सोमवार, 9 अगस्त 2010

साथी

कौन लड़ता है भीतर
लड़ना नहीं छोड़ता
जबकि ताक़तवर जीतते ही रहे हैं कमज़ोर सच्चे लोगों से
मिट जाओगे यह सच्चाई सुनाते हुए बुला लेता है
और हम भूखे प्यासे निहत्थे ही दौड़ पड़ते हैं
पुकार लड़ने का बल भरती है वंचित जीवन में
किसका अंतहीन इंतज़ार अमृत भरता है प्राणों में
शांत हो जाता है तब उसके काम लड़ते हैं अन्याय से
यह कौन है जो हारने और बैठने नहीं देता
सींचता रहता है अंत:करण में विद्रोह
खड़ा कर देता है समझौतों के खिलाफ़
हानि-लाभ कामनाओं से भरा हुआ
भूख-रोग ज़माने से डरा हुआ
वास्तव में यह मैं तो नहीं
फिर कौन मुझे चुनकर अपना लेता है?
अड़ने भिड़ने का दम भर देता है?
पूछता हूँ खुद से
कोई जवाब नहीं आता
आती है रंगों की याद
साथी हैं अपने
हरा और लाल.

3 टिप्‍पणियां:

  1. "सींचता रहता है अंत:कारण में विद्रोह"
    भाई शशि जी, आपने ये कविता अंतर्रात्मा की आवाज़ पर लिखी है. विद्रोह के लिए ये आवाज़ काफी है. बधाई.

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  2. बेहतर कविता के लिए बधाई...

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