शनिवार, 22 अप्रैल 2017

संवेदना की आँखें हैं वे या फिर प्रिज्म??

पिछले दिनों मध्यप्रदेश में किसानी और किसानों का एक वाकया सामने आया। महीनों की लगन और मेहनत से जब प्याज की फसल तैयार हुई तो किसान उसे ट्रालियों में भरकर बेचने मंडी पहुँचे। मंडी में किसानों ने प्याज के रेट सुने तो उनका दम निकल गया। चेहरे निस्तेज हो गये। लागत, मेहनत, ज़रूरत और सपने की बात छोड़िए प्याज बेंचकर मंडी तक पहुँचने का भाड़ा नहीं निकल रहा था। एक रुपये प्रति किलो से भी कम मूल्य। किसान दुखी हुए। मन ही मन रो पड़े। वापस ले जायें तो फिर उतना ही खर्च। तय किया कि प्याज यहीँ फेंक दी जाये। प्याज सड़क पर फेंक दी गयी। जिसने भी वह प्याज देखी उसका कलेजा फट गया। जिसे जीवन में कभी प्याज नसीब ही नहीं होनी थी वह अपने दुर्भाग्य पर पसीज गया।

बाज़ार में उन दिनों भी दस रुपये प्रति किलो से कम प्याज नहीं बिक रही थी। जनता उस दिन भी प्याज के एक टुकड़े को तरस रही थी। प्याज उस दिन भी सेब जैसी पौष्टिक थी। अपरिहार्य थी। कुछ ही महीनों बाद उसकी कीमत को आसमान छूना था। विदेशों से उसका आयात होना था। वह पहले भी कीमती थी उसे आगे भी मँहगी रहना था। आँसू ला देनेवाले अपने तीखेपन और अबूझ लगनेवाली परतदार संरचना के साथ वह उतनी ही शुद्ध, स्वादिष्ट और सर्वप्रिय थी। प्रभु जोशी की कहानियाँ प्याज की तरह हैं। वे तब भी अच्छी थीं। आज भी हमारे खून के लिए उपयोगी हैं। हुआ यह है कि वे अब दुगुनी लागत से लंबे अंतराल के बाद हम तक दुबारा पहुँच रही हैं। पुरानी समझी जा रही हैं। प्रभु जोशी ने प्याज की किसानी कभी नहीं छोड़ी। जब विस्थापित हुए तो कहानी की बटायीदारी की। उपन्यास और कई सौ लिखे पृष्ट पानी में गल जाते देखे। लेकिन उनके पास फसलों के विकल्प हमेशा रहे। कहा जाता है मालवा की मिट्टी एवं उर्वरा एक ही हैं। प्रभु जोशी जितने हिंदी के हैं उतने ही मालवी मानुष। चूँकि वे चित्रकार, फिल्मकार और रेडियो प्रोग्राम प्रोड्यूसर हैं इसलिए कृति का मूल्य खूब जानते हैं। इधर कथा साहित्य में हुआ यह कि संपादकों, आलोचकों और प्रकाशकों ने नये-नये के सालाना महा विशेषांक त्यौहार में लहसुन-प्याज खाना ही छोड़ दिया। अगर किसी को साहित्य में ऐसे सवर्ण हिंदू साहित्यिक परहेज के लिए छेड़ दिया जाये तो वह बिफर कर कह सकता है लहसुन, प्याज के सेवन के बाद सभा-संगत लोक और शास्त्र विरुद्ध रहे है। हमेशा रहेंगे। 

प्रभु जोशी के बारे में सबसे अधिक जाननेवाले मेरी नज़र में तीन लोग हैं। बकौल उनके ज्ञानू(ज्ञान चतुर्वेदी), कांत(प्रकाश कांत) और काका(जीवन सिंह ठाकुर)। प्रकाशकांत और जीवन सिंह ठाकुर आमतौर पर राय देते नहीं पाये जाते। कभी-कभार जब वे प्रभु भाई और प्रभु दा की बात ही अलग है बोलकर सांस भरते हैं तो उसी में आजीवन मैत्री और साहित्यिक श्रेष्ठता की तस्दीक हो जाती है। लेकिन अनूठे व्यंग्यकार, अखिलभारतीय लोकप्रिय लेखक ज्ञान चतुर्वेदी को मैंने बाकायदा बोलते सुना। मौका था भोपाल में प्रभु जोशी को मिले वनमाली सम्मान समारोह का। ज्ञान जी ने कहा- प्रभु जोशी, प्रभु जोशी हैं। इनके जैसा दूसरा नहीं। हो ही नहीं सकता। प्रभु, बचपन से मेरे मित्र हैं। कुछ समय हमारे घर में भी रहे। इनकी खूबी देखिए कि मेरे ही घर में मेरी माँ के मुझसे सगे बेटे हो गये थे। माँ इन्हीं से अपने सुख-दुख कहती थी, इन्हीं को किस्से सुनाती। मैं घर में अतिथि लगता। प्रभु जोशी हमेशा लाल लीड से लिखते। लंबी-लंबी चिट्ठियाँ। लंबी-लंबी कहानियाँ। मैं क्लास अटेंड करने जाता। प्रभु लिखने बैठते। मैं लौटता। इनकी बीस पच्चीस पेज की कहानी तैयार। बिना काट-पीट के। छपने भेजते। धर्मयुग और सारिका में खूब छपते। सेलिब्रेटी लेखक की तरह। जब जो धुन सवार हो जाये उसमें डूब जाते। मेडिकल की किताब पढ़ने की धुन सवार हुई तो मेरी मोटी-मोटी किताब रट डालीं। मेरे दोस्त आते तो प्रभु डॉक्टरी डिस्कस करते। नये मित्र इन्हें ही डॉक्टर समझते। इतना ही नहीं यदि कोई बड़ी, नयी बीमारी के बारे में पढ़ा तो खुद को उसका बड़ा शिकार समझते। इसी कारण इनका विवाह देर से हुआ। एक बार इनकी लगभग तय शादी इसलिए न हो सकी कि प्रभु जोशी को लगा इन्हें किडनी की ऐसी असाध्य बीमारी हो चुकी है जिसके कारण चंद दिनों के मेहमान हैं। तब किडनी की वह बीमारी दुर्लभतम थी। ये किसी लड़की को असमय विधवा नहीं बनाना चाहते थे इसलिए पीछे हट गये। जबकि ये अब तक ठीक ठाक हैं। खूब मेहनत कर लेते हैं। प्रभु जोशी को गाने का भी बड़ा शौक था। अभी भी है। खूब गाते और कुमार गंन्धर्व के यहाँ दसेक दिन तक सीखने बैठे रहते। कुल मिलाकर प्रभु जोशी, प्रभु जोशी हैं। जो करें खूब करते हैं। इनका मूल्यांकन होना बाकी है।

