पहला दिन: लड़ना आसान होता है; ज़रूरत शांति के प्रयास की है - एम एस सथ्यु

2 अक्टूबर से 4 अक्टूबर तक इंदौर में चलनेवाले भारतीय जन नाट्य संघ के इस तीन दिवसीय 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन और राष्ट्रीय जन सांस्कृतिक महोत्सव का विधिवत उद्घाटन आनंद मोहन माथुर सभागार में एम एस सथ्यु की अध्यक्षता में हुआ। मंच पर उपस्थित कलाकारों, लेखकों एवं रंगकर्मियों में थे अमन और जंग तथा जय भीम कॉमरेड जैसी ख्यात डाक्यूमेंट्री फिल्मकार आनंद पटवर्धन, इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणवीर सिंह, उपाध्यक्ष अंजन श्रीवास्तव, प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन, इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश, कॉमरेड पेरीन दाजी, नरहरि पटेल, वसंत शिंत्रे और मध्य प्रदेश इप्टा के अध्यक्ष हरिओम राजोरिया। सभागार में देश के 25 राज्यों के लगभग 800 सौ रंगकर्मियों-संस्कृति कर्मियों के अलावा सैकड़ों की संख्या में लेखक, पत्रकार, कलाकार एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।
अपने स्वागत भाषण में राकेश ने कहा इप्टा मोहब्बत की बात करती है। चार्ली चैप्लिन ने कहा था कि कला, कलाकार द्वारा जनता को लिखा गया प्रेमपत्र है। हम इसमें यह जोड़ते हैं कि इप्टा समय आने पर जनता की ओर से शासकों को अभियोग पत्र भी भेजती है। इप्टा के 75 साल पूरे हो रहे हैं। चित्तो प्रसाद एवं विनय राय जौनपुरी जैसे लोग इप्टा से जुड़े रहे हैं। जौनपुरी ने बंगाल के अकाल के समय ‘भूखा है बंगाल, फैला दुख का काल’ जैसा गीत लिखकर पूरे देश को झकझोर दिया था। भारतीय जन नाट्य संघ जिसका ध्येय वाक्य ‘जनता के रंगमंच की असली नायक स्वयं जनता होती है’ का नामकरण मशहूर वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने किया था। हम युद्ध के विरोध में तब भी थे और आज भी हैं। हम शांति के पक्षधर हैं। हम सबका मुकाबला करेंगे;युद्धवादियों का भी। हम इंपीरियलिज्म के खिलाफ़ नगाड़े, ढोलक के साथ स्वर मिलाएँगे। देश और दुनिया में अब झूठ ताकतवर हो चुका है। कहीं भी अगर कुछ बुरा हो रहा है तो हमें उससे मतलब है। हम इप्टा के अपने कद्दावर साथी ए. के हंगल तथा जितेन्द्र रघुवंशी को खो चुके हैं। हम दुगुनी मेहनत करेंगे। आज आवश्यकता वैसे गीत रचे जाने की है जैसा इप्टा के साथी रवि नागर ने लिखा-आजादी आजादी.. यह गीत पिछले साल से अब तक क्रांति का अन्तर्राष्ट्रीय गीत बन गया। इप्टा बेगूसराय के सदस्य रह चुके जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने इसे गाकर जन जन तक पहुँचाया। राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चला उनपर और अन्य युवाओं पर। हम कन्हैया कुमार के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करते हैं। राकेश ने एम एम कलबुर्गी समेत दिवंगत अन्य विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। मेधा पाटेकर, जलेस, प्रलेस, जसम, महाराष्ट्र की अंधविश्वास निर्मूलन समिति, कबीर कलामंच एवं सभी संघर्षशील जन पक्षधर संस्थाओं, व्यक्तियों के प्रति समर्थन व्यक्त किया। विभिन्न संगठनों एवं साथियों द्वारा प्राप्त ग्रीटिंग तथा शुभकामना संदेशों का उल्लेख कर धन्यवाद दिया।