रविवार, 17 सितंबर 2017

कहानीकार गीताश्री और उनकी कहानियाँ

गीता श्री कहानीकार हैं। आजकल यह सरल वाक्य अधूरा लग सकता है। इसके बावजूद कहना चाहिए गीता श्री कहानीकार हैं। जैसा इधर का चलन है यदि कहा जाये कि गीताश्री महिला कथाकार हैं तो दस्तूर के मुताबिक बात पूरी लगेगी। लेकिन इस सायास परिचय का ख़ालीपन लेखकीय मन को उदास कर सकता है। बल्कि उदास करना चाहिए। भले, हालात बाक़ायदा ऐसे रूढ़ हो चले हों कि कहने वाले विशेषण जोड़कर पूरी बात कहेंगे- गीताश्री ने कहानी में स्त्री विमर्श को नया आयाम दिया है।

कहने का सामयिक अभिप्राय यानी समकालीन समीक्षा का अनुभूत अर्थात यह है कि स्त्री हैं तो महिला कथाकार हैं, और महिला कथाकार हैं तो स्त्री विमर्श की पैरोकार हैं। लगे हाथ कहानियों के प्रकाशन की शुरुआत भी राजेन्द्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’ से हुई हो, लेखिका में फ़ेमिनिस्ट आग्रह भी हों तो क्या कहने ! फिर समीकरण बड़ा सीधा है। दायां, बायां बराबर सिद्ध है। मज़े की बात यह है कि यह समीकरण राजेंद्र यादव से पहले की कथा लेखिकाओं पर भी आज के समीक्षकों द्वारा संतुलित है। हाथों हाथ इति सिद्धम है। इसलिए है तो गुस्ताख़ी की तरह ही लेकिन मेरा वाक्य सरल है कि गीताश्री कहानीकार हैं। कहानीकार यद्यपि स्त्रीलिंग नहीं है। लेकिन क्या करें अपनी हिंदी में महापुरुष का स्त्रीलिंग महास्त्री भी तो सुनने में अब तक के अभ्यस्त कानों के लिए अजीब ही है। 

यह सच है कि गीताश्री कहानी में देर से आई। उनके लेखन की शुरूआत वाया पत्रकारिता है। वे कहानीकार से पहले पत्रकार हैं। इस मूलनिवास और पुनर्वास फिर पारस्परिक आवाजाही को उनकी कहानियों में अलग से देखा जा सकता है, खूबियों खामियों समेत दिखता भी है; लेकिन मैं अभी चाहता हूँ कि यह देखा जाये गीताश्री किस तरह की कहानीकार हैं?

कहानियां दो तरह की होती हैं। पहली वह जो होती हैं, और संवाद के लिए सुनायी जाती हैं या स्थायित्व के लिए लिख डाली जाती है। दूसरी वह जो सुनाने से या लिखने से कहानी बनती हैं। लिखे जाने से पहले की कहानियां सबके जीवन में होती हैं। अपनी यही कहानियाँ हमें दूसरों की लिखी या सुनायी गयी कहानियों से जोड़ती हैं।

जिसके जीवन में जितनी विविधता होती है, जितने अनुभव होते हैं उसके जीवन में उतनी ही अनलिखी-अनपढ़ी कहानियां होती हैं। ये कहानियां याद आती रहती हैं, दूसरों को सुनाने के लिए उकसाती हैं। दूसरे तरह की कहानियाँ लिखने के दौरान ही जनमती हैं। इनका निर्माण और स्वरूप पूरी तरह कहानीकार की दक्षता और कौशल पर निर्भर करता है। ऐसा कोई लिखित नियम नहीं है कि लिखी गयी कहानी या अनुभव की कहानी में श्रेष्ठ कहानी कौन होगी। लेकिन इतना तय है कि अनुभव की कहानी यदि कहानीकार की सिद्धि का परस पा जाये तो वह यादगार होकर रहती है।

सुनाने के दौर का अंत हो जाने के बाद अब लिखना ही हर किस्म की कहानी की वास्तविक देह है और पढ़ना नियति या परिणति। कहा जा सकता है कि गीताश्री की कहानियां उनके अनुभव में आयी कहानियां हैं जिन्हें उन्होंने कभी जल्दी में तो कभी धैर्य के साथ अधिकतर पत्रकारीय कुशलता से लिखा है। इसीलिए बाक़ायदा लिखी गयी कहानियों की दुनिया में गीताश्री की कहानियां कहीं कम गोल तो कहीं अधिक सिंकी हैं। 

आइये अब इस बात पर चर्चा करते हैं कि गीताश्री की कहानियों की मूल प्रवृत्तियाँ क्या हैं? हिंदी कहानी के वृहद आकाश में उनका स्थान क्या है? जब मैं गीताश्री की कहानियों के विषय में विचार करता हूँ, तो मुझे हिंदी कहानी का बडा परिदृश्य दिखाई पड़ता है। हिंदी कहानी का यह परिदृश्य लगभग सवा सौ साल का है। यह कहते हुए मुझे खुशी भी महसूस होती है और आश्वस्ति भी अनुभूत होती है कि आधुनिक हिंदी कहानी के करीब सवा सौ साल हिंदी की समृद्धि के भी साल हैं। 

इतने वर्षों में एक से एक कथाकार और एक से बढ़कर एक कालजयी कहानियां हमारे सामने आई हैं। जिस दौर में गीताश्री ने कहानियां लिखनी शुरू कीं, वह दौर आत्मकथाओं का दौर था, और विमर्शों का दौर था। लघु पत्रिकाओं की प्रमुख उपस्थिति या वर्चस्व का दौर। यानी जो भी साहित्यिक उपलब्धियाँ थीं, वे विमर्शों के माध्यम से और लघु पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकट हो रही थी। आत्मकथाओं में प्रमुख रूप से दलितों, स्त्रियों की आत्मकथाएँ थीं। कहीं-कहीं आत्मकथ्य की शैली में विमर्श की बात भी परिदृश्य में थी। ये आत्मकथाएं भारतीय भाषाओं से अनूदित होकर हिंदी में आ रही थीं, अंग्रेजी से आ रही थी, और इनके अतिरिक्त विमर्श थे, जिनमें दलित विमर्श और स्त्री विमर्श प्रमुख थे। इस प्रकार लघु पत्रिकाओं के माध्यम से आया सारा नया साहित्य हमारे सामने दो रूप में आया, एक जो विमर्शों से पैदा हो रहा था और दूसरा जो विमर्श पैदा कर रहा था। हालांकि जो कहानियां विमर्श पैदा कर रही थीं, उन्हें उतनी तवज्जो नहीं दी गयी क्योंकि विमर्श खड़े किए जा रहे थे या विमर्श खड़े करना मुख्य ध्येय था। उन्हीं कृतियों के सम्बन्ध में विमर्श की आवश्यकता महसूस हुई। 

गीताश्री की कहानियाँ जब आईं, तो स्त्री विमर्श का दौर था, दलित विमर्श का दौर था। हंस में प्रकाशित कहानी के केंद्र में स्त्री विमर्श था। गीताश्री की कहानियों में स्त्री विमर्श ही मुख्य है। उनकी कहानियों की स्त्री युवती है, विवाहिता है, स्वाबलंबी है, कामकाजी है, जुझारू है, अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीने वाली है। वह अपने स्वायत्त निर्णयों एवं पहल से थोड़ी हलचल पैदा करने वाली भी है। कह सकते हैं आज स्त्री जैसी भी है और समाज में इसकी जो भी भूमिका है, वही स्त्री गीताश्री की कहानियों की धुरी है। हम गीताश्री की कहानियों की स्त्रियों को तत्कालीन आत्मकथाओं की स्त्रियों से सबल, प्रगतिशील और स्वाबलंबी पाते हैं। आत्मकथाओं में जो स्त्रियाँ हैं उनसे बेहतर पाते हैं। आप प्रभा खेतान की आत्मकथा और उसमें वर्णित स्त्री याद कर सकते हैं। वह स्त्री भावुक है। दुखी स्त्री है। हमारी यही धारणा बनती है कि स्त्री आज भी वही है। यानी साहित्य और समाज में अत्यंत सक्रिय प्रभा खेतान, जिनका बड़ा सार्वजनिक जीवन भी था, वो भी जब अपनी आत्मकथा में आती हैं तो कस्बाई, दीनहीन और छली गयी स्त्री से भिन्न नहीं दिखती हैं। इसके उलट गीताश्री की कहानियों में जो स्त्री आती है, वह एकदम भिन्न है। उसे प्रेम में छली गयी, भावात्मक सुकून तलाशती स्त्री ही नहीं कह सकते। 

गीताश्री की पहली कहानी ‘प्रार्थना के बाहर’ में दो स्त्रियाँ हैं। यद्यपि वे सहेली हैं लेकिन प्रकृति से पूर्णतया भिन्न हैं। एक लड़की खुद को कस्बाई और कथित आदर्श समाज में आदर्श स्थापित करने वाली बनाना चाहती है। जिस पर कोई उँगली न उठा सके। उसके बारे में कोई सवाल न खड़ा किया जा सके, वैसी स्त्री खुद को समझती है। वह अपनी साथिन लड़की को लेकर बहुत प्रश्नाकुल है कि कैसी लड़की है यह जो लड़कों के साथ इतना स्वच्छंद व्यवहार करती है। निश्चित ही इसके जीवन में एक दिन प्रश्न ही प्रश्न रह जाएंगे और बुरी तरह पछ्ताएगी। वह अपने जीवन को संयमित बनाने की कोशिश में लगातार रहती है। मगर अंत में होता यह है कि वही लड़की जो अपनी जरूरतों, कल्पनाओं में पूरी तरह से डूबती है, इच्छित साहचर्य जीती है, पढ़ती भी है और सफल होती है। यही लड़की आप कह सकते हैं कि जो प्रभा खेतान हो सकती है एकदम से चौंक जाती है -ये तो हमसे आगे निकल गयी, कहीं न कहीं यही सफल है। मैं तो यों ही रह गयी। 

गीताश्री की कहानियां उन स्त्रियों की कहानियाँ हैं जो जुझारू हैं, समाज में योगदान देने वाली नागरिक हैं। हालांकि गीताश्री की कहानियों पर कई आरोप भी हैं जैसे उन्होंने यौनिकता को आरोपित कर बहुत बढ़ावा दिया है, महिमामंडित कर यौनिकता को केंद्र में रख दिया है। मेरी देह मेरे चुनाव का राग छेड़ दिया है। यौनिकता का केन्द्र में होना स्त्रियों को कमजोर करता है। स्त्री की आकांक्षाओं के आकाश को सीमित कर देता है। मेरी राय में एक अच्छी बात यह है कि गीताश्री की कहानियों की स्त्रियाँ यौनिकता को लेकर स्वच्छंद नहीं अपराधबोध से मुक्त हैं। वे अपने जीवन में आ जाने वाले भरोसे, उल्लास और पुरुष साहचर्य को अकुंठ स्वीकार करती हैं। यही कारण है कि ‘प्रार्थना के बाहर’ की दूसरी लड़की अकादमिक और प्रतियोगी परीक्षाओं और सफलता की दृष्टि से पिछड़ी हुई नहीं है। वह ग्लानि और अपराधबोध में नहीं है। यहीं हम कह सकते हैं कि गीताश्री की कहानियों के केंद्र में स्त्री है। भले ही वह एक गंवई स्त्री के रूप में आ रही हो, मगर वह नागर स्त्री ही है। गीताश्री की कहानियों की संवेदना नागर स्त्री की संवेदना है। उसकी मानसिकता शहरी मध्यवर्ग की ही है। इस दृष्टि से कहानीकार ईमानदार हैं। खुद को अपने अनुभवों से बाहर प्रक्षेपित नहीं करती हैं। वे उस क्षेत्र में जाकर अजूबे निर्णय नहीं लाना चाहती हैं, जो उनके अनुभव क्षेत्र के बाहर के हैं। यहीं आप उस प्रवृत्ति को भी गीताश्री की कहानियों में रेखांकित कर सकते हैं कि जो आत्मकथाओं की लेखिकाएं हैं वे भी अपना अनुभूत सत्य बता रही हैं और गीताश्री अपनी कहानियों में जिन स्त्रियों को ला रही हैं वे भी उनके अनुभव संसार की हैं। कहानीकार गीताश्री का कथासंसार और निजी कार्यक्षेत्र महानगरीय कार्यक्षेत्र है। पत्रकारिता के अनुभव उनके पास हैं। शहरों का अकेलापन, अवसाद, उदासी और एक ऐसी स्थिति जहां थोड़ी सी आत्मीयता से भी प्रेम के अंकुर फूट पड़ते हैं ये सब गीताश्री की कहानियों में दिखाई देते हैं। 

अब यह सवाल उठता है कि क्या गीताश्री केवल स्त्री विमर्श की कहानीकार हैं? निश्चित रूप से किसी भी कहानीकार की प्रतिबद्धता को इससे आंका नहीं जाना चाहिए कि उसमें किसी विशेष विषय को प्राथमिकता दी गयी है। या किसी विमर्श विशेष की बात करने की कोशिश की गयी है। कहानी हमेशा अपने निहितार्थों, परिणति में बड़ी या महत्वपूर्ण होती है। गीताश्री की एक कहानी में महानगरीय दफ्तर का परिवेश है। कहानी मे एक अफसर है, जिसे बॉस कहा जाता है। वह अपने ही दफ्तर की कर्मचारी लड़की के पहनावे पर टिप्पणी करता है। लड़की दुखी होती है लेकिन वह विवश है। सहना ही उसके वश में है। कहानी हमारे सामने बड़े यथार्थ की तरह तब प्रकट होती है जब लड़की खुद को खुली और आज़ाद महसूस करती है। इसी को एन्जॉय करने वह एक न्यूड पार्टी में जाती है। वहां अपने उसी बॉस को देखकर वह चौंक जाती है। अरे, यह तो वही है जो पहनावे को लेकर इतना चीखता है, इतना नैतिक था। इस कहानी में एक पुराना छद्म सामने आता है कि दरअसल स्त्री के लिए जो नैतिकताएं हैं वो गुलाम, उपभोग्य बनाए रखने की ही युक्तियाँ हैं। 

अब विमर्शों की बात करें तो, हम पाएंगे कि हिंदी कहानी ने अनेक आन्दोलनों को देखा है। लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी आन्दोलन हिंदी कहानी में कोई नियामक भूमिका नहीं निभा पाया। जनवादी कहानी, समान्तर कहानी आदि आदि जितने भी आन्दोलन आए, वे नेतृत्वकर्ताओं की निजी धमक से आगे नहीं बढ़ सके। कहानी के बारे में मुझे एक फिल्मी उक्ति बड़ी सच लगती है कि कहानी वह झूठ है जो हमें सच तक लेकर जाता है। जो गल्प है, जैसा कहानी का ताना बाना है, उसके अन्दर आने वाले जो चरित्र हैं, निश्चित रूप से वे किसी बने बनाए खांचे या धारणाओं में नहीं अटते हैं। कहानीकार की दृष्टि, जिद्द, कल्पना शक्ति एवं सृजन क्षमता से ही कोई कथ्य कहानी बनता है। मार्मिकता में ही कहानी सबसे अधिक प्रभावित करती है एवं अमिट होती है। यह एक जांचा परखा पाठकीय सत्य है।

एक दूसरा उदाहरण लेते हैं- मशहूर लेखिका और उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में जो स्त्री है, कस्तूरी कुण्डलि बसै की जो लड़की है, जो माँ है और गीताश्री की कहानी ‘अन्हरिया रात बौरानी…’ में जो स्त्री है तो आप देखेंगे कि साहित्य में आरोप क्या है, अपेक्षाएं क्या हैं और वास्तविकताएं क्या हैं? आरोप लगाने वाली आत्मकथा में आती हैं तो कौन सा यथार्थ प्रकट करती हैं, और जब अपेक्षाओं में उतरती हैं तो कैसे कैसे मांगपत्र पेश करती हैं। यह ऐसे चरित्रों की, सामाजिक सत्यों की मांग सूची होती है जिसे कोई भी कहानीकार पूरा नहीं कर सकता है। मुझे लगता है आज प्रेमचंद भी अपना उपन्यास गोदान लेकर आते तो उन्हें यह सलाह दे देता कोई प्रकाशक कि ये क्या शीर्षक है? गोदान का क्या औचित्य है? कहने का मकसद यह है कि हमें स्त्री यौनिकता के विषय में साफ और निरपेक्ष नज़रिया रखना ही होगा। ‘अन्हरिया रात बैरनिया हो…’ में जो बहू है, भाभी है उसका पति परदेश में है। वह यौन अतृप्ति और विक्षिप्तता में जी रही है। एक दिन इतनी पीड़ित हो जाती है कि बाध्य होकर अपने सुख की खातिर घर छोड़कर ही चली जाती है। यहीं हमें यह समझना होगा कि इस तरह भूत प्रेत की सतायी मानी जानेवाली देवर के साथ भागने को विवश स्त्रियाँ हमारे समाज में क्या जोड़ रही हैं। किन चीज़ों से ऊपर उठने की जद्दोजहद में हैं। क्या वे हमारे समाज को आगे ले जाने की दिशा में सक्रिय हैं? क्या ये हमारी जानी पहचानी लड़कियों जैसी हैं? जब हम ये सवाल खुद से पूछेंगे तो मुझे लगता है कि गीताश्री की कहानियों की वैधता और प्रासंगकिता हमारे बीच स्पष्ट होगी।

