गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

आज भी खुला है अपना घर फूँकने का विकल्प

(यह लंबी साँस की कविता दिनेश कुशवाह सर ने मेरे आग्रह पर भेजी.अपने पहले रूप में यह वागर्थ के अक्टूबर-09 अंक में प्रकाशित हो चुकी है.उन्हीं की हस्तलिपि में.कविता के पहले ड्राफ्ट और इस रूप में ज़्यादा अंतर नहीं है पर यह कहना ही होगा कि यह पहले से अधिक व्यापक,ज़्यादा बेधक और बिल्कुल अचूक हो गयी है.चूंकि दिनेश कुशवाह एक ही कविता को सालों लिखते हैं.किसी हद तक संपादित करते रहते हैं इसलिए यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि अब यह अंतिम रूप में है.कविता ने मुझे भी बहुत उद्वेलित किया.इसे लेकर जैसा स्वागत और निंदा कवि के हिस्से आए हैं उसके बारे में वे बताते हैं-सबकुछ अभूतपूर्व है.यह सात्विक क्रोध की कविता है.क्रोध अगर सात्विक हो तो खुद पर भी उतना ही टूटता है.निष्कलुष कवित विवेक आत्मालोचन से ही संतुष्ट नहीं होता.वह आत्मोत्थान की नींव भी रखता है.मैं समझता हूँ यह वैसी कविता नहीं है जिस पर वाह वाह किया जाए.सार्थक रचना कहन की सफलता भर नहीं होती.उसके प्रति जवाबदेह भी होना होता है.इस कविता पर बहस होनी चाहिए.साथ ही दिनेश जी को इस कविता के साथ खड़े होने तथा इसकी क़ीमत चुकाने को भी तैयार रहना चाहिए.निश्चित रूप से अब उनके सार्वजनिक कामों,निर्णयों को यहां से भी देखा जाएगा.कथनी करनी की तुलना की जाएगी.ऐसा हुआ भी है लंबे अर्से से क़रीब क़रीब शांत हो चले उनके रचनात्मक जीवन में हलचल पैदा हो गयी है.तारीफ़ और धिक्कार दोनों उन्हें घेरे हुए हैं.एक तरह से यह उनकी पहली कविता है क्योंकि इस महत्वपूर्ण कवि को अब तक निजी प्रेम की संवेदनाओं के कवि के रूप में नितांत सीमित दायरे में देखा जाता रहा है.इस सबने उन्हें ताक़त दी है.दिनेश जी उस कविता को भी पूरी करने में ज़िद के साथ जुट गए हैं जिसे लिखने से वे सचमुच डरते रहे हैं.उम्मीद है आप भी इस कविता पर कुछ न कुछ ज़रूर बोलेंगे-ब्लागर)

उम्र का पहला पड़ाव
जिसे पहले प्यार की उम्र भी कहते हैं
मैंने सबकुछ छोड़कर किया प्यार
और लिखी कविता.

उन दिनों प्यार ही
जीवन की पहली प्राथमिकता थी
कविता उसकी क्षतिपूर्ति
ये तो बाद में पता चला कि
इस ससुरी कविता से
जब न चोला बन सकता है न चोली
तो आप ही बतायें मैं इसका क्या करूँ?

जब चोली से भेंट हुई तो,
चोला ऐसा मगन हुआ कि
चोरों के गिरोह में शामिल होने की अर्जी देने लगा
सिर पर लादकर नून-तेल-लकड़ी.

अपने को ईमानदार चोर घोषित करता हुआ
जब किसी तरह शामिल हुआ चोर-बाज़ार में
तो चोरी की अपनी शर्तें थीं
और चोर की अपनी सीमा
तब जाकर पता चला कि सूर या तुलसीदास
मुझसे अधिक कुटिल-खल-कामी नहीं रहे होंगे
अवसर मिलता तो सब पतितन को टीको हो जाता
हो सकता है कुंभनदास फतेहपुर सीकरी से बैरंग लौटा दिए गये हों
अराजक क़रार देकर.

बहरहाल
मेरी पनहिया कई बार टूटी
पैरों में लुढ़ककर आ गिरी पगड़ी
कई बार
पर मैंने नहीं लिखीं
आत्मालोचन की वैसी कविताएँ.

आज सोचता हूँ कि
मैं अदना सा चोर था
व्यवस्था का चाकर
वे लोग जो पिस रहे थे चक्की में
उनके लिए राजा को गरिआता रहा
और उसकी नर्तकियों की करता रहा मनुहार
भड़वों के पाँव सहलाता रहा.

अगर राजा का तबलची भी हो गया होता
तो तानसेन की पदवी मिली होती
नर्तकियाँ आरती उतारतीं और
भड़वे उस्ताद कहकर तलवे चाटते.

मैं कबीर से पूछने गया
कि क्या करूँ दादा!!
ब्राह्मण से लेकर शूद्र
गांधी से लेकर लोहिया
एम एन राय से लेकर मायावती
सबसे गुहार लगाई
पर जो तब पिस रहे थे चक्की में
आज भी पिस रहे हैं.

