गुरुवार, 10 जून 2021

सारस्वत प्रार्थना

फिर ईश्वर ने शशिभूषण से ऐसी सारस्वत प्रार्थना लिखने को कहा जिसमें धर्मग्रंथों का सार हो। शशिभूषण ने वैसी सारस्वत प्रार्थना लिखकर ईश्वर को सौंप दी ।


हे ईश्वर
तू एक है
मैं एक हूँ
धर्म एक हैं
शासक एक हैं
तुम्हारे लिए धर्मों के लिए शासकों के लिए
संसार में अनेक हैं
सब हैं।

हे ईश्वर
मेरे ज्ञान को
धर्म के लायक बना
शासकों के लायक बना
अपने लायक बना
शासक राज्य को धर्म के लायक बनाएं
तुम्हारे लायक बनाएं
मुझसे शासकों की प्रशंसा करवा
मुझे धर्म पर चला
लोग मुझे मानें
मैं शासक को
शासक धर्म को
धर्म तुम्हें
यह सिलसिला जल थल वायु में
जहां जहां मनुष्य वास करें
कभी ख़तम न हो।

हे ईश्वर
मुझे सारस्वत बना
विद्यावान गुणी चतुर बना
मुझसे अनेक पुस्तकें लिखवा
मेरी पुस्तकों के समीक्षक पैदा कर
मेरी पुस्तकों को सम्मान दिला
मुझे पद पुरस्कार दिला
संसार में पुस्तकें अमर रहें।

हे ईश्वर
तू ही है एक
तेरे आगे कोई नहीं
जगत कुछ नहीं
हमेशा ऐसा रख सबको
कुछ न चल सके तुम्हारे बिना
न लोक न परलोक
न धरती न स्वर्ग
न भक्त न विभक्त।

हे ईश्वर
मैंने तुम्हारी कल्पना की
तुम्हारी अभ्यर्थना की
तुमसे याचना की
तुम्हारी सारस्वत प्रार्थना की
मेरी कल्पना अभ्यर्थना याचना को सच बना
मेरी  सारस्वत प्रार्थना सर्वव्यापक कर
मेरी पुस्तकों को  ईश्वरीय बना।

हे ईश्वर
इसे सदा सत्य साबुत रख
मनुष्यता ईश्वर
शासक धर्म
शासन विद्या
एक हैं।


©शशिभूषण

बुधवार, 9 जून 2021

डरो, डर पर जीत की प्रखर कविता

विष्णु खरे की एक कविता है, ‘डरो’। सेतु प्रकाशन, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित विष्णु खरे की संपूर्ण कविताओं में इस कविता के शीर्षक के नीचे 12 जुलाई 1976 की तारीख़ मिलती है।

मैं कविता और उक्त तारीख़ पढ़कर हैरान हूँ। 12 जुलाई 1976, मेरे जन्म से पहले और आज 6 जून 2021 से चौवालीस साल पहले की तारीख़ है। लेकिन कविता की विषयवस्तु के बारे में कहना ही होगा यह वर्तमान देशकाल का यथार्थ है। झकझोरता हुआ यथार्थ। सत्ता प्रवृत्ति पर घुप जाने वाला यथार्थवादी बयान।

कविता डरो आज का ऐसा बयान है जिसमें एक ओर राजसत्ता निर्मित डर के प्रमुख रूप चेतावनी बनकर प्रकट हैं वहीं दूसरी ओर जनता की निरुपायता, क्षोभ, घुटन और दुख प्रत्यक्ष हैं।

डर राज व्यवस्था का शक्तिशाली शोषक और दमनकारी हथियार है। इसके प्रभाव से जन प्रतिरोध अक्सर पैदा होने से पहले ही मर जाता है। कविता की प्रत्येक पंक्ति इसका प्रमाणिक दस्तावेज़ीकरण करती है। इसमें व्यक्ति मन से लेकर सांविधानिक माननीयों तक की दुनिया के डर वर्णित हैं। डर निपटान के प्रबंध संकेत रूप में चित्रित हैं। डर की बारिकियां कविता को प्रभावी के साथ-साथ अध्ययन-विश्लेषण के लायक बनाती है।

कविता के शीर्षक के नीचे 12 जुलाई 1976 की तारीख़ पहली बार में सोचने को विवश करती है कि देशकाल में आखिर क्या बदलाव हुआ ? कुछ भी तो नहीं। यदि देश में आज़ादी और अभिव्यक्ति अधिक ख़राब होते गये तो बिल्कुल आज का नागरिक बयान 12 जुलाई 1976 की तारीख़ में कैसे दर्ज़ होता है ? हमारी नागरिकता पीछे जा रही है या राजसत्ता आगे खिंच आयी ? राज व्यवस्था के लगातार भयावह होते जाने, बुरा वक्त आ गया कि वे सब चेतावनियाँ कहाँ हैं ?

जैसा कि कहा, यह पहली बार का मोटा-मोटी सोचना ही है। अधिक सोचने पर 1975 के राष्ट्रीय आपातकाल की याद आती है। तब पता चलता है कवि ने अपने दौर के हालात को केवल दर्ज़ किया था। संभव है कवि विष्णु खरे ने इस यथार्थ का काव्य दस्तावेज़ीकरण करते हुए यही सोचा हो कि इस घोर समय की स्मृति दर्ज़ होनी चाहिए। ताकि सनद रहे। साहित्य समाज या जन समाज भूलने की मार से बच-निकल पावे। कवि किसी अधिक भयावह भविष्य की आहट पाकर कविता को कालजयी बनाने का उपक्रम कर रहा था ऐसा सोचना बचकाना होगा। कविता में आत्मालाप सी पीड़ा अपने ही समय की सूचक है।

कविता ‘डरो’ को पढ़ते हुए बिल्कुल नहीं लगता कि इसमें नागरिक समाज का आज का कोई डर मसलन मॉबलिंचिंग को ही ले लें जोड़ देने से यह विशेष रूप से 2021 की काव्य स्मृति बन जायेगी। बल्कि गौर करें तो यह उद्घाटित होता है कि इसके डर में आज की मॉबलिंचिग की प्रायोजित हत्याएं और उसके प्रतिरोध के डर भी कविता के अभिप्राय में समाहित हैं। नि: संदेह यह 2021 के डरों को भी घनीभूत रूप में प्रकट कर रही है। 2021 में लिखे जाने पर करती या नहीं इस विषय में कहना मुश्किल है। बल्कि यह खुशी होती है कि कविता डर की महास्मृति और समकाल दोनो है। कविता की दीर्घजीविता का यही रहस्य है। कविता डरो जेब में रख लेने लायक है।

अब प्रश्न उठता है, क्या 2021 में भी कोई राष्ट्रीय आपातकाल है ? उत्तर है, आज तक इसकी घोषणा नहीं हुई है। यह कह सकते हैं 2021 में भी निर्वाचित सरकार पिछले कई साल से भारत को हर संभव जल्द से जल्द हिंदू राष्ट्र देखना चाहती है। कोरोना महामारी की आपदा से अवसरों में एक यह अवसर भी हासिल किया जाना प्रतीत होता है। पूरी तैयारी दिखती है। कोशिश है इस निर्माण का विरोध करने वाले स्वर मज़बूत-संगठित न होने पायें। लगता तो यही है कि यह असंभव है लेकिन इस असंभव की आकांक्षा से बहुत सी बातें निकल रही हैं, देश बदल रहा है। क्योंकि भारत धर्मनिरपेक्ष संघ गणराज्य है। 

एक धर्म निरपेक्ष संघ गणराज्य के सरकार प्रमुख चाहते हैं कि भारत हिंदू धर्म-राष्ट्र बने। ऐसा वह घृणा में नहीं लोकतांत्रिक कृतज्ञता-कर्मठता में चाहते हैं। क्योंकि वे ऐसी ही चाह वाले आंदोलनों से सरकार बनाने वाले लगभग अपराजेय दल बन सके हैं। उनके खाने के दाँत औऱ हैं दिखाने के और। उनके मुँह में सबका साथ सबका विकास है बगल में हिंदूराष्ट्र। यही करण है कि जानकार मानते हैं, आज परिस्थितियाँ आपातकाल से भी बदतर हैं। क्योंकि देश में बोलने वालों और असहमति रखने वालों की नागरिकता, सत्यनिष्ठा और देशभक्ति पर कभी भी सवाल उठ सकते हैं।

कमाल देखिये, सत्तारूढ़ दलों के सरकार प्रमुखों की निजी महत्वाकांक्षा हिंदू राष्ट्र के जो डर को अमोघ अस्त्र की तरह इस्तेमाल करती है सामने आते ही किस प्रकार एक कविता 1976 को इतिहास से निकालकर सामाजिक का 2021 बना देती है। कहना चाहिए सचेत कवि इस सार्वजनीनता को हमेशा पहचानता है। लिपिबद्ध करता है ताकि डर पैदा करने वाली ताक़त को पहचानने में चूक न हो। समय कोई दूसरा हो सकता है। आश्वासन विकास का भी हो सकता है दमन का फल देने वाला। जिसके बारे में जनता इतना ही जानती है, यही होता है। यही होता आया है। किसी का राज हो। यहीं कविता व्याख्या से अधिक सुनाये जाने की अधिकारी बन जाती है।

‘डरो’ कविता सुनते-पढ़ते हुए आप भी ध्यान दें क्या-क्या लगता है-

डर क्यों लगा कि बोल दिया ? नहीं बोलते तो किसके पूछने का डर था मुँह क्यों नहीं खोलते ?

क्या सुना कि अपने कान देने से डर गये ? ऐसा-इतना सुनने को क्यों है कि नहीं सुन पाये तो ग्लानि होगी ? कौन पूछेगा सुनते क्यों नहीं ? क्या बहरे हो ?

कौन हैं कर्ता-धर्ता ? कितना हृदय विदारक फैला है कि लगता है मेरे साथ भी हो जायेगा अगर देख लिया ? न देखो तो किनके लिये डर है गवाही देकर बचा लेने लायक कैसे मुँह बचा रहेगा ?

ऐसा क्या सोचते हो जो दिल में है मगर चेहरे पर लाने से डरते हो ? चेहरे पर आ गया सोचना तो किस बात का डर है ? चेहरा सम्हाल लेने पर और अधिक सोचने की परीक्षा से क्यों गुज़रना पड़ेगा ?

क्या पढ़ने लगे जिसे सबके सामने नहीं पढ़ते ? किताबों के ख़िलाफ़ कौन गवाही देंगे ? नहीं पढ़ते दिखना भी ख़तरनाक क्यों है ? क्यों पढ़ने की तलाशी ली जायेगी ?

किसको लिखने से डरते हो ? मनचाहे अभिप्राय निकालने वाले सत्ता में कैसे हैं ? शिक्षा विमुख कैसे है ? दूसरी पहचान थोपने के काम क्यों आती है ?

तुम डरते हो ? क्यों डरते हो ? डर तो कोई है नहीं अब। क्यों डरते हो का डर कौन ला रहा है ? नहीं डरने वालों को आदेश क्यों मिलेगा डर ? डर वरना जेल में सड़।

अंत में कहा जा सकता है कि कविता केवल डर नहीं बताती बल्कि ऐसे सवाल पूछती है जिनके जवाब देने वाले का डर ख़त्म हो जायेगा। कविता ‘डरो’ डर के वर्णन की कविता नहीं है। कविता का लक्ष्य है डर को डराने वाली सत्ता के मुँह पर दे मारो। डर पर जीत की प्रखर कविता है ‘डरो’। पूरी कविता इस प्रकार है-


डरो
(12 जुलाई 1976)


कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो

सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाज़िमी तो नहीं था

देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे

सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें

पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो तलाशेंगे क्या पढ़ते हो

लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नयी इबारत सिखायी जाएगी

डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुकुम होगा कि डर

सेतु समग्र : कविता, विष्णु खरे
संपादक : मंगलेश डबराल

शनिवार, 5 जून 2021

पत्रकार-बुद्धिजीवी सफ़ाई वाला बनें

मैं कम पढ़ा-लिखा रह गया। इसका बड़ा अफ़सोस है। इसके दो कारण हैं। जीवन की शुरुआत में पढ़ाई के उतने साधन नहीं थे। बाद में जब शिक्षा के साधनों तक पहुंचा तब तक दुनिया में इन्टरनेट आ गया। मेरे नौकरी करके जीने का समय हो गया। मीडिया और सोशल मीडिया ने मिलकर मेरे पढ़ने-जानने के लिए उड़ने वाले पंख कतर दिए। जो काम मजबूरी न कर पायी थी उसे कथित सुविधा ने कर दिखाया। अब मैं ज़्यादातर पोस्ट बराबर पढ़ता हूँ और ट्वीट बराबर लिखता हूँ। यह आत्महंता लत है।

