शनिवार, 9 जून 2018

पागलख़ाना : बाज़ारवाद पर एक आधुनिक क्लासिक


ज्ञान चतुर्वेदी, भारतीय उपन्यास का कदाचित् एक ऐसा अन्यतम हस्ताक्षर है, जिसने विगत चार दशकों में, अपने रचनात्मक-पुरुषार्थ से, अपनी भाषा और अभिव्यक्ति की भंगिमा में, अपनी अग्रज पीढ़ी द्वारा निर्मित तमाम, पड़ावों, सोपानों और प्रभावों से निकल कर, अब स्वयम् की एक विशिष्ट सृजनात्मक पहचान बना ली है। बहरहाल, ‘राजकमल प्रकाशन गृह’ से आयी, यह सद्य प्रकाशित कृति, ‘पागलख़ाना’, उसका पांचवां उपन्यास है। कहना न होगा कि ‘भूमण्डलीकरण’ के साथ ही आये, ‘बाज़ारवाद’ की सांस्कृतिक-आर्थिक और सामाजिक चपेट में आ चुके, हमारे मौजूदा भारतीय समाज की, यह उपन्यास, एक ऐसी दारुण व्यथा-कथा कहता है कि जिसमें ‘समकाल के यथार्थ’ की अभिव्यक्ति को और अधिक अमोघ बनाने के लिए, इस कृति को उसने इरादतन, फैण्टेसी के शिल्प में प्रस्तुत किया है। 

मुझे याद है, जब ज्ञान चतुर्वेदी, इस ‘भूमण्डलीकृत-बाज़ार’ के बढ़ते वर्चस्व को केंद्र बनाकर, उपन्यास लिखने की रचनात्मक-मनोभूमि में था, तो उसने एक दिलचस्प बात कही थी- “प्रभु, हमारे चिकित्सा-विज्ञान की पुस्तकों में, मधुमेह और मधुमेह के रोगियों के बारे में एक दिलचस्प टिप्पणी है- ‘ नेम द आर्गन, देअर विल बी द डायबिटीज़।’ अर्थात् जब व्यक्ति को मधुमेह हो जाए तो आप उसके किसी भी अंग का नाम लीजिये, वहाँ जो कुछ भी ‘क्षरण’ अथवा ‘नई-रुग्णता’ प्रकट हो रही है, वस्तुतः मधुमेह के ही हस्तक्षेप की वजह से है। और उस ‘क्षरण’ और ‘रुग्णता’ को, जब तक आप पहचानेंगे, तब तक देर हो चुकी होगी, क्योंकि, डायबिटीज इज़ अ साइलेण्ट किलर.....।’ 

प्रसंगवश, यहां मैं यह याद दिलाना चाहूंगा, कि ख्यात उत्तर-आधुनिक दार्शनिक फ्रेडेरिक जेमेसन ने ठीक यही बात ’भूमण्डलीकरण’ के सन्दर्भ कही है कि ‘ वह माईक्रो और मेक्रो दोनों ही स्तर पर ‘रेडिकल’ उलटफेर करता है और जब तक आप समझेंगे कि ‘भूमण्डलीकरण’ वास्तव में क्या है, तब तक वह अपना काम पूरी तरह से निबटा चुकेगा, क्योंकि वह तब तक सर्वस्व को अपने वर्चस्व में अधिग्रहित कर लेगा।’ 

ज्ञान का कहना है कि “इस सदी में अब हमें, यदि हमें किसी भी ‘राष्ट्र-राज्य’ में किसी भी तरह की राजनीतिक या सांस्कृतिक-रुग्णता के लक्षण प्रकट होते दिखने लगे तो यह तय मान लीजिये कि वह ‘भूमण्डलीकृत बाज़ार’ का ही किया-धरा है, क्योंकि जिस तरह मधुमेह मीठे-मीठे ढंग से नष्ट करता है, ‘भूमण़्डलीकरण’ की हिदायत है कि ‘टु बी किल्ड विथ काइण्डनेस।’ क्योंकि, अगर दयालु दिखने-दिखाने का यह एहतियात नहीं रखा गया तो समाज में उस उलटफेर के प्रति प्रतिरोध पनप सकता है। कहना न होगा कि इसलिए ही, ‘भूमण्डलीकरण’ के ‘इन्फो-वारियर्स’ कहने लगे- ‘तुम्हारे जीवन में अब एक नई सभ्यता और संस्कृति का उदय हो रहा है, अन्धत्व के शिकार लोग, इसके आगमन के विरुद्ध हाय-तौबा मचा रहे हैं। यह परिवर्तन, जो बहुत तेज़ी से आ रहा है, वह जीवन और समकाल की सबसे बड़ी सामाजिक सच्चाई है।’ वे ‘स्मृति’ के विरुद्ध ‘विस्मृति’ को रेखांकित करने लगे। कहना चाहता हूं कि ज्ञान चतुर्वेदी की, ‘बाज़ारवाद’ के साथ ही अचानक आ जाने वाले इस अप्रत्याशित परिवर्तन के पूरे कालखण्ड पर, एक सजग नज़र थी और वह अपने चिकित्सा-शास्त्र की पुस्तकों और पत्रिकाओं के साथ ही साथ, वह ‘भूमण्डलीकरण’ द्वारा किए जा रहे उथलधड़े को, एक बहुत गहन सम्वेदनशील लेखक की तरह लगातार देखता चला आ रहा था। वह ‘भूमण्डलीकरण’ से सम्बन्धित, किताबें पढ़ रहा था, ताकि वह उसे ठीक से समझ सके, क्योंकि पूरे भारतीय राष्ट्र और समाज के बीच, कोई भी ऐसा क्षेत्र और अनुशासन अछूता नहीं बचा रह सका था, जिसमें ‘पश्चिम-केन्द्रित बाजार’, अपने ढंग से अराजक उलटफेर नहीं कर रहा हो। ‘भूमण्डलीकरण’ के आगमन के साथ ही, यह एक दिलचस्प अन्तर्विरोध प्रकट होने लगा कि ‘आर्थिक’ स्तर पर, हम जहाँ एक ओर ‘वैश्विक’ हो रहे थे, वहीं ‘चेतना’ के स्तर पर अधिक ‘क्षेत्रीय’। जबकि, ऐसा होना, पूरे समाज को, एक तीखे अन्तर्संघर्ष से भर रहा था। क्योंकि एक तरफ़ जिस ज़ुबान से ‘नेशन इज़ एन इमेजिण्ड कम्युनिटी’ की बात कही जा रही थी, वहीं यह भी हो रहा था कि अंचलों से आवाज़ें उठ रही थीं कि हमें हमारा ‘झारखण्ड’ चाहिए, हमें हमारा ‘बघेलखण्ड’ या ‘बुन्देलखण्ड’ चाहिये। ज्ञान चतुर्वेदी, तब तक इस अर्न्तविरोध पर, ‘इण्डिया टुडे’ में एक बहुत तीख़ी और सशक्त फैण्टेसी लिख चुका था। 

बहरहाल, बहुत ज़ल्द ही पूरे समाज में, मुक्त-व्यापार बनाम ‘बाज़ारवाद’ का एक सार्वदेशीय भय चतुर्दिक व्यापने लगा था, गालिबन, जो कुछ उनका ‘अपना’ है, वही उनसे छीन लिया जाने वाला है। जाल बिछ रहे थे, और सबसे बड़ा जाल था-अन्तर्जाल। इण्टरनेट। वह घरों के भीतर कमरों में फैलता जा रहा था- और छतों पर एक दूसरा जाल था, जिसमें सारी दुनिया की ख़बरें खौल रही थीं- कहा जा रहा था, एक ‘सूचना सम्पन्न समाज’ की रचना हो रही है। किसी को कोई सम्पट नहीं बैठ पा रही थी कि ‘आख़िर ये क्या हो रहा है...?’ एक ईमानदार-सन्देह, सर्वस्व को ‘सन्दिग्ध’ बनाता हुआ, ‘बाज़ारवाद’ का ही एक विराट वलय रच रहा था। राजनीति में अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र में भूगोल, भूगोल में भाषा, भाषा में भूख, भूख में भगवान् - और इस सभी में सर्वव्यापी की तरह घुस रहा था, ‘चरम मुक्त-बाज़ार’। लगने लगा कि कोई महा-मिक्सर है, जिसने पूरे समाज और उसकी संरचना के तमाम घटकों को फेंट-फेंट कर गड्ड-मड्ड कर दिया गया है। उत्तर-आधुनिक फ्रेंच दार्शनिक देरीदा ने इसी ‘गड्ड-मड्ड समय’ को ‘टाइम फ्रेक्चर्ड-टाइम एण्ड टाइम डिसजॉइण्टेड’ जैसी सामासिक-पदावली में परिभाषित करने की दार्शनिक कोशिशें भी की। 

लेकिन, ज्ञान चतुर्वेदी के लेखन के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस ‘बाज़ारवाद’ बनाम ‘भूमण्डलीय-यथार्थ’ के वैराट््य को अपनी रचना में, ‘अधिकतम ढंग से अधिकतम स्तर पर’ समेटने की थी, क्योंकि वह इतना हाइपर, इतना विस्तृत और विराट था कि उसे एक कृति में समाहित करना, एक बड़ी लेखकीय द्विविधा का काम था। इसी दौर में उसके स्तंभों में भाषा और शिल्प का एक नितान्त नया और आत्म-सजग मुहावरा प्रकट होने लगा था। उसे लगने लगा था कि उसके पास एक लम्बे लेखकीय-जीवन के अनुभव से अर्जित व्यंग्य के शिल्प में, इस विराट और बहुत जटिल छद्म को उद्घाटित करना आसान नहीं है। ‘परिवर्तन की निर्ममता’ से उपजे अवसाद से निबटने के लिए, टेलिविज़न चैनलों पर ‘यथार्थ को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करता हुआ, मसखरी का कारोबार’, जन-सामान्य के ज़रूरी और जायज़ गुस्से को ‘मनोरंजन की मीठी खुराक़’ से हत्या कर रहा था। अख़बारों के लिए भी व्यंग्य के बजाय, हास्य-लेखन की उपभोक्ताई ज़रूरत हो गई थी। ख़बरों का भी खुल कर ‘मनोरंजनीकरण’ होने लगा था। समय और समाज के सत्य को, ‘कीलिंग विथ इण्टरटेंमेण्ट’, की धूर्त कूटनीति ने, सत्य को पहले से कहीं अधिक, सन्दिग्ध करते हुए, ‘विचारहीनता के विचार’ को फैलाना शुरू कर दिया था। तब निश्चय ही एक जेनुईन लेखक में अभिव्यक्ति की चिन्ता, ‘रचना’ में, ‘फार्म’ को लेकर ही उठती है। कहने की ज़रूरत नहीं कि किसी भी सच्चे लेखक के लिए अभिव्यक्ति से अधिक अभिव्यक्ति की भंगिमा के निर्धारित करने का यह एक क़िस्म का बहुत कठिन संकट होता है। यह संकट अब और गहरा गया था। क्योंकि लेखक, जिस यथार्थ को अपनी कृति में व्यक्त करने का दावा कर रहा था, उससे अधिक यथार्थ तो अब ‘रियालिटी-टीवी’ के फुटेज देने के लिए आगे आ गये। जबकि, ‘बाज़ारवाद’ के खिलाफ, किस्सागोई और निरे बखान की, निरी इन्वेस्टिगेटिव-साहित्यिक पत्रकारिता छाप बहुतेरी कहानियां, अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं में आ रहीं थीं, जिनमें बने-बनाये फामूलाओं वाले प्लाटों के सहारे, ग्राहक के ठगे जाने या विज्ञापन के छद्म या एग्रेसिव-मार्केटिंग को विषय बनाया गया था। जबकि, वह बाज़ार तो है लेकिन ‘बाज़ारवाद’ नहीं हैं। 

कुल मिलाकर, ये सारे वे प्रश्न ही थे, जिन्हांने ज्ञान चतुर्वेदी को, प्लाटवादी रास्ता छोड़ कर, कथा में घटनाओं और विवरणों के मोह को छोड़कर, एक ‘अकल्पनीय अविश्वसनीयता’ के सीमान्तों पर पहुंचकर, ‘एक नई कलाजन्य विश्वसनीयता’ की गढ़न्त’ वाला, ‘पागलख़ाना’ जैसी अद्वितीय रचना लिखने के लिए बाध्य कर दिया। एक दिन उसने कहा-‘ प्रभु...! मैंने एक ‘महा-खलनायक’ की कल्पना की और उसे एक ‘अमानवीय-सर्वसत्तावादी वर्चस्व’ के केंद्रीभूत किरदार की तरह गढ़ने की योजना बनायी र्है, क्योंकि, ये जो नया ‘बाज़ारवाद’ आया है, वह एक कोई सामान्य-सा परम्परागत बाज़ार नहीं हैं, बल्कि यह तो गहरी मेधा वाले व्यक्ति की कल्पना से भी कहीं अधिक विराट है। यह ‘लार्ज़र देन लाइफ नहीं, लार्ज़र देन ह्यूमन इमेजिनेशन’ है। क्योंकि, ये अब कमोबेश ‘ईश्वरावतार’ जैसा हो चुका है। वह सर्वव्यापी है। मेरा सोचना है कि यह अब ‘रामदीन-श्यामदीन’ के इस नये चमकीले बाज़ार में ठगे जाने के इकहरे किस्सों से यह एक्सपोज़ नहीं होगा।’ 

यह बहुत दिलचस्प है कि ज्ञान चतुर्वेदी के इस उपन्यास में इसलिए मुख्यतः केवल सिर्फ दो पात्र ही हैं। एक है, ‘बाज़ार’ और दूसरा है, ‘नागरिक’, जो अलग-अलग अध्यायों में अलग-अलग संस्करण में दिखता है, लेकिन बुनियादी रूप से वह एक ही पात्र है, एक ही किरदार है, जो अलग-अलग प्रतिनिधि परिस्थितियों में त्रास और भय के प्रतिनिधि कुचक्र में फंसा लिया जा रहा है। कहीं पर उसके सपनों की चोरी हो गई है, तो कहीं पर उसकी स्मृति का अपहरण हो गया है, वह खुद को पहचानना भूल गया है। वह ताले की तलाश में है। बाज़ार उसकी तलाश में है। पागल बढ़ रहे हैं। वह पागल है। वह पागल कतई नहीं है। वह दुनिया और दुनियादारी से भाग रहा है। वह भाग रहा है, आकाश से ऊपर और धरती के नीचे। वह छिप रहा है। क्योंकि वह अपने उस ‘स्वत्व, सत्य और सातत्य’ को बचा लेने में लगा हुआ है, जो उसके पास संचित था। ‘बाज़ार’ तो उपन्यास के हर अध्याय में हर जगह और हर पृष्ठ पर है, नागरिक को अपने लिए अनुकूलित करता हुआ। एक ‘डिज़ाइण्ड’ केन्द्रीय-आशावाद के पीछे वह विभिन्नताओं को लीलना चाहता है। उपन्यास में आया, वह ऐसा बाज़ार है, जो ‘फ्री-विल’ को नष्ट करके ‘स्वतन्त्रता’ की बात करता है, जबकि वह केवल ‘चयन’ की स्वतन्त्रता देता है, जीवन जीने और उसके तरीके़ की नहीं। 

सच बात तो यह है कि इस ‘बाज़ारवाद’ को, केवल, दुकानों, घरों, इमारतों और बहुमंजिला मॉल्स में ही नहीं देखा जा सकता है बल्कि इन दिनों उसकी नज़र तो, मनुष्य के मस्तिष्क पर है। कहना चाहिए कि कण-कण में रहने वाले भगवान् को अपदस्थ करके ‘बाज़ार’ ने वहाँ अपना वास बना लिया है। शायद, ईश्वर नहीं, मैं कहना चाहूँगा, नीत्शे की शब्दावली उधार लेकर- एक करुणाहीन राक्षस, जो सर्वस्व को अपने अधीन करने के लिए न केवल संकल्पित है, बल्कि समर्थ भी है। प्रकारान्तर से वह ‘विराटावतार-बाज़ार’, उपन्यास के हर अध्याय में एक धूर्त और दक्ष ‘ऑर्गनाइजेशन मैन’ है, जो सिर्फ संस्थागत रूप से सोचता है, व्यक्ति की सम्वेदना के सहारे नहीं। वह उपन्यास में हर जगह है, सबकुछ को, यहाँ तक कि विश्व के हर नागरिक को उपभोक्ता में बदलता हुआ। सिर्फ एक ही रूप में है, पृथ्वी का मनुष्य’, उस के लिए, मात्र उपभोक्ता। ‘एकता’ नहीं, एकरूपता उसके अभीष्ट की फेहरिस्त में प्राथमिक है। निस्सन्देह, वह पश्चिम के कूटनीतिक सांस्कृतिक विस्तारवादी वर्चस्व का अपराजेय रूप है, जो अन्ततः पहली दुनिया की श्रेष्ठता और उसमें भी केवल अमरीकी श्रेष्ठता को ही शेष संसार के अनुकरण के लिए ‘आईडियल-साँचे’ का काम कर रहा है। यहां, बाज़ार के कारण आये केऑस को समझने के लिये कुछेक महत्वपूर्ण बातें। 

मसलन, बेल-आउट डील पर हस्ताक्षर करने के बाद, भारत-सरकार के वित्तमंत्री की सारी प्रतिबद्धताएँ, अब भारतीय ‘राष्ट्र-राज्य’ के बजाय, ‘अन्तर-राष्ट्रीय मुद्रा कोष’, ‘विश्व बैंक’ और ‘विश्व-व्यापार संगठन’ के तमाम कूटनीतिक कारिन्दों की कृपा-साध्यता को पाने के प्रति हो गई थी। यह राष्ट्र की ‘सम्प्रभुता’ के धीरे-धीरे ‘स्वाहा’ करने का साबर-मन्त्र था, जिसके पार्श्व में ‘भूमण्डलीकरण’, और ‘उदारवादी जनतन्त्र’ का ‘सामगान’ चलना था। इसका, कुल अभिप्राय यह था कि ‘राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था’ को, ‘अन्तरराष्ट्रीय-अर्थव्यवस्था’ के महामत्स्य से नाथना था ताकि पश्चिम-केन्द्रित ‘चरम मुक्त बाज़ार व्यवस्था’ के हित में, आवारा-पूंजी के प्रवाह का निर्विघ्न मार्ग खोला जा सके। अर्थात् अब ‘शिक्षा’,‘स्वास्थ्य’,‘संचार’, से लेकर तमाम वे दायित्व, जो ‘राज्य’ की प्रथम शर्त थी, उन्हें ‘निजीकरण’ की झोली में डाल कर, जन-प्रतिबद्धता से हाथ झाड़ कर, राज्य के पास अब केवल ढांचागत-समायोजन’ के स्वागत में तालियाँ कूटने भर का काम रह गया था। यही ‘मनमोहनामिक्स’ कहा जा रहा था, जो कि असल में भारत का ‘दोहनामिक्स’ था। 

यह निर्णय समझदार देशवासियों के लिए ‘बाज़ारवाद’ उर्फ ‘मनमोहनामिक्स’ सचमुच ही हतप्रभ कर देने वाला था क्योंकि भारतीय जनतंत्र में, इतना बड़ा परिवर्तन आज़ादी के बाद पहली बार, अचानक लाद दिया गया था, जिसके लिए अभी भारतीय राष्ट्र-राज्य और समाज कतई तैयार नहीं था, क्योंकि आने वाला यह परिवर्तन, एक तरह से बड़ा अप्रत्याशित ‘विनष्टीकरण’ था, जिससे नेहरू-युगीन ‘वैकासिक आधुकिता’, जमींदोज़ हो गई, और ये सचाई भारतीयों को, अपनी ‘राजनीतिक रतौंध’ के चलते समझ में ही ही नहीं आ रही थी। यह कैसा ‘परिवर्तन’ था ? जिसमें हमारा अभी तक का सारा का सारा, संचित ही भीतर से, जगह जगह से टूट रहा था। 

मार्क्स ने एक जगह लिखा था, जब किसी परम्परागत गढ़न्त वाले समाज में, भीतर से परिवर्तन के लक्षण प्रकट होने के पूर्व ही, यदि उस पर बाहर से ‘बलात् परिवर्तन’ लाद दिया जाये तो वह पूरा का पूरा समाज, एक गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक-अवसाद में जीने को अभिशप्त हो जाता है। स्पष्टतः भारत में ‘भूमण्डलीकरण’ के शुरू होते ही, ठीक यही होने लगा, क्योंकि परिवर्तन त्वरित और उसका आघात इतना निष्करुण था कि वह परम्परागत का, चुन-चुन कर ध्वंस करता चला जा रहा था। 

यहाँ यह प्रासंगिक है कि क्योंकि सबसे पहले हमारे यहाँ ही नहीं बल्कि सब जगह, ‘बाज़ारवाद’ मीडिया की पीठ पर सवार होकर आया और मीडिया का धड़ाधड़ ‘भूमण्डलीकरण’ हुआ और पश्चिम की ‘कल्चर इण्डस्ट्री’ के उत्पाद या कहें कि ‘उनके’ माल के विक्रय के लिए, उसने हवाई हमले कर-कर के, सारे ‘परम्परागत’ और उससे जुड़ी आसक्ति को भी नष्ट करना शुरू करना शुरू कर दिया, ताकि उस माल के क्रय और उपभोग की आदतों के ज़रिये, यथेष्ट जगह बनाई जा सके। परिणाम-स्वरूप, उस चक्रव्यूह ने ऐसी संरचना बनाई कि जीवन-शैली का उलटफेर करने में, उसने बहुत कम समय लिया- इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने विज्ञापन के ज़रिये ‘कामना के अर्थशास्त्र’ के भीतर, अल्प-उपभोगवादी भारतीय समाज को उलटकर ध्वस्त कर दिया। ‘विचार’ की जगह ‘वस्तु’ ने ले ली और यही वह सबसे कागर-सा, अचूक ब्रह्मास्त्र ही था, जिसने मिल्टन फ्रीडमैन के, उस ‘मुक्त-बाज़ार’ को ज़ल्द ही विकराल बना डाला। उसने गाँव के विरुद्ध ‘शहर’ और नागरिक के विरुद्ध ‘उपभोक्ता’ को बनाया और पश्चिम के महानगरीय-अभिजन की जीवन-शैली के अनुकरण को ही समूची मानव-सभ्यता का आख़िरी अभीष्ट बना डाला है। 