ऊपर का यह उद्धरण इसलिए कि कुछ लेखक-कलाकार ऐसे भी होते हैं जिनके कदमों के निशान आलोचना के राजमार्ग पर नहीं मिलते। वे अपनी मिशाल आप होते हैं। उनकी गवाही पाठक देते हैं या समकालीन रचनाकार। प्रभु जोशी ऐसे ही विरल कहानीकार, उपन्यासकार, चित्रकार, फिल्मकार, लेखक और मीडियाकर्मी रहे हैं। वक्ता ऐसे कि बोलना एक यादगार परिघटना हो जाये। प्रभु जोशी के बाद किसी और वक्तव्य की जगह ही न रह जाये। इससे पहले कि उनकी कहानियों पर कोई बात कहूँ एक और प्रसंग-

प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा अप्रतिम कहानीकार शिवमूर्ति का कहानी पाठ और आलोचक शंभु गुप्त का व्याख्यान आयोजित होना तय हुआ था। 2007-08 की बात है। परिकल्पना, और आयोजन को अभूतपूर्व बना देने का संकल्प कथाकार, तबके इंदौर इकाई सचिव सत्यनारायण पटेल का था। सत्यनारायण पटेल, प्रलेसं इंदौर के लिए हाड़तोड़ मेहनत करनेवाले, और ज़रूरत आ पड़े तो जान लगा देनेवाले साथी थे। सत्यनारायण पटेल, अपनी धुन और जिद के लिए विख्यात हैं। उनका प्रण था कि मेरे सचिव रहते इकाई के अध्यक्ष की किताब पर भी गोष्ठी इसलिए नहीं होगी कि वे अध्यक्ष हैं। अपने लोग अपने हैं संगठन मुद्दों और ज़रूरी लड़ाइयों के लिए है। खैर, सत्यनारायण पटेल और मैं रोज़ साथ होते। वे रोज़ कहते यह मेरा आखिरी कार्यक्रम है। इसके बाद चाहे जो हो। तुम चाहो तो सचिव बन जाओ। सब एक एककर जाना चाहते हैं। मैं भी थक चुका हूँ। कार्यक्रम तय हुआ। सत्यनारायण पटेल ने शिलालेख तैयार करवाने की तरह कार्ड पर सारी बुद्धि, कल्पनाशीलता झोंक दी थी। सत्यनारायण पटेल की वर्तनी में तब हाथ तंग हुआ करता था। उसके लिए मैं था। दृष्टि और मंतव्य में वे हमेशा साफ़, दूटूक रहे हैं सो उन्हीं ने तय किया था टेक्स्ट। लक्ष्य था कम से कम दाम में अभूतपूर्व कार्ड छपे। एक हज़ार पर्चे भी छपवाये गये थे। मालवी आमंत्रण था- आवजू। सैकड़ों एसएमएस, ईमेल हुए। जब पर्चे पलासिया चौराहे, विश्वविद्यालय परिसर और गांधी हाल में सीताराम येचुरी के कार्यक्रम मे बांटे गये तो मैं भी साथ था। नया नया था सो लपककर पर्चे बाँटने में मुझे शरम आती तो सत्यनारायण पटेल उसी मुद्रा में समझाते जैसे गोर्की किसी युवा लेखक को समझाता होगा। याद रहे सत्यनारायण पटेल ने कहानी में अपने लिए सदा गोर्की जितना ऊँचा लक्ष्य रखा। ज्ञानरंजन और वरवर राव उनके किंचित बड़ी उम्र के दोस्त हैं।

