रविवार, 25 अक्तूबर 2020

नवीन सागर एक बड़ी कहानी जैसे हैं, जिसका एक टुकड़ा हमने बयान किया; बाकी टुकड़ा कोई दूसरा बयान करेगा

“अभी बेड रेस्ट पर हूँ। रेस्ट तो बेड ही कर रहा है मैं तो उस पर एक बीड़ी के लिए तरसती हुई घुटन सा पड़ा हूँ। माँ आ गयी है। जो दिन में पच्चीस बार मेरे कमरे में डरकर झाँकती है। वे भगवान से नाराज़ हैं। कि उन्हें कभी कोई बीमारी नहीं हुई जबकि उनके बेटों को कुछ भी हो जाता है।” एक पत्र में नवीन सागर। 

ऊपर ही उपर से देखने पर उपर्युक्त पत्रांश ममता की जीवनी है। माँ होने की करुणा। लेकिन हिंदी साहित्यिक जगत में यह माँ, हिंदी कहानी है। नवीन सागर कहानीकार। इससे अधिक क्या कहा जा सकता है कि नवीन सागर (29 नवंबर 1948 – 14 अप्रैल 2000) का पहला कविता संग्रह ‘नींद से लंबी रात’ उनके जीवन के 48वें साल 1996 में प्रकाशित हुआ। कहानीकार (पहला संग्रह ‘उसका स्कूल’ 1989) के रूप में आज उनका कहीं नाम नहीं लिया जाता। जबकि अनेक कुलेखकों की कट्टा भर किताबें प्रकाशित हैं। कई अलेखकों के घर पुरस्कारों से भरे हैं। यह अनायास ही होगा कि जिन्होंने नवीन सागर को पढ़ा होगा फिर चाहे कविताएँ हों या कहानियाँ उन्हें मुक्तिबोध, रेणु और स्वदेश दीपक की याद आ जायेगी। रेणु को अपना उपन्यास ‘मैला आँचल’ खुद छपवाना पड़ा। कालांतर में उन्हें आंचलिक कथाकार के अकादमिक बस्ते में डाल दिया गया। स्वदेश दीपक का कहीं कोई समाचार नहीं है कि वे अब कहाँ हैं ? मुक्तिबोध के बारे में यह तसल्ली की बात हो सकती है कि साहित्य-समाज कम से कम जानता तो है कि उनके साथ क्या-क्या हुआ ! यहीं यह दर्ज़ करना उपयुक्त होगा कि कहानीकार नियति में मुक्तिबोध और नवीन सागर में मार्मिक साम्य है। आज तक मुक्तिबोध को कहानीकार की तरह नहीं पुकारा जाता जबकि उन्होंने नयी कहानी के दौर के किसी कहानीकार से कम यादगार कहानियां नहीं लिखीं। यही कहानीकार नवीन सागर के साथ है। बतौर लेखक नवीन सागर की पहली महत्वपूर्ण किताब ‘उसका स्कूल’ कहानी संग्रह ही है। इस संग्रह की कहानियाँ सत्तर-अस्सी के दशक के किसी हिंदी कहानीकार की कहानियों से कमतर नहीं हैं। बल्कि कहना चाहिए कि नवीन सागर के कहानीकार की उपेक्षा का उनके समकालीन कहानीकारों को फ़ायदा ही मिला। नवीन सागर की कहानियों की भूमि वाली उनसे कमज़ोर कहानियाँ चर्चा में बनी रहीं। 

नवीन सागर ऐसे हैं भी कि अगर उनकी कविताओं का ध्यान करें तो कहानियों के बारे में मन चला जाता है। अगर कहानियों पर राय बनाने बैठें तो कविताएं दोहराने का दिल हो आता है। कहीं जो कविता कहानी दोनों के विषय में खुद को समेटने के प्रयास में बैठें तो उनका बाल साहित्य और चित्र आमंत्रित करने लगते हैं। इतना ही नहीं इंसान नवीन सागर का प्रेम, मैत्री, सपने, बड़प्पन, परिश्रम अपने जादुई प्रभाव में ही खींच लेते हैं। हृदय में लालसा भर जाती है काश ! हम भी नवीन सागर हो पाते। कुछ-कुछ हम भी ऐसी ही फितरत वाले हैं हाय पूरे ही नवीन सागर क्यों न हुए! वैसे ही सुदर्शन होते। वैसे ही दोस्त, प्रेमी, पिता और मेज़बान हो पाते। नवीन सागर को कम उम्र मिली तो क्या हुआ जीवन-लेखन ऐसा ही जिजीविषा-संवेदना से भरा होना चाहिए। कमाल की बात यह है कि यह सब मेरे भीतर की फीलिंग्स हैं। मैं नवीन सागर से कभी मिला नहीं। मैंने नवीन सागर को कभी दूर से भी नहीं देखा। बल्कि कहिए नवीन सागर यह नाम ही मैंने उनकी मृत्यु के 10 साल बाद सुना। लेकिन जब सुना, पढ़ा और जाना नवीन सागर मेरी आत्मा के मित्र हो गए। इस प्रेम में डूबते चले जाने में जिन लेखकों व्यक्तियों का बड़ा हाथ है उनमें से कुछ के नाम हैं- विष्णु खरे, कमला प्रसाद, ज्योत्सना मिलन, उदय प्रकाश, विष्णु नागर, राजकुमार केसवानी, मुकेश वर्मा, विनीत तिवारी, प्रयाग शुक्ल, समता सागर, और स्वयं नवीन सागर का रचना संसार। 

विरले साहित्यकार हुए हैं जिन्होने कविता, कथा, बाल साहित्य, चित्रकला चारों प्रकार की मिट्टी में अपने लेखकीय श्रम, कला प्रतिभा, रचनात्मकता और प्रतिबद्धता से संवेदना, मनुष्यता, सौंदर्य, शिल्प, प्रयोग, व्यंजना का हरापन पैदा किया, भावत्मकता को सींचा और उसे विचार पुष्ट लहलहाया है। जाने-माने कवि समीक्षक विष्णु खरे नवीन सागर के बारे में लिखते हैं- “यदि हम मुक्तिबोध को सूर्य मानें और शमशेर बहादुर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल और नवीन सागर को उनसे अपने-अपने तरीक़े से ऊर्जा पाने वाले ग्रह तो हम पायेंगे कि स्वायत्त होते हुए भी, शमशेर अपनी परिक्रमा में मुक्तिबोध के सबसे नज़दीक आ जाते हैं, विनोद उनसे कम और नवीन विनोद से भी कम।“ विष्णु खरे अपनी इसी बात को अधिक स्पष्ट करते हुए फिर एक जगह लिखते हैं- “मुक्तिबोध और नवीन सागर को परस्पर समकक्ष ठहराना दोनों के प्रति एक मूर्खतापूर्ण अन्याय होगा लेकिन निम्नमध्यमवर्गीय विपन्नता, यंत्रणा, असुरक्षा, आतंक और अकेला कर दिए जाने को दोनों अपनी कविता में मार्मिक रूप से लाते हैं।“ 

किसी कहानी की इससे बेहतर समीक्षा नहीं हो सकती कि उसे सुना दिया जाये। कहानी सुनाने में अगर यह प्रयत्न शामिल हो कि कहानी बिल्कुल वैसे ही सुनाई जाये जैसी कि वह है यानी कहानी का कोई संकेत, मंतव्य और मर्म छूटने न पाये तो कहने की ज़रूरत नहीं कि कहानी भूलने लायक नहीं है। यदि कहानी सुनाने की यह अभिलाषा और लालसा किसी ग़ैर पेशेवर वाचक, आलोचक, नागरिक, शिक्षक और पालक में मिले तो समझिए कहानी सफल है। अकादमिक जगत में, आलोचकों की दुनिया में उस कहानी का चाहे जो मूल्यांकन होता हो या फिर हुआ ही न हो फिर भी वह कहानी बड़े काम की है। ऐसी कहानियों की ज़रूरत समाज को हमेशा पड़ती है। बल्कि कहना चाहिए ऐसी कहानियों से ही समाज अपने भीतर झांकता है। बदलाव लाता है। इसे मज़बूती से कहना चाहिए कि नवीन सागर के पास ऐसी सुनाने की आकांक्षा पैदा करने वाली कहानियों की संख्या ही अधिक है। उनके पास अविस्मरणीय कहानियों की संख्या भी उन कहानीकारों से कम नहीं हैं जिन्होंने सत्तर-अस्सी के दशक में कहानीकार की प्रसिद्धि हासिल की। इतना ही नहीं नवीन सागर की कहानियाँ पढ़ते हुए अमरकांत, विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश, स्वयं प्रकाश, शिवमूर्ति की बरबस याद आती रहती है। कहीं-कहीं भावनात्मक रूप से लगता है कि नवीन सागर ऐसा ही चमकता कहानी का एक नक्षत्र था जो असमय आसमान से टूट गया। मृत्यु ने इस गहरी नवीन कथायात्रा को बीच में ही रोक दिया। यद्यपि नवीन सागर का एक ही कहानी संग्रह ‘उसका स्कूल’ जानने में आता है। लेकिन उनकी जो कहानियाँ पढ़ने के बाद हमारे मन में टंक जाती हैं और अपने वक्त को पहचानने के लिए हमें दृष्टि देती हैं उनमें से कुछ के नाम हैं- उसका स्कूल, मोर, पत्थर, घोड़ा का नाम घोड़ा, तीसमार खाँ, लौटा तो कहीं नहीं, मूँछ, माँ, अंतहीन, हत्यारा, किसी की शक्ल, बोझ, घर, क्षेपक, अपनी ज़मीन और सत्यकथा। किसी एक संग्रह वाले कहानीकार की इतनी महत्वपूर्ण कहानियों की फेहरिश्त समय-समाज की ही नहीं हिंदी कहानी आलोचना की कहानी भी कहती है। 

इससे पहले कि नवीन सागर की कुछ उल्लेखनीय कहानियों की विवेचना करें उनकी कहानियों की उन विशेषताओं का उल्लेख आवश्यक है जिनसे यह जानने में आसानी हो कि नवीन सागर की कहानियां कैसी हैं- 

1. नवीन सागर की कहानियों में फैंटेसी मिलती है। यह फैंटेसी कहानियों के देशकाल को विस्तृत कर देती है। इन्हें पढ़ते हुए मुक्तिबोध की याद आना स्वाभाविक है। 

2. नवीन सागर की कहानियों में प्रतिबद्धता और विचार वैसे ही हैं जैसे कुम्हार की सानी हुई मिट्टी से बने बर्तन में रूप। कहना मुश्किल ही रहेगा कि बर्तन का यह रूप पानी से मिला, चाक से, मिट्टी से, हाथों से या फिर आंवा की आग से। 

3. संवेदना, उसूल और सुधार नवीन सागर की कहानियों के केंद्र में हैं। शायद ही कोई ऐसी कहानी मिले जिसके कथा चरित्रों से हमारी संवेदना का रिश्ता न बन जाये। 

4. नवीन सागर की कहानियों की भाषा में काव्यात्मकता वहीं है जहाँ काव्यात्मक स्थल हैं। संवाद ऐसे हैं कि यकीन हो जाता है जीते जागते इंसानों की बातचीत चल रही। बिल्कुल वैसा ही टोन, विट और ह्यूमर। 

5. यथार्थ को नवीन सागर ने कहानियों में वैसे ही बरता है कि उनकी कहानियाँ बिल्कुल यथार्थ लगती हैं लेकिन यथार्थ की मात्रा उतनी ही है जैसा कि नामवर सिंह कहते हैं कि यथार्थ नमक की तरह होता है उसे कहानियों में वैसे ही इस्तेमाल करना चाहिए। 

6. नवीन सागर की कहानियों में व्यंग्य नहीं मिलेगा लेकिन भाषा हँसमुख मिलेगी। कहीं कहीं इतनी विनोदिनी भाषा कि हँसते–हँसते पेट में बल पड़ जायें। मन निर्मल हो जाए। इसी बीच आँखों के कोर भी भीग जायें। 

7. मनुष्यता, बराबरी, न्याय, प्रेम, मैत्री, सहकार और परिवर्तनकामना नवीन सागर की कहानियों में सहज मिलते हैं। मर्म, व्यंजना और चोट की अप्रतिम कहानियों के कृतिकार हैं नवीन सागर। 

8. नवीन सागर की कहानियों में आज की हिंदी कहानी में लगभग अनुपस्थित किस्सागोई मिलती है। 

‘उसका स्कूल’ नवीन सागर की कुछ-कुछ वैसी ही मार्मिक कहानी है जैसी स्वयं प्रकाश की ‘बलि’, शिवमूर्ति की ‘केशर कस्तूरी’ और प्रकाशकांत की ‘अमर घर चल’। चूँकि कोई भी दो कहानियाँ एक सी नहीं होतीं इसलिए कुछ-कुछ वैसी ही कहने का अभिप्राय यह है कि इस कहानी में आयी व्यवस्था विडंबना, सामाजिक निरुपायता और मानवीय दुख बोध भी वैसे ही हैं। ‘उसका स्कूल’ एक घरेलू नौकरानी की बच्ची की कहानी है। बाई, मालिक के आग्रह पर जो प्रोफेसर हैं अपनी बच्ची को उनके घर में बच्चों की देखभाल के लिए भेजना शुरू कर देती है। प्रोफेसर की पत्नी को नयी नयी नौकरी मिली है। उसके सामने शर्त है कि वह नौकरी छोड़ दे या कोई छोटे बच्चों की देखभाल करे। नौकरानी की बच्ची इसके लिए तैयार नहीं है। वह स्वयं स्कूल जाना चाहती है। उसे स्कूल प्यारा है। बच्ची की माँ उसे मनाती है। बच्ची बेमन से जाती है। एक दिन वह अपना बस्ता भी ले जाती है। वहाँ उसकी किताबें फट जाती हैं। बच्ची रोती है। माँ को बताती है। माँ उसे डाँटती है -बस्ता लेकर क्यों गयी ? बच्ची के मना करने के बावजूद मजबूर माँ बेटी को प्रोफेसर के घर बच्चों की देखभाल के काम में भेजती है। इसी में बच्ची का अपना स्कूल छूट जाता है। बच्चों की देखभाल में लगाये जाने के कारण किसी बच्ची का स्वयं पढ़ न पाना, अभिलाषा के बावजूद उसके स्कूल छूट जाने की यह कहानी पढने-सुनने वाले का मन भिगो देती है। यहीं ऊपर की वह बात दुहराई जा सकती है कि सुनाने लायक कहानी है ‘उसका स्कूल’। जो पढ़ेगा, सुनाना चाहेगा। जो सुनेगा, वह समझ लेगा। कहानी भीतर रह जायेगी। स्कूल न जा पा रही बच्ची बार-बार याद आयेगी। यहीं लगता है नवीन सागर बच्चों का मसीहा कथाकार है। आज शिक्षा और बच्ची की माँ में कोई अंतर नहीं। 