अपने को मिलने लगी थी चुपड़ी
पर वो भी खा नहीं सकता
सुगर हो गई है
और छोकरियों के आगे
छछिया भर छांछ पर नाचने में
पहले जैसा उत्साह नहीं रहा.

अब पांड़े और कसाई हो गये
हिन्दू और तुर्कों की राह और बिगड़ गई
तब एक पाहन पूजा जाता था
अब लाखों क़िस्म के पत्थर पूजे जाते हैं
अब ठगनी नैना झपकाती है तो
कालगर्ल बना दी जाती है
राजतंत्र में राजा का बेटा राजा होता था
लोकतंत्र में नेता का बेटा नेता
मंत्री का बेटा मंत्री
राजे-रजवाड़े जननेता.

पचास साल के लोकतंत्र पर गिरी है
वंशवाद,गुण्डागिरी और जाति की गाज
कोढ़ में खाज की तरह कि
अंधे बाँटते हैं रेवड़ी
और चीन्ह चीन्ह कर देते हैं
दुर्योधनों की भीड़ से सभाएँ भरी हैं
मंच से माँ कहते हुए भारत को
रोज ही उसकी साड़ी टॉन रहे हैं दु:शासन
भीष्म,द्रोण और कृपाचार्य
प्रश्न पूछने का पैसा लेते हैं
एकलव्यों के अंगूठे कटते रहें तो
कृष्ण को कोई शिकायत नहीं है
किसी भी समय में इतने धृतराष्ट्र नहीं थे
कारिंदे जो सबसे बड़े चोर हैं वे सबको चोर समझते हैं
स्वाधीनता की दुर्गति तो देखिए
दलाली का इतना बड़ा तंत्र कभी नहीं था
मंजिल उन्हें मिली है
जो सफ़र में कहीं नहीं थे.

कबीर वितृष्णा से मुस्कुराए,कहा-
तुम इस युग के नये ब्राह्मण हो
अपने को अदना कहने में भी
झलकता है तुम्हारा अहंकार
दूसरे की बुनी चादर ओढ़कर
कबीर नहीं बना जा सकता
तुम क्या वाक़ई मेरे पथ पर चलना चाहते हो?
तुम क्या बनोगे कबीरपंथी
जब कबीरपंथी हो गए ब्राह्मण
कम्युनिस्ट हो गए कांग्रेसी
समाजवादी हो गए भाजपायी
ब्राह्मण हो गए बसपायी
रामनाम लेकर तर गए कसाई
यह फिर नये बहाने से
प्रजाओं की तलाश है
समझे प्रोफेसर मध्यवर्गायी!

जाति से ऊपर उठ भी जाओ
तो भारत में अपनी जाति से उबरना
बहुत कठिन है
तुम्हे तो अपनी जाति तब याद आती है
जब कोई उस पर हिकारत से अँगुली उठाता है.

मैं तो कभी नहीं भूला कि
बनारस का जुलाहा हूँ
जबकि मुझे बाभनी का बेटा बताया गया था
पर बताने से होता क्या है इस देश में
कर्ण को भी तो कुंती का बेटा बताया गया था
और मेरे जन्म के पहले से ही
ऋषियों की एक लंबी फेहरिस्त है
शूद्रा माँओं से जन्मने की
तो बताने से कुछ नहीं होता
होता है इससे कि बताने वालों के
कितने काम के हैं आप?
यहाँ माँ से नहीं बाप से तय होती है जाति

जाति धर्म सत्ता के जो थे सरताज
वही हैं आज भी
कुशवाहा जी कहाँ हैं आप?
जाइए-कामरेड ज्योति बसु से पूछिए कि
उनके मंत्रिमंडल में युगों तक
मंत्री क्यों नहीं बना एक भी चर्मकार?
और इंदिरा-सोनिया से पूछिए कि
उनके यहाँ बना भी तो
चमटोली का क्या बना दिया?

मेरे यहाँ आते हैं कभी-कभी
पंडित हजारी प्रसाद,बाबा नागार्जुन
ठाकुर विश्वनाथ प्रताप
कहते हैं कुछ करना चाहते थे हम भी
पर कर नहीं सके बच्चों का विवाह
जाति से बाहर.

आप तो हैं वर्ग की कक्षा के छात्र
वर्ण की मनोहरता लक्ष्मण बंगारू के आका
हिन्दू संत बनिया सम्राट अशोक सिंहल से पूछिए
कि अयोध्या में बन रहे राम मंदिर का
कौन होगा महंथ?
किस जाति का होगा पुजारी?
बताइए न कल्याण सिंह जी
जी! उमा भारती!
या आप ही बाबू कांशीराम?
जाति क्यों है कुछ लोगों के लिए सोने का तमगा
जिसे वे सीने पर सजाये
छाती फुलाये घूमते रहते हैं
और जाति कुछ लोंगों के लिए
क्यों है सफेद कुष्ठ का दाग़
जिसे वे हर घड़ी छिपाते फिरते हैं
आखिर सरकार
क्यों नहीं घोषित करती जाति को राष्ट्रीय शर्म
और अंतर्जातीय प्रेम विवाहों को राष्ट्र-सम्मान.

