बुधवार, 23 दिसंबर 2009

नाम

एक लड़की गाँव में
उपले पाथती हुई
लिखती है उस चरवाहे का नाम
जो उसे सबसे सुंदर समझता है
चोरी से दिए गोबर के बदले
उससे कुछ नहीं चाहता.

वह रात दिन उसके सपने देखती है
घर लीपते हुए
रोटी सेंकते हुए.

उसके होठों में वही गुनगुनाता है
उसकी आँखों में वही मुस्कुराता है

धीरे धीरे कड़ी धूप में सूख जाते हैं उपले
सूख जाता है उनमें उकेरा हुआ नाम
एक दिन गोबर से पीले हुए लड़की के हाथ
हल्दी की चटख में खो जाते हैं.

फिर तो चूल्हे में लगते हैं उपले
लड़की के सीने में सुलगता है नाम
धुँआती हैं आँखें जीवन भर.

(जब मैंने यह कविता लिखी मैं मीना को नहीं जानता था.अगर बाद में मैंने चंदन पाण्डेय की कहानी:रेखाचित्र में धोखे की भूमिका,नहीं पढ़ी होती तो मैं मीना को जान ही नहीं पाता.कहानी की किसी लड़की को बिना कहानी पढ़े कोई जान भी कैसे सकता है?अब जबकि मैं मीना को जानता हूँ मेरे जानने में मीना को नहीं भूल पाने तथा अपनी जानी लड़कियों में उसका मजबूर चेहरा देख लेने की अनिवार्यता शामिल हो गई है.यह लड़की मुझे कहानी की लड़की लगती ही नहीं.मैं मीना के बारे में उसे कहानी में मिली जिंदगी से आगे सोचता रहा हूँ.मैं कभी कभी किसी लड़की को मीना कहते कहते रह जाता हूँ,बस यह दुआ ऐसा करने से रोक लेती है मुझे कि नारायण को फिर मरना न पड़े.क्योंकि बोली ह्ई बातें कभी कभी भयानक रूप से सच हो जाती हैं.इस वक्त मैं ऐसा आदमी होता हूँ जो मीना को तो माफ़ कर देता है पर उसी पल नारायण के लिए ज़्यादा उदास हो जाता है.अंत की इस भूमिका में यह भी जोड़ ही दूँ कि आप जब मीना को जानेंगे तो इसे मीना से थोड़ी खुशनसीब लड़कियों के लिए लिखी गई कविता समझेंगे.इसमें मुझे ऐतराज़ नहीं)

4 टिप्‍पणियां:

  1. itni achchhi kavita maine ek lambe samay baad padhi hai.

    sach, dil se kahta hun ki man prasann ho gaya

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  2. ऐसी असाधारण कविता रचने के लिए जिन साधारण परिस्थितियों की आवश्यकता होती है वह आज ज्यादा लोगों के पास नहीं है शशि बहुत सुंदर

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  3. बहुत ही ताजा बिम्ब है भई, कविता सुंदर लगी...

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