर अमर हो गया तो कोई कहानीकार दो तीन सौ कहानियाँ लिखने के बाद महज दो तीन कहानी के लिए जाना जाता है। कहानी आलोचना विकसित न हो पाने और सर्जनात्मक कथा आलोचना की गतिशील परंपरा न होने के कारण कहानीकार यादृच्छिक रूप से प्रसिद्धि और सम्मान के लिए संपादकों, पुरस्कार समितियों, पत्रिकाओं, समीक्षकों यहाँ तक कि ब्लॉग और फेसबुक पर भी निर्भर हैं। किसी को किसी का उत्तराधिकारी ठहरा दिये जाने में देर नहीं लगती। कहानीकार की तारीफ़ करनी है तो प्रेमचंद परंपरा का कह दिया जाता है। आज हिंदी कहानी में कोई दूसरी ढंग की परंपरा है इसके निशान भले मिलते हों लीक नहीं मिलती। नयी कहानी, जनवादी कहानी, अकहानी, समांतर कहानी, सचेतन कहानी, समकालीन कहानी आदि ऐसे नामकरण हैं जो किसी बड़ी कमी और विवशता के संकेतक स्वयं हैं। इन दिनों हालात इतने विचित्र हैं कि कहानीकारों के परमिट, लाईसेंस और एकसपायरी डेट चर्चा के विषय हैं। कोई युवा कहानीकार अपनी पहली कहानी से ही ऐसे नक्षत्र की तरह उदित हो सकता है जिसके पीछे पूर्ववर्तियों की चमक फीकी पड़ जाये तो कोई प्रतिबद्ध कहानीकार 40 साल के पहले कहानी संग्रह न छपवा पाने, एक भी ढंग का सम्मान न हथिया पाने के कारण साहित्यिक विस्मृति के ब्लैकहोल में समा सकता है। नया नया और युवा युवा का शोर हमेशा से चला आया है लेकिन अब वह दौर है जब कोई वरिष्ठ किसी क्षण चुका हुआ साबित किया जा सकता है। कहानी की बात कम हो चली है। कहानीकार भी मोबाईल फोन उपभोक्ता की तरह लास्ट काल और रिचार्ज से वेरीफाई हो रहा।

ऐसे मैगी और जियो उपभोक्ता कथा समय में यदि कोई यह पूछ बैठे कि प्रभु जोशी कौन? कौन है यह प्रभु जोशी नामधारी? तो अचरज तक न होना स्वाभाविक है। जबकि सच्चाई यह है कि प्रभु जोशी सत्तर के दशक में कमलेश्वर और धर्मवीर भारती की पसंद और स्वाद का लाडला कथाकार था। जिसकी कहानियाँ पाठकों के बीच पढ़ी जाने, सराहे जाने से ऊपर याद रह जानेवाली थीं। 1977 मे प्रकाशित आखिरी कहानी को मिलाकर मेरी स्मृति में प्रभु जोशी के नाम से लगभग 25 कहानियाँ मिलती हैं। सभी लंबी कहानियाँ। हिंदी कहानी में लंबी कहानियों के कृतिकार के रूप में निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, शैलेश मटियानी, संजीव, प्रियंवद, चंद्रकिशोर जायसवाल, उदय प्रकाश, अखिलेश, शिवमूर्ति आदि का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। 1980 के पूर्व लिखी गयीं प्रभु जोशी की कुछ यादगार लंबी कहानियाँ हैं- पितृ ऋण, उखड़ता हुआ बरगद, कमींगाह, शुरुआत से पहले, आकाश में दरार, धूल और धूल, इतना सब बे आवाज़ और अग्नि मुहानों पर।

इतना सब बे-आवाज़ की मुख्य पात्र स्त्री और नर्तकी है। वह भोपाल के एक उद्योगपति, कलाप्रेमी, बड़े आयोजक की प्रेमिका है। है तो वह आकंठ प्रेम में ही लेकिन एक दिन एक राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रम में प्रस्तुति दे चुकने के बाद अपने प्रेम और लिव इन रिलेशन के लिए लोक भर्त्सना का अति प्रचलित शब्द रखैल सुनकर विचलित हो जाती है। इसके बाद शुरू होती है उसकी यातना, पुरुषों की दुनिया में अपनी पहचान तलाशने की जद्दोजहद की अंतहीन दास्तान। क्योंकि यह सार्त्र और सीमोन की दुनिया नहीं है। इस कहानी की उदासी हमें संजीव की प्रसिद्ध कहानी मानपत्र की याद दिलाती है।

अग्नि मुहानों पर, कहानी प्रभु जोशी की साहसिक और जोखिम भरी कहानी है। इस कहानी में शिक्षिका बहन है जिसकी कोख में प्रेमी का बच्चा ठहर जाता है। माँ से सलाह मशविरा करने के बाद छोटा भाई इंदौर के एक नरसिंग होम में बड़ी बहन को गर्भपात के लिए लेकर जाता है। पिता संयोगवश किसी काम से कई दिनों के लिए बाहर गये हुए हैं। बस की यात्रा में जाती हुई बहन की स्थिति, लगभग एक सप्ताह बाद छोटे भाई के साथ बहन के लौटने की मनोदशा, भेद खुलते ही घर में बहन पर भाभी का शोर की तरह फैलता चारित्रिक हमला, माँ की दमघोटू यंत्रणा, गाँव पड़ोस में साथियों के मज़ाक-तंज, बहन के स्कूल में सहकर्मियों द्वारा अप्रकट जग हँसाईं, इन सबके बीच बहन की कहानी के आखिरी लाईन लिखे जाने तक लगातार मूक केन्द्रीयता कहानी विधा की हरसंभव खूबी को प्रकट करनेवाली है। इस कहानी का भाई एक बड़ा चरित्र है। बल्कि कहना चाहिए स्त्रियों के लिए एक बड़ी आश्वस्ति और संभावना है। कहानीकार प्रभु जोशी की दक्षता इसमें है कि मुख्य पात्र बहन शुरू से अंत तक भाई, माँ, सबके सम्मुख चीखती हुई सी चुप है। कलपती हुई सी दृढ़ है। गर्भपात के बाद टांगों में ताकत न रह जाने के बावजूद वृक्ष सी अचल है। एक सचमुच की स्त्री जो टूटती नही, अंत तक जीवन के लिए खड़ी रहती है। प्रेम तक चलकर पहुँचती है। भाई-बहन के संबंध और ऑनर किलिंग पर समकालीन कहानी के महत्वपूर्ण युवा हस्ताक्षर चंदन पांडेय की एक कहानी है रेखाचित्र में धोखे की भूमिका। मेरे खयाल से यदि इन दो कहानियों को एक साथ पढ़ा जाये तो भारत में स्त्रीत्व की धरती अपने समूचे रूप में दिखायी देगी। यह अनायास नहीं है कि प्रभु जोशी की कहानी धूल और धूल में पाठक प्रेमचंद की कहानी बड़े भाई साहब की गरिमा और उदात्तता पाते हैं।

पितृऋण, प्रभु जोशी के कहानी संग्रह का भी नाम है। आत्मकथ्य, ‘अभी तय करना है हँसना’, ‘किरिच’, ‘मोड़ पर’, ‘उखड़ता हुआ बरगद’, ‘कमींगाह’, ‘एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी’, ‘शायद ऐसे ही’ तथा ‘शुरुआत से पहले’ को मिलाकर इसमें कुल आठ कहानियाँ हैं। ये आठ कहानियाँ यथार्थ और संवेदना की धरती की उपग्रह हैं। स्वायत्त कथा सृष्टि।

इस किताब को पढ़ना भारतीय मनुष्यों की बस्ती में रमकर गुज़रना है। प्रभु जोशी के पात्रों की दुनिया इतनी विविध, बहुरंगी और स्वत:स्फूर्त तथा स्वायत्त है कि लगता है जैसे भाषा के कैमरे से काग़ज़ पर उतारा हुआ बहुत अपना देश। अपनी ही स्मृतियाँ, सपने और आकांक्षाएँ। अपना ही जीवन और जिजीविषा।

‘पितृऋण’ एक सादा कहानी संग्रह है जिसमें वे सारे वैभव हैं जो किसी सच्ची किताब में होते हैं। जिन्हें चमत्कार या आश्चर्यलोक की दरकार है अच्छा है कि वे दूसरी किताब खरीदते हैं। कहानी की उत्कृष्टता के विज्ञापनी समय में कहानियों की यह किताब समय, समाज, मनुष्य और संवेदनाओं के प्रति हमारे ऊपर चढ़े ऋणों का पता देती है। 

बहुत से समर्थ और अति प्रसिद्ध कहानीकारों के संबंध में इस किताब के बहाने एक बात दर्ज़ करने लायक है कि साहित्यिक सत्ताकामी उद्यमों से हमेशा दूर प्रभु जोशी जैसे कहानीकार यदि कुछ दिन के लिए भी उस फलदायिनी राह पर चल पड़ें तो उनका क्या होगा? पर नहीं, प्रभु जोशी ने सदैव खुद से माँगा जो माँगा, चाहे दृश्य श्रव्य कार्यक्रम हों, चाहे चित्र, चाहे कहानियाँ या फिर सालों गूँजने वाले लेख। इस कलाकार को मिली प्रसिद्धि और अंतर्राष्ट्रीय सफलता फूलों के साथ चली आती खुशबू जैसी है। प्रभु जोशी शब्द, वचन और रंगो के सिद्धहस्त कलाकार हैं। त्रिविमीय सर्जक। भाषा, रंग, दृश्य, दर्शन, राजनीति, सपने, विचार और संवेदना ये सब जब एक जगह गलते-ढलते हैं तो प्रभु जोशी का रचनाकार प्रकट होता है। 

प्रभु जोशी की कहानियों में रंग, दृश्य, संवेदना और विचार इस तरह घनीभूत होते हैं कि कोई पारखी बता सकता है कि वे अपनी कहानियों से जब विरत हुए होंगे तो उन्हें चित्रों में बदल दिया होगा। कहानियों में चित्र खींच देनेवाला यह कथाकार जब विचार की दुनिया में उतरता है तो व्यंग्यकार होता है। भाषा का साधक, दृष्टा और चित्रकार तीनो मिलकर प्रभु जोशी का कथाकार हैं।

कथाकार से कम से कम मेरी अपेक्षा आज भी वही है कि उसके पास सच हो, दर्शन हो और अबूझ से रोज़ बीतते जीवन को समझ लेने, उसे पा लेने और उसके मर्म में गोते लगा लेने की कूव्वत हो। कहानी कौशल नहीं है। डूबते को तिनके का सहारा है। कहानी के व्यावसायिक लेखन या महज़ कला हो जाने से पहले के कहानीकार ऐसे ही थे। संत से, दार्शनिक जैसे और कभी कभी तो बिल्कुल दीवाने।

तकनीकि मनुष्य को चाहे जितना नया बना ले आयी हो पर कहानियाँ यही बताती हैं कि वह आँसू और सपनों से रचा हुआ वही है सबसे पुराना। जब किसी कथाकार में ऐसी कहानियों की धारिता दिखती है तो वह अपना लगता है। प्रभु जोशी होना नयी दुनिया में, नये लिबास में उसी पुराने मनुष्य की किस्सागोई है। यह मानुष जितना देहात का है उतना ही नगर का।

प्रभु जोशी के भीतर भारतीय कहानीकार है। कहानीकार, जिसे नगर और गाँव दोनो की नब्ज़ पता है। उन्होंने भले कम कहानियाँ लिखीं, पहले खूब लिखीं, फिर बंद कर दीं अब लिखना चाहते हैं पर नहीं लिखते लेकिन जो लिखीं वे इतनी गाढ़ी हैं कि यदि समकालीनता या कथित प्रसिद्धि की रोशनी से हटकर उनमें उतरा जाये तो वे एक विवेकपूर्ण दुनिया में ले जाती हैं। जहां संबंध हैं, सवाल हैं तो इंसानी समाधान भी हैं। यथार्थ प्रभु जोशी की कहानियों में वैसे ही है जैसे बकरी के थन में दूध होता है। जिन्हे दूध मोल मिलता है वे इस यथार्थ के राग को पकड़ नहीं पायेंगे। 

कहानीकार की उम्र होती है। कहानियाँ बूढ़ी नहीं होती। भाषा कभी अपनी चमक नहीं खोती यदि उसमें संवेदना हो मर्म हो और जीवन के सच हों। भाषा के मामले में प्रभु जोशी पूरे कुम्हार हैं दिया, घड़ा, ईंट और सुराही सबके लिए एक ही मिट्टी कैसे अलग अलग रूँधी जाती है उनसे बेहतर कौन जानता है? ‘शुरुआत से पहले’ कहानी को लें तो यह जितनी कहानी है उतनी ही भाषा की नदी। पात्र जिस तरह बोलते हैं उनकी निजता जिस तरह उतर आती है, जिस तरह का नैरेशन है वह बेजोड़ है। मालवी लोकोक्तियों के संबंध में यह लंबी कहानी कोश की तरह है। पेशे, सामाजिकता और जीवन सत्यों को उद्घाटित करते उखान यहाँ भरे पड़े हैं। यह मालवी में मालवी की सीमा लाँघकर एक बोली को सार्विक अभिव्यक्ति का गौरव देनेवाली कथाभाषा है। जिसे आंचलिक रहकर महत्व जुटाने की फिक्र नहीं है बल्कि आंचलिकता को सर्वग्राही बनाने की साधु ज़िद है।

‘शुरुआत से पहले’ एक कुम्हार की कहानी है जो पैसे के लिए देवी की मूर्ति बनाता है। अपनी ही बनायी देवी से डरता है। एक दिन जब मूर्ति बन जाती है तो वह पाता है कि ग़लती से मूर्ति की पूजा हो चुकी है। पूजित मूर्ति अब कहीं नहीं जा सकती। बेची तो हरगिज न जायेगी यही प्रण कर बदरीप्रसाद अपनी जान पर खेल जाता है। अपनी ही निर्मिति पर जान देना कला के इस मूल्य के अलावा इस प्रक्रिया में जिन सामाजिक सत्यों का उद्घाटन हुआ है वे औपन्यासिक हैं। 

‘पितृऋण’ किताब की कहानियों को इस तरह पढ़ना कि ये एक कहानीकार की उसके उठान के दिनों के मील के पत्थर हैं ग़लत होगा इन कहानियों को रचनाकाल से बाहर अपने समय में पढ़ना सुखद रहेगा कि ये ऐसी कहानियाँ वास्तव में हैं जिनमें आज गूँजता है। कल का वैभव और मुहावरा बोलता है।

‘पितृऋण’ संग्रह की पहली कहानी है। यह कहानी बड़ी मार्मिक है। यदि आप इसे पढ़ेंगे तो कभी भूल नहीं पायेंगे। इस कहानी में होता यह है कि एक बहुत लायक बेटा अपने लाचार वृद्ध पिता को तीर्थ कराने के बहाने गंगा ले जाता है। पिता बड़े अरमान से अपनी पत्नी की अस्थियाँ भी साथ रख लेता हैं कि सुपुत्र के बहाने आ पड़े इस नसीब में वह अभागिन भी तर जायेगी। जैसे ही पिता गंगा में डुबकी लगाते हैं बेटा उनकी खुदरा पूँजी लेकर इत्मीनान से लौट जाता है। अब नहाये हुए अशक्त किंतु कृतज्ञ पिता के पास कुछ नहीं है। अपनी स्मृति और भीख के जोड़ से बनी पूँजी से शायद पिता लौट भी न पायेगा। जिस तरह से यह कथा लिखी गयी है उसमें लोक कथाओं के उस अभाव की पूर्ति भी हो जाती है जिसमें दुखियारी अधिकांशत: उपस्थित औरते होती हैं। इसमें अनुपस्थित औरत और माँ जिस तरह आँखों के सामने आती है वैसा केवल लोकगीतों में ही होता है। प्रभु जोशी की यह कहानी हिंदी की धरोहर है। इस कहानी के बूते वे उस पंक्ति के कथाकार हैं जिसमें ‘बूढ़ी काकी’ के साथ प्रेमचंद और ‘चीफ़ की दावत’ के साथ भीष्म साहनी आते हैं।

प्रभु जोशी ने कहानियाँ खूब क्यों नहीं लिखीं उन्हे पढ़नेवाला यह ज़रूर पूछेगा पर जब वह खूब लिखने और खूब प्रसिद्धि के उद्यमों से तंग आकर शांत बैठा होगा तो उसे यह सवाल भी उतना ही कोंचेगा कि प्रभु जोशी की कहानियाँ पढ़ी क्यों नहीं जा रही? कहानियों पर एक्सपायरी डेट की चिप्पी चिपकानेवाले होते कौन हैं? 