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे एम एस सथ्यु ने ‘मौजूदा सांस्कृतिक परिदृश्य और हमारी चुनौतियाँ’ विषय पर अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने अपने वक्तव्य की शुरुआत इप्टा से जुड़ाव के पुराने दिनों को याद कर की। कैफी आज़मी, बलराज साहनी, आबिद रिज़वी, आर.एन सिंह, ए.के हंगल का वे स्मरण कर ही रहे थे कि मंच पर सेल्फी लेने आ गये लोगों पर खीझ उठे। उन्होंने कहा फोटो खींचना अच्छी बात है। चाहे जितनी खींचिए। लेकिन सेल्फी यानी अपना फोटो खुद खींचना समझ से परे है। यह एक बीमारी है। बड़ी तेज़ी से देशभर में फैल चुकी है। इससे बचना चाहिए। फिर खुद को विषय पर केन्द्रित करते हुए कहा- यह तय करना मुश्किल होता है कि किस भाषा में बात करें। मैं कन्नड़ हूँ यहाँ भारत के सभी भाषा भाषी लोग मौजूद हैं। अपने आत्मीय लहजे में सथ्यु ने दक्षिण भारतीय भाषाओं तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम समेत हिंदी और अंग्रेज़ी में सभी का अभिवादन किया। उन्होंने कहा मै अनेक रंग संगठनों से होता हुआ 1965 में इप्टा में शामिल हुआ। मैं लंबे समय से इप्टा में हूँ लेकिन आज इसके झंडे का रंग नीला देखकर हैरान हूँ। यह कब हुआ मुझे मालूम नहीं। अंबेडकर बड़े नेता रहे। वे हिंदू से बुद्ध बने, औरों को भी बौद्ध बनाया, आरक्षण लाये। लेकिन उन्होंने बुद्धिज्म में आकर दलितवाद को एक रिलीजन बना दिया। हम रिलीजन, कास्ट, जेन्डर को नहीं मानते। धर्म और जाति से कुछ भी तय नहीं किया जा सकता। हमारी ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है। हमें सांप्रदायिकता और चरमपंथ को हराना है। लड़ना बहुत आसान होता है। लोगों से शांतिपूर्ण व्यवहार करना कठिन होता है। तकनीकि प्रगति इतनी हो चुकी है कि घर बैठे बम फेंके जा सकते हैं लेकिन शांति के प्रयास काफ़ी कठिन हैं। युद्ध के मौके पिछली सरकारों के पास भी थे। लेकिन उन्होंने हमले नहीं किये। लेकिन यह सरकार युद्ध कर रही है। आज की सरकार कम्युनल है। राहुल गांधी मोदी का युद्ध के विषय में समर्थन कर बचकानी बात कर रहे हैं। यह कांग्रेस का पक्ष नहीं राहुल गांधी की अपरिपक्वता है। मेरे विचार से सर्जिकल ऑपरेशन भारत के लिए शर्मनाक है। भारत का भरोसा आक्रमण पर नहीं होना चाहिए। हम शांति के देश हैं। बुद्ध की ज़मीन हैं। अहिंसा और शांति हमारा रास्ता है। कलाकार के रूप में हमें सांप्रदायिकता, चरमपंथ, आक्रमणों आदि से अपनी कला के माध्यम से मुकाबला करना है। हमारे लिए धर्म, जाति और द्रोणाचार्य सभी गैरज़रूरी हैं। हर रंग का एक मतलब होता है। असर होता है। लाल, क्रांति का रंग है। हमे बहुत प्रिय है। हम लोकतंत्र के पक्षकार हैं। लोकतंत्र हमें अपने विचार व्यक्त करने, आलोचना करने की आज़ादी देता है। हम लोकतांत्रिक रूप से चुनी गयी सरकार का भी सम्मान करते हैं इसलिए उसकी भर्त्सना नहीं कर सकते। लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी हमारा हक़ है। हमें अब और द्रोणाचार्य नहीं चाहिए। हम लोकतांत्रिक उम्मीद के लोग हैं। हम जानते हैं रंगमंच दुनिया नहीं बदल सकता। लेकिन वह लोगों को उत्प्रेरित कर उन्हें एक्टिव बनाता है। स्वीकार और निर्णय तक पहुँचाता है। जनता, न्याय और हक का पैरोकार बनाता है। मैं खुद को कलाकार मानता हूँ। यदि मैं नाटक लेकर आया होता तो उसके माध्यम से अधिक बोलता। मुझे बहुत खुशी होगी अगर मैं अगली बार अपना नाटक लेकर आऊँ। आप सभी लोगों का बहुत धन्यवाद!