‘घोड़े का नाम घोड़ा’ ऐसी प्यारी कहानी है कि जान फूँक दे। ऐसा गुदगुदाए कि मनहूस भी हँस पड़े। कठोर से कठोर हृदय इंसान भी बच्चों पर जान छिड़कने लगे। कहीं कोई अपने बेटे-बेटी से दूर रहता हो तो रो ही पड़े। इस कहानी की भाषा और मर्म जहाँ एक ओर रवींद्र नाथ ठाकुर की याद दिलाते हैं तो दूसरी ओऱ मन्नू भंडारी की। कहानी क्या है बाल-किशोर मन, खिलौनों, बचपन, भाई-बहन, माँ-बाप, पास-पड़ोस, बालश्रम, सख्य भाव और स्मृतियों की करुणा भरी हिरनी है। जिसके साथ-साथ मन दौड़ता जाए मगर थके-भरे न। अंत में पछताए हाय ओझल हो गयी। कहानी की शुरुआत से पहले ही दर्ज़ नोट मानीखेज है- यह दुनिया एक बड़ी कहानी जैसी है, जिसका एक टुकड़ा हमने बयान किया। बाकी टुकड़ा कोई दूसरा बयान करेगा। ‘घोडे का नाम घोड़ा’ मूलत: एक लड़की की कहानी है जो खिलौने बनाकर बेचने वाले लड़के से एक घोड़ा खरीदती है। वह जैसे ही घोड़ा घर लाती है भाई उसे पाना चाहते हैं। पड़ोस की एक प्यारी लड़की उसे लेना चाहती है। मगर घोड़ा लड़की को बहुत प्रिय है। लेकिन एक दिन ऐसा होता है कि उसे वह घोड़ा पड़ोस की दोस्त लड़की को देना पड़ता है। आगे की कहानी इसी खिलौना घोड़े के साथ साथ एक पूरी प्यारी स्मृति का चक्र पूरा करती है। घोड़ा खरीदने का यह शुरुआती अंश ही कहानी की सामर्थ्य, प्रभाव का पता देता है- 

वह विनती करता सा बोला, “दोनो ले लो, नहीं तो जोड़ी टूट जायेगी।” 

मैंने कहा, “जोड़ी टूट जायेगी तो क्या अकेला घोड़ा तुम्हारे पास रोयेगा ?” 

वह बोला, “एक आपके पास भी रोयेगा।” 

मैंने कहा, “मैं उसके आँसू पोंछ दूँगी।” 

वह मुस्कुराने लगा तो देखा उसके आगे के दो दाँत नहीं हैं। 

मैंने पूछा, “तुम्हारे दो दाँत कहाँ गये ?” 

वह बोला, “मैं जब सो रहा था चूहे ले गये।” 

अच्छा ! मैंने कहा, “बाकी दाँत क्यों छोड़ गये ?” 

वह हँसकर बोला, “वे जल्दी में थे पिर कभी आकर बाकी भी ले जायेंगे।” 

‘मोर’ नवीन सागर की ही नहीं हिंदी की मील का पत्थर कहानी है। इसके बारे में आलोचक कमला प्रसाद ने बिल्कुल ठीक लिखा है- ‘मोर’ यथार्थ की कालातीत गाथा है। वे आगे लिखते हैं ‘यह विजयदान देथा की कथा परंपरा की याद दिलाती है। मोर लोक की वाचिक परंपरा से अपना शिल्प गढ़ती हुई अपने प्रभाव को लोककथा के प्रभाव के समकक्ष निर्मित कर लेती है।‘ इस कहानी में हिंदी कहानी की लुप्त होती पठनीयता और किस्सागोई है। संभवत: ‘मोर’ आपातकाल के दौर को बयान करती हिंदी की सबसे सशक्त प्रतीकात्मक कहानी है। इस कहानी का थानेदार पुलिसिया क्रूरता, हिंसा, हत्या का चरम निष्करुण रूप संभव करता है। यद्यपि कहानी का नायक अमर लोक नायक ‘मोर’ ही है लेकिन मुख्य पात्र हुल्ले काछी है जो मोर की हत्या का ज़िम्मेदार पुलिस को मानता है। वह थाने जा जाकर जीवन पर्यंत जब तक कि मार नहीं दिया जाता थानेदार को गालियाँ देता है, धिक्कारता है। उसे बार-बार पीटा जाता है, घसीटा जाता है, उसकी पत्नी, उसे भी मार तक दिया जाता है मगर वह यह विरोध-भर्त्सना जीवित रहते नहीं छोड़ता भले थानेदार बदल गये, भले दवा तक के पैसे नहीं, भले अंग-अंग भंग किये गये। कहानी के अंत में उसी कुएँ से जिसमें हुल्ले काछी की गर्भवती पत्नी मरी थी लंबे अरसे बाद बाल्टी में फँसकर एक सांवला बच्चा निकलता है। पूछने पर वह बताता है कि मैं हुल्ले काछी का बेटा हूँ। लेकिन इतना लंबा वक्त गुज़र चुका है कि लोग हुल्ले काछी, थाने सब को भूल चुके हैं। यहीं प्रतिरोध अखंड और सार्वभौमिकता प्राप्त कर लेता है। उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानी ‘टेपचू’ की याद आ जाती है। 

नवीन सागर की कहानियाँ अपने वक्त की सीमा को लाँघकर आज की कहानियाँ लगती हैं। इसका कारण यही समझ में आता है कि कहानीकार ने यथार्थ को समाज, देश, व्यवस्था, नागरिकों, संबंधों, प्रेम, सपनों, बदलाव, सुधार, निर्माण की ऐतिहासिक धारावाहिकता में गलाया है। समाजवादी निष्ठा से भरे कहानीकार नवीन सागर दृष्टि संपन्न कथाकार हैं। उनके कथा कौशल में दृष्टा होना मुख्य है। वे विचार-सिद्धांत का अनुयायी या प्रवक्ता प्रतीत नहीं होते। उनमें दार्शनिक तटस्थता, कलाकार की उदारता और कवि की हृदयस्पर्शिता तथा कहानीकार की कल्पना एवं परकाया प्रवेश सामर्थ्य हैं। जैसा कि अक्सर होता है नवीन सागर की कहानियाँ किसी एक भाव, घटना, दृश्य, विचार, प्रसंग की फोटोग्राफ़ या वीडियो या इतिवृत्त या स्टोरी नहीं हैं बल्कि वे उस किस्सागो के आख्यान की तरह हैं जो जानता है कि कुछ चीज़ें अवश्य बदल जायेंगी लेकिन कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलेंगी। मनुष्य समाज में जो सतत प्रवहमान रहते हैं उस सभ्यता, संवेदना, संबंधों, प्रतिरोध, एकाकीपन, अदम्य मनुष्यता, मैत्री को नवीन सागर की कहानियों में अपराजेय स्थान मिला है। यही कारण है कि भाषा, शिल्प, प्रयोग और किस्सागोई को नवीन सागर ने कभी नहीं छोड़ा। बल्कि वे उसे पुनर्नवा करते रहे। 

नवीन सागर की कहानियाँ ‘पत्थर’, ‘तीसमार खाँ’ और ‘लौटा तो कहीं नहीं’ बीते समय की ही दस्तावेज़ी कहानियाँ नहीं है। आज का भारत जिस हिंसा, बेकारी, नागरिक अकेलेपन, सांस्कृतिक विघटन, लोकतांत्रिक पूँजीवाद, धार्मिक राष्ट्रवाद, धूर्त बड़बोलेपन, उपमहाद्वीपीय स्वप्न भंग की गिरफ्त में हैं उसे डिकोड करने की दृष्टि से भी उल्लेखनीय हैं। मेरे विनम्र मत में देर से ही सही यह नवीन सागर को हिंदी कहानी की चर्चा और बहस में शामिल करने का सही वक्त है। हिंदी के इस अत्यंत महत्वपूर्ण कवि-कहानीकार की चली आती उपेक्षा असह्य है। 

दीपक ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा औऱ बोला, “ सुनाओ जनार्दन” जनार्दन बोला, “सुनो” 


ओ मेरे आदर्शवादी मन 

ओ मेरे सिद्धांतवादी मन 

अब तक क्या किया 

जीवन क्या जिया 

उदरम्भरि बन... 

यहाँ तक आते-आते जनार्दन की जीभ ऐंठ गयी। दूसरे ही क्षण उसने उल्टी कर दी। वह कुर्सी पर गिर पड़ा। फिर कुर्सी ज़मीन पर गिर पड़ी। वह धूल में औंधा पड़ा ओकने लगा। (तीसमार खाँ) 

“दद्दा, गाय विष्ठा खाती है। मंदिर के सामने घूरे बना लिए हैं। माँ-बाप को लात मारते हैं। आप समझते हैं आप ही यह सब भोग रहे हैं। अरे सब भोग रहे हैं।” (पत्थर) 


- शशिभूषण, उज्जैन, म.प्र. 
  मो. 9424624278 
(लमही, कथा-समय विशेषांक अक्टूबर-दिसंबर2019 में प्रकाशित)

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

मुफ़्तख़ोर कौन है ?

कल रास्ते में चौबे जी मिल गए। दुःख भरे खीझ खीझकर कहने लगे, जनता मुफ़्तखोर हो गयी है। जनता को सब मुफ़्त में चाहिए। मैंने पूछा, जनता को क्या मुफ़्त में चाहिए ? उसे मुफ़्त में कौन देता है ? चौबे जी झल्लाए, बनिये मत। आपको इतना भी नहीं मालूम ? जनता को बच्चों की शिक्षा मुफ़्त चाहिए। घर में बिजली मुफ़्त चाहिये। पानी मुफ़्त चाहिए। इतना ही नहीं घर की औरतों के लिए बस ट्रेन का किराया भी मुफ़्त चाहिए। जो जो मिल जाये सब मुफ़्त चाहिए। काम तो कुछ करना नहीं चाहते लोग। मैंने पूछा, मुफ़्त में देता कौन है ? चौबे जी चीखे, आजकल के कुछ देशद्रोही, आतंकवादी नेता। मुझे अचरज हुआ। लेकिन फिर मैं कुछ कुछ समझ गया। मैंने चौबे जी से पूछा, चौबे जी शिक्षा, बिजली, पानी की बात आपको जल्दी समझ में आएगी नहीं। इसलिये उस बात से शुरू करते हैं जो आपको समझ में आती है। चौबे जी ने मुझे तरेरा, क्या कहना चाहते हैं आप ? आप बड़े ज्ञानी हैं ?

मैं : चौबे जी आप चौबे हैं या चतुर्वेदी ?
चौबे : हम चौबे हैं।
मैं : आपके दादा जी चौबे थे या चतुर्वेदी?
चौबे : दादा जी भी चौबे थे। लेकिन हमारे पुरखे चतुर्वेदी थे।
मैं : चौबे होने के लिए दादा जी ने कोई शुल्क दिया था ?
चौबे : कैसे मूर्ख हैं आप ? कुल नाम के लिए कोई फीस देता है?
मैं : क्या आपकी बेटी भी चौबे है ?
चौबे : वह शुक्ला है ?
मैं : ऐसा क्यों ?
चौबे : उसकी शादी हो चुकी।
मैं : शादी दहेज देकर हुई या बिन दहेज?
चौबे : बड़े मनई कोई शादी बिन दहेज करते हैं?
मैं : फिर आपकी बहू चौबे होगी ?
चौबे : हां, बहू चौबे है।
मैं : पहले भी चौबे थी ?
चौबे : पहले दुबे थी।
मैं : बेटे की शादी में दहेज मिला था या... ?
चौबे : क्या हम कंगले हैं जो बिन दहेज बेटा देंगे ?
मैं : चौबे जी आपके घर के लड़कों को सरनेम मुफ़्त है ?लेकिन लड़कियों के सरनेम में लेन-देन जुड़ा है ऐसा क्यों ?
चौबे : आपकी मति भ्रष्ट है तो क्या बताएं ? यह रिवाज़ है।
मैं : फिर तो आपको बहुत कुछ विरासत में मिला होगा ?
चौबे : क्यों नहीं ? घर, ज़मीन जायदाद, सब विरासत में ही तो मिला।
मैं : आप कह रहे हैं कि आपको ज़मीन जायदाद मुफ़्त मिली ?
चौबे : इसे मुफ़्त आप जैसा कोई गद्दार ही कह सकता है।
मैं : नाराज़ मत होइए। रिवाज़ और नियम क्या एक ही हैं ?
चौबे : विरासत भी नियम हैं। रिवाज़ भी क़ानून है।
मैं : अच्छा, क्या नेता भी रिवाज़ बना सकते हैं ?
चौबे : नेता क़ानून बना सकते हैं।
मैं : इसीलिए कोई नेता जनता को बुनियादी चीजें मुफ़्त दे रहा होगा। इससे जनता मुफ़्तखोर कैसे हुई ?
चौबे : आप महा मूर्ख हैं। नेता बाप दादा नहीं होता। वह नेता होता है।
मैं : जनता औलाद नहीं होती; जनता होती है।
चौबे : हाँ।
मैं : कोई नेता जनता को औलाद माने तो ?
चौबे : अच्छी बात है। लेकिन वह जनता को मुफ़्तखोर नहीं बना सकता।
मैं : जनता को मुफ़्त देने में वैसे दिक़्क़त क्या है ?
चौबे : जनता को सब मुफ़्त बांट देने से देश में बचेगा क्या ?
मैं : जनता बचेगी।
चौबे : बाक़ी कंगाल हो जाएंगे। ख़ज़ाना ख़ाली हो जाएगा।
मैं : जनता बचेगी। जनता ख़ुद ख़ज़ाना है।
चौबे : आप बकवास कर रहे हैं। अब आपसे कोई बात नहीं हो सकती। मुफ़्तख़ोरी देश को बर्बाद कर देगी। देश के टुकड़े- टुकड़े कर देगी।
मैं : ख़ुशहाल जनता देश को बनाएगी बचाएगी या शिक्षा, पानी, दवा को तरसती जनता ?
चौबे : आपसे बहस बेकार है। आप असभ्य हैं। नक्सली हैं। टुकड़े टुकड़े गैंग के सदस्य हैं।
मैं : चौबे जी बस कीजिए। पहले अपनी मुफ़्तख़ोरी से बाज आइये। पैतृक संपत्ति के बल पर तीन तिकड़म से थोड़ा बहुत उसमें जोड़कर मूछों में ताव दिए घूमते हैं।
चौबे : चौबे होना मुफ़्तख़ोरी है ? आपसे बड़ा मूर्ख , धर्म का दुश्मन दूसरा कोई मिलेगा धरती पर ?
मैं : सेंत के चौबे लोगों को यही लगेगा।
चौबे : चोप्प ! मुँह बंद रखना अब। हिन्दू विरोधी कहीं के।

आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इसके बाद क्या हुआ होगा। चौबे जी ने मुझे बड़ी भद्दी भद्दी सुनायी। जनता के साथ साथ मुझे भी ज़ाहिल और आलसी कहा। उनका बस चलता तो मुझे मारते भी। लेकिन मैं चुप लगा गया और जल्दी ही वहां से चला आया। मुझे अफ़सोस चौबे जी से गाली खाने का उतना नहीं है जितना उन्हें न समझा पाने का है। चौबे जैसे लोग दरअसल कुछ समझना ही नहीं चाहते। उन्हें जो जो मिला उसे अपना अधिकार, योग्यता समझते हैं। लेकिन जनता को जो नागरिक होने के नाते सरकार से स्वतः मिलना चाहिए उसे मुफ़्तख़ोरी समझते हैं।

चौबे लोगों की यही समस्या है। उनके जैसे नेताओं की भी यही समस्या है। वे जनता को मुफ़्तख़ोर बता कर भी अपने लिए माल मत्ता कमाना चाहते हैं। बल्कि बेशुमार कमा भी लेते हैं। यह गड़बड़ रामायण रुकनी चाहिए। ग़रीब जनता को सरकार से वह सब मिलना चाहिए जो उन्हें पुरखों से नहीं मिला। जिसके लिए वे मोहताज़ हैं। सरकार पालनहार होती है। उसे जनता को पालना पोषना और जोड़कर रखना चाहिए।

- शशिभूषण

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

मोहम्मद गांधी

गांधी जी ने कहा था ?
मेरी हत्या करने के बाद
कुछ लोग कहें- हत्यारा देशभक्त है
दूसरे लोग कहें- हम सुनते गांधी की
गांधी जी ने ही कहा था ?
जो बात तुम्हारे मन की हो
उसे बोलना गांधी ने कहा था
जो मार्ग तुम्हारे दल का हो
उसे कहना गांधी ने बनाया था !

माना सीधे सरल थे गांधी जी
उनमें कपट नहीं था जरा सा
सब उनको अपना सकते हैं
ऐसा उनके हत्यारे भी मानते हैं
जो उन्हें मोहम्मद गांधी कहते थे
मगर क्या इतने भोले थे गांधी जी ?
कि हत्यारे पक्ष से ही कह गए सब !
मर्म समझा गए हिन्दू राष्ट्रवादियों को ही ?

आज लगता है
ठीक कह गए गांधी जी
देश तुम्हारा है
मेरा धर्म अडिग
मुझे मारना चाहते हो
तुम्हारी इच्छा
मार डालो
मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा।

गांधी जी ने दरअसल कहा था
अपने मुँह मरना मरते रहना
मेरी हत्या करने के बाद
खुद मरना बार बार
मेरे पीछे अपनी करनी पर
मेरा क्या है ?
मैंने जो किया जो कहा
उसे भारत का दिल जानता है
मेरा जीवन ही मेरा संदेश है
तब भी था आगे भी रहेगा।

- शशिभूषण

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

हमारी सभ्यता

झूठ विद्या है

जिसमें नहीं विद्या
वह दीन निर्बल वध्य

विद्या हो जिसमें
हार जीत उसकी विद्या

ईश्वर विद्या है
धर्म  विद्या
राम हिंदू की विद्या
अल्लाह मुसलमान की
नरक उस ब्राह्मण की विद्या है
जो अपने लिए कमाता है सवर्ग

दमन राज्य की विद्या
आतंकवाद सत्ताकामी की

धन पद प्रभुता
देश शासन राजभवन विद्या हैं
विधान न्याय दंड भक्ति द्रोह कारागार
जय पराजय और बहुमत विद्या

संस्कार विद्या सम्मान विद्या
सौर से शमशान तक सर्वत्र विद्या

विद्या झूठ है
भ्रम मुक्ति का
यथार्थ है मनुष्यता।

- शशिभूषण

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

राष्ट्रीयता



आँधी आने के आसार थे। सालों बाद मैं घर से लगे खेत पर था। बड़ी-बड़ी सींगों वाली एक भारी भरकम सफ़ेद गाय बाड़ तोड़ती हुई तेज़ी से घुस आयी। उसकी मोटी-मोटी काली सींगों पर पुआल का गट्ठर टँगा था। लगता था गाय उसी लदे गट्ठर को सींग से गिराने-झटकारने बेचैन-हिंसक भाग-दौड़ रही है। गाय दौड़ती हुई महीनों से रखे बबूल की शाखों के परतदार ढेर जिसे मेरी मातृभाषा में 'जरबा' कहा जाता है को ठेलती हुई आगे बढ़ने लगी।

आँधी आ गयी। गाय का वेग तूफ़ानी था। आसमान में गड़गड़ाहट और बिजली चमकना तीव्र हो चले थे। ऊँचे-ऊँचे पेड़ इतना अधिक हिल रहे थे कि लगता था उखड़ जाएंगे। चारों तरफ़ धुंआ, धूल छाए थे। सहसा गाय जरबा उलझारकर बस्ती में घुस गयी। उसकी दौड़ और ताक़त के ज़ोर तथा सींगों के हमले से दीवारें छप्पर गिरने लगे। गाय में असीम शक्ति थी। वह जिधर टूट पड़ती उधर ही सब ढह जाता। हाहाकार मच जाता। औरते और बच्चे डर के मारे रोने चीख़ने लगते। मवेशी खूंटा तुड़ाकर भागने लगते।

मैंने क्या किसी ने अब तक किसी गाय को ऐसी अपरिमित शक्तिशाली, आक्रांता और विनाशकारी नहीं देखा था। शक़ होता था गाय की शक़्ल में यह इस्पात और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से बनी कोई विध्वंसक मशीन है। जैविक श्रद्धेय बुलडोजर। उसकी हाड़ मांस की विशाल पीठ पर लिखा था - 'भारत माता की जय'। वह किसी रिमोट से संचालित यहां घुस आयी थी। नियंत्रित ढंग से बेक़ाबू चल रही थी। लोग बेहाल थे मगर गाय को रोक पाने में अक्षम। खूँटे में बंधी घरेलू वास्तविक गइयाँ भयातुर थीं। उन्होंने अपना यह अवतार पहली बार देखा था। 

मैं गाय के इस विनाशक प्रलयंकारी रूप से त्रस्त और भयग्रस्त था। मां ने मुझे विकल भयभीत निरुपाय देखकर कहा- डरो मत। गाय का विनाश कुछ भी नहीं। आसमान की ओर देखो वहां कुछ लिखा है। मैं पढ़ नहीं सकती। तुम बाँच सकते हो। उस शब्द का अरथ लगाओ। जितना जल्दी हो सके सबको बताओ और सब एक दूसरे का हाथ पकड़कर शैतान गाय की उल्टी दिशा में भागो। मैंने डरकर आसमान देखा। आकाश क्रोध से लाल था। इस तरह क़रीब झुक आया था जैसे ज्वार भांटे वाले भयंकर समुद्र को उल्टा लटका दिया गया हो। चाँद आसमान से भी लाल था। वह बुरी तरह हिल रहा था। लगा थर थर काँप रहा है। मानो आसमान से उसके पैर उखड़ गये हैं। वह टूटकर अभी धरती पर गिर जाएगा। 

मैंने देखा अंतरिक्ष में सब ओर बेताल की तरह एक शब्द उल्टा लटका है - नागरिकता। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था। नागरिकता शब्द इतना भयानक कैसे हो गया ? महीने भर पहले हो चुके एनआरसी में मेरी राष्ट्रीयता सिद्ध हो चुकी थी। मुझे किस बात की अड़चन ? डर और भागने की विवश कोशिश में मेरी नींद टूट गयी। मुझे राहत मिली। अपार ख़ुशी हुई- ओह ! यह सपना था। 

बेटी ऊपर की बर्थ पर आकर मुझे झकझोर रही थी- पापा क्या हुआ ? मैंने उसे पूरा सपना सुनाया। बोला - चलती ट्रेन में सपना देखो तो चाँद हिलता है। बेटी ने चहककर कहा - वाह पापा ! आपने चाँद सपने और ट्रेन के रिलेशन की खोज कर ली आप साइंटिस्ट हैं। हम दोनों हँस पड़े। थोड़ी देर में फिर नींद आ गयी। हमारा गंतव्य अभी घंटों दूर था।

- शशिभूषण

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

कंगना में टैलेंट है वे पायल रोहतगी क्यों होना चाहती हैं ? 



हर दौर में कुछ ऐसी प्रतिभाएं होती हैं जो अपनी लोकप्रियता के सिक्कों को राजनीतिक चाटुकारिता के मंच की सीढ़ियों पर चढ़ा देती हैं। सतही लेखन के चैंपियन चेतन भगत के बाद कंगना राणावत ऐसी ही फ़िल्मी हस्ती हैं। यद्यपि चेतन भगत जो हमेशा लोकप्रियता के ग्राफ़ को देखते सम्हालते मैनेज करते चलते हैं इन दिनों सीएए के विरोध में विद्यार्थियों के आंदोलन को भांपकर सरकार के प्रति थोड़े आलोचनात्मक दिखने की कोशिश में लग गये हैं। शायद उन्हें अंदाज़ा है कि युवा ही उनका असल पाठक है। सी ए ए के विरोध आंदोलन का नेतृत्वकर्ता युवा ही है। लेकिन कंगना राणावत कदाचित अभी भी उस मानसिकता की शिकार हैं जिसमें युवा वर्ग को उग्र, भटक जाने वाला और राजनीतिकों द्वारा इस्तेमाल का बड़ा वर्ग माना जाता है। इसी मानसिकता का दोहन करते हुए सिस्टम के सुर में सुर मिलाना फायदेमंद हो सकता है। 

यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि कंगना राणावत उन सेलेब्रिटीज़ में से एक हैं जो पायल रोहतगी से थोड़ा अधिक जानकार हैं। थोड़ी अधिक कलाकार दिखती हैं। जिन्हें रजत शर्मा जैसे व्यवस्था पोषित पत्रकारों का स्वाभाविक संरक्षण मिल जाता है। कंगना हाल के एक विचित्र साक्षात्कार में अपने प्रोफ़ेशनल भोलेपन के साथ यह समझती कहती प्रतीत होती हैं कि कुछ परसेंट लोग ही इस देश में टैक्स देते हैं। बाक़ी लोग जिन्हें वह दयापूर्वक ग़रीब कहती हैं उनके जैसे हितकारी टैक्सपेयर की टैक्स कृपा पर जीते हैं। अब अगर एनआरसी और सी ए ए के विरोध आंदोलनों में पब्लिक प्रॉपर्टी का नुकसान हो जाएगा तो ग़रीब देशवासियों का क्या होगा ? मानो विश्विद्यालयों के आंदोलनकारी युवा और नागरिक पब्लिक प्रॉपर्टी का नुकसान करने के लिए ही विरोध आंदोलन कर रहे हैं। फिल्मी टैलेंट होने के बावजूद कंगना राणावत को इतना भी मालूम नहीं है कि केवल आय का टैक्स नहीं लगता बल्कि वस्तुओं पर भी टैक्स देना पड़ता है। अगर कंगना किसी रेस्टोरेंट में ताज़ी इडली की एक प्लेट का इलेक्ट्रॉनिक बिल भी देखने लायक कष्ट उठा सकें तो उन्हें मालूम चल जाएगा कि आजकल उसमें भी जीएसटी काटा जाता है। खैर,

अभी आते हैं कंगना राणावत द्वारा किये जा रहे सीएए के विरोध में हो रहे देशव्यापी आंदोलन के विरोध पर। क्या कंगना राणावत बता सकती हैं कि भारत में इतना अबोध कौन सीएए विरोधी आंदोलनकारी युवा या स्टूडेंट है, होगा जो इतना भी नहीं जानता कि सीएए नागरिकता लेने का नहीं नागरिकता देने का क़ानून है ? फिर सवाल उठता है वह सीएए का विरोध क्यों करता है ? वह एक दिन सी ए ए को एनआरसी से जोड़ दिए जाने की आशंका से क्यों आंदोलित है ? क्या किसी क़ानून का विरोध करने वाला इतना नासमझ हो सकता है कि वह क़ानून का विरोध करते हुए उसमें हिंसा करने के दुष्परिणाम को न समझे ? क्या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर कभी सरकारों को झुकाया जा सकता है ? क्या अब भारत के आंदोलनकारियों के पास कंगना राणावत जितनी बुद्धि, अनुशासन और शांति नहीं बचे हैं ? फिर कंगना राणावत टैक्स का उपदेश किसे देना चाहती हैं ? कंगना के राजनीतिक मकसद पिछले कुछ सालों से साफ़ रहे हैं इसलिए मूल विषय पर आते हैं। 

सीएए का विरोध करने का एक ही कारण है कि यह क़ानून भारत के तीन पड़ोसी देशों के शरणार्थियों को नागरिकता देने के सम्बंध में धर्म का विचार करता है। इन धर्मों पर विचार करते हुए वह एक ख़ास धर्म इस्लाम को छोड़ देता है। भारत के मौजूदा संविधान के अनुसार भारत की नागरिकता का आधार सेक्युलर है। अभी तक किसी को भी भारत का नागरिक होने के लिए उसका किसी धर्म का इंसान होना मायने नहीं रखता था। प्रावधान था कि किसी को भी नागरिकता देते हुए यह नहीं इंकार किया जाएगा कि माफ़ करना तुम इस धर्म के हो। नागरिकता देने में इसी उदारता का हामी है भारत का संविधान। कोई भी मनुष्य हो अगर वह भारत की नागरिकता के लिए आवेदन करता है या उसे नागरिकता देने पर विचार किया जाता है तो केवल यह देखा जाएगा कि उसे नागरिकता दी जा सकती है या नहीं यह नहीं देखा जाएगा कि वह किस धर्म का है ? 

