बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

हम खरीदार न सही पर अपनी क़ीमत जानते हैं



ये मलयेश हैं.

आप देख रहे हैं.जहाँ ये बैठे हुए हैं यह एक फुटपाथ है.स्पेंसर प्लॉजा के ठीक सामने.चेन्नई के इस शॉपिंग मॉल की गिनती दक्षिण एशिया के सबसे बड़े शॉपिंग मॉल में होती है.


एक शाम जब मैंने मलयेश को पहली बार अचानक अपने ठीक सामने कटोरा फैलाते हुए देखा तो डर गया था.हड़बड़ी में मैं आगे बढ़ गया पर ठिठककर मलयेश को ग़ौर से देखने से खुद को रोक नहीं पाया.मेरे पहले के डर और अब की जिज्ञासा को मलयेश ने भाँप लिया था.जवाब में उसने मुझे गाली दी.तमिल में.जिसे मेरे साथी ने समझाया.हाव-भाव से मुझे भी लग गया था कि यह गाली दे रहा है.अगले ही पल उसने अपना कटोरा खड़ख़ड़ाकर मुझे हटो यहाँ से..का साफ़ संकेत किया.

यह पहली बार था जब किसी भिखारी ने मुझे गाली दी.मैं गहरे अपमानबोध में था.फिर भी मेरी फ़ोटो खींच लेने की इच्छा हुई.इस इच्छा का मैंने खुद ही दमन किया कि साले एक सिक्का तक तो दिया नही चले हो फ़ोटो खींचने.मैं उस दिन चला आया.पूरी रात मन खिन्न रहा.


एक महीने बाद जब फिर यहाँ आना हुआ तो मैं पहले ही सावधान हो गया.चलते-चलते ही दो रुपये का सिक्का निकालकर मलयेश के कटोरे में डाला और उसकी बगल में खड़ा हो गया.पहले तो खयाल आया कि चुपचाप फ़ोटो खींच लूँ जल्दी से पर लगा यह ज़्यादती होगी.मैंने इसकी इजाज़त चाही.मलयेश ने साफ़ मना कर दिया.

इल्लै...पो..पो..(नहीं.जाओ यहाँ से...) लेकिन मुझपर ज़िद सवार हो चुकी थी.
हारकर मलयेश ने सौ रुपये की मांग रख दी.
मैंने कम रुपये लेने की गुजारिश की.

यह ऐसी सौदेबाज़ी थी जिसने मुझे सिखाया कि मलयेश मजबूर भले हो उसे दुनिया के बारे मे कोई भ्रम नहीं.पर मेरा खुद को तर्क था मेरे पास हराम के पैसे नहीं होते जो सौ रुपये को छोटी रकम समझ लूँ.


मैंने ज़ोर देकर कहा कि यह बहुत ज़्यादा है
वह इससे कम पर राज़ी नहीं था.
लेकिन मैंने यह फोटो खीच ली.
उसे दस रुपये दिये.
वह असंतुष्ट था पर शायद मेरी स्थिति जान गया था.


मुझे अंदाज़ा था कि यह बहुत कम है पर मैं ऐसे लोगों में हूँ जो पांच रुपये बचाने ही दो-तीन किलोमीटर रेंग जाते हैं.सो मुझे इतना कम देने पर ज़्यादा देर तक अफ़सोस नहीं हुआ.


मलयेश ने भी मुझे माफ़ कर दिया है.परसों जब मैं उसके पास से गुज़रा तो हम एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए.मुझे बहुत भला लगा.वह स्वाभिमानी है.परिचितों के सामने कटोरा नहीं फैलाता.

मैं चाहता हूँ इस बड़े महानगर में मुझे अच्छे दोस्त मिलें.पर मैं मलयेश की भी सच्ची दोस्ती का हक़दार रहूँ.वह मुझे देखकर खुश होता रहे.

मुझे नहीं पता कि मलयेश को यह कौन सी बीमारी है. मैं तो इस बात से विचलित हुआ कि इस काया को भी भूख नहीं बख्शती.


इतने बड़े बाज़ार के सामने जहाँ रुपये सिर्फ़ आंकड़े होते हैं यह अपनी भूख के लिए बैठा रहता है.सड़क के दलाल इससे भी टैक्स वसूलते हैं यह सोचकर ही ग़ुस्सा उफनता है.



5 टिप्‍पणियां:

  1. भूख भला किसे बख्शती है...संवेदनशील संस्मरण.

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  2. ओह तो उसका नाम मयलेश है.. मैंने भी उसे कई बार देखा है, मगर आपकी तरह गौर नहीं किया..

    मुझे पता नहीं था कि आप चेन्नई में हैं.. कभी मिलने के बारे में क्या ख्याल है?

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  3. marmik sansmaran.lekhan ki imandari prashansaneeya hai-kavita jadiya,kv baikunthpur

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  4. आपने संवेदनशील प्रस्तुती की है।

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