बुनियादी रूप से ‘बाज़ारवाद’, उपन्यास में नागरिक के विवेक को उखाड़ कर फेंकने के लिए राजी करता नज़र आता है। वह स्वतंत्र सोच को ‘कॉमनसेन्स’ से बाहर बताकर, उस सोच को ही ‘पागलपन’ सिध्द कर कर डालता है। अर्थात्, जो असहमत है, वह निर्विवाद रूप से ‘प्रमाणित-पागल’ है। उसे एक क़िस्म का ‘डि-नेचर्ड ह्यूमन बीइंग’ चाहिए, जो अपनी मानवीय नैसर्गिकता को छोड़ कर केवल उसके ‘उत्पादों’ का भोक्ता भर हो। एक निरा ‘कल्चरल-कंज्यूमर’ यह पहली दुनिया की मेटा-थियरी है, जो दूसरे देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक विवेक का अपहरण बाज़ार के हाथों करने लगी थी। 

मैं, ज्ञान चतुर्वेदी के घर में, उसकी माँ और छोटे भाइयों के साथ, कोई पौने दो साल रहा हूं, नतीज़त़न, उसे मित्र के साथ ही साथ एक रचनाकार की तरह भी जानने का कुछ-कुछ दावा कर सकता हूँ। ज्ञान, जब इस विषय को उठा रहा था तो निश्चय ही विषय की ‘अतिव्याप्ति’ को देख कर लिखते हुए वह शनैः शनैः इरादतन विषय का काफ़ी कुछ खारिज भी करता चला आया होगा। पूछा जा सकता है कि जिसे वह निरस्त करता है, किसके आग्रह पर ? बाहर के सच के आग्रह पर या भीतर के सर्जक की हिदायत के पालन में। मुझे कृति पढ़ते हुए लगा। उसने दोनों के आदेशों पर विचार करके अपने लेखक के नैसर्गिक रचना-विवेक से ‘कुछ निरस्त’ किया, ‘कुछ चुना’ होगा, क्योंकि ‘रचना करना’ और ‘खारिज़’’ करना, उसका अवश्यंभावी अंग है। टु क्रियेट एण्ड टु रिज़ेक्ट। एक तरह से कहना चाहिए, ज्ञान के भीतर शुरू से ही एक ‘प्रति-रचनाकार’ की उपस्थिति काफी मुखर है। उस ‘प्रति-रचनाकार’ को, उसके अन्तरंग में छुपे ‘आलोचक’ की तरह पहचाना जाना चाहिए। वह ठीक ही कहता है कि ‘साहित्य के ज़रिये’, इस भूमण्डलीकृत समय के इस सम्पूर्ण यथार्थ और सत्य को एक कृति में खोज लेने का दावा, एक अतिकथन कहा जाएगा, लेकिन ‘मानव-कल्पना’ में अपूर्व क्षमता है। और यह उपन्यास मेरे लिये, इस सम्भावना के दोहन का एक छोटा-सा, लेकिन सर्वथा ईमानदार लेखकीय यत्न है।’ 

कहने की ज़रूरत नहीं कि मनुष्य के लिये कल्पना जीवेषणा है। पेरिस में, जो छात्र-आन्दोलन हुआ था, जिसमें ज्यां पाल सा़र्त्र शामिल थे, उसमें युवाओं का नारा था-‘ कल्पना शक्ति है, कल्पना को अपार शक्ति मिले।’ बहरहाल, ज्ञान चतुर्वेदी के पास निस्सन्देह बहुत ही सशक्त कल्पना है। जब एक लेखक की रचनात्मक-कल्पना, प्रकट और गोचर यथार्थ का हाथ छोड़कर, एक उन्मुक्त अराजक कल्पना से भिड़न्त का निर्णय करती है, तो वह कथ्य को ‘वामन और विराट’ के द्वन्द्व में खड़ा करते हुए, स्वयं को एक स्वैर-कल्पना के कायान्तरण में पाती है। तब प्रत्यक्ष-यथार्थ से उसका सम्बन्ध सीधा-सरल न हो कर काफी जटिल हो उठता है। क्योंकि ‘फार्म’ के स्तर पर वह दुरूह हो जाता है। लेकिन जैसा कि हर्बर्ट मार्क्यूस ने कहा है- ‘ओनली द फॉर्म एक्सप्लोड्स। दरअसल, यहीं से ‘सामान्य-सत्य’ का एक ‘उत्कृष्टतम-विशेष’, कृति में विशिष्टता के साथ व्यक्त होता है। यही फैण्टेसी के जन्म का तर्क है। इसलिये, यह बाज़ार-समय के यथार्थ की, एक संश्लिष्ट पुनर्रचना ही है, जिसने ‘पागलखाना’ के समूचे वातावरण को, एक ‘सार्वदेशीय पैरानोइया’ में शब्दायित किया गया है। हम जब, ज्ञान के लेखक की एक अपूर्व दक्षता को देखते हैं,, तो लगता है कि यही वह उसके लेखन की विशिष्टता है, जो उसे सैम्युअल बैकेट के ‘स्ट्रेंग्थ टू इम्प्रोवाइज’ के ही बहुत निकट ले जाकर खड़ा कर देती है। क्योंकि उसने उपन्यास के समूचे आभ्यन्तर में एक ‘कलैक्टिव’ पैरानोइया’ रचा है, जो उसके चिकित्सा-विज्ञान में होने से सम्वादों में इतना सहजता से प्रकट होता है कि वह अपने ‘इम्प्रोवाइजशन’ के कौशल से, ‘यथार्थ से परे के यथार्थ’ की विचक्षण’ प्रतीति कराता है। उपन्यास का नागरिक पात्र, एक अनश्वर और अजर-अमर से भय में है। कभी वह भाषा के मुहावरे के सच को और सच के मुहावरे को एक दूसरे से भिड़ा देता है। वह बताता है कि डर सर्वाधिक विराट और शक्तिशाली है, वह किसी भी ताले से नहीं रुकता। वह एक ऐसे ताले की तलाश में है, जिसे ‘सरकार’ और ‘बाज़ार’़ दोनों ही नहीं तोड़ सके। वह बेतरह घबराया हुआ है। उसे लगता है, बाज़ार इतना क्रूर है कि वह पेण्ट उतरवाकर उसकी जिप में ताला लगवा दे। ताले से बुलडोज़र थोड़े ही रोके जा सकते हैं। ‘समय’ को ऐसे समय में यही पता नहीं चल पा रहा है कि असल में पागल कौन है..? और ये भी फैसला ‘समय’ ही करेगा, लेकिन एक ‘समय’ के बाद। जीनियस को पागल और पागल को जीनियस घोषित कर दिया जा सकता है। बाज़ार ने सपनों और सामान को ऐसा मिला दिया है कि अब वह सामान का ही सपना देखता है। सपनों के क्लोन बनाये जाने लगे हैं। हालांकि, घरों की दीवारें उनकी ही हैं, लेकिन कान बाज़ार के हैं। कानून, बस एक चुटकला हो गया है। बाज़ार हज़ारों-हज़ार आँखों और हाथों वाला है, वह उन पर निगाह रखता है, जो उनके ‘पक्ष’ में हैं और वह उन पर भी, जो उसके ‘विरुद्ध’ हैं। उपन्यास में वर्णित जीवन ऐसा होता जा रहा है कि जीवन को ‘अपनी पराजय का पता’ ही नहीं चल रहा। वह पराजय में ही अपनी जय देखता है। 

उपन्यास के देशकाल के भीतर, पाठक को एक ऐसी दुनिया बन गई दिखती है, जहाँ सूरज चाँद सितारे सब का बाज़ारीकरण हो गया है। कुछेक ने धूप का प्री-पेड कार्ड बनवा लिया है। मुस्कुराने वाला पागल हो चुका है या जो पागल है, वही निर्दोष और निर्विकार मुस्कान फेंक सकता है। घरों की हालत यह है कि घर में, घर के लिए जगह नहीं बच पाई है। बाज़ार अपने हित में सबसे पहले सरकार को बेदखल किए दे रहा है क्योंकि संसद के बारे में भ्रम है। और भ्रम डिस्काउण्ट पर मिलने लगा है, कोई भी उसे ‘पोस्टपेड’ और ‘प्रीपेड’ से ऑनलाइन ख़रीद बेच सकता है। बच्चे बेकार हो चुके ‘मत-कमाऊ’ माता-पिता को ऑनलाइन बेच सकने की हैसियत में हैं। उन्हें सोये-सोये बेचा जा सकता है। ‘समय’ केवल घड़ी के डायल में है, बाक़ी बाज़ार-समय है। धर्म की नई पैकेजिंग हो गई है। देवता डरे हुए हैं, बाज़ार से। उनका पूजा-पाठ उसी बाज़ार के हाथ में ही है। देवताओं ने अब बोलना स्थगित कर दिया है। बाज़ार, राजनीति से नियन्त्रित नहीं है बल्कि राजनीति ही बाज़ार से नियन्त्रित हो रही है। लोग हतप्रभ हैं कि उनकी हथेलियों से हस्तरेखाएं गायब होने लगी हैं। आदमी के कन्धे से सिर हट जाने पर, चीज़ें आसान हो सकतीं हैं, ऐसा सोचा जा रहा है। विचारों की डेड-बाडी है। कोई पोस्ट-मार्टम नहीं, पोस्ट-माडर्न है। डॉक्टर की प्रोफेशल आवाज़ इतनी मीठी हो चुकी है कि क़ायनात की सारी चींटियां चौंक कर, सिर उठाकर उधर देखने लगीं हैं। बाज़ार अन्धेरे के ख़िलाफ़ है और बिना बत्ती की मोमबत्ती जला कर अन्धेरा भगा रहा है। सबसे ख़तरनाक बाज़ार के लिये यही है कि आदमी सोच सकता है। उसके पास दिमाग़ है। वह सोच कर भागता है। यानी कि वो दिशा जानता है। आदमी को देखकर बिजली के खम्भे हंसतें हैं। बाज़ार सपने देखने वालों को मारने की योजना लिये घूम रहा है। दिक्कत ये कि अपने जीवन की निजता को बचाने के लिये, जीवन को ही दांव पर लगाने की जोख़िम से भरा हुआ है, वह नागरिक। इसलिए, बाज़ार उसे तकनीकी-नियतिवाद से धीरे-धीरे मैनेज़, मैन्युपलेट और म्युटिलेट कर रहा है। ज्ञान ने बाज़ार को समूची पृथ्वी के सर्वसत्तावादी प्रबन्धक के रूप में, ऐसा अपराजेय चित्रित किया है, जो भविष्य में ईश्वर को अपदस्थ कर देने वाला है। 

याद कीजिये, पश्चिम में जो व्यक्ति बाज़ार की जकड़ से मुक्त होने में नाक़ामियाब रहा, वह धर्म में स्थानान्तरित हो गया। उपन्यास में नागरिक का एक संस्करण ऐसा भी है, जो छुपकर सुरंग खोदकर भागता हुआ, एक दिन एक दिन धर्मस्थल में प्रकट हो जाता है। वहां से वह ‘अध्यात्म से मुक्त धर्म’ और ‘पावनता से मुक्त संस्कृति’ का पूजनीय बन जाता है। ज्ञान पूरे उपन्यास में ‘विस्मयों की एक नितान्त अकल्पित दुनिया’ को बखूबी रचते हुए, केऑस का भयभीत कर देने वाला स्थापत्य खड़ा करता है। कुल मिला कर, रोनल्ड रैंग के शब्दों में कहा जाये तो ‘बाज़ार पागलों की निर्मिति का मसीहा है।’ कितनी विडम्बना है कि ‘मनोव्याधि’ की शब्दावलि में ‘पैरानोइया’ तो है, जिसके चलते व्यक्ति में यह भ्रम गहरे तक उसके रिफ्लैक्सेज़ में उतर जाता है, कि कोई उसका पीछा कर रहा है, कोई उसे फॉलो कर रहा है, जबकि बाज़ार जानता है कि पूरा संसार उसका अभीष्ट है और सब उसको फॉलो करें। लेकिन साइकियेट्री में उसके लिये कोई शब्द नहीं है कि कोई ‘मनुष्य को सम्वेदनहीन और विवेकहीन बना रहा है’। 

उपन्यास की समीक्षा के तौर-तरीक़े में अमूमन यह होता है कि उसमें उसके कथानक को बताया जाये लेकिन के ज्ञान के इस उपन्यास में ख़ास तरीक़े से गढ़ा गया कोई मानीखेज़-सा कथानक नहीं है। सिर्फ ‘बाज़ारवाद’ के त्रासद केऑस का ‘भाषा से भाषा में उत्कीर्ण’ एक क़िस्म का ‘हाण्टेड-आर्किटेक्चर’ है, जिसका अदभुत-इण्टीरियर, कथा-कथन के ज़रिये विचक्षण कौशल से, कहें कि ऐसी प्रवीणता के साथ किया है, जो हिन्दी में ज्ञान के अलावा केवल ज्ञान से ही सम्भव हो सकता था। उसमें यह ऐसी दुर्लभ मेधा है, जो उसको निर्विवाद रूप से, विश्व-साहित्य के कुछ बड़े समकालीन लेखकों के समान्तर खड़ा कर देती है। वह बाकायदा, अपनी कृति की अन्तिम अन्विति में अन्ततः ओव्हर-कम करता है। 

प्रश्न यह उठता है कि उपन्यास में उत्कीर्ण, जो भयावह ‘महात्रास’ लेखक ने प्रस्तुत किया है, उसमें सारे जो ‘इज्म’ थे, वे ‘वाज्म’ में बदल गए हैं तथा सारे ‘यूटोपिया’, अब ‘डिसटोपिया’ में। ‘धर्म’ भी अपनी सनातन शुचिता हमेंशा के लिये खो चुका है और :अध्यात्म’ अब शिविरों की शक़्ल में दूकान में बदल गया है। दूसरी तरफ, विचारधारा की मृतदेह को रखकर, चिन्तक महाविलाप मे रुदन की समवेत प्रस्तुतियां दे रहे हैं। तब, क्या अभी भी कहीं कोई उम्मीद शेष है कि एक दिन कोई मसीहा आएगा या कोई दैवीय-अवतार प्रकट होगा और इस महात्रास से मुक्ति के द्वार को खोल देगा..? या माना जाये कि फिर भी दुनिया के भीतर कोई ऐसी अमिट क़िस्म की आस्था जमी हुई है कि ‘पावनयुग’ अर्थात् ‘एक्वेरियन-एज़’ आयेगी...? कहीं ऐसा तो नहीं कि सेम्युअल बैकेट के पात्र, ‘गोदो’ की शैली में, ‘कल के विरुद्ध बिना किसी कल’ के अन्तहीन सी मिथ्या प्रतीक्षा की अन्ध-नियति में ही सारी मनुष्यता विसर्जित हो जाएगी...? 

यहां यह याद करना ज़रूरी है कि बीसवीं सदी के चिन्तकों का दावा था कि इक्कासवीं सदी में ‘पूंजीवादी-सर्वसत्तावाद’ और ‘जनतंत्र’ के मध्य निर्णायक संघर्ष होगा। लेकिन हुआ यह कि जनतंत्र तो चुपचाप, ‘उदारवाद’ का मुखौटा पहने, बाज़ावादी-व्यवस्था का अंगरक्षक नियुक्त हो गया। उसने ‘पूर्वाधुनिकता’ और ‘उत्तराधुनिकता’ के तत्वों के मिश्रण से की ढाल बना ली। तब सोचिये कि कहीं से भी किसी तरह विरोध के उठने की आवाज़ कैसे से आयेगी..? 

ज्ञान चतुर्वेदी ने, उपन्यास के अन्तिम अध्याय में इसके लिए नगर के पुराने घण्टाघर की घड़ी से एक अनहद नाद की तरह प्रतिरोध की ध्वनि का सहारा लेकर ‘काल’ के विकराल होते जाने की एक रौद्र-ध्वनि का अद्भुत प्रतीक रखा है, जो एक अपराजेय ‘आशावाद’ का एक ‘कलात्मक-सत्य’ है। क्योंकि यही दुनिया और यही मनुष्य, दो-दो विश्वयुद्धों, नागासाकी, हिरोशिमा, ऑशवित्ज़ के नर-संहारों कंसंट्रेशन कैम्पों और कई प्राकृतिक-विनाश और आसन्न-आदाओं से बचकर अन्ततः बाहर आया ही है और ये एक युग-सत्य भी है। बहरहाल, ज्ञान भी अपने उपन्यास में, त्रासद-परिवेश से इस तरह ओवर कम करता है कि कोई अतीत का ही एक ‘विचार’, अन्त में फीनिक्स की तरह उठकर आता है। 

बेशक हिन्दी में बाज़ार को लेकर लिखी गई इतने बड़़े ‘आभ्यन्तर’ वाली यह पहली कृति है, जो निर्विवाद रूप से लगभग एक ‘आधुनिक-क्लासिक’ का दर्ज़ा रखती है और इसको बिना किसी संकोच के विश्व-साहित्य की कुछ सर्वाधिक चर्चित कृतियों के समकक्ष रखा जा सकता है। मसलन आर्वेल, जोसेफ हेलर या अल्डुअस हक्सले की फैण्टेसियों के बराबर। कहना चाहूंगा कि उन कृतियों से रत्ती भर भी कम नहीं। लेकिन हिन्दी में अपने संकीर्ण अहम् से सुलगते लोगों के लिये यह थोड़ा मुश्किल हो जायेगा कि वे इस कृति को अपने विगलित दुुराग्रहों से बाहर आकर साहस के साथ सराह सकें। क्योंकि, उन लोगों के घरों की घड़ियां बन्द पड़ी हैं। और चल भी रहीं हैं, तो उसमें तभी से लगातार एक ही समय टिक-टिक कर रहा है, यह वह समय है, जब उसमें उनके किसी प्रीति-भाजन की कोई कृति छपकर आयी थी। बहरहाल, ज्ञान चतुर्वेदी ने इस कृति के ज़रिये अपनी मेधा से प्रमाणित कर दिखाया है कि भारतीय भाषा में भी विश्व-भाषा स्तरीय ‘आधुनिक क्लासिक्स’ लिखे जा सकते हैं। 

अन्त में, कहना चाहूंगा कि ज्ञान चतुर्वेदी अपने लेखन में ‘प्रोलिफिक’ भी हैं और सर्वोत्कृष्ट भी। एक ही लेखक में इन दो गुणों की युति सर्वथा अलभ्य है। उत्कृष्टता के जो गुण, विश्व-स्तरीय साहित्य के लेखन में बरामद होते हैं, वे सभी गुण ज्ञान चतुर्वेदी के लेखन में हैं और वे विपुलता के साथ ही हैं। स्त्राविन्स्की ने कहा था, ‘जैसे ही हमें किसी प्रतिभा में महानता के गुण दिखाई देने लगें, हमें उसे तुरन्त ही महान् घोषित करने में विलम्ब नहीं करना चाहिये।’ लेकिन हिन्दी में तो हम अपने महानों के पीछे-पीछे कन्धों पर कुदाल लिये फिरते हैं। ऐसे में यदि उसे कोई टंगड़ी मार के गिरा दे तो हम तुरन्त वहीं उसे दफना कर अपने इस अभियान में आगे बढ़ जायें। अंग्रेज़ी, अपने गोबर को भी मोतीचूर के मूल्य पर बेचना जानती है। लेकिन, हिन्दी में, अपने ‘उत्कृष्ट’ को ‘उच्छिष्ट’ घोषित करने की, मालवी बोली के एक शब्द इस्तेमाल कर के कहूं में तो ये कि अपनी उसी ‘कोढ़िया-कुचरई’ में ही लगे हैं। बहरहाल, ज्ञान चतुर्वेदी ने अपनी इस बहुत सूझबूझ से लिखे गये उपन्यास के ज़रिये, स्वयम् को उस स्तर की मेधा का रचनाकार साबित कर दिया है, जो एक कालजयी रचना के सर्जक का स्पष्ट दावेदार है।

00000 

-प्रभु जोशी, 
303, गुलमोहर-निकेतन, 
वसन्त-विहार, इन्दौर, म. प्र. 
पिन- 452.010 मोबाइलः 94253 46 356

(कथादेश, जून 2018 से साभार !)






मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

मुक्तिबोध, चन्द्रकान्त देवताले, नईम स्मरण प्रसंग

कल यानी 8 अप्रैल 2018 को मध्य प्रदेश के देवास में प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में मुक्तिबोध, प्रो. नईम और चंद्रकांत देवताले स्मरण प्रसंग में शामिल होने का सुअवसर मिला।

कार्यक्रम दो सत्र में सम्पन्न हुआ। पहला सत्र विमर्श का था। इसमें मुक्तिबोध, चंद्रकांत देवताले और प्रो. नईम की रचनाओं का पाठ हुआ। प्रसिद्ध कवि और अनुवादक उत्पल बनर्जी ने मुक्तिबोध की कालजयी कविता अंधेरे में के एक अंश का यादगार गायन प्रस्तुत किया। चंद्रकांत देवताले की चुनिंदा कविताओं और प्रो. नईम के दो गीतों का पाठ किया कवि बहादुर पटेल एवं मनीष शर्मा ने। मुक्तिबोध की कहानियों पर शशिभूषण, चंद्रकांत देवताले पर राजेश सक्सेना एवं प्रो नईम पर विक्रम सिंह ने अपने विचार अनुभव बांटे। 

दूसरे सत्र में शशिभूषण, नीलोत्पल, राजेश सक्सेना, उत्पल बनर्जी, ब्रजेश कानूनगो एवं नरेंद्र गौड़ ने अपनी दो दो कविताओं का पाठ किया। इस अवसर पर प्रलेसं के संस्थापकों सहित महाविद्रोही राहुल सांकृत्यायन एवं प्रगतिशील धारा के उन सभी लेखकों, कलाकारों एवं संस्कृति कर्मियों को याद किया गया जिन्होंने लेखकों की एकजुटता एवं अपराजेय संघर्षशीलता के लिए अपना सर्वोत्तम दिया। कुछ लेखकों ने अपनी जान तक गँवाई लेकिन न पीछे रहे न समझौते किये।



प्रलेसं की देवास इकाई की ओर से इस कार्यक्रम का संयोजन किया मेहरबान सिंह ने। संचालन किया कहानीकार एवं जलेस से सम्बद्ध मनीष वैद्य ने। कार्यक्रम के अंत में हॉल के बाहर लगाए गए बुक स्टाल पर सबने अपनी पसंद की किताबें एवं पत्रिकाएँ खरीदीं। बड़ी संख्या में उपस्थित लेखकों, सहृदयों, सुधीजनों एवं ईटी का आभार माना युवा कवि अमेयकान्त ने।



कार्यक्रम की समाप्ति के बाद जैसा कि आमतौर पर देवास में होता ही है चित्रकार मुकेश बिजोले, उत्पल बनर्जी, नीलोत्पल, राजेश सक्सेना, बहादुर पटेल, मनीष वैद्य, मेहरबान सिंह के साथ हम जाने माने कथाकार प्रकाशकांत जी के घर पहुँचे। वहां न केवल देवताले जी के संस्मरणों का आत्मीय विनोदपूर्ण दौर चल निकला बल्कि आयोजन की खूबियों, सीमाओं की सुंदर विवेचना भी हुई।

कुल मिलाकर कुछ ज़रूरी सीखों और कुछ नए संकल्पों के साथ अनवरत चलते रहने वाले प्रलेसं के देश व्यापी अनगिन आयोजनो में एक यह आयोजन भी हमारी स्मृति में दर्ज हो गया। घर लौटते हुए मुकेश बिजोले की गाड़ी में चली लगातार गपशप के बीच कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार दुर्गाप्रसाद झाला जी की अनुपस्थिति एवं मुक्तिबोध की पंक्तियाँ भीतर गूँजती रहीं :

'इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए'

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

भारत बंद : मेरा नज़रिया

कल यानी 2 अप्रैल 2018 के भारत बंद के बारे में कुछ बातें :

1. कल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों ने भारत के उच्चतम न्यायालय के एक फ़ैसले जिसमें SC/ST अधिनियम में संशोधन कर दिया गया है के विरोध में अखिल भारतीय बंद का आयोजन किया।

2. इस भारत बंद की तैयारी माननीय उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद ही शुरू हो गयी थी। व्यापक पैमाने पर अधिक से अधिक लोगों को इस बंद में शामिल होने एवं इसे सफल बनाने के लिए न केवल जागरूक किया गया बल्कि उनसे लगातार अपील की गयीं। इसके लिए सोशल मीडिया का जमकर प्रयोग किया गया।

3. दलितों के इस आह्वान के जवाब में यानी बंद को असफल करने के लिए कुछ दूसरे नाम चीन संगठन के लोगों ने भी अभियान चलाया। उन्होंने सोशल मीडिया के इस्तेमाल से लगातार यह अपील की कि कोर्ट का संशोधन उचित है। इस एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है। भारत के सवर्ण समुदाय को संबोधित ऐसे संदेशों में यह कहा गया कि इस बंद का प्रतीकात्मक ही सही विरोध अवश्य करें यानी घरों से निकलें बंद को असफल बनाएं।

4. मेरी जानकारी में यह पहली बार था जब किसी भारत बंद के विरोध में इतनी सक्रियता दिखी। अनुभवी लोग हो सकता है जानते हों कि यह आपसी विरोध भी होता ही है।

5. जिस एक्ट के बारे में भारत बंद आयोजित किया गया उसके बारे में एक बात कॉमन है। भारत के दलित संगठनों का मानना है कि कोर्ट का यह फैसला एक्ट को कमज़ोर करेगा। भारत की मौजूदा सरकार भी इस बात से सहमत है और उसके द्वारा उच्चतम न्यायालय में एक पुनर्विचार याचिका भी दाख़िल की जा चुकी है कि कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार हो। कह सकते हैं कि इस बिंदु पर दलित संगठन और सरकार एकमत हैं या कम से कम एकमत दिखते हैं। लेकिन यहीं यह समझ से परे है कि वे लोग कौन हैं जो सरकार को समर्थन भी देते रहे और इस बंद का विरोध भी करते रहे।

6. कल दिन भर ऐसी खबर आती रहीं कि बड़े पैमाने पर देश भर में तोड़ फोड़, हिंसा, आगजनी होती रही। सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया गया। अलग अलग गुटों ने परस्पर मारपीट की। पुलिस को भी आक्रामक रुख अपनाना पड़ा एवं मिली जुली हिंसा में कई लोगों की जान गयी।

7. एक बात समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि जब एक पक्ष बंद आयोजित करे और दूसरा पक्ष उसको असफल बनाने की सक्रिय कोशिश करे तो पुलिस प्रशासन और अमन पसंद लोगों के लिए हिंसा रोकना असंभव जैसा हो सकता है। ख़ासकर तब और जब सरकार के समर्थक और विरोधी मिले जुले प्रतीत हों। ऐसी स्थिति में जब सरकार ख़ुद कोर्ट के फैसले के विरोध में हो और सरकार के प्रबल समर्थक दलित संगठनों के विरोध में हों तब हिंसा कैसे न हो यह सोचने लायक विश्लेषण भारत में तेज़ी से कम हो रहे हैं। व्यवस्था और लोगों का यह द्वंद्व उपद्रव को ही जन्म दे सकता है खासकर तब और जब भारतीय राष्ट्रवादी मीडिया हाथ सेंकने के लिए ही टीवी की डिजिटल आग लगाता हो।

8. कल के भारत बंद के दौरान सब तरह के लोग तो सक्रिय थे ही आरक्षण विरोधी ताक़तवर संगठित अभियानी लोग विशेष सक्रिय दिखे। इन्होंने लगातार यह बहस चलाये रखी कि आरक्षणवादियों को प्रश्रय नहीं देना चाहिए। आरक्षण खत्म होना चाहिए। आरक्षणवादियों के आंदोलनों की हिंसा देश को खत्म कर देगी। बहुत हो गया अब आरक्षण को कोई जगह न हो। संभव हो आप लोगों में से भी किसी को इन आरक्षण विरोधियों और कथित तटस्थ तथा शास्वत चिंतकों ने दौड़ाया हो। यह भी संभव है कि आप अचरज से भर गए हों कि आंदोलन और बंद एससी- एसटी एक्ट पर आए फैसले को लेकर है मगर ये लोग आरक्षण विरोध का सांस्कृतिक राष्ट्रवादी ढोल लेकर क्यों बैठ गए !

9. भारत बंद के समाचारों के बीच ही अरविंद केजरीवाल के फिर यानी इस बार भारत के वित्तमंत्री अरुण जेटली से माफ़ी मांगने की ख़बर आयी और इराक से भारतीयों के शव वापस आने की खबर भी आयी। अरविंद केजरीवाल पर तो प्रायोजित कार्टून ही दिखा टीवी में मगर बहुत दिनों बाद भारतीय सेना के पूर्व जनरल वीके सिंह टीवी पर बाक़ायदा बोलते हुए दिखे।

10. कल फिर प्रगतिशीलों को बेशुमार गालियां पड़ीं। कवियों को कलंकित किया गया। वक्तव्य जारी करनेवाले लेखक संगठनों के पदाधिकारियों को जातिसूचक अपशब्द सुनने को मिले। कल फिर नौकरीपेशा शांत लोगों को कोंचा गया। कल फिर दिलीप मंडल और रवीश कुमार को अनगिन लोगों ने बुरा भला कहा। कल फिर कुछ लोगों ने अपनी विक्षिप्तता ज़ाहिर करने के साथ ही कई बार स्टेटस लिख लिखकर साफ़ कर दिया कि हम अपनी नासमझी में किसी के सगे नहीं हैं। कल कुछ लोगों ने बंद के समर्थन में खुलकर लिखा। कुछ लोगों ने बंद का विरोध करने के लिए भोलेपन से बताया कि अपनी ट्रेन लेट हुई पड़ी है, घरों में नल नहीं आया, बच्चों को परीक्षा देने जाने में असुविधा हुई और पूरे देश को दलितों की हिंसा से भयानक भय लगता रहा। कल फिर अंजना ओम कश्यप टीवी में अपने चिर परिचित अंदाज़ में नाकामयाब चीखती रहीं। कल फिर उनके चेहरे में सामान्य विवेक खोकर व्यर्थ होते जाने की खीझ दिखी।

कुल मिलाकर कल का बंद कई कोण से ऐतिहासिक रहा। इसकी गूंज बहुत दूर तक जाएगी। हिंसा एवं जान माल के नुकसान का समर्थन किसी भी हाल में नहीं किया जा सकता लेकिन कल के दलितों के देशव्यापी आंदोलन ने यह साबित कर दिया कि भारत का दलित अब टीवी और अखबार यानी मीडिया के सपोर्ट के बिना सुप्रीम कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरने लायक दूरदर्शी और संगठित हो चुका है। यह एक बड़ी सामाजिक चेतना की मुनादी है। आगे देखना केवल यह होगा कि हिंसा चाहे प्रायोजित हो या परिस्थितिजन्य यदि वह आंदोलन में घुसती है तो लक्ष्य कभी हासिल नहीं हो पाते। भविष्य में भारत के दलित यदि हिंसा के बिना ऐसा कोई बड़ा आंदोलन करने की रणनीति बनाकर उसमें सफल होते हैं तो माना यही जाएगा कि भारत को बदलने से कोई रोक नहीं पायेगा। भारत को आज विकास से भी अधिक आवश्यकता संविधान के दायरे में खुद को न्यायोचित ढंग से आमूल बदलने की ही है। संविधान बदलने की चालाक कोशिशों का जवाब अहिंसक आंदोलन ही हो सकते हैं।

-शशिभूषण

बुधवार, 8 नवंबर 2017

अच्छे दिन

उस दिन देश के एक दिन पुराने प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार में भारतीयों द्वारा टैक्स की चोरी करने और विदेशी बैंक में भारी धनराशि जमा करने के काग़ज़ात लीक होने की ख़बर मुख पृष्ठ पर छायी हुई थी। यह दूसरी बार था। 18 महीने पहले भी विदेश में जाली कंपनियों के माध्यम से काला धन बनाने के सनसनीखेज समाचार मीडिया में भरे पड़े थे।

दो साल भी पूरे होते न होते ग़बन की इस अंतर्राष्ट्रीय स्टोरी पर शिक्षक की नज़र गड़ गयी। अपेक्षाकृत पिछड़े राज्य के एक क़स्बे के अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय में संस्कृत पढ़ाकर अपना परिवार पालनेवाले उस शिक्षक को अंग्रेज़ी मुश्किल से आती थी। वह कमज़ोर हो चली आँखें फाड़े, दम साधे समाचार को समझने में लगा था।

विदेश में कालाधन जमा करनेवाले भारतीयों की सूची बड़ी लंबी थी। उस सूची में केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के सबसे अमीर राज्य सभा सांसद, विपक्ष के जाने माने नेता, कई कुख्यात कारोबारी, बड़े कार्पोरेट समूह, और अंग्रेज़ी के दिग्गज पत्रकार के नाम शामिल थे। सदी का महानायक कहा जानेवाला लोकप्रिय सरकारी विज्ञापनकर्ता बूढ़ा हो चला एक फिल्मी कलाकार भी उस निंदनीय सूची का अहम सदस्य था।

शिक्षक सदमा जैसे आश्चर्य में पड़कर सोच में डूब गया- ‘कभी विदेशी आक्रांता, लुटेरे और अंग्रेज़ी सरकार के नुमांइदे भारत का धन लूट-हड़पकर अपने देश ले जाया करते थे। लेकिन अब आज़ाद देश में भारत के ही सबसे जवाबदेह, रसूखदार, सफ़ेदपोश, प्रसिद्ध, ताक़तवर, सत्ता-संस्थानों से जुड़े लोग विभिन्न सरकारों की आँख में धूल झोंककर यथाअवसर देश भक्ति का राग अलापकर देश के ग़रीबों, किसानों, नागरिकों के खून पसीने की कमाई विदेशी बैंकों में जमा कर रहे हैं। भारत में अब ईमानदार क्या कहीं स्वर्ग या दूसरे ग्रह से आयेंगे? किसी देश के अधिकांश लोग ऐसे हो जायें तो क्या बचेगा?’

शिक्षक ने अचरज, भय, अफ़सोस और नफ़रत से भन्ना आया माथा पकड़ लिया। स्टॉफ़रूम के सन्नाटे में घड़ी की किच किच साफ़ सुनाई पड़ रही थी।

‘मे आई कम इन सर...’ आवाज़ कानों में पड़ी। कक्षा 9 की दो लड़कियाँ शिक्षक के सामने खड़ी थीं। शिक्षक ने चौंककर पूछा - ‘क्या है?’ निशा ने सकुचाते हुए हथेली सामने कर दी। विनम्र लड़की की पसीजी गदोरी में दो रुपये का मैला हो चुका एक पुराना सिक्का था- ‘हाँ...शाबाश!...खूब खुश रहो...’ शिक्षक का गला भर आया। लड़कियाँ तेज़ी से लौट पड़ीं। दूसरी ने जाते जाते बताया- ‘सर, यह निशा को गैलरी में मिला।‘ निशा सहेली की बाँह पकड़कर दरवाज़े से बाहर खींच रही थी।

शिक्षक उठकर खड़ा हो गया- ‘बहुत अच्छे...ऐसे ही बने रहना...’ ‘थैंक्यू सर…’लड़कियाँ मुस्कुराती हुई स्टॉफ़रूम से बाहर चली गयीं।

-शशिभूषण

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

ईश्वर के पछताने का प्रकरण...

मेरी उनसे वह अन्तिम मुलाकात, किसी कि़स्म का एक अप्रत्याशित संयोग भर ही कही जा सकती थी, क्योंकि मैं बिना कोई पूर्व जानकारी एकत्र किये कि ‘वे वहाँ, अपने आवास पर हैं भी कि नहीं, सहसा पहुँच गया था। हाँ, उज्जैन, जहाँ वे अपनी बड़ी बेटी कनुप्रिया के साथ, जीवन के उत्तरार्ध के आखि़री वर्ष, गिन-गिन कर काट रहे थे। क्योंकि, उन्हीं ने बताया कि उन्हें एक असाध्य-रोग से लड़ते रहने के लिए, एक निर्धारित अवधि के भीतर, ब्लड-ट्रांस्फ्यूजन करवाना लाजमी हो जाता है। कदाचित् बोन-मेरो की कमी सम्बन्धित कोई रोग था, जो उनको शनैः शनैः, मृत्यु की तरफ़ खींचता हुआ ले जा रहा था। मुझे उनके इस रोग से ‘हड्डियों में ज्वर’ वाली, उनकी पहली कविता पुस्तिका की याद हो आती थी, जिसे अशोक वाजपेयी ने पहले-पहल, एफ. आर. लेविस की ‘स्कू्रटनी’ मैगजीन की तर्ज़ पर निकाली गई, अपनी ‘पहचान‘ श्रृंखला के अंतर्गत छापा था। हालाँकि, उन्हें किसी ऐसे घातक ज्वर ने कभी नहीं पकड़ा था, लेकिन उनकी आत्मा किसी अज्ञात से ज्वर से ग्रस्त हो कर, निरन्तर तपती ही रहती थी। शायद यही वजह रही आयी होगी कि ‘ताप’ शब्द से उनकी एक अज्ञात-सी आसक्ति थी और वह गाहे-ब-गाहे, चुपचाप उनकी कविताओं में ख़ासतौर पर, और बातचीत में आमतौर पर आ ही जाया करता था। यों भी वे अपनी ‘आत्मा के भूखंड’ में लगातार तपते हुए, ही बरामद होते थे। गजानन माधव मुक्तिबोध की चर्चित और लम्बी कविता, ‘अंधेरे में’ का-सा डिलीरियम, उन्हें हमेशा घेरे रहता। हालांकि, वह उनका ही चुना हुआ था। वे उखड़ी हुई नींद के सताये हुए थे। बरसों से। लेकिन, अपनी उन ‘बेनींद’ रातों में, उन्होनें कभी कोई ऐसी ‘उचापत’ कभी नहीं की कि ‘जो किसी तरह सोये हैं’ उनकी नींद हराम हो जाये। वे कहते ही थे- ‘अगर नींद नहीं आ रही है तो थोड़ा झांकों, शब्दों के भीतर। ख़ून की जांच करो।’ यह एक आत्म-परीक्षण पर ज़ोर था। 

उस दिन, उनके सामने बैठते ही मैंने गौर किया कि उनकी काया, पहले से कहीं ज़्यादा ही दुर्बल हो आयी है। उनकी काया की दुर्बलता को देखते हुए, ‘रेत, ज्यों तन रह गया है’, नेह निर्झर बह गया है...’, निराला की यह पंक्ति, उसी तरह का एक अफ़सोस मेरे भीतर भर रही थी। हालाँकि, काया क्षीण थी, लेकिन उनकी बड़ी-बड़ी दीप्त आँखों में, जीवन को जीने की जि़द, उसी तरह झाँकती दिखाई दे रही थी। रूग्णता ने, उनकी आंखों की, उस पुरानी दीप्ति को पूर्णतः छीना तो नहीं था, पर उसे थोड़ा धूमिल ज़रूर कर दिया था। मुझे आया देख कर, जब वे हलके से मुसकराये तो लगा कि बावजूद इस सब के, उनकी वह दीप्ति कौंध उठती है। ठीक ऐसे, जब हवा की हरक़त पर, कभी कभी छुपी हुई चीज़ें दिख जाती हैं। तसदीक़ करती हुई कि वे वहां हैं। मरी या नष्ट नहीं हुई हैं। 

वे विदा हो रहे दिन के आखि़री छोर पर रह जाने वाले, धूप के टुकड़े के गोल दायरे में, घर के पिछवाड़े, दालान में पड़ी रहने वाली कुर्सी पर सिमटे हुए से बैठे थे, सिर पर गन्दुमी रंग की कैप लगाये हुए। कमज़ोर धूप के उस टुकड़े में, वे मुझे कुछ ज़्यादा ही कमज़ोर दिख पड़ रहे थे। मुझे एक हल्के से विस्मय ने घेर लिया- क्योंकि हर बार मुझे ही नहीं, किसी को भी देखते ही ‘तपाक से बोलकर स्वागत करने’ की, उनकी अपनी चिर-परिचित आदत को, जैसे उन्होनें ख़ुद रह कर ही बरज दिया था, और वह उनके पास आते-आते ठिठक कर कुछ दूर ही खड़ी रह गई थी। 

“कैसे हो...?, प्रभु...तुम...?” उन्होनें बहुत धीमी लेकिन अपेक्षया काफी गाढ़ी आवाज़ में, वाक्य को टुकड़े-टुकडे़ में तोड़ते हुए, ऐसे स्वर में कहा, गालिबन वह कोई सवाल नहीं हो बल्कि अपनी ही किसी कविता की कोई प्रश्न-पंक्ति हो, जिसे उन्होंने बहुत निस्पृहता के साथ बोल दिया है। एक ठण्डे स्वगत-कथन की तरह, रूक-रूक कर। कुछ क्षणों तक उन्होनें मुझे बहुत आत्मीयता के साथ देखते रहने के बाद, सहसा ख़ुद को समेट लिया। उनकी वह रुचि, जो मुझको लेकर उनकी आँखों में अभी-अभी झलक रही थी, एकाएक झड़ गई थी और वे बिल्कुल ही, एक निरे अपरिचय के घेरे में बैठे हुए, एक ऐसे अन्य व्यक्ति जान पड़ रहे थे, जिनका मुझसे जैसे कभी कोई निकट का परिचय रहा ही नहीं है। 

वे शायद ब्लड-ट्रान्स्फ्यूजन के बाद अस्पताल से लौटकर, शाम में घर के बाहर आकर बैठे थे। मैं, इन्दौर से चलकर, उज्जैन उनके पास बैठ कर, उनसे कुछ देर, लम्बी गपशप करने के इरादे से आया था। पर, उनकी ऐसी मनोदशा देखते हुए, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि अब उनसे आगे क्या बात की जाये...? क्योंकि, एक अचूक ढंग से हरेक को ‘सम्मोहित कर के रखने वाले अपने बतरस’ से, जैसे उन्होनें अब हाथ झाड़ लिये हैं और अब वैसा बतरस उनके पास कभी लौट नहीं पायेगा। उनकी खुली हुई मुट्ठियाँ उनकी गोद में कुछ इस रखी हुई थीं, जैसे पहले उनमें कुछ दबा हुआ था, जो अब वहाँ नहीं है। फुर्र हो गया है। 

उनके व्यक्तित्व की आरम्भ से ही यह एक अलभ्य विशिष्टता रही आयी थी कि आप उनसे किसी भी तरह की बेतुकी बात करना शुरू करें, वे उसमें न केवल पर्याप्त तुक खोज लेते थे, बल्कि उसको पूरी तरह तुक और तर्क वाली बात बना दिया करते थे। उनका, यह एक बहुत प्रीतिकर कौशल था, जो उन्हें सबके लिए अनौपचारिक और आत्मीय बना देता था। मैं उनसे अमूमन मनो-विनोद के मालवी मुहाविरे में कहा करता था- ‘देवताले जी, आप अड़ंग-बड़ंग में, बायबड़ंग मिला कर, उसे एक नुस्खे में बदल देते हैं। नतीज़तन, एक बहुत साधारण-सी बात, अकारण ही सारगर्भित हो जाने का भ्रम भर देती है।’ वे मेरी इस टिप्पणी पर बच्चों की तरह हंसने लगते। 

इस वक्त, उनके सामने बैठा हुआ मैं, उनसे बतियाने से रुका हुआ, छोटे से अफ़सोस से भर गया था कि यह एक कैसी स्थगित मुलाकात है, जो शुरू होते ही समाप्त हो गई। वे लगभग भाषाच्युत से हो गये थे। एक विचित्र-सी विडम्बना यह थी, जिसे मैं चुपचाप देख रहा था कि एक कवि, जो अपने अल्फाज़ों के अखूट जख़ीरे को आलचाल करने में निरन्तर लगा रहा हो, उसकी मुट्ठी से शब्द छूट कर बिखर गये हैं और अब उसमें, अपने आसपास बिखरे में से, कुछ भी उठाने की, उसकी रुचि ही नहीं रह गई है। वे दाने-दाने हो कर बिखरी भाषा के बीच बैठे, उस बीमार परिन्दे की तरह जान पड़ रहे थे, जो दानों के ढेर पर बैठ कर भी, चुगने की ज़रूरत को खो चुका है। उनकी ऐसी अवस्था, मुझे भीतर ही भीतर बेतरह बैचेनी से भरने लगी। 

बहरहाल, मैंने अपनी अभी तक की, थोड़े बहुत शरीर-विज्ञान की अर्जित जानकारी के सहारे ख़ुद को समझाने की कोशिश की कि निश्चित ही, यह सब उनके रक्त में, सोडियम-पोटेशियम के निर्धारित अनुपात में एक विकट असन्तुलन का डराने वाला परिणाम है। इसीलिए ‘बतरस’ को, अपने कवि की फितरतों और युक्तियों से अतिरिक्त आशय-गर्भित बना डालने वाला, वह दक्ष-शब्दकार, इतना निशब्द हो गया है। कोई कचोट किरच की तरह मेरे अन्तस में चुभकर, एक गाढ़ी लकीर-सी खींचने लगी थी। 