कंगना राणावत को आय पर टैक्स से ऊपर जाकर अपनी समझ को दुरुस्त करना चाहिए। वे अभी कम समझती हैं तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि वे मूर्ख हैं या आगे समझने की कोशिश भी नहीं कर सकतीं। हम जानते हैं कि वे शबाना आज़मी जैसी महान अभिनेत्री नहीं हो सकतीं फिर भी हमें दुःख होता है कि कंगना राणावत अपने स्तर को पायल रोहतगी तक क्यों ले जा रही हैं ? उनमें टैलेंट है इससे किसे इंकार होगा ? 

- शशिभूषण

मंगलवार, 18 जून 2019

स्त्री मन से संवाद ‘स्त्रीशतक’


पवन करण के काव्य संग्रह ‘स्त्रीशतक’ को पढ़ते हुए बचपन में सुनी हातिमताई कहानी का एक संवाद याद आता है- एक बार देखा है दूसरी बार देखने की तमन्ना है।

वास्तव में पुस्तक एक बार पढ़कर खत्म कर दी जाने वाली नहीं लगती। यह बार-बार लगातार पढ़ने को बाध्य करती है। इसे सिर्फ़ काव्य पुस्तक कहना भी इसकी व्याप्ति को बहुत संकुचित कर देना है मेरी नज़र में। दरअसल यह किताब की शक्ल में दर्द का अनवरत प्रवहमान एक दरिया है जो सदियों से सदियों तक न थमने के लिए जीवंत हुआ है। पवन करण के भीतर गहरे तक पैठे हुए उस स्त्री-मन को मेरा दिली सलाम जिसने इतिहास, मिथक, पुराण और अध्यात्म में समायी तमाम स्त्रियों की पीड़ा, सिसक, चीख़, पुकार और क्रंदन को सुना और उन्हें वर्तमान का हिस्सा बना दिया। यह स्त्री-मन बहुधा स्त्री लेखकों में भी देखने को नहीं मिलता। ऐसा लगता है कि कवि ‘स्त्रीशतक’ की हर स्त्री की माँ की भूमिका निबाह रहा है। बेटी को कोई कष्ट आने पर माँ को जो छटपटाहट और अकथ दुख होता है वही दुख, संवेदना, चिंता ‘स्त्रीशतक’ की कविताओं में समायी हुई हैं। 

किताब की एक-एक कविता दुखांत गाथा है। यह पुस्तक मुझसे जल्दी-जल्दी नहीं पढ़ी गयी। कारण, यही था कि एक दुख से उबरकर दूसरे में डूबने के लिए मोहलत की ज़रूरत रही। ‘स्त्रीशतक’ की कविताएँ मोहभंग सृजित करती हैं हमारे उन ऋषियों, मुनियों, देवों, तपस्वियों, मनीषियों, राजपुरुषों के प्रति जिनकी वंदना और अनुगमन हमें संस्कारों में मिले हैं। जिन पर आज कोई सवाल तक पूछना ख़तरे से खाली नहीं। यह एक तरह का कवि की चेतस संवेदनशील, मानवीय, आँखों एवं प्रज्ञा से किया गया महान प्राचीनता का स्टिंग ऑपरेशन है उन सभी महापुरुषों के आश्रमों, महलों, झोपडियों, गुफ़ाओं, तपस्थलों, शयनागारों और चारदीवारियों के भीतर का जहाँ स्वप्रतिष्ठा और आत्मसंतोष के लिए स्त्रियां बेची गयीं, खरीदी गयीं, नीलाम की गयीं, दान में दी गयीं, परोसी गयीं, बलात्कृत हुईं, प्रेम, श्रद्धा, साहचर्य में छली गयीं, अपहृत हुईं, बलिवेदी पर चढायी गयीं। यह उन तेजस्वी, वीर, धीर, व्रती, सन्यासी, त्यागी पुरुषों के मन की कालिख को जो समाज के चेहरे पर अदृश्य पुती ही हुई है, जिसे हम आँखों में अंजन समझकर बसाये लगाये बैठे थे या नज़र न लगने के लिए डिठौना बनाये बैठे थे का उद्घाटन है।

स्त्री की पीड़ा तो ‘स्त्रीशतक’ का मूल स्वर है ही उसके भीतर भी पीड़ाओं की अनेक श्रेड़ियाँ हैं जिसमें जातिभेद, वर्गभेद, रंगभेद की यातनाएँ झेल रहीं अलग अलग महिलाएँ हैं। यह प्रचीन भारत के स्त्री मन से संवाद है। यहाँ उन सौ स्त्रियों के नाम गौण हो जाते हैं जिन पर कविताएँ लिखी गयी हैं। क्योंकि उनका दुख प्रमुख होकर सभी स्त्रियों को समदुखिनी बनाकर एक सूत्र में बाँध देता है। 

लोक प्रचलित धारणाओं, प्रथाओं, मान्यताओं एवं श्रेष्ठताओं को खंड-खंड करने वाला हथौड़ा ‘स्त्रीशतक’ लोक चित्त में बसे राम और रावण के व्यक्तित्व को ही उलट-पलट कर रख देता है। राम की बहन शांता का पिता दशरथ द्वारा ऋष्य श्रृंग को यज्ञ दान में दे दिये जाने को राम-सीता द्वारा शांति पूर्वक सह जाना और रावण की विधवा बहन बज्रमणि( शूर्पनखा) को सती होने से भाई रावण द्वारा रोका जाना, उसको प्रेम की स्वतंत्रता दिया जाना, उसके नाक कटी होने के बावजूद ससम्मान घर में रहने देना इन दोनों पौराणिक पुरुषों की लोकमान्य भूमिकाओं पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। मन में सवाल उठता है स्त्री के प्रति किसका आचरण सही है ?

संग्रह की प्रत्येक कविता के अंत में शामिल फुट नोट कवि की अनन्य दक्षता एवं संपादकीय दूरदर्शिता है जो पुराणों से अनभिज्ञ पाठक को भी कविता एवं कथा का हिस्सा बना लेते हैं। इनसे ही पता चलता है कि भारत के ऋषि, मुनि, देव, राजा, और ब्रह्मांड के ग्रह नक्षत्र शुक्र, बृहस्पति, चंद्र, बुध जैसे अनेकानेक पुरुष या तो नाजायज़ रिश्तों के सूत्रधार रहे या स्वयं अवैध संतति। धर्म की आड़ में किस प्रकार प्राचीन काल से पुरुषों ने स्त्रियों का भोग और शोषण किया और इस साज़िश में समूचा ब्रह्मांड शामिल रहा यह इस पुस्तक को पढ़कर ही मैंने जाना।

‘स्त्रीशतक’ प्राचीन भारत का एक्स रे है, वर्तमान भारत का लिंग जाँच करने वाला सोनोग्राफ़ी टेस्ट और भविष्य के भारत की ब्लड रिपोर्ट जो अनेकानेक भयावह संक्रमणों से ग्रस्त है। 

- कविता जड़िया
शिक्षिका, के.वि. उज्जैन

गुरुवार, 30 मई 2019

संसद के लिए शील, शांति, न्याय और पवित्रता सर्वोपरि होने चाहिए

आज भारत की 17वीं संसद पद एवं गोपनीयता की शपथ लेने जा रही है। यह ऐसा अवसर है जब भारत के सभी लोग नव निर्वाचित सांसदों को बधाई एवं आगामी पांच साल के लिए नयी सरकार को शुभकामना देना चाहेंगे। दुनिया भर के जागरूक नागरिक भारत के आज के इस ख़ास दिन को इच्छानुसार अपनी-अपनी डायरी में नोट करेंगे। 

मैं भी समझता हूँ आज का दिन है ही विशेष जब भारत के विभिन्न दलों के सांसद एक साथ मिलकर 17वीं संसद का चेहरा बन जाएंगे। यहीं मुझे लगता है एक बात पर विशेष रूप से विचार करने की ज़रूरत है। अनेक समाचार माध्यमों से यह जानने में आया है कि भारत की 17वीं नव निर्वाचित संसद में लगभग 44 प्रतिशत ऐसे सांसद हैं जिन पर अपराध पंजीबद्ध हैं। इन अपराधों के बारे में कहा गया है कि यह सब प्रकार के हैं। 

जैसा कि दुनिया का चलन है सम्भव है कि इन दागी जनप्रतिनिधियों में से कुछ पर मुकदमें दुर्भावनावश लगाए गए हों जो अदालत में आगे सही साबित न हो पाएं। सम्भव यह भी है कि आगे इन सांसदों में से कुछ का प्रभाव इतना बढ़ जाए कि अपराधों के सबूत छोटे पड़ जाएं। कोई अदालत इन नेताओं को दोषी साबित न कर पाए। सम्भव यह भी है कि माननीय सचमुच दोषी हों। 

सवाल यह नहीं है कि भविष्य में कौन बच जाएगा, किस दल में कम ज्यादा आरोपी हैं और कौन अपने अपराधों की सज़ा पायेगा ? बल्कि सवाल यह है कि क्या यह भारतीय संसद का आदर्श चेहरा है जहां 43 या 44 प्रतिशत निर्वाचित सासंद आरोपी हों ?यदि एक भी सांसद दोषी सिद्ध हो गया तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? संसद की पवित्रता का क्या होगा ? 

मेरे ख़याल से आज यह सवाल सबसे बड़ा सवाल होना चाहिए कि यदि भारतीय लोकसभा को अपने किसी सदस्य के लिए भविष्य में पछताना पड़े, शर्मशार होना पड़े, विश्व बिरादरी में नीचा देखना पड़े, जवाब देना पड़े तो इसका जिम्मा किस पर जाएगा ? क्या राजनीतिक दलों पर जिन्होंने प्रत्याशी खड़े किए ? क्या चुनाव आयोग पर जिसने इन्हें चुनकर आने दिया ? क्या न्याय पालिका पर जो समय रहते इन पर अपराध तय नहीं कर पाई ? क्या विभिन्न सरकारों पर जो इन पर अंकुश नहीं लगा पाईं ? या फिर अंतिम रूप से जनता पर जिसने दागी नेताओं को भारी मतों से अपना नुमाइंदा या रहनुमा चुना ? 

आज इन सवालों पर देश को गौर करना ही होगा। अब वह समय नहीं रहा जब विजेता के सब दोष माफ़ होते हैं। यह लोकतांत्रिक विश्व है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र में बहुमत से कम महत्व मत का नहीं होता। यदि एक भी नागरिक जानना चाहता है कि संसद में आरोपी क्यों और कैसे पहुंचे ? तो जवाब देना होगा। यही जनादेश का सच्चा सम्मान होगा। 

भारत एक महान देश है। इसे अपने उच्च मानवीय गुणों के लिए दुनिया भर में आदर से देखा जाता है। भारत के जनादेश का सम्मान करने वालों का यह पहला कर्तव्य है कि वे इस देश की संसद को पवित्र रखें। बिना इस तू-तू मैं-मैं के कि पिछली संसद में निर्वाचितों का आपराधिक डेटा क्या रहा है। 

मैं सबसे क्षमा सहित यह कहना चाहता हूं कि भारत की नवनिर्वाचित मज़बूत सरकार और विपक्ष चाहे वह कितना ही कमज़ोर क्यों न हो कि यह पहली साझी ज़िम्मेदारी होगी कि संसद में जो सदस्य चुनकर आये हैं वे जल्द से जल्द अगर दोषी हैं तो दोषी और बेदाग़ हैं तो बेदाग़ निकलें। इन पर लंबित मुकदमों की सुनवाई प्राथमिकता में त्वरित सुनिश्चित हो। कोई भी नया कार्यक्रम लागू करने से पहले इस जनादेश को निष्कलंक किया जाए। मेरा यह सोच अगर किसी रूप में गलत है तो मुझे माफ़ किया जाए। 

भारतीय नागरिक होने के नाते मेरी केवल एक ही इच्छा है कि जैसे भारत के करोड़ों लोग ग़रीबी, मजबूरी, सताये जाने पर भी नेक, निर्दोष, विनीत और निष्कलंक रहते हैं वैसी ही भारत की संसद भी हो। दुनिया में इसकी पहचान क़ायम हो कि यह भारत की संसद है जिसके लिए शील, शांति, न्याय और पवित्रता सर्वोपरि हैं। 

सभी निर्वाचित सांसदों एवं पदाधिकारियों को मेरी ओर से शुभकामनाएं। प्रधानमंत्री जी के लिए हार्दिक मंगलकामनाएं कि सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में सबसे अधिक आरोपी सांसद भी आपकी ओर से ही हैं  इसलिए अब इतनी बड़ी संसद को सम्हालने और निर्दोष रखने का सर्वाधिक जिम्मा आपका ही है। 

जय हिंद ! भारत माता की जय !!