‘किरिच’ एक सांद्र प्रेम कहानी है। कुतुब मीनार में पहुँचने और उसके ढह जाने के प्रतीकों में जीवन भर और सबके जीवन में चलनेवाली कहानी है। यह प्रेम के उगने, उमगने और एक टीस में बदलते जाने की शाश्वत सी परिणति के उम्र भर के किस्से को लगभग एक दिन के भ्रमण के प्लॉट में समेट लेने की सफलतम कहानी है। यदि देख पायें तो भाषा के भीतर फिल्म।

प्रभु जोशी कहानी के भीतर फिल्मकार हैं। उनकी हर कहानी में फिल्म की संभावना है। लेकिन हमारे दौर में जिस तरह की वाचालता फिल्मों की उपजीव्य है उनके हामी शायद इन कहानियों को गले न उतार पायें।

हिदी कहानी के आदोलन आक्रांत दौर में विषय खोज खोजकर कहानियाँ लिखी गयीं। जब विषय कम पड़ गये तो आंतरिक सूखे, निर्वासन, आत्मालाप और मृत्यु जैसे विषय को भी खूब घसीटा गया। नतीजे में ऐसी चर्चित कहानियाँ निकली जिनके पात्र एक सी भाषा बोलते हैं, इतनी एकरूपता कि लगता है एक ही कहानी लिखने के लिए लेखकों की शिफ्ट बदल रही है। कभी कभी तो यह भी लगता है कि किसी कहानीकार का रिलीवर नहीं पहुँचा तो वही ओवर टाईम कर रहा है। ओवर टाईम कहानी लेखन के 70-80 के दौर में प्रभु जोशी ने इस इत्मीनान से कहानी लिखी कि उनकी कहानियों का किसान किसान की और मुसलमान मुसलमान की ज़बान बोलता है।

कहानी ‘मोड़ पर’ मंटो की कहानी ‘ब्लाउज’ की याद दिला जाती है। किशोर मन स्त्री का संग किस तरह चाहता है और समाज उसे निरंतर कितनी वंचना में धकेलता रहता है इसे कहानी जीवंत कर देती है। ‘उखड़ता हुआ बरगद’ पढ़कर काशीनाथ सिंह की कहानी ‘अपना रास्ता लो बाबा’ याद आती है। जो ‘अपना रास्ता लो बाबा’ बाद में पढ़ेगा उसे ‘उखड़ता हुआ बरगद’ याद आयेगी। कोई पाठक शायद ही ऐसा मिले जो दोनों में से किसी एक कहानी को चुनना चाहे। प्रभु जोशी के कहानीकार की यही खासियत है वे एक साथ कई कथा पीढ़ियों को अपनी निजता और अद्वितीयता में आत्मसात किये हुए हैं। लगभग सन्यस्त हो चला हिंदी का यह कथाकार जितना अपने दौर का है उतना ही हमारे दौर का है। प्रभु जोशी को पढ़ते हुए यदि कमलेश्वर याद आयें तो प्रियंवद भी ज़रूर याद आयेंगे।

यह कहना काफ़ी होगा कि संग्रह की कहानी ‘कमीगाह’ ज़रूर पढ़ें। इस कहानी को पढ़कर ही जाना जा सकता है कि केवल परकाया प्रवेश काफ़ी नहीं हिंदुस्तानी कथाकार में परधर्म प्रवेश कर मनुष्य को गले लगा लेने की सिद्धि भी होनी चाहिए थी। प्रभु जोशी क्या किसी कथाकार कि इससे बड़ी सफलता क्या होगी कि उससे ‘पितृऋण’, ‘शुरुआत से पहले’, ‘उखड़ता बरगद’ और ‘कमीगाह’ जैसी कहानियाँ केवल कुछ वर्षों में संभव हो जायें। 

प्रभु जोशी अनेक आयामी कलाकार-लेखक हैं। चिंतन परक राजनीतिक लेखन, कला समीक्षा से लेकर मुक्तिबोध की कविता अँधेरे में पर रेडियो रूपक के लिए साउंड रिकॉर्डिंग की खातिर रीवा के शमशान में रात को जा बैठने की धुन तक उनकी साधना विरल और अद्वितीय है। बहुत कम लोग जानते हैं कि जब प्रभु जोशी ने मन्नू भंडारी की कहानी ‘दो कलाकार’ पर फिल्म बनाई तो इस कहानी के पात्रों की, स्थितियों की पेंटिंग भी बनाई। चित्रकार और एक्टिविस्ट सखियों की फिल्म में पेंटिंग बनाने का काम भी कोई प्रभु जोशी जैसा फिल्मकार ही कर सकता है। 

परिश्रम में कोई उनका सानी नहीं। हमेशा सफेद शर्ट काले पैंट, सर्दियों में कोट सूट या काले जैकेट में दिखाई देनेवाले प्रभु जोशी छिछले हास्य और मसखरी से 20 गज दूरी का संबंध रखते है। दाँत निपोर देना उनकी नज़र में सबसे बड़ी दुष्टता या पराभव है। भाषा की किसी लक्ष्मण रेखा को कभी न लाँघनेवाले प्रभु जोशी रंग, वाणी और शब्द के अतुलनीय साधक हैं। अपनी विधा का स्वयं शिक्षित बड़ा जलरंग चित्रकार। अंग्रेज़ी भाषा में गोल्ड मेडलिस्ट। बेहतरीन अंग्रेज़ी लिखने बोलनावाला हिंदी का जुझारू सिपाही जिसके लेख ‘इसलिए हिंदी को विदा करना चाहते हैं हिंदी के कुछ अखबार’ का हिंदी समाज सदैव ऋणी रहेगा। हिंग्लिश के खिलाफ़ उनके द्वारा जलायी गयी हिंदी के चुनिंदा बड़े अखबारों की होली भी हमेशा याद रखी जानेवाली परिघटना है।

किसी किस्म की नीचता या स्वैराचार के विरुद्ध प्रभु जोशी का विनम्र विरोध देखने लायक होता है। जब वे आकाशवाणी में रहे तब अफसरों से जूझते रहे, कभी न भरे जा सकने वाले नुकसान सहे लेकिन समझौता नहीं किया। आजीवन बड़े पद में न आ सके लिखने-पढ़ने, कला-साधना को इतना सर्वोपरि रखा। जाननेवाले बताते हैं प्रभु जोशी ने हमेशा दूरदर्शन, आकाशवाणी की शेर की जबड़े जैसी नौकरी के भीतर खुद को बचाये रखा। अपनी रीढ सीधी रखी। जबड़े भींचकर, मुट्ठी तानकर बात कही। राजनीतिक सक्रियता आरोपित कर, सत्यनिष्ठा पर हमले की धूर्त नौकरशाही युक्ति द्वारा टर्मिनेशन के कगार तक साजिशन पहुँचाये गये लेकिन अपनी सफेद कमीज की कालर पर नौकरशाही की मैल नहीं लगने दी। आकशवाणी छोड़ दूरदर्शन में आये। केवल नौकरी बची रहने दी। निगाह हमेशा कला और भाषा पर रखी। प्रभु जोशी अपने पेशे, कृतित्व में कमलेश्वर, धर्मवीर भारती और अज्ञेय जैसी शख्सियतों की याद दिलानेवाली विनम्र उपस्थिति हैं।

लेकिन जैसा कि हर बड़े रचनाकार-कलाकार के अतिवाद होते हैं प्रभु जोशी के भी हैं। वे प्राच्य और भारतीय परंपराओं से पैदा होनेवाली आधुनिकता, प्रगतिशीलता की वकालत में अपने सारे अध्ययन, सर्जनात्मकता को दांव पर लगा देने से भी नहीं चूकते। तब उनकी हालत तसलीमा नसरीन या मकबूल फिदा हुसैन से बहुत भिन्न नहीं होती। जिनके बारे में प्रभु जोशी की ही स्थापना है कि फिदा हुसैन एवं तसलीमा नसरीन की एक ही समस्या है जो उन्हें एक सा साबित करती है वह यह है कि तसलीमा हिंदू चरमपंथियों को नाराज़ नहीं करना चाहतीं और हुसैन मुस्लिम चरमपंथियों को। एक की शरणस्थली हिंदुत्व है दूसरे की इस्लाम। प्रभु जोशी के मानस पर भी एक हिंदू चित्त प्रतिष्ठित है। वे बिल्कुल हजारी प्रसाद द्विवेदी की तरह इस मसले पर खुद को प्रश्नांकित किये जाने की हद तक दृढ़ रखने, प्रकट हो जाने से नहीं रोकते। गांधी और नेहरू के प्रति उनकी प्रश्नाकुलता जब तब मुखर होती रहती है लेकिन अंबेडकर के प्रति समर्थन में वे उन्हीं के शब्दों में कभी बरामद नहीं हुए। यद्यपि प्रभु जोशी का सृजन उनके तमाम पारिवारिक,धार्मिक, नागरिक अंतरविरोधों का भी उन्मूलन करनेवाला है इसमें दो राय नहीं। जो केवल उनके सरस्वती का चित्र बना देने मात्र से नहीं फड़फड़ा उठते उन्हें उनके जीवन और जीवन के पीछे के तर्कों में पर्याप्त संगति मिल सकती है।

एक सीमा भी उल्लेखनीय है कि साहित्य में प्रभु जोशी की प्रथम नागरिकता हिंदी की नहीं है। अति समृद्ध उद्धरण सामर्थ्य होने के बावजूद वे हिंदी की कोई पंक्ति कोट नहीं कर पाते। उनका विस्तृत साहित्यिक चेतन और अवचेतन अंग्रेज़ी में उपलब्ध साहित्य से ही परिचालित होता है। उनके अध्ययन का मुख्य क्षेत्र अंग्रेज़ी में उपलब्ध साहित्य बिल्कुल शुरुआत से रहा है। बावजूद इसके उन्होंने बहुतों से कहीं अधिक हिंदी का साहित्य पढ़ा है; उसकी बहुलता में डुबकी लगायी है। क्योंकि प्रभु जोशी जितना जाग सकते हैं उतना पढ़ने के लिए जागनेवाले विरले होते हैं। लेकिन हिंदी के समकालीन साहित्यकारों से गप्प, गोष्ठियों का राब्ता न रख पाने की यह एक बड़ी वजह है। प्रभु जोशी कदाचित इस बात के लिए असमर्थ ही पाये जायेंगे कि वे किसी से मिलने पर उसकी कहीं प्रकाशित महत्वपूर्ण रचना की याद कर बातचीत शुरू कर सकें। अपने समकालीनों के बीच कमतर उपस्थिति की क्या पता यही एक बड़ी वजह हो। क्योंकि हिंदी में संबंध निभाये जाते हैं, स्नेह लुटाये जाते हैं, प्रेम संबंधों के चालू खाते खोले जाते हैं। बड़े से बड़े हिंदी के लेखक युवतर लेखकों की किताबों की समीक्षा तक लिखते ही हैं। तमाम प्रतिबद्धता के बावजूद नामवर सिंह छद्म लेखिका स्नोवा बार्नो के मुरीद होने से बच न सके और हिंदी के अंबेडकर राजेन्द्र यादव कहानीकार ज्योति कुमारी के लिए जेल जाते जाते बचे। हिंदी का बड़ा लेखक किसी सम्मान, पुरस्कार समिति या फाउंडेशन में ही शामिल रहते अपनी रेंज बढ़ाता ही रहता है। 

अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि अनेक नदियों वाले देश भारत में मुझे प्रभु जोशी की उपस्थिति ब्रह्मपुत्र की याद दिलाती है जिसके तट पर भले मेले न लगते हों, श्रद्धालुओं का जमघट न लगता हो, कीर्तन न होते हों, लेकिन जिसके तट पर लोग अपने पाप भी न धोते हों। मूल बात जिसका जल भले ठंडा-सांवला हो लेकिन कभी सूखता नहीं। आप भी अपने अर्थ लगाने को स्वतंत्र हैं। बस एक ही गुजारिश है। ब्रह्मपुत्र को याद रखें।

-शशिभूषण
नोट: 'संवेद' में शीघ्र प्रकाश्य लेख का शीर्षक प्रभु जोशी के अनन्य पाठक एवं मित्र प्रद्युम्न जड़िया, सेवानिवृत्त वरिष्ठ उदघोषक की एक पाठकीय टिप्पणी से साभार लिया गया है।

मर्द बननेवाले मुन्ना टाइप लोग

उन्हें लंपट, लंठ, पियक्कड़, लड़कीबाज़ और गुण्डई में मुब्तिला लोगों से कतई दिक्कत नहीं होती। बचपन से लेकर आज तक वे ऐसे ही यार और भाई लोगों से घिरे रहे।

वे यारबाश रहे हैं कि निठल्ले कहना मुश्किल है। एकदम शुरुआत से वे अपने महंगे मोबाईल और कंप्यूटर में नंगी फिल्मों का शौक रखते रहे।

वे कक्षा में फेल हुए। उन्होंने ऐसे मुकाम बनाया कि लगभग पशु चिकित्सा का पैकेज अध्ययन कर कृषि विशेषज्ञता हासिल कर ली। फिर खेल, राजनीति, कला, साहित्य और तकनीकि में ऐसे माहिर हुए कि अपने गवाह और मुरीद भी वही हैं।