कार्यक्रम की तारीख आने में कुछ दिन रह गये होंगे कि प्रभु जोशी को भनक लग गयी। उन्होंने सत्यनारायण पटेल के सामने प्रस्ताव रखा कि मुझे भी दूरदर्शन के लिए शिवमूर्ति का इंटरव्यू करना है। शिवमूर्ति, शहर मे आ ही रहे हैं तो दूरदर्शन पर भी उनका इंटरव्यू प्रसारित होना चाहिए। उन्होने सत्यनारायण पटेल से बात की। क्या पूछा, क्या आग्रह किया मैंने सुना नहीं लेकिन सत्यनारायण पटेल ने फैसला कर लिया था शिवमूर्ति दूरदर्शन नहीं जायेंगे। वे प्रलेसं के कार्यक्रम में आ रहे हैं। हमारे साथी ही उनका इंटरव्यू भी करेंगे। प्रभु जोशी दूरदर्शन के लिए काम करते हैं। दूरदर्शन सक्षम है। उसके पास धन है। शिवमूर्ति को अलग से बुलाएं। जितना लंबा करना हो उतना लंबा इंटरव्यू करें। प्रलेसं का समय साथियों का समय है। ऐसे फैसले मेरी समझ से परे थे। कदाचित मेरी आपत्तियाँ भी बचकानी रही होंगी कि उन्हें कोई भाव नहीं दिया गया। मैं कुछ नहीं कर सकता था फिर भी मेरी बात प्रभु जोशी से हो रही थी। शिवमूर्ति से हो रही थी। शिवमूर्ति जी मुझसे कह रहे थे भाई, मैं धरम संकट में पड़ गया हूँ। प्रभु जोशी मेरे बड़े पुराने मित्र हैं। मैं जाना चाहता हूँ उनके घर और दूरदर्शन। आप लोग आपस में सुलह कीजिए। कोई रास्ता निकल आये तो ठीक रहेगा। ऐसे अलगौझे वाले झगडे ठीक नहीं। मैंने सत्यनारायण भाई साहब से कहना चाहा तो उन्होंने समझाईश वाला आदेश दिया बीच में मत पड़ो। तुम नहीं समझोगे। लोग मुझे खा जायेंगे। यह मेरा आखिरी कार्यक्रम है। कोई समझौता नहीं होगा।
कईयों के फोन इधर उधर बजे। तनातनी, ईर्ष्याएँ और ग्लानियाँ निकलीं। बड़ी-बड़ी बातें उपजीं। समझौता हुआ कि शिवमूर्ति प्रभु जोशी के घर जा सकते हैं लेकिन कार्यक्रम के बाद, देवास के कार्यक्रम से ठीक पहले। प्रभु जोशी को इससे ही संतोष करना पड़ा। फलस्वरूप वे कैमरा लेकर कहानी पाठ शूट करने इंदौर प्रेस क्लब के हॉल आये। दूरदर्शन में ये उनके आखिरी के साल थे। शासकीय सेवा में LTR का वह दौर जब कोई अपनी बची हुई छुट्टियों का आवेदन भी खुद नहीं लिखना चाहता। उस कार्यक्रम में कॉमरेड होमी दाजी को व्हील चेयर के साथ कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ले आये थे। किसी को कोई मध्यस्थता करने का अधिकार नहीं था। एक बार कार्यक्रम तय हो जाये तो उसे वैसा ही होना चाहिए जैसा ठीक समझा गया यह अलिखित नियम था। पहले बहस हो सकती है बीच का हस्तक्षेप नहीं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग आये थे। जिस कार्यक्रम को सुनने व्हील चेयर पर कॉमरेड होमी दाजी आयें उसके बारे में और क्या कहा जाये? कार्यक्रम समाप्ति पर वहीं से शिवमूर्ति प्रभु जोशी के संवाद नगर वाले घर रवाना हुए। उनकी पेंटिंग पायी और वापस हम सब देवास अगले पड़ाव पर चले। इस प्रसंग का उपसंहार यह कि प्रभु जोशी के लोग अगर कायल हैं तो वे भी साहित्यकारों के लिए मान अपमान की परवाह नहीं करते। सत्यनारायण पटेल से अगर कोई काम ठीक से नहीं हो सकता तो वह है प्रशंसा। बावजूद इसके वे कहते हैं प्रभु दा ने अच्छी लंबी कहानियाँ लिखीं। मैं कई बार सत्यनारायण पटेल की बाईक में बैठकर प्रभु जोशी के घर गया।

हिंदी कहानी लगभग सवा सौ सालों में विन्यस्त है। हज़ारों कहानियाँ। कई कहानी युग, कई दौर, कई आंदोलन, कई वाद, कई विमर्श आये और गये। कथ्य को केन्द्र में रखकर देखें तो कहानियों में कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। आज भी कहानी यथार्थ का उद्घाटन कर रही और संदेश दे रही है। शायद अपनी इस आत्मा को वह हमेशा बचाकर रखे। कहानी की भाषा, और रूप में जो बदलाव आये वे अधिकतर युगीन ही रहे। विषय भी खूब नये से पुराने एवं पुराने से नये किये गये। किसी प्रतिज्ञा, विचार में आजीवन निबद्ध कहानीकार कम ही रहे। विचारधारा में प्रशिक्षित कहानीकारों ने भी चरित्रों और घटनाओं को लोकतांत्रिक तरीके से ही विकसित होने पर जोर दिया। कहानी में जितनी विविधता और प्रयोग मुख्य रहे उतनी ही पुरानी इतिवृत्तातमकता और परंपरागत शैली भी। किसी अत्यंत प्रयोगशील कहानी के लोकप्रिय होने के साक्ष्य कम ही मिलते हैं। फौरी तौर पर कोई कहानी या कथाकार भले कहीं से संबद्ध दिखे लेकिन अपनी कथा-प्रकृति में है स्वायत्त। कथा साहित्य में स्थान आज तक ऐसा ही चला आ रहा है कि कोई कथाकार दो तीन कहानी लिखकर अमर हो गया तो कोई कहानीकार दो तीन सौ कहानियाँ लिखने के बाद महज दो तीन कहानी के लिए जाना जाता है। कहानी आलोचना विकसित न हो पाने और सर्जनात्मक कथा आलोचना की गतिशील परंपरा न होने के कारण कहानीकार यादृच्छिक रूप से प्रसिद्धि और सम्मान के लिए संपादकों, पुरस्कार समितियों, पत्रिकाओं, समीक्षकों यहाँ तक कि ब्लॉग और फेसबुक पर भी निर्भर हैं। किसी को किसी का उत्तराधिकारी ठहरा दिये जाने में देर नहीं लगती। कहानीकार की तारीफ़ करनी है तो प्रेमचंद परंपरा का कह दिया जाता है। आज हिंदी कहानी में कोई दूसरी ढंग की परंपरा है इसके निशान भले मिलते हों लीक नहीं मिलती। नयी कहानी, जनवादी कहानी, अकहानी, समांतर कहानी, सचेतन कहानी, समकालीन कहानी आदि ऐसे नामकरण हैं जो किसी बड़ी कमी और विवशता के संकेतक स्वयं हैं। इन दिनों हालात इतने विचित्र हैं कि कहानीकारों के परमिट, लाईसेंस और एकसपायरी डेट चर्चा के विषय हैं। कोई युवा कहानीकार अपनी पहली कहानी से ही ऐसे नक्षत्र की तरह उदित हो सकता है जिसके पीछे पूर्ववर्तियों की चमक फीकी पड़ जाये तो कोई प्रतिबद्ध कहानीकार 40 साल के पहले कहानी संग्रह न छपवा पाने, एक भी ढंग का सम्मान न हथिया पाने के कारण साहित्यिक विस्मृति के ब्लैकहोल में समा सकता है। नया नया और युवा युवा का शोर हमेशा से चला आया है लेकिन अब वह दौर है जब कोई वरिष्ठ किसी क्षण चुका हुआ साबित किया जा सकता है। कहानी की बात कम हो चली है। कहानीकार भी मोबाईल फोन उपभोक्ता की तरह लास्ट काल और रिचार्ज से वेरीफाई हो रहा।

