बुधवार, 9 दिसंबर 2009

दोस्त की बधाई दुश्मन की दुआ लगती रहें

मनोज कुमार पाण्डेय कथाकार हैं.छुपाकर कविताएँ भी लिखते हैं.समीक्षाएँ तो बाक़ायदा छपाते भी हैं.मनोज कभी तरंग में आकर कविताएँ सुना डालें तो खुद ही शरमा जाते हैं.उनके इस संकोच को देखकर शंका होती है क्या अब सचमुच कविताएँ सुनाना ज़्यादती करने की श्रेणी में आ गया है?कविता के संबंध में लोगों के इस रेसपांस से मंचीय कविता के आलोचक भी सीख सकते हैं.कवि तो ख़ैर थोड़ा सहज लिखें तो कविता-पाठकों दोनों का भला होगा.
मनोज कुमार पाण्डेय शायद कविता में ही अपना मुकाम बनाते अगर इस समय के कल्पनाशील,सफल संपादक रवींद्र कालिया उन्हें कहानियाँ लिखने को नहीं उकसाते.हालांकि मनोज की कहानियाँ पढ़कर कोई भी यही कहेगा-इन्हे कहानीकार ही होना था.मैं भी यही सोचता हूँ.
मनोज कुमार पाण्डेय में मेरी दिलचस्पी पैदा होने की एक यादगार घटना है.2004-05 में जिन दिनों मैं रीवा में एक स्कूल में पढ़ा रहा था;वहाँ वार्षिकोत्सव के लिए एक नाटक तैयार हो रहा था.सुनाई दे रहा था कि नाटक के युवा निर्देशक ख़ासतौर से इस काम के लिए शहर के दूसरे छोर से बुलाए गए हैं.वे युवा निर्देशक अपने ही लोगों के बीच खासे लोकप्रिय थे.उनसे मेरी भी जान पहचान थी.पर उनके समूह में मुझे भाव देने लायक नहीं समझा जाता था.इसीलिए स्कूल में रहते हुए भी मुझे रिहर्सल की भनक नहीं लगी.जब नाटक तैयार हो गया तो समारोह में ही भारी भीड़ के साथ जिसमें नेता,मंत्री भी थे मैने नाटक देखा.नाटक में थीम की ताजगी तथा परिचित अपनी सी कथा स्थितियों ने मुझे प्रभावित किया.नवमीं-दशमीं के छात्रों ने काफी मेहनत की थी.नाटक समाप्त होने पर मैंने निर्देशक को आगे बढ़कर बधाई दी.जिसे उन्होंने अन्यमनस्क मुस्कुराहट के साथ स्वीकार कर लिया.
इसके दो-तीन महीना बाद मुझे वागर्थ का पुराना विशेषांक मिला जिसमें कहानी छपी थी-चंदू भाई नाटक करते हैं.कहानीकार:मनोज कुमार पाण्डेय.कहानी मुझे जानी पहचानी लगी.पढ़ने के बाद तो पूरा नाटक ही याद आ गया.पहले झटके में तो यही लगा कहानीकार नकलची है क्या.अपना निर्देशक तो ऊँची चीज़ निकला.तुरंत चेक करने लगा.तारीखें मिलाईं.नतीज़ा निकला;युवा निर्देशक ने चोरी की है.समकालीन लेखन से अपरिचित लोग शायद इसे कभी जान ही न पाएँ.मैंने इस बार निर्देशक से मिलने की किंचित आक्रोश भरी पहल की.उनसे पूछा-यह तो मनोज कुमार पाण्डेय की कहानी थी,जिसका आपने कहीं ज़िक्र नहीं किया?निर्देशक अध्यात्मिक भी थे.यह कैसी क्षुद्र लौकिक चिंता है वाली निर्लिप्तता से उन्होंने निश्चिंत उत्तर दिया.आपको आम खाने से मतलब कि पेड़ गिनने से?मुझे निर्देशक से उलझने में और ख़तरे भी थे सो मैंने अपनी राह ली.बात आयी गयी हो गयी.अब तो सुना है निर्देशक ने भी राह बदल ली.दूसरी जुगत में रहते हैं.
लेकिन इसके बाद मैंने मनोज को ध्यान से पढ़ना शुरू कर दिया.मेरी नज़र में यह लेखक की बड़ी स्वीकार्यता थी.कहानी छपने के दो तीन महीने के भीतर उसका मंचन हो,खासकर उसी युवा वर्ग द्वारा जिसकी सपनीली असफलताओं को यह कहानी संबोधित है यह उल्लेखनीय बात है.