किसी कहानीकार से दूसरी बड़ी अपेक्षा होती है कि वह अपने समय की कहानी को शिल्प या रूप की दृष्टि से कितना आगे लेकर जा रहा है? क्योंकि ऐसे तो कहानी बड़ी प्राचीन विधा है। हमेशा से कही जा रही है, हमेशा से सुनी जा रही है, पढी या लिखी जा रही है। लेकिन क्या समाज ही कभी आमूल चूल बदल पाता है? वह पूरी तरह नया हो पाता है? शायद नहीं। यही कारण है कि आज भले ही लोकतंत्र आया हो, हम उत्तर आधुनिक कहे जा रहे हों मगर 2017 में भी हज़ारों करोड़ रूपए के कुम्भ मेले आयोजित हो रहे हैं, संसद को मंदिर कहा जा रहा है, हमारा लोकतांत्रिक रूप से चुना गया प्रतिनिधि उसमें माथा टेक रहा है। तो एक ऐसा समाज जहाँ धर्म प्रतिबद्धता भी हो, जहां अनेक रूपों में मनुष्य का जीवन अनेक सदियों में गति करता हो, वहां फौरी तौर पर यह कह देना कि लेखक आखिर क्या प्रयोग कर रहा है? उसने कहानी में ऐसा नया क्या किया है? तो हमें धैर्य के साथ नए को पुरानेपन में भी देखना होगा। 

इस सवाल के जवाब में कि क्या गीताश्री कहानी को शिल्प के स्तर पर आगे ले आई हैं या वहीं हैं? मैं निर्ममता से यह कहूँगा कि भाषा और शिल्प और कथ्य के स्तर पर गीताश्री ऊँची सीढ़ी चढ़ चुकी कहानीकार नहीं ठहरती हैं। उनकी चिंताएं बड़ी हैं, प्रतिबद्धताएं बड़ी हैं, उनकी साहसिकता बड़ी है, वे एक नागरिक के रूप में स्त्री को सामने ला रही हैं। यही उनका प्रमुख हस्तक्षेप भी है, लेकिन प्रयोग के स्तर पर कहानी को आगे ले जाने की दृष्टि से गीताश्री को अभी लंबी दूरी तय करनी है।

एक अन्य सवाल -क्या गीताश्री का दायरा विमर्श ही हैं या इन विमर्शों से ऊपर उठकर उन्होंने कोई निजता भी हासिल की है? का जवाब है कि गीता श्री को इस दिशा में खुद साबित करना काफी हद तक शेष है। मुद्दों पर कहानी लिखी जा सकती है। जैसे देशद्रोह पर लिखी जा सकती है, गौ रक्षा पर लिखी जा सकती है, नोट्बंदी पर लिखी जा सकती है, लेकिन यह कहानी क्या कहानीकार की उस गरिमा के साथ प्रकट हो पाएगी, जिसका हमें अब तक कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, ममता कालिया आदि की कहानियों में अनुभव हो चुका है? यह महत्वपूर्ण अपेक्षा हो सकती है। गीताश्री की कहानियों की संवेदना नगरीय है, शहरी मध्यवर्ग ही उनकी चिंता के केंद्र में है। यदि इस आलोक में और देखें तो हमारा मध्यवर्ग जो अक्सर गुलाटी खाता रहता है, आज उसके पास न तो कोई क्रांतिकारी नेतृत्व है, न कोई परिवर्तनकारी समझ, जिसमें हम यह उम्मीद देख सकें कि हम वाकई लोकतांत्रिक ऊंचाई छूने जा रहे हैं। उलझा हुआ, आत्ममुग्धता, का, अकेलेपन का शिकार और आत्मकेन्द्रित वैयक्तिकताओं में जीता हुआ हर तरह के मूल्यों के क्षरण को भोगता हुआ जो समाज है, उसमें यथार्थ ही मसाल है। कोई आगे चलती हुई मशाल लेकर चलनेवाला नहीं दिखता है। हमने आन्दोलन देखे, उभरते हुए नेता देखे, पूँजी से भरते हुए धार्मिक, आध्यात्मिक, मीडिया के लोग देखे, नयी राजनीति तक ले जाने के वादे करने वाले और अफवाहों का धंधा करने वाले प्रधानसेवक देखे। अब इतना कुछ देखने के बाद हम कहानीकार से यही अपेक्षा कर सकते हैं कि वह यथार्थ को अभिव्यक्त करे। इस लिहाज़ से हम अपने बीच गीताश्री को एक प्रॉमिसिंग कहानीकार के रूप में देख सकते हैं। उनके कहानी लेखन में समाज के अलग अलग तबकों को शामिल करने की प्रवृत्ति है। हालांकि उन्होंने जितना घूमा है, जितनी दुनिया देखी है, जितना कहानी में समेटा है, उसी से हमें गीताश्री से और भी बेहतर की अपेक्षा है। 

गीताश्री की कहानियों का रास्ता उनका निजी रास्ता है। इन दिनों की दिशाहीन कहानियों, और ऐसी कहानियों के दौर में जिनमें कोई राजनीतिक चेतना नहीं है, परिवर्तन की ललक नहीं है, नायक सिरजने और उन्हें स्थापित करने की कोई ललक नहीं है, और ऐसी कहानियां नहीं लिखी जा रही हैं जो समाज को बदल सकें, ऐसी कोई प्रयत्नशीलता नहीं है, तो छुटपुट जो आलोकभरी कहानियाँ हैं जिसके बारे में हम यह उम्मीद करते हैं कि यही अपने नायक खुद पैदा करेंगी। तो ऐसे दौर की कहानियों में गीताश्री का अपना एक अच्छा स्थान बनता दिखता है। 

यह नहीं भूलना चाहिए कि सक्रिय वैचारिक कहानियों के अपने जोखिम होते हैं। यदि गीता श्री विचार परक कहानियाँ नहीं लिख रही हैं तो इसे किसी बड़ी कमी की तरह ही नहीं देखा जाना चाहिए। मुझे याद आता है कि अपने देश में जब अन्ना आन्दोलन शुरू हुआ था तो अखिलेश ने ‘श्रृंखला’ नाम से एक कहानी लिखी थी। जिस कहानी के विषय में मशहूर लेखक-संपादक रवीन्द्र कालिया ने संपादकीय में कहा था कि यह कहानी हमारे समाज की यथास्थिति में आ रहे बड़े बदलावों के बारे में दिखा रही है। कहानी अपनी रचनात्मकता के साथ आंदोलन के पैदा होने को समग्रता में देख पा रही है। जिस तरह के परिवर्तनकारी आंदोलन का वर्णन कहानी में है संयोग से वैसा ही कुछ देश में घटित होता दिख रहा है। लेकिन दुर्भाग्य से कालिया जी अब हमारे बीच नहीं हैं और हमने उस आन्दोलन की परिणिति चरमपंथी युग में भारत के गर्क होते जाने की दृष्टि से देख रहे हैं। देश उन्नत होने की बजाय गृह युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। लोकतंत्र पर ही अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है। यहीं समझना आवश्यक है कि कहानी जब हमारे सामने एक यथार्थ रखती है, स्वप्न रचती है तो कालांतर में उस यथार्थ एवं स्वप्न के पूरी तरह असफल हो जाने की दशा में भी कहानी को हम इस तरह से भी देखते हैं कि तब ऐसा देखा गया था, या तब ऐसा हुआ था या ऐसा होना चाहिए। जब लोग हमें किसी रूप में दीखते हैं मगर वैसे होते नही हैं तब कहानीकार इसका भी समाज के समक्ष साक्ष्य रख देना चाहता है। यहीं, कहानी स्मृतिपरक दस्तावेज बनती है। यह समृति हमें भविष्य के प्रति सचेत करती है। कहानी का महत्व पूरी तरह सच साबित हो जाने के अतिरिक्त इसमें भी बहुत होता है।

कुल मिलाकर गीताश्री सार्थक कहानियां लिख रही हैं। मैंने उनकी जितनी कहानियां पढ़ी हैं उनमें हमारे समय का विश्वसनीय अक्स है। इस कहानीकार से जितनी उम्मीद है उतना ही इनपर यकीन भी है।

-शशिभूषण



शनिवार, 9 सितंबर 2017

सच्चाई राख से भी उठकर खड़ी होगी

गौरी लंकेश की स्मृति में प्रतिरोध सभा में लिया संकल्प - अब बर्दाश्त और नहीं
विनीत तिवारी-सारिका श्रीवास्तव

5 सितम्बर 2017 को बेंगलुरु की पत्रकार एवं सम्पादक गौरी लंकेश की सम्प्रदायवादियों द्वारा हत्या कर दी गई। इसके प्रति अपना विरोध और आक्रोश दर्ज कराने 7 सितम्बर 2017 को शाम 5 बजे से इंदौर में रीगल चौराहे, गाँधी प्रतिमा पर करीब 400-450 लोग एकत्र हुए। 

नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद इस चौथी हत्या से लोगों में इतना आक्रोश था कि अकेले इंदौर शहर में ही श्रद्धांजलि के तीन अलग-अलग कार्यक्रम हुए। जिनमें से दो कार्यक्रम दो अलग-अलग प्रेस क्लब के ही थे।

शहर के लोगों को श्रद्धांजलि सभा से संतोष नहीं था इसलिए अलग-अलग राजनीतिक दल और संगठन सड़क पर आए और लगातार हो रहे विचारों पर हमले के विरोध में एकजुट होकर करीब दो घण्टे का मौन प्रदर्शन भी किया, जनगीत गाए और मोमबत्ती जलाकर शहीद हुए लेखकों को अपने जज्बे और दुख की सलामी दी।

इस विरोध प्रदर्शन का महत्त्व तब और बढ़ गया जब मेधा पाटकर औऱ नर्मदा आंदोलन के साथियों को हमने इस विरोध प्रदर्शन की इत्तला दी तो मेधा अपने करीब 200 से 250 साथियों के साथ अविलंब इस प्रदर्शन में शरीक हो गईं। करीब तीन दशक से अपने रहने, खाने, कमाने और वजूद के लिए सतत आंदोलन कर रहे नर्मदा आंदोलन के साथी जिनकी इसी दिन कई केस में से एक केस की सुनवाई थी शामिल हुए। नर्मदा बचाओ आंदोलनकारी एनसीए यानी नर्मदा कन्ट्रोल अथॉरिटी में हो रहे भ्रष्टाचार से निपटने और भ्रष्टाचारियों को यह समझाने कि हम गाँव में रहने वाले किसान, मजदूर, मछुआरे लोग जरूर हैं लेकिन अन्याय और शोषण सहित बहुत कुछ समझते हैं और आपके हर तरह के भ्रष्टाचार पर नजर भी रखे हुए हैं; अपने केस की सुनवाई के साथ ही साथ वे एनसीए यानी नर्मदा कन्ट्रोल अथॉरिटी से आमने-सामने बैठ दो-टूक बात करने के लिए मेधा पाटकार के साथ इंदौर आए थे।

इन सबके साथ ही बड़ी संख्या में शहर के युवा, महिलाएँ और बच्चे शरीक हुए। इस विरोध प्रदर्शन में शहर के वरिष्ठ एवं गणमान्य नागरिक, कुछ ऐसे साथी स्वास्थ्य खराब था शरीक हुए और अपनी नाराजगी दर्ज कराई। कॉमरेड पेरिन दाजी, कॉ वसन्त शिंत्रे, इप्टा इंदौर के संस्थापक और वरिष्ठ वकील आनंद मोहन माथुर जैसे साथी जो खड़े रह सकने में भी असमर्थ थे शामिल हुए। युवा साथियों ने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उन्हें बैठने के लिए स्टूल की व्यवस्था की। शैला शिंत्रे, कल्याण जैन के साथ-साथ नर्मदा आंदोलन की जुझारू नेत्री मेधा पाटकर अपने आंदोलन के साथियों सहित पूरे समय उपस्थित रहीं। जोशी एन्ड अधिकारी रिसर्च इंस्टीट्यट, दिल्ली की प्रमुख एवं सामाजिक अर्थशास्त्री जया मेहता, स्वास्थ्य के मुद्दों और ड्रग ट्रायल की डरावनी सच्चाई को सामने लाने वाली और महिलाओं के आंदोलन से जुड़ी कल्पना मेहता, मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव कॉ विनीत तिवारी भी सक्रिय रूप से उपस्थित रहे। इनके अलावा सीपीआई के जिला सचिव कॉमरेड रुद्रपाल यादव, कैलाश गोठानिया, कॉ दशरथ, सी.पी.एम. से कॉ अरुण चौहान, के.के.मिश्रा, एस यू सी आई से कॉ प्रमोद नामदेव, इसी के महिला संगठन से अर्शी, समाजवादी पार्टी से रामस्वरूप मंत्री, प्रगतिशील लेखक संघ से केसरी सिंह चिढार, चुन्नीलाल वाधवानी, मुकेश पाटीदार, मध्य प्रदेश भारतीय महिला फेडरेशन की महासचिव सारिका श्रीवास्तव, इसी की इंदौर इकाई की सचिव नेहा दुबे और अन्य सदस्य सुलभा लागू, पँखुरी, कामना, सुधा कोठारी, भारतीय जन नाट्य संघ से विजय दलाल, प्रमोद बागड़ी, अरविंद पोरवाल, रूपांकन से अशोक दुबे, दीपिका, विकी, नर्मदा घाटी आंदोलन के साथी रहमत, हिम्शी, देवराम भाई, कमलू दीदी, चिन्मय एवम सरोज मिश्र, जनवादी लेखक संघ से रजनीरमण शर्मा, परेश टोककर, सुरेश उपाध्याय, भगत सिंह दीवाने ब्रिगेड से विजय जाटव, शादाब गौरी, शाहरुख, कुछ पत्रकार, कार्टूनिस्ट और कलाकार साथी दीपक असीम, सौरभ बनर्जी, नवनीत शुक्ला, गिरीश मालवीय, हेमन्त मालवीय, सुन्दर गुर्जर, सदभावना एवं शांति एकजुटता संगठन से शफी शेख, मुस्ताख़ भाई बड़नगर वाला, आम आदमी पार्टी से युवराज सिंह और उनके साथी, फ़ाईन आर्ट कॉलेज के विद्यार्थी, पाशा मियाँ इत्यादि भी सम्मिलित हुए।

लोगों की यह उपस्थिति उनके अंदर छुपे दुःख आक्रोश एवं न्याय तथा संघर्ष के प्रति संलग्नता को दर्शाती है। बड़ी संख्या में यह मौजूदगी बताती है कि दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और अब गौरी लंकेश को एक-एक कर खो देने के बाद अब और नहीं। अब तक हम चुप थे लेकिन अब अपना मौन तोड़ते हुए क्रूर हत्यारों और उनकी समर्थक सत्ताओं को चेता रहे हैं कि अब अपने किन्हीं और साथियों को हम नहीं खोएंगे। 

इस विरोध प्रदर्शन में अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले कई राजनीतिक दलों के लोगों के अतिरिक्त सन्दर्भ केन्द्र इंदौर, इप्टा, भारतीय महिला फेडरेशन, प्रगतिशील लेखक संघ, सीपीआई,सीपीआई(एम), जनवादी लेखक संघ, रूपांकन, एसयूसीआई(सी), भगत सिंह दीवाने ब्रिगेड, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं कलाकारों के संगठन और शहर के अनेक शांति एवं न्यायप्रिय तथा संवेदनशील नागरिक शरीक हुए।

रविवार, 3 सितंबर 2017

अमेय कांत और शशिभूषण की रचनाओं का पाठ

'कवि अपने समकाल को रचते हुए इतिहास को दर्ज करने का कार्य भी करता है' – देवी अहिल्या केन्द्रीय पुस्तकालय, इंदौर में २६ अगस्त २०१७ (शनिवार) को आयोजित जनवादी लेखक संघ, इंदौर के ४५ वें मासिक रचनापाठ में युवा कवि अमेय कान्त की कविताओं पर चर्चा करते हुए प्रदीप मिश्र ने कहा। इस अवसर पर अमेय कान्त (देवास) व शशिभूषण (उज्जैन) ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। 

अमेय ने 'गुंजाइश', 'माँ ने एक गीत गाया', 'गए हुए लोग', 'भीमसेन जोशी', 'बाम की पुरानी डिबिया', 'चहचहाहट', 'चौराहों पर कुत्ते', 'छूटी हुई दुनिया' आदि कुछ कविताओं का पाठ किया जबकि शशिभूषण ने अपनी कहानी 'जाति-दण्ड' का पाठ किया।

