गुरुवार, 26 जनवरी 2012

यह कहानी-समय मूल्यों के द्वंद्व, मूल्यों के विघटन और उनके संकट का समय है: कैलास चंद्र

कहानी और व्यंग्य के क्षेत्र में कैलास चंद्र जी का नाम जाना माना है। पिछले तकरीबन तीस वर्षों से वे लगातार कहानियाँ-व्यंग्य लिख रहे हैं। उनकी कहानी तलाश अस्सी के दशक में कमलेश्वर द्वारा संपादित सारिका में अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत हुई थी तबसे। कैलास चंद्र जी की कहानियाँ देश की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं- हंस, पहल, आजकल, पक्षधर, वर्तमान साहित्य आदि में प्रकाशित होती रहीं। पिछले साल उनकी कहानी अँधेरे में सुगंध को वर्तमान साहित्य पत्रिका द्वारा कमलेश्वर कथा सम्मान दिया गया। कहानी हारमोनियम के एवज में का नाट्य रूपांतर देवेंद्र राज अंकुर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए कर चुके हैं। इसी नाम से कैलास जी का पहला कहानी संग्रह शिल्पायन से छप चुका है साथ ही एक व्यंग्य संग्रह नंगो का लज्जा प्रस्ताव भी प्रकाशित है। उनके कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशन की राह पर हैं। कैलास जी ने कहानी में शोर शराबों से अलग अपनी स्वतंत्र विनम्र पहचान बनायी। उनके कहानियों के विषय में जितनी विविधता है वह कई बड़े माने जानेवाले कहानीकारों में भी नहीं है। शहर से लेकर धुर गाँव तक उनके पात्र और कथ्य फैले हैं। हमारे समय के सर्वाधिक प्रसिद्ध कहानीकार उदय प्रकाश ने एक बार कहा था कि कैलास चंद्र बड़े ही संकोची हैं। वे अलक्षित रह जाते हैं तो इसकी एक बड़ी वजह यह संकोच ही है। वे अपनी हर कहानी पहली कहानी की सी तैयारी और मासूमियत से लिखते हैं। मैं भी उनकी निरंतर श्रेष्ठ सर्जना का कायल हूँ। कैलास चंद्र की कुछ अत्यंत प्रसिद्ध कहानियाँ हैं- हारमोनियम के एवज में, उन्होंने उसका चयन नहीं किया तथा डूब, स्याही के धब्बे और मनोहर माटसाब। हमारे समय के महत्वपूर्ण कथा आलोचक जय प्रकाश जी के शब्दों में- कैलास चंद्र की किस्सागोई में सादगी है, धीरज के साथ कहानी कहने और कथ्य को अंडरटोन में सँजोने का सहज कौशल है।...भाषा में सहजता है, शिल्प और संघटन में भी प्रायः यथार्थवादी अकृत्रिमता है। जो कहानी को पुराने ढंग की भाव भंगिमा देती है। लेकिन इसका कथ्य कोरमकोर समकालीन है। (कथादेश, सितंबर2006, पृष्ठ-45-46) यहाँ प्रस्तुत है मेरे दस सवालों के कैलास चंद्र जी द्वारा दिये गये जवाब।

सवाल

1- समकालीन हिंदी कहानी यानी पिछले पंद्रह से बीस वर्षों की कहानी में किन मूल्यों को प्रमुखता प्राप्त है? सफलता और सार्थकता के पैमाने में इसे आप कहाँ पाते हैं ?

2- यह कहानी जिन मूल्यों या पिछले कई दशक से चल रहे विमर्शों को स्वर दे रही है उनकी केन्द्रीयता में विगत कहानी आंदोलनों की क्या भूमिका है?

3- क्या समकालीन हिंदी कहानी में मूल्यों का द्वंद्व दिखाई पड़ता है? यदि हाँ तो कहानी की प्रभविष्णुता, पठनीयता और पाठकीय स्वीकार्यता में यह कितना निर्णायक या मुख्य है? कहानीकार इसे कितना महत्व दे पा रहे हैं?