फिर मैंने मनोज की हर कहानी पढ़ी.नैनीताल में संपन्न हुए संगमन ने हमें आत्मीय होने,एक दूसरे को जानने,अपनी-अपनी कहानी सुनाने का मौक़ा दिया.(वर्तमान कथा जगत में संगमन की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है इस पर अलग से लिखूँगा).वहाँ से जब समृद्ध होकर हम लौट रहे थे तो लखनऊ तक संयोग से ऊपर की आमने सामने की बर्थ हमारी थीं
मनोज कुमार पाण्डेय की इतनी चर्चा करने की वजह यह है कि एक दिन मैं जोड़ रहा था कि इस समय चंदन पाण्डेय,गीत चतुर्वेदी,राकेश मिश्र,अरुण कुमार असफल,गौरीनाथ,कैलाश वनवासी,कुणाल सिंह,उमाशंकर चौधरी,शिल्पी,नीलाक्षी सिंह,अल्पना मिश्र,आदि कहानी की नयी ज़मीन तैयार कर रहे हैं.ये ऐसे कहानीकार हैं जिन्होंने कहानी की संभावना का विस्तार किया है.इन्हीं महत्वपूर्ण कथाकारों के समय में होते-होते इस कहानीकार के खाते में यादगार कहानियों की संख्या आधा दर्जन हो गयी है.विनम्रता पूर्वक बिना किसी आयोजनी प्रयास के.यह लेखकीय उपलब्धि मुझे अच्छी लगती है,प्रिय भी है.हिन्दी कहानी जगत अपनी उदारता के लिए मशहूर है.वह चंद्रधर शर्मा गुलेरी को कुल तीन कहानियों में केवल एक अच्छी कहानी उसने कहा था के लिए सिर आँखों पर बिठाए हुए है.फिर खाल,सोने का सुअर,शहतूत,जींस आदि मनोज की कहानियाँ पीढ़ियों और युवा या स्थापित कथाकारों की सीमाओं,विभाजनों से ऊपर उठकर क्यों नहीं पढ़ी,विश्लेषित की जानी चाहिए?ये ऐसी कहानियाँ हैं जिनका अतिक्रमण करना मनोज के लिए भी चुनौती रहेगी.
मनोज इन अर्थों में मौलिक कथाकार हैं कि उनके यहाँ बाहरी कथा युक्तियाँ नहीं हैं.इनमें बाहरी प्रभाव ढूँढना भी ठीक नहीं होगा.ये क्लासिक पढ़कर कहानियां गढ़ने वाले लेखक नहीं हैं.इस कथाकार की जीवन दृष्टि हमारे बहुत काम की है.इनकी कहानियों की जो कलात्मकता है वो ऐसे देखी जानी चाहिए-यथार्थ का कैनवस,स्मृति के रंग और रूपकों के जीवन से भरे चित्र.इनकी कहानियों के चरित्र पूरे परिवेश से अंत:क्रिया करते हैं.वे परिवेश को जीवंतता के साथ हमारे सामने जैसे उजागर कर देते हैं.यह परिवेश यथार्थ का समकालीन आख्यान बनकर हमें अपनी मौजूदगी का भी एहसास कराता है.इनके चरित्र मनुष्यों की तरह सांस लेते हैं उन्हें आइडिया के आक्सीजन पर नहीं रखते मनोज.इनकी कथा भाषा में सादगी है,संयत सांसों के प्रवहमान वाक्य किस्सागोई में ले जाते हैं.इसी किस्सागोई के सुंदर इस्तेमाल से मनोज ने न केवल रूपकों को सफलता पूर्वक निबाहा है वल्कि नये रूपक रचे भी हैं.यक़ीन न हो तो जींस कहानी पढ़कर देखिए.यह केवल शीर्षक नहीं आइने के बाद कहानी में दूसरा रूपक है.गिनकर देख लीजिए कितने कथाकारों के यहाँ ताजे रूपक हैं?
ठीक इसी दिन मनोज का फ़ोन आया.उनसे बातचीत में पता चला उन्हें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के श्रुति कार्यक्रम में कहानी पाठ का आमंत्रण मिला है.साथ ही किसी एक कहानी का मंचन भी होगा.
यह कार्यक्रम हो चुका.मनोज ने वहाँ कहानी सोने का सुअर पढ़ी.खाल का मंचन हुआ.
अब अपनी इस देर की बधाई के लिए मैं क्या कहूँ?
लेकिन मेरे पास एक सच्ची वजह है.तब मेरा यह ब्लाग अस्तित्व में नहीं था.मैं इस अच्छे कथाकार को बधाई लिखता भी तो कौन छापता?पर अब मुझे कोई पुल नहीं पार करना पड़ रहा है तो अच्छा लग रहा है.कहते हैं अब तक दोस्त की बधाई और दुश्मन की दुआ फलते रहें हैं.ये आगे भी फलें यही दुआ है.मनोज की आनेवाली कहानियों के लिए शुभकामनाएँ.