प्रलेसं के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने कहा इंदौर सांस्कृतिक विरासत के लिए विख्यात है। आज लेखकों को सम्मान के माध्यम से, अनेकानेक प्रलोभन और डर देकर कमज़ोर बनाया जा रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए भारत की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी 20 रुपये प्रतिदिन से कम कमाती है। हमारा देश वित्तीय पूँजी का गुलाम हो चुका है। हमें तीसरी दुनिया में गिना जाता है। दूसरी दुनिया बनाने की लड़ाई अब तक बाकी है। आज भारतीय लोकतंत्र और विचारों की स्वतंत्रता खतरे में है। लेखकों को गुमराह किया जा रहा है, रंगकर्मियों को मुनाफ़े के लिए प्रेरित किया जा रहा है, संस्कृतिकर्मियों को तोड़ा जा रहा है लेकिन हम टूटने भटकनेवाले नहीं निदान करनेवाले लोग हैं। राजेन्द्र राजन के वक्तव्य के बाद इप्टा अशोक नगर के सीमा राजोरिया और अन्य कलाकारों ने बामिक जौनपुरी का लिखा जनगीत ‘रात के समंदर में गम की नाव चलती है’ प्रस्तुत किया।
कॉमरेड शमीम फैज़ी ने दिवंगत कॉमरेड एबी बर्धन को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा वर्धन साहब ने मुझे कम्युनिस्ट बनाया। पार्टी में शामिल किया। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अनेक आंदोलनों में हिस्सा लिया। कॉमरेड अपनी 90 साल की ज़िंदगी में साढ़े ग्यारह साल जेलों में रहे, साढ़े तीन साल भूमिगत रहे। कॉमरेड वर्धन कल्चर, आर्ट, राजनीति और आंदोलनों से समान रूप से जुड़े थे। उनकी लिखी किताब फाइनांस कैपिटल आज के परिदृश्य के लिए टेक्स्ट बुक की तरह है। वे आयडियोलाग की तरह थे। कला, संस्कृतिकर्म और लेखन से भी उनका जुड़ाव उतना ही रहा जितना आंदोलनों और राजनीति से। इस मामले में उनकी मिसाल वे आप हैं।
इस अवसर पर आनंद पटवर्धन की कॉमरेड ए बी वर्धन के अयोध्या भाषण पर आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई गयी। इप्टा के पूर्व राष्ट्रीय महा सचिव कवि-कथाकार-रंगकर्मी जितेंद्र रघुवंशी पर आधारित एक फिल्म ‘सीप का मोती’ का प्रदर्शन भी किया गया। कवि और अनुवादक उत्पल बैनर्जी ने फैज़ की नज़्म ‘लाजिम है कि हम भी देखेंगे’ सुनायी। महाराष्ट्र की अंधविश्वास निर्मूलन समिति के कलाकारों ने सुकरात, तुकाराम और नरेन्द्र दाभोलकर एवं गोविंद पानसरे की हत्या पर केन्द्रित नाटक प्रस्तुत किया।

दूसरा दिन: हम गांधी, अंबेडकर और भगत सिंह के वारिस हैं -राकेश