बहरहाल, मैंने उनसे बजाय कोई बात करने के, आहिस्ता से अपना हाथ बढ़ाया और उनके दाहिने घुटने पर रख दिया, जहाँ जीवन की इतनी लम्बी यात्रा की जाने कितनी कथायें छुपी हुई थीं। कालपात्र की तरह, ‘नी-कैप’ के नीचे। और सिर पर लगी धूसर रंग की कैप के नीचे तो उनका वह बहुत उर्वर कल्पना के उद्दाम से भरा मस्तिष्क था। जो इन क्षणों में सर्वथा प्रशान्त था। लगा, महासागर, एक खामोश झील में बदल गया है। एकदम स्थिर। मैं डर गया कि नीत्शे की तरह, वे भी किसी दिन कहीं वेजि़टेटिव तो नहीं हो जायेगें...? संसार में रहते हुए भी, संसार से नितान्त पृथक...और स्वयम् से भी एकदम विलग। अपरिचित। 

“देवताले जी, मेरी आपसे एक शिक़ायत है.....बताइये, आपने इन्दौर को तो एक सौतेले शहर की तरह बिलकुल अनाथ छोड़ दिया- अब आप वहाँ आते ही नहीं हैं...।’ मैंने बात का गुम हुआ सिरा खोज कर बोलना शुरू किया। उम्र के इस पड़ाव पर, अभी तक भी, बड़ी-बड़ी बनी रहने वाली अपनी आँखों को, हल्के से विस्फारित करके, वे मुझे एकटक देखने लगे। मुझे नहीं, जैसे मेरे द्वारा किए गए प्रश्न को, जिसके पीछे पूरा एक शहर था। उनका अपना शहर......जिसकी गलियों में आवारागर्दी करते हुए, उन्होनें काफी कच्ची उम्र में सहसा और सरेआम, एक दिन कविता का हाथ पकड़ लिया था। शायद, उनका यह पहला प्रेम था। नौवीं कक्षा का किशोरवय वाला प्रेम, जब आँखें आंसुओं नहीं, बल्कि स्वप्न-जल से धुली-धुली रहती हैं। 

मैंने अमूमन यही पाया था कि यदि आप उनके सामने इन्दौर की बात छेड़ दें तो, वे इस शहर को ऐसे याद करने लगते थे जैसे कि वे इन्दौर में ही रहकर भी सहसा, किसी और इन्दौर में चले गये हैं और वहाँ से वे ज़ल्दी लौटना नहीं चाहते। मुझे लगता, वे इन्दौर को ऐसे याद करते हैं, जैसे प्राग को कभी काफ्का याद करता होगा, या वॉन गॉग अपने पेरिस को। या विलियम फॉकनर मिसीसिपी को। 

मेरी उनसे अक्सर ही फोन पर बात होती रहती थी। वे उज्जैन से फोन लगा कर, बात करते हुए, बहुत भावुक होकर इन्दौर को याद करने लगते थे, जैसे अब सैंकड़ों मील दूर है, उनसे, उनका प्रिय शहर इन्दौर। वे स्वर्गीय प्रभाष जोशी की ही तरह, याद करते थे, अपने बचपन से रस-रस करती इन्दौर की तमाम जगहों और लोगों को। मसलन, इन्दौर के प्रेमी-युगलों की सैरगाह की तरह ख्यात वह सामन्तयुगीन फूटी-कोठी, बियाबानी, ओल्ड पलासिया, छावनी या वह जूनी इन्दौर, जिसकी किसी संकरी गली में खड़े रह कर, मक़बूल फि़दा हुसैन ने अपनी कच्ची उम्र में, एक लैंडस्केप बनाया था, जो दस रुपयों में बिकने वाली उनकी पहली चित्रकृति का कीर्तिमान बन गया था। देर रात गये तक, रौशनियों के बीच जगमग करने वाला वह सराफा भी, उनकी आंखों के नीचे घूमने लगता, जिसमें मैं प्रीतिश नन्दी को घुमाने ले गया था तो उन्होनें कहा था--‘ओह! आय एम फालिंग इन लव विथ दिस प्लेस...इट्स अ ग्रेट ट्रेज़र ऑफ ओरिजिनल इण्डियन फास्ट फूड’! 

इन्दौर ना आने की मेरी शिकायत को सुनने के बाद, कुछ क्षणों तक आँखों को विस्फारित करके वे मुझे देखते रहे फिर उन्होंने आहिस्ता से अपनी आँखें मूँद लीं। मुझे अंग्रेज़ी की एक कविता की पंक्ति याद हो आई- ‘एज़ द आइलिड क्लोजेस आउटवर्डली, द आई ओपन्स इनवर्डली...’ पता नहीं यहाँ से आँख, मुँदने के बाद, भीतर से वह कहाँ खुल गई होगी...? क्या देख रही होंगी...?, भीतर खुलने के बाद...? पता नहीं जगहों को...? लोगों को...?, या पूरे उस इन्दौर को, जो महानगर होने की होड़ के नीचे कुचल कर, कभी का नष्ट हो चुका है। और उस नष्ट इंदौर को याद करते हुए, वे कवि नहीं रह जाया करते थे, बल्कि, किशोरावस्था के बच्चे में बदल जाते थे। एक बच्चा निकर पहन कर उनके भीतर प्रदक्षिणा करने लगता था। हो सकता है, वहां......अतीत में कोई चन्दू कहके उन्हें ऊँची आवाज़ में शायद पुकार रहा होगा। वे लगभग समाधिस्थ से हो गये थे। मैंने कहा-‘ आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया...।’ 

उन्होंने अपनी आंखें खोल लीं। पर, उनकी वे आंखें, निश्चय ही सन् स़त्रह में नहीं ही थीं बहुत दूर थे, वे। मुझे लगा, वे वहां कुछ खोज या देख नहीं रहे हैं, बल्कि कुछ भूलने की कोशिश में लगे हैं। जैसे कोई पुरानी रेखाएँ हों, जिन पर वे बार-बार रबर फेर रहे हैं। हो सकता है, वे उन्हीं की बचपन की किसी कॉपी में खींची हुई रेखाएँ हों। या आकार हों। वो पहले की तरह किसी मामूली-सी भी बात पर सहसा दहाड़ उठने वाला स्वभाव कहीं बिसरा कर छूट गया था। एक निर्विकार तटस्थता का वास, बन गया था उनका अन्तःकरण। जैसे, शेर की मांद गोशाला में बदल गयी हो। 

‘इन्दौर मेरे लिये अब किसी पुरानी तसवीर की तरह है.....क्या तसवीर में दाखि़ल हुआ जा सकता है..?’ उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा तो लगा, वे इस वक़्त किसी और ही धरातल पर टहल रहे हैं। जहां उनसे जि़रह नहीं की जा सकती। मैंने उनके प्रति-प्रश्न को सुनकर, उनसे सम्वाद की, जो इच्छा मेरे भीतर थी, उसका का हाथ छोड़ दिया और कुर्सी में थोड़ा-सा मैं धंस कर बैठ गया। 

वैसे, यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी कि वे चित्रकारी भी करते थे और वे इतनी सशक्त रेखाएँ खींचनें में कुशल थे कि कला के इस ‘घसड़-फसड़’ वाले युग में, जबकि काग़ज़ और कैनवास पर खींची गई कैसी तो भी रेखाएँ, धंधई कला आलोचकों द्वारा, ‘अद्भुत चित्रकृति’ की तरह प्रचारित हो सकती हैं, ऐसे में वे तो एक ख्यात कवि-चित्रकार हो सकते थे। उनके सम्वाद-नगर वाले घर की बैठक में, उनके द्वारा तैलरंग में बनाई गई, निराला की मुखाकृति फ्रेम की हुई लगी थी, जो मेरे इस कथन की पुष्टि के लिए पर्याप्त है। हालाँकि, वे अपनी इस चित्रकारी के शौक को ‘झक’ कहा करते थे। कभी-कभी अपने कविता कर्म को भी, इसी संज्ञा से पुकार दिया करते थे। मैंने, उन्हें ‘झक्की-कवि’ कहते हुए एक दिन कहा था- “देवताले जी, निराला आपके प्रिय कवि नहीं हैं, पर, ये कैसी ‘झक्क’ है, हिन्दी कवियों में कि निराला को अपने फक्कड़पन की फितरत के चलते, कबीर की तरफ़ जाना चाहिए था, मगर वे तुलसी की तरफ लपक गये। मुक्तिबोध को निराला की तरफ़ जाना चाहिए था- लेकिन वे प्रसाद की कविता के प्रासाद में दाखि़ल हो गए। बताइये कि आपकी दौड़ किस तरफ है....?’ 

‘मुक्तिबोध की तरफ...।’ उन्होनें कहा नहीं, घोषणा की और अपनी घोषणा के असर को मुझमें पढ़ने के लिए मेरे चेहरे की तरफ़ एकटक देखते रहे थे। मैं किसी ‘ब्लिंकिंग ईडियट’ की तरह आँखें मिचमिचाकर उन्हें देखने लगा ताकि वे मेरी आँखों में, अपनी उस घोषणा की असली प्रतिक्रिया को बरामद ही न कर पाये। मैं कई बार ऐसी चतुराइयों का कुशल इस्तेमाल उनके समक्ष इरादतन किया करता था। 

यों देवताले जी मुक्तिबोध की तरफ मुँह करके उस दिशा में चलने लगे थे, लेकिन वे उनके उत्तराधिकारी नहीं थे। वे मुक्तिबोध की तरह मराठी-भाषी भी नहीं थे, लेकिन मराठी कवि और कविताओं से उनका बहुत निकट का सम्पर्क था और, वे मराठी कवियों के बीच, केवल लोकप्रिय भर नहीं थे, बल्कि मराठी कविता को उन्होनें अपनी कविता से ठीक उसी तरह प्रभावित किया था, जैसे कभी धूमिल के काव्य-मुहावरे ने हिन्दी की युवा कविता को। 

दरअस्ल, देवताले जी की ‘आरंभिक कविता’ का अपना कोई ‘पृथक व्यक्तित्व’ नहीं बन पाया था। तब तक राजकमल चौधरी की लम्बी कविता ‘मुक्ति-प्रसंग’ की भाषा और उसके स्थापत्य पर, अपना अघोषित उत्तराधिकार प्राप्त कवि धूमिल का काव्य-मुहावरा, हिन्दी की युवतर कविता पर एक नशे की तरह तारी हो रहा था। एक अप्रत्याशित ढंग से अचानक पहली पंक्ति से ‘दबोच’ लेने या ‘चौंकाने वाली’ इस कविता ने, आस्तीनें चढ़ाने पर उतारू युवा कवियों को लगे हाथ अपनी तरफ़ खींच लिया था। हालाँकि, वे युवा कवि, कोई ‘एंगस विल्सन’ की तरह ‘एंग्री यंग मैन’ नहीं थे, क्योंकि प्रतिरोध की समग्रता की समझ उनमें नहीं थी। केवल सत्ता-विरोध को ही वे कविता का प्राथमिक सरोकार समझ रहे थे। देवताले जी की कविता को थोड़ी-थोड़ी हवा, अकविता की भी लग चुकी थी और ताप, संताप, त्रास-संत्रास तथा ‘देह के अंधेरे’, उनकी कविता को घेरने लगे थे। लेकिन, उनके भीतर की एक आत्म-सजगता ने, उन्हें उस ओर अपने कदम बढ़ाने से यथा समय बरज दिया। 

बहरहाल, मुझे उस दिन उस मुलाकात की उन अवसन्न घडि़यों में पहली बार कवि के अकेलेपन में जीते हुए भी, वे इतने अधिक ‘अकेले’ लग रहे थे, जैसे कि वे अकेले है नहीं, बल्कि, ‘निरबंक अकेले पड़ गये’ हैं और अब उन्होंने उस ‘अकेलेपन’ से पिण्ड छुड़ा-छुड़ाकर भागने के बजाये, उसके साथ रहना सीख लिया है। यद्यपि, एक ‘अकेलापन’ उन्हें अपनी जीवन-सहचरी ने संसार से विदा मांग कर, कुछ समय पहले ही सौंप दिया था। लेकिन, उस ‘अकेलेपन’ को उन्होनें ‘रचनात्मकता’ में बदल कर, उसमें दुख का एक भिन्न ‘अंतर्निवेश’ कर लिया था। कई सारी कविताएं उन्होनें लिखीं, जिसमें हमें स्त्री की एक अलग ही उपस्थिति मिलती है। मैंने तब ही उनसे एक बार पूछा भी था-‘देवताले जी, क्या दाम्पत्य-प्रेम से अलग भी आपके पास कोई प्रेम है...? लेकिन, उसका उन्होनें कोई उत्तर नहीं दिया था। उनकी मुस्कान ही इस प्रश्न का उत्तर था। कुछ प्रश्न, ‘प्रश्नवत मुद्रा’ में ही आते हैं-लेकिन, वे उत्तर नहीं मांगते क्योंकि वे जानते हैं कि उत्तर के मिल जाने का अर्थ उनकी मृत्यु है। इसलिए, उत्तर उनकी तरफ़ पीठ फेर लेते हैं। देवताले जी की वह कोई मुस्कान नहीं थी, उनके उत्तर की पीठ थी। 

यह एक अनिवार्य सच है कि कला, साहित्य, और संगीत में स्त्री की उपस्थिति का आलोक चतुर्दिक है। इसलिए देवताले जी की कविता में भी स्त्री है लेकिन वह ‘कविता से निकाल कर कविता’ में आई स्त्री नहीं है, जो प्रेम से भरी हुआ करती है। नख से शिख तक। भाषा की लाण्ड्री से निकले प्रेम के दिव्य परिधान पहने आती है। उनकी कविता में जीवन के घन-मथन से निबटती हुई स्त्री थी, जो भारतीय मध्यम वर्ग के दाम्पत्य की प्रतिनिधि छवियों को अपना अलंकरण बनाती हुई है। 

अपनी जीवन-संगिनी की मृत्यु के बाद, वे बहुत अकेले हो गए थे। इन्दौर के सम्वाद-नगर में, वे मेरे पड़ोसी ही थे और नतीज़तन, उनके यहाँ मेरा आना-जाना लगा ही रहता था। वे उस घर में ज़्यादातर अकेले ही रहा करते थे। वे सबको अकेले ही दिखाई देते थे। घूमते-फिरते। गली के मोड़ से अंधेरे में मुड़ते हुए। या किसी जगह पर ठिठके हुए। पर, मुझे हमेशा लगा करता था, जैसे उनके साथ कोई है, जिसे अन्य लोगों की आँखें ठीक से देख नहीं पा रही हैं, कि आखि़र वह कौन है, उनके साथ...? 

मैं बेनोविट्ज के ‘नेकेड टेक्स्ट’ की तर्ज़ पर मुक्तिबोध की लम्बी कविता, ‘अंधेरे में’ पर, एक इन्नोवेटिव प्रोग्राम बनाकर आकाशवाणी का ‘नेशनल अवार्ड’ हासिल कर चुका था। उसका, एक नया रूपान्तर करके, उसे बर्लिन महोत्सव में भी भेज कर पुरस्कार भी प्राप्त कर चुका था, अतः कहना यह चाहता हूं कि मैं ‘अंधेरे में’ के उस काव्य-पात्र को, कई-कई तरह से पढ़ चुका था। 

“देवताले जी, मुक्तिबोध की कविता का एक बौखलाया हुआ आदमी, वहाँ से निकल कर, आपके साथ हो लिया है...।’ मैंने एक दफ़ा यह कहा, तो उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी ‘बल्जिंग’ आँखों से सन्देह के साथ देखा। बात को भी और मुझे भी। इस बात की तस्दीक़ के लिए कि मेरे कथन के पीछे कोई उपहास तो नहीं दुबका हुआ है। लेकिन, उन्हें मेरे कथन पर ज़ल्दी ही यक़ीन आ गया। क्योंकि, मैंने लगे हाथ, उनकी सद्य प्रकाशित कविता ‘भूखंड तप रहा है’ का उल्लेख करते हुए, उसे हिन्दी की लम्बी कविताओं के क्रम में, ‘अंधेरे में’ से बिलकुल सटा कर रख दिया था। उन्होनें भीतर से उठते सन्देह और खिन्नता दोनों को वहीं दबा दिया था, जहाँ से वे उठते थे। 

जो लोग उनके निकट रहे हैं, वे जानते थे कि उनकी खिन्नता को खोलकर, उससे खेलने का एक अलभ्य आनन्द है, जिसके उपसंहार में उनकी हंसियाँ छुपी रहती हैं। कभी-कभी, मैं इरादतन और शरारतन भी उन्हें कुरेद दिया करता था- ‘देवताले जी, कुछ लोग आपकी कविता का रिश्ता, शायद वैमनस्यवश ही, साठ के दशक की ‘अकविता’ से जोड़ देते हैं। केवल प्रवृति के स्तर पर। पता नहीं ये कमबख्त, ऐसा क्यों करते हैं...?’ यह बात सुनते ही उनके चेहरे की हर कोशिका से तिक्तता तैरती हुई बाहर आने लगती। फिर, खिन्नता की उनकी धारावाहिक छवियाँ प्रकट होने लगती। अगर, ऐसी बात उनसे, ‘संध्या आचमन’ के समय कर दी जातीं, तब वे यह प्रमाणित कर देते कि उन्होनें अभद्रता पर से अपना ‘स्वामित्व’ खोया नहीं है और वे अपशब्दों में पर्याप्त आत्मनिर्भर हैं। लेकिन, आपने उनसे ऐसे प्रश्न अकेले में कर दियें हों तो फिर वे उस लांछन को पोंछने के लिए हड़बड़ी में भर कर, खुरपी सरीखे तीखे और नोंकदार शब्द लाते और सब कुछ को खुरच-खुरच कर इतना साफ कर देते कि वहाँ ‘अकविता’ का छींटा तक उस पर दिखाई नहीं देता। फिर, अपनी बिगड़ैल और बनैली भाषा को, फल खाने के बाद फेंक दिए जाने वाले छिलके की तरह छोड़ कर, किसी यारबाश की तरह हंसने लगते। 

मुझे याद है, एक दफ़ा मैंने उनकी खिन्नता से खेलने के लिए कहा-‘देवताले जी, मुझे आकाशवाणी पर आपका एक ‘इंटरव्यू’ करना है, उसमें एक सवाल यह भी रहेगा कि मुक्तिबोध तो मराठी-भाषी थे, लेकिन, उन्होनें तुकाराम को हाथ पकड़ कर अपने साथ चलने के लिए कभी नहीं पुकारा। आप तो मराठी-भाषी भी नहीं हैं, फिर आपने सन्त तुकाराम को अपने साथ क्यों कर लिया...? क्या आपको, हिन्दी की पुरानी कविता-परम्परा का कोई कवि नहीं मिला...?’ कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ लोग कबीर-तुलसी को अपने ढंग से अपहृत कर चुके हैं- आप इसीलिए ही कुछ अलग-से कवि को अपने साथ लेना चाहते थे। जबकि, आप जैसे मार्क्सवादी कवि की सन्त तुकाराम से संगति कैसे बैठ गई...? 

बस क्या था, उनके तेवर ऐसे हो गए जैसे मालवी की मीठी-चुक्क मावा-बाटी में किसी ने मिर्ची मिला दी हो। वहाँ सन्त के साहचर्य की स्थित-प्रज्ञता तिरोहित हो गई। वे कुछ ऐसे शब्द भी उठा लाए, जिन्हें उनके अलावा कोई और उठाले तो फफोले पड़ जाएँ। अन्त में, इस सबका विसर्जन इस धमकी पर हुआ कि यदि ‘तुम मेरा इण्टरव्यू करने बैठ गये तो मैं माइक छोड़ कर स्टुडियो से भाग जाऊंगा।’ फिर हंसते हुए कहने लगे- ‘तुम बहुत शातिर हो, प्रभु.....मैं तुमसे डरता हूँ।’ यह डर की बात भी उन्होंने डर-डर के बतायी। डर के अपने अभिनय के साथ। फिर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। 

हक़ीक़तन, मेरे और उनके दरमियान कई खीझ और कई असहमतियाँ थीं, जो बात करते हुए, सभी एक साथ वहाँ एकत्र हो जातीं। लेकिन, खीझ को उन्होंने इतना सिर कभी उठाने नहीं दिया कि वह हमारे सम्बन्ध की मिठास को निगल जाये। खीझ प्रकट होते ही, वे जेब से बटुआ निकालने लगते। फिर ज़र्दा चबाने के बाद थूंकते हुए, गुस्सा थूंकते जान पड़ते। बाद इसके तो सम्वाद की सहजता का सैलाब आकर उन्हें आपादमस्तक डुबो लेता। असल बात तो ये ही थी कि वे बहुत भरे हुए थे, भीतर से। प्रेम से। बस उनके प्रेम का पात्र बन कर उस भरे हुए को, ढंग से उलीचने वाला कोई उन्हें अपने निकट नहीं मिला। मैं पहली बार, जब उनसे मिला था, सत्तर के साल में तो वे मुझे हास्य के पात्र लगे थे। अपनी बातों और पहनावे में। लेकिन ज़ल्द ही वे मेरे प्रेम के पात्र कब बन गए, यह पता ही नहीं चला। हक़ीक़तन, वे शुरू से ही प्रेम के ही पात्र थे, लेकिन तब मेरी ही आँख, उन्हें ठीक से चीन्ह पाने में चूक गई थी। 

यों भी वे युवा कवियों के अधिकतम प्रेम पात्र रहे। हरेक युवा, जो उनसे मिल लेता था, बहुत ही अल्पावधि में, वह यह दावा करने की वैध स्थिति में खुद को पाता था कि वही उनके सर्वाधिक निकट है। बात यह थी कि उनकी अन्तरंगता बहुत ही पनीली और पारदर्शी थी- वे अपने से, थोड़ा भी नैकट्य पैदा कर लेने वाले को, अपना वह सब कुछ खोल-खाल कर, बोलने और बताने की उतावली से भर उठते थे, जिसे चतुर लोग अपनी आत्मा के तलघर में छुपा कर रखते हैं, और उसमें ताला जड़े रखते हैं। वे न तो वैमनस्य छुपा पाते थे, ना ही प्रेम। उनमें उम्र और अहम् की दुतरफा सीढि़यों को तेज़ी से उतर सकने का अभ्यास नहीं, बल्कि एक ऐसी आदत थी, जिसके आगे वे हार जाते थे। वैसे, अपने हमउम्रों की कतार में, वे विष्णु खरे को हमेशा अपना ईमानदार दोस्त मानते थे। जबकि, उनके दूसरे सबसे निकट मित्र, विट्ठल त्रिवेदी थे। 