4- समकालीन हिंदी कहानी में पुराने मूल्यों के प्रति नकार तथा नये मूल्यों के प्रति स्वीकार कितना है? मूल्यों के द्वंद्व का स्वरूप कैसा है? क्या यह कहानी किन्हीं नये मूल्यों को गढ़ पा रही है?

5- परंपरा, नैतिकता, परिवार, खेती-किसानी, मज़दूरी, प्रगतिशीलता, विचारधारा या राजनीति, प्रतिरोध और संघंर्ष, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीयता, भूमंडलीकरण, उत्तर आधुनिकता और बाज़ारवाद आदि के संबंध में समकालीन हिंदी कहानी का रवैया कैसा है? क्या इन पर निर्भर किन्हीं मूल्यों की इस कहानी में उपेक्षा हो रही है ?

6- समकालीन हिंदी कहानी के विकास में कहानी केन्द्रित विमर्शों यथा-स्त्री, दलित, किसान-मजदूर, युवा लेखन और प्रेम आदि की क्या जगह है?

7- विमर्शों ने समकालीन हिंदी कहानी में किसी व्यापक कहानी आंदोलन की ज़रूरत और संभावना पर क्या प्रभाव डाला है? क्या यह कहना उचित है कि सक्रिय आंदोलनों के अभाव के चलते विमर्श पनपे हैं? विमर्शों पर बाज़ार का प्रभाव किस हद तक है?

8- क्या समकालीन हिंदी कहानी विमर्शों को ध्यान में रखकर भी लिखीं जा रही है? विमर्श केंन्द्रित कहानियों को किस तरह पढ़ा जाना चाहिए? आपकी नज़र में विमर्शों का सच क्या है?

9- क्या ऐसे विमर्श भी है जिन्हें समकालीन हिंदी कहानी ने पैदा किए?

10- कहानी के नज़रिए से विमर्शों का भविष्य कैसा है? साथ ही विमर्श आधारित कहानियों का भविष्य क्या होगा?

11- आपके कुछ पसंदीदा कहानीकार और कहानियाँ जिनमें मूल्यों का द्वंद्व दिखाई पड़ता है। जिन्हें विमर्शों के भीतर का अथवा विमर्शों के पार हमारे समय-समाज का सच समझने के लिए अनिवार्य रूप से पढ़ा जाना चाहिए।

12- उपर्युक्त प्रश्नों के अतिरिक्त भी यदि आप विमर्शों और मूल्यों से संबंधित समकालीन कहानी पर विशिष्ट अभिमत रखना चाहें तो मुझे बहुत खुशी होगी।

कथाकार कैलास चंद्र के जवाब

1- वैसे तो एक-डेढ़ दशक का समय समाज और साहित्य के संदर्भ में अहम् महत्व नहीं रखता और रुढ़ियाँ तथा परम्परा बनने में बहुत समय लगता है। मूल्य भी उसी गति और काल-क्रम से अपना महत्व स्थापित करते हैं। तो यह द्वंद्व तो हर काल-खण्ड में मौजूद है। वस्तुतः पिछला एक-डेढ़ दशक मूल्यों के द्वंद्व का कम मूल्यों के विघटन और संकट का ज्यादा रहा है। पिछली आधी सदी से तकनीक ने जिस कदर तेज़ी से विकास और उन्नति की और जीवन में जो गहरा दखल दिया ऐसी द्रुतता विगत किसी काल में दिखाई नहीं पड़ती है। पिछली सदी के उत्तरार्द्ध और नयी सदी के प्रवेश द्वार के संधि-स्थल पर आप खड़े होकर काल के तेज़ प्रवाह को देखें तो आश्चर्य चकित रह जायेंगे। बाज़ार और पूंजी का खेल, तकनीक का उच्चतम विेकास, सूचना क्रांति और विलास के बढ़ते साधनों ने आदमी के जीवन को मथ कर रख दिया, खास तौर से मध्यम वर्ग को। भले ही मध्यम वर्ग को सुविधायें मिलीं हों पर साथ-साथ एक भयानक गला काट सामाजिक स्पर्द्धा ने भी जन्म ले लिया। तेज़ी से बढ़ती तकनीक की घुसपैठ से सामंजस्य बैठाने के लिये नये मूल्य भी स्थापित हुए और पुरातन मूल्यों ने धूल चाटी। परिवार का विघटन तो पहले से ही हो रहा था। पर इसमें अब तेज़ी गयी। व्यक्तिवादिता हद दर्जें की बढ़ी और वैवाहिक सम्बन्धों में जो पहले जकड़ और निकटता का स्पर्श था वह टूट गया।