लेकिन मैं मानता हूँ किसी भी भाषा-देश के पत्रकार को बहुत पढ़ा-लिखा इंसान होना चाहिये। मेरे ख़याल से पढ़ने-जानने का पत्रकारिता से सम्बन्ध ऐसा है कि आप एक सीमा से आगे जैसे ही जानेंगे आप पत्रकार होते जाएंगे। जाने और ख़ुलासा न करे अथवा जाने और शासन न करना चाहे ऐसा इंसान के साथ कम ही होता है। साहित्य का सम्बंध अनुभूति से है मगर पत्रकारिता का सम्बंध जानने से है। जिस साहित्य में जानना अधिक हो उसे पत्रकारीय साहित्य भी कह सकते हैं। हालांकि यहां पत्रकारीय साहित्य कहकर साहित्य का अवमूल्यन करना मेरा उद्देश्य नहीं। मूल बात पर लौटते हैं। जैसे अनुभूति विवश कर देती है जानना भी बेचैन कर देता है।

तुलना करने की छूट मिल जाये तो कहूँगा आप अनुपम मिश्र से अच्छा उनसे आगे का पत्रकार तभी हो सकते हैं जब उनसे अधिक समझने-जानने लगेंगे। नल बन्द करने की जागरूकता और पृथ्वी के जल की चिंता में धरती आसमान का अंतर है। हालांकि कोई मसखरा कह सकता है कि आपको अनुपम मिश्र से बड़ा पत्रकार बनने के लिए उनसे बड़ा गांधीवादी होना पड़ेगा। हालांकि इस मसखरी में भी एक संदेश होगा। गांधी जैसे मनुष्य समाज के लिए जल जितने ही ज़रूरी हैं। कोई अधिक सयाना यह भी कह सकता है, श्रेष्ठ पत्रकार होने के लिए सन्त होना आवश्यक नहीं। वेद प्रताप वैदिक भी अच्छे पत्रकार हैं।

एक विचित्र कम पढ़े लिखों जैसा ही उदाहरण दें तो कह सकते हैं पत्रकार होना जानने के बल पर सफ़ाई वाला होना है। जैसे शरीर के बल पर सफ़ाई वाला मनुष्य होना। कब कहाँ किस नाले, मैनहोल, गन्दगी में उतरना पड़े पता नहीं। इनकार का कोई स्थान नहीं। साधन के नाम पर अंततः बच्चों के दूध की क़ीमत पर खरीदी गयी सिर्फ़ सस्ती शराब की बेहोशी का सहारा। जीवन में कुछ नहीं केवल ज़िंदा रहने भर की मजदूरी और कभी भी मर जाने का स्वीकार। सोचिए कितने गन्दे समाज होंगे जहां के महा नगरों में सफ़ाई वाले गंदे और घृणा तथा मृत्यु के सन्निकट रखे जाते हैं !

आमतौर पर पत्रकार को बुद्धि बल से इशारे या पूछकर सफ़ाई कर देने वाला माना जाता है। मगर कम लोग हैं जो जानते हैं किसी प्रकार की सफ़ाई के लिए अपना मोह छोड़ना पड़ता है। सफ़ाई का यहां मतलब सफ़ाई से ही है, सफाया नहीं। पत्रकार स्वतंत्र मष्तिष्क, आत्मनिर्भर, सफ़ाई वाला होता है। तभी वह समाचार से समाज -संसार में स्वच्छता ला सकता है।

मैं जब बड़े-बड़े पत्रकारों को देखता हूँ तो मुझे वे नगर निगम के सफ़ाई कर्मचारियों के कम पढ़े लिखे अधिक बलिष्ठ सरदार नज़र आते हैं। जिन पर शासन और शोषण तथा क्रूरता का टनों सदियों पुराना बोझ होता है। इन सरदारों के रहते शहर में गंदगी का क्या आलम होता है आप जानते ही हैं। कभी-कभी आपने देखा होगा ये नाला साफ़ कर सड़क में ही कूड़े की मेड़ बना देते हैं। कहना चाहिए कम पढ़े लिखे बड़े पत्रकार लढ़े अधिक होते हैं। वो कहावत है न, पढ़ा कम लढ़ा ज़्यादा।

अजीब लगेगा। मूर्खता पूर्ण लगने की अधिक संभावना है फिर भी कहूँगा, बिना सर्वाधिक जाने सन्त हुए आप पत्रकार या बुद्धिजीवी नही हो सकते। माफ़ करें सन्त होने का मेरा अभिप्राय महान बनना नहीं है। बल्कि एक ऐसी जीवन शैली अपनाना है जिसमें स्वस्थ और करुणावान रहते सफ़ाई जैसा काम प्रेमपूर्वक मेहनत से और लगातार किया जा सकता है।

यह सन्तोष की बात है कि हिंदुस्तान अच्छे पत्रकारों का देश रहा है। लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि आजकल पत्रकारों में सरदार ही सरदार नज़र आते हैं। मीडिया हाउस समाचारों के बूचड़खाने हैं। पत्रकार होकर लोग नागरिकों, राजनीतिकों से भी कम पढ़े लिखे हैं। पढ़ाई बहुत ज़रूरी है। इससे मनुष्यता आती है। उस देश की शिक्षा का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं जहां कम पढ़े-लिखे पत्रकार अंत में राज्यसभा पहुँचकर ही अपनी नासमझी छुपा पाते हैं।

मैं जानता हूँ पत्रकार मेरी इन बातों पर बाज जैसे टूट पड़ें अगर वे मान लें मेरे प्रसिद्ध हो जाने अथवा न होने से अधिक ज़रूरी है ऐसे उपदेश का विरोध जिसमें दावा हैसियत से ज़्यादा है। मगर ऐसा कुछ नहीं होगा। मेरी बातें वाक़ई कम पढ़े लिखे इंसान के मन की बाते हैं। केवल शीर्षक को अति आत्मविश्वास वाली थोड़ी चतुराई दे दी गयी है। कोई बात नहीं।

आप केवल इतना ध्यान रखें चीज़ गन्दी हो जाये तो उसे साफ़ कर देना चाहिए। इंसान बदला न जा सके तो उसे हरा देना चाहिए। सफ़ाई भी लड़ाई है। गंदगी की सफ़ाई करें। गंदगी फैलाने वालों से लड़ें भी। सबसे अधिक ज़रूरी है सफाया करने वालों से धरती की सफ़ाई। लोकतांत्रिक फ़ासीवाद और धार्मिक राष्ट्रवाद गंदगी हैं। इसे साफ़ करने के लिए आगे आएं और पत्रकार-बुद्धिजीवी बनें। धन्यवाद !


शशिभूषण

रविवार, 25 अक्तूबर 2020

नवीन सागर एक बड़ी कहानी जैसे हैं, जिसका एक टुकड़ा हमने बयान किया; बाकी टुकड़ा कोई दूसरा बयान करेगा

“अभी बेड रेस्ट पर हूँ। रेस्ट तो बेड ही कर रहा है मैं तो उस पर एक बीड़ी के लिए तरसती हुई घुटन सा पड़ा हूँ। माँ आ गयी है। जो दिन में पच्चीस बार मेरे कमरे में डरकर झाँकती है। वे भगवान से नाराज़ हैं। कि उन्हें कभी कोई बीमारी नहीं हुई जबकि उनके बेटों को कुछ भी हो जाता है।” एक पत्र में नवीन सागर। 

ऊपर ही उपर से देखने पर उपर्युक्त पत्रांश ममता की जीवनी है। माँ होने की करुणा। लेकिन हिंदी साहित्यिक जगत में यह माँ, हिंदी कहानी है। नवीन सागर कहानीकार। इससे अधिक क्या कहा जा सकता है कि नवीन सागर (29 नवंबर 1948 – 14 अप्रैल 2000) का पहला कविता संग्रह ‘नींद से लंबी रात’ उनके जीवन के 48वें साल 1996 में प्रकाशित हुआ। कहानीकार (पहला संग्रह ‘उसका स्कूल’ 1989) के रूप में आज उनका कहीं नाम नहीं लिया जाता। जबकि अनेक कुलेखकों की कट्टा भर किताबें प्रकाशित हैं। कई अलेखकों के घर पुरस्कारों से भरे हैं। यह अनायास ही होगा कि जिन्होंने नवीन सागर को पढ़ा होगा फिर चाहे कविताएँ हों या कहानियाँ उन्हें मुक्तिबोध, रेणु और स्वदेश दीपक की याद आ जायेगी। रेणु को अपना उपन्यास ‘मैला आँचल’ खुद छपवाना पड़ा। कालांतर में उन्हें आंचलिक कथाकार के अकादमिक बस्ते में डाल दिया गया। स्वदेश दीपक का कहीं कोई समाचार नहीं है कि वे अब कहाँ हैं ? मुक्तिबोध के बारे में यह तसल्ली की बात हो सकती है कि साहित्य-समाज कम से कम जानता तो है कि उनके साथ क्या-क्या हुआ ! यहीं यह दर्ज़ करना उपयुक्त होगा कि कहानीकार नियति में मुक्तिबोध और नवीन सागर में मार्मिक साम्य है। आज तक मुक्तिबोध को कहानीकार की तरह नहीं पुकारा जाता जबकि उन्होंने नयी कहानी के दौर के किसी कहानीकार से कम यादगार कहानियां नहीं लिखीं। यही कहानीकार नवीन सागर के साथ है। बतौर लेखक नवीन सागर की पहली महत्वपूर्ण किताब ‘उसका स्कूल’ कहानी संग्रह ही है। इस संग्रह की कहानियाँ सत्तर-अस्सी के दशक के किसी हिंदी कहानीकार की कहानियों से कमतर नहीं हैं। बल्कि कहना चाहिए कि नवीन सागर के कहानीकार की उपेक्षा का उनके समकालीन कहानीकारों को फ़ायदा ही मिला। नवीन सागर की कहानियों की भूमि वाली उनसे कमज़ोर कहानियाँ चर्चा में बनी रहीं। 

नवीन सागर ऐसे हैं भी कि अगर उनकी कविताओं का ध्यान करें तो कहानियों के बारे में मन चला जाता है। अगर कहानियों पर राय बनाने बैठें तो कविताएं दोहराने का दिल हो आता है। कहीं जो कविता कहानी दोनों के विषय में खुद को समेटने के प्रयास में बैठें तो उनका बाल साहित्य और चित्र आमंत्रित करने लगते हैं। इतना ही नहीं इंसान नवीन सागर का प्रेम, मैत्री, सपने, बड़प्पन, परिश्रम अपने जादुई प्रभाव में ही खींच लेते हैं। हृदय में लालसा भर जाती है काश ! हम भी नवीन सागर हो पाते। कुछ-कुछ हम भी ऐसी ही फितरत वाले हैं हाय पूरे ही नवीन सागर क्यों न हुए! वैसे ही सुदर्शन होते। वैसे ही दोस्त, प्रेमी, पिता और मेज़बान हो पाते। नवीन सागर को कम उम्र मिली तो क्या हुआ जीवन-लेखन ऐसा ही जिजीविषा-संवेदना से भरा होना चाहिए। कमाल की बात यह है कि यह सब मेरे भीतर की फीलिंग्स हैं। मैं नवीन सागर से कभी मिला नहीं। मैंने नवीन सागर को कभी दूर से भी नहीं देखा। बल्कि कहिए नवीन सागर यह नाम ही मैंने उनकी मृत्यु के 10 साल बाद सुना। लेकिन जब सुना, पढ़ा और जाना नवीन सागर मेरी आत्मा के मित्र हो गए। इस प्रेम में डूबते चले जाने में जिन लेखकों व्यक्तियों का बड़ा हाथ है उनमें से कुछ के नाम हैं- विष्णु खरे, कमला प्रसाद, ज्योत्सना मिलन, उदय प्रकाश, विष्णु नागर, राजकुमार केसवानी, मुकेश वर्मा, विनीत तिवारी, प्रयाग शुक्ल, समता सागर, और स्वयं नवीन सागर का रचना संसार। 

विरले साहित्यकार हुए हैं जिन्होने कविता, कथा, बाल साहित्य, चित्रकला चारों प्रकार की मिट्टी में अपने लेखकीय श्रम, कला प्रतिभा, रचनात्मकता और प्रतिबद्धता से संवेदना, मनुष्यता, सौंदर्य, शिल्प, प्रयोग, व्यंजना का हरापन पैदा किया, भावत्मकता को सींचा और उसे विचार पुष्ट लहलहाया है। जाने-माने कवि समीक्षक विष्णु खरे नवीन सागर के बारे में लिखते हैं- “यदि हम मुक्तिबोध को सूर्य मानें और शमशेर बहादुर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल और नवीन सागर को उनसे अपने-अपने तरीक़े से ऊर्जा पाने वाले ग्रह तो हम पायेंगे कि स्वायत्त होते हुए भी, शमशेर अपनी परिक्रमा में मुक्तिबोध के सबसे नज़दीक आ जाते हैं, विनोद उनसे कम और नवीन विनोद से भी कम।“ विष्णु खरे अपनी इसी बात को अधिक स्पष्ट करते हुए फिर एक जगह लिखते हैं- “मुक्तिबोध और नवीन सागर को परस्पर समकक्ष ठहराना दोनों के प्रति एक मूर्खतापूर्ण अन्याय होगा लेकिन निम्नमध्यमवर्गीय विपन्नता, यंत्रणा, असुरक्षा, आतंक और अकेला कर दिए जाने को दोनों अपनी कविता में मार्मिक रूप से लाते हैं।“ 