लेकिन, यथार्थ में, सूक्ष्मता के साथ देखा जाये तो वे किसी के निकट नहीं थे। वे अपने ही निकट थे और अपनी कविता के और अधिक निकट। वे अपनी कविता के नैकट्य में ही जागते-सोते और साँस लेते थे। इसलिए, उनके पास कविता और कविता थी। कविता के अलावा भी कविता ही थी। साहित्येतर ज्ञान को अर्जित करने की उनमें कोई अनियंत्रित-सी पड़ती ललक कभी दिखाई नहीं देती थी। वे अपने अनुभव और संवेदना की रौशनी के मैदान में टहलते रहते थे। उनकी भाषा में, एक अनुपम क्रीड़ा भाव था, लेकिन, उनकी कविता केवल कोई भाषा-क्रीड़ा नहीं थी। तमाम बड़े कवि की तरह उनकी भी कविता का वंश-वृक्ष ‘नैतिक क्षय’ से भी जुड़ता था। एक अतार्किक अतिरंजना को, कविता में अपने काव्य कौशल से, पश्चिम के कवियों की-सी, एक विशिष्ट तराश देने में समर्थ थे। 

कहना न होगा कि रचना में निर्विवाद रूप से, कल्पना ही सत्य की सामग्री जुटाती है और उनके भीतर कल्पना का तो क्षितिज इतना बड़ा था कि उसमें ‘उपस्थित’ अनुपस्थित में बदल जाते थे और ‘अनुपस्थित’ उपस्थित में। यही कांक्रीट और एब्स्ट्रैक्ट का खेल, वे मलार्मे और पाल वेलेरी की तरह, बहुत प्रावीण्य के साथ खेलते थे, लेकिन उसमें अपनी वामपंथी विचारधारा का आश्रय लेकर, वे उस खेल को किसी छापामार युद्ध की दृश्य-भाषा में उलट दिया करते थे। हालांकि, यह बात भी है कि वे ‘विचारधारा’ की चकाचौंध से, कथित प्रतिबध्द कवियों से अलग और बचे हुए थे, क्योंकि वे जानते थे कि उसका असन्तुलित आधिक्य रचना की गरिमा के गौरव को गिरवी रख देना है। अधिक चकाचौंध में ‘डिटेल्स’ दिखना बन्द हो जाते हैं। 

यों तो उन्होनें आलोचना के भय से मुक्त रहने की घोषणाएँ अपनी तरफ़ से बहुतेरी बार कहीं हैं, लेकिन वे खुल्लम-खुल्ला होकर, कभी सामने नहीं आये। यह बात बहुत दिलचस्प है कि हिन्दी की आलोचना की पीठ पर दो तरह लोग कोड़े बरसाते बैठे हुए हैं। वह सवार, या तो संस्कृत का पण्डित है या अंग्रेज़ी का पण्डित। लेकिन, आलोचना की लगाम इन पंण्डितों के बजाये मार्क्सवाद के ठाकुरों ने पकड़ ली थी। देवताले जी की इन तीनों से कभी कोई लम्बी भिड़न्त हुई हो, अपने मित्र विष्णु खरे की तरह, यह मुझे याद नहीं पड़ता। 

“यहाँ उज्जैन में, कहाँ आये हो...? उन्होंने, एक लम्बी चुप्पी के बाद पूछा। 

‘कवि चन्द्रकान्त देवताले के यहाँ।’ मैंने आने की वजह और पता बताया, जो जगह नहीं व्यक्ति का नाम था। मुझे लगा वे अपने नाम को किसी मुकाम की तरह पा रहे हैं। वहाँ हम दोनों ठिठके हुए और आमने-सामने थे। सुमन जी, नरेश मेहता के बाद, देवताले जी का आवास भी, उज्जैन के साहित्यिक जगत के किसी शक्तिपीठ की तरह ही था। मैं उनके घर को साहित्य की ‘हरसिध्दि’ कह देता तो वे घूर कर देखने लगते। 

पर, प्रभु...! तुम्हारा चन्द्रकान्त देवताले तो अन्दर है, उसने खदेड़कर मुझे घर से बाहर कर दिया है। मैं घर-बदर हूँ।’ उन्होनें कहा। पर जैसे उसमें से हास्य निथरा हुआ था और वे किसी के द्वारा बेलिहाज़ होकर, अपने से की गई किसी की बदसलूकी का बखान कर रहे हों। वे हँसे नहीं। होठ स्थिर। और नज़र मेरे चेहरे में पूरी तरह धँसी हुई थी। मैंने परिहास की मंशा से बात को बढ़ाया-‘ देवताले जी, चाय से ज़्यादा केतली गरम होती है। उसमें आपका ‘आत्म’ भरा हुआ है, जो खौलता-खदबदाता है। कोई आलोचक आपके यहां आ जाये तो, उसको कहना ‘मेरा ये पोर्ट्रेट छूकर देखना, ज़रा...देख लेना उसका तो पंजा ही भुन जायेगा...वो जीवन में आपके खिलाफ़ एक शब्द भी लिखने से डरेगा...।’ मुझे लगा कि वे मेरी इस बात पर ज़रूर हंसने लगेंगे। वे हंसे नहीं। मुझे लगा, हंसी को भी उन्होंने किसी, बहुत-बहुत बार इस्तेमाल करने के बाद अनुपयोगी हो चुकी चीज़ की तरह कहीं रख दिया है और भूल गये है। 

बहरहाल, यह हिन्दी की कविता की दुःखदायी विडम्बना ही है कि वह आलोचना के आतंकवाद से काफ़ी हद तक संचालित होती रही। साठ के दशक से ही मार्क्सवादी ‘समझ में अपमिश्रण’, इस हद तक हो गया कि जिस मार्क्स ने खुद प्रेम पर कविताएँ लिखी थीं- हिन्दी कविता में मार्क्सवाद से स्वयम् को नालबध्द मानने वाले रचनाकारों के लिये, ‘प्रेम’ एक उच्छिष्ट की तरह त्याज्य विषय होने लगा था। तब कविता का ‘एण्टी-रोमेण्टिक’ बनाने का मूढ़-आग्रह अपनी शिखरस्थ अवस्था में था। प्रेम कविता लिखने वाले कवि की पीठ पर, वह कोड़े की तरह पड़ने लगता था, क्योंकि प्रेम को, हिन्दी साहित्य में, उसकी एक ‘मेटाफिजिकल ग्रेविटी’ से अपदस्थ करके खारिज़ कर दिया जा चुका था। कहानी में तो ऐसा प्रेम एक धोखादेह कि़स्म की चतुराई की तरह चित्रित हो रहा था। कहना चाहिये कि प्रेम की उपस्थिति, कविता में संदिग्ध हो गई थी। उसकी प्रविष्टि कविता के ‘जेनुइन’ होने की वैधता खो देती थी। जैसे एक प्रेम और क्रान्ति के मध्य कोई पुश्तैनी शत्रुता हो। जबकि, प्रेम तो सदा से ‘अरिहन्ता’ रहा है। बल्कि वह प्रेम ही है, जो अगर ‘विचारधारा’ से जुड़ने जाने के बाद, उसे वह क्रान्ति तक पहुंचा देता है। यह विचार, एक तरह से, मार्क्सवाद को एक ‘एडवेंचरिज़्म’ से जोड़ने वाली ‘सीमित-समझ की बुद्धि का डबरा’ था, जिसमें कई डूब मरे। जबकि ‘दुनिया ऐसी है और उसे ऐसी होना चाहिए’, एक महास्वप्न सरीखे , प्रेम का ही पर्याय है। तब चे ग्वेवारा और टी, जिसका असली नाम तमारा बंक था, के प्रेम की चर्चा को भी सी.आई.ए. का षडयंत्रवादी प्रचार कह दिया गया था। 

यहाँ यह कहना जरूरी है कि देवताले जी, भी प्रेम के उस कॉस्मिक रूप को निर्भीकता के साथ कविता में आने से, सुविचारित ढंग से रोकते रहे। जबकि, वे प्रेम से नख-शिख तक भरे हुए व्यक्ति थे। मैं यह भी कह सकने की स्थिति में हूं कि वे अपनी माँ को इतना प्रेम करते थे, सॉंमरसेट माम की तरह, कि जब एक बार मैंने उनसे माँ के बारे में पूछा, तो लगा कि वे बिल्कुल बच्चे हो गये हैं। एकदम निश्चछल और अबोध। जैसे अभी तो उनके दूध के दांत ही नहीं गिरे हैं। अब उन्हें न मुक्तिबोध का नाम याद है और ना ही नामवर सिंह का, ना ही अशोक वाजपेयी का ना दिलीप चित्रे या तुकाराम का। शिशुओं की-सी निष्कलंक मुस्कान ने, उनके पूरे चेहरे को अपने में ढँक लिया था। वे सच ही स्वीकारते थे कि मैं माँ को लेकर एक मुकम्मल कविता नहीं लिख सकता। माँ के प्रेम में होना, भाषा से बाहर निकल कर खड़ा होना है। उन्हें भाषा का आयतन छोटा जान पड़ता है, माँ के समक्ष। जैसे मां के समक्ष सर्वस्व ही विसर्जित हो गया है। क्या यह नहीं कह सकते हम कि जहाँ भाषा अपनी अनुलंघ्यता को, एक ईमानदार पश्चाताप की तरह स्वीकार कर ठिठक जाती है, बस ‘प्रेम’ वहीं से शुरू होता है। भाषा से बाहर रह जाना नहीं, भाषा से बाहर हो जाना है, प्रेम। और हरेक व्यक्ति का प्रेम, माँ से ही शुरू होता है। रिल्के, जो संसार के प्रेमियों की कतार में बहुत विशिष्ट स्थान पर खड़ा है, उसका कहना था कि जो माँ को प्रेम नहीं कर सकता, उसमें प्रेमी हो जाने की शून्य पात्रता है। 

माँ के बारे में एक दिन उन्हो़ंने कई बातें बोली-बतायी थी। शायद, उस दिन मां की मृत्यु तिथि आसपास रही होगी। वे बोलते हुए किसी सीपिया रंग में बनाये गये मेरे पोर्ट्रेट में बदलने लगते थे। वहाँ स्मृतियों का धारासार बहने लगता था, जो सैलाब बन कर उनको डुबोये दे रहा था। ऐसा नहीं है कि उन्होनें प्रेम कविताएँ लिखी ही नहीं। छुट-पुट लिखीं, लेकिन वे घरेलू भूगोल में भटकती-खटती रहने वाली ‘मध्य वर्ग के वलय’ में अपने छोटे-छोटे सुखों और दुखों की प्रदक्षिणा करती स्त्रियाँ हैं, जिसमें माँ है, पत्नी है, बेटियाँ हैं, कोई अकेली विवाहिता या फिर बालम ककडि़याँ बेचती हुई, या वह सनातन स्त्री है, जो आकाश और पृथ्वी के बीच सदियों से कपड़े पछीट रही है, या मनों आटा गूँथ रही है। बिना शिकायत किये, वह जीवन को, उसके दैनंदिन में स्वीकार रही है। लेकिन, उनके यहाँ ‘कॉस्मिक बिलव्ड’ नहीं है, जैसा कि पश्चिम की प्रेम कविताओं में मिलती हैं, जैसे वेलेरी, मलार्मे, या नेरुदा की कविताओं में है। मैं यहां अशोक वाजपेयी की निर्भीकता को सराहना की दृष्टि से देखता हूं कि उन्होंने अपनी वय के चौथेपन में खूब सारी प्रेम कवितायें लिखीं। 

देवताले जी की एक कविता में असंभव आकाश में वह आज़ाद चिडि़या की तरह खेलती हुई बरामद होती है, जिसके लिये वे चंद्रमा को गिटार की तरह बजाते हुए उजली रातों में आने का कहते हैं। और उसके लिये वसन्त को रुई की तरह धुनकते रहने का संकल्प भी बताते हैं। 

जब उन्होनें कहा कि उन्हें खदेड़कर घर से बाहर कर दिया गया है। वे घर-बदर हो गए हैं, तो मुझे पोर्ट्रेट भेंट करने के कोई पन्द्रह दिन बाद की एक टेलिफोनिक बातचीत याद आ गयी। उनकी उस दिन, फोन पर परिहास के अभीष्ट से कही गई बातें अचानक बहुत संजीदगी से भरी हुई लगने लगीं। उन बातों को सुन कर लगने लगा था, गालिबन, इस समय वे अपने ही ‘आत्म’ की प्रदक्षिणा में हैं। क्योंकि, इस समूचे संसार को उसकी बहुत गहरी ऐन्द्रिकता के साथ जीने की अतृप्त कामना से भरे एक कवि को इस संसार के छूट जाने की मर्मान्तक पीड़ा कहीं ना कहीं घेरती तो होगी ही...क्योंकि बीसवीं सदी में जन्मे एक कवि और एक सन्त का संसार से रिश्ता बहुत अलग होता है। यह सब उनका उनका घनमथन ही कहा जाना चाहिये। एक पर्सनल ब्रूडिंग। हालांकि, मुझे तो उनकी सारी कविता का ढाँचा ही ब्रूडिंग का लगता है। जैसे एक-एक शब्द और उसके समूचे इतिहास से संघर्षरत है, यह कवि। उनकी, अपनी कविता और जीवन दोनों में ही ईश्वर, मृत्यु, और सत्ता से एक असमाप्त लड़ाई चलती रही। उन्होंने मृत्यु को ‘दार्शनिकता’ या ‘आध्यात्मिकता’ से नाथ कर देखने के बजाय, मनुष्य के ‘होने’ के द्वंद के रूप में देखा। क्योंकि जिस आग को हर बताई गई जगह वे देखते हैं, उसी आग से वे पैदा हुए हैं और वही उनको एक दिन खा भी जाने वाली है, इस सत्य की प्रतीति उन्हें बखूबी थी। वे नियति से अच्छी तरह वाकि़फ थे । वे मृत्यु के विरुद्ध जीवन को अधिक से अधिक प्रेम करने के लिए आकुलता से उफनते जान पड़ते हैं। लेकिन जीवन भी सचमुच ही क्रूर है, क्योंकि, वह अन्त में उसी को खत्म करने में जुटा रहा, जिसको वह बेहद प्यार करता रहा। हमें ख़त्म करने के बाद ही तसल्ली पाता है। 

एक बार जब मैंने उनसे कहा कि मैं आपकी कविता को ‘स्ट्रक्चरल-ग्रामर’ के सहारे विखण्डित करना चाहता हूँ, तो वे तपाक से बोले थे- ‘प्रभु...! तुम इसके बजाय अगर मेरा कभी एक पोर्ट्रेट बना दो, तो वह मुझे ज़्यादा खुश करेगा’। और मैंने उनके इस प्रस्ताव का सम्मान करते हुए, तैलरंगों में उनका एक पोर्ट्रेट बनाया और कवि मित्र प्रदीप मिश्र, प्रदीप कान्त, और देवेंद्र रिणवा के साथ उज्जैन, उनके आवास पर जाकर ‘जनवादी लेखक संघ इंदौर’ की इकाई की तरफ़ से भेंट किया। वे काफी भावुक हो उठे। अगर भाभी जिंदा होती तो मैं वह पोर्ट्रेट निश्चय ही उनको ही भेंट करता और विनोद में कहता- “भाभी, एक देवताले पर, एक देवताले मुफ्त”। लेकिन यह परिहास की घड़ी नहीं थी, क्योंकि देवताले जी हल्के से उदास भी हो आये थे। पता नहीं उन्होनें क्या सोचा होगा, जिसने उनके चेहरे पर एक अव्यक्त और अछोर-सा कोई ऐसा भाव भर दिया था कि जैसे पीड़ा की पटकथा का कोई पृष्ठ उनके समक्ष रख दिया गया हो और वे चुपचाप उसके आगे के पृष्ठों को पलटने में लग गये हैं। 

मैंने उनके चेहरे के अवसाद को पोंछ फेंकने के लिए कहा-“यह प्रभु जोशी का देवताले है, जो अब आपके घर में रह कर, आपके ‘दैनंदिन’ पर निगरानी रख कर मुझे रिपोर्ट करेगा। फिर,‘अंधेरे में’ कविता की पंक्ति उठा कर उल्लेख किया था कि मैंने उसे कह दिया है- “क्रॉस एक्ज़ामिन हिम थॉरोली”! उस रात हम सब लोग, इन्दौर की तरफ लौटते हुए, पूरे रास्ते उनके कमज़ोर होते जाने की चिंता करते रहे थे। 

लगभग, पन्द्रह दिन बाद, उन्होनें मुझे फोन किया। एक नकली स्वराभिनय से खुद को छुपाते हुए बोले- “कौन प्रभु जोशी जी बोल रहे हैं...? जोशी जी, सुनिए मुझे आपसे एक बहुत ही ज़रूरी बात करना है। मैं आपको सारी सच्चाई बताना चाहता हूँ, सुनकर आपको ज़रूर बड़ा धक्का लगेगा। असल में, चन्द्रकान्त देवताले कवि का मुखौटा लगाये हुए घूमता है, लेकिन वह बहुत दोगला मनुष्य है, न वह एक अच्छा पिता है, न एक अच्छा पति। और वह दोस्त तो किसी का भी नहीं है। वह एक घटिया अवसरवादी और मिथ्या-मार्क्सवादी है। उसने कविता के नाम पर आधी शताब्दी से, एक बहुत बड़ा छल किया है। क्योंकि, वे कविताएँ उसने इस संसार से ही चुराई और अपने नाम से छपवा लीं- उन कविताओं को जलती होली में डाल दिया जाना चाहिए। वह अहंकारी और दग़ाबाज़ है। चाहो तो आप उसकी एफ.आई.आर. लिखवा दो। जल्दी करो, वर्ना वो किसी दिन, या किसी रात, चकमा देकर यहाँ से चुपचाप फरार हो जाएगा”। 

मैं उनको आवाज़ से पहचान चुका था। फोन के इस छोर पर, मैंने ज़ोर का ठहाका लगाया और कहा- “मैं पहचान गया हूँ...देवताले जी। अब बन्द कर दीजिये एक्टिंग, मैंने रेडियो में बीस साल काम किया है। आवाज़ के किसी झीने पर्दे के पीछे, आप पांच फीट सात इंच के आदमी को छुपा नहीं सकते।’ 

“नहीं जोशी जी, आप पहचान नहीं पाये। मैं तो चन्द्रकान्त देवताले को ‘क्रॉस एक्ज़ामिन’ करके आपको रिपोर्ट दे रहा हूँ- मैं प्रभु जोशी का ‘क्रिएटेड’ चन्द्रकान्त देवताले हूँ...जिन्होंने मुझे ये असाइन्मेण्ट दिया था कि इस देवताले की गुप्त रिपोर्ट मुझे भेजना...।’ 

मैंने इस बात पर फिर ज़ोर से ठहाका लगाया। लेकिन, फोन के उस छोर पर, कहीं कोई हंसी नहीं थी। एक सन्नाटा था, जो कुछ क्षण चुपचाप गुज़रता चला गया। फिर कण्ठ से, एक थकी और खुरदुरी-सी कफ़ में फंसी आवाज़ आई। 

“प्रभु, तुम ठीक कहते हो, यह तो मेरे घर में जम गया है। अब इसने यहां पूरी तरह कब्ज़ा जमा लिया है। और अब मैं डर रहा हूं कि एक दिन ये मुझे खदेड़ कर, इस घर से बाहर कर देगा- मैं तो चला जाऊंगा, यह मेरे घर में हमेशा डटा रहेगा। सबको मेरी याद दिलाता हुआ। क्योंकि ये इतना जीवन्त लगता है कि मेरी अन्तिम सांस जब निकलने लगेगी तो, उसे ये अपने भीतर खींच लेगा...। 

फिर फोन अचानक ही, बात पूरी किये जाने के पहले ही बीच में कट गया। मैंने अपनी तरफ से फिर से डॉयल किया तो उधर से, केवल ‘एंगेज्ड टोन’ सुनाई देने लगी। उनकी अब पता नहीं किससे बात शुरू हो गई थी..., मुक्तिबोध से या कि तुकाराम से...?, या कि मृत्यु से ही...? फिर, पता चला कि उन्होनें अपना ताज़ा कविता संकलन तैयार किया है, उसका नाम ही यही रखा है--‘खुद पर निगरानी का वक्त’। क्या वे चाकू सवालों को हाथ में लिये, जीवन के आखि़री हिस्से को, केक की तरह काट-काट कर देख रहे थे...? इन्दौर में रहते हुए, वे या तो उज्जैन जाते थे या फिर दिल्ली। मैंने उनको एक बार कहा था-‘ मुक्तिबोध के भीतर एक द्वन्द्व था-‘ मैं उज्जैन जाऊं कि दिल्ली..? उनके लिये ये दोनों शहर, शहर नहीं, मेटाफर थे। धर्म और राजनीति के प्रतीक। परन्तु आपके लिये ये दोनों शहर, आपके ममत्व और प्रेम के दो ध्रुवान्त हैं।’ दरअसल, उनकी बड़़ी बेटी कनुप्रिया उज्जैन में थी और छोटी बेटी अनुप्रिया दिल्ली में। इनके बीच ही उनके प्रेम का अन्तरिक्ष था। 

कल, जब मैं उनके उठावने में शामिल होने के लिए उज्जैन गया तो मैंने देखा कि वहाँ उनके चित्र की जगह मेरा बनाया हुआ वही पोर्ट्रेट ही रखा था और उस पर ढेरों फूल मालाएँ चढ़ी हुई थीं। फूलों की जैसे कोई एक कंटीली बाड़ थी, जिसके पीछे ख़ामोश आँखों में देवताले जी उतर आये थे। बे-आवाज़ ढंग से सांस लेते हुए। क्या आखिरी सांस, जो उन्होंने छोड़ी, वह इसी में आकर समा गयी है...? तभी मुझे लगा, जैसे वे कह रहे हों--‘ प्रभु...! मैं मरा नहीं, हमेशा के लिए तुम्हारी रंग रेखाओं से बने, इस चन्द्रकान्त में छुपा हुआ हूँ। पहले शब्द की आड़ में छुपा रहता था, अब रंग की आड़ में...मुझे आन्द्रे ब्रेतॉं की कविता की एक पंक्ति याद हो आयी--‘ सुनो, जब भी फूलों के रंग कहीं दिखे मुझे याद कर लेना...।’ एक पछतावा-सा घिर आया। वे अभी कुछ वर्ष और रह लेते, हमारे और अपनी दोनों बेटियों के साथ। लगता है, यह हमारे ही नहीं, ईश्वर के भी पछताने का प्रकरण है। 

मेरा मन हुआ, उनकी बेटी कनुप्रिया को कहूँ, देवताले जी के इस पोर्ट्रेट की बगल में घर की बैठक में, निराला का वो पोर्ट्रेट लगा देना, जो देवताले जी ने बनाया था और यह समझना कि तुम्हारे कुनबे के दो दिवंगत तुम्हारी बैठक में बैठे हैं और जब तुम सो जाओगी और बैठक में अंधेरा हो जायेगा, तब देवताले जी, निराला से अंधेरे में, ‘वे सारी बात करेंगें, जो जीवन भर, उनकी संवेदना और समय को घेरे हुए रहीं और अभी कहना शेष थीं। 


प्रभु जोशी, 


303, गुलमोहर-निकेतन, वसन्त-विहार, इन्दौर, म.प्र.