वे सिंगल हैं। उनके दोस्तों की सूची बनाइये तो सबसे अलहदा क्रिएटिव वही ठहरते हैं। वे प्रतिबद्ध दिखते हैं। पत्नी के मर्मान्तक आग्रहों और सतत निगरानी में स्त्रीवाद के पहरुए हैं।

वे अनुवाद कर सकते हैं। अनुमान कर सकते हैं। अपने किसी मित्र की उसकी अनुपस्थिति में गन्दी से गन्दी तस्वीर खींच सकते हैं। वे इतने कृतघ्न हैं कि घरू आवभगत को भी दुष्टता समझते हैं। लेकिन उन्होंने अपने दिल में अपनी असल तस्वीर अब तक नहीं देखी है। उन्होंने अपने काइयाँपन और अवसरवाद का अनुवाद अब तक नहीं किया है।

वे चोरी छिपे गाली दे सकते हैं, किसी की तौहीन कर सकते है। हर उस इंसान की पीठ पीछे मरजाद ले सकते हैं जो उनकी हमेशा सुड़कती नाक पर मुक्का न जड़ दे। उनकी अपार ताक़त यह है कि वे मित्रवत जुगाड़ से मिली एक ऐसी नॉकरी में हैं जिसे समझने के लिए भगवान न करे कि कोई शिक्षिका उमा खुराना की गति को प्राप्त हो।

वे हीनता से ग्रस्त हैं। एक लोटा पानी उठाकर हांफ जाते हैं। उन्होंने आगे जाने के लिए हर दौड़ लगाई, सब करके देखा लेकिन अब चरित्र हनन में ग़रक हैं। उनमें हर उस शख्स से हिकारत है जो अपनी खाता है और उनपर निर्भर नहीं है।

वे सब बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन किसी की सज्जनता से सांस नहीं ले पाते। वे क्या हैं, किस हद तक बीमार हैं जानते हैं। केवल उन्हें यह पता नहीं है कि कोई उनके अत्यन्त संकीर्ण और क्षुद्र राज्य में नहीं रहता। कोई ऐसी कुम्हड़ बतिया नहीं कि उनकी तर्जनी (ऊँगली) दिखाने से सूख(मर) जाए। उन्हें यह भी पता नहीं किसी के ईर्ष्या बर्दाश्त करने की एक हद होती है।

वे इस गुमान में है कि वे ब्लैकमेल कर सकते है, किसी को छदम तरीके से बर्बाद कर सकते है। उन्हें यह नहीं पता कि अपने ही किसी शुभेच्छु को नीचता की हदें पारकर आहत करने से इंसान स्वयं नष्ट हो जाता है।

वे भलीभांति जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। हे प्रभु उन्हें कभी माफ़ नहीं करना वे भोलेपन और निर्दोष आत्मीयता की जड़ में मट्ठा डालनेवाले मुंहचोर हैं।

-शशिभूषण

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

शशिभूषण की कहानी: जाति - दंड


जिस समय रामफल पांडे की मित्रमंडली जिसे वे ‘गंजेड़ी स्वजन’ कहते थे; गांव के तालाब की मेड़ पर पुश्तों से खड़े पीपर के नीचे ताश का खेल बीच में रोक उन्हें ठिकाने लगा देने वाली बातों से कायदे से शाब्दिक सामाजिक तिलांजलि दे रहे थे उस वक़्त रामफल पांडे पगडंडी के किनारे खडे आम के पेड़ की ज़मीन से ऊपर निकली जड़ पर बैठकर अपनी रोज़ाना नोट बुक पर डायरीनुमा यह टीप लिख रहे थे-

"मूर्ख प्रतीत होनेवाला अफ़सर अत्यन्त दुष्ट होता है। ऐसा अफ़सर अपनी मूर्खताओं से जब सबसे अधिक मनोरंजन करता है तब सबसे अधिक खतरनाक होता है।

केवल वही व्यक्ति सज्जन होते हैं जिनकी समझ दुरुस्त होती है। जो मुर्ख नहीं होते। नासमझी दुष्टता की पहली सीढ़ी है। जिसे कोई अहमक चढ़ने लगे तो नीचता को उपलब्ध हो जाता है।

केवल वही गुरु नहीं होता जो हमें पढ़ाता है। वह भी गुरु होता है हम जिसे पढ़ते हैं। और ज़ाहिर सी बात है पढ़ा केवल आँख से नहीं जाता। समझदार इंसान को हर कहीं गुरु मिल जाते हैं। सचेत व्यक्ति हर किसी से सीख सकता है।"

रामफल पांडे ने इतना लिख चुकने के बाद। आखिरी पंक्ति के नीचे दायीं ओर हस्ताक्षर किये, तारीख़ लिखी और अपनी नोट बुक बंद कर दी। खडे हुए। बैठने में दबा हुआ कमीज़ का हिस्सा झाड़ा। साईकिल को स्टैंड से पहिए पर लाये। जांघो में सीट टिकाकार नोटबुक करियर पर दबायी। साईकिल को दौड़ाया और कूदकर चढ़ गए। जैसे ही दोनों पैर पैडल पर आये उन्होंने घंटी बजायी। सर को झटका दिया और एक गीत गुनगुनाने लगे। “कहाँ तक ये मन को अँधेरे छलेंगे...”

रामफल पांडे बेरोज़गार हैं। लिखा करते हैं। शोध करते हैं। कोई छोटा-मोटा रोज़गार ही पा जाएँ इसके लिए वे जितना परिश्रम करते हैं, जितना पढ़ते हैं, जितने इम्तहान देते हैं लाख उपमा दी जाये उतने उद्यम चींटी नहीं करती। रामफल पांडे प्रतिभाशाली होते हुए, इंसान रहते बेरोज़गार होकर खुद को चींटी-मटा से बदतर महसूस करते हैं। यह एहसास उन्हें दिन में तब सबसे अधिक होता है जब उनकी साईकिल की चेन उतर जाती है और सामने से साक्षात् यमराज की तरह कोई ट्रक आ रहा होता है। 

रामफल ने साईकिल पटरी पर उतार ली। चेन चढाने लगे। उनके हाथ कालिख जैसी ग्रीस से काले हो गये। उन्होने बेशरम के पत्ते तोड़कर अपने हाथ पोछे। पत्ते मसले जाने से हाथ में चिपट गये लेकिन ग्रीस नहीं छूटी। रामफल पांडे ने सोचा आखिर बेशरम का पत्ता है। उम्मीद ही कितनी की जा सकती है। उन्होंने सुन रखा था इसे नेहरू जी ने बाड़ के लिए कहीं बाहर से मंगवाया था। कब और कहाँ से, बात सही भी है या नहीं जाँचने, पढ़ने का अवसर और सामग्री नहीं मिले। इसे उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बेहया भी पुकारते हैं। बड़ी तेज़ी से पनपता है, जल्द ही धरती का बड़ा हिस्सा छा लेता है। मगर आता किसी खास काम में नहीं है। मजबूरी में लकड़ी की तरह चूल्हें में जलाओ तो विषैला धुआँ छोड़ता है। बेशरम के बारे में विधिवत जानना है रामफल कई बार तय कर चुके हैं। आगे नज़र दौड़ायी तो एक ओस भीगे अखबार का टुकड़ा दिखा। भीगकर अपनी खबरो की तरह बेकार हो चुका है उन्होंने सोचा। तभी रामफल को खयाल आया कल वाले उस नोट को देख लिया जाये एक बार। चेतना में अटका हुआ है तब से, लिखे जाने के पहले से। क्या पता रास्ते में सोचते हुए बेहतर हो जाये। लेखन ही है जो रामफल को आत्मतोष से भर देता है वरना उनकी बेरोज़गार ज़िंदगी में गर्व करने लायक है ही क्या? रामफल जाति शीर्षक से लिखा नोट देखने लगे-सड़क पर आवाजाही जारी थी।

एक थे बड़े लेखक। एक था छोटा लेखक। बड़े लेखक और छोटा लेखक जातिसूचक उपनाम नहीं लिखते थे। दोनों की भाषा एक थी। मातृभाषा एक थी। उसी नदी का पानी छोटा लेखक के कुएँ में झिरता था जिस नदी के पानी से बड़े लेखक का धान पकता था। राजभाषा अंग्रेज़ी में दोनों की दक्षता लेखकीय कद के अनुरूप थी। बड़े लेखक और छोटा लेखक परस्पर सब जानते थे। लेकिन एक दूसरे की जाति के बारे में नहीं जानते थे। बड़े लेखक छोटा लेखक से स्नेह रखते थे। छोटा लेखक के हृदय में बड़े लेखक के प्रति अपार श्रद्धा थी। यह वह दौर था जब भारत में किसी की जाति मामूली नहीं थी। किसी की भी नहीं। एक जाति का व्यक्ति अन्य जातियों के बारे में अलग-अलग घृणा रखता था। बड़े लेखक की जाति के बारे में एक दिन छोटा लेखक को बता दिया गया। बड़े लेखक को भी एक दिन छोटा लेखक की जाति बता दी गयी। बतानेवाले अलग अलग जाति के बिना जातिवादी लेखक थे। अपनी नज़र में बड़े लेखक और छोटा लेखक जातिवादी नहीं थे। समय ही ऐसा था जब कोई पढ़ा लिखा भूल से भी जातिवादी नहीं होना चाहता था। मगर शायद ही कोई था जो जातिवादी नहीं समझा जाता था। हर जाति चाहती थी उसे आरक्षण मिल जाये। सरकारें डरती थीं जाने कब किस जाति को आरक्षण देना पड़ जाये। इस डर के अलग अलग कारण थे। कभी भी जातिवादी नीचता हो सकती है एक ऐसा डर था जिससे बचने का उपाय नहीं था। एक दिन बड़े लेखक ने छोटा लेखक को भुला दिया। इस विस्मृति में सहजता थी। छोटा लेखक बड़े लेखक का आलोचक हो गया। इस आलोचना में खुद्दारी थी। बड़े लेखक की दुनिया में छोटा लेखक घट गया। छोटा लेखक का आलोच्य बड़ा हुआ तो कद भी बड़ा हो गया। इस घटना से साहित्य का भला हुआ। साहित्य के जातिसूचक नाम नहीं थे- हस्ताक्षर रामफल। बुरा नहीं है। ठीक ही लिख लेता हूँ। सुधार की गुंजाईश है। देखता हूँ और कितना मांजा जा सकता है। रामफल मन ही मन किंचित आश्वस्त थे। आगे चल पड़े। 

मित्रमंडली के गंजेड़ी स्वजन में से एक बड़े गुरु कहे जानेवाले अधेड़ ने खांस चुकने के बाद आँखों का कोर गमछे से पोंछते हुए कहा-

“जिन्हें तुम सब रामफल पांडे, ज्ञानी, साधो और जाने क्या-क्या तोप-तलवार कहते हो घंटा कुछ नहीं हैं; न कुछ समझते हैं। वे बचपन से लड़बहेर हैं। मरते दम तक लड़बहेर ही रहेंगे। पोथियां बाँच लेने से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता। उसके लिए लढ़ना पड़ता है। लिखकर दूँ कोरे काग़ज़ पर?”

छोट्टे भाई ने टोका- “रामफल दादा की एक ही बात बुरी है बाकी आस-पास के सत्तर गावों में उनके टक्कर का जानकार नहीं। साला कहाँ-कहाँ की बात खोद लाते हैं। झाड़े का लोटा माँजते रामफल दादा जो बात बोल जाते हैं माँ कसम टीवी वाले काँख कूँखकर वैसी बात नहीं कह पाते। लेकिन दादा असल में हैं बकचोद इसमें तनिक संदेह नहीं। वे अगर बकचोदी छोड़ दें तो बहुत कुछ कर सकते हैं।“

बहादुर काका ने मूँछ पर धार बनाते हुए छोट्टे भाई को तरेरा- “रामफल बकचोद हैं इसे क्लीयर करना होगा छोट्टे। वरना तुम्हारे बाप की कसम यहीं गाड़ देंगे। भले रिश्ते में भतीजे हो सारे क्रिया करम मुसलमानों वाले करेंगे। चलो शुरू करो”

पीके गुरू ने स्थिति सम्हाली। बरजने वाले मूड में उकसाते हुए बोले- “काका धीरज धरो। गरमी मत दिखाओ। छोट्टे ने कहा है तो साबित ज़रूर करेगा। अगर साबित नहीं किया तो यहीं भंडारा होगा। बुला लेंगे जिस बाप को बुलाना होगा।“

छोट्टे ताव खा गये। धमकी देते हुए कहा- “मेरे बाप को मरे अभी साल नहीं हुआ। बरषी बची है। मरे हुए बाप-दादा को बीच बतंगड़ में लाया गया तो लंका बार देंगे। भस्म कर देंगे। साला बिल्कुल खाक। अरे, कहा है तो साबित भी कर देंगे। लेकिन जरा इज्जत से। वरना चूड़ी नहीं पहनते हैं छोट्टे। सेर भर अन्न मैं भी खाता हूँ।“

रामशरण माटसाब बुजुर्ग थे। गांजे की लत के चलते लौंडे लपाड़ों के साथ लगे रहते थे। लेकिन उन्हें इज्जत का खयाल रहता था। जितनी ऐसी मंडली में संभव थी उतनी इज्जत उन्हें प्राप्त भी थी। माटसाब ने बीच बचाव किया- “गाली गुप्ता नहीं। बहन बेटियाँ निकल रही हैं। ज़रा कायदे से। गश्त वाला सिपाही भी आता होगा। चेला है अपना। लेकिन पुलिसवाला सगा बनेगा तो खायेगा क्या? थोड़ी तमीज़ से भोसड़ीवालो..वरना लेने के देने पड़ जायेंगे। किसी में इतना दम नहीं कि फिर बात बना ले। नाहक मेरी हुज्जत होती है।“

बड़े गुरु ने छोट्टे से कहा- “बोल छोट्टे। जल्दी बोल। वरना सब यही कहेंगे। जब गांड में नहीं था गूदा तो लंका में क्यों कूदा। बोल बे बोल”

छोट्टे ने सोचा था बात को बम की तरह फोड़ेंगे। लेकिन अकारण वातावरण ऐसा भारी, सतर्क, तनावपूर्ण हो गया था कि वह समझ गये थे शोर अधिक बढ़ गया है अब आवाज़ नहीं गूँजेगी। लेकिन पीछे हटने का कोई उपाय नहीं था। बात निकल चुकी थी।

“रामफल पांडे जिन्हें हम दादा कहते हैं एक शूद्र का नित्य आशीर्वाद लेते हैं इसी से वे बकचोद हैं। ब्राह्मण समाज पर कलंक हैं। ऐसा हमने सुना है। कोई वीडियो नहीं है हमारे पास।“

माट्साब चौंके – “क्या? शूद्र का आशीर्वाद लेता है? मने पाँव छूता है? मने चरण स्पर्श? कया कह रहे हो छोट्टे? रामफल मेरा चेला है। मैंने उसे पढ़ाया है। वह मेरे चरण नहीं छूता है। किसी शूद्र के पांव छुएगा? असंभव। यह लांछन है। तुम साबित न कर पाये तो कोई मुह नहीं देखेगा तुम्हारा। कौन है वह शूद्र? जल्दी बताओ “

छोट्टे भाई का निशाना लग चुका था। सब अचंभित थे। पाँव छूना वह भी रामफल पांडे के द्वारा। बिल्कुल अजूबे जैसी बात थी। साक्षात अनहोनी। जो शख्स कुल के गुरू महराज के पाँव नहीं छूता। बाप के पाँव छूते नहीं देखा गया। पाँव छूने के खिलाफ़ भाषण देता है। बच्चों को पाँव नहीं छूने के लिए समझाता है वह किसी दलित के पाँव छूता है! कैसा कलयुगी आश्चर्य है?