कविताओं पर चर्चा करते हुए प्रो. पद्मा सिंह ने कहा कि ये पाठक के मन में उतरने वाली कविताएँ हैं जबकि ब्रजेश कानूनगो व प्रदीप कान्त ने इन्हें अनुभूति और भाव की सघनाताओं की कविताएें कहा। वेद हिमांशु ने कविताओं की लोक संवेदना पर चर्चा की तो पुनर्वसु जोशी ने रेखांकित किया कि यह बाजारवाद के युग में आत्मीय मानवीय संबंधों की कविताएँ हैं जो धीरे धीरे समाज से ख़त्म होते जा रहे हैं। विनीत तिवारी ने इन कविताओं के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की और कहा कि कवि स्मृति के सूत्र पकड़कर कविता में जाता है। किन्तु इनमे सांसारिक चिंताओं का असर अभी बाकी है। शशिभूषण ने कहा कि इन कविताओं में जीवन के भीतर उतरने की प्रवृत्ति है। प्रभु जोशी ने भी इन कविताओं पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि कवि को ही सोचना है कि वह क्या छोड़े और क्या दर्ज करे जिससे कविता, कविता की तरह से आए। अमेय की माँ पर लिखी कविताओं पर उन्होंने कहा कि वे मां के प्रेम की छवियाँ लेकर आते हैं और माँ का प्रेम वह है जो भाषा के ठिठकने के बाद शुरू होता है। वरिष्ठ कवि राजकुमार कुंभज ने कहा कि कवि की कविता का ढांचा नया और अलग से दिखना चाहिए और इस मायने में 'भीमसेन जोशी' उनकी एक बड़ी कविता है। 
शशिभूषण की कहानी पर चर्चा करते हुए जीवन सिंह ठाकुर ने कहा कि यह एक सुगठित कहानी है जिसमें पूरा परिवेश ही एक पात्र है। कहानी कई सवाल खड़े करती है। कहानी में उठने वाले सवाल महत्वपूर्ण हैं। प्रकाश कान्त ने इस कहानी में वर्णित शैक्षणिक संस्थानों में फैले ध्रुवीकरण को इंगित किया तो प्रभु जोशी ने कहा कि यह दक्ष कथाकार की कहानी है जो सवर्ण और दलित के द्वैत को बड़ी बारीकी से समर्थ भाषा में बुनती है। कहानी का अंत विशिष्ट है। यह एक मेटाफर की तरह है। विनीत तिवारी ने इस कहानी में कुछ खूबियों के साथ करुणा के अभाव की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा यह अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसमें दलित की उपस्थिति भी होनी चाहिए थी। राजकुमार कुम्भज ने इस कहानी को भाषा और शिल्प की एक बेहतरीन कहानी बताया। उन्होंने कहा हमें बड़ी ख़ुशी है कि एक समर्थ कहानी कार हमारे बीच है। चुन्नीलाल वाधवानी, डॉ रमेश चन्द्र, अशोक शर्मा भारती, सारिका श्रीवास्तव आदि ने भी दोनों रचनाकारों की रचनाओं पर चर्चा की।

कार्यक्रम में राजकुमार कुम्भज के नए कविता संग्रह 'शायद यह जंगल कभी घर बने' का लोकार्पण भी किया गया। हाल ही में दिवंगत हुए कवि चंद्रकांत देवताले की कविता 'यमराज की दिशा' का पाठ कर उनको श्रद्धांजली अर्पित की गयी। साथ ही जलेस इंदौर इकाई ने निर्णय लिया कि अगले एक साल तक सभी कार्यक्रमों की शुरुआत देवताले जी की कविताओं के पाठ से होगी। इस अवसर पर 'पूरा सच' के संपादक रहे पत्रकार रामचंद्र क्षत्रपति को याद किया गया गया जिन्होंने अपने अखबार 'पूरा सच' में सबसे पहले राम-रहीम उर्फ गुरमीत की पोल खोली थी, साध्वी की चिट्ठी छापी थी, जिसके बाद उनको मरवा दिया गया था। साध्वियों और उन सभी लोगों की सराहना की गयी जिन्होंने बलात्कारी बाबा को सज़ा दिलवाने में सक्रिय भूमिका निभायी। कार्यक्रम का संचालन रजनी रमण शर्मा ने किया और आभार देवेन्द्र रिणवा ने माना।


- प्रदीप कांत

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

राष्ट्र के नाम एक नागरिक का संदेश

प्यारे देशवासियो,

भारत एक महान देश है। भारत एक विशाल देश है। भारत की सुंदरता अतुलनीय है। भारत की महानता का पूरा श्रेय यहां की धरती, प्रकृति और निवासियों को जाता है। सदियों से भारत में ऐसे महान इंसान होते आये हैं जिन्होंने भारत को बड़े दिल का देश बनाया। यहां सब प्रेमपूर्वक रह सकें इस लायक बनाया। ऐसा देश जिसके दिल में सबके लिए बराबर जगह हो।

भारत की महानता इसकी प्राकृतिक विविधता में तो है ही इस बात में सबसे अधिक है कि यह संस्कृतियों का महासंगम है। यदि आप अलग-अलग संस्कृति, धर्म, कला, इंसानियत और सहकार की ऊंचाइयों को देखना चाहते हैं और संयोग से भारत में पैदा हुए हैं तो फिर आपको कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है। भारत दर्शन ही जगत दर्शन है। जिहोंने पूरी दुनिया अपनी आंखों से देखी और देशों की महानताओं की तुलना कर सकने लायक जीवन में योग्यता हासिल की उन सबका कहना है कि मनुष्यता की दृष्टि से भारत सबसे महान भूमि है। यहां सब लोग भाईचारे के साथ रह सकें इसके गुण यहां की मिट्टी में ही हैं।

प्यारे देशवासियों, हम सौभाग्य एवं सत्कर्मों की धरती में रहते हैं तो इसका मतलब यह नहीं समझना चाहिए कि दुर्भाग्य और दुष्कर्म हमें घात लगाकर नहीं देखते रहते हैं। बुराइयां हमें नीचा दिखाने और हमारी कमर तोड़ देने के लिए दिन रात कोशिश करती हैं। वे कभी-कभी जीत भी जाती हैं। यही कारण हैं कि हम आज तक स्वावलंबी नहीं हो पाए, हमारे नौजवान बेरोज़गार भटकते हैं, हमारी लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है, दहेज स्त्रियों को ज़िंदा जल देता है, जातिवाद ज़िंदगियां तबाह करता है, कितनी कलियां जाति के बूट में कुचल जाती हैं, साम्प्रदायिकता हंसते-खेलते आंगनों में लाश गिरा देती हैं, आतंकवाद शांति के फूल नोच लेता है और सत्ता के चरमपंथी कंस बीमार बच्चों से प्राणवायु छीन लेते है। मुनाफे का धंधा ग़रीबों का खून चूस लेता है। यह सब हमारे देश को खोखला कर नष्ट करता जा रहा है। यह बताने की ज़रूरत नहीं साफ साफ दिख रहा है। जो आंखों के सामने है, जिस नफ़रत को रोज़ बोया जा रहा है उससे गाफ़िल रखने के झूठे लंबे-लंबे वादे और भाषण और भयानक हैं। राजनीति का स्वार्थी, अलगाववादी, चरमपंथी और भ्रष्ट होते जाना सबसे भयानक त्रासदी है।

प्यारे देशवासियों, लेकिन राहत की ज़िंदादिल बात यह है कि भारत हमेशा से बुराइयों पर विजय पाता आया है। कोई आसुरी सत्ता, लोभी शक्ति यहां अधिक दिन टिकी नहीं है। सबके घमंड चूर हुए हैं। सब नराधमों को भारत ने मिट्टी में मिलते देखा है इसलिये निराश होने की ज़रूरत नहीं है। हारकर बैठने की ज़रूरत नहीं है। आवश्यकता है बड़े मन से, साफ़ हाथों से परिश्रम करने की। भाईचारा रखने और बांटने की। किसी किस्म की नफरत की राजनीति से हमें हमेशा दूर रहना होगा। बांटने की बातें, किसी भी एक धर्म को सर्वश्रेष्ठ समझाने के भीषण छल को हमें मिलकर समय रहते भेदते रहना होगा। नेकी और भलाई के आगे अफवाह और सत्ता लोभ कभी टिकते नहीं हैं। 

प्यारे देशवासियों, धर्म महान हो सकते हैं। धार्मिक स्थल महान हो सकते हैं। लेकिन हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी धार्मिक जगह स्कूल, अस्पताल, खेल के मैदान, खेत खलिहान से भली नहीं हो सकती। जहां अन्न उगता है, जहां बच्चे पढ़ते हैं जहां रोगी चंगे होते हैं उन जगहों में ईश्वर को नहीं बैठाया जा सकता। आज सबसे अधिक ज़रूरत शिक्षा, चिकित्सा और सहिष्णुता की है। आइये हम संकल्प लें कि अपने बच्चों को खूब पढ़ाएंगे, सबको रोज़गार दिलाएंगे और महान भारतीयों के दिल से सब तरह के डर दूर करेंगे। 

प्यारे देशवासियों, हम महान देश के नागरिक हैं। राजनीतिक दलों के ईवीम रूपी कुल्हड़ के सिक्के नहीं हैं। बदली जानेवाली मुद्रा हमारी ईमानदारी का पैमाना नहीं हो सकती। हमारा ईमान हमारी एकता है। हम इसे कम करने के सब प्रयास मिटा कर रहेंगे। सत्ता के भुक्कड़ शैतान हमें तोड़ नहीं सकते। हम इस बात के लिए कृतसंकल्प हों कि मिलकर आगे बढ़ेंगे। अन्याय, ग़ैरबराबरी, अशिक्षा, झूठ, ग़रीबी, फैलायी जानेवाली नफ़रत से मिलकर मुक़ाबला करेंगे। हम अपनी नदियों, हरियाली, खेती और धरती की रक्षा करेंगे।

जय हिंद ! जय भारत!! भारत माता की जय !!!

-शशिभूषण
15 अगस्त 2017
फेसबुक वाल से

मुझे पीने की ज़रूरत क्यों नहीं पड़ी ?

आज फिर स्टैंड, बस खुलते-खुलते पहुंचा तो कंडक्टर ने मेरा हाथ पकड़ बिल्कुल आगे, गेट के पास की दो सीट खाली कराकर हमें देनी चाही। लेकिन बात नहीं बनी। पहले से बैठा शख्स नहीं माना। लेडीज आ रही की हेकड़ी दिखाई उसने। हमें हारकर आखिरी की दो सीट पर अलग अलग आना-बैठना पड़ा।

मेरी वाली सीट पर खिड़की की तरफ़ एक सज्जन बैठे थे। बिल्कुल ढीले-ढाले, हिलते-डुलते जैसे कोई बेल तनने-टिकने की कोशिश करे। पहले तो लगा नींद में बुरी तरह धंस चुके हैं। लेकिन एक मिनट भी न हुआ पता चल गया मस्त हैं। 

मुझे मस्त लोगों को देखकर बड़ा मज़ेदार लगता है। मैंने आत्मीयता से कहा आप थोड़ा उधर सरककर खिड़की बंद कर उसमें टिका लीजिये खुद को। आराम रहेगा। उन्होंने मुझे ऐसे भोलेपन से देखा कि मैं समझ गया इंसान सज्जन है। भीतर ही भीतर मैंने तय किया अब इन्हें कोई तक़लीफ़ नहीं होनी चाहिए। इन्हें असुविधा न हुई तो मुंह बंद रखेंगे। केवल तभी गंध से रक्षा होती रहेगी। मैं अपनी गोद के लैपटॉप वाले बैग से पूरी तरह लिपट गया।

कुछ ही मिनट गुज़रे होंगे कि मूंगफली बेचनेवाला लड़का आया। उन्होंने मूंगफली की पुड़िया की ओर हाथ बढ़ाया जो मेरे कंधे से टकराकर झूल गया। लड़का समझदार और अनुभवी था उसने मूंगफली की पुड़िया उनकी हथेली फैलाकर धर दी। दस रुपये मांगे उसने। उन्होंने उसे 30 रुपये दिए। एक 20 का नोट दूसरा 10 का नोट। लड़का 20 रुपये लौटाने लगा तो इन्होंने 20 रुपये और बढ़ा दिए। हारकर लड़के ने 10 रुपये लेकर बाक़ी रुपये इनकी खाली हथेली में पकड़ाकर हथेली गोदी में रख दी। इनके चेहरे पर मुस्कान आ गयी। इन्होंने मुझे पुड़िया देनी चाही कि मैं पुड़िया खोल दूँ और कुछ ले भी लूं। मैंने मना कर दिया। मुझे उनकी आती-जाती सांस से भी दिक़्क़त हो रही थी।

लगभग आधी दूरी निकल जाने के बाद जब एक स्टॉप पर बस रुकी तो इन्होंने मुझे उठाना चाहा। आ गया उज्जैन। उतरूंगा। ऑटो चला जायेगा। जल्दी है। मैंने कहा बैठे रहिए। अभी नहीं आया उज्जैन। आएगा तो बता दूंगा। उन्होंने मेरी बात पर यक़ीन नहीं किया । खिड़की से बाहर आधे झूल से गये। इधर उधर गर्दन घुमाकर पहचानने की कोशिश करने लगे। मैंने अंदर खींचा। कट जाएगी गर्दन। नहीं आया अभी। इन्होंने अंदर सिर करके ऐसे मुस्कुराकर भोलेपन से देखा कि मुझे फिर इत्मिनान हुआ इंसान सज्जन है। जाने किस खुशी या गम में ऐसी हालत में आ पड़ा है और उज्जैन भी जा रहा है जहां बस से उतरते ही भांग घोटा की दुकान सामने होगी। अगर भांग भी चढ़ा ली तो भले पहुंच गए लौट नहीं पायेगा।

मैं चलती बस में सोचने लगा। कितना अपार कष्ट देता होगा छककर पीने के बाद किसी सज्जन का ढाई घंटे के लिए बस में बैठना। पीने के बाद बैठे रहना और हिचकोले खाना कितनी गंभीर शरारत होती होगी खुद के साथ? मुझे क्या मालुम मैं कहाँ पीता हूँ !!!

मेरे साथी मुझपर हँसने लगे- अच्छा है आपको कोई ख़याल रखने के लिए मिल गया। ख़ुशनसीब है बंदा। अच्छे से पहुंच जाएगा। मैंने कहा- क्या करे ऐसे में कोई। इंसान तो सज्जन ही लग रहा। पी ली है तो क्या बदतमीज़ी करें उसके साथ। मैं तो उज्जैन में छोड़ भी दूंगा जहां कहेंगे। मुझे शराबियों से दिक़्क़त नहीं होती। एक से बढ़कर एक पीनेवाले मैने देखे हैं। किसी ने मुझे कभी हर्ट नहीं किया पीने के बाद। 

थोड़ी देर में क्या देखता हूँ कि उन्होंने माचिस और बीड़ी निकाल ली। कड़ाई किर्रने ही वाले थे कि मैंने टोका- क्या करते हैं आग लग जायेगी बस में! वे बोले- नहीं तो मैं सिर निकालकर पी लूंगा। एक ही पीनी है। मैंने कहा नहीं भाई यह ठीक नहीं। रख लो जेब में उज्जैन में पी लेना। उन्होंने माचिस और बीड़ी जेब में रख ली। मुझे देखकर मुस्कुराए। मैंने फिर सोचा आदमी सज्जन है। कितनी आसानी से मान गया।

मेरे साथी ने मुझे बातचीत में खींच लिया- आप सबका ऐसा ख़याल नहीं रखते ? उनका इशारा आगे बैठे किसी सहकर्मी की ओर था। मैंने कहा- मैं सांप को दूध नहीं पिलाता। साथी बोले क्यों? दुनिया तो पिलाती है। कटोरी में भरकर रख देती है। पूजा भी करती है। मैंने कहा- क्योंकि दूध सांप के लिए ज़हर होता है। मर जाता है सांप दूध पीकर। इसीलिए लौटकर नहीं आता। दुनिया कितनी क्रूर है कि दूध पिलाकर मार देती है और पुण्यात्मा भी बनी रहती है। पूजा भी करती है सांप की। मैं किसी को छल से नहीं मारना चाहता। बल्कि मारना ही नहीं चाहता। बस बचे रहना चाहता हूं। साथी हँसे-इतना सब किसे मालुम है। आप तो बग़ल में देखिए।

मैंने देखा उन्होंने फिर बीड़ी माचिस निकाल ली है। मैने फिर रोका। मान जाओ भाई। कंडक्टर बड़ा तेज़ है। मारिया है। मारेगा भी और उतार देगा बीच रास्ते में। लोगों को पता चल गया कि तुमने ढाल रखी है तो शराबी बोलकर उतरवा देंगे। कौन रोकेगा? कहाँ जाओगे ऐसी हालत में? मैं उज्जैन में सिगरेट पिलाऊंगा। बीड़ी, रख लो जेब में। उन्होंने फिर मेरी ओर देखा और मुस्कुराए। मैंने इस बार सोचा- सज्जन भले है, लेकिन है तो शराबी ही। मानेगा नहीं। खुदा न करे सख्ती करनी पड़े। लेकिन वे मान गए। बीड़ी माचिस जेब में रख ली। 

थोड़ी देर बाद उज्जैन की सीमा पर साथी उतर गए तो मैं उनकी सीट पर आ गया। मुझे राहत की दरकार थी। आराम से बैठना था। फिर मैं मोबाईल में उलझ गया। 

अचानक लाल सिग्नल पर बस धीमी हुई तो मैंने देखा वो उतरने के लिए सहसा खड़े हो गए। मैं कुछ सोच पाता कि बस में ब्रेक लगा और वे एक महिला के ऊपर गिर गए। दो तीन लोगों ने उन्हें उठाया। महिला ने समझकर माफ़ सा कर दिया। वो गेट से नीचे कूद से गए तो किसी ने उनका थैला, पॉलीथिन आदि उन्हें नीचे थमाया। मैंने उन्हें खिड़की से देखा। वे मुझे देखकर खुश हुए। मैं चीखा- सही जगह उतरे हैं न वरना मैं छोड़ दूंगा। 