भारतीय जन नाट्य संघ के तीन दिवसीय 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन और राष्ट्रीय जन सांस्कृतिक महोत्सव के दूसरे दिन सांगठनिक चर्चा-बहस एवं विचार सत्र मुख्य रहे। हालांकि इप्टा की उत्सव एवं कलाधर्मी मूल भावना इन पर भी मुख्य रही। छोटे-छोटे अंतराल में अनेक प्रेरक, उत्साहवर्धक और ओजपूर्ण जनगीत प्रस्तुत किए जाते रहे। इन जनगीतों की प्रस्तुति में संघर्षशीलता एवं भारतीय बहुलतावादी संस्कृति के रूप प्रकट हुए। जनगीतों में एकल एवं सामूहिक प्रस्तुतियां रहीं। छत्तीसगढ़ी, उड़िया, मलयालम और तेलगू की प्रस्तुतियां समृद्ध करनेवाली रहीं। चंडीगढ़ के इप्टा प्रतिनिधि ने एकल कविता पाठ भी किया।

इस अवसर पर पत्रिका ‘उद्भावना’ के भीष्म साहनी पर केन्द्रित विशेषांक के साथ रणवीर सिंह, कनक तिवारी और अखिलेश द्वारा लिखी गयी पुस्तिकाओं का विमोचन किया गया। उदभावना के संपादक अजय कुमार ने कहा भीष्म साहनी इप्टा से जुडे थे। हम लकड़ियों के गट्ठर की तरह नहीं उंगलियों की तरह परस्पर जुड़े हैं। आज पढ़े लिखे लोगों में सांप्रदायिकता की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। हमें अपने युवाओं को सांप्रदायिक होने से रोकना होगा। इप्टा के साथी अमेरिका का उच्चारण अमीर-का की तरह करें तो ठीक होगा। अमेरिका अमीरों का ही देश है।
इस सत्र में इप्टा की विभिन्न राज्य इकाईयों के प्रतिनिधियों ने जनरल सेक्रेटरी की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए संगठन के विकास एव जनपक्षधर स्वरूप में निखार लाने हेतु अपने मत एवं सुझाव व्यक्त किये। वक्तव्य देनेवालों में संजय गुप्ता(जम्मू) ने संगठन की मंसा के विपरीत भारतीय सेना द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राइक को उचित ठहराया। प्रदीप घोष(उ.प्र.) ने युवाओं और महिलाओं को जगह देने पर जोर दिया। गोपी सेल्वाराज, तमिलनाडु ने राष्ट्रीय कार्यशाला की आवश्यकता बतायी। एम एस पुनिया ने सदस्यता राशि बढ़ाकर 10 रुपये किये जाने की बात कही। बलकार, चंडीगढ़ ने कहा कि इप्टा का भी अपना टीवी चैनल होना चाहिए। हिमांशु ने कहा इप्टा में उचित बदलाव एवं सुधार होने चाहिए। कहीं हम आज वहीं तो नहीं खड़े हैं जहाँ वर्षों पहले खड़े थे? तकनीकि के इस्तेमाल को प्रमुखता दी जानी चाहिए। इप्टा के नाटकों में भी भव्यता हो। शैलेंद्र शैली(भोपाल) ने इप्टा को और जनोन्मुख बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। AISF के अध्यक्ष बलिउल्ला ने कहा इस समारोह में मै अल्फाज़ नहीं जज्बात लेकर आया हूँ। इप्टा से युवाओं को जोड़ने की बड़ी आवश्यकता है। हमें सज्जाद जहीर, सआदत हसन मंटो जैसे लेखकों से बहुत कुछ सीखना होगा।
दूसरा सत्र, अभिनय और निर्देशन, संगीत विधा और नाट्य संगीत तथा जन आंदोलनों के साथ इप्टा का जुड़ाव विषयों पर परिचर्चा का रहा। इस परिचर्चा में अलग-अलग विषयों में मॉडरेटर थे तनवीर अख्तर, सीताराम सिंह और विनीत तिवारी।


तीसरा दिन: हमारी देशभक्ति में जनता की भूख, बेरोज़गारी, बेदखली, शांति और न्याय के लिए संघर्ष शामिल हैं -शैलेंद्र

