शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

सेब का लोहा:गीत चतुर्वेदी

गीत चतुर्वेदी की यह कविता मुझे प्रिय है.इससे एक याद भी जुड़ी हुई है.

जिन दिनों मैं इंदौर में था एक दिन कथाकार सत्यनारायण पटेल ने कहा कि मैं गीत से मिलने आईआईएम जा रहा हूँ चलना हो तो चलो.मैंने कहा कि आप मुझे ले चलें यह बड़ी खुशी की बात होगी,चलिए.

हम बाईक से आईआईएम पहुँचे जहाँ गीत चतुर्वेदी दैनिक भास्कर के एक प्रबंधन संबंधी प्रशिक्षण के सिलसिले में ठहरे हुए थे.मेरी उनसे यह पहली भेंट थी.हम लोगों में काफ़ी बातें हुईं.गीत चतुर्वेदी से मिलने के काफ़ी पहले से मैं उन्हें पढ़ता रहा हूँ.मिलकर मेरी वह धारणा पुष्ट हो गई कि गीत जी लेखन के क्षेत्र में काफ़ी तैयारी से आए हैं.जैसा कि कई बार आगे चलकर महत्वपूर्ण समझे जाने वाले लेखकों के साथ भी हुआ है गीत ने किसी रौ में लिखना शुरू नहीं कर दिया होगा.

उस दिन जो बातें हुई उनके केंद्र में यही था कि लेखन एक सुनियोजित,दीर्घसूत्रीय काम है.सफल लेखक पहले से इस बात के प्रति भी तैयार होता है कि भविष्य में कैसा रेसपांस मिलने वाला है.कौन कौन सी शुरुआती प्राथमिकताएँ निर्णायक साबित होती हैं.ज़ाहिर है हम प्रसिद्धि के किन्हीं चालू टाइप नुस्खों पर बात नहीं कर रहे थे मेरे अनुभव में यह लिखे जा रहे के संबध में गंभीर अकादमिक बातें थीं.
सत्यनारायण पटेल अपनी परिचित ज़मीनी जिदों के साथ थे.गीत अपने निरंतर अद्यतन होते रहनेवाले विजन के साथ.उन्होंने अपने अध्ययन,मेधा तथा जल्द ही हावी हो जानेवाली तर्क पद्धति से मुझे जितना चौंकाया उतना ही संतुष्ट भी किया.मैंने शुरू में ही कहा था गीत जी आपको पढ़ते हुए लगता है कि आपके पास लिखने को काफ़ी है.

बात आगे बढ़ी तो आजकल के अत्यंत सफल,लोकप्रिय अंग्रेज़ी लेखक चेतन भगत के बारे में उन्होंने बताया कि इस लेखक ने अपने उपन्यास लिखने के पहले बाक़ायदा सर्वे करवाये कि कैसे उपन्यासों को लोगों ने अब तक पसंद किया है,उनकी खास बातें क्या थीं?इस संबध में निकलकर आयीं दस प्रमुख बातों को केंद्र में रखकर चेतन भगत ने अपने प्लाट बुने.सबसे सफल यह युक्ति अपनाई कि उपन्यास सुखांत ही रखे.हिंदी का लेखक ऐसी तैयारी के साथ अपना काम क्यों नहीं कर सकता?.फिर उन्होंने नाम लेकर कहा कि हिंदी के कई अच्छे लेखक इसी व्यावसायिकता के साथ लिख रहे हैं.हमें उन्हें मिशनरी या समाजसेवक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए.मैं तब गीत के इस फैसला देनेवाली बात से असहमत था.उन्हें भी अंदाज़ा होगा ही कि यह स्थापना कितनी विवादास्पद हो सकती है.पर इसकी सच्चाई से इंकार जितना मुझे तब था अब नहीं रह गया है.और लगातार कम ही हो रहा है.

सेब का लोहा, उसी रात डॉ.जया मेहता के घर में मैंने गीत जी से सुनी थी.वहाँ मौजूद थे रवींद्र व्यास,विनीत तिवारी,उत्पल बैनर्जी,कृष्षकांत निलोसे और सारिका.कविता सुनते सुनते ही दिलो-दिमाग़ में बैठ गई थी.आप गौर करेंगे कि इस कविता के कहन में सूक्तियों की अंतर्धारा है.जब कवि इतनी अपनी और गाढ़ी पंक्तियाँ कहने लगता है तो उसकी बातों में यह सोचकर भरोसा पैदा होता है कि दुनिया देखने की यही सिद्ध दृष्टि आज होनी चाहिए.पाठक का यह सोच अगर कवि के बहाने साथ साथ विकसित हो यानी वह पहले से मानकर न चल रहा हो कि कवि महान है हमें सिर्फ़ हृदयंगम करना है तो इसे आगे बढ़ना ही है.

