शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

मैं बिल्कुल आपके जैसा ही हूँ

एकदम शुरुआत में
जब बचपन सपनों को आसान बनाता है
मैं महान आदमी बनना चाहता था
जिसके पीछे-पीछे सब चल न सकें
तो कम से कम अच्छा ज़रूर कहें
यह जानने के बाद कि कोशिश करके महान नहीं हुआ जाता
इतिहास में भले लोंगों का यह हश्र देखकर कि
लोग अच्छा कहकर अपनी चाल चलते रहते हैं
मैंने चाहा अगर मैं बन सकूँ तो ख़तरनाक इंसान बनूँ
स्वार्थियों की आँख का कांटा रहूँ
जिसे मौत की सज़ा दिए बग़ैर
सत्ता एक क़दम न चल सके
कोई मुझे प्यार करे तो उसे अपनी जान पर खेलना पड़े
ताक़तवर घृणा मुझे माफ़ ही न कर पाए
ऐसा हर्गिज़ न हो कि मेरा लंगोटिया यार
मेरी जान के भूखे दुश्मन के घर से पान खाकर लौटे
मेरे ख़िलाफ़ षडयंत्र रचनेवाला
हिनहिनाकर मुझसे कहे
ह..ह..ह.. आप तो बहुत अच्छे हैं
दोस्ती,दुश्मनी,फ़र्ज़ के मतलब और नहीं हों
मुझे पढ़ी लिखी ऐसी स्त्रियों का वकील न बनना पड़े
जो टूटकर प्यार करती हैं
लेकिन बाप की पसंद के लड़के से ब्याह कर लेती हैं
मैं उन प्रेमपूर्ण नैतिकों की छाँव तक से बचा रहूँ
जो पत्नी की परोसी हुई थाली पर लात मारकर उठ जाते हैं
तब मुझे मुगालता था
मेरे हिस्से एक सचमुच की दुनिया आएगी
कभी सामना करना ही पड़ा
तो मैं दुनियादार लाभ-लोभ विवेक से भेद लूँगा
अपने बाल-बच्चों की खातिर किसी के पेट पर लात मार देनेवाले
झूठ-मूठ के लोग मुझे बदल नहीं पाएँगे
पर यह नहीं हुआ
तब मैंने अपने मध्यम मार्ग में चाहा
कभी कमाने लायक हो सका तो
आमदनी का बड़ा हिस्सा ज़रूरतमंदों पर खर्च करूँगा
मेरे पास काम करने की आज़ादी होगी
क्योंकि मैं हथियारबंद जनसेवा में नहीं पड़ूँगा
रहूँगा आराम करने की सुविधाओं से सदैव दूर
भक्ति करने या अध्यात्मिक हो जाने की बजाय
नियमित अस्पताल उन बीमारों को देखने जाऊँगा
जिनका कोई नहीं होता
नौकरी करते हुए अगर छुट्टी नहीं मिल सकी
तो तनख्वाह कटवाकर उनका साथ दूँगा
जो इंसानों की भलाई के लिए सबकुछ छोड़ने को तैयार हैं
मैने तय किया कोई दिखावा नहीं करूँगा
हरियाली बचाने गमलों में पेड़ नहीं लगाऊँगा
ऐसे घर में रहूँगा जहाँ दूर लड़ रहे साथी सुस्ताने आएँगे
मेरी ज़िम्मेदारियाँ संघर्षशीलों की राह आसान करेंगी
अफ़सोस यह भी न हो सका
मैं अच्छा खाने,सुंदर पहननेवाला
मनोरंजन की खातिर वक्त और पैसा फूँक देनेवाला
एक शांत निरापद आदमी बनकर रह गया
इज्ज़तदार लोगो मुझ पर संदेह नहीं करें
मेरा सलामत रहना बख्शें
मैं दुर्भाग्य से बिल्कुल आपके जैसा ही हूँ.

4 टिप्‍पणियां:

  1. निसंदेह यह कविता मेरे द्वारा पढ़ी गई सबसे सच्ची और अच्छी कविताओं में से एक है।

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  2. बहुत अच्छी रचना.बहुत उतर कर पढ़ा...फिर से पढ़ूंगा..अभी दिल नहीं भरा है.

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  3. dear sashi;
    kavita padhi. ghar phoonk tamasha dekhne ki ye zid lazwab hai.kahana nahin hoga imandar log samjhdar nahin hote.kabeer kahate the " tera jan ek aadh hai koi..." , ek to kabeer the aadhe tum thare........
    rajiv.

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