देह की आजादी ने सारी मर्यादाएँ और शुचितायें तिरोहित कर दीं। पैसे ने जो भयावह चकाचौंध लोगों की आंखों में पैदा की उसके सामने सारे सम्बन्ध और रिश्ते फीके पड़ गये। बाज़ारवाद ऐसा हावी हुआ कि उसने जीवन में दखल देना शुरू कर दिया। गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा ने रिश्तों की गरमाहट में एक शून्य पैदा कर दिया। कभी जो भविष्य डराता था अब वर्तमान डराने लगा। युवकों के सामने रोज़गार की चिंता के साथ अपरिचय की धुंध का साया भी लहराया। ऐसा लगा जैसे युवक माहौल से तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। उसके सामने कुछ मानदण्ड हैं पर वे आज की आपाधापी में फिट नहीं बैठ पा रहे हैं। लड़की को घर में ही सीमित रखने का जो डर था विशेष रुप से गावों और कस्बों में वह डर भी खत्म हुआ। उन्होंने आफिसों में भी शिद्दत से काम करना शुरू कर दिया। यद्यपि आर्थिक रुप से परिवार को मदद मिली। लड़कियों ने वही करना शुरू कर दिया जो लड़के करते है। विदेश में रोज़गार ढूढ़ने और वहाँ जाकर रहने का क्रेज बढ़ा। लेकिन असफलताओं से उनमें हीन भावना भी उपजी। समाज में खुद को स्थापित करने के लिए पाखण्ड का सहारा लेकर बड़बोलापन बढ़ा।

घूमन्तु परिवारों के सामाजिक जीवन पर भी परिवर्तन आये। उस समाज की कुरीतियों पर भी प्रहार हुए और उसके विरोध में समाज की ही कोई औरत उठ खड़ी हुई। टीवी की घरों में बहुत ज्यादा घुसपैठ ने यौन शुचिता पर प्रश्नचिन्ह लगाने शुरू कर दिये। साम्प्रदायिकता ने भी अपने मूल्य खड़े किये और नये ढंग के संस्कार अस्तित्व में आये। आतंकवाद ने एक मजहब विशेष को पीछे ला दिया और समाज में संदेह के नये ठौर बनने प्रारम्भ हो गये। समाज को चारों ओर से चुनौतियाँ मिलनी शुरू हो गईं। मर्यादाएँ और पुराने मूल्य टूट गये। घर-परिवार में व्यक्ति का मूल्य उसकी उपयोगिता से आँका जाने लगा। ऐसा नहीं था कि पहले आर्थिक पक्ष प्रबल नही था और मूल्यांकन व्यक्ति के आर्थिक सरोकारों से ही मापा जाता था। पर अब के दौर में वह जिस आक्रामकता और प्रचण्डता से आया उसकी मिसाल मिलनी मुश्किल है। गाँव का युवक शहर आया और बड़ा अधिकारी बन गया तो गाँव के सब रिश्ते ही भूल गया। भटकाव के मंजरों ने पूरी शिद्दत से प्रवेश किया। गाँव के भोले-भाले मन ने शहर की फिज़ा में ऐसी करवट ली कि वह आडम्बर और झूठ में घिरता चला गया।