अफ़सोस बस चल दी थी। मैं उनका जवाब नहीं सुन पाया। चेहरे से यही लगा मानो कह रहे हैं- यह भी ठीक ही जगह है। मैं चला जाऊंगा। 

अभी यह लिखते हुए मुझे लग रहा है कि दुनिया में निश्चिन्तता भी कितनी है ! कितने आराम से निकल पड़ते हैं लोग। न आगे की चिंता न पीछे की तैयारी। एक हम हैं पानी का बॉटल छूट जाए तो अंधेरा दिखने लगता है। खैर,

लेकिन मुझे पीने की ज़रूरत क्यों नहीं लगती यह भी पता चल गया आज। क्यों ? मुझे हर दूसरे तीसरे दिन कहीं भी लग जाता है आ गया उज्जैन।

एक दो बार तो मैं उतर भी चुका हूं। वो तो सब कंडक्टर पहचानने लगे हैं इसलिए मुझे कभी दूसरी बस नहीं पकड़नी पड़ी ।

-शशिभूषण
11 अगस्त 2017
फेसबुक वाल से

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

मैं देशभक्त नहीं, देशप्रेमी हूँ - कन्हैया

जब किसी चीज का विरोध होता है, तो लोगों में जि़द भी पनप जाती है कि अब तो यह करके ही रहेंगे। 9 अगस्त, 2017 को एआईएसएफ और एआईवायएफ की लाँग मार्च का कारवाँ इंदौर पहुँचना था। तय तो पहले से रहा होगा लेकिन ये बात सिफर तीन-चार दिन पहले ही ज़ाहिर की गई कि इस मौके पर आयोजित सभा को संबोधित करने के लिए जेएनयू विद्यार्थी संघ के पूर्व अध्यक्ष और एआईएसएफ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य कन्हैया भी इंदौर आएँगे। इंदौर के बारे में पुराना सच यह था कि यह मध्य भारत का मेनचेस्टर हुआ करता था लेकिन अब दक्षिणपंथी गतिविधियों का नागपुर से भी बड़ा गढ़ बनता जा रहा है। और किसी हद तक पहले जो लाल रंग में रंगे दिखते थे, उनमें से कई भी अब गुलाबी होने लगे और सीधे तौर पर अपने आपको ऐसे कार्यक्रमों से दूर रखते हैं जो दूर से ही सुर्ख लाल नज़र आती हों। लेकिन कुछ लोग हैं शहर में जो गाहे-बगाहे ये साबित कर जाते हैं कि इंसानियत की उम्मीद का आसमान अभी इतना भी वीराना नहीं हुआ है और उम्मीद दे जाते हैं कि सुर्ख सवेरा आएगा और उसे हम यानि आम अवाम ही लाएगी। 

तो ज़ाहिर है कि इलहाम तो आयोजकों को भी रहा ही होगा कि अगर कन्हैया आएँगे तो मामला सिर्फ़ अच्छे भाषण और तालियों पर खत्म नहीं होगा। देशभक्ति और देशद्रोह का प्रमाणपत्र बाँटने वाले ज़रूर ही कार्यक्रम बिगाड़ने की कोशिश करेंगे। तो कार्यक्रम के संयोजक विनीत तिवारी ने साथियों के साथ मिलकर व्यूह रचना बनाई। उनके साथ केन्द्रीय समूह में जुड़े एटक के मोहन निमजे, सोहनलाल शिंदे, रुद्रपाल यादव, सत्यनारायण वर्मा, बाबा साहेब, भारत सिंह, कैलाश गोठानिया, निमगाँवकर, अरविंद पोरवाल, विजय दलाल, और सीटू के साथी कैलाश लिंबोदिया, एस. के. मिश्रा, गौरीशंकर शर्मा आदि लोग, जो मज़दूर संघर्षों और ट्रेड यूनियनों से जुड़े रहे हैं। इसी के साथ उन्होंने इप्टा, प्रलेसं और अन्य प्रगतिशील संगठनों जैसे मेहनतकश, भारतीय महिला फ़ेडरेशन और आम आदमी पार्टी की युवा विंग को भी जोड़ा। 

तब भी चुनौती के आकार का अंदाज़ा लगाते हुए ये नाकाफ़ी था। पिछले कुछ दिनो से इंदौर शहर में एक नाम और संघियों और भाजपा की करतूतों के खिलाफ़ निडरता से बोलने के लिए अपनी पहचान रखता है और मज़े की बात ये कि ये मोर्चा उन्होंने खोला है 90 बरस की उम्र में। वो नाम है आनंद मोहन माथुर का। उन्होंने इसी बरस की 23 मार्च को भगतसिंह के शहादत दिवस के मौके पर भगतसिंह दीवाने ब्रिगेड बनाने का दीवानगी भरा काम किया और चंद महीनों के भीतर ही एक हज़ार नौजवानों को उससे जोड़ भी लिया। नारा यही है कि जाति तोड़ो और मजहब की या किसी भी किस्म की संकीर्णता में मत फँसो। ज़ाहिर है ऐसे नारे खुले दिमाग के लोगों के अलावा उन्हें ही अपील करते हैं जो खुद किसी संकीर्णता का शिकार बने हों। ऐसे लोग दलितों और अल्पसंख्यकों में ही ज़्यादा होते हैं सो भगतसिंह दीवाने ब्रिगेड में भी वह लोग अधिक हैं। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात ये रही उन्हें इस कार्यक्रम में जोड़ने की कि वे खुद 1942 में एआईएसएफ के सचिव रहे थे। बाद में वे वकालत में मसरूफ़ हो गए और आगे उनसे सांगठनिक राब्ता कायम नहीं रह सका। वैसे तो अनौपचारिक तौर पर जुड़े ही रहे। होमी दाजी के वे दोस्त रहे, पड़ोसी भी थे। सन 1950 में इप्टा में सक्रिय रहे। अभिनय किया, निर्देशन किया, बलराज साहनी और ज़ोहरा सहगल ने उनकी पीठ ठोकी। तो वे, उनकी भगतसिंह दीवाने ब्रिगेड और उनके सहयोगी विजय सिंह यादव (जाटव) भी आयोजन के केन्द्रीय हिस्से बन गए। इसी तरह कम्युनिस्ट पार्टी की वरिष्ठ सदस्य और पूरे इंदौर में मम्मीजी के नाम से जानी जाने वालीं कॉमरेड पेरिन होमी दाजी को, वरिष्ठ कर्मचारी नेता वसंत शिंत्रे और आल इंडिया बैंक आफि़सर्स एसोसिएशन के वरिष्ठ नेतृतवकारी साथी आलोक खरे को भी इस आयोजन में निवेदक बनाया गया। ये सब लोग एक तरह से शहर के अमन और इंसाफ़ के रखवाले बुज़ुर्ग कहे जा सकते हैं। 

एक रात पहले ही सोशल मीडिया पर कुछ भाजपा से जुड़े युवा नेताओं के नाम से एक पोस्ट वायरल की गई थी कि ‘कन्हैया को इंदौर की धरती को अपवित्र नहीं करने देंगे। देशद्रोही का मुँह काला कर देंगे।’ इसके साथ ही आनंद मोहन माथुर का भी मुँह काला करने की बात भी की गई थी। 

इसके लिए एहतियातन रात में ही आयोजकों द्वारा शहर पुलिस के आला अधिकारियों को संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन पता चला कि डीआईजी बीमार हैं और एस. पी. उस दिन मेधा पाटकर को अस्पताल से छुट्टी करवाकर उन्हें इंदौर से बाहर ले जाने में मसरूफ़ थे। माथुरजी ने कलेक्टर से बात की तो उन्होंने कुछ भी गड़बड़ न होने का आ’वासन तो दे दिया लेकिन ये भी बताया कि वे तो अगले दिन सुबह ही बाहर जा रहे हैं। उधर पुलिस के उस क्षेत्र के टीआई, जहाँ कार्यक्रम होना था, फोन पर आयोजकों को ही ये जताने की कोशिश करते रहे कि आपके पास कार्यक्रम की इजाज़त नहीं है तो आप कार्यक्रम नहीं कर सकते। माथुर जी भी जि़द पर थे कि अगर हम सरकारी जगह पर कार्यक्रम नहीं कर रहे तो भला किस बात की इजाज़त। बोले कि एक बार ले ली तो हमेशा का सिरदर्द हो जाएगा। बहरहाल, सारे साथियों के साथ शाम को फिर बैठकर व्यूह रचना बनाई गई। कौन कब कहाँ होगा, कहाँ रुकेगा, हॉल में कितने बजे से पहुँचकर अपनी-अपनी जगह और जि़म्मेदारी संभालेगा वगैरह, वगैरह। 

एक शाम पहले ही राज्य के एआईएसएफ और एआईवायएफ के पदाधिकारियों का दल इंदौर आ गया था जिसमें एआईवायएफ के राज्य अध्यक्ष कॉ श्रवण श्रीवास्तव (रीवा) और राज्स सचिव कॉ संजय नामदेव (सिंगरौली) और एआईवएसएफ के राज्य संयोजक कॉ राहुल वासनिक (सिवनी) और सह संयोजक कॉ यीशु प्रकाश बुरदे (सिवनी) थे। सिवनी, सिंगरौली और रीवा से आए साथियों को उसी गेस्ट हाउस में रुकवाया था जिसमें अगले दिन सुबह लाँग मार्च कारवाँ के साथी और कन्हैया आकर रुकने वाले थे। किसी तरह रात निकली और सब से बात हो गई कि सब ठीक चल रहा है कि तभी सुबह 10 बजे गेस्ट हाउस को 20-25 लोगों ने घेर लिया और उनकी जीप पर लगे एआईएसएफ और एआईवायएफ के बैनर वगैरह फाड़ दिये। तिरंगे झंडे थामे भीड़ नारे लगा रही थी, ‘देश के गद्दारों को जूते मारो सालों को।’ विनीत कहते हैं कि सुनकर वितृष्णा हुई कि ‘ये हुड़दंगी सिखाएँगे देश क्या होता है। विनीत ने बताया कि ‘कुछ तो तत्काल करना था वर्ना पता नहीं ये क्या कर डालें। आजकल तो लिंचिंग पर भी उतारू हो ही रहे हैं। जल्दी-जल्दी इधर-उधर फोन करके 15-20 मिनट में वहाँ पुलिस पहुँच गई और हुड़दंगियों को खदेड़ दिया। अब ये तय था कि ये लोग शाम को कार्यक्रम में ज़रूर गड़बड़ करेंगे। माथुर साहब ने सेंट्रल कोतवाली जाकर शिकायत की। उधर विनीत ने भोपाल पुलिस हेडक्वार्टर में पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अनुराधा शंकर सिंह से मिलने के लिए कॉ शैलेन्द्र शैली और कॉ सत्यम पाण्डे को भेजा। और कॉ जया मेहता की सलाह मानकर ख़ुद कॉ पेरिन दाजी को लेकर पुलिस एस. पी. से मिलने चले गए जहाँ एस. पी.मेधा पाटकर के पास बॉम्बे अस्पताल में थे। वहाँ पेरिन दाजी मेधा से बगलगीर होकर मिलीं और साथ ही उन्होंने वहाँ मौजूद एस. पी. को शाम के कार्यक्रम हेतु सुरक्षा उपलब्ध कराने का आग्रह किया। विनीत का स्वास्थ्य इतना खराब था कि उनके लिए खुद गाड़ी चलाना भी संभव नहीं था। और लगातार फोन पर फोन आए जा रहे थे। ऐसे में युवा साथी अदिति और अर्चिष्मान ने मदद की। वो ड्राइव करते रहे, और विनीत बैठकर फ़ोन पर ज़रूरी संपर्क करते रहे। उधर बाकी सभी साथी 6-7 गाडि़यों में एयरपोर्ट निकल गए थे कन्हैया को लेने। इन तीन-चार तरफ़ा एहतियाती कदमों से किसी हद तक पुलिस की सुरक्षा मिलना तय हो गया लेकिन हमारी रुकने की जगह कैंसिल कर दी गई। हमें ताबड़तोड़ दूसरे इंतज़ामात करने पड़े। कन्हैया ने अपनी मेधाताई से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की तो वैसे ही ये खबर फिर से हुड़दंगियों तक पहुँच गई और वो वहाँ भी झण्डे-डण्डे लेकर विरोध के लिए आ पहुँचे। ज़ाहिर है सूचनाएँ कहीं से इरादतन लीक की जा रही थीं। बहरहाल शाम के मुख्य कार्यक्रम के मद्देनज़र मेधा से मिलने का इरादा कन्हैया को भारी मन से मुल्तबी करना पड़ा।’

शाम को कार्यक्रम शुरू होने के पहले एक बार 100-150 लोगों का एक जत्था तिरंगे पकड़े और नारे लगाता सभागृह पर आया। पुलिस ने उन्हें रोकने-समझाने की कोशिश की तो वे हुज्जत पर उतर आये। पुलिस ने लाठी चलाई तो वे लोग बाहर खड़ी गाडि़यों पर पथराव करते भाग गए। इससे 4-5 गाडि़यों के काँच ज़रूर फूटे लेकिन किसी को शारीरिक चोट नहीं आई। इसके बाद पुलिस ने मेन रोड पर ही मोर्चा जमा लिया ताकि वहाँ से अंदर दाखिल होते वक़्त ही उपद्रव करने वालों को रोका जा सके। वहीं आयोजकों में से कुछ लोगों को पहचान के लिए पुलिस ने अपने साथ खड़ा कर लिया ताकि संदिग्ध या बिना पहचान वाला कोई न घुस पाये। आनंद मोहन माथुर ने ठीक ही कहा था कि यदि विरोध नहीं होता, तो बाहर भी पैर रखने की जगह नहीं होती, मगर उन्हें अंदर नहीं पता था कि बाहर भी पैर रखने की जगह नहीं थी। हॉल में कुर्सियां फुल होने के बाद लोग नीचे बैठ गए थे और नीचे की जगह भी पूरी होने के बाद ऊपर बालकनी में चले गए थे और वहां के अलावा बाहर प्रोजेक्टर स्क्रीन पर भी देख-सुन रहे थे। एक-दूसरे की शिनाख्ती के बिना कोई भीतर नहीं जा पा रहा था और तब भी इतनी भीड़ हो गई थी। पुलिस ने बहुत ही मुस्तैदी से काम किया और कथित हिंदूवादियों को खदेड़ दिया। कुछ लोगों पर लाठियां भी चलानी पड़ीं तो झिझकी नहीं। अरसे बाद लगा कि पुलिस किसी की तरफदार नहीं है। इसीलिए आनंद मोहन माथुर, विनीत तिवारी और कन्हैया सबने पुलिस की तारीफ की। आनंद मोहन माथुर के घर पर ढेरों-ढेर पुलिस थी और कन्हैया कुमार भी पुलिस की गाड़ी में ही आए। ना तो हुड़दंगी किसी का मुंह काला कर पाए और ना ही सभागृह के पास फटक पाए। (हालाँकि उन्होंने फोटोशॉप पर फर्जी तस्वीर बनाकर कन्हैया की तस्वीर पर ही कालिख पोत दी और कहा कि इंदौर में कन्हैया का मुँह काला किया गया। इस हरक़त से उनकी झूठ फैलाने की आदत की ही पुख्ता शिनाख्त होती है।) उसके बाद फिर एक बार उन्होंने इकट्ठा होकर थोड़ी बड़ी तादाद में सभागृह की ओर बढ़ना और नारेबाजी करना शुरू किया लेकिन इतना पुलिस बल था कि वे चंद मिनटों में ही फिर खदेड़ दिए गए। कार्यक्रम इप्टा के जनगीतों ‘ये जंग है जंगे-आज़ादी, आज़ादी के परचम के तले’, और रबीन्द्रनाथ ठाकुर के गीत ‘एकला चलो रे’ से शुरू हुआ जिसकी प्रस्तुति शर्मिष्ठा और उनके साथियों ने की। विनीत ने संचालन करते हुए 9 अगस्त के बहुआयामी महत्त्व पर रोशनी डाली और विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी नायकों बीरसा मुंडा और टंट्या भील को भगतसिंह और आम्बेडकर के समकक्ष बिठाकर अपना सम्मान ज़ाहिर किया। नागासाकी दिवस और भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगाँठ भी इसी दिन होने से इस मौके के मौजूँ पोस्टरों से लॉबी सजाई हुई थी। मंच पर सामने ही शलभ श्रीराम सिंह, गोरख पांडे और फ़ैज़ की नज़्में माहौल में और जोश भरने के साथ सोचने पर मजबूर भी कर रही थीं। 
जनगीतों के बाद इप्टा के ही एक और समूह ने गुलरेज़ के निर्देशन में एक 15 मिनट का माइम प्रस्तुत किया जो झकझोर देने वाला था। बिना शब्दों के उसने इस देश में लोगों के बीच आपसी भाईचारे को कैसे क़त्ल किया जा रहा है, इसकी मार्मिक कहानी कही।

