रविवार, 11 मार्च 2012

पान सिंह तोमर केवल एक फ़िल्म का नाम नहीं है

पान सिंह तोमर को मेरा सैल्यूट। ऐसी फिल्में हर साल नहीं बनती और किसी अभिनेता के जीवन में भी दुबारा घटें यह सपना ही कहा जायेगा। फ़िल्म समीक्षकों का कोपभाजन बनकर भी और कोई उँगली उठाता है तो इसकी परवाह किये बिना इसे एक महान फिल्म कहा जाना चाहिए। इसलिये कि यह अन्याय को ईमानदारी, सादगी और करुणा से दिखाती है। देखने के बाद यह भूलती नहीं और कहने लायक कुछ छोड़ती नहीं। इस फिल्म को देखने के बाद अवाक् रह जाना दरअसल अन्याय का प्रतिकार न कर सकने की ग्लानि है।

पान सिंह तोमर के जीने, लड़ने और मरने को इरफा़न ख़ान ने जिस तरह अभिनय से इस फिल्म में साकार किया है केवल उनके पसीने का टीका बहुतों को अभिनेता बना सकता है। उनकी प्रतिभा को और चरित्र के भीतर प्रवेश को छू सकने वाला दूसरा अभिनेता नहीं हो सकता।

तिग्मांशु धूलिया ने फिल्म के रूप में एक बेहतरीन आईना जो सामने आते ही तमाचा जड़ देता है इस देश को सौंपा है। बुंदेली टोन वाले संवाद और प्यार-झगड़े तथा गँवई दृश्य ऐसे कि आप चीख उठें यह फिल्म नहीं ऐसा सचमुच होता है! मेरा यक़ीन है इस फिल्म को देखने के बाद आप पान सिंह तोमर जैसा जीना चाहेंगे। उसके जैसा बोलना, चलना, अपनी माँ, बीवी और बच्चों तथा खेतों को प्रेम करना चाहेंगे।

पान सिंह जब छुपकर छावनी में बेटे के सामने खड़ा होकर पूछता है सुना है तुम्हारी शादी हो रही है। मेरी वजह से कोई दिक़्कत तो नहीं है? जब आइसक्रीम लेकर फोन पर अफ़सर से कहता है यह सबसे बड़ा मैडल है मेरे लिये। जब वह पत्नी से आखिरी बार मिलकर लौटता है तो कलेजा मुँह को आता है।

यह महज़ डायलाग नहीं है जो पान सिंह तोमर अपने कोच से कहता है मुझे गाली देना पर माँ की गाली कभी मत देना। माँ को गाली दी तो गोली चल जाती है हमारे यहाँ। हम भी तो जीवन से इतना चाहते ही हैं कि हमारी माँ को गाली देने वाला ज़िंदा न रहे हमारी आँखों के सामने। फिर खेत छीन लेने वाले और बूढ़ी माँ को बंदूक के कुंदे से पीटने वाले को गोली मारकर चंबल के बीहड़ों में भटकता पान सिंह डाकू कैसे हुआ? पान सिंह न केवल बाग़ी है बल्कि वह हमें सिखाता है कि बाग़ी होना किसे कहते हैं। वह हमें धिक्कारता है हम बाग़ी क्यों नहीं हैं?

हम डकैत नहीं बाग़ी हैं। डकैत तो संसद में होते हैं। पान सिंह तोमर का पत्रकार को दिया यह बयान इस फिल्म की रीढ़ है। और यह फ़िल्म एक राजनीतिक फ़िल्म है। फ़िल्म का नाम राजनीति होने से वह सही राजनीतिक फ़िल्म नहीं बनती। जब तक अन्याय और उसके प्रतिरोध की सही और हिम्मतवर समझ न हो फ़िल्म यथार्थ बनकर रह जाती है। उससे कला और चेतना के पाँव आगे नहीं बढ़ते। वह सीने में संकल्प शक्ति बनकर नहीं रहती।

फिल्म का मर्म वहां है जहाँ पान सिंह तोमर को सेना में अधिक खाने की वजह से स्पोर्ट्स में भेज दिया जाता है। वह अधिक खाता है इसलिये खिलाड़ी बन जाता है। उसमें ग़ुस्सा है। ग़लत की पहचान है पान सिंह को इसलिये उसकी शक्ति ख़र्च होनी चाहिये वरना विद्रोह हो सकता है। इस कारण उसे निशानेबाज़ी से हटाकर धावक बनाया जाता है।

