शुक्रवार, 5 मार्च 2010

आलोचना


एक आदमी ने रोटी पकाई.खाते-पीते मित्र को खाने पर बुलाया.ज़िद करके खाना खिलाया.वह अघाया मित्र दिन भर खाते रहने का आदी हो चला था.इसलिए इंकार न कर सका.अनमना खाता रहा.

जिज्ञासु मेज़बान से रहा न गया तो उसने मेजबानी में आत्मीयता जोड़ते हुए पूछ लिया
-.क्या रोटी अच्छी नहीं थी?
मित्र ने कहा-देखो मित्र अव्वल तो अब कोई रोटी खाता नहीं.पर अगर तुम रोटी बनाना नहीं ही छोड़ना चाहते तो गैस स्टोव की बजाय चूल्हे में लकड़ियाँ जलाकर सेंको.और हाँ खाली गेहूँ का आटा इस्तेमाल करने की बजाय उसमें थोड़ा चना या सोयाबीन का आटा मिलवा लीजिए.शुरू में ही एक साथ पिसवा सकें तो सबसे बढ़िया.आजकल यह जरूरी हो गया है.रोटी का मतलब पौष्टिक आहार भी होना चाहिए.

मेजबान मित्र उदास हो जाता है.इस बार दयनीय होकर पूछता है
-माफ़ करना क्या रोटी बिल्कुल अच्छी नहीं थी?
अतिथि मित्र ज़रा रुखाई से बोलता है.
-देखिए हमें अब इतनी गोल रोटियों की आदत छोड़नी होगी.रोटी निर्माण में कला घुसेड़ने की ज़रूरत नहीं.उससे भूख मिटाने का ही काम लिया जाय तो बेहतर होगा.व्यर्थ साज सज्जा बढ़ाकर रोटी को मनोरंजन का साधन बना दिए जाने के मैं सख्त खिलाफ़ हूँ.आखिर रोटी को तोड़ना और चबा ही डालना है.घी चुपड़ देने का चोंचला भी बंद करना पड़ेगा.लोगों की आँतों के चारों ओर पहले से चिकनाई बहुत जमा है.इसलिए घी इस्तेमाल करने से ज्यादा जरूरी है कोई चटनी साथ में दें जिसमें रेशे हों.मुझे लगता है आप आटा भी महीन पिसवाते हैं.इसकी कोई ज़रूरत नहीं.

इतना सुन लेने के बाद मेजबान मित्र झल्लाकर वाहियात प्रश्न पूछ डालता है
-अब इस रोटी में क्या कोई सुधार किया जा सकता है?
मेहमान मित्र ने कहा
-अगर आप सचमुच चाहते हैं कि यह रोटी सफल होने की बजाय सार्थक हो तो इसकी मौजूदा संरचना को तोड़िए.इसकी आत्मा वही रहने दीजिए पर शरीर बदल दीजिए.मेरा मतलब समझ रहे हैं न?इसे सुखा लीजिए.दुबारा पीसकर नए आटे को भूनिए.याद रखिए यहाँ घी का इस्तेमाल अवश्य करें.अब थोड़ा पानी और मसाले डालकर उसका हलवा बनाइए मगर शक्कर डालकर बहुत मीठा करने से बचिएगा.देश में आजकल कम मीठे हलवे का चलन है.इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कहूँगा.रोटी खिलाने का बहुत-बहुत धन्यवाद.

मेजबान मित्र यह सब सुनकर हक्का-बक्का रह गया.उसे समझ में ही नहीं आया कि इस आलोचना से कुछ सीखे या भविष्य में ऐसे खाते-पीते मित्र को कभी खाने पर न बुलाने का निर्णय ले.

3 टिप्‍पणियां:

  1. अरे वाह शशि जी. कमाल की चीज़ रची है आपने. मज़ा आ गया पढ़कर.
    धन्यवाद.

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  2. बेहतर तो यही होगा कि इस खाते पीते मित्र से दूरी बना ले..ये अभी हलुए का भी छिद्रान्वेषण करने से बाज नहीं आयेंगे. :)


    इस माध्यम से बड़ी गहरी बात कही है आपने.

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  3. बधाई। आपकी यह पोस्‍ट आलोचना शीर्षक से आज दिनांक 9 मार्च 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में प्रकाशित हुई है।

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