नर्मदा आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर के साथ एकजुटता जताने आए केरल के पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्री विनय बिस्वम भी इत्तफाक से उस दिन इंदौर में ही थे। अपने दो मिनट के संबोधन में उन्होंने मार्के की बात कही कि ये जो बाहर तिरंगा लेकर अपने आपको देशभक्त बताने का स्वांग कर रहे हैं, इन्हें शायद ये भी नहीं पता कि इनके मातृ संगठन आरएसएस ने कभी तिरंगे का भी विरोध किया था, इस देश के संविधान का भी विरोध किया था और आज़ादी का भी विरोध किया था। वे अंग्रेजों के ग़ुलाम बने रहकर ही खुश थे।

इंदौर के सभी आयोजकों की ओर से स्वागत वक्तव्य दिया आनंद मोहन माथुर ने और रूपांकन के कविता पोस्टरों से लाँग मार्च में शामिल सभी सभी युवा और विद्यार्थी यात्रियों का स्वागत किया गया। मंच पर लाँग मार्च के सभी यात्री पूरे जोश से मौजूद थे। जब एआईवायएफ की तरफ़ से राष्ट्रीय अध्यक्ष कॉ आफ़ताब आलम और एआईएसएफ की तरफ़ से राष्ट्रीय महासचिव कॉ विश्वजीत ने लाँग मार्च के मक़सद और अब तक के अपने अनुभवों को संक्षेप में साझा किया तो पूरे हॉल की तालियों ने उनके जज़्बे को सलाम किया और शुभकामनाएँ दीं।

इसके बाद मुख्य वक्तव्य के तौर पर कॉ कन्हैया का भाषण शुरू हुआ। कन्हैया खूब बोले। उनके बोलने में दर्द इस बात का था कि उन्हें देशद्रोही कहा गया। किसी ने उनके बारे में अखबार में लिख दिया कि - अफजल गुरू की बरसी मना कर चर्चित हुए कन्हैया...और ये लाइन उन्हें चुभ गई। उन्होंने कहा कि पहली बात तो मैंने अफज़ल गुरू की बरसी नहीं मनाई, लेकिन मनाता भी हो तो मैं अफजल गुरू की बरसी मना कर चर्चित हुआ और तुम लोग बरसों से गोड़से की बरसी मना कर चर्चित क्यों नहीं हो पाए। इसका मतलब यह हुआ कि अफजल गोड़से से भी बड़ा आतंकवादी था? फिर उन्होंने समझाया कि यह आरोप पूरी तरह झूठा है। केवल गृहमंत्री राजनाथ सिंह के ट्वीट के बाद पुलिस ने पकड़ कर मुकदमा कायम कर दिया। कोई सबूत नहीं हैं। पुलिस आज तक चार्जशीट ही फाइल नहीं कर पाई है। उन्होंने कहा कि मैं देशभक्त नहीं देशप्रेमी हूं। भक्ति में भगवान ऊपर है और भक्त नीचे। प्रेम में सब बराबर होते हैं। मैं अपने देश को प्रेम करता हूं, देश के लोगों से प्रेम करता हूं। देश की विविधता और विविधता में एकता से प्रेम करता हूं। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी हैं, सीएम शिवराज हैं, विधायक भी यहां बीजेपी का है और मैं कन्हैया कुमार इन सबके खिलाफ इसलिए बोल पा रहा हूं कि देश का संविधान महान लोगों ने लिखा है। पुलिस संविधान की कसम खाकर काम करती है और संविधान के प्रति जवाबदेह है। संघ भाजपा देश का संविधान इसीलिए बदलना चाहते हैं कि लोगो को बोलने से रोक सकें। उन्होंने कहा कि मैं मोदी विरोधी नहीं हूं, मैं अपने देश के दुखी और सताए हुए लोगों के हक के लिए लड़ रहा हूं। 

वे डेढ़ घंटा बोलते रहे और लोग बस सुनते रहे, सुनते रहे। वे एक से दूसरे विषय पर जा रहे थे। तंज कर रहे थे, मुहावरे और दोहे बोल रहे थे। लोग मजा ले रहे थे, तालियां बजा रहे थे, नारे लगा रहे थे। ऐसा इसलिए कि मोदी सरकार आने के बाद इतने लोग इंदौर में पहली बार इतना खुला, साफ़ और तर्कपूर्ण वक्तव्य मोदी के खिलाफ़ सुन रहे थे। वे हर विषय पर अध्ययन और तैयारी के साथ आए थे और उनके सवालों के कोई जवाब उनके विरोधियों के पास नहीं हैं। मिसाल के तौर पर उनका यह पूछना कि सावरकर को वीर क्यों कहते हैं, उन्होंने तो अंग्रेजों से माफ़ी मांगी थी? फौज के महिमामंडन करने वाली सरकार के खिलाफ उनका सवाल है कि फिर एक रैंक एक पेंशन की योजना क्यों लागू नहीं हो रही? उनका सवाल यह है कि क्यों एक साल में तीन सौ से ज्यादा फौजी आत्महत्या कर चुके हैं? 

आनंद मोहन माथुर और कन्हैया कुमार दोनों ने कहा कि हमारा मुंह काला भी कर दिया जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारे विचार काले नहीं कर पाएँगे। कन्हैया ने कहा कि काली टोपी और काले दिल वाले लोग काले से आगे नहीं जा सकते मगर हमारा रंग लाल है। आप हमसे नफरत करिए मगर हम देश से और अपने लोगों से मुहब्बत ही करेंगे। भाषण के अंत में लोगों के बहुत कहने पर कन्हैया ने आजादी वाला गीत गाया जो माहौल को बिल्कुल उरूज़ पर ले गया। बूढ़े क्या, अधेड़ क्या, बच्चे और नौजवान क्या, सबने खड़े होकर गाया, सबने नारे लगाए। ऐसा लगा कि जितना विरोध होगा उतना ही जोश इन लोगों के भीतर बढ़ता जाएगा। उनका लाँग मार्च देश के और कई राज्यों को पार करता हुआ हुसैनीवालां में खत्म होगा, जहां भगतसिंह का स्मारक है। सभी राज्यों के किसी न किसी शहर में कन्हैया की भी सभा होगी। मध्य प्रदेश में ये इंदौर में हुआ, इसके लिए आयोजकों की हिम्मत दाद की हक़दार है। केंद्र सरकार की ऐसी अखिल भारतीय मुखालफत कोई सियासी दल भले ना कर पाएं, नौजवानों और विद्यार्थियों ने ये बीड़ा उठाया है, ये बड़ी और उम्मीद बुलंद करने वाली बात है। 

अंत में भगतसिंह दीवाने ब्रिगेड के सहसंयोजक विजय सिंह यादव (जाटव) ने आभार माना। 

जब कार्यक्रम खत्म हुआ तो सब कारवाले कन्हैया को अपनी कार में बैठा कर माथुर साहब के घर तक छोड़ना चाहते थे। लेकिन कन्हैया विनीत के निर्देश के इंतज़ार में थे। आखिर में व्यापमं और ड्रग ट्रायल के मामले उजागर करने से चर्चा में आए व्हिसल ब्लोअर डॉ. आनंद राय की कार में कन्हैया और आनंद मोहन माथुर बैठे। बाहर हिंदूवादी हुड़दंगियों के मुखबिरों को खबर लग गई (या कर दी गई) कि कन्हैया कौन सी कार में है, सो उन्होंने अपनी कायराना हरकत करते हुए कार पर पथराव किया। उससे कार का काँच ज़रूर टूटा, गनमैन और ड्राइवर को काँच के छोटे-छोटे टुकड़े भी लगे लेकिन किसी को ज़्यादा चोट नहीं आई। कन्हैया माथुर जी के घर ही रुके। रात भर पचास के क़रीब पुलिस वाले माथुरजी के घर के बाहर डेरा डाले रहे। ये सवाल ज़रूर फिर भी अटकता है कि पुलिस ने पथराव करने वालों, सोशल मीडिया पर नामजद धमकी देने वालों के खिलाफ़ प्रकरण क्यों नहीं दर्ज किया।

***बचाव की तैयारी भी पूरी थी***

आयोजकों ने पैनी नजर रखी कि विरोध करने वाले कहीं समर्थक के भेस में ना आ जाएं। विरोध करने वाले दिन भर घुसपैठ की कोशिशें करते रहे मगर विनीत तिवारी, अशोक दुबे, अजय लागू, रुद्रपाल यादव, सोहनलाल शिंदे, मोहन निमजे, सत्यनारायण वर्मा, विक्की शुक्ला आदि की टीम ने किसी की एक ना चलने दी। विनीत तिवारी की टीम के लोग दोपहर तीन बजे से ही माथुर सभागृह पहुंच गए थे और सभागृह से ऐसे लोगों को बाहर निकलवा दिया, जिन्हें वे नहीं पहचानते थे। आगे की कुर्सियां भी उम्ररसीदां लोगों के लिए उन्होंने रोक लीं। इसके बावजूद अगर कोई विरोध करने वाला अंदर आ जाता तो पचास लोग लाठी वाले भी थे, जो ऐसे किसी भी हुड़दंग के लिए तैयार थे। एक गनमैन भी था। पिछली बार इन्हीं आयोजकों के इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन के कार्यक्रम में कथित हिंदूवादियों ने हुड़दंग किया था, इसलिए इस बार ये लोग भी पूरी तैयारी से थे। हालांकि इस बार पुलिस भी बहुत सख्त थी। मंच पर कोई ना चढ़ पाए इसके लिए पुलिस मंच के पास भी तैनात थी। हर आदमी को विनीत तिवारी के इशारे के बाद ही अंदर आने दिया जा रहा था। पुलिस और विनीत दोनों की ही नाकेबंदी इतनी पुख्ता रही कि परिंदा भी पर नहीं मार पाया। शिवराज के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहली बार है, जब किसी विरोधी विचार वाले आयोजन को इतनी सुरक्षा मिली हो। आनंद मोहन माथुर और कन्हैया की पार्टी के लोगों ने भी दिल्ली-इंदौर-भोपाल एक कर रखा था। भोपाल में पुलिस के सबसे आला अफसर से मिलकर अनुरोध किया गया था कि इंदौर में धमकी मिली है और आप सुरक्षा करें और उन्होंने आश्वासन दिया कि ऐसा कोई काम नहीं होने दिया जाएगा जो संवैधानिक मूल्यों को चोट पहुँचाता हो। 
 

***पुलिस हमारी आपकी, हमारे संविधान की, नहीं किसी पार्टी की***

कन्हैया कुमार के भाषण के दौरान कई बार तालियां बजीं, कई बार नारे लगे, डेढ़ घंटे वे ऐसा धाराप्रवाह बोले कि लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। उन्होंने कहा कि मुझ पर कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि मैंने अफजल गुरू की बरसी मनाई और देशविरोधी नारे लगाए। गृहमंत्री के ट्विट के आधार पर पुलिस ने मुझ पर मुकदमा बनाया मगर अभी तक चार्जशीट पेश नहीं हुई है। क्यों? क्योंकि कोई सबूत नहीं हैं। जानबूझ कर यह आरोप इसलिए लगाया गया क्योंकि उस समय रोहित वेमुला की मौत का मामला चल रहा था और ध्यान हटाने के लिए किसी झूठे आरोप की जरूरत थी। उनका फोटो खींचने की कोशिश कर रहे, मीडिया वालों पर उन्होंने तंज किया कि जाइये मोदी की तस्वीर खींचिए, मुझे फोटो नहीं खिंचानी। उन्होंने कहा कि ये लोग झूठ बोलते हैं। अगर मैंने कोई गुनाह किया होता तो अदालत मुझे जमानत नहीं देती। उन्होंने इंदौर के पुलिस प्रशासन की तारीफ की और कहा कि आज जो मैं बोल पा रहा हूं तो इसका कारण यह है कि पुलिस मोदी की नहीं, शिवराज की नहीं, संविधान की कसम खाती है। भाजपा आरएसएस के लोग इसीलिए संविधान को बदलना चाहते हैं कि कोई कन्हैया बोल ना पाए। उन्होंने कहा कि जेएनयू में डेढ़ सौ देशों के विद्यार्थी पढ़ते हैं और वहां आए दिन हर तरह के अत्याचार के खिलाफ नारे लगते हैं। उन्होंने कहा कि ये बीजेपी आरएसएस वाले मुझ पर फौज विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। मैं शहीद के परिवार से आता हूं। मेरा भाई सेना में शहीद हुआ है। मेरे घर से 16 लोग फौज में गए हैं। क्या भाजपा के किसी नेता या मंत्री का बेटा फौज में है? इनके कार्यकर्ताओं के बेटे फौज में हैं? उन्होंने कहा कि संघ लोगों को देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटता है, मगर क्या संघ के एक भी आदमी को देश के लिए फांसी हुई है? राम की बात करते हैं और असली भक्त ये नाथूराम के हैं। उन्होंने कहा कि सावरकर को वीर क्यों कहते हैं, मुझे नहीं पता। अंग्रेजों से माफी मांगने वाला वीर होता है, या उनसे लड़ने वाला वीर होता है? उनका इशारा अंडमान निकोबार जेल से सावरकर और उनके भाई के रिहा होने को लेकर था, जहां सावरकर और उनके भाई ने माफीनामा लिखा था और यह भी लिखा था कि हम राजनीति में हिस्सा नहीं लेंगे। 

उन्होंने संघ की भारतीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि खाकी चड्डी और उस पर काली टोपी पहनना कौन से देश की संस्कृति है? उनका इशारा इस बात को लेकर था कि संघ ने अपनी वर्दी और नियमावली हिटलर की नाजी सेना से ली है। बहुत ही गहन अध्ययन के साथ वे काफी सरलता से बोल रहे थे। उनके लहजे का बिहारीपन बहुत ही अच्छा लग रहा था और उनके तंज बहुत ही असरदार और गुदगुदाने वाले थे। उन्होंने इंदौर में विरोध करने वालों को खुली चुनौती देते हुए कहा कि अगली बार मेरी सभा दशहरा मैदान पर होगी, रोक सको तो रोक लेना। उन्होंने कहा कि हम सरकारी स्कूल में जनता के पैसों से पढ़े हैं। हम देश की खातिर लड़ेंगे और संघ भाजपा को कामयाब नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि भागवत कहते हैं महिलाएं रात को ना निकलें। वे ऐसा इसलिए कहते हैं कि नेताओं के बच्चे रात को निकलते हैं। उन्होंने कहा कि संघ की भारतीयता नागपुर की सीमा पर खत्म हो जाती है, जबकि देश बहुत बड़ा है। ये लोग अब महापुरुषों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं। नेहरू के खिलाफ पटेल को खड़ा कर रहे हैं। अगर नेहरू नहीं होते और वे अनुमति नहीं देते तो पटेल कुछ नहीं कर पाते। उन्होंने मंच पर मौजूद आनंद मोहन माथुर, पेरिन दाजी, वसंत शिंत्रे और आलोक खरे का नाम लेकर कहा कि आपने जिस तरह का भारत बनाने के लिए कुर्बानियाँ दी हैं, हम उस भारत को बचाएँगे, और आगे बढ़ाएँगे।

हॉल खचाखच भरा था। लोग ऊपर बालकनी में भी थे और बाहर भी। दरअसल हिंदूवादी कार्यकर्ताओं की जिद ने आयोजकों और कन्हैया कुमार के समर्थकों में भी जिद भर दी कि अब तो हम कार्यक्रम को सफल करके रहेंगे। बहरहाल हिंदूवादी कार्यकर्ता पुलिस के लठ खाकर लौटने के सिवा कुछ नहीं कर पाए। प्रगतिशील कॉमरेड लोग इस मामले में हिंदूवादियों पर भारी पड़े। 

-दीपक असीम

रविवार, 7 मई 2017

मारता मीडिया क्या क्या न करता !!!

