बुधवार, 3 मार्च 2010

शर्म

यह एक बड़ा सालाना आयोजन था.

एक भूतपूर्व प्रसिद्ध उद्योगपति की याद में उन्हीं के नाम से स्थापित हिंदी का सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक सम्मान समारोह.इसमें कई विधाओं के लिए वार्षिक पुरस्कार दिए जानेवाले थे.

हॉल खचाखच भरे होने की भी समुचित व्यवस्था की गई थी.बड़े-बड़े साहित्यकारों,आलोचकों,संपादकों,समीक्षकों,पत्रकारों,राजनीतिज्ञों,और कला जगत की जानी मानी हस्तियों के बीच अनेक साहित्यसेवियों के साथ भूपुष्प को भी सम्मानित किया जा रहा था.विभिन्न निजी,सरकारी टी वी चैनल समारोह को सीधा प्रसारित कर रहे थे.

भूपुष्प मूलत: कवि थे पर हिंदी की सभी प्रमुख विधाओं में काम कर चुके थे.उनकी चालीस साल की अभावों से जूझती अनवरत् साहित्य साधना में अब तक कोई बड़ा यश नहीं आया था.विख्यात पत्रिकाओं ने उन्हें खास तवज्जो नहीं दी थी.किसी बड़े प्रकाशन से कोई किताब नहीं छप सकी थी न किसी प्रसिद्ध आलोचक ने उन पर कभी कुछ लिखा था.राष्ट्रीय महत्व के आयोजनों में वे अपने ही खर्च से सम्मिलित होते रहे थे.जब तक सरकारी नौकरी की नियत आय रही अपने घर में प्रिय संगठन की गोष्ठियाँ करवाते रहे.फिर भी वे गुमनाम ही रहे सदा.पर प्रतिभा को कब तक नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?अचानक राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति में सफल हो गए बचपन के एक मित्र की बदौलत इस बार भी यह मुहावरा झूठ होने से बच गया था.पारखियों की नज़र उनपर भी डलवायी गई.खर्च खुद वहन करने की शर्त पर अपेक्षाकृत अच्छे प्रकाशन से किताबें छपवायी गयीं.यह बात अलग है कि अब भी उनके मौलिक लेखन को नहीं अनुवाद को पुरस्कृत किया जा रहा था.इसमें संतोष की बात यह थी कि किसी रूप में ही सही प्रसिद्धि भूपुष्प के हिस्से भी आई जिसके वे पुराने हक़दार थे.कहते हैं प्रसिद्धि बड़े-बड़े दरवाज़े तोड़ देती है इसी बहाने उनपर बात की शुरुआत हो रही है तो जल्द ही नया अध्याय भी खुलेगा ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है.

सबसे पहले भूपुष्प का संक्षिप्त परिचय पढ़ा गया.जिसमें खासतौर से यह उल्लेख किया गया था कि कैसे भूपुष्प जी ने उम्र के छठवें दशक में अत्यंत मुश्किल चीनी भाषा सीखी.फिर मध्यकालीन चीनी काव्य का गहन अनुशीलन किया तब जाकर इस अज्ञात कवयित्री को उन्होंने खोज निकाला.जिस पर आज तक किसी की नज़र नहीं पड़ी थी.जबकि हर साल चीन में ही सैकड़ों शोध होते हैं.इस कवयित्री की अनूदित कविताओं से गुज़रते हुए एक पल को भी यह नहीं लगता कि हम किसी चीनी समाज से बावस्ता हैं बल्कि लगता है जैसे भारतीय समय-समाज ही हमारे सम्मुख मूर्त हो रहा है.उसकी परतें खुल रही हैं.इसी बिंदु पर यह स्वीकार करना ही पड़ता है कि दुनिया एक गाँव है.देश विदेश की सीमाएँ कोई मायने नहीं रखतीं.यदि क्रांति के उजले दर्पण की तरह ये कविताएँ हमें प्रतीत होती हैं तो इसका काफ़ी श्रेय उत्तम अनुवाद को जाता है.आनेवाले दिनों में इस चीनी दलित कवयित्री की कविताओं के बहाने हिंदी में भी सार्थक बहस की शुरुआत हो सकेगी,भटके हुए विमर्शों को सही दिशा मिल सकेगी ऐसी आशा करना बिल्कुल उचित होगा.इस अवदान के लिए हिंदी समाज भूपुष्प जी का सदैव ऋणी रहेगा.

इसके बाद भूपुष्प जी को शॉल श्रीफल और ढाई लाख रुपये का चेक देकर उनके ही राज्य के लेखक राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया गया.पूरा दृश्य देखकर उनकी भावुक पत्नी की आँख में आँसू आ गए.बेटे और बहू ने पोते का साथ देते हुए ज़ोर की तालियाँ बजायीं.जब माहौल में सारस्वत शोर थोड़ा कम हो गया तो भूपुष्प ने संबोधित करने के लिए माईक सम्हाला.इस वक्त उनकी टांगें काँप रहीं थी और मुह से स्पष्ट बोल नहीं निकल रहे थे.लग रहा था जैसे वे अपनी किसी भीतरी लड़ाई में मारे जा रहे अपने ही बौने अवतारों की लाश निकाल रहे हैं.पर शुरुआती आभार संबंधी औपचारिकताओं के बाद उनकी आवाज़ साफ़-संयत हो गई.लोगों ने खुद को उन्हें सचमुच का सुनते हुए पाया.