दूरभाष 0731-2551719 मोबाइल- 94253-46356 







रविवार, 8 अक्तूबर 2017

लेखन के साथ जीवन में भी ज़रूरी है जनपक्षधरता

कविता कार्यशाला,1-2 अक्टूबर 17, प्रलेस-इप्टा अशोकनगर

प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) एवं भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की मध्य प्रदेश में सर्वाधिक सक्रिय इकाइयों में से एक अशोकनगर इकाई ने संयुक्त रूप से विगत 1-2 अक्टूबर को मुक्तिबोध की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दो दिनी कविता कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला में अनेक वरिष्ठ एवं प्रसिद्ध साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों के साथ दर्जनभर से अधिक युवा कवियों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला नितांत अनौपचारिक, आत्मीय माहौल में साहित्यिक-वैचारिक अनुशासन के साथ संपन्न हुई। दो दिन चलनेवाली इस कार्यशाला की रूपरेखा इस प्रकार तैयार की गयी थी कि नये पुराने कवियों-लेखकों-संस्कृतिकर्मियों का न केवल परस्पर परिचय हो, घुलना-मिलना हो बल्कि उनके बीच नि:संकोच वैचारिक आदान-प्रदान एवं संवाद स्थापित हो ताकि नये कवियों की अपने समय की राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ समकालीन रचनात्मक-कलात्मक-साहित्यिक बारीकियों से भी अंतरंगता विकसित हो सके। 

ऐसे समय में जब संवादहीनता, तटस्थता, गैर जवाबदेह स्वायत्तता एवं आत्मकेन्द्रित वैयक्तिकता से निर्मित विचारहीन, अप्रतिबद्ध रचनात्मकता चरम पर है और उसे इसी रूप में व्यवस्था के हित में प्रोत्साहित भी किया जा रहा है ऐसी कार्यशालाओं का महत्व बढ़ जाता है। इस कार्यशाला के दो दिन बड़े सुनियोजित, संबद्ध एवं व्यस्त रहे। भोजनावकाश के अतिरिक्त दोनो दिन देर रात तक सवाल-जवाब एवं बहसों तथा असहमतियों से लबरेज़ रहे। प्रलेस और इप्टा के आयोजनों की यही खासियत उन्हें रचनात्मक एवं ऊर्जावान बनाती है कि यहाँ महमामंडन नहीं होता, श्रद्धाभाव से तर्कों या प्रस्तुतियों को हृदयंगम नहीं किया जाता बल्कि बड़े से बड़े और वरिष्ठ साथी को भी तीखे सवालों एवं कभी-कभी खारिज कर देनावाली कठोर असहमतियों का सामना करना पड़ता है। इन आयोजनों में नये और पुराने लोग बराबर सीखते हैं और ताप एवं तनाव से बराबर गुज़रते हैं।

इस दो दिन की कार्यशाला में कुल 8 सत्र संपन्न हुए। पंकज दीक्षित की कविता पोस्टर प्रदर्शनी लगायी गयी। जनगीत हुए तथा कविताओं (कबीर, पाश एवं उदय प्रकाश) के गायन की प्रस्तुतियों ने कार्यशाला को जीवंत और सोद्देश्य बनाया। किताबों एवं पत्रिकाओं तथा पुस्तिकाओं के स्टॉल भी पाठकों-लेखकों की गहमा गहमी के केन्द्र रहे। इस स्टॉल के प्रमुख आकर्षण रहे- खोजी पत्रकार राना अयूब की बेस्ट सेलर किताब ‘गुजरात फाइल्स’ का हिंदी संस्करण और उदभावना के अंक। नये पुराने कवियों में पंकज चतुर्वेदी, विनीत तिवारी, बसंत त्रिपाठी, समीक्षा, शिल्पी, कविता जड़िया, मानस भारद्वाज, मयंक जैन, अभिषेक अंशु, अरबाज़, शशिभूषण आदि ने काव्य पाठ किये। वैचारिक सत्रों में प्रमुख रहे- ‘मुक्तिबोध का काव्य विवेक और आज का समय’, ‘मुक्तिबोध की रचना प्रक्रिया और उनका आलोचनात्मक संघर्ष’, ‘कविता की पक्षधरता’, ‘इक्कीसवीं सदी की कविता का वैचारिक स्वप्न’ और ‘जनपक्षधर कविता की पहचान और ज़रूरत’। इन सत्रों में क्रमश: पंकज चतुर्वेदी, बसंत त्रिपाठी, विनीत तिवारी और निरंजन श्रोत्रिय ने विचारोत्तेजक एवं बहस तलब आधार वक्तव्य दिये। वक्ताओं में प्रमुख रहे- सत्येंद्र रघुवंशी, डॉ. अर्चना, सुरेंद्र रघुवंशी, पवित्र सलाल पुरिया, कथाकार आशुतोष, शशिभूषण, सत्यभामा और समीक्षा। सवाल एवं संवाद तथा हस्तक्षेप के अंतर्गत न केवल सवाल, जवाब हस्तक्षेप हुए बल्कि अनेक मुद्दों पर गंभीर विमर्श हुए। वक्तव्य से लेकर काव्य पाठ तक सबमें सवाल, असहमति की अन्त: धारा व्याप्त रही।

कविता कार्यशाला के पहले दिन तीन सत्र सम्पन्न हुए। पहले सत्र का विषय था 'मुक्तिबोध का काव्य विवेक और आज का समय।' दूसरे सत्र का विषय था 'मुक्तिबोध की रचना प्रक्रिया और उनका आलोचनात्मक संघर्ष।' आखिरी सत्र में युवा कवियों ने कविता पाठ किये। शुरुआत पंकज दीक्षित द्वारा बनाये कविता पोस्टर की प्रदर्शनी के उदघाटन से हुई। प्रदर्शनी का उद्घाटन कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी, वरिष्ठ साहित्यकार निरंजन श्रोत्रिय एवं चित्रकार मुकेश बिजोले ने किया। इस अवसर पर इप्टा अशोक नगर की सीमा राजोरिया एवं कलाकारों ने जनगीत प्रस्तुत किये।

'मुक्तिबोध का काव्य विवेक और आज का समय।' विषय पर अपने प्रभावी एवं मार्मिक आलोचनात्मक आधार वक्तव्य में चर्चित कवि एवं आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने कहा -शमशेर ने मुक्तिबोध की सबसे प्रामाणिक किंतु संक्षिप्त आलोचना की। मुक्तिबोध ने हिंदी कविता को पूरी तरह बदल दिया। वे सरल कवि हैं। लेकिन उनका सरलीकरण नहीं किया जा सकता। उनका जीवन और साहित्य विवेक एक ही थे। उनमें किसी स्तर पर द्वैत या फांक नहीं थी। उनमें दुचित्तापन नहीं था। निरंतर द्वंद्वात्मकता और गहन आत्माभियोग या आत्मालोचन उनकी खासियत थे। मुक्तिबोध ने अंधेरे के काले समुद्र का प्रतिकार अपनी बेचैनी एवं रचनात्मक अर्थवत्ता से किया। मुक्तिबोध ने फ़ासीवाद के आगमन की आहट नेहरू की मृत्य के समय ही देख ली थी। उनमें नैतिक बोध बहुत गहरा था।

इस सत्र में हस्तक्षेप करते हुए सत्येंद्र रघुवंशी, सुरेंद्र रघुवंशी और डॉ अर्चना ने अपने विचार व्यक्त किये। सत्येंद्र रघुवंशी ने कहा- जीवन विवेक ही साहित्य विवेक है यह मुक्तिबोध अपनी सृजनात्मकता से साबित करते हैं। डॉ अर्चना ने कहा कि मुक्तिबोध बहुत सचेत एवं सजग कवि हैं। वे हमें प्रेरित करते हैं कि हम अपनी नैतिकता को उच्च स्तर पर ले जाएं। तभी मुक्तिबोध को आत्मसात किया जा सकता है। इसी सत्र में हस्तक्षेप करते हुए चर्चित कवि बसंत त्रिपाठी ने मुक्तिबोध के जीवन एवं सृजन से संबंधित कुछ अनसुने प्रसंग सुनाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुक्तिबोध की किताब पर प्रतिबंध केवल पाठ्यक्रम में न लेने के संबंध में लगाया गया था। उन्होंने अपने उपन्यास विपात्र में अपने महाविद्यालय के जिन प्रबंधक को मुख्य पात्र बनाया था उन्हीं को अपनी किताब भी समर्पित की। यह उनके जीवन की स्पष्टता थी कि आलोचना और आत्मीयता का स्थान अलग अलग है। इस स्तर पर उनमें संशय नहीं था।

इस अवसर पर श्रोताओं ने अपने सवाल भी रखे। युवा कवि अरबाज़ के सवाल के जवाब में पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि मुक्तिबोध ने अपने डर पर विजय प्राप्त कर, चुनौतियों का सामना करते हुए ख़ुद्दार, प्रतिबद्ध साहित्यिक क़द हासिल किया। हमें भी वैसी नैतिकता एवं ईमानदारी को अपनाना चाहिए। दूसरे सत्र के वक्ताओं में प्रमुख रहे - पवित्र सलालपुरिया, सत्यभामा और कहानीकार आशुतोष। इस सत्र में आधार वक्तव्य दिया बसंत त्रिपाठी ने। दोनों सत्रों का संचालन कवि एवं रंगकर्मी हरिओम राजोरिया ने किया। 

दूसरे सत्र का विषय था-'मुक्तिबोध की रचना प्रक्रिया और उनका आलोचनात्मक संघर्ष।' इस विषय पर चर्चित कवि बसंत त्रिपाठी ने आधार वक्तव्य दिया। बसंत त्रिपाठी ने मुक्तिबोध की कृति ‘एक साहित्यिक की डायरी’ और ‘कामायनी एक पुनर्विचार’ के हवाले से विस्तार से ‘फैंटेसी’ रचना प्रक्रिया एवं उनके आलोचनात्मक संघर्षों पर प्रकाश डाला। इस सत्र में कथाकार आशुतोष ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि संवेदना मुख्य है। सृजन का संबंध इसी से है। आलोचक की लेखकों से निकटता हमेशा रचनात्मक नहीं होती। आलोचना के लिए रचनाकार से ऑब्जेक्टिव दूरी बड़े काम की होती है। लेखकों से निकटता उनकी आलोचना में बाधक भी होती है। इसी दूरी के चलते राम विलास शर्मा अपने समकालीनों में से एक मुक्तिबोध के स्थान पर निराला एवं प्रेमचंद पर बड़ी आलोचना कृतियाँ रच पाये। जेएनयू की छात्रा सत्यभामा ने कहा कि मुक्तिबोध हमेशा नये ढाँचे की खोज में रहे। उन्हें लोगों की उदासीनता बहुत परेशान करती थी। हमारी लिए बड़ी चुनौती यह है कि हम पुरानी चीज़ों को तो खत्म करते आये लेकिन उन्हें नयी चीज़ों से रिप्लेस नहीं कर पाये। 

तीसरे सत्र के विषय ‘कविता की पक्षधरता’ पर कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने यादगार एवं विस्तृत आधार वक्तव्य दिया। स्पष्टता, वैचारिकता, जनपक्षधरता एवं परिवर्तनकारी रचनात्मक कार्यवाई का आह्वान उनके वक्तव्य की रीढ़ रहे। उन्होंने मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष, द्वंद्व एवं सामाजिक संघर्षों का यथार्थपरक खाका प्रस्तुत किया। विनीत तिवारी ने भूतपूर्व विद्रोही का बयान सहित मुक्तिबोध की दो कविताओं का प्रभावी पाठ किया। उन्होने जोर देकर कहा कि हम असफल इसलिए हैं क्योंकि आधे अधूरे मन से थोड़े विद्रोही हैं। अधिकांश श्रोताओं ने महसूस किया इस वक्तव्य को समग्र रूप में पढ़े-सुने जाने की आवश्यकता रहेगी। यदि वक्तव्य की पुस्तिका भी प्रकाशित हो तो मुक्तिबोध को समझने के लिए महत्वपूर्ण द्वार खुलेगा। वक्तव्य में अकादमिक गुंजलकों से मुक्त एक जनशिक्षक के नज़रिए से दर्ज बयान सर्वाधिक काम के हैं। 

कविता कार्यशाला के दूसरे दिन की शुरुआत भी इप्टा अशोक नगर के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत जनगीत से हुई। इस अवसर पर जेएनयू की छात्रा समीक्षा ने अपनी मधुर आवाज में 'हिरना समझ बुझि बन चरना।' का शास्त्रीय गायन पेश का सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यशाला के दूसरे दिन पहले सत्र का विषय था 'इक्कीसवीं सदी की कविता का वैचारिक स्वप्न।' दूसरे सत्र का विषय था 'जन पक्षधर कविता की पहचान और ज़रूरत।' कार्यशाला के अंतिम सत्र में विनीत तिवारी, सुरेंद्र रघुवंशी, शशिभूषण, मानस भारद्वाज, अरबाज़ और हरिओम राजोरिया ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

'इक्कीसवीं सदी की कविता का वैचारिक स्वप्न।' विषय पर अपने आधार वक्तव्य में चर्चित कवि एवं युवा द्वादश के संपादक निरंजन श्रोत्रिय ने कहा - मुक्तिबोध हमारी नई रचनाशीलता के लिए प्रकाश स्तंभ की तरह है। कल अपने वक्तव्य में विनीत तिवारी ने मुक्तिबोध के जीवन, काव्य विवेक एवं आत्मसंघर्ष को समझने के लिए जैसा अकादमिक, साहित्यिक एवं वैचारिक वक्तव्य दिया उसे हमेशा ध्यान में रखने की ज़रूरत है। उन्होंने आगे कहा यह सुखद है कि युवा कवि अपने विचारों एवं सृजन में सुलझे हुए हैं। वे किसी जल्दी में नहीं हैं। कल जिन कवियों मानस भारद्वाज, कविता जड़िया, अरबाज़, बसंत त्रिपाठी आदि ने कविता पाठ किये उनकी रचनात्मकता आस्वास्तिकारक है। इनकी मंजिल ऊंची हैं। वैचारिकता के स्वप्न से संबद्धता को सबसे प्राथमिक एवं ज़रूरी संलग्नता बताते हुए कवि एवं कहानीकार शशिभूषण ने कहा - यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत को बाक़ायदा विचारहीन बनाया गया है। विचारहीनता ही भ्रष्टाचार की शुरुआत है। यह विचारहीनता भारत के लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक समाजवाद के सपने के लिए रोड़ा है। धर्म सत्ता एवं राज सत्ता से आम जन या लोक के लिए, हक़ एवं बराबरी के लिए विचारपरक कविताएं ही जूझ सकती हैं। हमें हमेशा याद रखना चाहिये मुक्तिबोध की बात कि 'मुक्ति सबके साथ है।' भारत को विचार की ओर फिर से ले चलना रमाशंकर विद्रोही के शब्दों में आसमान में धान बोने के समान है। लेकिन हमें यह करना ही होगा।

तीसरे सत्र 'जन पक्षधर कविता की पहचान और ज़रूरत।' में कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने आधार वक्तव्य दिया। उन्होंने दो कविताओं के पाठ के हवाले से कहा ब्रेख्त और पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब(दस्तूर) हमारे पथप्रदर्शक हो सकते हैं । जनपक्षधरता केवल लेखन में नहीं होती। वैसा जीवन भी जीना पड़ता है। आज के युवा रचनाकारों में वैचारिकता और राजनीतिक संलग्नता की कमी महसूस होती है। यह व्यवस्था एवं दक्षिणपंथी राजनीति की एक सफलता ही है कि वह यथास्थितिवाद बनाये रखने हेतु लोगों को छोटे छोटे कामों में उलझाए हुए है। जबकि हमारा बड़ा स्वप्न लोकतंत्र और समाजवाद है। उसके लिए व्यवस्था परिवर्तन की योजना भी हमें अपनी रचनात्मक तैयारी में शामिल करना चाहिए। इस अवसर पर श्रोताओं ने अपने सवाल भी रखे। जिनका विस्तार से जवाब हरिओम राजोरिया, निरंजन श्रोत्रिय एवं विनीत तिवारी ने दिया। तीनों सत्रों का संचालन हरिओम राजोरिया ने किया एवं आभार माना पंकज दीक्षित ने।

कुल मिलाकर ऐसे समय में जब स्वयं के द्वारा घोषित प्रेमचंद के कथित ध्वज वाहकों ने ही उनके कालजयी एवं विश्व प्रसिद्ध भारतीय उपन्यासों में धरोहर सरीखे गोदान को केन्द्रीय हिंदी संस्थान से बाहर का रास्ता दिखा दिया और कुछ दूसरे कथित महा उत्तराधिकारी-आलोचक-संपादक मुक्तिबोध की वैचारिक पहचान छीनकर उन्हें सरकारी आयोजनो पर निर्भर एवं उनका मोहताज बनाकर व्यापक स्वीकार्य बनाने के बहाने बेदखल करवा देने की अघोषित तैयारी में लगे हैं, लेखक संगठनों एवं अन्य जनपक्षधर संगठनों पर चौतरफा विचारहीन अवसरवादी हमले हो रहे हैं तब व्यक्तिगत प्रयासों, सीमित संसाधनों एवं साहित्यिक-सांस्कृतिक सहकार से आयोजित जन्म शताब्दी वर्ष में मुक्तिबोध को समर्पित यह कविता कार्यशाला केवल प्रतिबद्धता ही नहीं बल्कि अपने साहित्यिक-विचारक पुरखों के काम, सपने को ज़िदा रखने की जिद की तरह याद रखे जाने की आवश्यकता पर बल देती है। प्रतिबद्ध सक्रियता की दृष्टि से ही नहीं विनम्र हस्तक्षेप की दृष्टि से भी अशोकनगर जैसे छोटे शहर में संपन्न प्रलेस एवं इप्टा की इस कविता कार्यशाला को याद किया जायेगा।

-शशिभूषण

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

अभिव्यक्ति के ख़तरे उठा रहे लेखकों ने महसूस की भूखंड की तपन

मध्य प्रदेश प्रलेस का बारहवाँ राज्य सम्मेलन, 16-17 सितंबर, 2017, सतना


यह विस्तृत रिपोर्ट साथी हरनामसिंह चांदवानी, साथी संतोष खरे, सत्यम सत्येन्द्र पाण्डे, सत्येन्द्र रघुवंशी, शिवशंकर मिश्र सरस, भगवान सिंह निरंजन, सारिका श्रीवास्तव, नीरज जैन, आरती आदि के नोट्स की मदद से तैयार की गई है - विनीत तिवारी


( अगर सब ठीक चल रहा हो तो कविता-कहानी लिखने वालों की चर्चा के विषय- लेखन में भावपक्ष कैसा हुआ, यथार्थ का परावर्तन कितना हुआ, लेखक की कल्पनाशीलता ने कहाँ तक उड़ान भरी, कौन से नये शिल्प को हासिल किया, शैली में क्या नयापन है, कहाँ तक परंपरा का असर लेखन पर है और कहाँ लेखक, परंपरा से मुठभेड़ कर नई ज़मीन तोड़ रहा है ? आदि में हर्ज़ नहीं। लेकिन जब देश-दुनिया पर, इंसानियत पर संकट के बादल छाए हों तब कला की बारीकियों के सवालों में उलझे रहना और अपने यथार्थ को बदलने की कोशिश न करना बुरा नहीं, बहुत बुरा है। प्रेमचंद ने कहा था- ‘हमें यानी प्रगतिशील लेखक संघ को साहित्य का सौंदर्यशास्त्र (हुस्न का मेयार) बदलना है।‘ हमारे लेखकों ने सिर्फ़ साहित्य के ही नहीं, जीवन के सौंदर्यशास्त्र को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई और जीवन-मूल्यों को भी बेहतर, अधिक मानवीय बनाने के प्रयास किये। सच कहना, लिखना, दिखाना कभी भी बिना खतरे उठाये नहीं हुआ। बेशक मध्यवर्गीय भीरुता ने भी चोर दरवाज़े से घुसपैठ की है लेकिन हमारे ऐसे लेखकों की तादाद भी कम नहीं रही जिन्होंने ख़तरे उठाये। यहाँ तक कि उनके लेखन के असर से डरकर कायरों और झूठों ने उनकी जान भी ले ली।


गौरी लंकेश का क़त्ल हुए ज़्यादा समय नहीं बीता है। गौरी की हत्या ने पूरे देश में अमन और इंसाफ़पसंद लोगों को हिला दिया है। दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्याओं के बाद गौरी लंकेश की हत्या से इस तरह की वहशियाना हरक़त के प्रति पूरे समाज में रोष फैला है। इस बात से ग़ुस्सा और भी बढ़ जाता है जब सत्ता में बैठे लोग उन्हें संरक्षण देते हैं जो इन हत्याओं का मखौल बनाना चाहते हैं और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए शहीद हुए लोगों पर मौत के बाद भी गाली गलौच का कीचड़ उछालते हैं। उस गु़स्से का तापमान प्रगतिशील लेखक संघ के मध्य प्रदेश राज्य सम्मेलन में भी महसूस किया गया। 

पहले से ही तय था कि यह सम्मेलन मुक्तिबोध की जन्मशती के उपलक्ष्य में उन्हें समर्पित किया जाएगा। मुक्तिबोध का नाम आते ही सबसे पहले ही जो पंक्तियाँ नारों की तरह दिमाग में कौंधती हैं, वो हैं- ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?’ और ‘अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।’ इन दोनों पंक्तियों में से पहली पंक्ति तो अपने आप पर, अपने ही साथियों पर सवाल करती है ताकि अपनी पक्षधरता में स्पष्टता रहे, और दूसरी पंक्ति अपना संकल्प बताती है, ख़तरों की आशंकाओं के यथार्थ को मूर्त करती हुई।

मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ का 11वाँ राज्य सम्मेलन 2012 में सागर में हुआ था। उसके पश्चात देश के बदले राजनीतिक परिदृष्य में तेजी से जनता के पक्ष में सोचने, लिखने, पढ़ने या कला के किसी और माध्यम में अपने आपको अभिव्यक्त करने वालों पर हमले हुए। उन्हें प्रताड़ित पहले भी किया जाता रहा था। लेकिन इस दफ़ा उन्हें जान से ही मार डाला गया। इसी बेचैनी के बीच विंध्य क्षेत्र के सतना में 12वें राज्य सम्मेलन (16-17 सितम्बर 17) में प्रदेश के 26 जिलों से एकत्र हुए प्रलेस के प्रतिनिधि कलमकारों ने और अन्य लेखकों ने एकताबद्ध होकर कहा कि ‘‘ज़ुल्म के खि़लाफ़ हम मिलकर लड़ेंगे साथी।’’

हाल ही में दिवंगत हुए प्रलेस संरक्षक मंडल के प्रमुख सदस्य श्री चन्द्रकांत देवताले के नाम पर बनाए गए सभागार में लगातार दो दिनों तक विभिन्न विषयों पर वरिष्ठ लेखकों, प्रलेस प्रतिनिधियों ने विचार विमर्श कर राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय विषयों पर प्रस्ताव पारित कर अपनी मंशा जाहिर कर दी कि उभरते फासिज्म के खिलाफ लेखक, पत्रकार, स्वतंत्रचेता झुकने को तैयार नहीं हैं। मुक्तिबोध जन्म शताब्दी को समर्पित 12वाँ राज्य सम्मेलन चन्द्रकांत देवताले की लंबी कविता के शीर्षक ‘‘भूखण्ड तप रहा है’’ के सूत्र वाक्य पर आधारित था। इसी तपिश को सम्मेलन में भली भाँति महसूस किया गया। 



16 सितम्बर को अधिवेशन का शुभारंभ वरिष्ठ लेखक-आलोचक श्री विश्वनाथ त्रिपाठी (दिल्ली) ने किया। उन्होंने अधिवेशन स्थल पर प्रदेश के रचनाकारों, कलाकारों द्वारा प्रदर्शित कृतियों का अवलोकन किया। अधिवेशन सभागार की दीवारों पर टंगे कविता पोस्टर देश के वर्तमान हालात दर्शा रहे थे। बस्ती (उ. प्र.) से आये छायाकार शाहआलम ने छायाचित्रों के माध्यम से चंबल के बीहड़ों में निवासरत ग़रीबों किसानों की दशा-दिशा पर दर्शकों का ध्यान आकृष्ट किया। उज्जैन के चित्रकार मुकेश बिजौले, अशोकनगर के पंकज दीक्षित, इंदौर के अशोक दुबे, रीवा के के. सुधीर के कविता पोस्टरों और शिल्पज्ञ-चित्रकार प्रोफेसर प्रणय की शिल्पकला को भरपूर सराहना मिली। इन्हीं के साथ किताबों की प्रदर्शनी और विक्रय के स्टॉल पर भी सभी लेखक प्रतिनिधि दिलचस्पी लेकर साहित्य से लेकर लेनिन, क्लारा जेटकिन आदि वाम सिद्धांतकारों की पुस्तकें देखते, पढ़ते और खरीदते रहे। चंद्रकांत देवताले सभागृह में हर तरह से कला की सभी विधाओं से प्रगतिशील संस्कृति का शानदार माहौल बना लिया गया था। 


सम्मेलन की शुरुआत में अशोकनगर इप्टा ने जनगीत प्रस्तुत किए। स्वागत भाषण देते हुए प्रलेस सतना इकाई के अध्यक्ष श्री संतोष खरे ने आपातकाल के दौरान 41 वर्ष पूर्व 1976 में हुए प्रलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन को याद करते हुए कहा कि तब घोषित आपातकाल था और आज अघोषित आपातकाल है। आज फिर लेखकों के सामने अभिव्यक्ति का संकट मुँह बाये खड़ा है। आपने सत्ता की आलोचना की नहीं कि आप देशद्रोही करार दिये जा सकते है। सरकार को ही देश मानने पर मजबूर किया जा रहा है। ऐसे में प्रलेस फिर दमन के खिलाफ मोर्चा लेगा।

उद्घाटन वक्तव्य देते हुए श्री विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि वर्ष 1976 में सतना में ही आपातकाल के दौरान प्रलेस का अधिवेशन हुआ था। उस आपातकाल को तो उठा लिया गया। वर्तमान में अघोषित अपातकाल को कौन हटाएगा? साम्प्रदायिकता अपने विकृत चेहरे को ढंककर संस्कृति की खाल ओढ़कर आती है। मनुष्य विरोधी हर काम के खिलाफ जो भी हैं, हम उनके साथ हैं। उन्होंने कहा कि जो इस भारत को को तोड़कर एक जैसा बनाना चाहते हैं, वे समझ लें कि यहाँ जीवन में इतना सदभाव घुला मिला है कि वे उसे हमेशा के लिए तोड़ नहीं सकते। जो ताक़तें भारत को सिर्फ़ हिंदुओं का देश बनाना चाहती हैं, वे समझ लें कि वे भी चैन से नहीं रह पाएँगी। उन्होंने ‘एकता’ और ‘एकजैसेपन’ यानी ‘यूनिटी’ और ‘यूनिफॉर्मिटी’ के फ़र्क़ को समझने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध को याद करने का अर्थ ही यह है कि हम देश में संस्कृति का लबादा ओढ़े चले आ रहे फ़रेबियों और हत्यारों के ख़िलाफ़ लामबंद हों। वे लोग न केवल हत्या की संस्कृति फैला रहे हैं बल्कि जिस महिला को उसके विचारों की वजह से मारा गया, उस गौरी लंकेश को अपशब्द भी कहे जा रहे हैं। और उससे भी ज़्यादा शर्म की बात यह है कि ख़ुद प्रधानमंत्री उसके ट्विटर पर फॉलोअर हैं। जनता सब देख रही है। निश्चित है कि वो इसका जवाब देगी। 

श्रोताओं में प्रलेस के वरिष्ठ संरक्षक मंडल सदस्य जो बारहवें राज्य सम्मेलन के संरक्षक भी थे और जो विंध्य क्षेत्र के लोकप्रिय प्रगतिशील लेखक रहे हैं, श्री देवीशरण ग्रामीण भी अपनी अस्वस्थता और आयु के बाद भी नागौद से सतना आये थे और अगली कतार में ही बैठे थे। उनसे मंच पर चढ़ते न बना तो विश्वनाथ जी ख़ुद नीचे उतरकर उनसे गले मिलने चले गए। न केवल देवीशरण ग्रामीण जी की आँखें ख़ुशी से भीगी थीं बल्कि सभागृह में मौजूद सभी लोगों की आँखों में अपने दो बुजुर्ग लेखकों का परस्पर सम्मान, प्यार और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता देखकर गीलापन था। ख़ुद विश्वनाथ जी 88 वर्ष की आयु में जबलपुर से सतना तक का सड़क से सफ़र करके आये थे और कह रहे थे कि प्रलेस के साथियों से मिलकर मेरा जीवन रस बढ़ जाता है, इसलिए मैं तो अपने स्वार्थ से आया हूँ। 

जनवादी लेखक संघ के प्रदेश महासचिव श्री मनोज कुलकर्णी ने लेखकों की एकजुटता पर जोर देते हुए कहा कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर फासिज़्म हमारे सामने है। ग़रीबों और अमीरों के बीच खाई बढ़ती जा रही है। देश के सभी आर्थिक संसाधनों पर एक प्रतिशत से भी कम औद्योगिक घरानों का कब्ज़ा हो गया है। जनता की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए सत्ता द्वारा साम्प्रदायिक विद्वेष को बढ़ावा दिया जा रहा है। धार्मिक बहुसंख्यकवाद के नाम पर अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों को प्रताड़ित किया जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी और निजता का अधिकार छीना जा रहा है। जन संस्कृति मंच के महासचिव श्री प्रेम शंकर ने कहा- अब वही जीवित रह पाएगा जो सत्ता के झूठ को स्वीकारेगा। लेखक संगठन अपने अतीत के मतभेदों को स्थगित रखकर एकजुट हों। आज देश में विराट सांस्कृतिक मोर्चा बनाने की जरूरत है। प्रलेस के प्रांतीय अध्यक्ष श्री राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य पुनः निशाने पर है। हिन्दी साहित्य संस्थान से गोदान को हटा दिया गया है। दक्षिणपंथी प्रेमचंद से डरते हैं। 

अंत में सागर सम्मेलन के बाद से प्रलेस, मध्य प्रदेश के दिवंगत हुए साथी लेखकों सर्वश्री श्यामसुंदर मिश्र (जबलपुर), श्री महेंद्र वाजपेयी (जबलपुर), सुश्री नुसरत बानो रूही (भोपाल), श्री गोविंदसिंह असिवाल (भोपाल), श्री प्रेमशंकर रघुवंशी (हरदा), श्री के. के. श्रीवास्तव (दमोह), श्री गेंदालाल सिंघई (अशोकनगर), श्री गिरधर शर्मा (गुना) और श्री चंद्रकान्त देवताले (इंदौर) को श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया।

उद्घाटन सत्र के बाद प्रलेस महासचिव श्री विनीत तिवारी ने अपने वक्तव्य में सागर सम्मेलन के बाद से अब तक के प्रमुख कार्यों की सूची प्रस्तुत की और मध्य प्रदेश प्रलेस द्वारा 11 लेखकों के प्रतिनिधिमंडल की शहीद लेखकों डॉ. नरेंद्र दाभोलकर, कॉमरेड गोविंद पानसरे और प्रोफ़ेसर एम. एम. कलबुर्गी के गृहनगरों की ओर इन लेखकों के परिजनों से मिलने और एकजुटता ज़ाहिर करने के मक़सद से की गई यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने प्रदेश में लगाये गए प्रदेश स्तरीय कविता, कहानी और विचार शिविरों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने ये भी कहा कि आज बेशक हम पहले से ज़्यादा भी हैं और पहले से अधिक सक्रिय भी, लेकिन फ़ासीवाद की चुनौती का सामना करने के लिए हमें और अधिक सक्रियता की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि यदि आज स्वतंत्र विचारों की रक्षा नहीं की गई तो देश में उदारवादी चेहरों का अकाल पड़ जाएगा। उन्होने प्रलेस सचिव मंडल सदस्य श्री बाबूलाल दाहिया द्वारा किसानों की हत्या के विरोध में प्रदेश सरकार के पुरस्कार को ठुकराकर प्रतिरोध की परंपरा को आगे बढ़ाने की सराहना की, साथ ही अपने सचिव मंडल, कार्यकारी दल और विशेष रूप से संगठन को आगे बढ़ाने में सुश्री सुसंस्कृति परिहार, सुश्री सारिका श्रीवास्तव और सुश्री आरती के प्रयासों को रेखांकित किया। श्री तिवारी ने कहा कि सत्ता के संरक्षण के कारण ही कलबुर्गी, दाभोलकर, पानसरे के हत्यारों को अब तक नहीं पकड़ा जा सका और अब गौरी लंकेश के क़त्ल को भी पारिवारिक मामला या नक्सलवादियों का नाम लेकर भरमाया जा रहा है। उन्होंने वर्ष 2015 में विश्व हिन्दी सम्मेलन में लेखकों की उपेक्षा और केन्द्रीय मंत्री की अपमानजनक टिप्पणी और व्यापम घोटाले का भी उल्लेख किया। अपने वक्तव्य में श्री विनीत तिवारी ने सरदार सरोवर बाँध के विस्थापितों के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए उनके आंदोलन का समर्थन किया। इसका महत्त्व इसलिए भी था कि अगले ही दिन यानि 17 सितंबर को मोदी अपने जन्मदिन पर सरदार सरोवर बाँध का पूर्ण कहकर उद्घाटन करने वाले थे जबकि 40 हज़ार परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे का निपटारा अभी तक बाक़ी है। लोगों को डुबोने, किसानों को आत्महत्याओं के लिए मजबूर करने और फिर जनता के सारे असंतोष की दिशा एक दूसरे पीड़ित समूहों की ओर मोड़ने और उन्हें आपस में लड़वाने का फ़ासीवाद का तरीक़ा नया नहीं है लेकिन लेखकों को इसे फिर से लोगों के सामने उजागर करना होगा। उन्होंने अपने वक्तव्य की समाप्ति में कहा कि ‘लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है।’


दोपहर बाद विचार सत्र में मुक्तिबोध के संदर्भ में ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ विषय पर साहित्य एवं राजनीति के अंतर्संबंधों को टटोला गया। सत्र की शुरुआत में दमोह की साथी सुश्री सुसम्मति परिहार ने मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ कविता का अंश ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन, ओ मेरे सिद्धांतवादी मन’ गाकर प्रस्तुत किया। प्रमुख वक्ता प्रो. गार्गी चक्रवर्ती (दिल्ली) ने कहा कि आपातकाल में राज्य के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों पर कार्यवाही होती थी। अब आम जनता को निशाना बनाया जा रहा है। जब सावरकर ने हिंदू राष्ट्र की कल्पना की थी तो रबींन्द्रनाथ ठाकुर ने उसका विरोध किया था। सांप्रदायिकता के प्रवेश के कारण ही रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1905 के बंग-भंग आंदोलन से दूरी बना ली थी। उनका उपन्यास ‘गोरा’ एक तरह से इसी पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है। दक्षिणपंथी लोग आज भी रबीन्द्रनाथ ठाकुर को मौका मिलते ही पाठ्यक्रमों से बाहर करना चाहते हैं। जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई से अपने आपको दूर रखा और अंग्रेजों की चाटुकारिता की, उन्होंने ही गाँधीजी को मारा, रबीन्द्रनाथ ठाकुर को बदनाम करने की कोशिश की और आज फिर हिंदू राष्ट्रवाद को हथियार बनाकर लोगों के हक़ की आवाज़ उठाने वालों या सच्चाई बताने वालों का क़त्लेआम कर रहे हैं। हम भारतीय राष्ट्रवादी हैं, हिन्दू राष्ट्रवादी नहीं। साम्प्रदायिक विचारधारा अब फ़ासीवाद की शक्ल लेती जा रही है। फ़ासीवाद के खिलाफ ही प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ था। उसके खिलाफ लड़ना आज भी ज़रूरी है। 

अलीगढ़ से आये वेदप्रकाश ने कहा कि मध्यवर्ग बदल रहा है। सत्ता का भय कायम है। लोग झुकने के लिए तैयार बैठे हैं। चारों ओर चापलूसी का माहौल है। आम आदमी के मन में राजनीति का गंदा चेहरा स्थापित कर दिया गया है। इस सबमें शिक्षण संस्थानों और मीडिया की भूमिका भी बहुत ही नकारात्मक है। हमें हमारी प्रगतिशील विरासत को आज के संदर्भों से जोड़कर लोगों के समक्ष ले जाने की ज़रूरत है। छत्तीसगढ़ से आये वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे ने कहा कि हर व्यक्ति की पक्षधरता होती है। मनुष्य विरोधी कार्यों के ख़िलाफ़ लड़ने वालों के साथ हम खड़े हैं। अध्यक्ष मंडल सदस्य वरिष्ठ कहानीकार-उपन्यासकार श्री रमाकांत श्रीवास्तव ने कहा कि सत्य पर कोड़े बरसाये जा रहे हैं और अधिकांश बुद्धिजीवी खामोश हैं, जबकि सच के साथ खड़ा होना लेखकों का दायित्व है। उन्होंने परसाई को उद्धृत करते हुए कहा कि जब एक व्यक्ति दूसरे को मार रहा हो तो आप दोनों के प्रति समान भाव नहीं रख सकते। आपको पक्ष लेना होता है। उसी चयन से हमारी पॉलिटिक्स तय होती है। अध्यक्ष मंडल सदस्य वरिष्ठ कहानीकार-उपन्यासकार श्री सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि हमारे राम-राम को बड़ी धूर्तता से षड्यंत्र करके आरएसएस-भाजपा ने जय श्रीराम में बदल दिया है। हमें लोंगों को यह समझाना ज़रूरी है कि हमारे राम गाँधी के राम थे, न कि जिनके नाम पर मंदिर-मस्ज़िद के फ़साद खड़े करके क़त्लेआम और नफ़रत फैलायी जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं कटनी इकाई के अध्यक्ष श्री नंदलाल सिंह ने कहा कि संगठन के सभी सदस्यों को वैचारिक रूप से प्रखर बनाने की ज़रूरत है ताकि हम राजनीति के आगे चलने वाली मशाल की वो भूमिका निभा सकें जो प्रेमचंद ने हमारे लिए निर्धारित की थी। शहडोल के वरिष्ठ साथी श्री सुरेश शर्मा ने कहा कि ये जानते हुए भी कि हमारी लड़ाई लंबी है और हम इसे लड़ते जाएँगे, लड़ने के तरीकों में कुछ बदलाव लाने की दिशा में हमें सोचना चाहिए। इस सत्र का संचालन सचिव मंडल सदस्य श्री तरुण गुहा नियोगी ने किया। 

शाम को एक विशाल रैली निकाली गई जो अस्पताल चौक से प्रारंभ होकर नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई आयोजन स्थल तक पहुँची। रैली में लेखकों ने शहीद लेखकों, पत्रकारों के हत्यारों को गिरफ़्तार करने की माँग करते हुए जनगीत गाये और लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की एकता, अमन, इंसाफ़, इंसानियत, मोहब्बत और इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे लगाये। हरिशंकर परसाई, बलराज साहनी, भीष्म साहनी, हबीब तनवीर, सज्जाद ज़हीर, प्रेमचंद, ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, इस्मत चुगताई आदि लेखकों की तस्वीरों के साथ रैली में दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश के लिए इंसाफ़ माँगने वाले और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा हेतु जनता से अपील करने वाले पोस्टर भी थे। 

सांस्कृतिक रैली के वापस आने के बाद फिर सत्र शुरू हुआ। शुरुआत में सीधी से आये इंद्रावती नाट्य समिति के कलाकारों ने बघेली के लोकगायन का प्रसिद्ध आशु कविता रूप टप्पा गायन प्रस्तुत किया। ट्रेन के 12 घंटे लेट हो जाने की वजह से विशिष्ट अतिथि, प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव श्री राजेन्द्र राजन (बेगुसराय) और प्रलेस के बिहार प्रांत के प्रांतीय महासचिव प्रो. रवीन्द्र नाथ राय (आरा) शाम होते-होते सतना पहुँच सके थे और सीधे ही सत्र में शामिल हो गए। श्री राजेन्द्र राजन ने मध्य प्रदेश प्रलेस के लेखक साथियों को अपना क्रांतिकारी अभिवादन पेश करते हुए मुक्तिबोध का स्मरण करते हुए संक्षेप में फ़ासीवाद के आसन्न संकट के दौर में लेखक संगठन की भूमिका पर अपनी बात रखी। उन्होंने 28-29 अक्टूबर को चंडीगढ़ में होने जा रहे लेखकों के फ़ासीवाद विरोधी राष्ट्रीय सम्मेलन की रूपरेखा भी रखी और मुक्तिबोध के अवदान को याद किया। प्रो. रवीन्द्रनाथ राय ने भी मध्य प्रदेश के सम्मेलन को अपनी शुभकामनाएँ देने के साथ ही नवउदारवाद के दौर में सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। अध्यक्ष मंडल सदस्य और वरिष्ठ कवि श्री कुमार अंबुज (भोपाल) ने इस सत्र में कहा कि जिसे आज नवउदारवाद की संज्ञा दी जा रही है, वह दरअसल नवसंकीर्णतावाद है। हमारे लेखकों को आज प्रतिबद्धता के साथ अपने लेखन के मोर्चे पर तो जुटना ही चाहिए, साथ ही हमारी मौजूदगी के बारे में सहज सांगठनिक विवेक का भी इस्तेमाल करना चाहिए। अगर हम आज ढुलमुल नीति अपनाएँगे तो हमारा आंदोलन कमज़ोर होगा, ख़ुद हमारी पहचान विश्वसनीय नहीं रह जाएगी। 


रात में 9 बजे से कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें प्रदेश के कोने-कोने से आये अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। कवि गोष्ठी रात 1 बजे तक चली जिसका संचालन किया श्री टीकाराम त्रिपाठी (सागर) ने और अध्यक्षता की श्री महेश कटारे ‘सुगम’ (बीना) ने। सर्वश्री शैलेन्द्र शैली, महेंद्र सिंह, रामयश बागरी, बाबूलाल दाहिया, आज़ादवतन वर्मा, श्रीमती उर्मिला सिंह, वृंदावनराम ‘सरल’, गिरीश पटेल, पी. आर. मलैया, सुश्री मीना सिंह, मिथिलेश राम, दीपक अंबुद, केशरीसिंह चिड़ार, वीरेन्द्र प्रधान, हरिनारायण, प्रेमप्रकाश चौबे, यासीन ख़ान, आदि विभिन्न शहरों से आये 27 कवियों ने कविता पाठ किया। 

अधिवेशन के दूसरे दिन की शुरुआत ‘हाशिये का समाज और साहित्य की जिम्मेदारी’ विषय पर परिचर्चा से हुई। सत्र के पूर्व गुना-अशोकनगर से आईं प्रलेस और इप्टा की सदस्या लेखिका व संगीतकार सुश्री रामदुलारी शर्मा ने और अनूपपुर की रचनाकार साथी सुश्री मीना सिंह ने भी जनगीत गाये।

आधार वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार व चिंतक श्री रामनारायण सिंह राना, सतना ने कहा कि सामाजिक न्याय से वंचित समाज के बारे में अभी भी बहुत लिखा जाना बाक़ी है। वर्तमान साहित्य के बिम्ब संपन्न समाज के हैं। साहित्य की मुख्यधारा में ऊँची जातियों के लेखकों का दबदबा है। प्रलेस राष्ट्रीय महासचिव श्री राजेंद्र राजन ने कहा कि शोषण के ख़िलाफ़ लिखने वाला ही सच्चा लेखक है। शोषण से मुक्ति टुकड़ों में नहीं मिलती। रचनाकार अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकते। देश में साम्प्रदायिकता, शोषण व ग़रीबी के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने का समय है यह। लेखक के भीतर वैज्ञानिक चेतना हो तो बाकी विषय मायने नहीं रखते। चूँकि प्रलेस का जन्म ही फासीवाद से संघर्ष की पृष्ठभूमि में हुआ इसलिए अन्य सांस्कृतिक संगठनों की तुलना में फासिज़्म से लड़ने की हमारी ज़िम्मेदारी है। लड़ें या घुटने टेकें ? हम घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं हैं। भारत माता को राष्ट्र भक्ति का पैमाना बना दिया गया है। ताक़तवर बाज़ार विवेक को समाप्त कर रहा है। फासिज़्म अब पुराने तरीके से सामने नहीं आएगा। भारत में साम्प्रदायिक्ता के खोल में फ़ासीवाद का चेहरा सामने है। 