- शशिभूषण

सोमवार, 27 मई 2019

लोग अंगूठा लगाकर विश्व गुरुओं की सरकार चुनते हैं


इसे कहानी में लिखूंगा तो शायद आप मानेंगे नहीं इसलिए सीधे सीधे एक अनुभव कहता हूँ ताकि आप सवाल जवाब भी कर सकें।

मैं पीठासीन अधिकारी था। इस बार मतदान हेतु बीएलओ पर्ची मान्य नहीं थी। एक दिन पहले ही एजेंट से अनुरोध कर लिया था बीएलओ पर्ची से वोट नहीं पड़ पायेगा। किसी हाल में नहीं। लेकिन अगले दिन मतदाता आधार कार्ड और वोटर कार्ड आदि के साथ बीएलओ पर्ची भी ला रहे थे।

यह बीएलओ पर्ची तब परेशानी और डर का सबब बन गयी जब कुछ बुजुर्ग मतदाता जिनमें अधिकांश महिलाएं थीं स्याही लगवाने, मतदान अधिकारी 3 द्वारा बैलेट इश्यू करने के बाद हाथ में लिए लिए बूथ में जाते और इसे कहीं डालना चाहते। चूंकि बैलेट यूनिट में कहीं से कुछ डाला नहीं जा सकता तो ये उसे वीवीपीएटी में डालना चाहते।

एक दो बार तो मुझे अपनी जान सूखती सी लगी। मेरी प्रार्थना थी कि यह मशीन 6 बजे तक ऐसी ही चलती रहे। मतदान सम्पन्न हो जाये। लेकिन यह नई समस्या थी। मैं बूथ पर नहीं जा सकता था। मतदाता के पीछे पीछे कोई दूसरा नहीं जा सकता था। एक को समझाओ भी तो दूसरा मतदाता नया होता। फिर क्या किया जाए ?

जैसे ही कोई बुजुर्ग मतदाता आता या आती मैं मतदान कक्ष के बीचोबीच दूसरे मतदान अधिकारी के सामने खड़ा हो जाता था। उनके हाथ से बीएलओ पर्ची और परिचय पत्र लेता था। विनती करता था- केवल बटन दबाना है और कुछ नहीं। उसके बाद मुझसे यह ले जाओ।

इतना ही होता तो गनीमत थी। कमाल तो तब हुआ जब मतदान समाप्ति के बाद वीवीपीएटी की बैटरी निकालने के लिए बैक साइड खोली तो उससे बीएलओ पर्ची निकली। शाम को 6 बजे रोने लायक जान न बचने के बावजूद मुझे जोर की हँसी आई। हम चारो हँस पड़े। मतदान समाप्त हो चुका था।

इसीलिए कहता हूं कि माई बाप जनता जनार्दन की खूब इज्जत कीजिये। उन्हें सर आंखों पर बिठाइए। लेकिन केवल इज्जत से और उनके जनादेश से कुछ खास नहीं होने वाला। भारत की जनता जनार्दन को शिक्षित करना पड़ेगा। उसे शिक्षित कीजिये। भारत में शिक्षा पहली ज़रूरत है।

यदि यह देश शिक्षा के लिए आगे नहीं आता तो जनादेश आदि की इज्ज़त का कोई अर्थ नहीं है। यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि लोग अंगूठा लगाकर विश्व गुरुओं की सरकार चुनते हैं।

- शशिभूषण

नेहरू का सपना हमारा भारत


ऐसे माता-पिता, शिक्षकों और परिजनों पर आज ग़ुस्सा आता है जिन्होंने बच्चों से कहा था - पढ़ो लिखो, अच्छे बनो। गांधी, नेहरू, भगत सिंह, आदि महापुरुषों की राह पर चलो। अपने से पहले समाज के बारे में सोचो। भारत निर्माण का रास्ता आजादी के आंदोलन के महान सपनों से होकर निकलेगा।

वैसे है तो यह गर्व करने की बात मगर गुस्सा इसलिए आता है क्योंकि इसी दौर में स्कूल, कॉलेज, विश्विद्यालय और शिक्षा नष्ट किये जा रहे थे। लोग परहित से विमुख होकर अपने-अपने घर भर रहे थे। बस कुछ पुराने अच्छे नागरिक उन्हीं महान सपनों के साथ जिये जा रहे थे। जिनकी तादाद घटती जा रही थी। पढ़ाई या तो थी नहीं या खोखली हो चुकी थी, आज़ादी के सपने टूट रहे थे, राष्ट्र निर्माण और नेकी की राह मुश्किलों एवं अपना सब कुछ खो देने की राह बनती जा रही थी।

इसी वक़्त की कोख से वह पीढ़ी पैदा हुई, जो इस सही मगर कठिन राह पर चलने में भविष्यहीनता देखती थी। उसके सामने करियर का प्रश्न अहम हो चला था। परिणाम क्या हुआ ? ऐसे-ऐसे नेता, रणनीतिकार पैदा हुए जिनकी दिखायी राह पर चलने में आदर्शों की कोई शर्त नहीं थी, त्याग की, ईमानदारी की कोई अड़चन नहीं थी। शिक्षित होना भी अनिवार्य नहीं था। बल्कि प्रतिभाएं विदेशों में शरण खोज रही थीं। नेता खुलेआम बोलने लगे थे- गांधी, नेहरू शैतान थे। भारत विभाजन के जिम्मेदार थे। भगत सिंह कम्युनिस्ट था। अम्बेडकर शूद्र। आरक्षण बुराई है। अल्पसंख्यक हिंदुओं पर खतरा हैं। इस्लाम खतरे में है। देश ख़तरे में है। संस्कृति पर संकट के बादल देखे जाते। बुद्धिजीवियों को त्याज्य, अलगाववादी समझा जाता। कारण ? इनसे ब्राह्मणवाद, धार्मिक चरमपंथ और जातिवाद आदि कमज़ोर पड़ रहे थे। इन अतिवादी नेताओं को कोई टोकने वाला नहीं था कि यह झूठ क्यों ? ऐसी नफ़रत क्यों ? धर्म का धंधा क्यों ? यह उस वक़्त का आगमन था जब दंगाई या लुटेरा होकर भी समाज हितैषी या सेवक कहलाया जा सकता था। जब जातियों, समाजों के संगठन, सेनाएं बन रही थीं। मेले-त्यौहार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के अड्डे बनते जा रहे थे।

ऐसे में क्या होता ? कम पढ़े लिखों की उन्मादी फ़ौज तैयार हो गयी। वो धर्म में लग गयी। बिजनेस सम्हालने लगी। राजनीतिक कार्यकर्ता बन गयी। ट्रोल हो गयी। लिंचिंग करने वाली मॉब बन गयी। नौजवान बिना पढ़े लिखे ही स्मार्ट, अमीर होने लगे। समझदार कहलाने लगे। विभाजनकारी जन नेता कहलाने लगे। कुछ भी करके जनसमर्थन जीत लेने में सफल होने लगे। धंधा, सबसे बड़ा रोज़गार हो गया। मुनाफ़ा सदगति। सेठ, धर्म और राजनीति के मालिक बन बैठे। लोग खुलेआम पूछने लगे समाज सेवा से क्या फायदा ? हम सरोकार के लिए क्यों मरें ? हमें भी सुख चाहिए। हमारे भी बाल बच्चे हैं। भलाई के लिए हमी क्यों शहीद हों ? फिर क्या था अपराध का ऐसा कोई क्षेत्र न बचा जहां से चुनकर सांसद, विधायक सदनों में न पहुंचें।

हमें शहीद नहीं होना, हमें भी येन केन प्रकारेण ऐश ओ आराम चाहिए युवाओं के जीवन का मूलमंत्र बन गया। बुजुर्ग आखिरी सांस तक शासन करना चाहने लगे। भारत में धर्मनिरपेक्षता गाली हो गयी। वैज्ञानिकता को नास्तिकता समझा जाने लगा। नास्तिक को देशद्रोही प्रचारित कर दिया गया। विरोधी विचारधारा को शत्रु समझ लिया गया। मानवतावाद की जगह राजनेताओं की भक्ति और धार्मिक उन्माद आ गया। मीडिया धनपशु और सत्ता का प्रचारक बन गया। व्यक्ति पूजा चरम पर पहुंच गयी। ऐसे वक़्त में नेहरू को कौन अच्छा कहता ? अम्बेडकर के पीछे कौन चलता? इतिहास कौन पढ़ता जबकि पुस्तकालय खत्म हो गए । ज्ञान विज्ञान की जगह वाट्सअप का मायावी जाल छा गया। रही सही कसर अंतरार्ष्ट्रीय उपभोक्तावाद ने पूरी कर दी। देश में कंपनियों का साम्राज्य फैल गया। भारत के लोग फेक न्यूज़ और धार्मिक राष्ट्रवाद के चंगुल में फंस गए। फिल्मी कलाकार या तो सट्टेबाज़ हो गए या नेताओं के विज्ञापन करता। एंकर गुंडे हो चले। योग-अध्यात्म महाकाय कारोबार बन गया। ऐसे लोगों की सत्ता, रस्साकशी में जनता की नज़र में गांधी, नेहरू इज्ज़त पाने भी पाएं तो कैसे ?

लोग ही गिनती के बचे जो आंख में आंख डालकर कह सकें - जवाहर लाल नेहरू जैसा पढ़ा लिखा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रधानमंत्री भारत में दूसरा न हुआ न होगा। नेहरू जी आधुनिक भारत के महान स्वप्नदृष्टा और शिल्पी थे। उनका चिंतन और राजनीति भारत की आत्मा के ख़ुराक हैं। आज जिस प्रकार से नेहरू को कलंकित किया जा चुका है और दोषियों को कोई ठोस जवाब नहीं दे पाता वह भारत की ही दुर्गति का कारण है, कारण बनेगा।

दुष्प्रचार और चरित्र हनन के विशाल राजनीतिक औद्योगिक समय में आज सबसे बड़ा सवाल है भारत निर्माताओं का खोया गौरव कैसे लौटे ? कौन उनके असल संदेशों को जनता तक ले जाए ? सवाल बड़ा है लेकिन उम्मीद भी बड़ी है कि यह घटाटोप सदा नहीं चलेगा। अफवाह, छल, झूठे वादे, तिकड़मी भाषा और झूठ हमेशा नहीं चलते। ठगों की कलई एक दिन खुल ही जाती है। भले देर लगे मगर नेहरू फिर से पहचाने जाएंगे। क्योंकि वे किसी दल विशेष के नेता नहीं थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और महान स्वप्नदृष्टा थे। भारत उनका सदैव ऋणी रहेगा।

आज 27 मई है। नेहरू जी की पुण्यतिथि। भारत माता के इस सपूत और गांधी जी के वास्तविक उत्तराधिकारी को मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि ! नमन ! जय हिंद !! भारत माता की जय !!!

- शशिभूषण

रविवार, 26 मई 2019

बेटी की चिट्टी देश के नाम



मेरे प्यारे देश भारत,
आज जबकि मैं वह हूँ, जो होना चाहती थी, तो इसका सारा श्रेय मैं तुम्हें देना चाहूँगी। तुमने मेरी साँसों को हवा दी, जीवन को अन्न-जल और विकास को वह सुंदर दुनिया, जिसमें सपनों के विस्तार के लिए अनंत आकाश था और उन्हें साकार करने के लिए असीम धरा।

बढ़ती उम्र की समझ के साथ मैंने जाना कि तुम अपनी एक ऐसी विशेषता के कारण अपने आत्महिंसक, आत्मपीड़क पड़ोसी देशों से अलग और महान हुए, जो संविधान द्वारा तुम्हें दी गयी उद्देशिका है- सम्पूर्ण संप्रभुता संपन्न लोकतंत्रात्मक संघ गणराज्य और पंथ निरपेक्ष लोकतांत्रिक समाजवादी। यह एक प्रतिज्ञा तुम्हारी उस पवित्र और उदात्त आत्मा का प्रतिबिंब है जिसमें सबके लिए सबकुछ है। अपनी आदिम अवस्था से तुम अपने इसी धर्म का पालन करते आ रहे हो। ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों और इतिहास को पढ़कर मैंने जाना कि तुम्हारी धरती दुनिया के तमाम बाशिंदों को अपनी गोद में पालने, उन्हें संरक्षण व मुक्त आकाश देने को सदा से आतुर रही है। वात्सल्य का ऐसा अनुपम भंडार धरती के किसी और टुकड़े पर नहीं दिखता।

मैं सच्चे दिल से यही प्रार्थना करती हूँ कि तुम्हारी वनस्पतियाँ सदा हरी रहें, तुम्हारी नदियाँ सदा भरी रहें, तुम्हारे पशु-पक्षी, खेत-खलिहान, किसान-जवान और सभी इंसान सदा सलामत रहें।

पर सच कहूँ- मन तब उदास ज़रूर हो जाता है जब सत्ताओं की शतरंज में तुम्हें मोहरा बना देखती हूँ। तुम्हारी हरी-भरी धरती की चटख रंगत जब चंद रंगों और तूलिकाओं में समेटने की कोशिश की जाती हैं, तुम्हारी उदात्त आत्मा को जब तुम्हारे ही आत्मज और आत्मजाएँ खंडित करने का प्रयास करते हैं, जब एक ओर तुम्हें माता का दर्ज़ा देकर पूजनीय बनाया जाता है और दूसरी ओर सत्ताओं का लोभ, क्षुद्र स्वार्थों का अतिरेक तुम्हारे आत्म सम्मान को तार-तार करते हैं, तब मेरी आँखों के सामने बार-बार अपने प्यारे भारत के आँगन में युधिष्ठिर के जुएँ का खेल और द्रौपदी के चीर हरण का दृश्य अपनी पूरी नग्नता के साथ जीवंत हो उठता है।

ऐसा नहीं है कि तुम्हारे साथ यह सबकुछ मेरे ही जीवन काल में हो रहा है ! हाँ, मेरी पीड़ा नयी है, तुम्हारा दुख सदियों पुराना है। यह दुख कुछ बुरा नष्ट न कर पाने के लिए उतना नहीं है, जितना आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ अच्छा सहेज न पाने का, अपने बच्चों को सुंदर और स्वस्थ वातावरण, स्वच्छ पर्यावरण, पवित्र और लोकमंगलकारी आचरण न दे पाने का है।

मेरे प्यारे देश भारत ! मैं कैसे मान लूँ कि जातिवाद, क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता, अशिक्षा, ग़रीबी, बेरोज़गारी जैसी अनगिनत समस्याओं की सौगात साथ लेकर आ रही राजनीति में दिग्भ्रमित युवा पीढ़ी तुम्हारे आत्मगौरव की रक्षक होगी, तुम्हारे प्रेम के विस्तार को समझ पाने की संवेदनशीलता उसमें होगी ! वह मानव धर्म को सभी धर्मों से ऊपर मान भी पायेगी या नहीं !!