आज का भारतीय मीडिया पूंजी आधारित उस दक्षिणपंथी राजनीति की रीढ़ है जिसका उभार पूरी दुनिया में देखा जा रहा है। यह राजनीति, धन-बल एवं अपने समर्थक मीडिया के साथ मिलकर सवाल, संदेह, आलोचना और आम जन का हित सर्वोपरि रखने वाली पत्रकारिता को ख़त्म करती चल रही है।

माफ़ कीजिये, यह मीडिया तोड़-मरोड़ और शब्दों का मनचाहा अर्थ निकालने के लिए ही है। लेकिन यह तोड़-मरोड़, मुद्दों को भटकाना, अपने एजेंडे को केंद्र में रखना, केवल इतना ही नहीं है। यह शासन करने और दमन कर पाने की एक सक्षम व सफल राजनीति है। वर्ना अला पार्टी के भ्रष्टाचार, फलां पार्टी के अत्याचार में फ़र्क़ ही क्या और कितना है? उनके समर्थक, पोषक तो एक ही हैं। कमाल देखिये कि वही सेठ बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र में सब दलों के पालक हैं। कब किसे कितना पालना है वह तय कर लेते हैं।

मीडिया का भाषायी खेल और राजनीतिक बिसात वह कार्पोरेट जाल है जिसके लोकतंत्र में पहले से फंसी जनता को और जकड़ लिया गया है। मज़ेदार यह है कि भारतीय मीडिया कर्मी ही नारे गढ़ता है और वही उन्हें जुमला भी साबित करता है। इसे देशज अंदाज़ में कहते हैं अपने पाले तीतर, मुर्गे लड़ाने का खेल, राज और उसी हिंसा का आनंद।

यह केवल भाषा की सरमायेदारी नहीं , शब्दों की ऐयारी नहीं, करुणा की रोज़ की हत्या नहीं सत्ता का गुप्त ढंग का खुला अभियान तथा हथियार है। चन्दन पांडे की एक अच्छी कहानी याद आती है जिसका शीर्षक अब याद नहीं। वह कहानी बताती है कि भाषा अपनी संवेदना में कितने कार्पोरेट महत्व की होती है। किसी सफल कंपनी के लिए कवि कितने काम का होता है।

जिसे आज 24 घंटे सातों दिन का मीडिया कहते हैं वह देशी विदेशी पूंजी निवेश की आत्मनिर्भर खेती है। आशा की बात नहीं मज़ेदार बात यह है कि इसे चौथा खंभा आदि कहनेवाले देर से ही सही अब सच कह रहे हैं। क्योंकि अब विश्लेषण के रोज़गार में भी घोर मंदी और भारी छंटनी जो शुरू हो गयी है। खतरनाक यही है कि पहरेदार भी चोरों की ही चाकरी करे।

इसलिए नए रिपब्लिक में खत्तम के फिनिश्ड अंग्रेजी अनुवाद पर चौंकिए मत। यह जी, आज तक, ओल्ड या न्यू इण्डिया टीवी की भी स्ट्रेटजी है। मुझे तो कम समझने मीडिया जगत का न होने के बावजूद यह कहने में भी संकोच नहीं कि यह भारतीय मीडिया संस्थानों की ही स्ट्रेटजी और प्रोडक्शन है। वे उन्हीं के द्वारा खोले गए अपने ही मालिकों के हितों के लिए हैं।

इसके पीछे एक निजी अनुभव भी है। अपने बचपन के कुछ अजीज़ मित्र जो आज सफल पत्रकार एंकर हैं वे अपनी पढाई के दौरान ऐसा ही कुछ सीखने पर ज़ोर दे रहे थे। कमाल की बात यह कि वे बचपन से ही मामूली बात को मुद्दा जिसे साधारण लोग बात का बतंगण कहते हैं, भावना को तीर साबित कर पाने में सक्षम थे। वे पर्यवेक्षण और अर्थ अन्वेषण के लगभग बैडमिंटन प्लेयर थे। बड़ी खेल भावना से सदाचरण को धूर्तता, अतिथि सत्कार को पीआर और नेट्वर्किंग से नत्थी कर निंदा कर लेते थे। कही हुई बात के आधार पर ही नहीं फ़ोन रिकॉर्डिंग आदि के आधार पर तब बवाल काट लेते थे जब स्टिंग हो या केजरीवाल की सेटिंग थ्योरी दूर दूर तक कहीं न थे।

वे तभी कहते थे पत्रकारिता सरोकार नहीं शुरू से लेकर अंत तक बिजनेस है। यह हमारे लिए अधिक से अधिक प्रोफेशन हो सकती है। मीडिया केवल और केवल बिजनेस ही है। हमने किसी आश्रम में एडमिशन नहीं लिया है सेमेस्टरवाइज मोटी फीस भरी है। आखिरी सेमेस्टर के साथ कहीं न कहीं लगना है। यहाँ निःशुल्क या सेवा जैसा कुछ भी नहीं है। यह बात अलग है कि वे तब साहित्य और विचार में मूल्य एवं सेवा के हामी थे। वे ज़ोर देकर कहते पैसे के लिए साहित्य? न, कभी मत सोचना! अफ़सोस, वे अपने बारे में तब शायद ही जानते थे कि प्रोफेशनल होते होते कमर्शियल हो जायेंगे। मीडिया बिजनेस के साथ-साथ राष्ट्रवाद का आंदोलन हो जायेगा। धार्मिक पत्रकारिता सबसे अच्छा पैकेज हो जायेगा। वे अपने गांव की मिट्टी भी गूगल में देखेंगे। वनस्पतियां गूगल पिक्चर में देखकर लिख पाएंगे। बारिश अपने ही टीवी या अख़बार की खबर से जानेंगे। इसमें उनकी ख़ास गलती भी नहीं। यह उन्हीं के आका लोगों का राज था जिसने शुरुआत से पहले निजीकरण के साथ हर क़िस्म का रोज़गार ख़त्म करना शुरू किया। बेहतर प्रतिभा के लिए बेहतरीन जॉब का सपनीला संसार निर्मित किया। बेरोज़गार मरता, क्या न करता!!!

तो सवाल यह नहीं है कि रिपब्लिक मीडिया में खत्तम की क्या अंग्रेज़ी हो रही है? चिंता यह भी बराबर की करनी है कि अंग्रेज़ी की कौन-कौन सी, कहाँ- कहाँ हिंदी हो रही है? क्योंकि अब कह लीजिये या कहिये पहले से ही मीडिया में अनुवाद और पूंजी ही पत्रकारिता है। आज के किसी भी सफल पत्रकार के कंधे पर यम के दो दूत नहीं बैठते अनुवाद एवं कंप्यूटर देव विराजते हैं। अंत में वही मिलकर पत्रकार को यमलोक नहीं गूगल लोक में छोटे मोटे कुछ पेज दे देते हैं।

यह अनायास नहीं है कि अब ज़रा सा विपक्ष नहीं है। जितना है वह बजरिए मीडिया हास्यास्पद है। मीडिया तोड़-मरोड़ का लोकतांत्रिक सत्ता उद्योग है। भिन्न मत शत्रुता हैं। असहमति का प्रकटीकरण युद्ध की मुनादी। विचार और साहित्य को निगलकर मीडिया झूठ और अफवाह की लुगदी बनाता जा रहा है। पहले नेता कह सकते थे- उदास हूँ। अब मीडिया पूछता है- नेताजी की उदासी का क्या मतलब है? यह प्रवृत्ति नागरिक ही नहीं बड़े साफ़ सुथरे इन्सानी रिश्ते तक घुस आयी है। यदि आप पुरुष हैं, पत्नी की मौजूदगी में घर में रोटी के लिए आटा सान रहे हैं तो पत्रकार पूछ सकती हैं- आटा आप आज ही गूँथ रहे हैं कि हमेशा गूँथते हैं? मीडिया ने घर में बाज़ार घुसने की घोषणा की थी। बाज़ार में ठगे जाकर बेहाल नागरिकों ने जाना दरअसल मीडिया घुसा था। बडा ज़रूरी सवाल है कि पूंजीवाद के सिपाही, सेनापति मीडिया से जनता, सवाल और विपक्ष को कौन बचाने आएगा? उत्तर न भी मालुम चले तब भी कम से कम पूछा तो अवश्य जाना चाहिये।

इसलिए मेरा तो मानना है जब तक यह मीडिया है न नया कुछ बन सकता है और न बुरे का कुछ बिगड़ सकता है। केवल सफल पत्रकार नेताओं, पूंजीपतियों की ऐश चलती रह सकती है और जनता की हद से हद आँख भी फूट सकती है। तवक्को तो उठ ही चुकी है। आप पूछ सकते हैं इस मीडिया को ठीक कौन करेगा तो मोटा जवाब यही है कि आम इंसान का राज!

-शशिभूषण



शनिवार, 22 अप्रैल 2017

संवेदना की आँखें हैं वे या फिर प्रिज्म??

पिछले दिनों मध्यप्रदेश में किसानी और किसानों का एक वाकया सामने आया। महीनों की लगन और मेहनत से जब प्याज की फसल तैयार हुई तो किसान उसे ट्रालियों में भरकर बेचने मंडी पहुँचे। मंडी में किसानों ने प्याज के रेट सुने तो उनका दम निकल गया। चेहरे निस्तेज हो गये। लागत, मेहनत, ज़रूरत और सपने की बात छोड़िए प्याज बेंचकर मंडी तक पहुँचने का भाड़ा नहीं निकल रहा था। एक रुपये प्रति किलो से भी कम मूल्य। किसान दुखी हुए। मन ही मन रो पड़े। वापस ले जायें तो फिर उतना ही खर्च। तय किया कि प्याज यहीँ फेंक दी जाये। प्याज सड़क पर फेंक दी गयी। जिसने भी वह प्याज देखी उसका कलेजा फट गया। जिसे जीवन में कभी प्याज नसीब ही नहीं होनी थी वह अपने दुर्भाग्य पर पसीज गया।

बाज़ार में उन दिनों भी दस रुपये प्रति किलो से कम प्याज नहीं बिक रही थी। जनता उस दिन भी प्याज के एक टुकड़े को तरस रही थी। प्याज उस दिन भी सेब जैसी पौष्टिक थी। अपरिहार्य थी। कुछ ही महीनों बाद उसकी कीमत को आसमान छूना था। विदेशों से उसका आयात होना था। वह पहले भी कीमती थी उसे आगे भी मँहगी रहना था। आँसू ला देनेवाले अपने तीखेपन और अबूझ लगनेवाली परतदार संरचना के साथ वह उतनी ही शुद्ध, स्वादिष्ट और सर्वप्रिय थी। प्रभु जोशी की कहानियाँ प्याज की तरह हैं। वे तब भी अच्छी थीं। आज भी हमारे खून के लिए उपयोगी हैं। हुआ यह है कि वे अब दुगुनी लागत से लंबे अंतराल के बाद हम तक दुबारा पहुँच रही हैं। पुरानी समझी जा रही हैं। प्रभु जोशी ने प्याज की किसानी कभी नहीं छोड़ी। जब विस्थापित हुए तो कहानी की बटायीदारी की। उपन्यास और कई सौ लिखे पृष्ट पानी में गल जाते देखे। लेकिन उनके पास फसलों के विकल्प हमेशा रहे। कहा जाता है मालवा की मिट्टी एवं उर्वरा एक ही हैं। प्रभु जोशी जितने हिंदी के हैं उतने ही मालवी मानुष। चूँकि वे चित्रकार, फिल्मकार और रेडियो प्रोग्राम प्रोड्यूसर हैं इसलिए कृति का मूल्य खूब जानते हैं। इधर कथा साहित्य में हुआ यह कि संपादकों, आलोचकों और प्रकाशकों ने नये-नये के सालाना महा विशेषांक त्यौहार में लहसुन-प्याज खाना ही छोड़ दिया। अगर किसी को साहित्य में ऐसे सवर्ण हिंदू साहित्यिक परहेज के लिए छेड़ दिया जाये तो वह बिफर कर कह सकता है लहसुन, प्याज के सेवन के बाद सभा-संगत लोक और शास्त्र विरुद्ध रहे है। हमेशा रहेंगे। 

प्रभु जोशी के बारे में सबसे अधिक जाननेवाले मेरी नज़र में तीन लोग हैं। बकौल उनके ज्ञानू(ज्ञान चतुर्वेदी), कांत(प्रकाश कांत) और काका(जीवन सिंह ठाकुर)। प्रकाशकांत और जीवन सिंह ठाकुर आमतौर पर राय देते नहीं पाये जाते। कभी-कभार जब वे प्रभु भाई और प्रभु दा की बात ही अलग है बोलकर सांस भरते हैं तो उसी में आजीवन मैत्री और साहित्यिक श्रेष्ठता की तस्दीक हो जाती है। लेकिन अनूठे व्यंग्यकार, अखिलभारतीय लोकप्रिय लेखक ज्ञान चतुर्वेदी को मैंने बाकायदा बोलते सुना। मौका था भोपाल में प्रभु जोशी को मिले वनमाली सम्मान समारोह का। ज्ञान जी ने कहा- प्रभु जोशी, प्रभु जोशी हैं। इनके जैसा दूसरा नहीं। हो ही नहीं सकता। प्रभु, बचपन से मेरे मित्र हैं। कुछ समय हमारे घर में भी रहे। इनकी खूबी देखिए कि मेरे ही घर में मेरी माँ के मुझसे सगे बेटे हो गये थे। माँ इन्हीं से अपने सुख-दुख कहती थी, इन्हीं को किस्से सुनाती। मैं घर में अतिथि लगता। प्रभु जोशी हमेशा लाल लीड से लिखते। लंबी-लंबी चिट्ठियाँ। लंबी-लंबी कहानियाँ। मैं क्लास अटेंड करने जाता। प्रभु लिखने बैठते। मैं लौटता। इनकी बीस पच्चीस पेज की कहानी तैयार। बिना काट-पीट के। छपने भेजते। धर्मयुग और सारिका में खूब छपते। सेलिब्रेटी लेखक की तरह। जब जो धुन सवार हो जाये उसमें डूब जाते। मेडिकल की किताब पढ़ने की धुन सवार हुई तो मेरी मोटी-मोटी किताब रट डालीं। मेरे दोस्त आते तो प्रभु डॉक्टरी डिस्कस करते। नये मित्र इन्हें ही डॉक्टर समझते। इतना ही नहीं यदि कोई बड़ी, नयी बीमारी के बारे में पढ़ा तो खुद को उसका बड़ा शिकार समझते। इसी कारण इनका विवाह देर से हुआ। एक बार इनकी लगभग तय शादी इसलिए न हो सकी कि प्रभु जोशी को लगा इन्हें किडनी की ऐसी असाध्य बीमारी हो चुकी है जिसके कारण चंद दिनों के मेहमान हैं। तब किडनी की वह बीमारी दुर्लभतम थी। ये किसी लड़की को असमय विधवा नहीं बनाना चाहते थे इसलिए पीछे हट गये। जबकि ये अब तक ठीक ठाक हैं। खूब मेहनत कर लेते हैं। प्रभु जोशी को गाने का भी बड़ा शौक था। अभी भी है। खूब गाते और कुमार गंन्धर्व के यहाँ दसेक दिन तक सीखने बैठे रहते। कुल मिलाकर प्रभु जोशी, प्रभु जोशी हैं। जो करें खूब करते हैं। इनका मूल्यांकन होना बाकी है।

ऊपर का यह उद्धरण इसलिए कि कुछ लेखक-कलाकार ऐसे भी होते हैं जिनके कदमों के निशान आलोचना के राजमार्ग पर नहीं मिलते। वे अपनी मिशाल आप होते हैं। उनकी गवाही पाठक देते हैं या समकालीन रचनाकार। प्रभु जोशी ऐसे ही विरल कहानीकार, उपन्यासकार, चित्रकार, फिल्मकार, लेखक और मीडियाकर्मी रहे हैं। वक्ता ऐसे कि बोलना एक यादगार परिघटना हो जाये। प्रभु जोशी के बाद किसी और वक्तव्य की जगह ही न रह जाये। इससे पहले कि उनकी कहानियों पर कोई बात कहूँ एक और प्रसंग-

प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा अप्रतिम कहानीकार शिवमूर्ति का कहानी पाठ और आलोचक शंभु गुप्त का व्याख्यान आयोजित होना तय हुआ था। 2007-08 की बात है। परिकल्पना, और आयोजन को अभूतपूर्व बना देने का संकल्प कथाकार, तबके इंदौर इकाई सचिव सत्यनारायण पटेल का था। सत्यनारायण पटेल, प्रलेसं इंदौर के लिए हाड़तोड़ मेहनत करनेवाले, और ज़रूरत आ पड़े तो जान लगा देनेवाले साथी थे। सत्यनारायण पटेल, अपनी धुन और जिद के लिए विख्यात हैं। उनका प्रण था कि मेरे सचिव रहते इकाई के अध्यक्ष की किताब पर भी गोष्ठी इसलिए नहीं होगी कि वे अध्यक्ष हैं। अपने लोग अपने हैं संगठन मुद्दों और ज़रूरी लड़ाइयों के लिए है। खैर, सत्यनारायण पटेल और मैं रोज़ साथ होते। वे रोज़ कहते यह मेरा आखिरी कार्यक्रम है। इसके बाद चाहे जो हो। तुम चाहो तो सचिव बन जाओ। सब एक एककर जाना चाहते हैं। मैं भी थक चुका हूँ। कार्यक्रम तय हुआ। सत्यनारायण पटेल ने शिलालेख तैयार करवाने की तरह कार्ड पर सारी बुद्धि, कल्पनाशीलता झोंक दी थी। सत्यनारायण पटेल की वर्तनी में तब हाथ तंग हुआ करता था। उसके लिए मैं था। दृष्टि और मंतव्य में वे हमेशा साफ़, दूटूक रहे हैं सो उन्हीं ने तय किया था टेक्स्ट। लक्ष्य था कम से कम दाम में अभूतपूर्व कार्ड छपे। एक हज़ार पर्चे भी छपवाये गये थे। मालवी आमंत्रण था- आवजू। सैकड़ों एसएमएस, ईमेल हुए। जब पर्चे पलासिया चौराहे, विश्वविद्यालय परिसर और गांधी हाल में सीताराम येचुरी के कार्यक्रम मे बांटे गये तो मैं भी साथ था। नया नया था सो लपककर पर्चे बाँटने में मुझे शरम आती तो सत्यनारायण पटेल उसी मुद्रा में समझाते जैसे गोर्की किसी युवा लेखक को समझाता होगा। याद रहे सत्यनारायण पटेल ने कहानी में अपने लिए सदा गोर्की जितना ऊँचा लक्ष्य रखा। ज्ञानरंजन और वरवर राव उनके किंचित बड़ी उम्र के दोस्त हैं।