इसलिए कहना चाहिए कि यह कहानी-समय मूल्यों के द्वंद्व के साथ-साथ मूल्यों के विघटन और भयानक संकट का समय है। इस बीच जो कहानियाँ सामने आईं उनमें मूल्यों के द्वंद्व और विघटन का चित्रण बहुत उद्दामता से अत्यंत सफलता पूर्वक किया गया है। कहानियों में गाँव भी नहीं छूटे हैं। बाज़ारवाद ने गाँव के तटबंधों को भी छुआ है। शहरों की वारदातों और आदमी के कमीनेपन ने गाँवों में भी अपनी जगह बना ली है। हिन्दी कहानी ने इस ओर भी दृष्टिपात किया है। मैं कहूँगा कि यह हिन्दी कहानी का सबसे बढ़िया और सार्थक काल है। हिन्दी कहानी ने इतने आयाम उठाये हैं कि लगता है कि कोई बात छूटी नहीं है।

2- इसमे कोई दो राय नहीं हो सकती कि कहानी अपने उन्ही मूल्यों को स्वर दे रही है जिनकेा रचनाकार ने भोगा या अनुभव किया है। अभिव्यक्ति ने एक खरापन पाया है और जो लेखक ने कहानी में कहा पूरे बेलागपन से कहा। ऐसी कई कहानियाँ उदाहरण के रुप में प्रस्तुत की जा सकती है। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि कहानी ने एक बहुत बड़ी संख्या में पाठकों के मन को झकझोरा है। पाठक बहुत अधिक सचेत हुआ है। कहानीकार ने उन सत्यों ओर मूल्यों को खोजा और उद्घाटित किया है जो बिना सर्जना के देखना संभव ही नही था। कहानी में एक कोई रीति नहीं बनी। यह कहना ज्यादा सही होगा कि कहानी ने अपने को दोहराया नहीं। निरंतर आगे ही बढ़ती रही अपनी पूरी ऊर्जा और शक्ति के साथ। ऐसी-ऐसी बेचैन कर देने वाली कहानियाँ इस दौरान लिखी गयी कि आपकी रातों की नींद छीन ले गयी।

जैसा कि मैं समझता हूँ कहानी से विमर्श जन्म लेते हैं कि कोई कहानी विमर्शों को स्वर देती है। विमर्शों के केन्द्र में कहानी ही होती है। जंहा तक विमर्शां की बात है तो विमर्श बौद्धिक विलास से अधिक कुछ नहीं होते हैं। विमर्श तो तब चलते हैं जब कहानी किसी विश्वसनीयता के स्तर को हासिल कर लेती है। विमर्श तो तभी चलेंगे जब कहानी में कुछ कहने को होगा। स्वतंत्र रुप से विमर्शों का तो कोई औचित्य है और कोई अर्थ ही। कहानी जब एक स्तर अख्तियार कर लेती है उस संदर्भ में विमर्श चलते हैं। कहानी विमर्शों के पीछे नहीं चलती विमर्श कहानी के पीछे उसके आस-पास चलते हैं।

मैं समझता हूँ कि कहानी के विकास में कहानी आंदोलनों की भूमिका नगण्य है। कहानी के आंदोलन चालाक संपादकों और चुके हुए कहानीकारों का साहित्य में अपना स्थान निश्चित कर लेने का एक चलाया गया सोचा-समझा उपक्रम मात्र होता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि ये आंदोलन कहीं कहानी को प्रभावित नहीं करते। हाँ इतना अवश्य है कि इन आंदोलनों के पीछे जो लेखक-संपादक होते हैं उनके पीछे कुछ लेखकों की भीड़ अवश्य लग जाती है खास तौर से नये कहानीकारों की। ये हल्ला बोल आंदोलन होते हैं और कहानी या अन्य किसी विधा को किसी भी रुप में प्रभावित नहीं करते। इस वजह से कहानी की केन्द्रीयता में इनकी भूमिका को केवल इस दृष्टि से देखा जाना चाहिए कि इन आंदोलनों से सन्नाटा टूटता रहता है। ये कथित आंदोलन खेमेबाजी को जन्म देते हैं। क्योंकि यही इनका मंतव्य होता है। कहानी अपनी मौलिकता में आगे विस्तार पाती है और अपने पाँव जमाती चलती है। लेखकों की एक जमात जो चुपचाप रचना में रत रहती है उनके भीतर ये आंदोलन अवश्य हीन भावना पैदा करने का प्रयास करते हैं। क्योंकि इन आंदोलनों की वजह से कुछ कहानीकार चर्चित होते रहते हैं।