ऐसे मैगी और जियो उपभोक्ता कथा समय में यदि कोई यह पूछ बैठे कि प्रभु जोशी कौन? कौन है यह प्रभु जोशी नामधारी? तो अचरज तक न होना स्वाभाविक है। जबकि सच्चाई यह है कि प्रभु जोशी सत्तर के दशक में कमलेश्वर और धर्मवीर भारती की पसंद और स्वाद का लाडला कथाकार था। जिसकी कहानियाँ पाठकों के बीच पढ़ी जाने, सराहे जाने से ऊपर याद रह जानेवाली थीं। 1977 मे प्रकाशित आखिरी कहानी को मिलाकर मेरी स्मृति में प्रभु जोशी के नाम से लगभग 25 कहानियाँ मिलती हैं। सभी लंबी कहानियाँ। हिंदी कहानी में लंबी कहानियों के कृतिकार के रूप में निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, शैलेश मटियानी, संजीव, प्रियंवद, चंद्रकिशोर जायसवाल, उदय प्रकाश, अखिलेश, शिवमूर्ति आदि का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। 1980 के पूर्व लिखी गयीं प्रभु जोशी की कुछ यादगार लंबी कहानियाँ हैं- पितृ ऋण, उखड़ता हुआ बरगद, कमींगाह, शुरुआत से पहले, आकाश में दरार, धूल और धूल, इतना सब बे आवाज़ और अग्नि मुहानों पर।

इतना सब बे-आवाज़ की मुख्य पात्र स्त्री और नर्तकी है। वह भोपाल के एक उद्योगपति, कलाप्रेमी, बड़े आयोजक की प्रेमिका है। है तो वह आकंठ प्रेम में ही लेकिन एक दिन एक राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रम में प्रस्तुति दे चुकने के बाद अपने प्रेम और लिव इन रिलेशन के लिए लोक भर्त्सना का अति प्रचलित शब्द रखैल सुनकर विचलित हो जाती है। इसके बाद शुरू होती है उसकी यातना, पुरुषों की दुनिया में अपनी पहचान तलाशने की जद्दोजहद की अंतहीन दास्तान। क्योंकि यह सार्त्र और सीमोन की दुनिया नहीं है। इस कहानी की उदासी हमें संजीव की प्रसिद्ध कहानी मानपत्र की याद दिलाती है।

अग्नि मुहानों पर, कहानी प्रभु जोशी की साहसिक और जोखिम भरी कहानी है। इस कहानी में शिक्षिका बहन है जिसकी कोख में प्रेमी का बच्चा ठहर जाता है। माँ से सलाह मशविरा करने के बाद छोटा भाई इंदौर के एक नरसिंग होम में बड़ी बहन को गर्भपात के लिए लेकर जाता है। पिता संयोगवश किसी काम से कई दिनों के लिए बाहर गये हुए हैं। बस की यात्रा में जाती हुई बहन की स्थिति, लगभग एक सप्ताह बाद छोटे भाई के साथ बहन के लौटने की मनोदशा, भेद खुलते ही घर में बहन पर भाभी का शोर की तरह फैलता चारित्रिक हमला, माँ की दमघोटू यंत्रणा, गाँव पड़ोस में साथियों के मज़ाक-तंज, बहन के स्कूल में सहकर्मियों द्वारा अप्रकट जग हँसाईं, इन सबके बीच बहन की कहानी के आखिरी लाईन लिखे जाने तक लगातार मूक केन्द्रीयता कहानी विधा की हरसंभव खूबी को प्रकट करनेवाली है। इस कहानी का भाई एक बड़ा चरित्र है। बल्कि कहना चाहिए स्त्रियों के लिए एक बड़ी आश्वस्ति और संभावना है। कहानीकार प्रभु जोशी की दक्षता इसमें है कि मुख्य पात्र बहन शुरू से अंत तक भाई, माँ, सबके सम्मुख चीखती हुई सी चुप है। कलपती हुई सी दृढ़ है। गर्भपात के बाद टांगों में ताकत न रह जाने के बावजूद वृक्ष सी अचल है। एक सचमुच की स्त्री जो टूटती नही, अंत तक जीवन के लिए खड़ी रहती है। प्रेम तक चलकर पहुँचती है। भाई-बहन के संबंध और ऑनर किलिंग पर समकालीन कहानी के महत्वपूर्ण युवा हस्ताक्षर चंदन पांडेय की एक कहानी है रेखाचित्र में धोखे की भूमिका। मेरे खयाल से यदि इन दो कहानियों को एक साथ पढ़ा जाये तो भारत में स्त्रीत्व की धरती अपने समूचे रूप में दिखायी देगी। यह अनायास नहीं है कि प्रभु जोशी की कहानी धूल और धूल में पाठक प्रेमचंद की कहानी बड़े भाई साहब की गरिमा और उदात्तता पाते हैं।