कार्यक्रम की तारीख आने में कुछ दिन रह गये होंगे कि प्रभु जोशी को भनक लग गयी। उन्होंने सत्यनारायण पटेल के सामने प्रस्ताव रखा कि मुझे भी दूरदर्शन के लिए शिवमूर्ति का इंटरव्यू करना है। शिवमूर्ति, शहर मे आ ही रहे हैं तो दूरदर्शन पर भी उनका इंटरव्यू प्रसारित होना चाहिए। उन्होने सत्यनारायण पटेल से बात की। क्या पूछा, क्या आग्रह किया मैंने सुना नहीं लेकिन सत्यनारायण पटेल ने फैसला कर लिया था शिवमूर्ति दूरदर्शन नहीं जायेंगे। वे प्रलेसं के कार्यक्रम में आ रहे हैं। हमारे साथी ही उनका इंटरव्यू भी करेंगे। प्रभु जोशी दूरदर्शन के लिए काम करते हैं। दूरदर्शन सक्षम है। उसके पास धन है। शिवमूर्ति को अलग से बुलाएं। जितना लंबा करना हो उतना लंबा इंटरव्यू करें। प्रलेसं का समय साथियों का समय है। ऐसे फैसले मेरी समझ से परे थे। कदाचित मेरी आपत्तियाँ भी बचकानी रही होंगी कि उन्हें कोई भाव नहीं दिया गया। मैं कुछ नहीं कर सकता था फिर भी मेरी बात प्रभु जोशी से हो रही थी। शिवमूर्ति से हो रही थी। शिवमूर्ति जी मुझसे कह रहे थे भाई, मैं धरम संकट में पड़ गया हूँ। प्रभु जोशी मेरे बड़े पुराने मित्र हैं। मैं जाना चाहता हूँ उनके घर और दूरदर्शन। आप लोग आपस में सुलह कीजिए। कोई रास्ता निकल आये तो ठीक रहेगा। ऐसे अलगौझे वाले झगडे ठीक नहीं। मैंने सत्यनारायण भाई साहब से कहना चाहा तो उन्होंने समझाईश वाला आदेश दिया बीच में मत पड़ो। तुम नहीं समझोगे। लोग मुझे खा जायेंगे। यह मेरा आखिरी कार्यक्रम है। कोई समझौता नहीं होगा।
कईयों के फोन इधर उधर बजे। तनातनी, ईर्ष्याएँ और ग्लानियाँ निकलीं। बड़ी-बड़ी बातें उपजीं। समझौता हुआ कि शिवमूर्ति प्रभु जोशी के घर जा सकते हैं लेकिन कार्यक्रम के बाद, देवास के कार्यक्रम से ठीक पहले। प्रभु जोशी को इससे ही संतोष करना पड़ा। फलस्वरूप वे कैमरा लेकर कहानी पाठ शूट करने इंदौर प्रेस क्लब के हॉल आये। दूरदर्शन में ये उनके आखिरी के साल थे। शासकीय सेवा में LTR का वह दौर जब कोई अपनी बची हुई छुट्टियों का आवेदन भी खुद नहीं लिखना चाहता। उस कार्यक्रम में कॉमरेड होमी दाजी को व्हील चेयर के साथ कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ले आये थे। किसी को कोई मध्यस्थता करने का अधिकार नहीं था। एक बार कार्यक्रम तय हो जाये तो उसे वैसा ही होना चाहिए जैसा ठीक समझा गया यह अलिखित नियम था। पहले बहस हो सकती है बीच का हस्तक्षेप नहीं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग आये थे। जिस कार्यक्रम को सुनने व्हील चेयर पर कॉमरेड होमी दाजी आयें उसके बारे में और क्या कहा जाये? कार्यक्रम समाप्ति पर वहीं से शिवमूर्ति प्रभु जोशी के संवाद नगर वाले घर रवाना हुए। उनकी पेंटिंग पायी और वापस हम सब देवास अगले पड़ाव पर चले। इस प्रसंग का उपसंहार यह कि प्रभु जोशी के लोग अगर कायल हैं तो वे भी साहित्यकारों के लिए मान अपमान की परवाह नहीं करते। सत्यनारायण पटेल से अगर कोई काम ठीक से नहीं हो सकता तो वह है प्रशंसा। बावजूद इसके वे कहते हैं प्रभु दा ने अच्छी लंबी कहानियाँ लिखीं। मैं कई बार सत्यनारायण पटेल की बाईक में बैठकर प्रभु जोशी के घर गया।

हिंदी कहानी लगभग सवा सौ सालों में विन्यस्त है। हज़ारों कहानियाँ। कई कहानी युग, कई दौर, कई आंदोलन, कई वाद, कई विमर्श आये और गये। कथ्य को केन्द्र में रखकर देखें तो कहानियों में कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। आज भी कहानी यथार्थ का उद्घाटन कर रही और संदेश दे रही है। शायद अपनी इस आत्मा को वह हमेशा बचाकर रखे। कहानी की भाषा, और रूप में जो बदलाव आये वे अधिकतर युगीन ही रहे। विषय भी खूब नये से पुराने एवं पुराने से नये किये गये। किसी प्रतिज्ञा, विचार में आजीवन निबद्ध कहानीकार कम ही रहे। विचारधारा में प्रशिक्षित कहानीकारों ने भी चरित्रों और घटनाओं को लोकतांत्रिक तरीके से ही विकसित होने पर जोर दिया। कहानी में जितनी विविधता और प्रयोग मुख्य रहे उतनी ही पुरानी इतिवृत्तातमकता और परंपरागत शैली भी। किसी अत्यंत प्रयोगशील कहानी के लोकप्रिय होने के साक्ष्य कम ही मिलते हैं। फौरी तौर पर कोई कहानी या कथाकार भले कहीं से संबद्ध दिखे लेकिन अपनी कथा-प्रकृति में है स्वायत्त। कथा साहित्य में स्थान आज तक ऐसा ही चला आ रहा है कि कोई कथाकार दो तीन कहानी लिखकर अमर हो गया तो कोई कहानीकार दो तीन सौ कहानियाँ लिखने के बाद महज दो तीन कहानी के लिए जाना जाता है। कहानी आलोचना विकसित न हो पाने और सर्जनात्मक कथा आलोचना की गतिशील परंपरा न होने के कारण कहानीकार यादृच्छिक रूप से प्रसिद्धि और सम्मान के लिए संपादकों, पुरस्कार समितियों, पत्रिकाओं, समीक्षकों यहाँ तक कि ब्लॉग और फेसबुक पर भी निर्भर हैं। किसी को किसी का उत्तराधिकारी ठहरा दिये जाने में देर नहीं लगती। कहानीकार की तारीफ़ करनी है तो प्रेमचंद परंपरा का कह दिया जाता है। आज हिंदी कहानी में कोई दूसरी ढंग की परंपरा है इसके निशान भले मिलते हों लीक नहीं मिलती। नयी कहानी, जनवादी कहानी, अकहानी, समांतर कहानी, सचेतन कहानी, समकालीन कहानी आदि ऐसे नामकरण हैं जो किसी बड़ी कमी और विवशता के संकेतक स्वयं हैं। इन दिनों हालात इतने विचित्र हैं कि कहानीकारों के परमिट, लाईसेंस और एकसपायरी डेट चर्चा के विषय हैं। कोई युवा कहानीकार अपनी पहली कहानी से ही ऐसे नक्षत्र की तरह उदित हो सकता है जिसके पीछे पूर्ववर्तियों की चमक फीकी पड़ जाये तो कोई प्रतिबद्ध कहानीकार 40 साल के पहले कहानी संग्रह न छपवा पाने, एक भी ढंग का सम्मान न हथिया पाने के कारण साहित्यिक विस्मृति के ब्लैकहोल में समा सकता है। नया नया और युवा युवा का शोर हमेशा से चला आया है लेकिन अब वह दौर है जब कोई वरिष्ठ किसी क्षण चुका हुआ साबित किया जा सकता है। कहानी की बात कम हो चली है। कहानीकार भी मोबाईल फोन उपभोक्ता की तरह लास्ट काल और रिचार्ज से वेरीफाई हो रहा।

ऐसे मैगी और जियो उपभोक्ता कथा समय में यदि कोई यह पूछ बैठे कि प्रभु जोशी कौन? कौन है यह प्रभु जोशी नामधारी? तो अचरज तक न होना स्वाभाविक है। जबकि सच्चाई यह है कि प्रभु जोशी सत्तर के दशक में कमलेश्वर और धर्मवीर भारती की पसंद और स्वाद का लाडला कथाकार था। जिसकी कहानियाँ पाठकों के बीच पढ़ी जाने, सराहे जाने से ऊपर याद रह जानेवाली थीं। 1977 मे प्रकाशित आखिरी कहानी को मिलाकर मेरी स्मृति में प्रभु जोशी के नाम से लगभग 25 कहानियाँ मिलती हैं। सभी लंबी कहानियाँ। हिंदी कहानी में लंबी कहानियों के कृतिकार के रूप में निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, शैलेश मटियानी, संजीव, प्रियंवद, चंद्रकिशोर जायसवाल, उदय प्रकाश, अखिलेश, शिवमूर्ति आदि का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। 1980 के पूर्व लिखी गयीं प्रभु जोशी की कुछ यादगार लंबी कहानियाँ हैं- पितृ ऋण, उखड़ता हुआ बरगद, कमींगाह, शुरुआत से पहले, आकाश में दरार, धूल और धूल, इतना सब बे आवाज़ और अग्नि मुहानों पर।

इतना सब बे-आवाज़ की मुख्य पात्र स्त्री और नर्तकी है। वह भोपाल के एक उद्योगपति, कलाप्रेमी, बड़े आयोजक की प्रेमिका है। है तो वह आकंठ प्रेम में ही लेकिन एक दिन एक राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रम में प्रस्तुति दे चुकने के बाद अपने प्रेम और लिव इन रिलेशन के लिए लोक भर्त्सना का अति प्रचलित शब्द रखैल सुनकर विचलित हो जाती है। इसके बाद शुरू होती है उसकी यातना, पुरुषों की दुनिया में अपनी पहचान तलाशने की जद्दोजहद की अंतहीन दास्तान। क्योंकि यह सार्त्र और सीमोन की दुनिया नहीं है। इस कहानी की उदासी हमें संजीव की प्रसिद्ध कहानी मानपत्र की याद दिलाती है।

अग्नि मुहानों पर, कहानी प्रभु जोशी की साहसिक और जोखिम भरी कहानी है। इस कहानी में शिक्षिका बहन है जिसकी कोख में प्रेमी का बच्चा ठहर जाता है। माँ से सलाह मशविरा करने के बाद छोटा भाई इंदौर के एक नरसिंग होम में बड़ी बहन को गर्भपात के लिए लेकर जाता है। पिता संयोगवश किसी काम से कई दिनों के लिए बाहर गये हुए हैं। बस की यात्रा में जाती हुई बहन की स्थिति, लगभग एक सप्ताह बाद छोटे भाई के साथ बहन के लौटने की मनोदशा, भेद खुलते ही घर में बहन पर भाभी का शोर की तरह फैलता चारित्रिक हमला, माँ की दमघोटू यंत्रणा, गाँव पड़ोस में साथियों के मज़ाक-तंज, बहन के स्कूल में सहकर्मियों द्वारा अप्रकट जग हँसाईं, इन सबके बीच बहन की कहानी के आखिरी लाईन लिखे जाने तक लगातार मूक केन्द्रीयता कहानी विधा की हरसंभव खूबी को प्रकट करनेवाली है। इस कहानी का भाई एक बड़ा चरित्र है। बल्कि कहना चाहिए स्त्रियों के लिए एक बड़ी आश्वस्ति और संभावना है। कहानीकार प्रभु जोशी की दक्षता इसमें है कि मुख्य पात्र बहन शुरू से अंत तक भाई, माँ, सबके सम्मुख चीखती हुई सी चुप है। कलपती हुई सी दृढ़ है। गर्भपात के बाद टांगों में ताकत न रह जाने के बावजूद वृक्ष सी अचल है। एक सचमुच की स्त्री जो टूटती नही, अंत तक जीवन के लिए खड़ी रहती है। प्रेम तक चलकर पहुँचती है। भाई-बहन के संबंध और ऑनर किलिंग पर समकालीन कहानी के महत्वपूर्ण युवा हस्ताक्षर चंदन पांडेय की एक कहानी है रेखाचित्र में धोखे की भूमिका। मेरे खयाल से यदि इन दो कहानियों को एक साथ पढ़ा जाये तो भारत में स्त्रीत्व की धरती अपने समूचे रूप में दिखायी देगी। यह अनायास नहीं है कि प्रभु जोशी की कहानी धूल और धूल में पाठक प्रेमचंद की कहानी बड़े भाई साहब की गरिमा और उदात्तता पाते हैं।

पितृऋण, प्रभु जोशी के कहानी संग्रह का भी नाम है। आत्मकथ्य, ‘अभी तय करना है हँसना’, ‘किरिच’, ‘मोड़ पर’, ‘उखड़ता हुआ बरगद’, ‘कमींगाह’, ‘एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी’, ‘शायद ऐसे ही’ तथा ‘शुरुआत से पहले’ को मिलाकर इसमें कुल आठ कहानियाँ हैं। ये आठ कहानियाँ यथार्थ और संवेदना की धरती की उपग्रह हैं। स्वायत्त कथा सृष्टि।

इस किताब को पढ़ना भारतीय मनुष्यों की बस्ती में रमकर गुज़रना है। प्रभु जोशी के पात्रों की दुनिया इतनी विविध, बहुरंगी और स्वत:स्फूर्त तथा स्वायत्त है कि लगता है जैसे भाषा के कैमरे से काग़ज़ पर उतारा हुआ बहुत अपना देश। अपनी ही स्मृतियाँ, सपने और आकांक्षाएँ। अपना ही जीवन और जिजीविषा।

‘पितृऋण’ एक सादा कहानी संग्रह है जिसमें वे सारे वैभव हैं जो किसी सच्ची किताब में होते हैं। जिन्हें चमत्कार या आश्चर्यलोक की दरकार है अच्छा है कि वे दूसरी किताब खरीदते हैं। कहानी की उत्कृष्टता के विज्ञापनी समय में कहानियों की यह किताब समय, समाज, मनुष्य और संवेदनाओं के प्रति हमारे ऊपर चढ़े ऋणों का पता देती है। 

बहुत से समर्थ और अति प्रसिद्ध कहानीकारों के संबंध में इस किताब के बहाने एक बात दर्ज़ करने लायक है कि साहित्यिक सत्ताकामी उद्यमों से हमेशा दूर प्रभु जोशी जैसे कहानीकार यदि कुछ दिन के लिए भी उस फलदायिनी राह पर चल पड़ें तो उनका क्या होगा? पर नहीं, प्रभु जोशी ने सदैव खुद से माँगा जो माँगा, चाहे दृश्य श्रव्य कार्यक्रम हों, चाहे चित्र, चाहे कहानियाँ या फिर सालों गूँजने वाले लेख। इस कलाकार को मिली प्रसिद्धि और अंतर्राष्ट्रीय सफलता फूलों के साथ चली आती खुशबू जैसी है। प्रभु जोशी शब्द, वचन और रंगो के सिद्धहस्त कलाकार हैं। त्रिविमीय सर्जक। भाषा, रंग, दृश्य, दर्शन, राजनीति, सपने, विचार और संवेदना ये सब जब एक जगह गलते-ढलते हैं तो प्रभु जोशी का रचनाकार प्रकट होता है। 

प्रभु जोशी की कहानियों में रंग, दृश्य, संवेदना और विचार इस तरह घनीभूत होते हैं कि कोई पारखी बता सकता है कि वे अपनी कहानियों से जब विरत हुए होंगे तो उन्हें चित्रों में बदल दिया होगा। कहानियों में चित्र खींच देनेवाला यह कथाकार जब विचार की दुनिया में उतरता है तो व्यंग्यकार होता है। भाषा का साधक, दृष्टा और चित्रकार तीनो मिलकर प्रभु जोशी का कथाकार हैं।

कथाकार से कम से कम मेरी अपेक्षा आज भी वही है कि उसके पास सच हो, दर्शन हो और अबूझ से रोज़ बीतते जीवन को समझ लेने, उसे पा लेने और उसके मर्म में गोते लगा लेने की कूव्वत हो। कहानी कौशल नहीं है। डूबते को तिनके का सहारा है। कहानी के व्यावसायिक लेखन या महज़ कला हो जाने से पहले के कहानीकार ऐसे ही थे। संत से, दार्शनिक जैसे और कभी कभी तो बिल्कुल दीवाने।

तकनीकि मनुष्य को चाहे जितना नया बना ले आयी हो पर कहानियाँ यही बताती हैं कि वह आँसू और सपनों से रचा हुआ वही है सबसे पुराना। जब किसी कथाकार में ऐसी कहानियों की धारिता दिखती है तो वह अपना लगता है। प्रभु जोशी होना नयी दुनिया में, नये लिबास में उसी पुराने मनुष्य की किस्सागोई है। यह मानुष जितना देहात का है उतना ही नगर का।