4 टिप्‍पणियां:

  1. मनोज जी की निरन्तर सफलता की कामना।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  2. शशि, मनोज कुमार पांडेय बतौर मेरा पहला परिचय भी उनकी कहानी चंदू भाई नाटक करते हैं से ही हुआ था। रही बात युवा निर्देशक की तो तुम्हें पता ही है कि वह एक जमाने में मेरा बहुत अजीज हुआ करता था। मेरे अनेक चाहने वाले कहते हैं कि उसने मेरा इस्त्ेमाल किया। पहले मुझे भी ऐसा ही लगता था लेकिन अब नहीं लगता। अब मुझे अपने उन दिनों के बारे में सोचकर जाने क्यों अच्छा ही लगता है। मुझे यह भ्ीा लगता है कि अपने कस्बाई जीवन के मुख्य टोन से इतर अगर मुझमें किसी तरह की महत्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टि पैदा हुई तो इसमें युवा निर्देशक की भूमिका को मैं नकार नही सकता। जहां तक उस नाटक की बात है निश्चित रूप से वह नाटक चंदू भाई नाटक करते हैं कथा पर ही आधारित था। उसकी काफी रिहर्सल मेरे घर पर भी हुई थी और उस समय वागर्थ की प्रति युवा निर्देशक के हाथ में ही रहती थी। सारे करीबी लोगों को पता था कि यह नाटक उस कहानी पर आधारित है। निश्चित रूप से मनोज को क्रेडिट दिया जाना चाहिए था। शायद युवा लेखक ने सोचा होगा कि मनोज कोई सेलिब्रिटी लेखक तो है नहीं जिसे क्रेडिट दिया जाए। शायद उसके मन में कहीं यह आकांक्षा भी दबी हो कि इसे उसकी रची स्क्रिप्ट मान लिया जाए। अगर ऐसा था तो मुझे अफसोस है युवा निर्देशक के लिए। हमारे रिश्ते बहुत नाटकीय अंदाज में खत्म हुए लेकिन मैं अब भी मनाता हूं कि युवा निर्देशक के रूप में हमारे बीच की एक बड़ी संभावना का अंत हुआ।

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  3. तुमने मनोज पर बात की थी मेरी टिप्पणी व्यक्तिगत हो गई है उसके लिए माफी और हां व्याकरणात्मक अशुद्धियों का ठीकरा गूगल ट्रांसलिटरेटर के सर

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