किसी कहानी की इससे बेहतर समीक्षा नहीं हो सकती कि उसे सुना दिया जाये। कहानी सुनाने में अगर यह प्रयत्न शामिल हो कि कहानी बिल्कुल वैसे ही सुनाई जाये जैसी कि वह है यानी कहानी का कोई संकेत, मंतव्य और मर्म छूटने न पाये तो कहने की ज़रूरत नहीं कि कहानी भूलने लायक नहीं है। यदि कहानी सुनाने की यह अभिलाषा और लालसा किसी ग़ैर पेशेवर वाचक, आलोचक, नागरिक, शिक्षक और पालक में मिले तो समझिए कहानी सफल है। अकादमिक जगत में, आलोचकों की दुनिया में उस कहानी का चाहे जो मूल्यांकन होता हो या फिर हुआ ही न हो फिर भी वह कहानी बड़े काम की है। ऐसी कहानियों की ज़रूरत समाज को हमेशा पड़ती है। बल्कि कहना चाहिए ऐसी कहानियों से ही समाज अपने भीतर झांकता है। बदलाव लाता है। इसे मज़बूती से कहना चाहिए कि नवीन सागर के पास ऐसी सुनाने की आकांक्षा पैदा करने वाली कहानियों की संख्या ही अधिक है। उनके पास अविस्मरणीय कहानियों की संख्या भी उन कहानीकारों से कम नहीं हैं जिन्होंने सत्तर-अस्सी के दशक में कहानीकार की प्रसिद्धि हासिल की। इतना ही नहीं नवीन सागर की कहानियाँ पढ़ते हुए अमरकांत, विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश, स्वयं प्रकाश, शिवमूर्ति की बरबस याद आती रहती है। कहीं-कहीं भावनात्मक रूप से लगता है कि नवीन सागर ऐसा ही चमकता कहानी का एक नक्षत्र था जो असमय आसमान से टूट गया। मृत्यु ने इस गहरी नवीन कथायात्रा को बीच में ही रोक दिया। यद्यपि नवीन सागर का एक ही कहानी संग्रह ‘उसका स्कूल’ जानने में आता है। लेकिन उनकी जो कहानियाँ पढ़ने के बाद हमारे मन में टंक जाती हैं और अपने वक्त को पहचानने के लिए हमें दृष्टि देती हैं उनमें से कुछ के नाम हैं- उसका स्कूल, मोर, पत्थर, घोड़ा का नाम घोड़ा, तीसमार खाँ, लौटा तो कहीं नहीं, मूँछ, माँ, अंतहीन, हत्यारा, किसी की शक्ल, बोझ, घर, क्षेपक, अपनी ज़मीन और सत्यकथा। किसी एक संग्रह वाले कहानीकार की इतनी महत्वपूर्ण कहानियों की फेहरिश्त समय-समाज की ही नहीं हिंदी कहानी आलोचना की कहानी भी कहती है। 

इससे पहले कि नवीन सागर की कुछ उल्लेखनीय कहानियों की विवेचना करें उनकी कहानियों की उन विशेषताओं का उल्लेख आवश्यक है जिनसे यह जानने में आसानी हो कि नवीन सागर की कहानियां कैसी हैं- 

1. नवीन सागर की कहानियों में फैंटेसी मिलती है। यह फैंटेसी कहानियों के देशकाल को विस्तृत कर देती है। इन्हें पढ़ते हुए मुक्तिबोध की याद आना स्वाभाविक है। 

2. नवीन सागर की कहानियों में प्रतिबद्धता और विचार वैसे ही हैं जैसे कुम्हार की सानी हुई मिट्टी से बने बर्तन में रूप। कहना मुश्किल ही रहेगा कि बर्तन का यह रूप पानी से मिला, चाक से, मिट्टी से, हाथों से या फिर आंवा की आग से। 

3. संवेदना, उसूल और सुधार नवीन सागर की कहानियों के केंद्र में हैं। शायद ही कोई ऐसी कहानी मिले जिसके कथा चरित्रों से हमारी संवेदना का रिश्ता न बन जाये। 

4. नवीन सागर की कहानियों की भाषा में काव्यात्मकता वहीं है जहाँ काव्यात्मक स्थल हैं। संवाद ऐसे हैं कि यकीन हो जाता है जीते जागते इंसानों की बातचीत चल रही। बिल्कुल वैसा ही टोन, विट और ह्यूमर। 

5. यथार्थ को नवीन सागर ने कहानियों में वैसे ही बरता है कि उनकी कहानियाँ बिल्कुल यथार्थ लगती हैं लेकिन यथार्थ की मात्रा उतनी ही है जैसा कि नामवर सिंह कहते हैं कि यथार्थ नमक की तरह होता है उसे कहानियों में वैसे ही इस्तेमाल करना चाहिए। 

6. नवीन सागर की कहानियों में व्यंग्य नहीं मिलेगा लेकिन भाषा हँसमुख मिलेगी। कहीं कहीं इतनी विनोदिनी भाषा कि हँसते–हँसते पेट में बल पड़ जायें। मन निर्मल हो जाए। इसी बीच आँखों के कोर भी भीग जायें। 

7. मनुष्यता, बराबरी, न्याय, प्रेम, मैत्री, सहकार और परिवर्तनकामना नवीन सागर की कहानियों में सहज मिलते हैं। मर्म, व्यंजना और चोट की अप्रतिम कहानियों के कृतिकार हैं नवीन सागर। 

8. नवीन सागर की कहानियों में आज की हिंदी कहानी में लगभग अनुपस्थित किस्सागोई मिलती है। 

‘उसका स्कूल’ नवीन सागर की कुछ-कुछ वैसी ही मार्मिक कहानी है जैसी स्वयं प्रकाश की ‘बलि’, शिवमूर्ति की ‘केशर कस्तूरी’ और प्रकाशकांत की ‘अमर घर चल’। चूँकि कोई भी दो कहानियाँ एक सी नहीं होतीं इसलिए कुछ-कुछ वैसी ही कहने का अभिप्राय यह है कि इस कहानी में आयी व्यवस्था विडंबना, सामाजिक निरुपायता और मानवीय दुख बोध भी वैसे ही हैं। ‘उसका स्कूल’ एक घरेलू नौकरानी की बच्ची की कहानी है। बाई, मालिक के आग्रह पर जो प्रोफेसर हैं अपनी बच्ची को उनके घर में बच्चों की देखभाल के लिए भेजना शुरू कर देती है। प्रोफेसर की पत्नी को नयी नयी नौकरी मिली है। उसके सामने शर्त है कि वह नौकरी छोड़ दे या कोई छोटे बच्चों की देखभाल करे। नौकरानी की बच्ची इसके लिए तैयार नहीं है। वह स्वयं स्कूल जाना चाहती है। उसे स्कूल प्यारा है। बच्ची की माँ उसे मनाती है। बच्ची बेमन से जाती है। एक दिन वह अपना बस्ता भी ले जाती है। वहाँ उसकी किताबें फट जाती हैं। बच्ची रोती है। माँ को बताती है। माँ उसे डाँटती है -बस्ता लेकर क्यों गयी ? बच्ची के मना करने के बावजूद मजबूर माँ बेटी को प्रोफेसर के घर बच्चों की देखभाल के काम में भेजती है। इसी में बच्ची का अपना स्कूल छूट जाता है। बच्चों की देखभाल में लगाये जाने के कारण किसी बच्ची का स्वयं पढ़ न पाना, अभिलाषा के बावजूद उसके स्कूल छूट जाने की यह कहानी पढने-सुनने वाले का मन भिगो देती है। यहीं ऊपर की वह बात दुहराई जा सकती है कि सुनाने लायक कहानी है ‘उसका स्कूल’। जो पढ़ेगा, सुनाना चाहेगा। जो सुनेगा, वह समझ लेगा। कहानी भीतर रह जायेगी। स्कूल न जा पा रही बच्ची बार-बार याद आयेगी। यहीं लगता है नवीन सागर बच्चों का मसीहा कथाकार है। आज शिक्षा और बच्ची की माँ में कोई अंतर नहीं। 

‘घोड़े का नाम घोड़ा’ ऐसी प्यारी कहानी है कि जान फूँक दे। ऐसा गुदगुदाए कि मनहूस भी हँस पड़े। कठोर से कठोर हृदय इंसान भी बच्चों पर जान छिड़कने लगे। कहीं कोई अपने बेटे-बेटी से दूर रहता हो तो रो ही पड़े। इस कहानी की भाषा और मर्म जहाँ एक ओर रवींद्र नाथ ठाकुर की याद दिलाते हैं तो दूसरी ओऱ मन्नू भंडारी की। कहानी क्या है बाल-किशोर मन, खिलौनों, बचपन, भाई-बहन, माँ-बाप, पास-पड़ोस, बालश्रम, सख्य भाव और स्मृतियों की करुणा भरी हिरनी है। जिसके साथ-साथ मन दौड़ता जाए मगर थके-भरे न। अंत में पछताए हाय ओझल हो गयी। कहानी की शुरुआत से पहले ही दर्ज़ नोट मानीखेज है- यह दुनिया एक बड़ी कहानी जैसी है, जिसका एक टुकड़ा हमने बयान किया। बाकी टुकड़ा कोई दूसरा बयान करेगा। ‘घोडे का नाम घोड़ा’ मूलत: एक लड़की की कहानी है जो खिलौने बनाकर बेचने वाले लड़के से एक घोड़ा खरीदती है। वह जैसे ही घोड़ा घर लाती है भाई उसे पाना चाहते हैं। पड़ोस की एक प्यारी लड़की उसे लेना चाहती है। मगर घोड़ा लड़की को बहुत प्रिय है। लेकिन एक दिन ऐसा होता है कि उसे वह घोड़ा पड़ोस की दोस्त लड़की को देना पड़ता है। आगे की कहानी इसी खिलौना घोड़े के साथ साथ एक पूरी प्यारी स्मृति का चक्र पूरा करती है। घोड़ा खरीदने का यह शुरुआती अंश ही कहानी की सामर्थ्य, प्रभाव का पता देता है- 

वह विनती करता सा बोला, “दोनो ले लो, नहीं तो जोड़ी टूट जायेगी।” 

मैंने कहा, “जोड़ी टूट जायेगी तो क्या अकेला घोड़ा तुम्हारे पास रोयेगा ?” 

वह बोला, “एक आपके पास भी रोयेगा।” 

मैंने कहा, “मैं उसके आँसू पोंछ दूँगी।” 

वह मुस्कुराने लगा तो देखा उसके आगे के दो दाँत नहीं हैं। 

मैंने पूछा, “तुम्हारे दो दाँत कहाँ गये ?” 

वह बोला, “मैं जब सो रहा था चूहे ले गये।” 

अच्छा ! मैंने कहा, “बाकी दाँत क्यों छोड़ गये ?” 