प्यारे भारत ! मैने बहुत जादुई उम्मीदें नहीं पाल रखी हैं तुमसे। बस एक दिन ऐसा आए, जब तुम्हारे सबसे कमज़ोर और अकेले इंसान तक मदद के हाथ पहुँचे, एक रात वह शुरुआत हो, जब तुम्हारा सबसे ग़रीब इंसान भूखा नहीं सोए- ऐसे दिनों और ऐसी रातों वाला प्यारा भारत बनते मैं तुम्हें देखना चाहती हूँ।

तुम्हारी बेटी
कविता जड़िया
शिक्षिका, के वि उज्जैन

रवीश आप नहीं हारे हैं

प्रिय रवीश जी,
नमस्ते !

मैंने आपका लेख 'क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूँ' ध्यान से पढ़ा। चूंकि आपके लेख का शीर्षक बिना प्रश्नवाचक चिन्ह के एक सवाल की तरह है इसलिए मैं पहले जवाब ही देना चाहता हूं- नहीं, आप बिल्कुल नहीं हारे हैं। आप हैं तो बहुत कुछ है। हम लोग अकेले नहीं हैं। कमज़ोर नहीं है। लोगों की समझ पर चारों तरफ़ से हमले हैं मगर वे आपको देख सुनकर अपनी समझ ठीक कर सकते हैं। रवीश कुमार अकेला ही आज की राजनीति का ईमानदार अटल विपक्ष है। मैं व्यक्तिगत रूप से इतने सालों में आपके लिखे बोले दिखाए से काफ़ी मजबूत हुआ हूँ। मेरे आत्मबल में वृद्धि हुई है। मैंने अनेक बार महसूस किया है कि मैं अपने काम को प्यार करने लगा हूँ। मुझमें निडरता आ गयी है। दृढ़ता, आत्मीयता, प्रतिबद्धता और मैत्री बढ़ी है। मैंने रवीश कुमार को देखते हुए जाना है कि कैसे विषम परिस्थिति में भी रचनात्मक, दोस्ताना, खुशमिजाज़ रहा जा सकता है। कैसे एक साथ बच्चों जैसा सुकुमार और परम दृढ़ हुआ जा सकता है। मैंने रवीश कुमार के कठोर राजनीतिक दृष्टि सम्पन्न मनुष्य और किसी फिल्मी गाने पर मचलते किशोर रूप को देखा है। 

मैं आज आपसे एक बात साझा करना चाहता हूं। मुझे अपनी इस उम्र में आकर एक इंसान मिला है जिसे मैं प्यार कर सकता हूँ। जिसकी हर बात पर यकीन कर सकता हूँ। मुझे गहराई से लगता है कि वह इंसान झूठ नहीं कह सकता। आप उस इंसान का नाम जानना चाहेंगे ? उसका नाम है सिद्धार्थ गौतम। सिद्धार्थ गौतम को दुनिया बुद्ध के नाम से जानती है। दुर्भाग्य से दुनिया ने एक गलत पाठ भी रट लिया है कि बुद्ध भगवान थे। अवतार थे। उन्होंने कोई धर्म चलाया। जबकि सच यह है कि बुद्ध इंसान थे। उन्होंने इंसानी संदेश दिए। बुद्ध कदाचित दुनिया के सबसे प्यारे और खरे इंसान हैं। उन्होंने एक बात कही है कि मैत्री, प्रेम से श्रेष्ठ है। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा होगा क्योंकि हम विराट विश्व में रहते है। प्रकृति से लेकर मनुष्य तक सबके प्रति मैत्री ही श्रेष्ठ और दोषरहित मानवीय गुण है। इसी से करुणा उत्पन्न होती है। मनुष्य में करुणा आ जाए तो वह सबका मित्र हो जाता है। उससे किसी का अहित नहीं हो सकता। रवीश जी मैंने महसूस किया है कि आपमें करुणा है। पत्रकारिता में रहते हुए इसी करुणा से आपकी भाषा बड़ी मैत्रीपूर्ण और मार्मिक हो गयी है। आपने इतना विरोध और धमकियां झेली हैं कि आपकी भाषा सहज ही दिल को छूने वाली और दोस्ताना है। उसमें विश्वास है। वह अपनी ओर खींचती है। आपकी भाषा में दर्द है। उसमें खुशमिजाजी भी है। क्योंकि आप उम्मीद से भरे हुए हैं। 

मैं दोहराता हूँ कि आप बिलकुल नहीं हारे हैं। जो लोग जीते हैं वे जीते नहीं हैं उन्होंने बस कुछ चीजों पर कब्ज़ा कर लिया है। वे विजेता नहीं हैं कब्जेदार हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में बहुमत पर कब्ज़ा करना आसान है अगर मीडिया, पूंजी और धर्म मिल जाएं। मत जीतना असम्भव। उसके लिए गांधी बनना पड़ता है। गांधी ने बिल्कुल शुरुआत में ही विश्व के महानतम मानवतावादी तोल्स्तोय और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का दिल जीत लिया था। मैं गंगा में खड़े होकर कह सकता हूँ कि मोदी जी चाहे जो और जितना जीत लें वे दुनिया के किसी भी महान मानवतावादी का दिल कभी नहीं जीत पाएंगे। उनमें वे खुबिया नहीं हैं। मोदी जी को अब तक हो चुके भारत के महान संतो का कभी समर्थन नहीं मिल सकता। यहीं मैं आपसे हार जीत के संबंध में एक पौराणिक यथार्थ को साझा करना चाहता हूँ। इसे ध्यान से पढ़ियेगा-

पुराणों में जिन्हें राक्षस कहा लिखा गया उनके पास सब हुआ करता था। रावण का ही उदाहरण ले लीजिए, तो उसके पास महा सत्ता थी, अकूत सोना था और विराट सेना यानी महा शक्ति थी। रावण परम तपस्वी था। वह महा उद्यमी था। लंका में विभीषण को छोड़कर शायद ही कोई था जिसने उसका विरोध किया हो अथवा प्रजा में विद्रोह भड़काया हो। संसार में शायद ही कोई रहा हो जिसके पास उससे बड़ी प्रभुता हो। वह क्या दृष्टि थी कि पुराणों के राक्षसों के पास सब कुछ था । वे युद्ध में कभी हारते नहीं थे। उन्हें जिस देवता से जो वरदान चाहिए वह मिलता था ? उनकी प्रजा कभी विद्रोह नहीं करती थी। फिर राक्षस कैसे हारते थे ? उनका अंत कैसे होता था ? वे कब हारते थे ? इन सवालों का पुराणों में एक ही उत्तर मिलता है कि राक्षस हमेशा जीतते। उनकी ताक़त, उनकी दहशत दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जाती। वे पराजित कब होते थे ? इसका उत्तर है वे अंत में हारते थे। राक्षसों के अंत में ही हारने की प्रवृत्ति या नियम पुराणों में मिलते हैं। तो क्या पुराणों में अंत में ही हारने के लिए राक्षसों की कल्पना की गयी अथवा यह प्रकृति का कोई शाश्वत नियम है ? जो भी हो अब कोई भी जवाब देने के लिए कोई पुराणकार हमारे बीच नहीं है। फिर इस चर्चा का औचित्य क्या है ? इस चर्चा का अभिप्राय यह है कि पुराणकारों ने उद्धारकों की आवश्यकता को प्रमुख बना दिया। उन्होंने यह नियम बना दिया कि कोई नायक आएगा जो हमेशा जीतने वाले राक्षस राजा का अंत करेगा। बिना नायक के ऐसा असम्भव है। प्रजा अपने बलबूते ऐसा नहीं कर सकती यही स्थापना पुराणों की इस देश को सबसे भयानक देन है। यही कारण है कि पुराणों में प्रजा के विद्रोह की कोई कहानी नहीं मिलती। वहां सदैव नायक आता है। तो क्या यह व्यवस्था जान बूझकर है ? नायकों का पुराणकर्ताओं से कोई रिश्ता है ? इन दोनों का एक ही उत्तर है कि पुराण कथाओं के जितने भी नायक हैं वे पुराण लिखने कहने वाले ऋषियों के माता पिता, बंधु, सखा, गुरु हैं।

रवीश जी आप पढ़ते बहुत हैं। मैं आपसे बुद्ध का 'धम्मपद' पढ़ने का आग्रह करता हूँ। अम्बेडकर की लिखी बुद्ध की जीवनी पढ़ने का आग्रह करता हूँ। काशीनाथ सिंह का उपन्यास 'उपसंहार' पढ़ने का आग्रह करता हूँ। आप इन्हें ज़रूर पढ़िए। आज गीता से अधिक ज़रूरी है भारत के लोगों का बुद्ध को पढ़ना। सम्भव है जिन बुजुर्ग ने आपको गीता दी उन्होंने आपमें अपना पुत्र देख लिया हो। वे आपकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए हों। सलिये गीता दी। ताकि वह आपके पास रहे तो गौलल्ला आप पर हमले न करें। मैं माफ़ी सहित कहना चाहता हूं गीता आज की किताब नहीं है। गीता में कृष्ण ने अर्जुन से झूठ बोला। महाभारत के बाद अर्जुन को न भोगने लायक धरती मिली न स्वर्ग। महाभारत ने सब नष्ट कर दिया था। सब कुछ। कृष्ण के राजनीतिक जीवन, उसकी महत्वाकांक्षाएँ, सबका खोखलापन और समूर्ण हार जानने के लिए काशीनाथ सिंह का उपन्यास उपसंहार अप्रतिम है। पढ़ियेगा। अम्बेडकर वाली बुद्ध की जीवनी हिंदी में उपलब्ध है। इसकी भूमिका भदंत आनंद कौसल्यायन ने लिखी है। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि जब आप ये किताबें पढ़ लें तो अपने दर्शकों से भी इनकी चर्चा कर लें मुझे संतोष होगा।

आखिरी बात मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि आप हारे नहीं हैं। मोदी जी भी जीते नहीं है। अगर उनकी जीत के बाद भारत हिन्दू राष्ट्र बनता है तो यह भारत की हार होगी। लेकिन मुझे उम्मीद है कि भारत ऐसा ही रहेगा। मोदी जी का नाम केवल लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में ही शुमार होकर रह जाएगा। भारत का विशाल हृदय उन्हें भीतर से बदलेगा भी और जहां आवश्यक होगा रोकेगा भी। होना भी यही चाहिए। मैं उनसे यही चाहता हूँ। मोदी जी आप महा जीते, आपको लोगों का समर्थन मिला। ठीक। आप राज करें। विकास करें। लेकिन हमारे भारत को वैसा ही रहने दें। जैसा बुद्ध, गांधी, भगत सिंह, अम्बेडकर से लेकर टैगोर तक इसे देखना चाहते रहे हैं। इसे नया भारत यानी हिन्दू राष्ट्र न बनाएं। भारत के लोग यह नहीं चाहते। कभी नहीं चाह सकते।

रवीश जी, मैं भविष्य में आपके अधिक सक्रिय तथा प्रतिबद्ध पत्रकारीय जीवन की कामना करते हुए कहना चाहता हूं कि हम सब यहीं हैं। इसी लोकतंत्र और देश में। आप हारे नहीं हैं। क्योंकि महामानव समुद्र भारत का लोकतांत्रिक समाजवादी, पंथ निरपेक्ष सपना हम सबका साझा सपना है। आपके द्वारा चलायी गयी विश्वविद्यालय और नौकरी सीरीज तथा अन्य सीरीज का भारत को ऋणी होना चाहिए। मुझे यक़ीन है कि भारत में कोई दूरदर्शी मनुष्य सत्ता में आया तो वह आपके इन कामों को देखकर ठोस सुधार करना चाहेगा। आप हिंदी पत्रकारिता के एकलव्य हैं। हम जानते हैं आप अपनी शिक्षा पर जियेंगे लेकिन अपना अंगूठा कभी नहीं देंगे। अनंत शुभकामनाओं सहित !
जय हिंद !