दरअस्ल इस तरह के कहानी आंदोलन कतिपय लेखकों द्वारा पुराने लेखकों से अलग कुछ नया करने और बताने और इस विधा में धाक जमाने के उद्देश्य से शुरू किये जाते हैं। गुटबाजी को बढ़ाने के लिये भी आंदोलन प्रारम्भ किये जाते है। उदाहरण के लिये कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश ने खुद को नया कहानीकार बताने के लिये योजनाब़द्ध तरीके से नयी कहानी आंदोलन चलाया। इससे तो मोहन राकेश काफी हद तक दूर ही रहे। पर बाकी दो ने अपने आप को कहानी विधा में स्थापित कर लिया। कमलेश्वर जब तक सारिका के संपादक रहे उन्होंने समान्तर कहानी आंदोलन को हवा दी। ऐसी कहानी जो जीवन के समान्तर चले। जो उस आंदोलन के दौरान सारिका में नहीं छपे तो उनकी कहानी भी जीवन के समान्तर ही चल रही थी ऊपर या दायें-बायें नहीं। इसका नतीज़ा यह हुआ कि कमलेश्वर के साथ कहानी लेखकों का एक बड़ा तबका जुड़ गया और लगा कि कहानी केवल सारिका में ही दिख रही है। जब कि उस समय श्रीपत राय कहानी पत्रिका निकाल रहे थे और भी पत्रिकाएँ निकल रही थीं और उनमें छपी कहानियाँ जीवन के दस्तावेज़ के रुप में जानी जाती हैं।

इन आंदोलनों का सामयिक महत्व केवल इतना रहा कि कहानी चर्चा के केन्द्र में बनी रही। पर इन आंदोलनों के परिप्रेक्ष्य में तो कहानी का विकास हुआ और उनसे कोई नयी बात निकली। कहानी जीवन की धड़कनों से निकलती है किसी कहानी आंदोलन से नहीं।

3- समकालीन कहानी में मूल्यों का द्वंद्व स्पष्ट दिखाई पड़ता है। यही बात कहानी को विश्वसनीयता प्रदान करती है। क्योंकि कहानी केवल नेरेशन नहीं है। उसका महत्व इसी में है कि समाज में जो मूल्य दिखाई पड़ रहे हैं और जो नहीं भी दिखाई पड़ रहे हैं उनके बीच से रास्ता खोजे और उनको दिखाये। यह कई स्तर पर और कई तरीकों से होता है। मैं कहूँगा कि इस वजह से कहानी का विन्यास संश्लिष्ट हुआ है। जैसे आप साम्प्रदायिकता को ही लें तो अब वह सीधे-सीधे नहीं दिखाई पड़ती है। घृणा की जाने कितनी परतें उसमें चढ़ी होती हैं और इतने सूक्ष्म रुप में कि लेखक को कहानी में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। अब हर कोई धर्मनिरपेक्षता का ढोल लटकाये तो घूमता नहीं है कि वह पग-पग पर बताये कि वह ऐसी मानसिकता को पसंद नहीं करता है। पर सरलता में भी ऐसी परिस्थितियों में पात्र जिस तरह रियेक्ट करते हैं वही कहानी को एक ओर सफल और दूसरी ओर सतही बनाते हैं। कहना होगा इधर हाल के वर्षों में इस विषय पर जितनी कहानियाँ लिखी गयीं उनमें तो बड़बोलापन था और जबरन थोपी गयी कोई आईडियालॉजी। कहानी सीधे जीवन से निकल कर आई और अपना प्रभाव छोड़ गयी। इसी तरह प्रेम कहानियों को भी लिया जा सकता है। वह परम्परागत प्रेम अब दिखाई नहीं पड़ता है। इससे जीवन का कर्म विरत नहीं हुआ है बल्कि उसके बीच ही प्रेम खोजने की कवायद बड़ी शिद्दत से की गयी है। कहीं वर्षों के विवाहित जीवन में ही प्रेम खोजने की फितरत की गयी है। इसी के बीच से रिश्तों मे पड़ी ठण्डक को उकेरा गया है। बेरोज़गारी और अर्थहीनता के बीच प्रेम की निरतंर खोज की गयी है और दायित्वों को एक नयी भाषा दी गयी है। पुराने प्रेम प्रसंगों को नये अर्थ देकर उनको समकालीन समय से जोड़ने की कोशिश पुरअसर तरीके से हुई है। इसीलिए लेखकों ने अपना एक बड़ा पाठक वर्ग कहानी की विश्वसनीयता के आधार पर तैयार कर लिया है। पाठकों को लगता है कि कहानी उनके बीच से निकल कर रही है। किसी लेखक को पाठक ही सार्थक बनाते हैं। कोई समालोचक कदाचित् ही यह काम कर सकता है। मैं कहूँगा कि आज कहानी की स्वीकार्यता पाठकों के बीच बढ़ी है। जीवन के विविध प्रसंगों को एक आनुपातिक महत्व और एक आब्जैक्टिव दृष्टि देकर कहानी ने पठनीयता के पुराने सब रिकार्ड ध्वस्त किये है। कुछ कहानियाँ विन्यास की दृष्टि से कमज़ोर कही जा सकती हैं पर अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण के मायने में उनमें कोई कमी नज़र नहीं आती।