पितृऋण, प्रभु जोशी के कहानी संग्रह का भी नाम है। आत्मकथ्य, ‘अभी तय करना है हँसना’, ‘किरिच’, ‘मोड़ पर’, ‘उखड़ता हुआ बरगद’, ‘कमींगाह’, ‘एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी’, ‘शायद ऐसे ही’ तथा ‘शुरुआत से पहले’ को मिलाकर इसमें कुल आठ कहानियाँ हैं। ये आठ कहानियाँ यथार्थ और संवेदना की धरती की उपग्रह हैं। स्वायत्त कथा सृष्टि।

इस किताब को पढ़ना भारतीय मनुष्यों की बस्ती में रमकर गुज़रना है। प्रभु जोशी के पात्रों की दुनिया इतनी विविध, बहुरंगी और स्वत:स्फूर्त तथा स्वायत्त है कि लगता है जैसे भाषा के कैमरे से काग़ज़ पर उतारा हुआ बहुत अपना देश। अपनी ही स्मृतियाँ, सपने और आकांक्षाएँ। अपना ही जीवन और जिजीविषा।

‘पितृऋण’ एक सादा कहानी संग्रह है जिसमें वे सारे वैभव हैं जो किसी सच्ची किताब में होते हैं। जिन्हें चमत्कार या आश्चर्यलोक की दरकार है अच्छा है कि वे दूसरी किताब खरीदते हैं। कहानी की उत्कृष्टता के विज्ञापनी समय में कहानियों की यह किताब समय, समाज, मनुष्य और संवेदनाओं के प्रति हमारे ऊपर चढ़े ऋणों का पता देती है। 

बहुत से समर्थ और अति प्रसिद्ध कहानीकारों के संबंध में इस किताब के बहाने एक बात दर्ज़ करने लायक है कि साहित्यिक सत्ताकामी उद्यमों से हमेशा दूर प्रभु जोशी जैसे कहानीकार यदि कुछ दिन के लिए भी उस फलदायिनी राह पर चल पड़ें तो उनका क्या होगा? पर नहीं, प्रभु जोशी ने सदैव खुद से माँगा जो माँगा, चाहे दृश्य श्रव्य कार्यक्रम हों, चाहे चित्र, चाहे कहानियाँ या फिर सालों गूँजने वाले लेख। इस कलाकार को मिली प्रसिद्धि और अंतर्राष्ट्रीय सफलता फूलों के साथ चली आती खुशबू जैसी है। प्रभु जोशी शब्द, वचन और रंगो के सिद्धहस्त कलाकार हैं। त्रिविमीय सर्जक। भाषा, रंग, दृश्य, दर्शन, राजनीति, सपने, विचार और संवेदना ये सब जब एक जगह गलते-ढलते हैं तो प्रभु जोशी का रचनाकार प्रकट होता है। 

प्रभु जोशी की कहानियों में रंग, दृश्य, संवेदना और विचार इस तरह घनीभूत होते हैं कि कोई पारखी बता सकता है कि वे अपनी कहानियों से जब विरत हुए होंगे तो उन्हें चित्रों में बदल दिया होगा। कहानियों में चित्र खींच देनेवाला यह कथाकार जब विचार की दुनिया में उतरता है तो व्यंग्यकार होता है। भाषा का साधक, दृष्टा और चित्रकार तीनो मिलकर प्रभु जोशी का कथाकार हैं।

कथाकार से कम से कम मेरी अपेक्षा आज भी वही है कि उसके पास सच हो, दर्शन हो और अबूझ से रोज़ बीतते जीवन को समझ लेने, उसे पा लेने और उसके मर्म में गोते लगा लेने की कूव्वत हो। कहानी कौशल नहीं है। डूबते को तिनके का सहारा है। कहानी के व्यावसायिक लेखन या महज़ कला हो जाने से पहले के कहानीकार ऐसे ही थे। संत से, दार्शनिक जैसे और कभी कभी तो बिल्कुल दीवाने।

तकनीकि मनुष्य को चाहे जितना नया बना ले आयी हो पर कहानियाँ यही बताती हैं कि वह आँसू और सपनों से रचा हुआ वही है सबसे पुराना। जब किसी कथाकार में ऐसी कहानियों की धारिता दिखती है तो वह अपना लगता है। प्रभु जोशी होना नयी दुनिया में, नये लिबास में उसी पुराने मनुष्य की किस्सागोई है। यह मानुष जितना देहात का है उतना ही नगर का।

प्रभु जोशी के भीतर भारतीय कहानीकार है। कहानीकार, जिसे नगर और गाँव दोनो की नब्ज़ पता है। उन्होंने भले कम कहानियाँ लिखीं, पहले खूब लिखीं, फिर बंद कर दीं अब लिखना चाहते हैं पर नहीं लिखते लेकिन जो लिखीं वे इतनी गाढ़ी हैं कि यदि समकालीनता या कथित प्रसिद्धि की रोशनी से हटकर उनमें उतरा जाये तो वे एक विवेकपूर्ण दुनिया में ले जाती हैं। जहां संबंध हैं, सवाल हैं तो इंसानी समाधान भी हैं। यथार्थ प्रभु जोशी की कहानियों में वैसे ही है जैसे बकरी के थन में दूध होता है। जिन्हे दूध मोल मिलता है वे इस यथार्थ के राग को पकड़ नहीं पायेंगे। 