छोट्टे भाई ने कहा – “वह शूद्र, ब्राह्मण शिरोमणि उदभ़ट विद्वान अपने रामफल दादा का गुरू है।“

पीके गुरू ने पूछा- “गुरू? वो भी शूद्र? तुमने देखा पाँव छूते?”

छोट्टे ने बताया- “देखा नहीं है सुना है। लेकिन सही सुना है। रामफल का गाईड है। यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर है। रामफल उसे अपना गुरू कहते हैं।“

बहादुर काका ने छोट्टे का कॉलर पकड़कर पीपर के तने में दचेड़ दिया- “भोसड़ी के सुनी सुनाई बातों पर ब्राह्मण को कलंकित करता है? रामफल शान हैं हमारी। ऐसा पढ़ोक्कर और सज्जन यहाँ न हुआ है, न दूसरा होगा। वह खुद ज्ञानी है। वह किसी को गुरू क्यों बनायेगा? उसका गुरू हो सकने लायक है कौन इस क्षेत्र की धरती पर? रामफल पर यह कलंक अगर साबित हो गया तो यह पूरे ब्राह्मण समाज पर कलंक होगा छोट्टे। अगर झूठ साबित हुए तो यही झूठ तुम्हारा काल होगा समझे। जबान सम्हालकर, ऊँच-नीच बूझकर बात करो। यदि सही है तो रामफल भले अजीज़ और आदरणीय हैं हमारे पनही से वंदना होगी उनकी। बायकाट होगा। साला कोई पानी पी लेगा उनके हाथ का तो खन के गाड़ देंगे। देखना।“

छोट्टे का दम घुटने लगा था। सिर में चोट भी लगी। सब सन्न थे। माटसाब ने बीच बचाव किया। माहौल में सन्नाटा फैल चुका था। जो व्यक्ति गाँव में किसी से पैलगी नहीं करता। बढ़कर अभिवादन नहीं करता। सगे नाते रिश्तेदारों के पाँव नहीं छूता वह किसी दलित प्रोफेसर के पाँव छूता है किसी के लिए हजम होनेवाली बात नहीं थी। समय कितना भी बदल गया हो। राजनीति कैसे भी रूप दिखा रही हो लेकिन रामफल जैसा पढ़ा लिखा प्रणाम विरोधी ब्राह्मण भी अपना ईमान छोड़ देगा गंजेड़ी स्वजन के लिए अनोखी बात थी। यद्यपि यह मित्र मंडली सुनती जानती सब थी। सब तरह के कुकर्मों में खुद भी मुब्तिला थी। रोटी बेटी उठा लेने तक में निंदित रह चुकी थी। जो गाँव में हो रहा था, जो देश में हो रहा था उन सबकी भागीदार थी। फिर भी किसी श्रेष्ठ समझे जानेवाले को नीच समझने का जो मज़ा गाफिली और निकृष्ट कोटि की खुद्दारी में है वह उदारता में कहाँ?

बड़े गुरू ने स्थिति को सम्हालने और शांत करनेवाले अंदाज़ में कहा- “संभव है। छोट्टे की बात संभव है। रामफल हमसे भी कह चुके हैं कि वे जात पाँत नहीं मानते। अब अगर वे जात पाँत मानते ही नहीं तो पाँव क्यों नहीं छू सकते? जो व्यक्ति जाँत पाँत नहीं मानता वह कुछ भी कर सकता है। लेकिन यह गलत और समाज विरोधी आचरण है इसमें दो राय नहीं।”

इधर रामफल पांडे रास्ते में पड़नेवाले मुसलमानों के एक मुहल्ले में सड़क पर आ गयी मुर्गी से टकरा जाने के कारण एक थप्पड़, दर्जन भर से अधिक गालियाँ खाकर, सौ रुपये हर्जाने के जमा कर और उससे पहले पिछली ट्यूब का एक पंचर बनवाकर शहर पहुँच गये थे। यूनिवर्सिटी चौक के एक बुक स्टॉल पर खड़े-खड़े पत्रिकाएँ उलटने-पलटने लगे। उन्हें खरीदना बीएड प्रवेश परीक्षा का फॉर्म था। लेकिन अब रुपये कम थे। सौ रुपये हर्जाने में गँवाये जा चुके थे। अच्छा होता कि वे उस बीमार मृत मुर्गी को ले ही आते तो यहीं किसी होटल में बेचकर बीएड के फॉर्म का जुगाड़ कर लेते। लेकिन मजबूरी में भी मांस के धंधे जैसी गयी बीती हरकत में नहीं पड़ गये वह यह तसल्लीबख्श बात लगी।

रामफल चलनेवाले ही थे कि एक सज्जन ने बीएड का फार्म ऑर्डर किया। रामफल ने सोचा देखा तो जा ही सकता है फॉर्म। माँगने की नौबत नहीं पड़ी। दुकान के भीतर से किताब पत्रिकाओं के ऊपर की जाली में फेंका गया फार्म उन्हीं के पास आ गिरा। रामफल ने उठा लिया। लिफ़ाफा खोलकर देखने लगे। ग्राहक चिढ़ गया। 

“भाई मैंने लिया। जल्दी में हूँ।“

“देता हूँ। जरा देख लूँ। अपने लिए ही लिया या किसी और के लिए ?“

“लिफाफें में नाम लिखा है...“दुकानदार ने बताया।

रामफल ने देखा- डॉ. चंचला पाठक

“कैंडिडेट पीएचडी है ?”

“हाँ”

“पीएचडी के बाद बीएड?”

शख्स उखड़ गया।

तो क्या हुआ ?”

“सही कहते हैं। सॉरी।”

“एक से एक लोग पड़े हैं। भेजा चाट लेते हैं। दो फार्म। अपना लेना तो देखना।“

रामफल के माथे पर पसीना आ गया। अनायास खासा अपमान हो चुका। अगल-बगल लोग हँस पड़े थे। मन ही मन पछताये। ‘कैसे बेहूदे सवाल आ जाते हैं मेरे मन में। मैं भी तो रिसर्च कर रहा हूँ। बीएड भी करना चाहता हूँ कि नहीं। फार्म लेने आया कि नहीं। बेरोज़गारी ऐसी है। लगता है मंगल गृह में ही सही चपरासगीरी मिल जाये। चलूँगा यहाँ से या और कुछ बाकी है!’

रामफल पलटे ही थे कि प्रो. लक्ष्मण प्रसाद शर्मा मानो प्रकट हो गए। बगल में आकर दुकानदार से चार-पाँच पत्रिकाएँ मांगी। ताज़ा इंडिया टुडे के पृष्ठ पलटने लगे। सर्दियों के दिन थे। सालाना सेक्स सर्वे प्रकाशित हुआ था। रामफल ने पत्रिका के कवर से नज़र हटाते हुए अभिवादन किया। प्रोफेसर शर्मा ने पहचानकर कंधे में हाथ रखा। उनका दूसरा हाथ स्त्री तस्वीर के नितंब पर था। खुश होकर स्नेह से भरे बोले-

“ओहो हो पंडित कैसे हो ? कहां से यहाँ? आजकल क्या कर रहे हो?”

“रिसर्च कर रहा हूँ सर”

“रिसर्च ? किसमें??...नेट वेट किया या पहले ही?”

“जेआरएफ़ के लिए कोशिश कर रहा हूँ सर नेट हो गया है”

“वेरी गुड, सब करते हैं कोशिश। तुम भी करो। मैथ्स में नेट बहुत बड़ी बात है ! लेकिन कभी सुना नहीं। बताया नहीं तुमने। घर आओ तो मिठाई खिलाऊँगा। पेपर वेपर में देना चाहिए ऐसी अचीवमेंट। वेरी गुड।“

“धन्यवाद सर लेकिन मैथ्स में नहीं हिंदी में नेट हुआ है।“

“हिंदी में ? तुम हिंदी में कब- क्यों चले गये? मैथ्स में फेल हुए क्या?”

“नहीं सर फेल नहीं हुआ। पसंद से गया। बीएससी में अच्छे परसेंट थे। लेकिन मुझे हिंदी पढ़नी थी। फेलोशिप की ज़रूरत है।“

“हिंदी में कहाँ से ? कौन पढ़ाता है? तुम्हारी मति मारी गयी है? मैथ्स के बाद हिंदी? क्या करोगे आगे? किसने बहकाया तुमको? अच्छी पकड़ थी तुम्हारी। साहित्य वाहित्य बिना हिंदी पढ़े भी कर सकते थे।“

शर्मा जी हतप्रभ थे। रामफल सन्न। आस-पास खड़े लोग किसी खास मनोरंजन की उम्मीद में निकट सरक आये थे। दुकानदार जो कि प्रोफेसर साहब का विद्यार्थी रह चुका था मंद-मंद मुसकाए जा रहा था।

“किसी ने नहीं बहकाया। मैं खुद गया। यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग से रिसर्च कर रहा हूँ।“

“ओह हिंदी विभाग ? कौन है वहाँ? मेरा मतलब गाईड कौन है?”

रामफल ने नाम बताया। प्रोफेसर शर्मा ने घृणास्पद तरीके से तंबाकू थूक दी। 

“वह दलित साहित्यकार ?”

“हाँ दलित साहित्यकार।“

“बकलोल है। ऐसे लोग जो राजेन्द्र यादव जैसे पौवा छाप, लौंडियाबाज़ संपादको के बल पर हंस या इधर-उधर छप जाते हैं आजकल दलित साहित्यकार निकल आये हैं। साहित्य में भी आरक्षण आने ही वाला है। खुद राजेन्द्र यादव को आता क्या है? एक कहानी बता दो यादव की? संपादकीय के नाम पर गाली लिखता है। जान बूझकर विवाद खड़ा करता है। उसने मन्नू भंडारी के साथ क्या किया? हंस में होता क्या है जातिवाद और सेक्स के सिवा? चले हैं अंबेडकर बनने। तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है?”

“मेरी बुद्धि भ्रष्ट नहीं हुई है सर लेकिन एक बात तय है।”

“कौन सी बात खुलकर कहो ?”

“आपकी समझ दुरुस्त नहीं हो सकती।”

“क्यों मेरी समझ को क्या हुआ है ? वह दुरुस्त ही है। तुम्हारी ही बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है। एक बकलोल के चक्कर में मैथ्स छोड़कर हिंदी पढ़ रहे हो। माँ बाप की छाती के पीपर बन रहे हो। अभी साल दो साल में बेरोज़गार हो जाओगे और व्यवस्था को गाली देते फिरोगे। तुम छाती के पीपर हो। तुम्हारा गुरू बकलोल है। और भी बहुत कुछ है वह जिसे मैं अभी कह नहीं सकता।“

“लेकिन मैं कह सकता हूँ।“

“क्या ?”

“आपकी समझ ठीक नहीं है सर।“

“यह तो वक्त बतायेगा। तुम नोट कर लो। तुम्हें यूजीसी से फेलोशिप मिल भी गयी तो इस यूनिवर्सिटी में फेलोशिप की जगह बोकरी का बार मिलेगा। भारत में क्रांति होगी घंटा। तुम बेरोज़गार घूमोगे, बेरोज़गार।“

“जाने दीजिए सर जो होगा देखा जायेगा। अभी मुझे देर हो रही है। सलाह के लिए बहुत धन्यवाद”

रामफल चलने लगे। प्रोफेसर शर्मा ने हाथ पकड़कर लगभग खींच लिया। 

“रुको, आज समझ लो अच्छी तरह। ये देखो पाँच उँगलियाँ हैं। पाँचो अलग-अलग। छोटी-बड़ी। इन्हें ऐसे की ऐसे विधाता ने बनाया। ये ऐसे ही रहती हैं अंत तक। लेकिन अब कम्युनिस्टबे इन्हें बराबर कर देंगे। तुम इंतज़ार करना। समझे। इंतज़ार करना। जब क्रांति हो जायेगी तुम प्रोफेसर ज़रूर बन जाओगे। क्रांति होने तक सब्र रखना। अब जा सकते हो। गधे कहीं के।“

रामफल की मनोदशा बेहद खराब हो चुकी थी जैसे सरेबाज़ार किसी ने नंगा कर दिया हो। लेकिन किया कुछ नहीं जा सकता था। किया कुछ नहीं जा सकता जैसे रामफल की नियति बन चुकी थी। इस नियति से मैं अकेला ही नहीं जूझ रहा यही एक बल था उन्हें। इससे घोर क्या होगा कि ऐसे क्षण एक बात तक ऐसी नहीं कही जा सकती थी जो प्रोफेसर शर्मा के लिए मुँहतोड़ हो या कम से कम चुभ ही जाये। प्राचार्य रहकर सेवानिवृत्त हो चुके प्रोफेसर शर्मा शहर में ऐसे संगठन के संरक्षक सदस्य थे जिसके गुंडा अनुयायी एक इशारे पर कुछ भी कर सकते थे। उनकी मित्रमंडली में ही कई ऐसे प्रोफेसर थे जो उग्र राजनीतिक संगठनों, सट्टा बाज़ार से लेकर अपहरण उद्योग तक में सक्रिय थे। पिछले साल देखते-देखते महाविद्यालय परिसर से कई विद्यार्थी गायब हो चुके थे। यही नहीं रामफल अपने गाईड को भी शर्मा जी का पर्याप्त सम्मान करते देख चुके थे। प्रोफेसर शर्मा रसायन शास्त्र के प्रोफेसर होने के साथ-साथ हिंदी के तुक्कड़ कवि भी थे। उनके छंदों पर शहर का पुलिस कप्तान ही नहीं विवि का कुलपति भी वाह वाह करता था। रामफल उनसे आखिरी प्रणाम कर विश्वविद्यालय पहुँचे जहाँ एक और सलाह उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।

विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अभी-अभी एमए फाइनल की कक्षा छूटी थी। साक्षात कुलसचिव लेक्चर देकर यानी क्लास लेकर गये थे। एक सुंदर शोधार्थिनी से पितृवत स्नेह के कारण उन्होंने अध्यापन का यह गुरूतर भार ओढ़ रखा था। नियमित आया करते थे। बड़े विद्वान, बड़े छात्र वत्सल माने जाते थे। यद्यपि विभागाध्यक्ष की राय नितांत भिन्न थी। लेकिन अपनी सीमा और सामर्थ्य के मुताबिक वह केवल एक संशोधित लोकोक्ति ही कहा करते थे “आये हरिभजन को ओट रहे कपास।“

चपरासियों और क्लर्क को इधर उधर डोलते देख रामफल ने कुलसचिव के जाने के बाद की प्रशासकीय ढील लक्षित की। हिंदी के अस्त-व्यस्त गँवई लगने वाले विद्यार्थी परस्पर गप्प और चुहल कर रहे थे। रामफल के पहुँचते ही एक जूनियर ने दादा प्रणाम कर सूचना दी

“दादा आपको हेड सर ने बुलाया है।“

“अच्छा, खाली होने पर मिलता हूँ। और कैसे हो ?”