4- मूल्यों के स्वीकार और नकार का यह द्वंद्व समाज में हमेशा चलता रहता है। कहानी भी इस द्वंद्व से अछूती नहीं रह सकती है। समाज में जिस तेज़ी से चीज़ें बदलतीं हैं उतनी तेज़ी से सोच को बदलने में समय लगता है। यह समय तो बहुत तेज़ी का है। तकनीक ने जिस तेज़ रफ्तार से सब कुछ बदल कर रख दिया उसको स्वीकार करने में वक्त लग रहा है। जीवन में सुविधाओं और साधनों का जिस तरह बहाव आया हुआ है, उपभोक्ता सामग्री ने बिना वजह जिस तरह से जीवन में दस्तक देकर घुसपैठ की है, बाज़ार ने जिस अंदाज़ में उत्पाद को अपरिहार्य बना दिया है उससे जो तनाव पैदा हुए हैं कहानी ने उन सब को समेटने और एक नयी भाषा गढ़ने में अपने को अक्षम नहीं पाया है। नये सोच को आधार भूमि प्रदान की है। जीवन ने एक नयी करवट ली है। फिर भी पुराने मूल्यों का एकदम नकार भी नहीं दिखाई देता है। एक सामंजस्य बैठाने की कोशिश भी है। हालांकि कुछ कहानियाँ हैं जिन्हें हम एकदम बदलाव की कहानियाँ कह सकते हैं जिनमें समय के अनुरुप बदले हुए रिश्तों की कहानियाँ कह सकते हैं पर ऐसी कहानियों की संख्या ज्यादा नहीं है। कहानियों में इसलिए नये और पुराने मूल्यों का द्वंद्व कहानी की आंतरिकता में दिखाई पड़ता है। भीतर से कहानियों का विन्यास इस बात की ही पुष्टि करता है। एक तो रोज़गार और कैरियर को लेकर जो जद्दोजहद इधर कहानियों में दिखाई पडती है उसमें यह द्वंद्व उभर कर सामने आया है। यौन-शुचिता का जो मानदण्ड समाज ने स्थापित किया था वह बुरी तरह भंग हुआ है। रिश्तों का जो लिहाज हुआ करता था वह टूटा है। पैसा कमाने की हवस में यह द्वंद्व खासा दिखाई पड़ता है। औरतें जो पहले निरीह थीं वे भी अब पुरानी रुढ़ियों के सामने सिर झुकाने को तैयार नहीं हैं। दलित स्त्रियाँ अपनी जाति के दस्तूरों के खिलाफ खड़ी हो रही हैं।