इस कविता की पहली ही पंक्ति अपनी आत्मीय व्याप्ति में हमें मुरीद बना लेती है.यह जितनी सच है उतनी ही बेधक है.पहली ही लाइन से इस तरह शुरु होने वाली कविताएँ कम हैं.यह एक व्यक्ति की कविता है.कविता में जिसके बारे में खुलकर कह दिया गया है पत्थर आग पानी और जानवर अभिनय नहीं जानते/मैं जानता हूं

यह व्यक्ति ऐसे समय में है जिसमें लोग किधर के हैं यह तय करना कठिन हो गया है.सर्वग्रासी देशकाल में जहां बनायी हुई परिस्थितियाँ हर तरह की निष्ठा पचा लेती हैं यह भीतर ही भीतर प्रतिबद्ध होना चाहने पर हार रहे व्यक्ति के आत्मस्वीकार की कविता है.यह व्यक्ति फिर भी आत्मकेंद्रित होने से बचा हुआ है.जब कविता का मैं अपने बारे में कहता है-मैं भय विनाश भूख और त्रासदी से निकला हूं/सिर्फ़ एक अनुभव से नहीं समझा जा सकता जिन्हें.तो व्यक्ति की भीतरी टूटन सभ्यता के उस हिस्से का एक्स रे बनकर दिखती है जहाँ इंसान जनमता और मरता है.

व्यवस्था के सामने व्यक्ति की इससे बड़ी असमर्थता क्या होगी कि-सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाक़ू नहीं बनता.व्यक्ति के द्वंद्वों को अनुभूतिपरक सफलता के साथ सामने लानेवाली यह कविता वैयक्तिकता की हामी नहीं है.यह वास्तव में उस व्यक्तिवाद के खिलाफ़ है जो सामूहिकता से खुद को पृथक कर लेने के अपराधबोध को आत्मविश्लेषण से कम करता है.अपनी आत्मकेंद्रीयता को भी लड़ाई का मोर्चा समझने की भूल करता है.पलायन कोई पक्ष नहीं होता बल्कि एक तर्क होता है.व्यक्ति कितने पलायन-तर्कों से भरा हुआ है जिनमें से ज्यादातर उसके ही गढ़े हुए हैं आप इस कविता में नोट कर सकते हैं.फिर भी अपनी परिणति में यह बचे हुए,जूझ रहे व्यक्ति की कविता है.

कविता का यह कथन कि शरीर में लोहे की कमी है सड़कों और खदानों में नहीं/मैं इसीलिए अपने हिस्से का सेब कभी नहीं फेंकता.सबमें मौजूद पर स्थगित निर्णय की ओर इशारा करता है.सेब का लोहा बड़ा व्यंजक प्रतीक है.पूरी कविता कई बार पढ़ने का जैसे आमंत्रण देती है.


गीत चतुर्वेदी कविता के मौलिक,रचनात्मक अध्येता भी हैं.इस अर्थ में कि उन्होंने कुछ यादगार कविताओं के संप्रेष्य को पंक्तियों समेत पिरोकर कथा स्थितियाँ बुनी हैं.इस कविता को पढ़ते हुए आप कल्पना करें कि किसी नहीं लिखी गई लंबी कहानी का फ़कीर अपने होने और समझे जाने के फर्क को स्पष्ट करता हुआ अपना पक्ष रख रहा है.