“आशीर्वाद दादा”

रामफल पहले अपने गाईड के कक्ष की ओर गये। वहाँ कोई न था। उन्होंने सोचा मिल लेता हूँ हेड से अभी। बाद में भूल जायें या कहीं चले जायें उससे पहले। एक अग्रेषण लेटर भी है। साईन हो जायेगा। कुछ किताबें भी लाईब्रेरी से निकलवानी हैं।

विभागाध्यक्ष का कमरा जिसे चपरासी चेंबर कहते थे एक छोटा कक्ष था जिसके आधे हिस्से में उनका टेबल और घूमनेवाली कुर्सी थी। शेष हिस्से में कुछ सोफ़े थे जिनमें कुछ विद्यार्थी बैठकर कभी-कभी कुछ पढ़ा करते थे। विभागाध्यक्ष कुछ उदार थे, कुछ विद्वान और कुछ ताकतवर। दुनियादार वह बहुत थे। सभी राजनीतिक दलों के लोगों से उनके संबंध थे। कुल मिलाकर उनके व्यक्तित्व और पद का निर्माण कुछ ऐसी परिस्थितियों, कुछ ऐसे पदार्थों से हुआ था जिनके मूल में कुछ ही बहुत कुछ होता है। भारत के विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों के संदर्भ में तो सब कुछ। वे डी लिट थे। प्रादेशिक पाठ्यक्रम निर्माण समिति के अध्यक्ष थे। पूरा देश घूमे हुए अपने अंत:प्रदेश के प्रधान सेवक थे।

जब रामफल ने दरवाज़ा खींचकर अंदर आने की अनुमति माँगी तब हेड साहब के कक्ष में कुछ सुंदर शिष्याएँ सोफ़े पर बैठी अध्ययन कर रही थीं। कक्ष से लगे हुए बाथरूम का दरवाज़ा खुला हुआ था। जिससे अंदाज़ा लगता था हेड साहब अभी अभी हलके हुए हैं। रामफल ने सौजन्यवश खड़े होने की जगह बनाते हुए दरवाज़ा बंद कर दिया। इस संस्कार प्रदर्शन से हेड साहब प्रसन्न हुए। उन्होंने धन्यवाद की जगह मुस्कुराहट प्रकट कर दी।

“कैसे हो ?”

“अच्छा हूँ सर”

“बैठो”

“ठीक हूँ सर आपने बुलाया ?”

“मैंने बुलाया ? नहीं तो..हाँ...हाँ... बुलाया था...बैठो...बैठो तुमसे कुछ बात करनी है।“

“जी धन्यवाद सर”

हेड साहब का इशारा पाकर एक लड़की ने खिसककर सोफे पर जगह बनायी। रामफल गलती से उसके दुपट्टे पर बैठ गये जिसे अचकचाई छात्रा ने जोर से खींच लिया। सब हँस पड़े। रामफल असहज हो गये। हेड साहब सीधा रामफल से मुखातिब हुए

“तुम्हारा घर कहाँ पड़ता है ?”

रामफल ने जगह का नाम बताया।

“तुम ब्राह्मण हो न ?”

“जी आप कई बार पूछ चुके हैं।“

“हाँ.. मैं भूल जाता हूँ। लेकिन ब्राह्मण हो तो कई बार बताने में भी क्या हर्ज़? कौन से ब्राह्मण हो ?”

“मैं समझा नहीं सर”

“मेरा मतलब है सरयू पारीण हो या कान्यकुब्ज ?”

“सरयूपारीण”

“अच्छा गोत्र कौन सा है ?”

“मालुम नहीं सर”

“गोत्र नहीं मालुम ?”

“नहीं सर”

“क्यों ?”

“कभी ज़रूरत नहीं पड़ी”

“जानना चाहिए। तुम विद्वान हो।“

“जी। पता कर लूँगा।“

“शादी हो गयी ?”

“नहीं”

“करोगे ?”

“जी ?”

“शादी करोगे ?”

“अभी इस बारे में सोचा नहीं”

“सोचो, जल्दी सोचो। शादी भी ज़रूरी होती है।“

“सोच लूँगा वक्त मिलेगा तो”

“अभी सोचो, क्या पता जब वक्त मिले लड़की ही न मिले”

सब हँस पड़े।

“आते कैसे हो ?”

“साईकिल से”

“कितने किलोमीटर होगा यहाँ से घर ?”

“18 किलोमीटर”

“दोनों तरफ़ का ?”

“नहीं एक तरफ़”

“कुछ चना चबेना लाते हो ? “

“नहीं”

“लाया करो”

“जी”

इसके बाद हेड साहब मुद्दे पर आये। इसके लिए उन्होंने मुँह की तंबाकू थूक दी। अपनी आवाज़ धीमी और गंभीर बनायी। दोनों हाथ जोड़कर उनमें ठुड्डी टिका ली। बारी-बारी से सभी छात्राओं को देखा। बोले

“मेरे कहने का, बुलाने का कुल मतलब यह कि तुम मेहनती हो। मज़बूत हो। अच्छे ब्राह्मण हो। विद्वान हो। लिखते हो। समर्पित हो। तुममे प्रतिभा और लगन दोनों हैं तो फिर वैसा ही आचरण भी क्यों नहीं करते? गरिमा हीन आचरण से सरस्वती रूठ जाती है। व्यक्ति प्रतिष्ठाच्युत हो जाता है। समाज मे अपयश मिलता है और अर्थ की हानि होती है। तुम यदि श्रेष्ठ आचरण करो तो एक दिन अवश्य प्रोफेसर बनोगे। वरना असंभव है।“

रामफल अचकचा गये। उन्हें सम्हलने तक का मौका नहीं मिला था। यह दूसरा आक्रमण था जिसे उन्हें झेलना था। वे कुछ विचित्र अपमानजनक कर बैठें इससे बचने के लिए उन्होंने बातचीत को खींचकर जगह बनानी चाही।

“मैं कुछ समझा नहीं सर”

“समझने जैसी कोई बात नहीं है। तुम मेरी इज्जत नहीं करते मत करो। तुम्हारे अध्ययन के क्षेत्र में मैं पारंगत नहीं तो इसका अर्थ यह नहीं कि मेरा पुरुषार्थ किसी से कम है। याद रखना विभागाध्यक्ष मुझे ही बनाया गया है। मैं तुम्हें केवल आगाह करना चाहता हूँ।“

“किस बात के लिए सर ?”

“बात कुछ खास नहीं है। सोचोगे तो है भी”

“बात क्या है सर ?”

“बात यह है कि तुम इतना सब होने के बावजूद किसी दलित साहित्यकार को अपना आदर्श मानते हो। एक ऐसा रिसर्च एसोसिएट जो ब्राह्मण की ही कृपा और अनुशंसा पर नियुक्त हुआ। दलित के पीछे-पीछे तुम ब्राह्मण होकर घूमते हो। यह ठीक नहीं है। यह इस विभाग में, यहाँ की धरती पर फलदायी नहीं हो सकता। इस विभाग में तो क्या पूरा विश्वविद्यालय ही न इसे पचा पायेगा न बर्दाश्त कर पायेगा। धोबी का कुत्ता हो जाओगे। अपने समाज के हो इसलिए आगाह कर दिया। आगे तुम खुद समझदार हो।“ 

रामफल कुछ बोलना ही चाहते थे कि हेड साहब ने टोक दिया

“इस विषय में बहस की गुजाईश नहीं है। मुझे कोई दलील नहीं सुननी। अब तुम जा सकते हो।“ रामफल बुरी तरह खिसिआये हुए बोले

“तुम्हारी क्षय हो...”

“क्या कहा ?”

“तुम्हारी क्षय कहा सर”

“तुमने मुझे गाली दी ?”

“गाली नहीं दी सर...मैं किसी को भी गाली नहीं दे पाता।“

“फिर तुम्हारी क्षय क्या है ? स्पष्ट करों अभी वरना मैं पुलिस बुलाता हूँ।“

“सर तुम्हारी क्षय राहुल सान्कृत्यायन की किताब का नाम है। “

“होगा। मैंने नहीं देखी सुनी। लेकिन अभी क्यों कहा तुमने ?”

“सर मैं यहाँ से निकल रहा था। कोई दूसरा है नहीं विभाग में तो सोचा आपसे पूछ लूँ आज कैसे निकलेगी ? संकोच और अपमान के कारण वाक्य पूरा नहीं कर पाया। आप अन्यथा न लें। मैं कल आ जाऊँगा सर।“

“बाहर निकल बत्तमीज़...”

हेड साहब चीखे। रामफल मन ही मन हँसते बाहर निकल आये। उन्हें अपने अपमान का बदला रचनात्मक रूप से लेने का किंचित अवसर मिल गया था। अपनी प्रत्युत्पन्न मति पर गर्व करते हुए रामफल अपनी साईकिल की ओर बढ़े। सड़क पर चलते हुए रामफल वापसी का गीत गुनगुना रहे थे- “नदिया चले चले रे धारा...चंदा चले चले रे तारा....तुझको चलना होगा...”

जिस वक्त रामफल अपनी साईकिल पर सवार इस बात से बेपरवाह कि इतनी स्पीड में अब किसी भी क्षण चेन उतर सकती है यह सोचते लौट रहे थे कि यदि मैं अपने विवेक के साथ रहा तो ज़िंदगी में उजले दिन अवश्य आयेंगे उसी वक्त उनके गंजेड़ी स्वजन में से एक रामशरण माटसाब इस प्रस्ताव के साथ संगत विसर्जित कर रहे थे-

“यदि रामफल पांडे ने स्वीकार कर लिया या किसी तरह यह साबित हो गया कि उन्होंने किसी दलित का चाहे वह प्रोफेसर ही क्यों न हो पाँव छूते आ रहे हैं तो उनका सामाजिक बहिस्कार किया जायेगा और अगर रामफल ने इस बहिस्कार का उचित सम्मान न किया तो उनका शुद्धिकरण किया जायेगा। शुद्धिकरण कब और कैसे होगा इसका खुलासा तभी होगा। किसी भी कीमत पर यह गोपनीय रखा जाये“

बड़े गुरू ने सबसे पहले प्रस्ताव का समर्थन किया। फिर सबने हाँ हाँ कर दी। 

रामफल पांडे की साईकिल का चेन इस बार ढलान पर उतरा। उन्होंने पैडल से पाँव उठा लिए। साईकिल आगे की आधी चढाई अपने आप चढ़ गयी। शेष चढाई उन्होंने पैदल चढ़ी। ऊपर एक टपरे पर साईकिल सुधारने की दुकान थी। लेकिन वह थोड़ी दूर थी। रामफल को पास में एक पेड़ दिखा तो वे नोटबुक लेकर बैठ गये। दर्ज़ किया- 

“सवर्ण या दलित घर में जनम लेना अजीब नहीं है। अजीब है दलित या सवर्ण समझे जाना। सबसे अजीब है खुद नहीं समझना लेकिन समझे जाते रहना। मैं अपने गाईड की नज़र में भी ब्राह्मण ही हूँ जबकि मेरी निगाह और बर्ताव में वे दलित नहीं है। आनेवाला समय दस्तक दे रहा है कि अब जो सवर्ण के घर पैदा होंगे वह सवर्ण जो दलित के घर पैदा होंगे वह दलित ही समझे जाते रहेंगे। भविष्य में छुआछूत विहीन जातिवाद विकराल होता जायेगा।“ “यह नहीं भी हो सकता है।“ कोष्ठक में लिखकर हस्ताक्षर किए और नोटबुक बंद कर दी। 

दुकान पर पहुँचकर रामफल ने मिस्त्री से कहा- काट दो। मिस्त्री चौंका-क्या काटना है? रामफल बोले- चेन बढ़ गयी है उसे काट दो। मिस्त्री ने कहा-अच्छा, हो जायेगा लेकिन समय लगेगा।

-'बया' के उच्च शिक्षा विशेषांक: भारत की उच्च शिक्षा-1, जनवरी-मार्च 2017 में प्रकाशित




गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

निडरता की ओर छोटी-सी यात्रा


अनुभव बटोरने के लिए दुनियाभर के लेखकों द्वारा की गई यात्राओं के अनेक किस्से हैं। उस लिहाज से अपने गृह राज्य से हजार दो हजार किलोमीटर दूर की यात्रा करना कोई उल्लेखनीय बात नहीं होती। वो भी आज के सुख-सुविधापूर्ण यातायात के साधनों के जमाने में तो हर्गिज नहीं। लेकिन जब कर्फ्यू लगता है तो लोग अपने पड़ोस के घर तक जाने का जोखिम मोल नहीं लेते। तब इंसानियत के लिए हाथों में हाथ लेकर निडरता से दस कदम चलना भी एक चुनौती होती है। जब एक लेखक या कलाकार की अभिव्यक्ति पर पहरे बिठा दिये जाएँ, उसे निर्देशित किया जाए कि वो सिर्फ़ वही लिखे जो सत्ता को पसंद आता हो, तब विवेक से सत्ता को अप्रिय लगने वाला सच लिखना तो बड़ी बात है ही। बर्टोल्ट ब्रेष्ट ने लिखा था –
“क्या अँधेरे वक्त में भी गीत गाए जाएँगे
हाँ, अँधेरे वक्त में भी
अँधेरे के बारे में गीत गाए जाएँगे।“