प्रभु जोशी के भीतर भारतीय कहानीकार है। कहानीकार, जिसे नगर और गाँव दोनो की नब्ज़ पता है। उन्होंने भले कम कहानियाँ लिखीं, पहले खूब लिखीं, फिर बंद कर दीं अब लिखना चाहते हैं पर नहीं लिखते लेकिन जो लिखीं वे इतनी गाढ़ी हैं कि यदि समकालीनता या कथित प्रसिद्धि की रोशनी से हटकर उनमें उतरा जाये तो वे एक विवेकपूर्ण दुनिया में ले जाती हैं। जहां संबंध हैं, सवाल हैं तो इंसानी समाधान भी हैं। यथार्थ प्रभु जोशी की कहानियों में वैसे ही है जैसे बकरी के थन में दूध होता है। जिन्हे दूध मोल मिलता है वे इस यथार्थ के राग को पकड़ नहीं पायेंगे। 

कहानीकार की उम्र होती है। कहानियाँ बूढ़ी नहीं होती। भाषा कभी अपनी चमक नहीं खोती यदि उसमें संवेदना हो मर्म हो और जीवन के सच हों। भाषा के मामले में प्रभु जोशी पूरे कुम्हार हैं दिया, घड़ा, ईंट और सुराही सबके लिए एक ही मिट्टी कैसे अलग अलग रूँधी जाती है उनसे बेहतर कौन जानता है? ‘शुरुआत से पहले’ कहानी को लें तो यह जितनी कहानी है उतनी ही भाषा की नदी। पात्र जिस तरह बोलते हैं उनकी निजता जिस तरह उतर आती है, जिस तरह का नैरेशन है वह बेजोड़ है। मालवी लोकोक्तियों के संबंध में यह लंबी कहानी कोश की तरह है। पेशे, सामाजिकता और जीवन सत्यों को उद्घाटित करते उखान यहाँ भरे पड़े हैं। यह मालवी में मालवी की सीमा लाँघकर एक बोली को सार्विक अभिव्यक्ति का गौरव देनेवाली कथाभाषा है। जिसे आंचलिक रहकर महत्व जुटाने की फिक्र नहीं है बल्कि आंचलिकता को सर्वग्राही बनाने की साधु ज़िद है।

‘शुरुआत से पहले’ एक कुम्हार की कहानी है जो पैसे के लिए देवी की मूर्ति बनाता है। अपनी ही बनायी देवी से डरता है। एक दिन जब मूर्ति बन जाती है तो वह पाता है कि ग़लती से मूर्ति की पूजा हो चुकी है। पूजित मूर्ति अब कहीं नहीं जा सकती। बेची तो हरगिज न जायेगी यही प्रण कर बदरीप्रसाद अपनी जान पर खेल जाता है। अपनी ही निर्मिति पर जान देना कला के इस मूल्य के अलावा इस प्रक्रिया में जिन सामाजिक सत्यों का उद्घाटन हुआ है वे औपन्यासिक हैं। 

‘पितृऋण’ किताब की कहानियों को इस तरह पढ़ना कि ये एक कहानीकार की उसके उठान के दिनों के मील के पत्थर हैं ग़लत होगा इन कहानियों को रचनाकाल से बाहर अपने समय में पढ़ना सुखद रहेगा कि ये ऐसी कहानियाँ वास्तव में हैं जिनमें आज गूँजता है। कल का वैभव और मुहावरा बोलता है।

‘पितृऋण’ संग्रह की पहली कहानी है। यह कहानी बड़ी मार्मिक है। यदि आप इसे पढ़ेंगे तो कभी भूल नहीं पायेंगे। इस कहानी में होता यह है कि एक बहुत लायक बेटा अपने लाचार वृद्ध पिता को तीर्थ कराने के बहाने गंगा ले जाता है। पिता बड़े अरमान से अपनी पत्नी की अस्थियाँ भी साथ रख लेता हैं कि सुपुत्र के बहाने आ पड़े इस नसीब में वह अभागिन भी तर जायेगी। जैसे ही पिता गंगा में डुबकी लगाते हैं बेटा उनकी खुदरा पूँजी लेकर इत्मीनान से लौट जाता है। अब नहाये हुए अशक्त किंतु कृतज्ञ पिता के पास कुछ नहीं है। अपनी स्मृति और भीख के जोड़ से बनी पूँजी से शायद पिता लौट भी न पायेगा। जिस तरह से यह कथा लिखी गयी है उसमें लोक कथाओं के उस अभाव की पूर्ति भी हो जाती है जिसमें दुखियारी अधिकांशत: उपस्थित औरते होती हैं। इसमें अनुपस्थित औरत और माँ जिस तरह आँखों के सामने आती है वैसा केवल लोकगीतों में ही होता है। प्रभु जोशी की यह कहानी हिंदी की धरोहर है। इस कहानी के बूते वे उस पंक्ति के कथाकार हैं जिसमें ‘बूढ़ी काकी’ के साथ प्रेमचंद और ‘चीफ़ की दावत’ के साथ भीष्म साहनी आते हैं।

प्रभु जोशी ने कहानियाँ खूब क्यों नहीं लिखीं उन्हे पढ़नेवाला यह ज़रूर पूछेगा पर जब वह खूब लिखने और खूब प्रसिद्धि के उद्यमों से तंग आकर शांत बैठा होगा तो उसे यह सवाल भी उतना ही कोंचेगा कि प्रभु जोशी की कहानियाँ पढ़ी क्यों नहीं जा रही? कहानियों पर एक्सपायरी डेट की चिप्पी चिपकानेवाले होते कौन हैं? 

‘किरिच’ एक सांद्र प्रेम कहानी है। कुतुब मीनार में पहुँचने और उसके ढह जाने के प्रतीकों में जीवन भर और सबके जीवन में चलनेवाली कहानी है। यह प्रेम के उगने, उमगने और एक टीस में बदलते जाने की शाश्वत सी परिणति के उम्र भर के किस्से को लगभग एक दिन के भ्रमण के प्लॉट में समेट लेने की सफलतम कहानी है। यदि देख पायें तो भाषा के भीतर फिल्म।

प्रभु जोशी कहानी के भीतर फिल्मकार हैं। उनकी हर कहानी में फिल्म की संभावना है। लेकिन हमारे दौर में जिस तरह की वाचालता फिल्मों की उपजीव्य है उनके हामी शायद इन कहानियों को गले न उतार पायें।

हिदी कहानी के आदोलन आक्रांत दौर में विषय खोज खोजकर कहानियाँ लिखी गयीं। जब विषय कम पड़ गये तो आंतरिक सूखे, निर्वासन, आत्मालाप और मृत्यु जैसे विषय को भी खूब घसीटा गया। नतीजे में ऐसी चर्चित कहानियाँ निकली जिनके पात्र एक सी भाषा बोलते हैं, इतनी एकरूपता कि लगता है एक ही कहानी लिखने के लिए लेखकों की शिफ्ट बदल रही है। कभी कभी तो यह भी लगता है कि किसी कहानीकार का रिलीवर नहीं पहुँचा तो वही ओवर टाईम कर रहा है। ओवर टाईम कहानी लेखन के 70-80 के दौर में प्रभु जोशी ने इस इत्मीनान से कहानी लिखी कि उनकी कहानियों का किसान किसान की और मुसलमान मुसलमान की ज़बान बोलता है।

कहानी ‘मोड़ पर’ मंटो की कहानी ‘ब्लाउज’ की याद दिला जाती है। किशोर मन स्त्री का संग किस तरह चाहता है और समाज उसे निरंतर कितनी वंचना में धकेलता रहता है इसे कहानी जीवंत कर देती है। ‘उखड़ता हुआ बरगद’ पढ़कर काशीनाथ सिंह की कहानी ‘अपना रास्ता लो बाबा’ याद आती है। जो ‘अपना रास्ता लो बाबा’ बाद में पढ़ेगा उसे ‘उखड़ता हुआ बरगद’ याद आयेगी। कोई पाठक शायद ही ऐसा मिले जो दोनों में से किसी एक कहानी को चुनना चाहे। प्रभु जोशी के कहानीकार की यही खासियत है वे एक साथ कई कथा पीढ़ियों को अपनी निजता और अद्वितीयता में आत्मसात किये हुए हैं। लगभग सन्यस्त हो चला हिंदी का यह कथाकार जितना अपने दौर का है उतना ही हमारे दौर का है। प्रभु जोशी को पढ़ते हुए यदि कमलेश्वर याद आयें तो प्रियंवद भी ज़रूर याद आयेंगे।

यह कहना काफ़ी होगा कि संग्रह की कहानी ‘कमीगाह’ ज़रूर पढ़ें। इस कहानी को पढ़कर ही जाना जा सकता है कि केवल परकाया प्रवेश काफ़ी नहीं हिंदुस्तानी कथाकार में परधर्म प्रवेश कर मनुष्य को गले लगा लेने की सिद्धि भी होनी चाहिए थी। प्रभु जोशी क्या किसी कथाकार कि इससे बड़ी सफलता क्या होगी कि उससे ‘पितृऋण’, ‘शुरुआत से पहले’, ‘उखड़ता बरगद’ और ‘कमीगाह’ जैसी कहानियाँ केवल कुछ वर्षों में संभव हो जायें। 

प्रभु जोशी अनेक आयामी कलाकार-लेखक हैं। चिंतन परक राजनीतिक लेखन, कला समीक्षा से लेकर मुक्तिबोध की कविता अँधेरे में पर रेडियो रूपक के लिए साउंड रिकॉर्डिंग की खातिर रीवा के शमशान में रात को जा बैठने की धुन तक उनकी साधना विरल और अद्वितीय है। बहुत कम लोग जानते हैं कि जब प्रभु जोशी ने मन्नू भंडारी की कहानी ‘दो कलाकार’ पर फिल्म बनाई तो इस कहानी के पात्रों की, स्थितियों की पेंटिंग भी बनाई। चित्रकार और एक्टिविस्ट सखियों की फिल्म में पेंटिंग बनाने का काम भी कोई प्रभु जोशी जैसा फिल्मकार ही कर सकता है। 

परिश्रम में कोई उनका सानी नहीं। हमेशा सफेद शर्ट काले पैंट, सर्दियों में कोट सूट या काले जैकेट में दिखाई देनेवाले प्रभु जोशी छिछले हास्य और मसखरी से 20 गज दूरी का संबंध रखते है। दाँत निपोर देना उनकी नज़र में सबसे बड़ी दुष्टता या पराभव है। भाषा की किसी लक्ष्मण रेखा को कभी न लाँघनेवाले प्रभु जोशी रंग, वाणी और शब्द के अतुलनीय साधक हैं। अपनी विधा का स्वयं शिक्षित बड़ा जलरंग चित्रकार। अंग्रेज़ी भाषा में गोल्ड मेडलिस्ट। बेहतरीन अंग्रेज़ी लिखने बोलनावाला हिंदी का जुझारू सिपाही जिसके लेख ‘इसलिए हिंदी को विदा करना चाहते हैं हिंदी के कुछ अखबार’ का हिंदी समाज सदैव ऋणी रहेगा। हिंग्लिश के खिलाफ़ उनके द्वारा जलायी गयी हिंदी के चुनिंदा बड़े अखबारों की होली भी हमेशा याद रखी जानेवाली परिघटना है।

किसी किस्म की नीचता या स्वैराचार के विरुद्ध प्रभु जोशी का विनम्र विरोध देखने लायक होता है। जब वे आकाशवाणी में रहे तब अफसरों से जूझते रहे, कभी न भरे जा सकने वाले नुकसान सहे लेकिन समझौता नहीं किया। आजीवन बड़े पद में न आ सके लिखने-पढ़ने, कला-साधना को इतना सर्वोपरि रखा। जाननेवाले बताते हैं प्रभु जोशी ने हमेशा दूरदर्शन, आकाशवाणी की शेर की जबड़े जैसी नौकरी के भीतर खुद को बचाये रखा। अपनी रीढ सीधी रखी। जबड़े भींचकर, मुट्ठी तानकर बात कही। राजनीतिक सक्रियता आरोपित कर, सत्यनिष्ठा पर हमले की धूर्त नौकरशाही युक्ति द्वारा टर्मिनेशन के कगार तक साजिशन पहुँचाये गये लेकिन अपनी सफेद कमीज की कालर पर नौकरशाही की मैल नहीं लगने दी। आकशवाणी छोड़ दूरदर्शन में आये। केवल नौकरी बची रहने दी। निगाह हमेशा कला और भाषा पर रखी। प्रभु जोशी अपने पेशे, कृतित्व में कमलेश्वर, धर्मवीर भारती और अज्ञेय जैसी शख्सियतों की याद दिलानेवाली विनम्र उपस्थिति हैं।

लेकिन जैसा कि हर बड़े रचनाकार-कलाकार के अतिवाद होते हैं प्रभु जोशी के भी हैं। वे प्राच्य और भारतीय परंपराओं से पैदा होनेवाली आधुनिकता, प्रगतिशीलता की वकालत में अपने सारे अध्ययन, सर्जनात्मकता को दांव पर लगा देने से भी नहीं चूकते। तब उनकी हालत तसलीमा नसरीन या मकबूल फिदा हुसैन से बहुत भिन्न नहीं होती। जिनके बारे में प्रभु जोशी की ही स्थापना है कि फिदा हुसैन एवं तसलीमा नसरीन की एक ही समस्या है जो उन्हें एक सा साबित करती है वह यह है कि तसलीमा हिंदू चरमपंथियों को नाराज़ नहीं करना चाहतीं और हुसैन मुस्लिम चरमपंथियों को। एक की शरणस्थली हिंदुत्व है दूसरे की इस्लाम। प्रभु जोशी के मानस पर भी एक हिंदू चित्त प्रतिष्ठित है। वे बिल्कुल हजारी प्रसाद द्विवेदी की तरह इस मसले पर खुद को प्रश्नांकित किये जाने की हद तक दृढ़ रखने, प्रकट हो जाने से नहीं रोकते। गांधी और नेहरू के प्रति उनकी प्रश्नाकुलता जब तब मुखर होती रहती है लेकिन अंबेडकर के प्रति समर्थन में वे उन्हीं के शब्दों में कभी बरामद नहीं हुए। यद्यपि प्रभु जोशी का सृजन उनके तमाम पारिवारिक,धार्मिक, नागरिक अंतरविरोधों का भी उन्मूलन करनेवाला है इसमें दो राय नहीं। जो केवल उनके सरस्वती का चित्र बना देने मात्र से नहीं फड़फड़ा उठते उन्हें उनके जीवन और जीवन के पीछे के तर्कों में पर्याप्त संगति मिल सकती है।

एक सीमा भी उल्लेखनीय है कि साहित्य में प्रभु जोशी की प्रथम नागरिकता हिंदी की नहीं है। अति समृद्ध उद्धरण सामर्थ्य होने के बावजूद वे हिंदी की कोई पंक्ति कोट नहीं कर पाते। उनका विस्तृत साहित्यिक चेतन और अवचेतन अंग्रेज़ी में उपलब्ध साहित्य से ही परिचालित होता है। उनके अध्ययन का मुख्य क्षेत्र अंग्रेज़ी में उपलब्ध साहित्य बिल्कुल शुरुआत से रहा है। बावजूद इसके उन्होंने बहुतों से कहीं अधिक हिंदी का साहित्य पढ़ा है; उसकी बहुलता में डुबकी लगायी है। क्योंकि प्रभु जोशी जितना जाग सकते हैं उतना पढ़ने के लिए जागनेवाले विरले होते हैं। लेकिन हिंदी के समकालीन साहित्यकारों से गप्प, गोष्ठियों का राब्ता न रख पाने की यह एक बड़ी वजह है। प्रभु जोशी कदाचित इस बात के लिए असमर्थ ही पाये जायेंगे कि वे किसी से मिलने पर उसकी कहीं प्रकाशित महत्वपूर्ण रचना की याद कर बातचीत शुरू कर सकें। अपने समकालीनों के बीच कमतर उपस्थिति की क्या पता यही एक बड़ी वजह हो। क्योंकि हिंदी में संबंध निभाये जाते हैं, स्नेह लुटाये जाते हैं, प्रेम संबंधों के चालू खाते खोले जाते हैं। बड़े से बड़े हिंदी के लेखक युवतर लेखकों की किताबों की समीक्षा तक लिखते ही हैं। तमाम प्रतिबद्धता के बावजूद नामवर सिंह छद्म लेखिका स्नोवा बार्नो के मुरीद होने से बच न सके और हिंदी के अंबेडकर राजेन्द्र यादव कहानीकार ज्योति कुमारी के लिए जेल जाते जाते बचे। हिंदी का बड़ा लेखक किसी सम्मान, पुरस्कार समिति या फाउंडेशन में ही शामिल रहते अपनी रेंज बढ़ाता ही रहता है। 

अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि अनेक नदियों वाले देश भारत में मुझे प्रभु जोशी की उपस्थिति ब्रह्मपुत्र की याद दिलाती है जिसके तट पर भले मेले न लगते हों, श्रद्धालुओं का जमघट न लगता हो, कीर्तन न होते हों, लेकिन जिसके तट पर लोग अपने पाप भी न धोते हों। मूल बात जिसका जल भले ठंडा-सांवला हो लेकिन कभी सूखता नहीं। आप भी अपने अर्थ लगाने को स्वतंत्र हैं। बस एक ही गुजारिश है। ब्रह्मपुत्र को याद रखें।

-शशिभूषण
नोट: 'संवेद' में शीघ्र प्रकाश्य लेख का शीर्षक प्रभु जोशी के अनन्य पाठक एवं मित्र प्रद्युम्न जड़िया, सेवानिवृत्त वरिष्ठ उदघोषक की एक पाठकीय टिप्पणी से साभार लिया गया है।