आपका
शशिभूषण

शुक्रवार, 17 मई 2019

वो वक़्त आएगा

- प्रशासन से शिकायत होती है ?
- नहीं। नहीं होती।
- क्यों ?
- अर्थहीन है।
- शिकायत का कोई अर्थ ही नहीं ?
- किसी के लिए हो सकता है। मेरे लिए नहीं है।
- इसकी वजह ?
- प्रशासन अभी शैशवावस्था में है।
- क्या मतलब ?
- यह अभी मातहत से कुछ कायदों को मनवा लेने और अपने पद से संबंधित कुछ कायदों को मानते हुए निजी सुविधाओं, रसूख और यश के उपभोग तक ही पहुंचा है।
- ऐसा तो नहीं। एक से एक अफसर हैं जो मिसाल और लोक प्रशासन की शान हैं। उन्होंने बड़े बड़े काम किये। सुधार कर रहे।
- व्यक्तिगत उदाहरण और अपवाद किसी भी क्षेत्र में मिल सकते हैं।
- आपके कहने का मतलब यह बहुतायत में नहीं ?
- हां। अभी वह यात्रा शुरू होनी है जब राजनीति का उद्देश्य लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, हक़, बराबरी और जन कल्याण तथा प्रशासन का उद्देश्य मनुष्यता एवं लोकसेवा होंगे।
- यह संभव है ?
- जब तक राजनीति जन कल्याणकारी नहीं होगी। फिर बेहतर नहीं होती रहेगी प्रशासन में मनुष्यता नहीं हो सकती।
- फिर जो लोग प्रशासन से असंतुष्ट होते हैं। नाराज़ होते हैं। शिकायती हैं उनका क्या ?
- सम्भव है वे एक दिन समाधान तक पहुँचे। लेकिन वह आंशिक और अल्पकालिक ही होगा। वैसे ज्यादातर लोग प्रशासन में ईमानदारी की कमी की ही शिकायत करते हैं। उनकी शिकायत के बाद अगर कोई दूसरा आता भी है तो दूसरे की ईमानदारी की गारंटी नहीं होती। लेकिन शिकायत करने वाला खुश होता है। मैंने कुछ किया। मेरी शिकायत से कुछ बदला।
- तो क्या भ्रष्टाचार वाकई कोई इश्यू नहीं ?
- हो सकता है। लेकिन ईमानदारी से भी पहले है मनुष्यता। वरना डाकू भी अपने गिरोह में अत्यंत ईमानदार होता है। अगर मनुष्यता ध्येय हो तो कोई इंसान बेईमान नहीं हो सकता। न राजनीति में न प्रशासन में न कहीं और।
- मनुष्यता के अलावा आपका कोई फ़र्ज़ नहीं ?
- मेरा फ़र्ज़ है अपना काम ठीक से, मेहनत से करना। बड़ों की बात सुनना। ग़लती हो जाने पर उसे नहीं दोहराना। शिकायती होकर नहीं जीना। जहां लगे मैं सही हूँ उसे निर्भीक होकर कहना और जरूरत पड़ने पर अच्छाई के लिए लड़ना।
- इससे आपके साथ न्याय होता रहेगा ?
- यह देखना उनका काम है जिन्हें न्याय करना है। कुछ अनसुनी, अन्यायों से इंसान को हार मानकर वैसे ही नहीं हो जाना चाहिए जैसे लोगों वह सही नहीं मानता।
- यही आपका सपना है ?
- नहीं। मेरा सपना है वह दिन देखना। जब राजनीति सामाजिक न्याय, बराबरी और हक़ के लिए होगी और प्रशासन में लोकसेवा और मनुष्यता सर्वोपरि होंगे।
- ऐसा दिन आएगा ?
- ज़रूर आएगा।
- कौन लाएगा ?
- बच्चे।
- आपको यकीन है ?
- मुझे यकीन है।
- आप घोर आदर्शवादी और आशावादी हैं।
- मैं शिक्षक हूँ।


- शशिभूषण

शुक्रवार, 10 मई 2019

साहित्य का तकाज़ा और नामवर सिंह


"यद्यपि जिन रचनाओं की चर्चा वे कर रहे थे, वे मेरी नहीं हरिशंकर परसाई की लिखी थीं। पर विषय बदलने के डर से तथा अपनी सहज नम्रतावश मैंने उनके कथन में सुधार करना उचित नहीं समझा। सोचा चलने दो, कौन यह नामवर सिंह है, जिसकी भूलें सुधारना साहित्य का तकाजा हो।" - शरद जोशी, 'कहहुँ लिखि कागद कोरे' शीर्षक व्यंग्य का अंश।

मैंने अपने विद्यालयी दिनों में यानी बालिग़ होने से पहले तत्कालीन लागू हिंदी पाठ्यपुस्तक में शरद जोशी के व्यंग्य 'कहहुँ लिखि कागद कोरे' के इसी अंश में पहली बार रीवा जैसे शहर में 'नामवर सिंह' लिखा पढ़ा था। तब तक मेरे लिए नामवर सिंह को जानना या उन्हें सुन रखना दोनों का सवाल ही नहीं उठता था। मैंने अपने हिंदी शिक्षक से पूछा नहीं कि नामवर सिंह कौन हैं ? इस व्यंग्य का क्या अभिप्राय है ? शिक्षक ने मानो केवल इतना ही कहा- नामवरों का क्या भरोसा ! मैंने चौंकते हुए अपनी बाल बुद्धि से सोचा- नामवर सिंह यानी साहित्य का तीसमारखाँ टाईप। यदि आगे साहित्य में डूबना है तो नामवर सिंह से सतर्क रहना होगा अथवा उनकी भूल सुधार सकने की तैयारी रखनी होगी। 

इसके बाद मैंने राज्य और संघ लोक सेवा आयोग के हिंदी विषय लेने वाले प्रतियोगियों से नामवर सिंह की उद्धरणों वाली बाक़ायदा चर्चा सुनी- ये कहा, वो कहा, इस पर विवाद है, इस स्थापना को कोई काट नहीं सकता आदि आदि। मैं प्रभावित हुआ। होना ही था। फिर मैथ्स ग्रेड्यूएशन के बाद हिंदी से एम ए करने विश्विद्यालय गया तो नामवर सिंह को विधिवत पढ़ा - लेख, भाषण, किताबें जो भी प्रो कमला प्रसाद की बनायी हिंदी विभाग की उस लाइब्रेरी में उपलब्ध था। आगे उन्हें सुनने का भी मौका मिला। उन्हीं सालों एक मशहूर शेर मेरे जेहन से टकराया था- हुए नामवर बेनिशां कैसे कैसे/ ज़मी खा गयी आसमां कैसे कैसे। लेकिन नामवर सिंह तो अमर हैं, ख्याति में सर्वोपरि। आलोचकों में सिरमौर। विद्वानों में बादशाह। इनका कभी अंत न होगा- ख़याल आता।

कुछ भी हो शरद जोशी की इस एक पंक्ति ने असर निर्णायक किया, करती है इसमें दो मत नहीं। व्यंग्य का प्रभाव अमिट होता ही है। मेरे भीतर नामवर सिंह की भूलें तजवीज करने की प्रवृत्ति यहीं से आयी। यह हुआ तो नामवर सिंह के प्रति श्रद्धा विकलांग होने से बची रही। मैंने गौर किया नामवर सिंह की मुस्कुराती तस्वीरें व्यंग्य, आक्रामकता और बेपरवाह दृढ़ता की तस्वीरें हैं। उनके चेहरे में हजारी प्रसाद द्विवेदी के चेहरे की उदात्त सौम्यता की जगह व्यंग्य है। यह अनायास नहीं है कि नामवर सिंह ने बड़े बड़ों को ध्वस्त करने के लिए व्यंग्यपूर्ण बारीक विवेचना और किसी को भी स्थापित करने के लिए उदार व्याख्या का सहारा लिया। आइए संक्षेप में नामवर सिंह की कुछ भूलों पर गौर करते हैं -

नामवर सिंह का लिखना छोड़कर बोलने पर आ जाना कालांतर में उनके आलोचक की हार साबित हुई। वे लोकप्रिय व्याख्याता रह गए। नामवर सिंह चाहते तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तरह इतिहास लिख सकते थे। लिखने पर केंद्रित रहते उन विरोधाभासों, अंतर्विरोधों परस्पर विरोधी निष्पत्तियों, परिवर्तनशील स्थापनाओं को स्वतः संपादित कर उस दोष से बच सकते थे जो बोलने के साथ जुड़े होते हैं। यह कहना अच्छा लगता है कि नामवर सिंह ने हिंदी साहित्यालोचन में ओशो का दर्जा हासिल किया। लेकिन इसके ख़तरे भी सर्वविदित हैं। अध्यात्म का सम्बंध परमात्मा से है और साहित्य का यथार्थ से। परमात्मा किसी को नहीं मिलता। यथार्थ सबका अपना होता है। ओशो अंत में ध्यान कराते थे और साथ नृत्य भी करते थे। लेकिन नामवर सिंह को हमेशा अपने श्रोताओं को उनके हाल पर छोड़कर अकेले ही प्रोफेसर, कुलपति आदि रहना पड़ा। छूटे हुए कुछ श्रोता, पाठक भी थे और स्वयं लेखक भी। वे सुनकर मुग्ध हो सकते थे तो बाद में चिढ़ भी सकते थे। ऐसा हुआ भी। यह अब तक का शुक्र है कि नामवर सिंह हरिशंकर परसाई और कांतिकुमार जैन के वैसे हत्थे नहीं चढ़े जैसे रजनीश। इसके पीछे दो कारण हैं पहला परसाई अब हैं नहीं दूसरा कांतिकुमार जैन प्रोफेसर रह चुके हैं। वे शिवमंगल सिंह सुमन सरीखा यानी मरने के पहले और मरने के बाद जैसा दांव नामवर सिंह के साथ नहीं खेल सकते।

नामवर सिंह भले ही राजेन्द्र यादव से टकराते रहे हों मगर वे अपनी वाचिक प्रतिष्ठा के शिखर पर स्नोवा बार्नो को स्त्री कहानीकार की तरह ही महत्वपूर्ण मान पाए। यह बाक़ायदा शोध का विषय है कि नामवर सिंह जैसा विमर्श विरोधी आलोचक एक पुरुष को स्त्री नाम से लिखता पाकर उसे बड़ी स्त्री कहानीकार मान बैठा और बाद में सब कुछ जानने के बावजूद अनजान बना रहा। इतना ही नहीं नामवर सिंह ने ज्योति कुमारी की किताब के लोकार्पण में भी काफ़ी कुछ बोला और नाना प्रकार की दूसरी किताबों, साहित्यकारों पर भी भाषण दिए जो बाद में सही नहीं उतरे।

हिंदी दलित लेखन भी नामवर सिंह के मज़बूत हाथ न पा सका। काफ़ी बाद में उन्होंने यह स्वीकार किया कि दलित आत्मकथाओं का यथार्थ गंभीर और विचारणीय है मगर वे इस पर डंटे रहे कि साहित्य की कसौटी में केवल स्वानुभूति को मुख्य नहीं माना जा सकता। इसके पीछे यही कारण समझ में आता है कि नामवर सिंह आत्माभिव्यक्ति की भावना को छायावाद युगीन प्रवृत्ति मानते रहे। जहाँ साहित्यिक उदात्तता थी। चूंकि वे छायावाद में उस व्यक्तिवादी भावना का उभार लक्षित कर ही चुके थे जिसमें आत्मकथा लेखन की परंपरा सी चल पड़ी थी इसलिए वे दलित लेखन से साहित्यिक कलात्मक उत्कृष्टता की मांग पर अडिग रहे किंतु दलित साहित्य को सामाजिक यथार्थ के अध्ययन के लिए उपयुक्त भी मानते रहे।

नामवर सिंह की आलोचना विरासत भी जो अब हमारे सामने है वह उनकी भयंकर भूलों से भरी हुई है। इसमें दो तरह की प्रवृत्तियां मुख्य हैं। पहली वह जिसमें नामवर सिंह ने दूसरे आलोचकों को सामने नहीं आने दिया अथवा विनम्रता में दबकर कहना चाहिए उनके तेज में दूसरे मंद ही रहे और कालांतर में बुझ गए। दूसरी वह प्रवृत्ति जिसके आधे में वे आलोचक हैं जो हैं तो नामवर अनुगामी लेकिन वे आलोचना को दूसरी परम्परा से आगे नहीं ले जा पाए यानी नामवर सिंह की उत्तराधिकारी आलोचना की अनुपस्थिति। यहीं कमाल यह है कि जहां कुछ टीकाकार बाद के आलोचकों को नामवर सिंह की जेब से निकला पाते हैं वहीं कुछ को उनकी जेब फाड़कर निकला। कुल मिलाकर इसमें नामवर सिंह की भूलें भी बराबर की उत्तरदायी मानी जायेगी कि वे हिंदी और साहित्य के लोकतंत्र में अधिनायक बनकर रहे। उन्होंने अपनी इंटेलिजेंट स्थापनाओं से हिंदी समाज को जितना चमत्कृत किया उतना ही शब्दों को भी यथावसर बारीक पकड़ने वाली विदग्धता से किसी को भी उठाया गिराया। उदाहरण के लिए यह नामवर सिंह ही थे जो कह सकते थे- कविता एक खेल है। उन्होंने ज़रूरत पड़ने पर शब्दों से खेल सकने वाले को भी बड़ा कवि साबित किया।

नामवर सिंह ने कृतियों के मूल्यांकन के संबंध में भी भूलें की। उन्होंने धर्मवीर भारती के कालजयी नाटक 'अंधा युग' को सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज़ कर दिया था क्योंकि लेखक की विचारधारा दूसरी थी। यह अच्छा है कि अब पुरानी किताबों मे गोते लगाने को अच्छा नहीं माना जाता वरना नामवर सिंह की पुरानी किताब इतिहास और आलोचना उनके माथे आ जाती। हिंदी में भला वह कौन होगा जो अंधा युग के लिए आलोचक को माफ़ कर दे वो भले नामवर सिंह ही क्यों न हो। क्या यह कहना गप होगा कि भारत में जितने अंधा युग के मंचन हो चुके और होते जा रहे उतने तो नामवर सिंह ने व्याख्यान भी न दिए होंगे। ध्यान रहे इसी के समांतर उन्होंने निर्मल वर्मा को ख़ूब सराहा। यह अलग बात है कि निर्मल वर्मा को मोहन राकेश जैसा पाठकों का प्यार न मिला। शैलेश मटियानी जैसा उनका लोक महत्व तो शायद ही कभी स्थापित हो पाए। नामवर सिंह ने शिवमूर्ति और संजीव को भी कम ही पहचाना। 