वह हँसकर बोला, “वे जल्दी में थे पिर कभी आकर बाकी भी ले जायेंगे।” 

‘मोर’ नवीन सागर की ही नहीं हिंदी की मील का पत्थर कहानी है। इसके बारे में आलोचक कमला प्रसाद ने बिल्कुल ठीक लिखा है- ‘मोर’ यथार्थ की कालातीत गाथा है। वे आगे लिखते हैं ‘यह विजयदान देथा की कथा परंपरा की याद दिलाती है। मोर लोक की वाचिक परंपरा से अपना शिल्प गढ़ती हुई अपने प्रभाव को लोककथा के प्रभाव के समकक्ष निर्मित कर लेती है।‘ इस कहानी में हिंदी कहानी की लुप्त होती पठनीयता और किस्सागोई है। संभवत: ‘मोर’ आपातकाल के दौर को बयान करती हिंदी की सबसे सशक्त प्रतीकात्मक कहानी है। इस कहानी का थानेदार पुलिसिया क्रूरता, हिंसा, हत्या का चरम निष्करुण रूप संभव करता है। यद्यपि कहानी का नायक अमर लोक नायक ‘मोर’ ही है लेकिन मुख्य पात्र हुल्ले काछी है जो मोर की हत्या का ज़िम्मेदार पुलिस को मानता है। वह थाने जा जाकर जीवन पर्यंत जब तक कि मार नहीं दिया जाता थानेदार को गालियाँ देता है, धिक्कारता है। उसे बार-बार पीटा जाता है, घसीटा जाता है, उसकी पत्नी, उसे भी मार तक दिया जाता है मगर वह यह विरोध-भर्त्सना जीवित रहते नहीं छोड़ता भले थानेदार बदल गये, भले दवा तक के पैसे नहीं, भले अंग-अंग भंग किये गये। कहानी के अंत में उसी कुएँ से जिसमें हुल्ले काछी की गर्भवती पत्नी मरी थी लंबे अरसे बाद बाल्टी में फँसकर एक सांवला बच्चा निकलता है। पूछने पर वह बताता है कि मैं हुल्ले काछी का बेटा हूँ। लेकिन इतना लंबा वक्त गुज़र चुका है कि लोग हुल्ले काछी, थाने सब को भूल चुके हैं। यहीं प्रतिरोध अखंड और सार्वभौमिकता प्राप्त कर लेता है। उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानी ‘टेपचू’ की याद आ जाती है। 

नवीन सागर की कहानियाँ अपने वक्त की सीमा को लाँघकर आज की कहानियाँ लगती हैं। इसका कारण यही समझ में आता है कि कहानीकार ने यथार्थ को समाज, देश, व्यवस्था, नागरिकों, संबंधों, प्रेम, सपनों, बदलाव, सुधार, निर्माण की ऐतिहासिक धारावाहिकता में गलाया है। समाजवादी निष्ठा से भरे कहानीकार नवीन सागर दृष्टि संपन्न कथाकार हैं। उनके कथा कौशल में दृष्टा होना मुख्य है। वे विचार-सिद्धांत का अनुयायी या प्रवक्ता प्रतीत नहीं होते। उनमें दार्शनिक तटस्थता, कलाकार की उदारता और कवि की हृदयस्पर्शिता तथा कहानीकार की कल्पना एवं परकाया प्रवेश सामर्थ्य हैं। जैसा कि अक्सर होता है नवीन सागर की कहानियाँ किसी एक भाव, घटना, दृश्य, विचार, प्रसंग की फोटोग्राफ़ या वीडियो या इतिवृत्त या स्टोरी नहीं हैं बल्कि वे उस किस्सागो के आख्यान की तरह हैं जो जानता है कि कुछ चीज़ें अवश्य बदल जायेंगी लेकिन कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलेंगी। मनुष्य समाज में जो सतत प्रवहमान रहते हैं उस सभ्यता, संवेदना, संबंधों, प्रतिरोध, एकाकीपन, अदम्य मनुष्यता, मैत्री को नवीन सागर की कहानियों में अपराजेय स्थान मिला है। यही कारण है कि भाषा, शिल्प, प्रयोग और किस्सागोई को नवीन सागर ने कभी नहीं छोड़ा। बल्कि वे उसे पुनर्नवा करते रहे। 

नवीन सागर की कहानियाँ ‘पत्थर’, ‘तीसमार खाँ’ और ‘लौटा तो कहीं नहीं’ बीते समय की ही दस्तावेज़ी कहानियाँ नहीं है। आज का भारत जिस हिंसा, बेकारी, नागरिक अकेलेपन, सांस्कृतिक विघटन, लोकतांत्रिक पूँजीवाद, धार्मिक राष्ट्रवाद, धूर्त बड़बोलेपन, उपमहाद्वीपीय स्वप्न भंग की गिरफ्त में हैं उसे डिकोड करने की दृष्टि से भी उल्लेखनीय हैं। मेरे विनम्र मत में देर से ही सही यह नवीन सागर को हिंदी कहानी की चर्चा और बहस में शामिल करने का सही वक्त है। हिंदी के इस अत्यंत महत्वपूर्ण कवि-कहानीकार की चली आती उपेक्षा असह्य है। 

दीपक ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा औऱ बोला, “ सुनाओ जनार्दन” जनार्दन बोला, “सुनो” 


ओ मेरे आदर्शवादी मन 

ओ मेरे सिद्धांतवादी मन 

अब तक क्या किया 

जीवन क्या जिया 

उदरम्भरि बन... 

यहाँ तक आते-आते जनार्दन की जीभ ऐंठ गयी। दूसरे ही क्षण उसने उल्टी कर दी। वह कुर्सी पर गिर पड़ा। फिर कुर्सी ज़मीन पर गिर पड़ी। वह धूल में औंधा पड़ा ओकने लगा। (तीसमार खाँ) 

“दद्दा, गाय विष्ठा खाती है। मंदिर के सामने घूरे बना लिए हैं। माँ-बाप को लात मारते हैं। आप समझते हैं आप ही यह सब भोग रहे हैं। अरे सब भोग रहे हैं।” (पत्थर) 


- शशिभूषण, उज्जैन, म.प्र. 
  मो. 9424624278 
(लमही, कथा-समय विशेषांक अक्टूबर-दिसंबर2019 में प्रकाशित)

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

मुफ़्तख़ोर कौन है ?

कल रास्ते में चौबे जी मिल गए। दुःख भरे खीझ खीझकर कहने लगे, जनता मुफ़्तखोर हो गयी है। जनता को सब मुफ़्त में चाहिए। मैंने पूछा, जनता को क्या मुफ़्त में चाहिए ? उसे मुफ़्त में कौन देता है ? चौबे जी झल्लाए, बनिये मत। आपको इतना भी नहीं मालूम ? जनता को बच्चों की शिक्षा मुफ़्त चाहिए। घर में बिजली मुफ़्त चाहिये। पानी मुफ़्त चाहिए। इतना ही नहीं घर की औरतों के लिए बस ट्रेन का किराया भी मुफ़्त चाहिए। जो जो मिल जाये सब मुफ़्त चाहिए। काम तो कुछ करना नहीं चाहते लोग। मैंने पूछा, मुफ़्त में देता कौन है ? चौबे जी चीखे, आजकल के कुछ देशद्रोही, आतंकवादी नेता। मुझे अचरज हुआ। लेकिन फिर मैं कुछ कुछ समझ गया। मैंने चौबे जी से पूछा, चौबे जी शिक्षा, बिजली, पानी की बात आपको जल्दी समझ में आएगी नहीं। इसलिये उस बात से शुरू करते हैं जो आपको समझ में आती है। चौबे जी ने मुझे तरेरा, क्या कहना चाहते हैं आप ? आप बड़े ज्ञानी हैं ?

मैं : चौबे जी आप चौबे हैं या चतुर्वेदी ?
चौबे : हम चौबे हैं।
मैं : आपके दादा जी चौबे थे या चतुर्वेदी?
चौबे : दादा जी भी चौबे थे। लेकिन हमारे पुरखे चतुर्वेदी थे।
मैं : चौबे होने के लिए दादा जी ने कोई शुल्क दिया था ?
चौबे : कैसे मूर्ख हैं आप ? कुल नाम के लिए कोई फीस देता है?
मैं : क्या आपकी बेटी भी चौबे है ?
चौबे : वह शुक्ला है ?
मैं : ऐसा क्यों ?
चौबे : उसकी शादी हो चुकी।
मैं : शादी दहेज देकर हुई या बिन दहेज?
चौबे : बड़े मनई कोई शादी बिन दहेज करते हैं?
मैं : फिर आपकी बहू चौबे होगी ?
चौबे : हां, बहू चौबे है।
मैं : पहले भी चौबे थी ?
चौबे : पहले दुबे थी।
मैं : बेटे की शादी में दहेज मिला था या... ?
चौबे : क्या हम कंगले हैं जो बिन दहेज बेटा देंगे ?
मैं : चौबे जी आपके घर के लड़कों को सरनेम मुफ़्त है ?लेकिन लड़कियों के सरनेम में लेन-देन जुड़ा है ऐसा क्यों ?
चौबे : आपकी मति भ्रष्ट है तो क्या बताएं ? यह रिवाज़ है।
मैं : फिर तो आपको बहुत कुछ विरासत में मिला होगा ?
चौबे : क्यों नहीं ? घर, ज़मीन जायदाद, सब विरासत में ही तो मिला।
मैं : आप कह रहे हैं कि आपको ज़मीन जायदाद मुफ़्त मिली ?
चौबे : इसे मुफ़्त आप जैसा कोई गद्दार ही कह सकता है।
मैं : नाराज़ मत होइए। रिवाज़ और नियम क्या एक ही हैं ?
चौबे : विरासत भी नियम हैं। रिवाज़ भी क़ानून है।
मैं : अच्छा, क्या नेता भी रिवाज़ बना सकते हैं ?
चौबे : नेता क़ानून बना सकते हैं।
मैं : इसीलिए कोई नेता जनता को बुनियादी चीजें मुफ़्त दे रहा होगा। इससे जनता मुफ़्तखोर कैसे हुई ?
चौबे : आप महा मूर्ख हैं। नेता बाप दादा नहीं होता। वह नेता होता है।
मैं : जनता औलाद नहीं होती; जनता होती है।
चौबे : हाँ।
मैं : कोई नेता जनता को औलाद माने तो ?
चौबे : अच्छी बात है। लेकिन वह जनता को मुफ़्तखोर नहीं बना सकता।
मैं : जनता को मुफ़्त देने में वैसे दिक़्क़त क्या है ?
चौबे : जनता को सब मुफ़्त बांट देने से देश में बचेगा क्या ?
मैं : जनता बचेगी।
चौबे : बाक़ी कंगाल हो जाएंगे। ख़ज़ाना ख़ाली हो जाएगा।
मैं : जनता बचेगी। जनता ख़ुद ख़ज़ाना है।
चौबे : आप बकवास कर रहे हैं। अब आपसे कोई बात नहीं हो सकती। मुफ़्तख़ोरी देश को बर्बाद कर देगी। देश के टुकड़े- टुकड़े कर देगी।
मैं : ख़ुशहाल जनता देश को बनाएगी बचाएगी या शिक्षा, पानी, दवा को तरसती जनता ?
चौबे : आपसे बहस बेकार है। आप असभ्य हैं। नक्सली हैं। टुकड़े टुकड़े गैंग के सदस्य हैं।
मैं : चौबे जी बस कीजिए। पहले अपनी मुफ़्तख़ोरी से बाज आइये। पैतृक संपत्ति के बल पर तीन तिकड़म से थोड़ा बहुत उसमें जोड़कर मूछों में ताव दिए घूमते हैं।
चौबे : चौबे होना मुफ़्तख़ोरी है ? आपसे बड़ा मूर्ख , धर्म का दुश्मन दूसरा कोई मिलेगा धरती पर ?
मैं : सेंत के चौबे लोगों को यही लगेगा।
चौबे : चोप्प ! मुँह बंद रखना अब। हिन्दू विरोधी कहीं के।

आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इसके बाद क्या हुआ होगा। चौबे जी ने मुझे बड़ी भद्दी भद्दी सुनायी। जनता के साथ साथ मुझे भी ज़ाहिल और आलसी कहा। उनका बस चलता तो मुझे मारते भी। लेकिन मैं चुप लगा गया और जल्दी ही वहां से चला आया। मुझे अफ़सोस चौबे जी से गाली खाने का उतना नहीं है जितना उन्हें न समझा पाने का है। चौबे जैसे लोग दरअसल कुछ समझना ही नहीं चाहते। उन्हें जो जो मिला उसे अपना अधिकार, योग्यता समझते हैं। लेकिन जनता को जो नागरिक होने के नाते सरकार से स्वतः मिलना चाहिए उसे मुफ़्तख़ोरी समझते हैं।

चौबे लोगों की यही समस्या है। उनके जैसे नेताओं की भी यही समस्या है। वे जनता को मुफ़्तख़ोर बता कर भी अपने लिए माल मत्ता कमाना चाहते हैं। बल्कि बेशुमार कमा भी लेते हैं। यह गड़बड़ रामायण रुकनी चाहिए। ग़रीब जनता को सरकार से वह सब मिलना चाहिए जो उन्हें पुरखों से नहीं मिला। जिसके लिए वे मोहताज़ हैं। सरकार पालनहार होती है। उसे जनता को पालना पोषना और जोड़कर रखना चाहिए।

- शशिभूषण

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

मोहम्मद गांधी

गांधी जी ने कहा था ?
मेरी हत्या करने के बाद
कुछ लोग कहें- हत्यारा देशभक्त है
दूसरे लोग कहें- हम सुनते गांधी की
गांधी जी ने ही कहा था ?
जो बात तुम्हारे मन की हो
उसे बोलना गांधी ने कहा था
जो मार्ग तुम्हारे दल का हो
उसे कहना गांधी ने बनाया था !

माना सीधे सरल थे गांधी जी
उनमें कपट नहीं था जरा सा
सब उनको अपना सकते हैं
ऐसा उनके हत्यारे भी मानते हैं
जो उन्हें मोहम्मद गांधी कहते थे
मगर क्या इतने भोले थे गांधी जी ?
कि हत्यारे पक्ष से ही कह गए सब !
मर्म समझा गए हिन्दू राष्ट्रवादियों को ही ?