5- उपर्युक्त के प्रति कहानी का रवैया सकारात्मक है। इनमें से किसी के प्रति कहानी का उपेक्षा भाव नहीं है। इनको कहानी ने नया आधार और भाव-भूमि प्रदान की है। रुढ़ियों को तोड़ने का काम कहानी कर रही है। एक नया मानववाद कहानी में उभर कर रहा है। जो कहानी में पहले नहीं था वह भाव-स्तर उठ कर सामने आया है। जाति के बंधन भले ही पूरी तरह टूटे हों पर उसके प्रति नज़रिया में भारी परिवर्तन कहानी में दृष्टिगोचर होता है। जो नयापन कहानी में आया है वह वस्तुगत होकर उभर कर आया है। सापेक्ष कुछ भी नहीं है। जो कुछ है वह यथार्थ के स्तर पर है। कहानी में भावुकता कम हुई है और दृष्टिकोण एकांगी होकर बहुआयामी हुआ है। मूल्यों की उपेक्षा नहीं स्पष्ट द्वंद्व दिखाई पड़ता है। राष्ट्रीयता का वह नज़रिया नहीं हैं जैसा कि जाना जाता है। पर देश से प्यार है यह मूल्य कई रुपों में प्रकट हुआ है।

यद्यपि बाज़ारवाद और भूमण्डलीकरण पर ज्यादा तादाद में कहानियाँ नहीं लिखी गयी हैं पर जो मौजूद हैं वे जबरदस्त हैं। आज के संदर्भ में राष्ट्रीयता एक गैरजरूरी शब्द है। इसलिए इस विषय पर सीधे कोई कहानी नहीं लिखी गयी है। हाँ राष्ट्र-प्रेम या देशप्रेम पर लिखी कहानियाँ मिल जाएँगी एक हल्की छौंक के साथ। उत्तर आधुनिकता शब्द ही छल पूर्ण है और विशेष रुप से भारत के संदर्भ में। यहाँ तो अभी कायदे की आधुनिकता ही नहीं आई। हमारे आलोचक विदेशी साहित्य से कुछ शब्द चुरा लेते हैं और अपने विद्वता प्रदर्शन के लिये उनका उपयोग करना शुरू कर देते है।

6- कहानी का विकास समय के दबाव में होता हैं और यह शत-प्रतिशत स्वतःस्फूर्त होता है। ये जो विमर्श हैं ये बतौर फैशन आते हैं और कुछ चुके हुए लेखकों संपादको द्वारा प्रायः आयोजित किये जाते है। इसलिए मैं समझता हूँ कि किसी भी प्रकार के विमर्श की जगह कहानी के विकास में गौण होती है। जब विमर्श शब्द नहीं था तो क्या स्त्रियों पर नहीं लिखा गया? दलित लेखन नहीं हुआ? प्रेमचंद का तो पूरा लेखन ही किसान-मज़दूर पर रहा है, प्रेम पर तो युगों से लिखा जा रहा है। वैसे अभी सबसे अधिक विमर्श स्त्रियों और दलित पर ही केन्द्रित रहे हैं। एक नया ही नारा आया है कि दलित-लेखन केवल दलित ही कर सकते हैं और कतिपय संपादक चर्चा में बने रहने और मठाधीशी करने के लिये इस विचार को हवा दे रहे है। इसलिए दलित लेखन से प्रेमचंद बाहर हो रहे है, अखिलेश बाहर हो गये हैं। कहानी में ये विषय मुख्य रुप से उठायें जा रहे हैं। युवा-लेखन का ठेका तो रवीन्द्र कालिया जैसे संपादकों ने उठा ही लिया है। जो यह सिद्ध करने में लगे हैं कि नवलेखन जो उन्होने छापा है वही सार्थक और मुख्य है। फिर उन पर उन्होंने इस ढंग से टिप्पणियाँ दी हैं कि उनको असरदार बनाने की नाजायज कोशिश की है।