अध्यक्ष मंडल सदस्य श्री सेवाराम त्रिपाठी, रीवा ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य में वंचित वर्ग को स्थान दिया है। हाशिये का समाज भी कई वर्गों में बँटा है। श्री महेंद्र सिंह ने कहा कि हाशिये का समाज सदैव ज्ञान से वंचित रहा है। यहाँ तक कि प्रगतिशील लेखकों के भीतर भी अनेक के भीतर जातीय, लैंगिक अथवा धार्मिक भेदभाव के लक्षण हैं। हम लेखकों को लेखन व आचरण में समानता लानी होगी। देश की एक प्रतिशत आबादी के पास 53 प्रतिशत पूँजी है। यह आर्थिक खाई सामाजिक असमानता भी लाती है। आर्थिक मुद्दों पर तो फिर भी कुछ न कुछ होता है लेकिन सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन अब देश में नहीं होते। इस दिशा में प्रलेस को कुछ ठोस करने की आवष्यकता है। सुश्री आरती, भोपाल ने कहा कि नवउदारवाद और पूँजीवाद ने हाशिये के नए समाज बनाए हैं। वंचित वर्ग भी नई अर्थनीतियों का शिकार है। सम्पत्ति पर उत्तराधिकार जैसी कई समस्याएँ आज भी बनी हुई हैं। सुश्री सुसंस्कृति परिहार, दमोह के अनुसार वंचित वर्ग के मार्गदर्शन के लिए प्रलेस का गठन हुआ। किसानों-आदिवासियों के बारे में न केवल लिखा जाना चाहिए अपितु उनके साथ उनके आंदोलनों का हिस्सा भी बनने की ज़रूरत है।

सचिव मंडल सदस्य श्री शैलेंद्र शैली, भोपाल ने कहा कि दलित चेतना का वर्गीय चेतना में रूपान्तरण जरूरी है। सुश्री सारिका श्रीवास्तव, इंदौर के अनुसार आज के दौर में लेखक सिर्फ़ लिखकर ही इतिश्री नहीं कर सकता। उसे अन्य मुद्दों पर भी समाज में अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी। हाशिये के समाज के बारे में उन्होंने कहा कि मर्द और औरत के अलावा समाज में तीसरे लिंग की चर्चा नहीं होती जबकि वे भी मनुष्य ही हैं। उन्होंने महिला लेखिकाओं, लालदेई, डॉ. रशीद जहाँ, नुसरत बानो रूही आदि के लेखकीय अवदान को याद रखने की प्रलेस से अपेक्षा की। श्री फूलचंद बसोर, रीवा ने कहा कि यह भी एक विडंबना है कि हाशिये के बाहर समाज के बारे में गैर दलितों ने अधिक लिखा है और खुद हाशिये के समाज के लोग मौका मिलते ही मुख्यधारा का हिस्सा बन जाना चाहते हैं। श्री रामआसरे पाण्डे, इंदौर ने चुनाव प्रणाली में बदलाव की माँग को रेखांकित करते हुए कहा कि वामपंथ के पास भविष्य का स्वप्न तो है लेकिन उसे हासिल कैसे करना है, उसका कोई कार्यक्रम (प्रोग्राम) नहीं है। सचिव मंडल सदस्य श्री अभय नेमा, इंदौर ने सचेत किया कि हमें प्रायोजित नफ़रत से बचना चाहिए जो इस नये माध्यम सोशल मीडिया द्वारा फैलाई जा रही है। तोड़े-मरोड़े गए थोड़े से सच में भरपूर झूठ मिलाकर लोगों को भरमाया और एक दूसरे के ख़िलाफ़ भड़काया जा रहा है। प्रलेस इस बारे में भी कुछ करे तो अच्छा होगा। श्री सोमेश्वर सोम, सीधी ने कहा कि किसान हर जगह मर रहा है पर साहित्य में उसे स्थान नहीं मिल रहा है। लेखकों के बीच जाति की चर्चा उन्हें बाँटने की साजिश है। हमारा ऐतिहासिक दायित्व पूँजीवाद को ख़त्म करना है। वर्गीय चेतना ही हमारा अस्त्र है। 


पवित्र सलालपुरिया, गुना के अनुसार सोच जाति आधारित नही वर्ग आधारित होना चाहिये। अनिल कुमार सिंह ने कहा कि साहित्य दो अतिवादी विचारो के बीच जी रहा है। मंदसौर के साथी श्री हरनामसिंह ने पठनीयता के संकट पर ध्यान आकृष्ट करवाते हुए साहित्य के संप्रेषण में नई तकनीक के उपयोग पर जोर दिया। इस सत्र में आर. बी सिंह, गणेश कानड़े, खंडवा, नीरज जैन, दतिया, डॉ. विद्याप्रकाश, रीवा ने भी अपने विचार रखे। सत्र का समापन करते हुए महासचिव विनीत तिवारी ने कहा कि लेखक केवल वही नहीं है जो कविताएँ, कहानियाँ लिख रहे हैं। इतिहास, अर्थशास्त्र या अन्य किसी भी विषय में लेखन करने वाले, यहाँ तक कि पत्रकार, ब्लॉगर भी लेखकों की बिरादरी का हिस्सा हैं। हमें इस भावना से बाहर आना चाहिए कि कविता-कहानी लिखने वाला ही लेखक होता है। मारे गए चारों शहीद अपने लिखने-पढ़ने और अपने विचारों को निडरता से व्यक्त करने के लिए ही मारे गए। वे जो लिखते थे, मुक्तिबोध की पंक्ति ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब’ को चरितार्थ करते थे। उनका लिखा शोषकों के चैन में खलल डालने में कामयाब रहा तो उन्हें बेशक बड़ा लेखक मानना ही चाहिए। दूसरी बात यह कि लेखन के खाने बनाना दलित लेखन, महिला लेखन वगैरह ग़लत है। न तो एक लेखक सिर्फ़ इतना लिखना चाहता है जो उसकी जाति या समूह से जुड़ा हुआ हो और न ही पाठक ये अपेक्षा करता है। प्रलेस के अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद या प्रलेस के घोषणापत्र में वंचित और शोषित समुदायों के साथ जुड़ने, अपने लेखन के माध्यम से उनके जीवन के दुःखों और खुशियों को दर्ज करने की बात की गई है, चाहे वे दलित हों, अल्पसंख्यक हों या लैंगिक, भाषिक या क्षेत्रीय आधार पर हाशिये पर हों। सागर सम्मेलन में ही हमने महत्त्वपूर्ण आदिवासी लेखक श्री वाहरू सोनवणे को अपना मुख्य अतिथि बनाया था। किसी ने बात की थी वामपंथ के पास कार्यक्रम की कमी की। प्रलेस के पास कार्यक्रम है। और वो कार्यक्रम है एक शोषणमुक्त समाज की, समाजवादी समाज व्यवस्था की रचना करने में अपना भरसक योगदान देना। इसी लक्ष्य को पाने के लिए यह ज़रूरी है कि हम हाशिये के समुदायों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ करें, बिना यह भूले कि आख़िरकार जातीय, क्षेत्रीय, भाषायी, लैंगिक और सांप्रदायिक भेदभाव पैदा ही इसलिए किए जाते हैं कि मुट्ठीभर तबक़े का सारे संसाधनों पर क़ब्ज़ा रहे। इसलिए आर्थिक आधार पर वर्गीय संरचना को तो बदलना ही होगा लेकिन उतना काफ़ी भी नहीं और बदलने के लिए जो ताक़त चाहिए, वो भी हाशिये पर मौजूद संख्या में बहुत सारे लोगों के एकीकृत संघर्ष में जुड़ाव से ही हासिल होगी। 


दोनों दिन इन खुले सत्रों में अनेक स्थानीय और आसपास के रचनाकारों की भी भागीदारी रही। इस अवसर पर दोनों दिन अनेक लेखकों की पुस्तकों का विमोचन भी हुआ। इनमें श्री देवीशरण ग्रामीण की पुस्तक के साथ ही श्री शिवकुमार ‘अर्चन’ ,भोपाल की पुस्तक ‘ऐसा भी होता है’, श्री बाबूलाल दाहिया, सतना की बघेली पुस्तक ‘पसीना हमारे बद है’, श्री सरोज सिंह परिहार की ‘सूरज के गाँव में’, श्री संतोष खरे, सतना की किताब ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’, श्री कैलाश चन्द्र, रीवा की चार पुस्तकों ‘पतनगाथा’ (उपन्यास), ‘नाम में क्या रखा है’ (उपन्यास), ‘मोहनदास’(उदय प्रकाश) नाट्य रूपांतर और ‘चौराहे’ (नाटक), श्री जाहिद खान (शिवपुरी) की पुस्तक ‘फैसले जो नज़ीर बन गए’ और सुरेश शर्मा, शहडोल की पुस्तक ‘राजनीतिक संकट के विभिन्न आयाम’ का विमोचन सम्मेलन में आये अतिथियों एवं वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा किया गया। सभी प्रतिनिधियों को प्रातिनिधिक सामग्री में गार्गी चक्रवर्ती लिखित पी. सी. जोशी की जीवनी, सारिका द्वारा तैयार किये गए प्रगतिशील लेखकों के छोटे-छोटे पद्यांश या गद्यांश पर बुकमार्क जैसे पोस्टर्स एवं अन्य सामग्री भी दी गई। सारिका द्वारा तैयार किये गए पोस्टर्स का भी विमोचन किया गया। 

दूसरे दिन भोजनोपरांत सांगठनिक सत्र के पहले शिवकुमार ‘अर्चन’ ने तरन्नुम में उम्दा नज़्म सुनाई और इप्टा अशोकनगर के साथियों ने कबीर के पद और जनगीत सुनाये। सांगठनिक सत्र में सर्वसम्मति से नई कार्यकारिणी चुनी गई। श्री राजेन्द्र शर्मा को पुनः अध्यक्ष पद हेतु चुना गया जबकि महासचिव पद की ज़िम्मेदारी सचिव मंडल के वरिष्ठ सदस्य श्री शैलेन्द्र शैली को दी गई। अब विनीत तिवारी राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्य हैं और उन्हें प्रांतीय अध्यक्ष मंडल में भी शामिल किया गया है। संरक्षक मंडल में 9 वरिष्ठ साहित्यकार रखे गए और अध्यक्ष मंडल में 15 साहित्यकारों को रखा गया। सचिव मंडल 14 साहित्यकारों को लेकर गठित किया गया। पहली बार मध्य प्रदेश के प्रांतीय सचिव मंडल में तीन महिला साहित्यकारों को लिया गया। 

सम्मेलन के अंत में निवृत्तमान पदाधिकारियों और नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने स्थानीय आयोजक समूह के सर्वश्री देवीशरण ग्रामीण, संतोष खरे, महेन्द्र सिंह, बाबूलाल दाहिया, रामयश बागरी, तेजभान, उदित तिवारी, आदि साथियों को कामयाब सम्मेलन के लिए बधाई और अच्छी व्यवस्थाओं के लिए धन्यवाद दिया। अपने तेवरों में विद्रोही और सत्ता के दमन के तीव्र विरोध की आभा लिए यह प्रांतीय सम्मेलन भी पूर्व में हुए शानदार और यादगार सम्मेलनों की कड़ी में दर्ज हुआ। सतना में ही नहीं, पूरे प्रदेश में और प्रदेश से बाहर भी इसकी अनुगूँज बनी रहेगी। 

प्रस्ताव जो पारित किये गये- 

1. बर्मा से आये रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार बंद हो। सभी तरह के शरणार्थियों को मानवता के आधार पर शरण, सुरक्षा और सहायता दी जाए।

2. सरदार सरोवर बाँध के विस्थापितों का पूर्ण पुनर्वास किया जाए, मेधा पाटकर एवं अन्य आन्दोलनकारियों पर थोपे गए झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ।

3. केन्द्रीय हिंदी संस्थान द्वारा प्रेमचंद के उपन्यास गोदान को पुनः पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये। 

4. प्रदेश की सभी शासकीय, अशासकीय संस्थाओं में बढ़ते राजनीतिक दखल को रोका जाये।

5. प्रलेस के मध्य प्रदेश महासचिव विनीत तिवारी एवं उनके साथ जाँच दल में मौजूद रही प्रोफ़ेसर नंदिनी सुंदर, प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद, महिला फ़ेडरेशन नेत्री मंजु कवासी, सीपीआई (एम) के छत्तीसगढ़ राज्य सचिव संजय पराते और स्थानीय आदिवासी मंगलू पर छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा थोपे गए झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ और ऐसे झूठे मामले बनाकर आम नागरिकों को फँसाने वाले शासन के अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए।

6. बेंगलुरु की एक कंपनी द्वारा इंटरनेट पर सर्वे कर एक सूची जारी की गई है। ट्विटर पर आये संदेशों में लिखा गया है कि किन-किन कथित ‘देश द्रोहियों’ को ख़ामोश करने की ज़रूरत है, और आगे 66 लोगों की एक सूची है जिसमें सोनिया गाँधी, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह जैसे काँग्रेस के नेताओं के साथ ही केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन, एआईएसएफ नेता कन्हैया कुमार, सर्वोच्च न्यायालय की वकील वृंदा ग्रोवर एवं अन्यों के साथ प्रलेस के प्रांतीय महासचिव विनीत तिवारी का भी नाम है। न केवल नाम है बल्कि उनकी और वृंदा ग्रोवर की तस्वीरें भी डाली गई हैं। यह शुद्ध रूप से धमकी है और विवेकहीन लोगों को इन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए प्रेरित करना है। सोशल मीडिया पर की जाने वाली इस तरह की ट्रोलिंग की हम निंदा करते हैं और माँग करते हैं कि पुलिस इसे साइबर अपराध के तहत दर्ज कर अपराधियों को पकड़े और ऐसे नफ़रत फैलाने वाले अपराधियों को कड़ी सज़ा दी जाए ताकि दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसी वारदात की पुनरावृत्ति न हो। हम ये भी माँग करते हैं कि उक्त चारों हत्याओं के ज़िम्मेदार अपराधियों को पकड़ने में बरती जा रही ढिलाई बंद की जाए और शीघ्रता से अपराधियों को पकड़ा जाए।

7. आसन्न फ़ासीवाद से निपटने के लिए समस्त लेखक, लेखक संगठन और अन्य जनपक्षीय व प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठन सघन विचार-विमर्श से साझा रणनीति तैयार करें और जनता के बीच में इंसानियत, मोहब्बत, इंसाफ़ के जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठित करने हेतु नये सांस्कृतिक आंदोलन का आगाज़ किया जाए।

8. वेनुजुएला, उत्तर कोरिया सहित समस्त राष्ट्रों की सम्प्रभुता का सम्मान किया जाए। अमेरिकी साम्राज्यवाद लगातार इन देशों के भीतर अस्थिरता पैदा करने और युद्ध भड़काने की कोशिशों में लगा हुआ है। हम इस सम्मेलन के माध्यम से इन राष्ट्रों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए वैश्विक समुदाय से आह्वान करते हैं कि इन देशों को अस्थिर करने के लिए किए जा रहे अमेरिकी प्रयासों को बंद करने के लिए अमेरिका पर दबाव बनाएँ। 


*** मध्यप्रदेश विभिन्न क्षेत्रीय पहचानों, बोलियों और संस्कृतियों को समेटे है। इस तरह की विविधताओं के बीच विन्ध्य क्षेत्र के सतना में प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य सम्मेलन में प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों से आये लेखकों, चिंतकों की चिंताएँ समान थीं। राज्य सम्मेलन में मालवा-मेवाड़ क्षेत्र से सटे मंदसौर जिले से लेकर निमाड़ के खंडवा, होल्करों की राजधानी इन्दौर, नवाबी सांस्कृतिक परिवेश के भोपाल के अलावा बुंदेली, बघेली में लिखने-पढ़ने वाले एक छत के नीचे लगातार दो दिनों तक देश के वर्तमान हालात पर विचार-विमर्श करते हुए वर्तमान व भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी सुनिश्चित करते रहे। 

एक तरफ जहां देश में निरंतर बढ़ते फासिज्म के खतरे की पहचान कर प्रतिरोध के रास्ते तलाशे गये वहीं आतंरिक कमजोरी के रूप में हाशिए का समाज और साहित्य की जिम्मेदारी तय करने पर भी चिंतन हुआ। 16 व 17 सितम्बर सतना सम्मेलन का मूल लक्ष्य देश में बढ़ते तानाशाही के खतरे के प्रति लेखकों, बुद्धिजीवियों का ध्यान आकृष्ट कर उससे लड़ने की रणनीति बनाने पर था। लगभग सभी वक्ताओं ने याद दिलाया कि प्रगतिशील लेखक संघ का गठन ही फासिज्म के खिलाफ हुआ था। जब 1936 में मानवता के दुश्मन के रूप में फासिज्म हिटलर, मुसोलिनी, और तोजो के नेतृत्व में सामने आया था। यह फासिज्म जनतांत्रिक पद्धति को समाप्त कर नस्लीय आधार पर दुनिया को संचालित करने का मंसूबा पाले था। ऐसे ही सोच से वर्तमान सरकार का आश्रय प्राप्त शोषक वर्ग देश की सहिष्णुता और सद्भाव की संस्कृति पर कुठाराघात करते हुए उसकी जगह कट्टर हिन्दुत्व को स्थापित करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपना रहा है। साम्प्रदायिकता, जातिगत आधार पर घृणा फैलाने में संलग्न है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने विरोध में उठे स्वर को बलपूर्वक कुचलने में किसी तरह का संकोच नहीं कर रहा है। सतना सम्मेलन को इस रूप में भी याद किया गया कि लगभग 41 वर्ष पूर्व वर्ष 1976 में सतना में ही फासिस्ट विरोधी लेखकों का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था। वर्तमान राज्य सम्मेलन के उद्घाटनकर्ता वरिष्ठ लेखक और आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी वर्तमान अघोषित आपातकालीन परिस्थितियों से चिंतित थे। उन्होंने सवाल उठाया कि वर्ष 1975 में घोषित आपातकाल को उठा लिया गया था लेकिन वर्तमान में जारी अघोषित आपातकाल की परिस्थतियों से कैसे निपटा जाए ?



सम्मेलन में वैचारिक मतभेदों को ताक पर रखकर देश के समस्त लिखने-पढ़ने, चिंतन करने वालों से एकजुटता का आह्वान किया गया। जनवादी लेखक संघ, मध्यप्रदेश के मनोज कुलकर्णी, जन संस्कृति मंच, उत्तरप्रदेश के महासचिव प्रेमशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि अभी अतीत की शिकायतों को स्थगित रखकर देश में विराट सांस्कृतिक मोर्चा बनाये जाने की जरूरत है। सम्मेलन में प्रदेश के लेखकों के अलावा हिन्दी पट्टी के निकटवर्ती प्रदेशों के कई विद्वानों ने शिरकत कर मध्यप्रदेश के लेखको के प्रति अपनी एकजुटता और सहमति जताई। दिल्ली के विश्वनाथ त्रिपाठी के अलावा गार्गी चक्रवर्ती, छाया चित्रकार शाह आलम, उत्तरप्रदेश के प्रेमशंकर व राजेन्द्र यादव, अलीगढ़ के वेदप्रकाश, बिहार के राजेन्द्र राजन, (प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव), बिहार प्रलेस के महासचिव प्रो. रवीन्द्रनाथ राय, छत्तीसगढ़ के महासचिव प्रभाकर चैबे, सम्मेलन में सक्रिय रहे। 

सभी का मानना था कि साम्प्रदायिक विचारधारा के खिलाफ लड़ना जरूरी है। विद्वानों ने मध्यवर्ग की अवसरवादिता, अमीरों और गरीबो के मध्य बढ़ती खाई, किसानों, दलितो, अल्पसंख्यको पर बढ़ते हमलो पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हम लड़ेंगे और हम सत्ता आश्रित साम्प्रदायिकता के सामने घुटने टेकने को तैयार नहीं है। 

सम्मेलन में अपने दिवंगत साथियों को शिद्दत से याद किया गया। विख्यात कवि गजानन माधव मुक्तिबोद्ध जन्म शताब्दी को समर्पित सम्मेलन में हाल ही में दिवंगत हुए प्रलेस संरक्षक मंडल के वरिष्ठ साथी चन्द्रकांत देवताले की स्मृति में उनकी लंबी कविता ‘भूखण्ड तप रहा है’ को ही सम्मेलन का केन्द्रीय विषय बनाकर सम्मेलन की दिशा को स्पष्ट किया गया। मंच के पार्श्व में त्रिलोचन, हरिशंकर परसाई, कमलाप्रसाद, भगवत रावत की तस्वीरों ने संपूर्ण प्रदेश के लेखकों की प्रगतिशील सोच की विरासत को प्रतिनिधित्व प्रदान किया। सम्मेलन में दाभोलकर, कलबुर्गी, पानसरे, गौरी लंकेश की सुनियोजित हत्या में शासकों की भूमिका और हत्यारों को संरक्षण की निंदा करते हुए अपराधियों को गिरफ्तार करने की मांग की गई। सोशल मीडिया के माध्यम से तर्कशील विचारकों को दी जा रही धमकियों पर भी चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से अपराधियों पर कार्यवाही की मांग की गई। इनमें प्रलेस के महासचिव विनीत तिवारी को खामोश करने की धमकियाँ भी शामिल हैं।

सम्मेलन में किसान आंदोलन, नर्मदा बांध के विस्थापितों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के प्रति सरकार के रवैये की निंदा करते हुए शासकों की संवेदनहीनता को रेखांकित किया गया। व्यापम घोटाले में जिस तरह से अपराधियों को बचाया जा रहा है, उस पर भी ध्यान आकृष्ट किया गया। वर्ष 2015 में विश्व हिन्दी सम्मेलन में लेखकों के अपमान की ओर ध्यान दिलाते हुए शासकों के वर्गीय चरित्र को उजागर किया गया। सम्मेलन में प्रदेश में विकल्पहीनता की राजनीति की पहचान करते हुए प्रतिरोध को संगठित कर फासिज्म की प्रवृतियों को आमजन तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया। प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा अक्टूबर माह में चंडीगढ़ में जनतंत्र और संस्कृति की रक्षा के लिए लेखको का राष्ट्रीय सम्मेलन इस दिशा में एक पहल है। निश्चित ही ऐसे आयोजनो की गूँज देश के संवेदनशील, लोकतंत्र प्रेमी नागरिको तक पहुंचेगी। कट्टरपंथी पराजित होंगे और देश खुली अभिव्यक्ति की फिजा में भय मुक्त होकर सांस ले सकेगा।



00000