कहानीकार की उम्र होती है। कहानियाँ बूढ़ी नहीं होती। भाषा कभी अपनी चमक नहीं खोती यदि उसमें संवेदना हो मर्म हो और जीवन के सच हों। भाषा के मामले में प्रभु जोशी पूरे कुम्हार हैं दिया, घड़ा, ईंट और सुराही सबके लिए एक ही मिट्टी कैसे अलग अलग रूँधी जाती है उनसे बेहतर कौन जानता है? ‘शुरुआत से पहले’ कहानी को लें तो यह जितनी कहानी है उतनी ही भाषा की नदी। पात्र जिस तरह बोलते हैं उनकी निजता जिस तरह उतर आती है, जिस तरह का नैरेशन है वह बेजोड़ है। मालवी लोकोक्तियों के संबंध में यह लंबी कहानी कोश की तरह है। पेशे, सामाजिकता और जीवन सत्यों को उद्घाटित करते उखान यहाँ भरे पड़े हैं। यह मालवी में मालवी की सीमा लाँघकर एक बोली को सार्विक अभिव्यक्ति का गौरव देनेवाली कथाभाषा है। जिसे आंचलिक रहकर महत्व जुटाने की फिक्र नहीं है बल्कि आंचलिकता को सर्वग्राही बनाने की साधु ज़िद है।

‘शुरुआत से पहले’ एक कुम्हार की कहानी है जो पैसे के लिए देवी की मूर्ति बनाता है। अपनी ही बनायी देवी से डरता है। एक दिन जब मूर्ति बन जाती है तो वह पाता है कि ग़लती से मूर्ति की पूजा हो चुकी है। पूजित मूर्ति अब कहीं नहीं जा सकती। बेची तो हरगिज न जायेगी यही प्रण कर बदरीप्रसाद अपनी जान पर खेल जाता है। अपनी ही निर्मिति पर जान देना कला के इस मूल्य के अलावा इस प्रक्रिया में जिन सामाजिक सत्यों का उद्घाटन हुआ है वे औपन्यासिक हैं। 

‘पितृऋण’ किताब की कहानियों को इस तरह पढ़ना कि ये एक कहानीकार की उसके उठान के दिनों के मील के पत्थर हैं ग़लत होगा इन कहानियों को रचनाकाल से बाहर अपने समय में पढ़ना सुखद रहेगा कि ये ऐसी कहानियाँ वास्तव में हैं जिनमें आज गूँजता है। कल का वैभव और मुहावरा बोलता है।

‘पितृऋण’ संग्रह की पहली कहानी है। यह कहानी बड़ी मार्मिक है। यदि आप इसे पढ़ेंगे तो कभी भूल नहीं पायेंगे। इस कहानी में होता यह है कि एक बहुत लायक बेटा अपने लाचार वृद्ध पिता को तीर्थ कराने के बहाने गंगा ले जाता है। पिता बड़े अरमान से अपनी पत्नी की अस्थियाँ भी साथ रख लेता हैं कि सुपुत्र के बहाने आ पड़े इस नसीब में वह अभागिन भी तर जायेगी। जैसे ही पिता गंगा में डुबकी लगाते हैं बेटा उनकी खुदरा पूँजी लेकर इत्मीनान से लौट जाता है। अब नहाये हुए अशक्त किंतु कृतज्ञ पिता के पास कुछ नहीं है। अपनी स्मृति और भीख के जोड़ से बनी पूँजी से शायद पिता लौट भी न पायेगा। जिस तरह से यह कथा लिखी गयी है उसमें लोक कथाओं के उस अभाव की पूर्ति भी हो जाती है जिसमें दुखियारी अधिकांशत: उपस्थित औरते होती हैं। इसमें अनुपस्थित औरत और माँ जिस तरह आँखों के सामने आती है वैसा केवल लोकगीतों में ही होता है। प्रभु जोशी की यह कहानी हिंदी की धरोहर है। इस कहानी के बूते वे उस पंक्ति के कथाकार हैं जिसमें ‘बूढ़ी काकी’ के साथ प्रेमचंद और ‘चीफ़ की दावत’ के साथ भीष्म साहनी आते हैं।

प्रभु जोशी ने कहानियाँ खूब क्यों नहीं लिखीं उन्हे पढ़नेवाला यह ज़रूर पूछेगा पर जब वह खूब लिखने और खूब प्रसिद्धि के उद्यमों से तंग आकर शांत बैठा होगा तो उसे यह सवाल भी उतना ही कोंचेगा कि प्रभु जोशी की कहानियाँ पढ़ी क्यों नहीं जा रही? कहानियों पर एक्सपायरी डेट की चिप्पी चिपकानेवाले होते कौन हैं? 

‘किरिच’ एक सांद्र प्रेम कहानी है। कुतुब मीनार में पहुँचने और उसके ढह जाने के प्रतीकों में जीवन भर और सबके जीवन में चलनेवाली कहानी है। यह प्रेम के उगने, उमगने और एक टीस में बदलते जाने की शाश्वत सी परिणति के उम्र भर के किस्से को लगभग एक दिन के भ्रमण के प्लॉट में समेट लेने की सफलतम कहानी है। यदि देख पायें तो भाषा के भीतर फिल्म।

प्रभु जोशी कहानी के भीतर फिल्मकार हैं। उनकी हर कहानी में फिल्म की संभावना है। लेकिन हमारे दौर में जिस तरह की वाचालता फिल्मों की उपजीव्य है उनके हामी शायद इन कहानियों को गले न उतार पायें।