जो लेखक बोलने और लिखने के लिए शहीद हुए, जो लिखना और बोलना सही और जरूरी समझते थे, उनके विचारों के साथ और उनके परिजनों-साथियों के साथ एकजुटता दर्शाने के लिए, मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ ने अपने पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक की यात्रा का कार्यक्रम बनाया। ये एक छोटा-सा कदम ही था लेकिन इसने बहुत सारे अनुभव दिये और हौसलों को मजबूत किया। इन्हीं राज्यों में पिछले चार वर्षों में हमारे तीन बड़े लेखक, विचारक और आंदोलनकारी शहीद हुए। उनके कायर-हत्यारे नाकारा सरकारों की ढील की वजह से अब तक खुले घूम रहे हैं और शेष समाज के लिए खतरा बने हुए हैं। सच और सच की तलाश की लड़ाई में डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर, कॉमरेड गोविंद पानसरे और प्रो. एम.एम. कलबुर्गी ने अपनी शहादत दी है और उनके परिवारजन तथा साथी न्याय के लिए सब्र के साथ वर्षों से लड़ रहे हैं। केवल उनके लिए न्याय नहीं, इस पूरे समाज के लिए और एक तर्कशील विचारवंत समाज की स्थापना के लिए भी न्याय।
हम सोचकर निकले थे कि उनकी लड़ाई में अपनी आवाज मिलाकर आएँगे। हम सोचकर निकले थे कि सच्चाई के लिए उठते नारों की बँधी मुट्ठियों में अपनी मुट्ठी भी लहराकर आएँगे। हम सोचकर निकले थे कि नजदीक से चीजों को जानकर आएँगे। लेकिन जब हम पहुँचे और जिस तरह लोगों ने तमाम शहरों में जो इज़्ज़त और प्यार दिया, जो भरोसा दिखाया, उससे लगा कि हमने कोई बड़ी जिम्मेदारी ले ली है जो सिर्फ़ इस यात्रा के साथ समाप्त नहीं होगी।

लिखने, बोलने और अहिंसात्मक प्रतिरोध करने, लोगों में तर्कशीलता एवं विवेक के इस्तेमाल की समझाईश की प्रवृत्ति को जगाने के प्रयासों में लगे, देश के तीन प्रबुद्ध चिंतक, समाजसेवी और लेखकों की पिछले वर्षों में लगातार उग्र और कट्टरपंथियों द्वारा हत्याएँ की गईं। महाराष्ट्र में तर्क और विवेक पर आधारित कार्य करते हुए लोगों को बरगलाने वाले ढोंगी बाबाओं का प्रतिरोध करने की वजह से डॉ नरेन्द्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को गोली मारकर हत्या की गई। इसी प्रकार विख्यात सीपीआई नेता और समाजसेवी कॉमरेड गोविंद पानसरे और उनकी पत्नी कॉमरेड उमा पानसरे को भी कट्टरपंथियों ने अपनी बंदूक का निशाना बनाया। फलस्वरूप कॉमरेड गोविंद पानसरे की 20 फरवरी 2015 को मृत्यु हो गई और कॉमरेड उमा अभी तक पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सकी हैं। उन्हें भी सिर में गोली लगी थी। कर्नाटक के विख्यात लेखक और 2006 में साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजे गए प्रो. एम.एम. कलबुर्गी की उनके घर में घुसकर हत्या की गई। विवेकशील विचारों को समाप्त कर देने के लिए की गई ये हत्याएँ बेहद चिंतनीय हैं लेकिन उससे भी ज़्यादा खतरनाक है सरकारों का लगभग उदासीन रवैया। हालाँकि प्रतिक्रियास्वरूप पिछले चार वर्षों में भारतीय जागरूक जनमानस के बीच इसकी तीखी आलोचना हुई। अनेक लेखकों, पत्रकारों, संस्कृतिकर्मियों, समाजविदों और वैज्ञानिकों ने अपने सम्मानों को लौटाकर, लेख, कविताएँ लिखकर और सड़कों पर उतरकर हत्यारों के न पकड़े जाने को लेकर प्रतिरोध दर्ज किया।

इसी क्रम में ‘मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ’ ने ग्यारह चयनित सदस्यों का दल बनाकर इन लेखकों के विचारों पर हुए कट्टरवादी हमले और अब तक इनके हत्यारों के पकड़े न जाने की न्यायिक शिथिलता के प्रति अपना असंतोष व लेखक परिवारों और उनके साथ न्यायिक लड़ाई लड़ रहे, उनके सहयोगियों के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करने के लिए शहीद लेखकों के गृहनगरों की यात्रा का आठ दिवसीय कार्यक्रम बनाया। यह कार्यक्रम इस तरह नियोजित किया गया कि इसमें हम इन लेखकों के परिजनों से भेंट के साथ-साथ ऐसे मोर्चों और व्यक्तियों से मिलने का अवसर भी पा सकें जो जनसंघर्षों में या किसी न किसी तरह सृजनात्मक तरह से एक बेहतर मानवीय संस्कृति के निर्माण की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

14 फरवरी 2017 से प्रारंभ यह दल पुणे से सतारा, गोवा, धारवाड़ और कोल्हापुर होते हुए स्थितियों को नजदीक से परखते, समझते, विश्लेषण करते हुए 21 फरवरी को वापस आया। इस दल में प्रलेस के प्रांतीय अध्यक्ष राजेन्द्र शर्मा (भोपाल), प्रांतीय महासचिव और राष्ट्रीय सचिव मंडल सदस्य विनीत तिवारी (इंदौर), प्रांतीय कार्यकारी दल सदस्य हरनाम सिंह चांदवानी (वरिष्ठ पत्रकार, मंदसौर), सुसंस्कृति परिहार (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, दमोह), तरुण गुहा नियोगी (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, जबलपुर), हरिओम राजोरिया(प्रांतीय अध्यक्ष मंडल सदस्य, अशोकनगर), सीमा राजोरिया (प्रलेस सदस्य व भारतीय जन नाट्य संघ, इप्टा अशोक नगर), दिनेश भट्ट (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, छिंदवाड़ा), शिवशंकर शुक्ल ‘सरस’ (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, सीधी), बाबूलाल दाहिया (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, सतना) एवं आरती (प्रलेस सदस्य, भोपाल) शामिल हुए।

म.प्र. प्रलेस के ये सभी पदाधिकारी और सदस्य अलग-अलग जिलों से पुणे में 14 फरवरी को इकट्ठे हुए। इकट्ठे होने की जगह रेलवे स्टेशन भी हो सकती थी लेकिन तय की गई जगह थी महाराष्ट्र की ही नहीं देश भर की प्रमुख अर्थशास्त्री, आंदोलनकारी और विचारवंत लेखिका और हाल ही में दिवंगत डॉ. सुलभा ब्रह्मे द्वारा बनाई ‘लोकायत’ नामक संस्था का कार्यालय। वहाँ पुणे के ही एक अन्य सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता अमित नारकर ने हमें ‘लोकायत’ संस्था के कार्यों व संगठन की जानकारी दी। शुरुआत से ही हमारा समूह खामोशी से एक अध्ययन दल में बदल गया। लोकायत के कार्यों को जानते और सुलभा ब्रह्मे जी के बारे में जानते-समझते ये एहसास भी हुआ कि ऐसे ज़रूरी लोगों के बारे में भी हम कितना कुछ नहीं या न के बराबर ही जानते हैं। ये ख्याल भी आया कि दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी के बारे में भी हिंदी का संसार आमतौर पर तब तक नहीं ही जानता था जब तक कि वे शहीद हो जाने की वजह से सभी जगह चर्चित नहीं हो गए।

‘लोकायत’ से हम पुणे के करीब 50 कि. मी. दूर ‘तलेगांव दाभाड़े’ में विदुर महाजन (लेखक और सितार वादक) एवं उनकी पत्नी अपर्णा महाजन (अंग्रेजी की प्राध्यापिका) के बहुत ही कलात्मक और प्राकृतिक खूबसूरती से आच्छादित ‘मैत्रबन’ यानी ‘दोस्तों के घर’ पहुँचे। पहाड़ी की तलहटी में बने इस मैत्रबन के बनने की कहानी से लेकर, उसका स्थापत्य, फर्नीचर, सैकड़ों पेड़-पौधे और पूरा माहौल ही एक अलग दुनिया का अहसास करवा रहा था। और सबसे खास तो अपर्णा और विदुर का वो सहज और गर्मजोश व्यवहार था, जिसे छूकर पेड़-पौधे और मिट्टी, पत्थर, लकड़ी सभी क़रीबी और पुराने परिचित लगने लगे थे। शाम को विदुर महाजन ने सितार वादन और सभी साथियों ने कविता-पाठ किया। इस स्थान का कोना-कोना, अनगिनत किस्मों के पेड़-पौधे, विदुर-अपर्णा महाजन के प्रकृति और कला प्रेम की कहानी खुलकर कहते हैं। विदुर ने शाम को अपने उस अभियान की भी जानकारी दी जिसमें वे शास्त्रीय संगीत को खास लोगों के दायरे से निकालकर उसे आम ग्रामीण लोगों से परिचित करवाने के लिए सैकड़ों गाँवों में साधारण जन के बीच सितार और शास्त्रीय संगीत लेकर गए जिनमें से अधिकांश ने जीवन में पहली बार ही सितार सुना था। उन्होंने दो एकड़ की उस आत्मीय जमीन के बीचोंबीच बना वह डोम भी बताया जिसमें करीब दो सप्ताह तक बंद रहकर उन्होंने अपनी एक पुस्तक पूरी की थी। विदुर की पारिवारिक पृष्ठभूमि संगीत या कला की नहीं थी लेकिन विदुर को शास्त्रीय संगीत में इतनी दीवानगी थी कि वो तलेगाँव से मुंबई तक संगीत विदुषी ख्यात गायिका किशोरी अमोनकर से संगीत सीखने के लिए अप-डाउन किया करते थे। विदुर ने कविताओं, दर्शन और संस्मरणों की किताबें मराठी में लिखी हैं और वे महाराष्ट्र साहित्य अकादमी से पुरस्कृत भी हुई हैं। रात तारों भरी थी और साथियों के साथ बातें करने की एक दूसरे को जानने की उत्कंठा से और 11 लोगों की चहल-पहल से आबाद मैत्रवन की वो रात अविस्मरणीय बन गई। 

15 फरवरी यानी अगले दिन सुबह हमने राष्ट्रीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान(FTTI), पुणे में विद्यार्थियों से मुलाकात कर, संस्थान के अधिकारियों एवं शासन की रीतियों-नीतियों पर चर्चा की। ये वही संस्थान है जिसने भाजपा के सत्ता में आने के बाद कला, संस्कृति और शिक्षा के संस्थानों के संप्रदायीकरण और राजनीतिक नियुक्तियों के खिलाफ पूरे देश को जगाने वाली आवाज उठाई थी। वहाँ नाचीमुत्थु, रोहित, रॉबिन और अन्य विद्यार्थियों ने प्रलेस के दल को पूरे संस्थान का भ्रमण करवाया। प्रभात स्टूडियो, फिल्म एडिटिंग एवं लायब्रेरी, कैंटीन, हॉस्टल आदि जगहों का विस्तार से परिचय दिया। इसके बाद पुणे की प्रलेस इकाई एवं अन्य संस्थाओं द्वारा साधना मीडिया सेंटर में चर्चा का आयोजन था। साधना समाचार पत्र करीब 6 दशकों पहले महाराष्ट्र के प्रसिद्ध समाज सुधारक साने गुरूजी द्वारा आरंभ किया गया था और आज तक सतत यह वैज्ञानिक चेतना और समाजवादी विचारों के प्रसार में संलग्न है। इसमें म.प्र. प्रलेस द्वारा की जा रही यात्रा के उद्देश्य को पुणे के लेखकों, विचारकों, समाजसेवियों एवं पत्रकारों तथा अंधश्रृद्धा निर्मूलन समिति (अनिस) के कार्यकर्ताओं के बीच साझा किया गया। इस बैठक में 93 वर्षीय कॉमरेड शांता ताई रानाडे (वरिष्ठ सीपीआई नेता व गोविंद पानसरे की राजनीतिक सहयोगी, पिछले साठ सालों से राजनीतिक तथा वैचारिक मोर्चों पर सक्रिय), एस.पी. शुक्ला (वरिष्ठ विचारक, पूर्व सदस्य योजना आयोग, पूर्व वित्त एवं वाणिज्य सचिव), लता भिसे (भारतीय महिला फेडरेशन की राज्य नेत्री), मिलिंद देशमुख (अनिस कार्यकर्ता), नंदिनी जाधव (अनिस कार्यकर्ता), नीरज (लोकायत), अहमद शेख (थियेटर कलाकार), दीपक मस्के (अंबेडकरवादी विचारक और प्रलेस, पुणे), माओ भीमराव (प्रलेस, महाराष्ट्र) एवं अपर्णा, जहाँआरा, शैलजा, रुचि भल्ला, राधिका इंग्ले, सुनीता डागा के साथ ही ‘अनिस’, प्रलेस एवं थियेटर से जुड़े कई युवा भी उपस्थित थे। लेखिका राधिका इंग्ले तो देवास से अपने किसी अन्य कार्यक्रम में पुणे आई थीं। उन्हें दस्तक वाट्सअप समूह से इस बैठक की जानकारी मिली तो वे आ गईं। इसी तरह लेखिका रुचि भल्ला पुणे से 110 किमी दूर स्थित फलटण शहर से इस बैठक की जानकारी पाकर इस लोभ में भी आई थीं कि यहाँ उन्हें हिंदी सुनने को मिलेगी जो उन्होंने फलटण रहते 3 महीनों से नहीं सुनी थी। हमारे दल के वरिष्ठ साथी हरनाम सिंह जी ने म.प्र. प्रलेस के सांगठनिक ढांचे और कार्यों का विस्तृत परिचय दिया एवं कहानीकार दिनेश भट्ट ने यात्रा का उद्देश्य साझा किया। हरिओम राजोरिया एवं शिवशंकर शुक्ल ‘सरस’ ने कुछ कविताओं का पाठ भी किया। मराठी के कवियों का भी कवितापाठ हुआ। इस बैठक की विशेषता कट्टरवाद एवं अन्य सामाजिक मुद्दों पर हुई चर्चा थी। आज की परिस्थिति में फासीवादी ताकतों के खिलाफ सभी को एकजुट होकर उनका प्रतिकार करना चाहिए, यह समय की आवश्यकता है, इस बात पर सभी ने जोर दिया। एस. पी. शुक्ला ने हमें महाराष्ट्र की तर्कशील परंपरा और संत साहित्य के भीतर मौजूद रही मानवतावादी धारा का तथा कॉमरेड गोविंद पानसरे द्वारा शिवाजी को हिंदू राजा की चैखट से बाहर निकालने के तथा उनके व्यक्तिगत जीवन के मार्मिक प्रसंगों से संक्षेप में परिचित करवाया।

शाम को हम युवा फिल्म निर्देशक क्रांति कानाडे के घर गए। वहाँ उनकी बनाई और राष्ट्रपति पुरस्कार एवं कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजी लघु फिल्म ‘चैत्र’ देखी। उल्लेखनीय बात ये कि उनके घर की पूरी बनावट इस तरह की गई है कि पूरे क्षेत्रफल का अधिकांश हिस्सा किसी भी सार्वजनिक किस्म के कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल हो सकता है। क्रांति का कहना है कि जब सरकारें सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा करती जा रही हैं और उन्हें निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, साहित्य, नाटक, फिल्म आदि करने के लिए सभी जगहें या तो बहुत महँगी कर दी गई हैं या फिर सरकारी विचारधारा के अनुकूल होने की शर्त उन पर जड़ दी गई है तो उन जगहों को वापस हासिल करने के लिए लड़ना तो होगा ही, साथ ही हममें से जिनके पास भी जगहें हैं, उन्हें आगे आना होगा और अपने निजी आकाश में सार्वजनिक की जगह बढ़ानी होगी। क्रांति ने हमें अपनी नई फिल्म ‘सीआरडी’ का ट्रेलर भी दिखाया जो अभी हाल ही में अमेरिका के पाँच महानगरों में रिलीज हुई है। फिल्म का ट्रेलर देखकर ही ये अंदाजा लग गया कि दक्षिणपंथियों को इससे खासी तकलीफ रहेगी।