उठाना गिराना, खंडन महिमामंडन, विवाद, सत्ता संधान नामवर सिंह के आजीवन प्रिय कर्म रहे। उन्होंने जिसे निशाने पर लिया उसे लगभग बिरादरी बाहर होना पड़ा। यह नामवर सिंह की खासियत रही कि उन्होंने जिसे लक्ष्य किया उसे देखते हुए अपनी एक आँख सदैव दबाकर रखी। व्यंग्य और अचूक प्रसंगों से ऐसा बेधा भेदा कि उन्हें पढ़ने के बाद संबंधित साहित्यकार में पाठक की रुचि ख़त्म हो जाये। यक़ीन न हो तो रामविलास शर्मा, अशोक वाजपेयी आदि के कृतित्व पर उन्हें पढ़ लीजिये। अशोक वाजपेयी को कवि और रामविलास शर्मा को आधुनिक प्रगतिशील मानने में सदैव संकोच रहेगा। इस प्रवृत्ति का अपवाद भी नामवर सिंह में ही मिलता है। उन्हें पढ़ने के बाद आपको अज्ञेय की 'नाच' कविता से प्रेम हो जाएगा। यह नामवर सिंह ही हैं जिनके कारण अगर आप अवसरवादी हैं तो आपको अटल जी से नफ़रत और राजनाथ सिंह से मोहब्बत साथ साथ हो सकती है। बावजूद इसके एक भाजपा का संस्थापक सदस्य रहा है दूसरा अध्यक्ष। यहां इस बात का कोई खास मतलब नहीं है कि अशोक वाजपेयी नामवर सिंह को ही अचूक अवसरवादी कहते हैं। यह सर्वविदित है कि नामवर सिंह न होते तो मुक्तिबोध को गांधीवादी साबित कर डालने में अशोक वाजपेयी को कोई रोक न पाता।

नामवर सिंह की चुप्पियां भी उनकी भूल मानी गयी हैं। लेकिन उन्होंने इतना बोला है कि उनकी चुप्पियों का ग़लत अर्थ निकालना असंभव है। इस संबंध में काशीनाथ सिंह के एक दृष्टांत का स्मरण ही उचित होगा कि नामवर सिंह उस शेर की तरह रहे जो उठकर बोला तो जंगल में सब चुप हुए, शांति हुई और जब जंगल में शोर बढ़ा तो नामवर चुप ही रहे। क्योंकि जब सब बोल रहे हों तो शेर चुप ही रहता है। अपनी भूलों और खूबियों के शिखर से बने नामवर सिंह के आखिरी दिनों का यही चित्र उभरता है -

जिसमें मज़बूत तना, ठूंठ डालें पर हरहराते फुनई (शीर्ष) रह जाते हैं नदी किनारे के ऐसे पुराने पीपल सरीखे रह गए हैं नामवर सिंह। उनकी उपलब्धि जड़ों को ढंके मिट्टी सदृश हिंदी समाज के कगार बड़ी छोटी लहरों के साथ टूटकर -घुलकर नदी में मिल रहे हैं। गिनी जा सकने वाली नामवर सिंह की देह की नसें हिंदी की धमनी-शिरा हैं। संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी-उर्दू की मनीषा और विश्व साहित्य की हवा पानी से ऊंचे उठे इस पीपल की पत्तियां आज भी सामाजिक -राजनीतिक- सांस्कृतिक वायुमंडल की आती -जाती सांस पर डोलती हैं। चुप्पियां तोड़ती हैं। ऐसे पेड़ हैं नामवर सिंह जिनकी बची -खुची पत्तियों के लिए आज भी हँसिया, कुल्हाड़ी, रस्सी लेकर चढ़ते हैं कुछ महत्वाकांक्षी, कुछ सामंती, कुछ वर्चस्ववादी अकादमिक दुनिया के, कुछ बेरोजगार, भूमिहीन युवा और कुछ विस्तारवादी साहित्यिक सामंत। फिर भी नामवर सिंह है कि आज भी केवल अपने कह सकने की आन पर रहते हैं। चाहे वक्तव्य कितनी ही बड़ी भूल या कायरता साबित होने जा रहा हो। वो नामवर सिंह ही हैं जो कन्नड़ लेखक एम एम कलबुर्गी की दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी ताकतों द्वारा नृशंस हत्या के बाद लेखकों के सम्मान वापसी आंदोलन को लोकप्रियता प्राप्ति का उद्यम बताकर मौन साध लेते हैं।

पंचतंत्र की एक उक्ति के अनुसार जो विद्वान या व्यक्ति राजा को प्रिय होगा वह लोक की नजर में दुष्ट होगा। जो लोक को प्रिय होगा वह राजा की नजर में संदिग्ध होगा। हिंदी के नामवर सिंह इसके अपवाद हैं। वे जितने हिंदी समाज में स्वीकृत हुए उतने ही संस्थानों, विश्वविद्यालयों और साहित्य के या भाषा के सत्ता केंद्रों में। नामवर सिंह के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने जितना दिया उससे कई गुना ज्यादा पाया। यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है लेकिन सच्चाई यही है। आरक्षण पर नामवर सिंह की राय कि क्या सवर्णों के बच्चे भूखों मरेंगे, कटोरा लेकर भीख मांगेंगे ? उनकी आखिरी भूल मानी जा सकती है। दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से जिसे हमारे समय के फासीवाद की ओर झुके पूंजीवादी लोकतंत्र ने 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण देकर स्थायी कर दिया। यह हिंदी का सौभाग्य होगा कि सेलेब्रेटी का जीवन जीकर गए पब्लिक इंटेलेचुअल नामवर सिंह की भूलों को सुधारा जाए । मगर इसकी संभावना कम ही है कि ऐसी किसी भावना तक को मूर्खता, कृतघ्नता अथवा छोटा मुँह बड़ी बात नहीं समझ लिया जाएगा। इसलिए अंत में नामवर सिंह को ही प्रिय रहा एक शेर-

हमको सज़ा मिली है ये हयात से
समझ हरेक राज़ को मगर फ़रेब खाएजा

- शशिभूषण

(उद्भावना, जनवरी-मार्च 2019 में प्रकाशित)

शिक्षकों की शिक्षण गुणवत्ता के मूल्यांकन का आधार PI मान क्यों नहीं हो सकता !

इन दिनों विद्यालयी शिक्षा में बोर्ड कक्षाओं के परीक्षा परिणाम पर आधारित PI की गणना कर शिक्षकों के श्रेणीकरण का अभियान जोरों पर है। आइए जानते हैं कि PI मान किस प्रकार शिक्षकों की शिक्षण गुणवत्ता आकलन का मानक आधार नहीं हो सकता:- 

वर्तमान ग्रेडिंग अनुत्तीर्ण विद्यार्थियों को और उनके द्वारा प्राप्त अंको को शून्य मानती है। जबकि किसी एक विषय में अनुत्तीर्ण विद्यार्थी के पास एक और परीक्षा का अवसर होता है। विद्यार्थी के अनुत्तीर्ण होने के पीछे अनेक कारण होते हैं। किसी विद्यार्थी के परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाने का अभिप्राय यह नहीं हो सकता कि वह अब शैक्षणिक संसार में अनुपस्थित है।

अंको के विषयवार ग्रेड निर्धारण में उत्तीर्ण विद्यार्थियों को शामिल किया जाता है। कुल उत्तीर्ण विद्यार्थियों के ऊपर से आठवें हिस्से को A1 ग्रेड दे दिया जाता है। आगे के ग्रेड A2, B1, B2 आदि इसी प्रकार क्रमश: शेष आठवें भाग को आवंटित किए जाते हैं। एक समान अंक पाने वाले उत्तीर्ण विद्यार्थियों की संख्या ग्रेडिंग को प्रभावित करती है। इतना ही नहीं एक ही अंक के लिए अलग-अलग विषय में अलग-अलग ग्रेड होंगे। यह अंतर दहाई तक भी पहुँच सकता है।

ग्रेड निर्धारण विद्यार्थियों को मनुष्य समाज की अद्वितीय इकाई नहीं केवल प्राप्तांकों वाली संख्या मानता है। पी आई शिक्षण कार्य को अंकीय मान से आँकता है। यदि पीआई उपलब्धि को मानक मान लिया जाये तो शिक्षा का लक्ष्य परीक्षा रह जायेगा। ऐसी स्थिति में संगीत, आर्ट, खेलकूद, पुस्तकालय, कार्यानुभव आदि के शिक्षकों के मूल्यांकन के लिए क्या पैरामीटर होंगे बड़ा सवाल होगा ?

वर्तमान ग्रेड निर्धारण प्राप्त अंकों के संबंध में मॉडरेशन पॉलिसी के साथ लागू है। मॉडरेशन पॉलिसी निर्दोष नहीं है। यह कम अंक अर्जित करने वाले विद्यार्थी को अधिक अंक पाने वाले विद्यार्थी के समकक्ष खड़ा कर देती है। मॉडरेशन पॉलिसी को निरस्त किए जाने संबंधी सुझावों- आदेशों को नज़र अंदाज किया जा रहा है। यदि कुछ समाचार वेबसाईट की खबरों को सच मानें तो मॉडरेशन पॉलिसी को हटाने के आदेश दिल्ली हाई कोर्ट और मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा भी दिये जा चुके हैं।

क्या अनुत्तीर्ण विद्यार्थी पर शिक्षक द्वारा किया गया शिक्षण कार्य शून्य होता है ? क्या अधिकतम ग्रेड पाने वाले विद्यार्थी का सारा श्रेय शिक्षक को जाता है ? क्या शिक्षकों के मूल्यांकन की पी आई पद्धति में असमान कक्षाओं, बेशुमार कोचिंग संस्थानों, विद्यार्थियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का उनके प्राप्तांकों पर पड़ने वाले प्रभाव को घटाने का कोई उपाय है ?

मान लीजिए किसी कक्षा में केवल 1 विद्यार्थी है। यदि वह A 1 ग्रेड ले आए तो शिक्षक का पीआई 100 होगा। A1 ग्रेड का अंक 90 से लेकर 100 के बीच कुछ भी हो सकता है। विद्यार्थी के प्राप्तांक और शिक्षक के पीआई का यह अंतर शत प्रतिशत उपलब्धि की अवधारणा को ही ध्वस्त कर देता है। विद्यार्थी का प्राप्तांक 91 और शिक्षक का पी आई 100 यह अजीब नहीं है? पी आई पर विद्यार्थियों की संख्या का भी खासा प्रभाव पड़ता है।

अंक और ग्रेड अलग-अलग प्रदान करना। विद्यार्थियों के लिए अंक को मुख्य मानना तथा ग्रेड मान को शिक्षकों की पी आई के लिए मुख्य मानना असंगत है। जहां आवश्यक हो पी आई से बेहतर विद्यार्थियों द्वारा अर्जित अंकों के मीन (माध्य) को माना जा सकता है। कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि यदि पी आई नहीं तो फिर शिक्षकों के मूल्यांकन का क्या आधार हो सकता है ? खराब प्रदर्शन करने वाले शिक्षक और अच्छा प्रदर्शन करने वाले शिक्षक कैसे पहचाने जायेंगे ? इसका उत्तर यही हो सकता है कि शिक्षण का मापन पी आई से करना शिक्षकों की पहचान को और धुंधला कर सकता है।

क्या शिक्षण का कोई अंकीय मान हो सकता है ? केवल बोर्ड कक्षाओं के परीक्षा परिणाम और उसके पी आई के आधार पर शिक्षण गुणवत्ता का मानकीकरण शैक्षिक आयामों का संकुचन है। यहीं यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि फिर प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं के शिक्षकों को किस आधार पर अच्छे और कम अच्छे शिक्षकों में वर्गीकृत किया जाएगा ?

किन्ही भी 2 शिक्षकों की तुलना पी आई के आधार पर तब तक नहीं की जा सकती जब तक दोनों शिक्षकों का विषय एक ही न हो और उनके विद्यार्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन एक ही व्यक्ति ने न किया हो। मूल्यांकन निर्दोष साबित होना भी आवश्यक है। जाहिर है यह असंभव जैसा है। यदि संस्कृत विषय में 60 पीआई लाने वाला शिक्षक विज्ञान विषय में 55 पीआई लाने वाले शिक्षक से खुद को श्रेष्ठ मानने लगे तो अव्वल यह तुलना ग़लत होगी दूसरे उपयोगिता का सवाल भी उठ जायेगा।

शिक्षण गुणवत्ता के आकलन का आधार बोर्ड के उत्तीर्ण विद्यार्थियों के ग्रेड पर निर्भर पी आई नहीं हो सकता। शिक्षकों का सतत समावेशी निरीक्षण ही युक्तिसंगत ठहरता है। उनके द्वारा पढ़ायी जाने वाली अन्य कक्षाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

शिक्षा का परीक्षा केंद्रित होते जाना स्वयं एक बड़ा संकट है। केवल बोर्ड कक्षा के परीक्षा परिणाम के पी आई के आधार पर शिक्षकों का कुशल और अकुशल में वर्गीकरण अन्य अनेक संकटों को जन्म देगा। शिक्षकों के बीच मान्य उत्कृष्टता भेदभाव पूर्ण होगी। क्योंकि अंततः एक शिक्षक शिक्षक ही होता है। कक्षाओं के आधार पर बड़ा या छोटा नहीं। 

शिक्षकों से अपील है कि यदि आप उचित समझें तो उपर्युक्त बिंदुओं पर संशोधन या सुझाव या अपनी राय रखें। परीक्षा केंद्रित हो चली शिक्षा को वास्तविक व्यापक लक्ष्यों की ओर मोड़ने के लिए शुद्ध प्रयत्न करें और निर्मल बुद्धि से नीति निर्धारकों के सम्मुख अपने मत रखें। 

- शशिभूषण