तीसरे दिन की शुरुआत तेलंगाना के इप्टा कलाकारों द्वारा प्रस्तुत जनगीत से हुई। इसके बाद विभिन्न अंतरालों में केरल, तमिलनाडु, रायपुर, लखनऊ इप्टा के कलाकारों ने जनगीत एवं लोकनृत्य प्रस्तुत किये। लिटिल इप्टा, लखनऊ की दो बच्चियों ने ओम प्रकाश नदीम का गीत ‘हमें भी दिखा दो किताबों की दुनिया…’ सुनाकर सभी को भाव विभोर करने के साथ झकझोर कर रख दिया। इन प्रस्तुतियों में विद्यमान कला, भारतीय संस्कृति, प्रगतिशीलता, संघर्षशीलता और उत्सवधर्मिता मौजूद लोगों को झूमने और प्रेरित करने में सफल रहे। इसके साथ ही इप्टा रायपुर और जेएनयू के कलाकारों ने नुक्कड़ नाटक खेले। जेएनयू का नुक्कड़ नाटक ‘खतरा’ खासतौर से दक्षिणपंथी ताक़तों द्वारा 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन और जन सांस्कृतिक महोत्सव को ‘देशद्रोही’ करार दिये जाने के जवाब में प्रस्तुत किया गया। ‘खतरा’ ने बहुत प्रभावशाली ढंग से स्थपित किया कि इप्टा के मूल्य और संघर्ष, भारतीय संविधान की आत्मा और मानवाधिकारों के पक्ष में हमेशा से चले आ रहे हैं, जारी हैं और आगे भी अक्षुण्ण रहेंगे।

इस अवसर पर मनीष श्रीवास्तव, शैलेंद्र तथा सारिका श्रीवास्तव द्वारा अलग-अलग प्रस्ताव लाये गये जिन्हें ध्वनि मत से पारित किया गया। इन प्रस्तावों में मुख्य थे शिक्षा संस्थानो, विद्यार्थियों पर हो रहे सरकारी हमलों का एकजुट विरोध, आतंकवाद की निंदा के साथ सरकार द्वारा निर्मित युद्धोन्माद का सांस्कृतिक, शांतिपूर्ण विरोध, दलितों आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ़ एकजुटता एवं मेट्रोसिटी बनाये जाने के नामपर बस्तियाँ उजाड़े जाने की गुंडागर्दी के विरुद्ध शातिपूर्ण कानूनी उपायों की ज़रूरत पर उठाये जानेवाले प्रभावी कदम। इसके साथ ही सरसों की खेती में सरकारी दुष्चक्र के खिलाफ़ जागरूकता अभियान को प्राथमिकता, समानधर्मा संगठनों का बेशर्त सहयोग एवं समर्थन।

इप्टा की प्रतिबद्धता या उत्सवधर्मिता इस बात से पुष्ट हुई कि निर्धारित सत्र पूर्ववत फिर शुरू हो गये। कॉमरेड पेरिन दाजी ने होमी दाजी की याद में ‘अपने लिए जिये तो क्या जिए ऐ दिल तू जी जमाने के लिए…’ सुनाकर साथियों के उत्साह को फिर ताज़ा कर दिया। राकेश ने नये पदाधिकारियों समेत नवगठित कार्यकारिणी के सदस्यों के नामों की घोषणा की एवं उनका परिचय दिया। कुल मिलाकर यह रिपोर्ट लिखे जाने तक पुलिस, मीडिया की आवाजाही भले बढ़ गयी हो ढोल, नगाड़ों, गीत-संगीत के स्वर थमें नहीं हैं। कलाकारों में विरोध को झेलकर डँटे रहने का स्वाभाविक जोश देखा जा रहा है। उम्मीद है देर रात तक यह महोत्सव अपनी मूल प्रतिज्ञाओं के साथ परवान चढ़ता रहेगा।
और अंत में अपील: साथी हाथ बढ़ाना रे.. ऐ दिल तू जी ज़माने के लिए...
