गुरुवार, 18 मार्च 2010

सपने की याद

यह कविता मैंने अपनी उदासी,अकेलेपन और बेचैनी में कई कई बार लिखी.अनेक साथियों से शेयर किया.फिर भी इसे सार्वजनिक करने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी.डर था कहीं गलत न समझ लिया जाऊँ.इससे पहले मुझे कविता लिखकर खुशी मिलती रही है.सर्जना का सुख.पहली बार यह कविता लिखकर परेशान रहा.खुद से ही लड़ता रहा.किसी सहृदय राय की बड़ी ज़रूरत महसूस हो रही थी.शुक्रिया कथाकार मनोज कुमार पांडेय का जिनके सुझाव के कारण मैं न केवल इससे उबर पाया बल्कि आप सबके सामने रख भी पा रहा हूँ.



जब यह तय जैसा था
हमें कहीं ठौर नहीं मिलेगी
हमारे पूर्वज कभी सत्ता के आदमी रहे न जनता के
इतना जोड़ नहीं पाए कि खाते-पीते कहलाएँ
इतने आरामतलब न हुए कि दीन हो जाएँ
उनके पास आभासी इज़्जत थी
काफ़ी श्रम था
इस खातिर खटते,अपनों में ही जूझते रहे सदा
कि बाल बच्चे कटोरा लेकर खड़े न हों किसी के द्वार
न ही बन जाएँ चोर-चकार
अपनी सवर्ण ठसक में अछूत हैसियत के साथ
वे एक खास जाति ही रहे हमेशा
हमें छोड़ गए थे गैर बराबरी में अमिट पहचान देकर
हम पढ़ने में अच्छे थे
फिर भी रोज़गार के लायक नहीं थे
इसीलिए देखना चाहते थे आरक्षण को लचीला
हमें चाहिए थी किसी छोर में कैसी भी एक नौकरी
बिना मक़सद की हमारी सुबहें शाम जितनी बोझिल होतीं थीं
रातों को अक्सर एक सपना आता था
मैं छिटककर सफल हो गया हूँ
ऐसी जगह पहुँच गया हूँ
जहाँ मुझे नौकरी मिली है
हमें प्यार करनेवाली लड़कियाँ भी
इन दिनों जिसका ज्यादा इंतज़ार करती थीं
वहाँ सबकुछ होता था
लेकिन रंग-रूप,वेशभूषा में लोग दूसरे होते थे
उनकी भाषा किसी क़ीमत पर समझ में नहीं आती थी
मेरी पूरी वर्णमाला भी वैसी ही
सामनेवाले को असंभव होती थी
यह ऐसी मजबूरी थी
जो सुखद सपने को डरावना बना देती थी
मैं पसीने में लथपथ थरथराता हुआ जागता था
अकेली माँ को सोचकर प्रार्थना करता था
मुझे कभी जाना नहीं पड़े ऐसी सुख की दुनिया में
इतने सालों में जब वक्त काफ़ी बदल चुका है
रोज़गार उनके लिए भी नहीं बचा है
बकौल जगदीशचंद्र जिनकी खातिर धरती धन न अपना है
प्रायोजित भ्रम में जिनके द्वारा हम खुद को खदेड़ दिया गया समझते रहे
भारतीय भाषाओं का विकल्प बन चुकी अँग्रेज़ी
केवल हिंदी जानते हुए
मैं रहता हूँ चेन्नई के एक लॉज में
सबसे ऊपर अकेला
जहाँ नौकरी से थककर पहुँचना रोज़ शाम को
उमर का पहाड़ चढ़ना होता है
दिनभर बचपन का छूट गया सपना जीता हूँ
देर रात पानी पीता हूँ
अनजाने ही उसी जूठे पानी की चाय बनाता हूँ
फिर यह सोच कौन आएगा यहाँ
पी लेता हूँ चुपचाप
नींद में रोज़ जाता हूँ घर-गाँव
सुबह सुबह सपना याद करता हूँ.
खाली वक्त मे कोशिश करता हूँ.
अंग्रेज़ी से पहले तमिल सीख लूँ.


4 टिप्‍पणियां:

  1. "निराशाजनक तो है पर कविता में आशा भी है, कुलमिलाकर बढ़िया रचना है...."
    प्रणव सक्सैना
    amitraghat.blogspot.com

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  2. नींद में रोज जाता हूँ घर-गाँव
    सुबह सुबह सपना याद करता हूँ...


    -मेरी कहानी...मुझे बहुत पसंद आई आपकी यह रचना...

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  3. आपकी पीड़ा बेहद मार्मिक है ....मनोज जी को बधाई .

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  4. Shashi!
    Kavita achhi hai, Marmik... Kahani ke saath-saath kavita me bhi tumhari samvedna ka vistar achha lag raha hai... vaise Kavita ki samvedna ke saath kahani bhi achhi likhee ja sakti hai. tum achhi kahaniyan aur kavitayen likh rahe ho. Badhai.
    meri samajh me bhoomika me tumhe jis galat samajh liye jane ki aashanka hai, is tarah ki to to koi baat door-door tak nahi dikhati. meri jankari me to tum is tarah ki 'sanshayatma' to nahi ho..
    shayad ise likhne ke baad zyada Personal ho kar soch rahe ho. Likh diye jane ke baad 'main' main nahi rah jata. wo kisi-na-kisi aur main ke saath mil hi jata hai.. comments me bhi ye baat siddh ho hi rahi hai.
    @vivek,ahbd.

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