हिदी कहानी के आदोलन आक्रांत दौर में विषय खोज खोजकर कहानियाँ लिखी गयीं। जब विषय कम पड़ गये तो आंतरिक सूखे, निर्वासन, आत्मालाप और मृत्यु जैसे विषय को भी खूब घसीटा गया। नतीजे में ऐसी चर्चित कहानियाँ निकली जिनके पात्र एक सी भाषा बोलते हैं, इतनी एकरूपता कि लगता है एक ही कहानी लिखने के लिए लेखकों की शिफ्ट बदल रही है। कभी कभी तो यह भी लगता है कि किसी कहानीकार का रिलीवर नहीं पहुँचा तो वही ओवर टाईम कर रहा है। ओवर टाईम कहानी लेखन के 70-80 के दौर में प्रभु जोशी ने इस इत्मीनान से कहानी लिखी कि उनकी कहानियों का किसान किसान की और मुसलमान मुसलमान की ज़बान बोलता है।

कहानी ‘मोड़ पर’ मंटो की कहानी ‘ब्लाउज’ की याद दिला जाती है। किशोर मन स्त्री का संग किस तरह चाहता है और समाज उसे निरंतर कितनी वंचना में धकेलता रहता है इसे कहानी जीवंत कर देती है। ‘उखड़ता हुआ बरगद’ पढ़कर काशीनाथ सिंह की कहानी ‘अपना रास्ता लो बाबा’ याद आती है। जो ‘अपना रास्ता लो बाबा’ बाद में पढ़ेगा उसे ‘उखड़ता हुआ बरगद’ याद आयेगी। कोई पाठक शायद ही ऐसा मिले जो दोनों में से किसी एक कहानी को चुनना चाहे। प्रभु जोशी के कहानीकार की यही खासियत है वे एक साथ कई कथा पीढ़ियों को अपनी निजता और अद्वितीयता में आत्मसात किये हुए हैं। लगभग सन्यस्त हो चला हिंदी का यह कथाकार जितना अपने दौर का है उतना ही हमारे दौर का है। प्रभु जोशी को पढ़ते हुए यदि कमलेश्वर याद आयें तो प्रियंवद भी ज़रूर याद आयेंगे।

यह कहना काफ़ी होगा कि संग्रह की कहानी ‘कमीगाह’ ज़रूर पढ़ें। इस कहानी को पढ़कर ही जाना जा सकता है कि केवल परकाया प्रवेश काफ़ी नहीं हिंदुस्तानी कथाकार में परधर्म प्रवेश कर मनुष्य को गले लगा लेने की सिद्धि भी होनी चाहिए थी। प्रभु जोशी क्या किसी कथाकार कि इससे बड़ी सफलता क्या होगी कि उससे ‘पितृऋण’, ‘शुरुआत से पहले’, ‘उखड़ता बरगद’ और ‘कमीगाह’ जैसी कहानियाँ केवल कुछ वर्षों में संभव हो जायें। 

प्रभु जोशी अनेक आयामी कलाकार-लेखक हैं। चिंतन परक राजनीतिक लेखन, कला समीक्षा से लेकर मुक्तिबोध की कविता अँधेरे में पर रेडियो रूपक के लिए साउंड रिकॉर्डिंग की खातिर रीवा के शमशान में रात को जा बैठने की धुन तक उनकी साधना विरल और अद्वितीय है। बहुत कम लोग जानते हैं कि जब प्रभु जोशी ने मन्नू भंडारी की कहानी ‘दो कलाकार’ पर फिल्म बनाई तो इस कहानी के पात्रों की, स्थितियों की पेंटिंग भी बनाई। चित्रकार और एक्टिविस्ट सखियों की फिल्म में पेंटिंग बनाने का काम भी कोई प्रभु जोशी जैसा फिल्मकार ही कर सकता है। 

परिश्रम में कोई उनका सानी नहीं। हमेशा सफेद शर्ट काले पैंट, सर्दियों में कोट सूट या काले जैकेट में दिखाई देनेवाले प्रभु जोशी छिछले हास्य और मसखरी से 20 गज दूरी का संबंध रखते है। दाँत निपोर देना उनकी नज़र में सबसे बड़ी दुष्टता या पराभव है। भाषा की किसी लक्ष्मण रेखा को कभी न लाँघनेवाले प्रभु जोशी रंग, वाणी और शब्द के अतुलनीय साधक हैं। अपनी विधा का स्वयं शिक्षित बड़ा जलरंग चित्रकार। अंग्रेज़ी भाषा में गोल्ड मेडलिस्ट। बेहतरीन अंग्रेज़ी लिखने बोलनावाला हिंदी का जुझारू सिपाही जिसके लेख ‘इसलिए हिंदी को विदा करना चाहते हैं हिंदी के कुछ अखबार’ का हिंदी समाज सदैव ऋणी रहेगा। हिंग्लिश के खिलाफ़ उनके द्वारा जलायी गयी हिंदी के चुनिंदा बड़े अखबारों की होली भी हमेशा याद रखी जानेवाली परिघटना है।

किसी किस्म की नीचता या स्वैराचार के विरुद्ध प्रभु जोशी का विनम्र विरोध देखने लायक होता है। जब वे आकाशवाणी में रहे तब अफसरों से जूझते रहे, कभी न भरे जा सकने वाले नुकसान सहे लेकिन समझौता नहीं किया। आजीवन बड़े पद में न आ सके लिखने-पढ़ने, कला-साधना को इतना सर्वोपरि रखा। जाननेवाले बताते हैं प्रभु जोशी ने हमेशा दूरदर्शन, आकाशवाणी की शेर की जबड़े जैसी नौकरी के भीतर खुद को बचाये रखा। अपनी रीढ सीधी रखी। जबड़े भींचकर, मुट्ठी तानकर बात कही। राजनीतिक सक्रियता आरोपित कर, सत्यनिष्ठा पर हमले की धूर्त नौकरशाही युक्ति द्वारा टर्मिनेशन के कगार तक साजिशन पहुँचाये गये लेकिन अपनी सफेद कमीज की कालर पर नौकरशाही की मैल नहीं लगने दी। आकशवाणी छोड़ दूरदर्शन में आये। केवल नौकरी बची रहने दी। निगाह हमेशा कला और भाषा पर रखी। प्रभु जोशी अपने पेशे, कृतित्व में कमलेश्वर, धर्मवीर भारती और अज्ञेय जैसी शख्सियतों की याद दिलानेवाली विनम्र उपस्थिति हैं।