तीसरे दिन दोपहर में बीच में सभी को रोकते हुए आयोजक मंडल के सदस्य कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी मंच पर आये माईक हाथ में लेकर कहा- साथियो, आज ही असम से आये प्रतिनिधि साथी का पर्स खो गया। उसमें लौटने के टिकट और 14 हज़ार के लगभग रुपये थे। साथ ही साथी विजय दलाल का मोबाईल गुम गया है। आप जानते हैं कि असम बहुत दूर है, हमारे साथियों की सकुशल वापसी हमारी ज़िम्मेदारी है। इसे कोई अकेला नहीं उठा सकता इसलिए बाहर एक दान पात्र रखा गया है आप सब उसमें अपनी स्वेच्छा से रूपये डाल सकते हैं। ध्यान यह रहे कि आवश्यकता के अनुरूप रुपये जमा हो सकें। वापसी का इंतज़ाम हो सके और विजय दलाल को एक मोबाईल मिल सके। इस अपील के असर का पता रात को लगभग साढे ग्यारह बजे चला जब इकट्ठा रुपयों की गिनती हुई। अनेक साथियों की मौजूदगी में अशोक दुबे ने अठारह हज़ार पाँच सौ रुपये इकटठे होने की घोषणा की। बेतरह थके साथियों के चेहरे में खुशी के रंग छा गये। नारों, गीतों, संवादों से जागती रात तालियों से गूँज उठी। इसमें हँसी का फव्वारा तब छूटा जब सारिका ने बताया जाँच करने आये पुलिस अधिकारी ने विनीत तिवारी को बुरी तरह टोका था-आपने बिना हमारी इजाज़त यह चंदा जमा करनेवाला कार्टन क्यों रखा हुआ है? और अब दूसरी अपील जिसके असर का पता चलना हमेशा बाकी रहेगा-
भिन्न विचारों को खुलेआम देशद्रोह से नाथ रहे, वाम पंथियों को प्रतिबंधित किये जाने के अभियान में निसि-दिवस जुटे, विद्यार्थियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों के लिए रोज़ खाई खोदते, अन्य मतावलंबियों के पांवों में धर्म, जाति, सरकार, पुलिस, क़ानून के स्वार्थान्ध दुरूपयोग से निर्मित आतंक, दमन के गुखरू डाल रहे पूंजी-मीडिया-राजनीति-सत्ता के नेक्सस से निकले सिपाही, ताकतवर, बेलगाम, व्यापारी कौन हैं?
संघ गणराज्य भारत के राष्ट्र ध्वज तिरंगे का; भारतीयों के संवैधानिक अधिकारों और संवैधानिक उपचारों के अधिकारों को सीमित करने के लिए भयावह हथियार की तरह उपयोग कर रहे, तिरंगे को अपने अहं की लाठी में टांगकर बेख़ौफ़ कहीं भी घुसकर तर्क, वैज्ञानिक सोच, मानवाधिकारों के ख़िलाफ़ भारत माता की जय बोल रहे, विरोधियों को मार रहे, डरा रहे, खुद घबराये, बौखलाए हुए किंतु निश्चिन्त-उद्दंड लोग कौन हैं?
लोक कल्याण की भाषा बोलते, विकास, स्वच्छता, एकता के नारे लगाते, हाथों में स्वनिर्मित देशद्रोह के विखंडनवादी परमाणु हथियारों से भी खतरनाक मीडिया-हथियार लिए स्वच्छंद हमले करते, गांधी, आंबेडकर, भगत सिंह के शत्रु, राष्ट्रवादी-शांतिप्रिय-देशभक्त लोग कौन हैं?
क्या उन्हें पहचानना इतना मुश्किल है? क्या साहित्य, कला,राजनीति, विज्ञान और नई नीतियों की खाल ओढ़कर घूम रहे उन्हें, उनके नुमाइंदों को और उनके संरक्षकों को चीन्ह लेना सचमुच कठिन है? कदाचित नहीं। वे बार-बार पहचाने गए, हर क़िस्म के ध्वंस के कारकों में पाए गए मनुष्य विरोधी नर-मादा हैं। क्या इन्हें मातृभूमि या भारतभूमि की आह लगती है? ये सवाल नहीं, तीन दिवसीय राष्ट्रीय जनसांस्कृतिक महोत्सव और इप्टा के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन के अखिल भारतीय रूप से अभूतपूर्व ढंग से इंदौर में सफलतापूर्वक संपन्न हो जाने के ठीक कुछ घंटों पूर्व उपजी चिंताएं हैं।