शाम को ही पुणे से चलकर हम करीब आधी रात सतारा पहुँचे। 16 फरवरी को हमारी मुलाकात डॉ नरेन्द्र दाभोलकर के बेटे डॉ हमीद दाभोलकर, डॉ शैला दाभोलकर (डॉ दाभोलकर की पत्नी) एवं अनिस के कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों के साथ हुई। डॉ दाभोलकर के बेटे और अनिस कार्यकर्ता हमीद दाभोलकर ने डॉ दाभोलकर के कार्यों, संघर्षों एवं हत्या का वर्णन करते हुए न्याय प्रक्रिया में आनेवाली अड़चनों का विस्तृत विवरण दिया। उन्होंने कहा कि अनिस की स्थापना हुए 25 साल हो गए। महाराष्ट्र के 30 जिलों में करीब 4 से 5 हजार स्वैच्छिक कार्यकर्ता सामाजिक जागरुकता की लड़ाई लड़ रहे हैं। महाराष्ट्र के साथ ही कर्नाटक और दिल्ली में भी नयी इकाइयाँ खुली हैं। उन्होंने बताया कि लोगों का शोषण करने और अंधविश्वास फैलाने वाले कारकों के खिलाफ महाराष्ट्र राज्य में अब कानून भी (डॉ दाभोलकर की हत्या के बाद) बन चुका है। म.प्र. प्रलेस के सदस्यों ने डॉ शैला से भी विस्तृत और अंतरंग बातें की। उन्होंने कहा कि यह सामाजिक न्याय की लड़ाई है जो आगे भी चलती रहेगी। नरेन्द्र की हत्या के बाद भी लड़ाई थमी नहीं है और थमेगी भी नहीं। डॉ दाभोलकर के और उनकी शादी के दिलचस्प किस्सों के साथ ही डॉ दाभोलकर के दृढ़ निश्चय और अडिग निर्णयों के बारे में उन्होंने जो बातें कीं, उनसे सभी का दिल भर आया।

सतारा से दोपहर को ही निकलकर हमने गोवा की ओर प्रस्थान किया। गोवा वह स्थान है जहाँ दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्या के हत्यारों के सूत्र जिस सनातन संस्था के साथ जुड़े बताये जाते हैं, उसका मुख्यालय है। रात करीब 10.30 बजे हम गोवा पहुंचे। यहाँ हमारा आत्मीय स्वागत सुविख्यात मजदूर नेता कॉमरेड क्रिस्टोफर फोन्सेका व उनकी पत्नी कॉमरेड शांति फोन्सेका (ख्यातिनाम वकील) ने किया। कॉमरेड क्रिस्टोफर एवं कॉमरेड शांति ने गोवा के ताजे हालात, राजनीतिक गतिविधियों, मजदूर संगठनों की जानकारी दी। अगले दिन 17 फरवरी को गोवा के प्रसिद्ध स्थल ‘कला सांस्कृतिक भवन’ में गोवा के लेखकों, समाजसेवकों एवं पत्रकारों के साथ एक बैठक हुई जिसमें साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त लेखक डॉ दत्ता नाईक, दिलीप बोरकर, रजनी नैयर (हिन्दी और कोंकणी की लेखक), चितांगी नमन (कवि, युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त), महेश, प्रभु देसाई एवं अन्य प्रतिष्ठित लोग भी मौजूद थे। सभी ने गोवा के ऐतिहासिक-राजनीतिक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लेखकों की हत्याओं के विरोध में गोवा के 30 लेखकों ने अपने सम्मान शासन को वापस किए (इसमें राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान शामिल हैं)। इस बैठक का मकसद गोवा के साहित्यकारों से गोवा के उस पहलू को जानना था जो आमतौर पर पर्यटक के तौर पर आने वाले कभी जान नहीं पाते। गोवा का मुक्ति संग्राम, वहाँ के भौगोलिक और सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को जानने के लिए गोवा के ही विद्वानों को सुनना हम लोगों ने तय किया था और यही किया भी।

डॉ दत्ता नाईक ने अपने उद्बोधन में कहा कि-दुनिया में पर्यटन के लिए विख्यात गोवा में यहाँ के लोगों के लिए रोजगार की काफी कमी है जिससे वे विदेश या भारत के अन्य भागों की ओर पलायन करते हैं। सन् 2012 में खदानों के पूर्णतः बंद होने से पूर्व गोवा खदानों के लिए जाना जाता था। पहले यहाँ खेती भी आजीविका का माध्यम थी। इसके बाद यहाँ सरकारों द्वारा केवल पर्यटन एवं होटल उद्योगों को ही बढ़ावा दिया जाता है जिसने वर्गभेद को और गहरा किया है। युवा कवि नमन ने प्रलेस से बात करते हुए कहा कि दुनियाभर में फिल्मों के द्वारा परोसी गई गोवा की छवि (समुद्री बीच और कसीनो) से इतर आपने इसके भीतर की कलात्मकता, जन-जीवन और संघर्षों की ओर देखने की पहल की, उन्हें करीब से जानने की कोशिश की, यह बेहद सराहनीय है।

गोवा के एटक मज़दूर संगठन के कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन था। प्रेस कॉन्फ्रेंस में हमारे दल ने गोवा के मीडियाकर्मियों से मुलाकात की एवं अपनी यात्रा का उद्देश्य बताया। इसका एक महत्त्व ये भी था कि जिस सनातन संस्था के सदस्यों पर इन तीनों विद्वानों की हत्या का आरोप है, उसका मुख्यालय गोवा में ही है, उस तक भी मीडिया के मार्फ़त ये संदेश पहुँचे कि विचारों को नहीं मारा जा सकता। मीडिया की ओर से प्रश्न पूछा गया कि हत्याओं के इतने वर्षों बाद यह यात्रा क्यों? इसका उत्तर विनीत तिवारी ने देते हुए कहा कि हम अपने प्रदेशों में अनेक तरीकों से (लेखन, भाषण, जुलूस, प्रदर्शन और ज्ञापन) द्वारा विरोध दर्ज करते रहे हैं। हममें से कुछ पदाधिकारी पहले भी आकर शहीद लेखकों के गृहनगरों में आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सेदारी करके गए हैं। लेकिन अब इतने दिनों तक न्यायिक प्रक्रिया की सुन्नावस्था देखकर, शहीद हुए परिवार के लोगों एवं अन्य प्रादेशिक लेखकों के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए इस यात्रा का आयोजन किया, ताकि यह संदेश दूर तक जाए कि इस लड़ाई में हम भी उनके साथ हैं। पत्रकारों को राजेन्द्र शर्मा, हरिओम राजोरिया और सीमा राजोरिया ने भी संबोधित किया। शाम को हम प्रसिद्ध ‘पिलार सेमिनरी म्यूजियम’ को देखने गए। वहाँ फादर कॉस्मे जोस कोस्टा ने म्यूजियम में गोवा की ऐतिहासिकता से संबंधित बारीक जानकारियाँ दीं एवं वहाँ के विद्यार्थियों एवं शिक्षकों से मुलाकात भी करवाई।

18 फरवरी की सुबह ‘द पलोटी इंस्टीट्यूट ऑफ फिलॉसफी एवं रिलीजन’ में विद्यार्थियों से एवं वहाँ के शिक्षकों से भी इस यात्रा और गोवा के विषय पर विस्तृत चर्चा हुई। वैसे तो वह भी ईसाइयत के धार्मिक शिक्षक तैयार करने का इंस्टीट्यूट है लेकिन वहाँ सिर्फ़ धर्मशास्त्रों की ही पढ़ाई नहीं होती। इंस्टीट्यूट के विद्यार्थियों ने साहित्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को लेखकों के सामने रखा। उनके पूछे प्रश्नों पर भी काफी चर्चा हुई। सुसंस्कृति परिहार ने प्रगतिशील लेखक संघ के सुदीर्घ और व्यापक इतिहास से संक्षेप में परिचय करवाया।

18 फरवरी की दोपहर हमने गोवा से, दो दिन में हम सबके बेहद अजीज बन गए कॉमरेड क्रिस्टोफर और कॉमरेड शांति से विदा ली। दो दिनों में इन दोनों ही शख्सियतों ने हम सबको बेहद प्रभावित और प्रेरित भी किया। कभी न भूल सकने वाली शख्सियतें हैं कॉमरेड शांति और कॉमरेड क्रिस्टोफर। अब हम अपनी अगली मंजिल धारवाड़ (कर्नाटक) की ओर रवाना हुए। धारवाड़ पहुँचकर सीधे हम ‘दक्षिणायन संस्था’ की ओर से आयोजित ‘सोशल मीडिया वर्कशाप’ का हिस्सा बने। यहाँ पर प्रसिद्ध समाजसेवी और लेखक प्रो. गणेश देवी मौजूद थे। साथ ही उनकी पत्नी सुलेखा जी और कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों से आये जाने-माने लेखक, कवि, पत्रकार, समाजसेवी और शोधार्थी-विद्यार्थी भी। यहाँ पर जानकारी देना आवश्यक है कि ‘दक्षिणायन संस्था’ प्रो. गणेश देवी एवं अन्यों के प्रयास का वह प्लेटफार्म है जो फासीवाद के बरअक्स लोगों को एक साथ, एकजुट करने का प्रयास कर रहा है। प्रो. एम.एम. कलबुर्गी की हत्या की न्यायिक लड़ाई कर्नाटक के जागरुक लेखक, पत्रकार, समाजसेवी नागरिक मिलकर लड़ रहे हैं। प्रो. गणेश देवी ने हमें ‘दक्षिणायन’ का सविस्तार परिचय कराया। हमारे साथियों के परिचय के बाद, चाय के दौरान सोशल मीडिया वर्कशाप में आये सभी प्रतिभागियों के साथ हमारे दल का लंबा फोटोसेशन चला जो हमारी यात्रा के उद्देश्य एवं प्रतिरोध के साथ खड़े होने के संकल्प की टिप्पणियों के साथ सोशल मीडिया के सभी प्लेटफॉर्मों (फेसबुक, ट्वीटर, वाट्सअप, इंस्टाग्राम, गूगल) पर छाया रहा और अभी भी उपलब्ध है। यहीं पर प्रसिद्ध मार्क्सवादी चिंतक और जाने माने समाजसेवी एस.आर. हिरेमठ जी से मुलाकात हुई। वे बस बाहर जाने से पहले हमसे मिलने के लिए ही इंतज़ार में रुके हुए थे। हिरेमठजी अनेक वर्षों से आदिवासियों के हक़ों और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खि़लाफ लड़ाई लड़ रहे हैं और कर्नाटक के खनन माफिया की रीढ़ पर प्रहार करने के लिए वे देशभर में जाने जाते हैं। यह प्रो. कलबुर्गी का सत्य व ज्ञान से अर्जित स्थान है कि सभी लेखक और अन्य उनके बाद भी उनके सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं।

19 फरवरी की सुबह हम प्रो. कलबुर्गी के घर उनकी पत्नी उमा देवी और उनके पोते अमोघवर्ष से मुलाकात करने पहुँचे। प्रो. गणेश देवी और सुलेखा जी ने ये बैठक तय की थी। वे भी वहाँ थे। छोटे से ड्राइंगरूम में सोफे पर प्रो. कलबुर्गी की तस्वीर के आसपास तरतीब से सँजोया हुआ उनका रचना संसार देख एक क्षण के लिए समय रुक सा गया। प्रो. गणेश देवी ने हमें बताया कि कलबुर्गी जी ने दर्शन, इतिहास और अन्यान्य गूढ़ विषयों पर 120 से अधिक ग्रंथों की रचना की है और वे लिंगायत समाज के सही इतिहास को लोगों के सामने लाने की लड़ाई लड़ रहे थे। श्रीमती उमादेवी के द्वारा बताया गया और अब तक का सुना घटनाक्रम आँखों के सामने से गुजर गया। सचमुच ये पल बेहद भावुक कर देने वाले थे। अपनी एकजुटता जाहिर करने के बाद हमने उमाजी से और अमोघवर्ष से विदा ली और उमाजी ने प्रो. कलबुर्गी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तिका ‘प्रो. एम.एम. कलबुर्गी-द आर्किटेक्ट ऑफ महामार्ग’ हम सभी को भेंट दी।

धारवाड़ में हम आनंद करंदीकर और अरुंधति से भी मिले जो लेखकों को सोशल मीडिया के सार्थक और उद्देश्यपूर्ण उपयोग की जानकारी दे रहे थे। यहाँ हमने शंकर गुहा नियोगी (छत्तीसगढ़ में पूँजीपतियों और माफियाओं के गठजोड़ ने जिनकी हत्या 28 सितंबर 1991 को कर दी थी) पर बनाई फिल्म और एक अन्य लघु फिल्म भी जिसमें वेलेन्टाइन डे पर बजरंग दल के लोगों द्वारा युवाओं पर लाठियाँ बरसाने के प्रतिरोधस्वरूप प्रेम के गहरे और विषद अर्थों को उठाया गया था, देखी। हिरेमठ जी के सहयोगी इकबाल पुल्ली जी ने हमें कर्नाटक के भीतर चल रहे विभिन्न जनांदोलनों की जानकारी भी दी। उन्होंने हमें ‘समाज परिवर्तन समुदाय’ के कार्यालय का भ्रमण भी कराया जो हिरेमठ जी के क्रांतिकारी कार्यों की जमीन है। यहाँ आते-आते हमें लगने लगा था कि हम अपने पड़ोसी राज्यों, उनके लोगों और उनके संघर्षों के बारे में कितना कम जानते हैं और कैसे मुख्यधारा मीडिया हमें न जानने देने की साजिशें रचता है। हमारी यात्रा का उद्देश्य विस्तृत हो गया था। हम नई बातें सीख रहे थे और अपने कार्यक्षेत्र में नये कामों को करने की प्रेरणा से भर रहे थे।