लेकिन जैसा कि हर बड़े रचनाकार-कलाकार के अतिवाद होते हैं प्रभु जोशी के भी हैं। वे प्राच्य और भारतीय परंपराओं से पैदा होनेवाली आधुनिकता, प्रगतिशीलता की वकालत में अपने सारे अध्ययन, सर्जनात्मकता को दांव पर लगा देने से भी नहीं चूकते। तब उनकी हालत तसलीमा नसरीन या मकबूल फिदा हुसैन से बहुत भिन्न नहीं होती। जिनके बारे में प्रभु जोशी की ही स्थापना है कि फिदा हुसैन एवं तसलीमा नसरीन की एक ही समस्या है जो उन्हें एक सा साबित करती है वह यह है कि तसलीमा हिंदू चरमपंथियों को नाराज़ नहीं करना चाहतीं और हुसैन मुस्लिम चरमपंथियों को। एक की शरणस्थली हिंदुत्व है दूसरे की इस्लाम। प्रभु जोशी के मानस पर भी एक हिंदू चित्त प्रतिष्ठित है। वे बिल्कुल हजारी प्रसाद द्विवेदी की तरह इस मसले पर खुद को प्रश्नांकित किये जाने की हद तक दृढ़ रखने, प्रकट हो जाने से नहीं रोकते। गांधी और नेहरू के प्रति उनकी प्रश्नाकुलता जब तब मुखर होती रहती है लेकिन अंबेडकर के प्रति समर्थन में वे उन्हीं के शब्दों में कभी बरामद नहीं हुए। यद्यपि प्रभु जोशी का सृजन उनके तमाम पारिवारिक,धार्मिक, नागरिक अंतरविरोधों का भी उन्मूलन करनेवाला है इसमें दो राय नहीं। जो केवल उनके सरस्वती का चित्र बना देने मात्र से नहीं फड़फड़ा उठते उन्हें उनके जीवन और जीवन के पीछे के तर्कों में पर्याप्त संगति मिल सकती है।

एक सीमा भी उल्लेखनीय है कि साहित्य में प्रभु जोशी की प्रथम नागरिकता हिंदी की नहीं है। अति समृद्ध उद्धरण सामर्थ्य होने के बावजूद वे हिंदी की कोई पंक्ति कोट नहीं कर पाते। उनका विस्तृत साहित्यिक चेतन और अवचेतन अंग्रेज़ी में उपलब्ध साहित्य से ही परिचालित होता है। उनके अध्ययन का मुख्य क्षेत्र अंग्रेज़ी में उपलब्ध साहित्य बिल्कुल शुरुआत से रहा है। बावजूद इसके उन्होंने बहुतों से कहीं अधिक हिंदी का साहित्य पढ़ा है; उसकी बहुलता में डुबकी लगायी है। क्योंकि प्रभु जोशी जितना जाग सकते हैं उतना पढ़ने के लिए जागनेवाले विरले होते हैं। लेकिन हिंदी के समकालीन साहित्यकारों से गप्प, गोष्ठियों का राब्ता न रख पाने की यह एक बड़ी वजह है। प्रभु जोशी कदाचित इस बात के लिए असमर्थ ही पाये जायेंगे कि वे किसी से मिलने पर उसकी कहीं प्रकाशित महत्वपूर्ण रचना की याद कर बातचीत शुरू कर सकें। अपने समकालीनों के बीच कमतर उपस्थिति की क्या पता यही एक बड़ी वजह हो। क्योंकि हिंदी में संबंध निभाये जाते हैं, स्नेह लुटाये जाते हैं, प्रेम संबंधों के चालू खाते खोले जाते हैं। बड़े से बड़े हिंदी के लेखक युवतर लेखकों की किताबों की समीक्षा तक लिखते ही हैं। तमाम प्रतिबद्धता के बावजूद नामवर सिंह छद्म लेखिका स्नोवा बार्नो के मुरीद होने से बच न सके और हिंदी के अंबेडकर राजेन्द्र यादव कहानीकार ज्योति कुमारी के लिए जेल जाते जाते बचे। हिंदी का बड़ा लेखक किसी सम्मान, पुरस्कार समिति या फाउंडेशन में ही शामिल रहते अपनी रेंज बढ़ाता ही रहता है। 

अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि अनेक नदियों वाले देश भारत में मुझे प्रभु जोशी की उपस्थिति ब्रह्मपुत्र की याद दिलाती है जिसके तट पर भले मेले न लगते हों, श्रद्धालुओं का जमघट न लगता हो, कीर्तन न होते हों, लेकिन जिसके तट पर लोग अपने पाप भी न धोते हों। मूल बात जिसका जल भले ठंडा-सांवला हो लेकिन कभी सूखता नहीं। आप भी अपने अर्थ लगाने को स्वतंत्र हैं। बस एक ही गुजारिश है। ब्रह्मपुत्र को याद रखें।

-शशिभूषण
नोट: 'संवेद' में शीघ्र प्रकाश्य लेख का शीर्षक प्रभु जोशी के अनन्य पाठक एवं मित्र प्रद्युम्न जड़िया, सेवानिवृत्त वरिष्ठ उदघोषक की एक पाठकीय टिप्पणी से साभार लिया गया है।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (25-04-2017) को

    "जाने कहाँ गये वो दिन" (चर्चा अंक-2623)
    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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