आज लगता है
ठीक कह गए गांधी जी
देश तुम्हारा है
मेरा धर्म अडिग
मुझे मारना चाहते हो
तुम्हारी इच्छा
मार डालो
मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा।

गांधी जी ने दरअसल कहा था
अपने मुँह मरना मरते रहना
मेरी हत्या करने के बाद
खुद मरना बार बार
मेरे पीछे अपनी करनी पर
मेरा क्या है ?
मैंने जो किया जो कहा
उसे भारत का दिल जानता है
मेरा जीवन ही मेरा संदेश है
तब भी था आगे भी रहेगा।

- शशिभूषण

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

हमारी सभ्यता

झूठ विद्या है

जिसमें नहीं विद्या
वह दीन निर्बल वध्य

विद्या हो जिसमें
हार जीत उसकी विद्या

ईश्वर विद्या है
धर्म  विद्या
राम हिंदू की विद्या
अल्लाह मुसलमान की
नरक उस ब्राह्मण की विद्या है
जो अपने लिए कमाता है सवर्ग

दमन राज्य की विद्या
आतंकवाद सत्ताकामी की

धन पद प्रभुता
देश शासन राजभवन विद्या हैं
विधान न्याय दंड भक्ति द्रोह कारागार
जय पराजय और बहुमत विद्या

संस्कार विद्या सम्मान विद्या
सौर से शमशान तक सर्वत्र विद्या

विद्या झूठ है
भ्रम मुक्ति का
यथार्थ है मनुष्यता।

- शशिभूषण

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

राष्ट्रीयता



आँधी आने के आसार थे। सालों बाद मैं घर से लगे खेत पर था। बड़ी-बड़ी सींगों वाली एक भारी भरकम सफ़ेद गाय बाड़ तोड़ती हुई तेज़ी से घुस आयी। उसकी मोटी-मोटी काली सींगों पर पुआल का गट्ठर टँगा था। लगता था गाय उसी लदे गट्ठर को सींग से गिराने-झटकारने बेचैन-हिंसक भाग-दौड़ रही है। गाय दौड़ती हुई महीनों से रखे बबूल की शाखों के परतदार ढेर जिसे मेरी मातृभाषा में 'जरबा' कहा जाता है को ठेलती हुई आगे बढ़ने लगी।

आँधी आ गयी। गाय का वेग तूफ़ानी था। आसमान में गड़गड़ाहट और बिजली चमकना तीव्र हो चले थे। ऊँचे-ऊँचे पेड़ इतना अधिक हिल रहे थे कि लगता था उखड़ जाएंगे। चारों तरफ़ धुंआ, धूल छाए थे। सहसा गाय जरबा उलझारकर बस्ती में घुस गयी। उसकी दौड़ और ताक़त के ज़ोर तथा सींगों के हमले से दीवारें छप्पर गिरने लगे। गाय में असीम शक्ति थी। वह जिधर टूट पड़ती उधर ही सब ढह जाता। हाहाकार मच जाता। औरते और बच्चे डर के मारे रोने चीख़ने लगते। मवेशी खूंटा तुड़ाकर भागने लगते।

मैंने क्या किसी ने अब तक किसी गाय को ऐसी अपरिमित शक्तिशाली, आक्रांता और विनाशकारी नहीं देखा था। शक़ होता था गाय की शक़्ल में यह इस्पात और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से बनी कोई विध्वंसक मशीन है। जैविक श्रद्धेय बुलडोजर। उसकी हाड़ मांस की विशाल पीठ पर लिखा था - 'भारत माता की जय'। वह किसी रिमोट से संचालित यहां घुस आयी थी। नियंत्रित ढंग से बेक़ाबू चल रही थी। लोग बेहाल थे मगर गाय को रोक पाने में अक्षम। खूँटे में बंधी घरेलू वास्तविक गइयाँ भयातुर थीं। उन्होंने अपना यह अवतार पहली बार देखा था। 

मैं गाय के इस विनाशक प्रलयंकारी रूप से त्रस्त और भयग्रस्त था। मां ने मुझे विकल भयभीत निरुपाय देखकर कहा- डरो मत। गाय का विनाश कुछ भी नहीं। आसमान की ओर देखो वहां कुछ लिखा है। मैं पढ़ नहीं सकती। तुम बाँच सकते हो। उस शब्द का अरथ लगाओ। जितना जल्दी हो सके सबको बताओ और सब एक दूसरे का हाथ पकड़कर शैतान गाय की उल्टी दिशा में भागो। मैंने डरकर आसमान देखा। आकाश क्रोध से लाल था। इस तरह क़रीब झुक आया था जैसे ज्वार भांटे वाले भयंकर समुद्र को उल्टा लटका दिया गया हो। चाँद आसमान से भी लाल था। वह बुरी तरह हिल रहा था। लगा थर थर काँप रहा है। मानो आसमान से उसके पैर उखड़ गये हैं। वह टूटकर अभी धरती पर गिर जाएगा। 

मैंने देखा अंतरिक्ष में सब ओर बेताल की तरह एक शब्द उल्टा लटका है - नागरिकता। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था। नागरिकता शब्द इतना भयानक कैसे हो गया ? महीने भर पहले हो चुके एनआरसी में मेरी राष्ट्रीयता सिद्ध हो चुकी थी। मुझे किस बात की अड़चन ? डर और भागने की विवश कोशिश में मेरी नींद टूट गयी। मुझे राहत मिली। अपार ख़ुशी हुई- ओह ! यह सपना था। 

बेटी ऊपर की बर्थ पर आकर मुझे झकझोर रही थी- पापा क्या हुआ ? मैंने उसे पूरा सपना सुनाया। बोला - चलती ट्रेन में सपना देखो तो चाँद हिलता है। बेटी ने चहककर कहा - वाह पापा ! आपने चाँद सपने और ट्रेन के रिलेशन की खोज कर ली आप साइंटिस्ट हैं। हम दोनों हँस पड़े। थोड़ी देर में फिर नींद आ गयी। हमारा गंतव्य अभी घंटों दूर था।

- शशिभूषण

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

कंगना में टैलेंट है वे पायल रोहतगी क्यों होना चाहती हैं ? 



हर दौर में कुछ ऐसी प्रतिभाएं होती हैं जो अपनी लोकप्रियता के सिक्कों को राजनीतिक चाटुकारिता के मंच की सीढ़ियों पर चढ़ा देती हैं। सतही लेखन के चैंपियन चेतन भगत के बाद कंगना राणावत ऐसी ही फ़िल्मी हस्ती हैं। यद्यपि चेतन भगत जो हमेशा लोकप्रियता के ग्राफ़ को देखते सम्हालते मैनेज करते चलते हैं इन दिनों सीएए के विरोध में विद्यार्थियों के आंदोलन को भांपकर सरकार के प्रति थोड़े आलोचनात्मक दिखने की कोशिश में लग गये हैं। शायद उन्हें अंदाज़ा है कि युवा ही उनका असल पाठक है। सी ए ए के विरोध आंदोलन का नेतृत्वकर्ता युवा ही है। लेकिन कंगना राणावत कदाचित अभी भी उस मानसिकता की शिकार हैं जिसमें युवा वर्ग को उग्र, भटक जाने वाला और राजनीतिकों द्वारा इस्तेमाल का बड़ा वर्ग माना जाता है। इसी मानसिकता का दोहन करते हुए सिस्टम के सुर में सुर मिलाना फायदेमंद हो सकता है। 

यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि कंगना राणावत उन सेलेब्रिटीज़ में से एक हैं जो पायल रोहतगी से थोड़ा अधिक जानकार हैं। थोड़ी अधिक कलाकार दिखती हैं। जिन्हें रजत शर्मा जैसे व्यवस्था पोषित पत्रकारों का स्वाभाविक संरक्षण मिल जाता है। कंगना हाल के एक विचित्र साक्षात्कार में अपने प्रोफ़ेशनल भोलेपन के साथ यह समझती कहती प्रतीत होती हैं कि कुछ परसेंट लोग ही इस देश में टैक्स देते हैं। बाक़ी लोग जिन्हें वह दयापूर्वक ग़रीब कहती हैं उनके जैसे हितकारी टैक्सपेयर की टैक्स कृपा पर जीते हैं। अब अगर एनआरसी और सी ए ए के विरोध आंदोलनों में पब्लिक प्रॉपर्टी का नुकसान हो जाएगा तो ग़रीब देशवासियों का क्या होगा ? मानो विश्विद्यालयों के आंदोलनकारी युवा और नागरिक पब्लिक प्रॉपर्टी का नुकसान करने के लिए ही विरोध आंदोलन कर रहे हैं। फिल्मी टैलेंट होने के बावजूद कंगना राणावत को इतना भी मालूम नहीं है कि केवल आय का टैक्स नहीं लगता बल्कि वस्तुओं पर भी टैक्स देना पड़ता है। अगर कंगना किसी रेस्टोरेंट में ताज़ी इडली की एक प्लेट का इलेक्ट्रॉनिक बिल भी देखने लायक कष्ट उठा सकें तो उन्हें मालूम चल जाएगा कि आजकल उसमें भी जीएसटी काटा जाता है। खैर,

अभी आते हैं कंगना राणावत द्वारा किये जा रहे सीएए के विरोध में हो रहे देशव्यापी आंदोलन के विरोध पर। क्या कंगना राणावत बता सकती हैं कि भारत में इतना अबोध कौन सीएए विरोधी आंदोलनकारी युवा या स्टूडेंट है, होगा जो इतना भी नहीं जानता कि सीएए नागरिकता लेने का नहीं नागरिकता देने का क़ानून है ? फिर सवाल उठता है वह सीएए का विरोध क्यों करता है ? वह एक दिन सी ए ए को एनआरसी से जोड़ दिए जाने की आशंका से क्यों आंदोलित है ? क्या किसी क़ानून का विरोध करने वाला इतना नासमझ हो सकता है कि वह क़ानून का विरोध करते हुए उसमें हिंसा करने के दुष्परिणाम को न समझे ? क्या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर कभी सरकारों को झुकाया जा सकता है ? क्या अब भारत के आंदोलनकारियों के पास कंगना राणावत जितनी बुद्धि, अनुशासन और शांति नहीं बचे हैं ? फिर कंगना राणावत टैक्स का उपदेश किसे देना चाहती हैं ? कंगना के राजनीतिक मकसद पिछले कुछ सालों से साफ़ रहे हैं इसलिए मूल विषय पर आते हैं। 

सीएए का विरोध करने का एक ही कारण है कि यह क़ानून भारत के तीन पड़ोसी देशों के शरणार्थियों को नागरिकता देने के सम्बंध में धर्म का विचार करता है। इन धर्मों पर विचार करते हुए वह एक ख़ास धर्म इस्लाम को छोड़ देता है। भारत के मौजूदा संविधान के अनुसार भारत की नागरिकता का आधार सेक्युलर है। अभी तक किसी को भी भारत का नागरिक होने के लिए उसका किसी धर्म का इंसान होना मायने नहीं रखता था। प्रावधान था कि किसी को भी नागरिकता देते हुए यह नहीं इंकार किया जाएगा कि माफ़ करना तुम इस धर्म के हो। नागरिकता देने में इसी उदारता का हामी है भारत का संविधान। कोई भी मनुष्य हो अगर वह भारत की नागरिकता के लिए आवेदन करता है या उसे नागरिकता देने पर विचार किया जाता है तो केवल यह देखा जाएगा कि उसे नागरिकता दी जा सकती है या नहीं यह नहीं देखा जाएगा कि वह किस धर्म का है ? 

कंगना राणावत को आय पर टैक्स से ऊपर जाकर अपनी समझ को दुरुस्त करना चाहिए। वे अभी कम समझती हैं तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि वे मूर्ख हैं या आगे समझने की कोशिश भी नहीं कर सकतीं। हम जानते हैं कि वे शबाना आज़मी जैसी महान अभिनेत्री नहीं हो सकतीं फिर भी हमें दुःख होता है कि कंगना राणावत अपने स्तर को पायल रोहतगी तक क्यों ले जा रही हैं ? उनमें टैलेंट है इससे किसे इंकार होगा ? 