सम्मेलन के तीसरे दिन 4 अक्टूबर को आनंद मोहन माथुर सभागार में जब सब ठीक से, गरिमापूर्ण और अपरिहार्य चल रहा था, सबके लिए बेहतरी का अरमान लिए प्रस्ताव पारित हो रहे थे, भारतीय भाषाओं में जनगीत गाये जा रहे थे तभी राष्ट्रवादी छावनियों से छोड़े गए कुछ उपद्रवी गुंडे, तिरंगे के साथ भारत माता की जय बोलते घुसे। मार्च करते सीधे मंच तक आये, माइक छीने और मंच पर चढ़ गए। अत्यन्त आक्रामक बेशर्मी से सबको भारत माता की जय बोलने की धमकी देने लगे। लोग अचंभित, सहमे और आक्रांत आवेगों से स्तब्ध थे।

तब बाहर जो हुआ उसे वहीं मौजूद लोगों ने ही देखा। अंदर पूर्ववत बैठ जाने की अपील सुनाई दी। कुछ मिनटों में सब पूर्ववत हो गया। तभी माइक से एक मार्मिक उदघोषणा हुई।
साथियो, यदि इंदौर में कोई सांस्कृतिक, प्रगतिशील, जन पक्षधर कला उत्सव हो और कॉमरेड होमी दाजी को याद न किया जाये तो वह सम्मेलन या उत्सव कितने ही मानकों से सफ़ल माना जाये लेकिन असल में तब तक सफ़ल नहीं कहा जा सकता जब तक कॉमरेड होमी दाजी को न याद किया जाये। यह सुखद है कि उनकी जीवन साथी हमारे बीच हैं। हम कॉमरेड पेरिन दाजी को मंच पर आमंत्रित करते हैं।
अभी अभी जो घटित हो चुका था उससे बिलकुल अविचलित, उम्र को धता बताती एक कार्यकर्त्ता के कंधे पकड़ लंबी उम्र गुजार चुकी बदलावों और इंसानी सपनो की अपराजेय साथिन पेरिन दाजी डग मग मंच पर पहुंची।
बोलीं-जब भी मैं ऐसे किसी सम्मेलन में आती हूँ मुझे होमी दाजी की बहुत याद आती है। यह कहते हुए उनका गला भर आया। सभागार में मौजूद लोगों की आँखों की कोर में नमी आ गयी। पेरिन दाजी ने आगे कहा- मैं हमेशा दाजी के साथ होती थी। लोग जानते हैं कि वे मेरे जीवन साथी थे। मैं जानती हूँ कि होमी दाजी मेरे गुरु थे। वे गुरु की तरह मुझे हमेशा सिखाते समझाते।
मैं दाजी को जीवनभर अपना गुरु मानती रही। आज तक मानती हूँ। होमी दाजी को एक गाना बहुत प्रिय था। वे हमेशा उसे गाते थे। बाद में मैं उनके लिए यह गाना गाती। वे सुनते। जब भी कहीं होते जरूर सुनते या गाते। मैं आज आप लोगों को वही गाना सुनाऊँगी। मेरी उम्र बहुत हो चुकी। मैंने बहुत साल पढ़ाया। गले से काम लिया। लेकिन अब गला खराब हो सकता है। गाते गाते बेसुरी हो जाऊं तो आप सब माफ़ कर दें। सुर मत देखें गाने के भाव पर ध्यान दें। फिर पेरिन दाजी ने वह गाना गाया जो उनकी बहुत अनुभवी और भरोसेमंद आवाज़ में अपने नए-नए अर्थों के साथ गूंजता रहा। एक मार्मिक सन्देश बनकर दिलों में टंक गया।
गाना था 'अपने लिये जिए तो क्या जिए; ऐ दिल, तू जी ज़माने के लिए...'
पांच-सात मिनट की अवधि में सभागार ऐसे हो गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। या जो बाहर हो रहा था उसे सम्हालना उनका जिम्मा है जो वहां हैं। जो जहाँ है वह बदले के लिए नहीं अमन, बेहतरी और शांति के लिए है पेरिन दाजी ने बिना एक वाक्य की प्रतिक्रिया व्यक्त किये जैसे सब को खूब समझा दिया।
लेकिन क्या स्वयंभू देशभक्तों को कभी यह शर्म आएगी कि वे क्या कर रहे हैं? किन्हें अपना निशाना बना रहे हैं? भारत को किस अँधेरे गह्वर में ले जा रहे हैं?
यह भी सवाल नहीं चिंता ही हैं। ऐसी चिंता जो इरादों को फौलादी बना देती है और हाथ पर हाथ धर बैठने नहीं देती।
शशिभूषण
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