सेब का लोहा


पत्थर भी अपने भीतर थोड़ी मोम बचा कर रखता है
ख़ुद आग में होता है बुझ जाने का हुनर
जब वह अपने आग होने से थक जाती है
गिरते हुए कंकड़ को अभय दे
अंगुल भर खिसक जाता है समुद्र एक दिन
सबसे हिंसक पशु की आंखों की कोर पर एक गीली लकीर
धीरे-धीरे काजल की तरह दिखने लगती है
सबसे क्रूर इंसान भी रोता है
और प्रार्थना में एक दिन उठाता है हाथ

पत्थर आग पानी और जानवर अभिनय नहीं जानते
मैं जानता हूं

मुझे सेब की फांक पर उग आया लोहा कह लो
या पहिए और पटरी के बीच से कभी फ़ुरसत से निकली चिंगारी
या तमाम माफि़यों से भरी वह प्रार्थना जिसका मसौदा सदियों से अपनी जेब में रखते आया
पढ़े जाने के माकूल वक़्त का इंतज़ार करते

जो कुछ छोड़े जा रहा हूं
क्‍या उसके बदले सिर्फ़ एक माफ़ी काम की होगी
जिसे पढ़ना होगा पुरखों नहीं संततियों के आगे
बताना होगा कि मेरी हथेलियां बहुत छोटी थीं
छिटकते समय को सहेज लेने के वास्ते

सिर्फ़ एक रास्ता काफ़ी नहीं इस जगह से घर को
सिर्फ़ एक जड़ से नहीं मिला छतनार को जीवन
सिर्फ़ एक बार नहीं बना था परमाणु बम
सिर्फ़ एक अर्थ से नहीं चलता रोज़गार शब्‍दों का
सिर्फ़ नीयत ही काफ़ी नहीं होती हर बार
बिना चले गठिया का पता नहीं चलता

मैं भय विनाश भूख और त्रासदी से निकला हूं
सिर्फ़ एक अनुभव से नहीं समझा जा सकता जिन्हें
सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाक़ू नहीं बनता

कोई आता है हांक लगाता पुकारता मेरा नाम
एक उबासी से करता हूं उसका स्वागत फिर ढह जाता हूं
एक दिन वह बना लेता है उपनिवेश
मेरी देह और दिमाग़ के टू-रूम फ़्लैट में
फिर छिलके-सा उतार दिया जाता हूं
किसी आरोप या बिना किसी आरोप के
मेरी राजनीतिक उदासीनता राजनीतिक नासमझी में बदल जाती है
हर इच्छा एक नागरिक उदासीनता की तरफ़ ले जाती है

शरीर में लोहे की कमी है सड़कों और खदानों में नहीं
इसीलिए अपने हिस्से का सेब कभी नहीं फेंकता मैं
थोड़ा-सा मनुष्य भी है मुझमें
जो सदियों पुरानी धुनों पर गाता है भ्रम के गीत

कोई और रहता है मेरे भीतर

जो लिखता है कविता या गाता है
जब वह मेरे सामने आता
मिलता नहीं कोना जहां अकेले बैठ थोड़ी देर सचमुच रो सकूं मैं
अभिशप्‍त भटकता हूं
जैसे लिखे जाने से पहले खो गई किसी पंक्ति की तलाश में
तभी झमाझम बरसती हैं स्मृतियां
भूल जाता हूं पिछली बार कहां रख छोड़ा था छाता

शब्‍द के उच्चारण या नाद से निकली सृष्टि में
क्‍यों बार-बार भूल जाना कि
इतिहास से पहले भी जीवन था
बोली जाने वाली भाषा से पहले समझी जाने वाली
उससे भी पहले एक आंसू उससे भी पहले एक पीड़ा
उन्हीं के अवशेषों की भाषा लिखता हूं

मुझको पढ़ना बार-बार पढ़ी जा चुकी किताब-सा आसान नहीं
मेरा हर व्यवहार एक विचार है
हर हरकत एक इशारा
मैं आधी समझी गई पंक्ति हूं
अभी आधा काम बाक़ी है तुम्‍हारा.
(आलाप में गिरह संग्रह से)

-गीत चतुर्वेदी

3 टिप्‍पणियां:

  1. गीत जी की मै भी प्रशंशक हूँ ---'साहिब हैं रगरेज' के बाद से .

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  2. गीत की यह कविता मैने भी कई बार पढ़ी है और उससे सुनी भी है। उसकी क्षमता का क़ायल हूं पर इस तर्क वाली उसकी लाईन से नहीं। ख़ैर यहां तो बस उसे ख़ूब बधाई…

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  3. 'मैं आधी समझी गयी पंक्ति हूँ.'गीत को आधा समझना भी बहुत कठिन है,पूरी तरह तो शायद ही कोई समझ पाए.वे अपनी बात कहने के लिए नए मुहावरे और भाव दृश्य गढते हैं.अनेक विद्रूपताओं के बीच आशा की किरण जगाए रखने वाली कविता.

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