- शशिभूषण

मंगलवार, 18 जून 2019

स्त्री मन से संवाद ‘स्त्रीशतक’


पवन करण के काव्य संग्रह ‘स्त्रीशतक’ को पढ़ते हुए बचपन में सुनी हातिमताई कहानी का एक संवाद याद आता है- एक बार देखा है दूसरी बार देखने की तमन्ना है।

वास्तव में पुस्तक एक बार पढ़कर खत्म कर दी जाने वाली नहीं लगती। यह बार-बार लगातार पढ़ने को बाध्य करती है। इसे सिर्फ़ काव्य पुस्तक कहना भी इसकी व्याप्ति को बहुत संकुचित कर देना है मेरी नज़र में। दरअसल यह किताब की शक्ल में दर्द का अनवरत प्रवहमान एक दरिया है जो सदियों से सदियों तक न थमने के लिए जीवंत हुआ है। पवन करण के भीतर गहरे तक पैठे हुए उस स्त्री-मन को मेरा दिली सलाम जिसने इतिहास, मिथक, पुराण और अध्यात्म में समायी तमाम स्त्रियों की पीड़ा, सिसक, चीख़, पुकार और क्रंदन को सुना और उन्हें वर्तमान का हिस्सा बना दिया। यह स्त्री-मन बहुधा स्त्री लेखकों में भी देखने को नहीं मिलता। ऐसा लगता है कि कवि ‘स्त्रीशतक’ की हर स्त्री की माँ की भूमिका निबाह रहा है। बेटी को कोई कष्ट आने पर माँ को जो छटपटाहट और अकथ दुख होता है वही दुख, संवेदना, चिंता ‘स्त्रीशतक’ की कविताओं में समायी हुई हैं। 

किताब की एक-एक कविता दुखांत गाथा है। यह पुस्तक मुझसे जल्दी-जल्दी नहीं पढ़ी गयी। कारण, यही था कि एक दुख से उबरकर दूसरे में डूबने के लिए मोहलत की ज़रूरत रही। ‘स्त्रीशतक’ की कविताएँ मोहभंग सृजित करती हैं हमारे उन ऋषियों, मुनियों, देवों, तपस्वियों, मनीषियों, राजपुरुषों के प्रति जिनकी वंदना और अनुगमन हमें संस्कारों में मिले हैं। जिन पर आज कोई सवाल तक पूछना ख़तरे से खाली नहीं। यह एक तरह का कवि की चेतस संवेदनशील, मानवीय, आँखों एवं प्रज्ञा से किया गया महान प्राचीनता का स्टिंग ऑपरेशन है उन सभी महापुरुषों के आश्रमों, महलों, झोपडियों, गुफ़ाओं, तपस्थलों, शयनागारों और चारदीवारियों के भीतर का जहाँ स्वप्रतिष्ठा और आत्मसंतोष के लिए स्त्रियां बेची गयीं, खरीदी गयीं, नीलाम की गयीं, दान में दी गयीं, परोसी गयीं, बलात्कृत हुईं, प्रेम, श्रद्धा, साहचर्य में छली गयीं, अपहृत हुईं, बलिवेदी पर चढायी गयीं। यह उन तेजस्वी, वीर, धीर, व्रती, सन्यासी, त्यागी पुरुषों के मन की कालिख को जो समाज के चेहरे पर अदृश्य पुती ही हुई है, जिसे हम आँखों में अंजन समझकर बसाये लगाये बैठे थे या नज़र न लगने के लिए डिठौना बनाये बैठे थे का उद्घाटन है।

स्त्री की पीड़ा तो ‘स्त्रीशतक’ का मूल स्वर है ही उसके भीतर भी पीड़ाओं की अनेक श्रेड़ियाँ हैं जिसमें जातिभेद, वर्गभेद, रंगभेद की यातनाएँ झेल रहीं अलग अलग महिलाएँ हैं। यह प्रचीन भारत के स्त्री मन से संवाद है। यहाँ उन सौ स्त्रियों के नाम गौण हो जाते हैं जिन पर कविताएँ लिखी गयी हैं। क्योंकि उनका दुख प्रमुख होकर सभी स्त्रियों को समदुखिनी बनाकर एक सूत्र में बाँध देता है। 

लोक प्रचलित धारणाओं, प्रथाओं, मान्यताओं एवं श्रेष्ठताओं को खंड-खंड करने वाला हथौड़ा ‘स्त्रीशतक’ लोक चित्त में बसे राम और रावण के व्यक्तित्व को ही उलट-पलट कर रख देता है। राम की बहन शांता का पिता दशरथ द्वारा ऋष्य श्रृंग को यज्ञ दान में दे दिये जाने को राम-सीता द्वारा शांति पूर्वक सह जाना और रावण की विधवा बहन बज्रमणि( शूर्पनखा) को सती होने से भाई रावण द्वारा रोका जाना, उसको प्रेम की स्वतंत्रता दिया जाना, उसके नाक कटी होने के बावजूद ससम्मान घर में रहने देना इन दोनों पौराणिक पुरुषों की लोकमान्य भूमिकाओं पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। मन में सवाल उठता है स्त्री के प्रति किसका आचरण सही है ?

संग्रह की प्रत्येक कविता के अंत में शामिल फुट नोट कवि की अनन्य दक्षता एवं संपादकीय दूरदर्शिता है जो पुराणों से अनभिज्ञ पाठक को भी कविता एवं कथा का हिस्सा बना लेते हैं। इनसे ही पता चलता है कि भारत के ऋषि, मुनि, देव, राजा, और ब्रह्मांड के ग्रह नक्षत्र शुक्र, बृहस्पति, चंद्र, बुध जैसे अनेकानेक पुरुष या तो नाजायज़ रिश्तों के सूत्रधार रहे या स्वयं अवैध संतति। धर्म की आड़ में किस प्रकार प्राचीन काल से पुरुषों ने स्त्रियों का भोग और शोषण किया और इस साज़िश में समूचा ब्रह्मांड शामिल रहा यह इस पुस्तक को पढ़कर ही मैंने जाना।

‘स्त्रीशतक’ प्राचीन भारत का एक्स रे है, वर्तमान भारत का लिंग जाँच करने वाला सोनोग्राफ़ी टेस्ट और भविष्य के भारत की ब्लड रिपोर्ट जो अनेकानेक भयावह संक्रमणों से ग्रस्त है। 

- कविता जड़िया
शिक्षिका, के.वि. उज्जैन

गुरुवार, 30 मई 2019

संसद के लिए शील, शांति, न्याय और पवित्रता सर्वोपरि होने चाहिए

आज भारत की 17वीं संसद पद एवं गोपनीयता की शपथ लेने जा रही है। यह ऐसा अवसर है जब भारत के सभी लोग नव निर्वाचित सांसदों को बधाई एवं आगामी पांच साल के लिए नयी सरकार को शुभकामना देना चाहेंगे। दुनिया भर के जागरूक नागरिक भारत के आज के इस ख़ास दिन को इच्छानुसार अपनी-अपनी डायरी में नोट करेंगे। 

मैं भी समझता हूँ आज का दिन है ही विशेष जब भारत के विभिन्न दलों के सांसद एक साथ मिलकर 17वीं संसद का चेहरा बन जाएंगे। यहीं मुझे लगता है एक बात पर विशेष रूप से विचार करने की ज़रूरत है। अनेक समाचार माध्यमों से यह जानने में आया है कि भारत की 17वीं नव निर्वाचित संसद में लगभग 44 प्रतिशत ऐसे सांसद हैं जिन पर अपराध पंजीबद्ध हैं। इन अपराधों के बारे में कहा गया है कि यह सब प्रकार के हैं। 

जैसा कि दुनिया का चलन है सम्भव है कि इन दागी जनप्रतिनिधियों में से कुछ पर मुकदमें दुर्भावनावश लगाए गए हों जो अदालत में आगे सही साबित न हो पाएं। सम्भव यह भी है कि आगे इन सांसदों में से कुछ का प्रभाव इतना बढ़ जाए कि अपराधों के सबूत छोटे पड़ जाएं। कोई अदालत इन नेताओं को दोषी साबित न कर पाए। सम्भव यह भी है कि माननीय सचमुच दोषी हों। 

सवाल यह नहीं है कि भविष्य में कौन बच जाएगा, किस दल में कम ज्यादा आरोपी हैं और कौन अपने अपराधों की सज़ा पायेगा ? बल्कि सवाल यह है कि क्या यह भारतीय संसद का आदर्श चेहरा है जहां 43 या 44 प्रतिशत निर्वाचित सासंद आरोपी हों ?यदि एक भी सांसद दोषी सिद्ध हो गया तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? संसद की पवित्रता का क्या होगा ? 

मेरे ख़याल से आज यह सवाल सबसे बड़ा सवाल होना चाहिए कि यदि भारतीय लोकसभा को अपने किसी सदस्य के लिए भविष्य में पछताना पड़े, शर्मशार होना पड़े, विश्व बिरादरी में नीचा देखना पड़े, जवाब देना पड़े तो इसका जिम्मा किस पर जाएगा ? क्या राजनीतिक दलों पर जिन्होंने प्रत्याशी खड़े किए ? क्या चुनाव आयोग पर जिसने इन्हें चुनकर आने दिया ? क्या न्याय पालिका पर जो समय रहते इन पर अपराध तय नहीं कर पाई ? क्या विभिन्न सरकारों पर जो इन पर अंकुश नहीं लगा पाईं ? या फिर अंतिम रूप से जनता पर जिसने दागी नेताओं को भारी मतों से अपना नुमाइंदा या रहनुमा चुना ? 

आज इन सवालों पर देश को गौर करना ही होगा। अब वह समय नहीं रहा जब विजेता के सब दोष माफ़ होते हैं। यह लोकतांत्रिक विश्व है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र में बहुमत से कम महत्व मत का नहीं होता। यदि एक भी नागरिक जानना चाहता है कि संसद में आरोपी क्यों और कैसे पहुंचे ? तो जवाब देना होगा। यही जनादेश का सच्चा सम्मान होगा। 

भारत एक महान देश है। इसे अपने उच्च मानवीय गुणों के लिए दुनिया भर में आदर से देखा जाता है। भारत के जनादेश का सम्मान करने वालों का यह पहला कर्तव्य है कि वे इस देश की संसद को पवित्र रखें। बिना इस तू-तू मैं-मैं के कि पिछली संसद में निर्वाचितों का आपराधिक डेटा क्या रहा है। 

मैं सबसे क्षमा सहित यह कहना चाहता हूं कि भारत की नवनिर्वाचित मज़बूत सरकार और विपक्ष चाहे वह कितना ही कमज़ोर क्यों न हो कि यह पहली साझी ज़िम्मेदारी होगी कि संसद में जो सदस्य चुनकर आये हैं वे जल्द से जल्द अगर दोषी हैं तो दोषी और बेदाग़ हैं तो बेदाग़ निकलें। इन पर लंबित मुकदमों की सुनवाई प्राथमिकता में त्वरित सुनिश्चित हो। कोई भी नया कार्यक्रम लागू करने से पहले इस जनादेश को निष्कलंक किया जाए। मेरा यह सोच अगर किसी रूप में गलत है तो मुझे माफ़ किया जाए। 

भारतीय नागरिक होने के नाते मेरी केवल एक ही इच्छा है कि जैसे भारत के करोड़ों लोग ग़रीबी, मजबूरी, सताये जाने पर भी नेक, निर्दोष, विनीत और निष्कलंक रहते हैं वैसी ही भारत की संसद भी हो। दुनिया में इसकी पहचान क़ायम हो कि यह भारत की संसद है जिसके लिए शील, शांति, न्याय और पवित्रता सर्वोपरि हैं। 

सभी निर्वाचित सांसदों एवं पदाधिकारियों को मेरी ओर से शुभकामनाएं। प्रधानमंत्री जी के लिए हार्दिक मंगलकामनाएं कि सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में सबसे अधिक आरोपी सांसद भी आपकी ओर से ही हैं  इसलिए अब इतनी बड़ी संसद को सम्हालने और निर्दोष रखने का सर्वाधिक जिम्मा आपका ही है। 

जय हिंद ! भारत माता की जय !!

- शशिभूषण

सोमवार, 27 मई 2019

लोग अंगूठा लगाकर विश्व गुरुओं की सरकार चुनते हैं


इसे कहानी में लिखूंगा तो शायद आप मानेंगे नहीं इसलिए सीधे सीधे एक अनुभव कहता हूँ ताकि आप सवाल जवाब भी कर सकें।

मैं पीठासीन अधिकारी था। इस बार मतदान हेतु बीएलओ पर्ची मान्य नहीं थी। एक दिन पहले ही एजेंट से अनुरोध कर लिया था बीएलओ पर्ची से वोट नहीं पड़ पायेगा। किसी हाल में नहीं। लेकिन अगले दिन मतदाता आधार कार्ड और वोटर कार्ड आदि के साथ बीएलओ पर्ची भी ला रहे थे।

यह बीएलओ पर्ची तब परेशानी और डर का सबब बन गयी जब कुछ बुजुर्ग मतदाता जिनमें अधिकांश महिलाएं थीं स्याही लगवाने, मतदान अधिकारी 3 द्वारा बैलेट इश्यू करने के बाद हाथ में लिए लिए बूथ में जाते और इसे कहीं डालना चाहते। चूंकि बैलेट यूनिट में कहीं से कुछ डाला नहीं जा सकता तो ये उसे वीवीपीएटी में डालना चाहते।

एक दो बार तो मुझे अपनी जान सूखती सी लगी। मेरी प्रार्थना थी कि यह मशीन 6 बजे तक ऐसी ही चलती रहे। मतदान सम्पन्न हो जाये। लेकिन यह नई समस्या थी। मैं बूथ पर नहीं जा सकता था। मतदाता के पीछे पीछे कोई दूसरा नहीं जा सकता था। एक को समझाओ भी तो दूसरा मतदाता नया होता। फिर क्या किया जाए ?