यह पंडित नेहरू का लोकतंत्र है
और पण्डित राहुल गांधी का सुराज
जहाँ देखो तो कम मजे में नहीं हैं
मुलायम,लालू परसाद या रामविलास पासवान
समझे कि नहीं समझे कुछ
यही कि अलख नहीं है पिया जो बोले सो निहाल.

आदमी से प्रेम हो या देश से
प्रेम तब भी खाला का घर नहीं था
और आज भी खाला का घर नहीं है
दरअसल मैं होऊँ या तुलसीदास
गालियाँ दोनों ने दी हैं
जी जलने पर
पर लिखा है प्रेम पर.

तब लिखने पर खाल खींचकर
भूसा भर दिया जाता था
हाथी के पैरों तले कुचलवा देना थी आम बात
मुझे तो जल समाधि दे दी गयी थी
दो चार डंडा तो पा गये बाबा तुलसी भी
पर उनके पास सुविधा थी
विश्वनाथ मंदिर में महादेव जी से
सही कराने की
जैसे आज सुविधा है आलोचक पटाने की
या काशी के डोम के घर
शंकराचार्यों के जिमाने की
दोनों दो बातें हैं परंतु एक ही राह है
स्वर्ग में जाने की.

अपन तो ठहरे धुनिया-बुनिया बंगा
बुद्धू-लुच्चा-नंगा
और आज इसलिए जिन्दा छोड़ दिये गए हैं
कि हम वोट हैं
नेता अब लोंगों को कहाँ मानते हैं आदमी
सारी जनसंख्या को वे वोट समझते हैं.

ब्राह्मण के पास मन(शास्त्र) है
टाकुर के पास तन(शस्त्र) है
बनिया के पास धन(तंत्र) है
नेताओं के पास है जाति
और जाति को उनने वोट में बदल दिया है
इसलिए आज एक भी
नेता नहीं है जाति के ख़िलाफ़.

एक बात जान लो
आँच साँच पर ही आती है
झूठ का कुछ नहीं बिगड़ता
और जाति है सहस्त्राब्दियों का सबसे बड़ा झूठ
जो सच से बड़ा हो गया है.

फिर सुरक्षित ढंग से जियो जीवन
या करो प्रेम
दोनों ही होंगे बेस्वाद
भले लोग महात्मा को कहते थे बनिया-बक्काल
पर यह सब जानते हैं कि
बापू के मुंह में राम था
बगल में छूरी नहीं थी
आज भी गवाह हैं वरवर राव कि
कविता करता था कबीर
पर उसके जीवन और कविता में दूरी नहीं थी.

वरना किसे नहीं दिखता
किसानों की आत्महत्या और मर-मरकर जीना
पुलिस की गोली और आदिवासियों का सीना
सलवा जुडूम से संतोष नहीं हुआ
तो भूख के खिलाफ़ लगाएँगे सेना.
न जाने कब इस देश में दुबारा
होंगे गौतम बुद्ध,राहुल सांकृत्यायन,भगत सिंह,
चारू मजुमदार,अम्बेडकर और मोहनदास.

कुहासा घना है आज भी
चक्की में पिस रहे लोग छटपटाते हैं
पर अपनी लुकाठी लेकर चलने
और अपना घर फूँकने का विकल्प
आज भी खुला है.
-दिनेश कुशवाह

4 टिप्‍पणियां:

  1. ye adbhut kavita hai bhai. marm par chot karti hui. Badhai dinesh ji ko aur yahan pesh karne ke liye aapko bhi.

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  2. सही कहा पंकज भाई ने. अच्छी कविता. बड़े भाई तक मेरी भी बधाई चहुंपाएं.

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  3. दिनेश की यह बहुत अच्छी कविता है । यह भी सही कह रहे हैं दिनेश कि अच्छी कविता सालों साल लिखी जाती है । मैने खुद अपनी लम्बी कविता "पुरातत्ववेत्ता " 10-12 साल मे पूरी की । और भी कवितायें लगातार चलती रहती हैं .. यह ज़रूरी है ।

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  4. प्रिय शशि ,तुम्हारी प्रशंशा करनी पड़ेगी ,तुमने मुझे यहाँ भी खोज लिया ,मानना पड़ेगा तुम्हे एकबार फिर /
    बढ़िया ब्लॉग और उम्दा प्रस्तुति ,अच्छा लगता है जब कोई अपना सार्थक कुछ करता है /विस्तार से लिखो कहाँ हो ,क्या कर रहे हो ,/
    जो भी हो मेरी मंगल कामनाएं ,स्नेह ,
    तुम्हारा ही
    भूपेन्द्र

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