धारवाड़ से चलकर शाम होते-होते हम कोल्हापुर में थे। यहाँ प्रो. मेघा पानसरे (कॉमरेड गोविन्द पानसरे की बहू) और उनके बेटे कबीर और मल्हार से बेहद आत्मीय मुलाकात हुई। 20 फरवरी को सुबह 7.30 बजे हम कॉमरेड पानसरे के घर के सामने से प्रारंभ होने वाले ‘निर्भय मार्निंग वॉक’ में शामिल होने पहुँचे। ‘निर्भय मार्निंग वॉक’ का आयोजन कॉमरेड पानसरे की हत्या के बाद से उनके सहकर्मियों, साथी कार्यकर्ताओं, मॉर्निंग वॉक के साथियों और वे सब भी जो इस प्रतिरोध में शामिल हैं, ने किया है। वे हर माह की 20 तारीख को (20 फरवरी को ही उनकी हत्या हुई थी) कोल्हापुर के अलग-अलग क्षेत्रों में जुलूस निकालते हैं। कॉमरेड गोविंद पानसरे और कॉमरेड उमा पानसरे को तभी गोली मारी गई थी जब वे अपने घर से बाहर मॉर्निंग वॉक पर निकले थे। उनकी हत्या को दो साल पूरे हो गए लेकिन देशभर में लोगों के तीव्र प्रतिरोध के बावजूद शासन हत्यारों को पकड़ तक न सकी। इस पूरी रैली का सबसे याद रह जाने वाला नारा था - आम्बी सारे, पानसरे। कई जनगीतों के साथ यह रैली चलती रही। लोग नारे लगाते जा रहे थे। एक जनगीत की दो पंक्तियां अभी भी गूंज रही हैं- ‘गोल्या लाठी घाल्या, विचार नहीं मरणार’, मराठी से अधिक परिचित न होने पर भी यह याद है, अपने अर्थ के साथ। यह यात्रा बिन्दु चैक पर जाकर पूरी हुई। यहाँ उस स्कूल के सभी विद्यार्थी और शिक्षक मौजूद थे जिसमें कॉमरेड पानसरे पढ़े भी थे और जहाँ उन्होंने पढ़ाया भी था। सबने कॉमरेड पानसरे के हत्यारों के पकड़े जाने की लड़ाई को जारी रखने और उनके बनाए मूल्यों को जीवन में अपनाने की शपथ ली। इस जुलूस में भारी संख्या में कोल्हापुर के नागरिक, मीडियाकर्मी, मार्क्सवादी कार्यकर्ता और सभी सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल थे। इस ‘निर्भय मॉर्निंग वॉक’ रैली का प्रतिनिधित्व एन.डी. पाटिल (सुविख्यात मार्क्सवादी विचारक और समाजसेवी) ने किया। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि - यह रैली चुनौती है हत्यारों को और उन्हें बचाने सत्ता में बैठे लोगों को कि हम भयभीत नहीं हैं।

वहाँ से लौटकर हमने कॉमरेड पानसरे की पत्नी उमादेवी से उनके घर आकर मुलाकात की। इसके बाद हमारी बैठक कॉमरेड पानसरे द्वारा स्थापित ‘श्रमिक प्रतिष्ठान’ के कार्यालय में हुई। वहाँ कॉमरेड दिलीप पवार, कॉमरेड एस. बी. पाटिल और कॉमरेड पानसरे के अन्य सहयोगियों और साथियों ने पानसरे जी के जीवन, उनके कार्यों, संघर्षों और निर्भयता के साथ मंजिल पाने तक डटे रहने की क्षमताओं और कार्यप्रणाली पर प्रकाश डाला। किसी महान व्यक्तित्व के जीवन और उनके कामों से जुड़ी छोटी-छोटी बातें भी बेहद महत्त्वपूर्ण होती हैं और वे एक न देखे, न मिले हुए व्यक्ति को भी आपके सामने ला खड़ा करती हैं। इस बातचीत के दौरान ऐसा ही महसूस हो रहा था। पानसरे जी की लिखी पुस्तकें ‘शिवाजी कौन है?’ और ‘राजर्षि शाहू की शिक्षा नीति’ पुस्तकें भी उन्होंने हमें भेंट में दीं। एक ख़ास बात और देखने को मिली कि कार्यालय में कॉमरेड पानसरे जिस कुर्सी पर बैठते थे, वह दो साल बाद आज भी उनकी याद में खाली रखी गई है।

मेघा जी ने हमें कोल्हापुर विश्वविद्यालय में भ्रमण का अवसर भी दिया। वे ‘रूसी अध्ययन’ विभाग की प्रमुख भी हैं। उनके विभाग में ही बैठकर थोड़ी देर बातचीत कर, मेघा जी के बताए अनुसार हमने मराठी के विख्यात साहित्यकार ‘विष्णु सखाराम खांडेकर स्मृति संग्रहालय’ का भ्रमण भी किया। यहाँ करीने से सँजोई कवि की स्मृतियों के प्रतीकों ने एक बार फिर हमारे प्रदेश के कवियों की याद दिलाई। हमारे खाते में जो सुभद्रा कुमारी चैहान, माखनलाल चतुर्वेदी, हरिशंकर परसाई जैसे अनेक नाम हैं लेकिन इस तरह से सँजो सकने का हुनर नहीं। किसी साहित्यकार का वि.वि. में इतना सम्मानजनक स्थान पाना, हम लोगों के लिए अत्यंत सुखद अनुभव था। सिर्फ संग्रहालय ही नहीं, विश्वविद्यालय में जहाँ-तहाँ दीवारों पर भी मराठी साहित्यकारों के ‘मूल्य वाक्य’ सूक्तियों के रूप में तस्वीरों के साथ दिखे।

तीन बजे हमारी मुलाकात ‘साहू स्मारक भवन’ में कोल्हापुर के प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों से हुई। पत्रकार वार्ता को राजेन्द्र शर्मा, विनीत तिवारी, सुसंस्कृति परिहार, हरिओम राजोरिया ने संबोधित किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस समाप्त होते-होते कार्यक्रम का समय हो गया था जिसमें भारी संख्या में कोल्हापुर और बाहर के लोग भी उपस्थित थे। इतनी तादाद में लोगों की उपस्थिति कॉमरेड पानसरे की लोकप्रियता और उनके विचारों के समर्थन को प्रमाणित करने वाली थी। कार्यक्रम की शुरूआत फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जनगीत

‘ऐ ख़ाकनशीनों उठ बैठो, वो वक्त़ क़रीब आ पहुँचा है।
अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें, अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं,
जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जाएँगे...’

को हमारे साथियों हरिओम राजोरिया, सीमा राजोरिया, तरुण गुहा नियोगी, हरनाम सिंह, राजेन्द्र शर्मा और विनीत तिवारी ने गाकर की।

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. गणेश देवी, मुख्य वक्ता जाने-माने पत्रकार निखिल वागले, हमीद दाभोलकर और विनीत तिवारी मंच पर मौजूद थे। स्वागत की परंपरा के बाद मेघा पानसरे ने मंचासीन अतिथियों का परिचय कराया साथ ही म.प्र. प्रलेस के लेखकों की यात्रा के उद्देश्य को भी श्रोताओं के सामने व्यक्त किया और कहा कि - देश के जागरुक चिंतक, कवि, कलाकार भी हमारे साथ हैं। दो साल बाद भी हत्यारे पकड़े नहीं गए। लेकिन इन शहीदों के रास्ते पर चलने वाले हम भी थके नहीं हैं। यह लड़ाई न्याय पाने तक थमने वाली नहीं है।

हमीद दाभोलकर ने अपने उद्बोधन में स्पष्ट रूप से कहा कि -तीनों ही शहीदों के हत्यारे ‘सनातन धर्म संस्था’ और ‘हिंदू जन जागरण समिति’ से हैं और प्रमाणों के बावजूद वे खुले घूम रहे हैं। प्रलेस महासचिव और म.प्र. प्रलेस लेखक यात्रा दल के मार्गदर्शक विनीत तिवारी ने देश में दिनोंदिन बढ़ते कट्टरवाद व विचारों पर हमले के अन्य उदाहरणों को सामने रखते हुए जोर देकर कहा कि एक लेखक या एक अकादमिक विद्वान के भीतर अनेक पुस्तकों का निचोड़ और सदियों की संचित ज्ञान निधि होती है। अगर राज्य नागरिकों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाता तो हम नागरिक ऐसे राज्य से लोकतंत्र की रक्षा करने के एपाय अपनाएँगे लेकिन हम अब और किसी को भी खोने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हमें इस यात्रा के अनुभवों ने और भी अधिक निर्भीक, मजबूत और ज़िम्मेदार बनाया है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रतिष्ठित पत्रकार निखिल वागले ने सत्ता के इशारों पर काम करने में लगी पुलिस मशीनरी के एक और पहलू को उजागर करते हुए वह नोटिस जो पुलिस की तरफ से कार्यक्रम में आने से पूर्व उन्हें दिया गया, जिसमें लिखा था कि वे पानसरे स्मृति के कार्यक्रम में किसी व्यक्ति या संस्था का नाम लेकर आरोप नहीं लगाएँगे और ऐसा कुछ भी नहीं कहेंगे जो लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाए, अन्यथा उन्हें पुलिस गिरफ़्तार कर सकती है। ऐसा ही नोटिस आयोजकों को भी दिया गया था। ढेर सारे पुलिस वाले अधिकारी, कर्मचारी, थानेदार और सिपाही कार्यक्रम स्थल पर हॉल के अंदर-बाहर मंडरा रहे थे। निखिल वागले ने मंच से पुलिस, प्रशासन और सत्ताधीशों को करारा जवाब देते हुए कहा कि उन्हें किन लोगों की भावनाओं की चिंता है। वे ऐसे नोटिस हत्यारों को पैदा करने वाली संस्थाओं और समितियों को क्यों नहीं देते जो विचारों को स्थापित करने के नाम पर हत्या करने, हुड़दंग मचाने का काम करते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस की मंच से आलोचना करते हुए कहा कि वो महाराष्ट्र में लोकतंत्र को क्या मजाक बना देना चाहते हैं?

अंत में कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. गणेश देवी का वक्तव्य हुआ। उन्होंने कहा कि- आज के हालात अघोषित आपातकाल जैसे ही हैं। केन्द्र सरकार हर क्षेत्र में स्वतंत्र विचारों का विरोध लाठी डंडे के साथ करती है। उन्होंने एफटीआईआई, चेन्नई के आंबेडकर, फुले और पेरियार के विचारों पर मनन करने वाले चेन्नई स्टडी सर्कल, जेएनयू, रोहित वेमुला और नजीब को याद करते हुए कहा कि विचार को गुलाम बनाने की कोशिशें कामयाब नहीं होंगी। उन्होंने कहा कि देश में ही नहीं दुनियाभर में फासीवादी प्रवृत्तियाँ उभर रही हैं और ये मानवता के लिए खतरा हैं। आज की सबसे बड़ी जरूरत फासीवाद विरोधी विचारों, व्यक्तियों और संगठनों के एकजुट होकर कट्टरपंथियों का प्रतिरोध करने की है।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मेघा पानसरे और अन्य साथियों से विदा लेकर और साथ रहने की प्रतिज्ञा को दोहराते हुए हम वापसी की ओर चल पड़े। हमारे कुछ साथियों ने सतारा स्टेशन से और कुछ ने पुणे से वापसी की राह पकड़ी। इस 14 से 20 फरवरी की यात्रा ने हमारे अनुभव संसार को बढ़ाया और विचारों की आजादी के लिए लड़ने के हमारे संकल्प को मजबूत किया। इस छोटी-सी यात्रा के बीच हम वैचारिक, सांगठनिक और अद्भुत समाहारी, प्रेरणादायी व्यक्त्तिवों से मिले। उनके कार्यों को जाना। समाज के लिए अड़े रहने की शक्ति और उससे हासिल की जा सकने वाली खुशी से भी परिचित हुए। इस यात्रा का खाका महासचिव विनीत तिवारी ने बनाया था। इस तरह की यात्रा की सोच उनकी वैचारिकता और देशभर में फैले उनके ज़मीनी संपर्कों का परिणाम है। यात्रा को उनके सांगठनिक और व्यक्तिगत सूत्रों, परिचयों और हर शहर में उनके अभिन्न मित्रों के सहयोग ने अधिक मूल्यवान बनाया। इन सात दिनों में हम सब शाम को अपने दिनभर के कार्यों, मुलाकातों और रोजमर्रा में नए-नए मिलने वाले अनुभवों पर चर्चा करते। कई बार कुछ मुद्दे अचानक आ जाते और घंटों साथियों के बीच उन पर बहसें होती रहीं। शिक्षा, साहित्य, रिश्ते, सामाजिक स्थितियों पर होने वाले विचार-विमर्श और जनगीतों, शास्त्रीय संगीत से लेकर फ़िल्मी गाने तक सफ़र का हिस्सा बनते रहे। इस सफ़र के दौरान साथियों के बीच अनेक विषयों पर हुईं बेहद दिलचस्प चर्चाएँ और सोच के दायरों को विस्तृत करने वाली गर्मागर्म बहसें भी स्मृति में रहेंगी।

सात दिन तक लगभग 14 से 16 घंटे जिन साथियों के साथ गुजारे, उनके व्यक्तित्व के भी कुछ नये पहलुओं को जानने का मौका मिला। इतने दिनों तक कोई भी सिर्फ़ औपचारिकता का आवरण ओढ़कर नहीं रह सकता। बाहर के भले लोगों से हुई मुलाकात ने जहाँ हमें भी बेहतर बनाने का काम किया, वहीं अपने ही साथियों के साथ बने जीवंत और अनौपचारिक संपर्क ने एक संगठन के तौर पर भी हमें समीप किया। अपने साथियों पर लिखने का काम कभी अलग से।

हमारे 14 से 21 फरवरी की यात्रा के बीच हुए कार्यक्रमों की प्रेस, इलेक्ट्रानिक मीडिया, ऑनलाइन मीडिया और सोशल मीडिया पर छपी खबरें साथियों द्वारा अभी तक प्राप्त हो रही हैं। हमारे बाहर के देखे अनुभव खासकर मीडिया ने हमें उनकी तुलना अपने प्रदेश से करने पर बार-बार मजबूर कर देते हैं। गोवा, कर्नाटक और महाराष्ट्र में कार्यक्रमों के हुए विशद, विस्तृत, शुद्ध और ‘जैसा कहा गया वैसा ही लिखा गया’, इन कवरेज ने मीडिया पर खोता जा रहा विश्वास फिर से जगा दिया। हम अद्भुत जीवट वाले निडर लोगों से मिले। यह सोच अधिक दृढ़ हुई कि विचार और तर्कशील कर्म का साथ देने और अन्याय का प्रतिरोध करने के निडरता और सच्चाई ही सच्चे हथियार हैं। इनकी ताक़त को हमने अलग-अलग रूपों में बहुत ही नज़दीक से महसूसा। इस पूरी यात्रा का उल्लेख विनोद के उल्लेख के बिना पूरा नहीं होता जो यूँ तो सिर्फ़ हमारे वाहन चालक थे लेकिन यात्रा समाप्त होते-होते वे हमारे साथी बन गए। इससे हमारा ये विश्वास भी पुख्ता हुआ कि अगर हम अपने विचार योजनाबद्ध रूप में आम लोगों के बीच लेकर जाएँगे तो लोग तार्किक विचारों को सुनने- समझने और अपनाने के लिए तैयार होते हैं।

-आरती