जैसे ही कोई बुजुर्ग मतदाता आता या आती मैं मतदान कक्ष के बीचोबीच दूसरे मतदान अधिकारी के सामने खड़ा हो जाता था। उनके हाथ से बीएलओ पर्ची और परिचय पत्र लेता था। विनती करता था- केवल बटन दबाना है और कुछ नहीं। उसके बाद मुझसे यह ले जाओ।

इतना ही होता तो गनीमत थी। कमाल तो तब हुआ जब मतदान समाप्ति के बाद वीवीपीएटी की बैटरी निकालने के लिए बैक साइड खोली तो उससे बीएलओ पर्ची निकली। शाम को 6 बजे रोने लायक जान न बचने के बावजूद मुझे जोर की हँसी आई। हम चारो हँस पड़े। मतदान समाप्त हो चुका था।

इसीलिए कहता हूं कि माई बाप जनता जनार्दन की खूब इज्जत कीजिये। उन्हें सर आंखों पर बिठाइए। लेकिन केवल इज्जत से और उनके जनादेश से कुछ खास नहीं होने वाला। भारत की जनता जनार्दन को शिक्षित करना पड़ेगा। उसे शिक्षित कीजिये। भारत में शिक्षा पहली ज़रूरत है।

यदि यह देश शिक्षा के लिए आगे नहीं आता तो जनादेश आदि की इज्ज़त का कोई अर्थ नहीं है। यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि लोग अंगूठा लगाकर विश्व गुरुओं की सरकार चुनते हैं।

- शशिभूषण

नेहरू का सपना हमारा भारत


ऐसे माता-पिता, शिक्षकों और परिजनों पर आज ग़ुस्सा आता है जिन्होंने बच्चों से कहा था - पढ़ो लिखो, अच्छे बनो। गांधी, नेहरू, भगत सिंह, आदि महापुरुषों की राह पर चलो। अपने से पहले समाज के बारे में सोचो। भारत निर्माण का रास्ता आजादी के आंदोलन के महान सपनों से होकर निकलेगा।

वैसे है तो यह गर्व करने की बात मगर गुस्सा इसलिए आता है क्योंकि इसी दौर में स्कूल, कॉलेज, विश्विद्यालय और शिक्षा नष्ट किये जा रहे थे। लोग परहित से विमुख होकर अपने-अपने घर भर रहे थे। बस कुछ पुराने अच्छे नागरिक उन्हीं महान सपनों के साथ जिये जा रहे थे। जिनकी तादाद घटती जा रही थी। पढ़ाई या तो थी नहीं या खोखली हो चुकी थी, आज़ादी के सपने टूट रहे थे, राष्ट्र निर्माण और नेकी की राह मुश्किलों एवं अपना सब कुछ खो देने की राह बनती जा रही थी।

इसी वक़्त की कोख से वह पीढ़ी पैदा हुई, जो इस सही मगर कठिन राह पर चलने में भविष्यहीनता देखती थी। उसके सामने करियर का प्रश्न अहम हो चला था। परिणाम क्या हुआ ? ऐसे-ऐसे नेता, रणनीतिकार पैदा हुए जिनकी दिखायी राह पर चलने में आदर्शों की कोई शर्त नहीं थी, त्याग की, ईमानदारी की कोई अड़चन नहीं थी। शिक्षित होना भी अनिवार्य नहीं था। बल्कि प्रतिभाएं विदेशों में शरण खोज रही थीं। नेता खुलेआम बोलने लगे थे- गांधी, नेहरू शैतान थे। भारत विभाजन के जिम्मेदार थे। भगत सिंह कम्युनिस्ट था। अम्बेडकर शूद्र। आरक्षण बुराई है। अल्पसंख्यक हिंदुओं पर खतरा हैं। इस्लाम खतरे में है। देश ख़तरे में है। संस्कृति पर संकट के बादल देखे जाते। बुद्धिजीवियों को त्याज्य, अलगाववादी समझा जाता। कारण ? इनसे ब्राह्मणवाद, धार्मिक चरमपंथ और जातिवाद आदि कमज़ोर पड़ रहे थे। इन अतिवादी नेताओं को कोई टोकने वाला नहीं था कि यह झूठ क्यों ? ऐसी नफ़रत क्यों ? धर्म का धंधा क्यों ? यह उस वक़्त का आगमन था जब दंगाई या लुटेरा होकर भी समाज हितैषी या सेवक कहलाया जा सकता था। जब जातियों, समाजों के संगठन, सेनाएं बन रही थीं। मेले-त्यौहार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के अड्डे बनते जा रहे थे।

ऐसे में क्या होता ? कम पढ़े लिखों की उन्मादी फ़ौज तैयार हो गयी। वो धर्म में लग गयी। बिजनेस सम्हालने लगी। राजनीतिक कार्यकर्ता बन गयी। ट्रोल हो गयी। लिंचिंग करने वाली मॉब बन गयी। नौजवान बिना पढ़े लिखे ही स्मार्ट, अमीर होने लगे। समझदार कहलाने लगे। विभाजनकारी जन नेता कहलाने लगे। कुछ भी करके जनसमर्थन जीत लेने में सफल होने लगे। धंधा, सबसे बड़ा रोज़गार हो गया। मुनाफ़ा सदगति। सेठ, धर्म और राजनीति के मालिक बन बैठे। लोग खुलेआम पूछने लगे समाज सेवा से क्या फायदा ? हम सरोकार के लिए क्यों मरें ? हमें भी सुख चाहिए। हमारे भी बाल बच्चे हैं। भलाई के लिए हमी क्यों शहीद हों ? फिर क्या था अपराध का ऐसा कोई क्षेत्र न बचा जहां से चुनकर सांसद, विधायक सदनों में न पहुंचें।

हमें शहीद नहीं होना, हमें भी येन केन प्रकारेण ऐश ओ आराम चाहिए युवाओं के जीवन का मूलमंत्र बन गया। बुजुर्ग आखिरी सांस तक शासन करना चाहने लगे। भारत में धर्मनिरपेक्षता गाली हो गयी। वैज्ञानिकता को नास्तिकता समझा जाने लगा। नास्तिक को देशद्रोही प्रचारित कर दिया गया। विरोधी विचारधारा को शत्रु समझ लिया गया। मानवतावाद की जगह राजनेताओं की भक्ति और धार्मिक उन्माद आ गया। मीडिया धनपशु और सत्ता का प्रचारक बन गया। व्यक्ति पूजा चरम पर पहुंच गयी। ऐसे वक़्त में नेहरू को कौन अच्छा कहता ? अम्बेडकर के पीछे कौन चलता? इतिहास कौन पढ़ता जबकि पुस्तकालय खत्म हो गए । ज्ञान विज्ञान की जगह वाट्सअप का मायावी जाल छा गया। रही सही कसर अंतरार्ष्ट्रीय उपभोक्तावाद ने पूरी कर दी। देश में कंपनियों का साम्राज्य फैल गया। भारत के लोग फेक न्यूज़ और धार्मिक राष्ट्रवाद के चंगुल में फंस गए। फिल्मी कलाकार या तो सट्टेबाज़ हो गए या नेताओं के विज्ञापन करता। एंकर गुंडे हो चले। योग-अध्यात्म महाकाय कारोबार बन गया। ऐसे लोगों की सत्ता, रस्साकशी में जनता की नज़र में गांधी, नेहरू इज्ज़त पाने भी पाएं तो कैसे ?

लोग ही गिनती के बचे जो आंख में आंख डालकर कह सकें - जवाहर लाल नेहरू जैसा पढ़ा लिखा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रधानमंत्री भारत में दूसरा न हुआ न होगा। नेहरू जी आधुनिक भारत के महान स्वप्नदृष्टा और शिल्पी थे। उनका चिंतन और राजनीति भारत की आत्मा के ख़ुराक हैं। आज जिस प्रकार से नेहरू को कलंकित किया जा चुका है और दोषियों को कोई ठोस जवाब नहीं दे पाता वह भारत की ही दुर्गति का कारण है, कारण बनेगा।

दुष्प्रचार और चरित्र हनन के विशाल राजनीतिक औद्योगिक समय में आज सबसे बड़ा सवाल है भारत निर्माताओं का खोया गौरव कैसे लौटे ? कौन उनके असल संदेशों को जनता तक ले जाए ? सवाल बड़ा है लेकिन उम्मीद भी बड़ी है कि यह घटाटोप सदा नहीं चलेगा। अफवाह, छल, झूठे वादे, तिकड़मी भाषा और झूठ हमेशा नहीं चलते। ठगों की कलई एक दिन खुल ही जाती है। भले देर लगे मगर नेहरू फिर से पहचाने जाएंगे। क्योंकि वे किसी दल विशेष के नेता नहीं थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और महान स्वप्नदृष्टा थे। भारत उनका सदैव ऋणी रहेगा।

आज 27 मई है। नेहरू जी की पुण्यतिथि। भारत माता के इस सपूत और गांधी जी के वास्तविक उत्तराधिकारी को मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि ! नमन ! जय हिंद !! भारत माता की जय !!!

- शशिभूषण

रविवार, 26 मई 2019

बेटी की चिट्टी देश के नाम



मेरे प्यारे देश भारत,
आज जबकि मैं वह हूँ, जो होना चाहती थी, तो इसका सारा श्रेय मैं तुम्हें देना चाहूँगी। तुमने मेरी साँसों को हवा दी, जीवन को अन्न-जल और विकास को वह सुंदर दुनिया, जिसमें सपनों के विस्तार के लिए अनंत आकाश था और उन्हें साकार करने के लिए असीम धरा।

बढ़ती उम्र की समझ के साथ मैंने जाना कि तुम अपनी एक ऐसी विशेषता के कारण अपने आत्महिंसक, आत्मपीड़क पड़ोसी देशों से अलग और महान हुए, जो संविधान द्वारा तुम्हें दी गयी उद्देशिका है- सम्पूर्ण संप्रभुता संपन्न लोकतंत्रात्मक संघ गणराज्य और पंथ निरपेक्ष लोकतांत्रिक समाजवादी। यह एक प्रतिज्ञा तुम्हारी उस पवित्र और उदात्त आत्मा का प्रतिबिंब है जिसमें सबके लिए सबकुछ है। अपनी आदिम अवस्था से तुम अपने इसी धर्म का पालन करते आ रहे हो। ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों और इतिहास को पढ़कर मैंने जाना कि तुम्हारी धरती दुनिया के तमाम बाशिंदों को अपनी गोद में पालने, उन्हें संरक्षण व मुक्त आकाश देने को सदा से आतुर रही है। वात्सल्य का ऐसा अनुपम भंडार धरती के किसी और टुकड़े पर नहीं दिखता।

मैं सच्चे दिल से यही प्रार्थना करती हूँ कि तुम्हारी वनस्पतियाँ सदा हरी रहें, तुम्हारी नदियाँ सदा भरी रहें, तुम्हारे पशु-पक्षी, खेत-खलिहान, किसान-जवान और सभी इंसान सदा सलामत रहें।

पर सच कहूँ- मन तब उदास ज़रूर हो जाता है जब सत्ताओं की शतरंज में तुम्हें मोहरा बना देखती हूँ। तुम्हारी हरी-भरी धरती की चटख रंगत जब चंद रंगों और तूलिकाओं में समेटने की कोशिश की जाती हैं, तुम्हारी उदात्त आत्मा को जब तुम्हारे ही आत्मज और आत्मजाएँ खंडित करने का प्रयास करते हैं, जब एक ओर तुम्हें माता का दर्ज़ा देकर पूजनीय बनाया जाता है और दूसरी ओर सत्ताओं का लोभ, क्षुद्र स्वार्थों का अतिरेक तुम्हारे आत्म सम्मान को तार-तार करते हैं, तब मेरी आँखों के सामने बार-बार अपने प्यारे भारत के आँगन में युधिष्ठिर के जुएँ का खेल और द्रौपदी के चीर हरण का दृश्य अपनी पूरी नग्नता के साथ जीवंत हो उठता है।

ऐसा नहीं है कि तुम्हारे साथ यह सबकुछ मेरे ही जीवन काल में हो रहा है ! हाँ, मेरी पीड़ा नयी है, तुम्हारा दुख सदियों पुराना है। यह दुख कुछ बुरा नष्ट न कर पाने के लिए उतना नहीं है, जितना आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ अच्छा सहेज न पाने का, अपने बच्चों को सुंदर और स्वस्थ वातावरण, स्वच्छ पर्यावरण, पवित्र और लोकमंगलकारी आचरण न दे पाने का है।

मेरे प्यारे देश भारत ! मैं कैसे मान लूँ कि जातिवाद, क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता, अशिक्षा, ग़रीबी, बेरोज़गारी जैसी अनगिनत समस्याओं की सौगात साथ लेकर आ रही राजनीति में दिग्भ्रमित युवा पीढ़ी तुम्हारे आत्मगौरव की रक्षक होगी, तुम्हारे प्रेम के विस्तार को समझ पाने की संवेदनशीलता उसमें होगी ! वह मानव धर्म को सभी धर्मों से ऊपर मान भी पायेगी या नहीं !!