लेकिन एक दिन उसका कोच उससे कहता है तुम पाँच हज़ार मीटर की फ़ाइनल दौड़ नहीं दौड़ोगे? क्यों? क्योंकि अफ़सर के बेटे से कोच की बेटी की शादी होने वाली है और यह दौड़ उसे ही जीतनी है। कोच पान सिंह तोमर को समझाता है तुम पीछे हट जाओ मैं तुम्हें बाधा दौड़ का नेश्नल चैंपियन बना दूँगा। पान सिंह तोमर मान जाता है। वह बाधा दौड़ का प्रशिक्षण लेता है और नेश्नल चैंपियन बनता है। अपने इस कौशल और सामर्थ्य में केवल एक अंतर्राष्ट्रीय दौड़ वह हारता है जिसमें उसे कंटीले जूते पहनने पड़ते हैं। वह अपने कोच से कहता है इन जूतों में तो मैंने कभी अभ्यास ही नहीं किया। मैं नंगे पैर दौड़ लूँगा। उसे इसकी अनुमति नहीं मिलती। वह दौड़ के बीच में ही जूते उतारकर नंगे पैर दौड़ता है फिर भी हार जाता है।

अगर इस फिल्म की किसी फ़िल्म से तुलना की जा सकती है तो वह है बैंडिट क्वीन। लेकिन मैं समझता हूँ दलितों और स्त्रियों के प्रति अन्याय सहज ही हमारी संवेदना को जगा देता है। कोई भी पानीदार इंसान इस बात से विचलित हुये बिना नहीं रह पाता कि स्त्रीत्व का अपमान हो रहा है। लेकिन यदि यह अन्याय ज़मीन और अधिकारों के साथ हो रहा हो तो बैंडिट क्वीन जैसी संवेदना जगाने के लिये जिस कलात्मक सामर्थ्य की ज़रूरत पड़ती है उसी का नाम है फ़िल्म पान सिंह तोमर। यहीं दोनों फिल्मों का एक साझा पाठ किया जा सकता है कि आत्मसमर्पण के बाद भी मारी जाने वाली स्त्री होती है और हर वह शख्स मारा ही जाता है जो अन्याय से लड़ता है। पर बाग़ी सूबेदार पान सिंह तोमर मरकर भी मरता नहीं हमारे दिल में, फ़िल्म इस कोटि की है।

इस फ़िल्म के और पहलुओं पर चर्चा हो सकती है, आगे होगी भी। बाग़ी पान सिंह तोमर का यह सवाल पूरे भारतीय अतीत को निरुत्तर करने और शर्म से सर झुका लेने को मजबूर कर देने वाला है कि मुझसे खेल का मैदान क्यों छीन लिया? जीवन भर बीहड़ में भटकने को क्यों छोड़ दिया? मैं इस स्वीकार के साथ कि इस फिल्म का एक-एक मिनट क़ीमती है एक सामयिक सवाल पूछना चाहता हूँ जिसका संबंध दर्शकों से है कि यह फिल्म मल्टी प्लेक्सेस में बड़े पैमाने पर क्यों नहीं दिखायी जा सकी? छोटे बजट की ऐसी फ़िल्मों को हर क़िस्म के दर्शकों तक पहुँचाने का जिम्मा किसका होना चाहिए? क्या दर्शक केवल सुंदर अभिनेत्रियों के मुजरे देखने के लिये बने हैं? क्या उनके शौक़ को बेलगाम छोड़ दिया गया है कि बालीवुड की स्त्रियाँ महज़ देह और इंटरटेनमेंट हो जायें? ऐसे दर्शकों की ज़िंदगी में किसी बाग़ी की बीवी के आँसू क्यों नहीं पहुँचते?

3 टिप्‍पणियां:

  1. इरफ़ान खान इक मंजे कलाकार हे आज ओस्कर उनका होता..............

    मगर शायद वो इस फिलम की तरह राजनीती से नही जित पाए

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  2. मैने फिलम नही देखी लेकीन फिलम की लोकपियता बताती है कि एक अछी फिलम होगी

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  3. पानसिंह तोमर जैसी फिलमे बनाने का साहस नये निदेशकों को करना चाहिऐ

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