बुधवार, 8 नवंबर 2017

अच्छे दिन

उस दिन देश के एक दिन पुराने प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार में भारतीयों द्वारा टैक्स की चोरी करने और विदेशी बैंक में भारी धनराशि जमा करने के काग़ज़ात लीक होने की ख़बर मुख पृष्ठ पर छायी हुई थी। यह दूसरी बार था। 18 महीने पहले भी विदेश में जाली कंपनियों के माध्यम से काला धन बनाने के सनसनीखेज समाचार मीडिया में भरे पड़े थे।

दो साल भी पूरे होते न होते ग़बन की इस अंतर्राष्ट्रीय स्टोरी पर शिक्षक की नज़र गड़ गयी। अपेक्षाकृत पिछड़े राज्य के एक क़स्बे के अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय में संस्कृत पढ़ाकर अपना परिवार पालनेवाले उस शिक्षक को अंग्रेज़ी मुश्किल से आती थी। वह कमज़ोर हो चली आँखें फाड़े, दम साधे समाचार को समझने में लगा था।

विदेश में कालाधन जमा करनेवाले भारतीयों की सूची बड़ी लंबी थी। उस सूची में केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के सबसे अमीर राज्य सभा सांसद, विपक्ष के जाने माने नेता, कई कुख्यात कारोबारी, बड़े कार्पोरेट समूह, और अंग्रेज़ी के दिग्गज पत्रकार के नाम शामिल थे। सदी का महानायक कहा जानेवाला लोकप्रिय सरकारी विज्ञापनकर्ता बूढ़ा हो चला एक फिल्मी कलाकार भी उस निंदनीय सूची का अहम सदस्य था।

शिक्षक सदमा जैसे आश्चर्य में पड़कर सोच में डूब गया- ‘कभी विदेशी आक्रांता, लुटेरे और अंग्रेज़ी सरकार के नुमांइदे भारत का धन लूट-हड़पकर अपने देश ले जाया करते थे। लेकिन अब आज़ाद देश में भारत के ही सबसे जवाबदेह, रसूखदार, सफ़ेदपोश, प्रसिद्ध, ताक़तवर, सत्ता-संस्थानों से जुड़े लोग विभिन्न सरकारों की आँख में धूल झोंककर यथाअवसर देश भक्ति का राग अलापकर देश के ग़रीबों, किसानों, नागरिकों के खून पसीने की कमाई विदेशी बैंकों में जमा कर रहे हैं। भारत में अब ईमानदार क्या कहीं स्वर्ग या दूसरे ग्रह से आयेंगे? किसी देश के अधिकांश लोग ऐसे हो जायें तो क्या बचेगा?’

शिक्षक ने अचरज, भय, अफ़सोस और नफ़रत से भन्ना आया माथा पकड़ लिया। स्टॉफ़रूम के सन्नाटे में घड़ी की किच किच साफ़ सुनाई पड़ रही थी।

‘मे आई कम इन सर...’ आवाज़ कानों में पड़ी। कक्षा 9 की दो लड़कियाँ शिक्षक के सामने खड़ी थीं। शिक्षक ने चौंककर पूछा - ‘क्या है?’ निशा ने सकुचाते हुए हथेली सामने कर दी। विनम्र लड़की की पसीजी गदोरी में दो रुपये का मैला हो चुका एक पुराना सिक्का था- ‘हाँ...शाबाश!...खूब खुश रहो...’ शिक्षक का गला भर आया। लड़कियाँ तेज़ी से लौट पड़ीं। दूसरी ने जाते जाते बताया- ‘सर, यह निशा को गैलरी में मिला।‘ निशा सहेली की बाँह पकड़कर दरवाज़े से बाहर खींच रही थी।

शिक्षक उठकर खड़ा हो गया- ‘बहुत अच्छे...ऐसे ही बने रहना...’ ‘थैंक्यू सर…’लड़कियाँ मुस्कुराती हुई स्टॉफ़रूम से बाहर चली गयीं।

-शशिभूषण

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (10-11-2017) को
    "धड़कनों को धड़कने का ये बहाना हो गया" (चर्चा अंक 2784)
    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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