प्यारे भारत ! मैने बहुत जादुई उम्मीदें नहीं पाल रखी हैं तुमसे। बस एक दिन ऐसा आए, जब तुम्हारे सबसे कमज़ोर और अकेले इंसान तक मदद के हाथ पहुँचे, एक रात वह शुरुआत हो, जब तुम्हारा सबसे ग़रीब इंसान भूखा नहीं सोए- ऐसे दिनों और ऐसी रातों वाला प्यारा भारत बनते मैं तुम्हें देखना चाहती हूँ।

तुम्हारी बेटी
कविता जड़िया
शिक्षिका, के वि उज्जैन

रवीश आप नहीं हारे हैं

प्रिय रवीश जी,
नमस्ते !

मैंने आपका लेख 'क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूँ' ध्यान से पढ़ा। चूंकि आपके लेख का शीर्षक बिना प्रश्नवाचक चिन्ह के एक सवाल की तरह है इसलिए मैं पहले जवाब ही देना चाहता हूं- नहीं, आप बिल्कुल नहीं हारे हैं। आप हैं तो बहुत कुछ है। हम लोग अकेले नहीं हैं। कमज़ोर नहीं है। लोगों की समझ पर चारों तरफ़ से हमले हैं मगर वे आपको देख सुनकर अपनी समझ ठीक कर सकते हैं। रवीश कुमार अकेला ही आज की राजनीति का ईमानदार अटल विपक्ष है। मैं व्यक्तिगत रूप से इतने सालों में आपके लिखे बोले दिखाए से काफ़ी मजबूत हुआ हूँ। मेरे आत्मबल में वृद्धि हुई है। मैंने अनेक बार महसूस किया है कि मैं अपने काम को प्यार करने लगा हूँ। मुझमें निडरता आ गयी है। दृढ़ता, आत्मीयता, प्रतिबद्धता और मैत्री बढ़ी है। मैंने रवीश कुमार को देखते हुए जाना है कि कैसे विषम परिस्थिति में भी रचनात्मक, दोस्ताना, खुशमिजाज़ रहा जा सकता है। कैसे एक साथ बच्चों जैसा सुकुमार और परम दृढ़ हुआ जा सकता है। मैंने रवीश कुमार के कठोर राजनीतिक दृष्टि सम्पन्न मनुष्य और किसी फिल्मी गाने पर मचलते किशोर रूप को देखा है। 

मैं आज आपसे एक बात साझा करना चाहता हूं। मुझे अपनी इस उम्र में आकर एक इंसान मिला है जिसे मैं प्यार कर सकता हूँ। जिसकी हर बात पर यकीन कर सकता हूँ। मुझे गहराई से लगता है कि वह इंसान झूठ नहीं कह सकता। आप उस इंसान का नाम जानना चाहेंगे ? उसका नाम है सिद्धार्थ गौतम। सिद्धार्थ गौतम को दुनिया बुद्ध के नाम से जानती है। दुर्भाग्य से दुनिया ने एक गलत पाठ भी रट लिया है कि बुद्ध भगवान थे। अवतार थे। उन्होंने कोई धर्म चलाया। जबकि सच यह है कि बुद्ध इंसान थे। उन्होंने इंसानी संदेश दिए। बुद्ध कदाचित दुनिया के सबसे प्यारे और खरे इंसान हैं। उन्होंने एक बात कही है कि मैत्री, प्रेम से श्रेष्ठ है। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा होगा क्योंकि हम विराट विश्व में रहते है। प्रकृति से लेकर मनुष्य तक सबके प्रति मैत्री ही श्रेष्ठ और दोषरहित मानवीय गुण है। इसी से करुणा उत्पन्न होती है। मनुष्य में करुणा आ जाए तो वह सबका मित्र हो जाता है। उससे किसी का अहित नहीं हो सकता। रवीश जी मैंने महसूस किया है कि आपमें करुणा है। पत्रकारिता में रहते हुए इसी करुणा से आपकी भाषा बड़ी मैत्रीपूर्ण और मार्मिक हो गयी है। आपने इतना विरोध और धमकियां झेली हैं कि आपकी भाषा सहज ही दिल को छूने वाली और दोस्ताना है। उसमें विश्वास है। वह अपनी ओर खींचती है। आपकी भाषा में दर्द है। उसमें खुशमिजाजी भी है। क्योंकि आप उम्मीद से भरे हुए हैं। 

मैं दोहराता हूँ कि आप बिलकुल नहीं हारे हैं। जो लोग जीते हैं वे जीते नहीं हैं उन्होंने बस कुछ चीजों पर कब्ज़ा कर लिया है। वे विजेता नहीं हैं कब्जेदार हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में बहुमत पर कब्ज़ा करना आसान है अगर मीडिया, पूंजी और धर्म मिल जाएं। मत जीतना असम्भव। उसके लिए गांधी बनना पड़ता है। गांधी ने बिल्कुल शुरुआत में ही विश्व के महानतम मानवतावादी तोल्स्तोय और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का दिल जीत लिया था। मैं गंगा में खड़े होकर कह सकता हूँ कि मोदी जी चाहे जो और जितना जीत लें वे दुनिया के किसी भी महान मानवतावादी का दिल कभी नहीं जीत पाएंगे। उनमें वे खुबिया नहीं हैं। मोदी जी को अब तक हो चुके भारत के महान संतो का कभी समर्थन नहीं मिल सकता। यहीं मैं आपसे हार जीत के संबंध में एक पौराणिक यथार्थ को साझा करना चाहता हूँ। इसे ध्यान से पढ़ियेगा-

पुराणों में जिन्हें राक्षस कहा लिखा गया उनके पास सब हुआ करता था। रावण का ही उदाहरण ले लीजिए, तो उसके पास महा सत्ता थी, अकूत सोना था और विराट सेना यानी महा शक्ति थी। रावण परम तपस्वी था। वह महा उद्यमी था। लंका में विभीषण को छोड़कर शायद ही कोई था जिसने उसका विरोध किया हो अथवा प्रजा में विद्रोह भड़काया हो। संसार में शायद ही कोई रहा हो जिसके पास उससे बड़ी प्रभुता हो। वह क्या दृष्टि थी कि पुराणों के राक्षसों के पास सब कुछ था । वे युद्ध में कभी हारते नहीं थे। उन्हें जिस देवता से जो वरदान चाहिए वह मिलता था ? उनकी प्रजा कभी विद्रोह नहीं करती थी। फिर राक्षस कैसे हारते थे ? उनका अंत कैसे होता था ? वे कब हारते थे ? इन सवालों का पुराणों में एक ही उत्तर मिलता है कि राक्षस हमेशा जीतते। उनकी ताक़त, उनकी दहशत दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जाती। वे पराजित कब होते थे ? इसका उत्तर है वे अंत में हारते थे। राक्षसों के अंत में ही हारने की प्रवृत्ति या नियम पुराणों में मिलते हैं। तो क्या पुराणों में अंत में ही हारने के लिए राक्षसों की कल्पना की गयी अथवा यह प्रकृति का कोई शाश्वत नियम है ? जो भी हो अब कोई भी जवाब देने के लिए कोई पुराणकार हमारे बीच नहीं है। फिर इस चर्चा का औचित्य क्या है ? इस चर्चा का अभिप्राय यह है कि पुराणकारों ने उद्धारकों की आवश्यकता को प्रमुख बना दिया। उन्होंने यह नियम बना दिया कि कोई नायक आएगा जो हमेशा जीतने वाले राक्षस राजा का अंत करेगा। बिना नायक के ऐसा असम्भव है। प्रजा अपने बलबूते ऐसा नहीं कर सकती यही स्थापना पुराणों की इस देश को सबसे भयानक देन है। यही कारण है कि पुराणों में प्रजा के विद्रोह की कोई कहानी नहीं मिलती। वहां सदैव नायक आता है। तो क्या यह व्यवस्था जान बूझकर है ? नायकों का पुराणकर्ताओं से कोई रिश्ता है ? इन दोनों का एक ही उत्तर है कि पुराण कथाओं के जितने भी नायक हैं वे पुराण लिखने कहने वाले ऋषियों के माता पिता, बंधु, सखा, गुरु हैं।

रवीश जी आप पढ़ते बहुत हैं। मैं आपसे बुद्ध का 'धम्मपद' पढ़ने का आग्रह करता हूँ। अम्बेडकर की लिखी बुद्ध की जीवनी पढ़ने का आग्रह करता हूँ। काशीनाथ सिंह का उपन्यास 'उपसंहार' पढ़ने का आग्रह करता हूँ। आप इन्हें ज़रूर पढ़िए। आज गीता से अधिक ज़रूरी है भारत के लोगों का बुद्ध को पढ़ना। सम्भव है जिन बुजुर्ग ने आपको गीता दी उन्होंने आपमें अपना पुत्र देख लिया हो। वे आपकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए हों। सलिये गीता दी। ताकि वह आपके पास रहे तो गौलल्ला आप पर हमले न करें। मैं माफ़ी सहित कहना चाहता हूं गीता आज की किताब नहीं है। गीता में कृष्ण ने अर्जुन से झूठ बोला। महाभारत के बाद अर्जुन को न भोगने लायक धरती मिली न स्वर्ग। महाभारत ने सब नष्ट कर दिया था। सब कुछ। कृष्ण के राजनीतिक जीवन, उसकी महत्वाकांक्षाएँ, सबका खोखलापन और समूर्ण हार जानने के लिए काशीनाथ सिंह का उपन्यास उपसंहार अप्रतिम है। पढ़ियेगा। अम्बेडकर वाली बुद्ध की जीवनी हिंदी में उपलब्ध है। इसकी भूमिका भदंत आनंद कौसल्यायन ने लिखी है। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि जब आप ये किताबें पढ़ लें तो अपने दर्शकों से भी इनकी चर्चा कर लें मुझे संतोष होगा।

आखिरी बात मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि आप हारे नहीं हैं। मोदी जी भी जीते नहीं है। अगर उनकी जीत के बाद भारत हिन्दू राष्ट्र बनता है तो यह भारत की हार होगी। लेकिन मुझे उम्मीद है कि भारत ऐसा ही रहेगा। मोदी जी का नाम केवल लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में ही शुमार होकर रह जाएगा। भारत का विशाल हृदय उन्हें भीतर से बदलेगा भी और जहां आवश्यक होगा रोकेगा भी। होना भी यही चाहिए। मैं उनसे यही चाहता हूँ। मोदी जी आप महा जीते, आपको लोगों का समर्थन मिला। ठीक। आप राज करें। विकास करें। लेकिन हमारे भारत को वैसा ही रहने दें। जैसा बुद्ध, गांधी, भगत सिंह, अम्बेडकर से लेकर टैगोर तक इसे देखना चाहते रहे हैं। इसे नया भारत यानी हिन्दू राष्ट्र न बनाएं। भारत के लोग यह नहीं चाहते। कभी नहीं चाह सकते।

रवीश जी, मैं भविष्य में आपके अधिक सक्रिय तथा प्रतिबद्ध पत्रकारीय जीवन की कामना करते हुए कहना चाहता हूं कि हम सब यहीं हैं। इसी लोकतंत्र और देश में। आप हारे नहीं हैं। क्योंकि महामानव समुद्र भारत का लोकतांत्रिक समाजवादी, पंथ निरपेक्ष सपना हम सबका साझा सपना है। आपके द्वारा चलायी गयी विश्वविद्यालय और नौकरी सीरीज तथा अन्य सीरीज का भारत को ऋणी होना चाहिए। मुझे यक़ीन है कि भारत में कोई दूरदर्शी मनुष्य सत्ता में आया तो वह आपके इन कामों को देखकर ठोस सुधार करना चाहेगा। आप हिंदी पत्रकारिता के एकलव्य हैं। हम जानते हैं आप अपनी शिक्षा पर जियेंगे लेकिन अपना अंगूठा कभी नहीं देंगे। अनंत शुभकामनाओं सहित !
जय हिंद !

आपका
शशिभूषण