पर यह क्या?भूपुष्प जी ने पहला वाक्य बोलकर ही सबको सकते में डाल दिया.-मैं आज सचमुच शर्मिंदा हूँ.मुझे यह नहीं करना चाहिए था.पर मैं मजबूर था.और वह रोने लगे.लोगों को लगा ऐसे मौको पर संवेदनशील कलाकार आमतौर पर भावुक हो जाते हैं तथा पुरस्कार ग्रहण करने की चाही गयी मजबूरी को भी अपराधबोध के शिल्प में प्रकट करते हैं इसलिए भूपुष्प को बोलने में जितनी तक़लीफ़ हो रही थी श्रोता उतनी ही बेचैनी से उन्हें झुठलाते हुए सुनना चाह रहे थे.आखिरकार भूपुष्प बोलने में सफल हुए उन्होंने कहा-मुझे माफ़ करें यह किसी चीनी कवयित्री की नहीं मेरी ही कविताएँ हैं.मैंने कोई अनुवाद नहीं किया.ये मेरी वो कविताएँ हैं जो आज तक कहीं न छप सकीं.जिन्हें मैं अपने मित्रों के प्यार के बदौलत फाड़कर फेंक न सका.और आप सबसे बदला लेने के लिए यह कर बैठा.मैं आप सबसे माफ़ी माँगता हूँ.मैं सचमुच शर्मिंदा हूँ.
यह द्विवेदीयुगीन हृदय परिवर्तन से उपजी ऐसी नैतिकता थी जिसे किसी ने स्वीकार नहीं किया.बदले में सभी अपमान से इतने आक्रामक हो गए कि इसके बाद समारोह में जो जो हुआ उसकी तफसील में जाने की जरूरत नहीं.भूपुष्प जी को गंभीर हालत में अस्पताल में भरती कराया गया.

अगले दिन अखबारों में इसके पक्ष-विपक्ष में बयान छपे थे.किसी ने कहा यह सदी का सबसे बड़ा साहित्यिक फ्राड है.किसी का कहना था इसमें कुछ भी ग़लत नहीं.



6 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ मुझे ऐसा ही लगता है इसमें कुछ भी गलत नही है. किसी व्यवस्था को आइना दिखने के लिए कई बार बने -बनाये नियम तोड़ने पड़ते हैं.

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  2. from where will i get more information about this poet and where will i get his poems, please inform at nikhil.848@rediffmail.com please i want to read more about this poet it was very sad and heart touching................

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  3. बहुत अच्छी रचना। मैं इसे फ्राड नहीं कहुंगा। मेरी सहानुभूति लेखक के साथ बनती है।

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  4. मैं आपका निहितार्थ सही समझ पाया हूं तो आपने पात्र का नाम "भूपुष्प" बहुत खूब रखा है।

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  5. निखिल जी,यह एक कहानी है.इसे किसी सच्ची घटना पर आधारित कहकर वजनी बनाने की कोशिश ठीक नहीं होगी.लेकिन आप साहित्य समाज में आवाजाही रखते होंगे तो देख पा रहे होंगे कि कैसे कैसे भेष धारी साहित्य में मौजूद हैं.भूपुष्प के प्रति मेरी भी सहानुभूति है.मैं महसूस कर रहा हूँ कि आनेवाले दिनों में ऐसी घटनाएँ बढेंगी.विदेशी लेखकों को उल्था करने,पुराने लेखकों की नकल कर डालने के कितने ही उदाहरण आपके सुनने जानने में भी आए होंगे.हिंदी साहित्य में अस्तित्व और वर्चस्व दोनों के लिए एक साथ यह बढ़ता छद्म चिंता जनक है.
    लवली जी,मैं सोचता हूँ जितना समाज को आईना दिखाना ज़रूरी है उतना ही ज़रूरी है खुद चोर हो जाने से बचना.
    एक बात और इस पोस्ट में पहली उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया कविराज जी की थी.जिसके साथ किताबघर प्रकाशन का लिंक भी था.वह एक गलती सुधारने की मेरी कोशिश में जाने कैसे डिलीट हो गई.इसका मुझे खेद है.

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  6. dear friend
    happy morning

    jane kyun mujhe lagta hai jese aap mujhse naraj hain ya mujhse naraj hone main bhi aap sayad apni hethi samajen kher mujhe aapki dosti se jayada aapki partibadhtayen pasand hain.umid karta hun apne balog ka pata mujhe deker pachta nahin rahe honge.jahan tak tippani ki bat hai to aaj ki aapki sabhi rachnayen behed prabhavi hain.rajiv

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