इसी तरह प्रेम जैसे सात्विक विषय पर भी रवीन्द्र कालिया जैसे संपादकों ने दादागिरी थोपी है। प्रेम-विशेषांक से लेकर प्रेम-महाविशेषांक तक की श्रृंखला उन्होने निकाल डाली और ऐसी-ऐसी कहानियों की भरती उन्होने उसमें की जो प्रेम के खाँचे में फिट नहीं बैठतीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उपर्युक्त विषय समाकलीन कहानी के केन्द्रीय विषय हैं। कहानी में इन विषयों पर लिखकर केवल स्पेस भरा है बल्कि उनको केन्द्रीयता में ला दिया है।

7- कहानी-लेखन किन्हीं विमर्शों और कहानी आंदोलनों के भरोसे नहीं होता है। फिर विमर्श भी तो लिखी हुई कहानी पर ही होते हैं। विमर्श कहानी लिखने के आधार नहीं बनते। फिर भी अगर ऐसा लेखन होगा तो फॉरमूलाबद्ध लेखन होगा। तब लेखक का अनुभव, संवेदनशीलता पीछे चले जाते हैं। कुछ चुके हुए लेखकों और संपादकों के शगलों से ये विमर्श उत्पन्न होते हैं। चर्चा में बने रहने के लिये और अपना महत्व जताते रहने के लिये इनका आयोजन होता रहता है।

जब विमर्श नहीं थे और किसी आंदोलन का दूर-दूर तक कोई पता नहीं था उस ज़माने में क्या कहानियाँ लिखी नहीं गईं? उसने कहा था, पुरस्कार, हार की जीत, पूस की रात आदि कहानिंयाँ किस विमर्श और किन आंदोलनों की देन हैं? मैं समझता हूँ कि विमर्शों ने किसी बड़े कहानी-आंदोलन की ज़रूरत और सम्भावना पर कोई प्रभाव नही डाला है। उल्टे ये विमर्श अपने लोगों को जमाने के लिये ज्यादा उपयोग में लाये गये है। कमरे से बाहर इन विमर्शो ने अपना दम खुद तोड़ दिया। मेरे विचार में ये विमर्श कहानी की दिशा को भरमाते अवश्य हैं बजाय सही दिशा-निर्देश के। कहानी स्वंय के अनुभव , संवेदना और प्रतिभा के रस में पकती और आकार पाती है। हाँ चर्चाएँ ज़रूर सार्थक और ज़रूरी हो सकती हैं। इनसे कम से कम रचनाकार को बल मिलता है। इन विमर्शों से बाहर भी कहानीकार ही होता है।

मैं नहीं समझता हूँ कि कहानी के किसी दौर में कहानी आंदोलनों की जरूरत पड़ी हो या महसूस की गयी हो। सृजन बिना किसी आंदोलन या विमर्श के संभव होता हैं तो फिलहाल उसकी आवयश्कता ही क्या है। जैसा कि मैंने कहा खुद को जमाने के लिये ये विमर्श या आंदोलन शुरू किये जाते हैं और यह बताने की कोशिश की जाती है कि पुराने कहानीकारों से किस तरह भिन्न हैं और समय के साथ खड़े हैं। अपने देश में ही क्यों बाहर विदेश में भी अच्छी कहानियों ने बिना किन्हीं विमर्शों और आंदालनों के जन्म लिया है और वे कहानियाँ कालजयी सिद्ध हुई हैं।

जहाँ तक बाज़ारवाद के प्रभाव की बात है तो बाज़ार सर्वग्रासी हो गया है। जीवन और जगत में शायद ही कोई चीज या भाव बचा हो जो बाज़ारवाद के प्रभाव से अछूता रह गया हो। बाज़ार में जिस तरह की प्रतिस्पर्द्धा होती है और प्रोडक्ट एक-दूसरे से आगे निकलने की गलाकाट प्रतियोगिता में लगे होते है, आज साहित्य में भी यही कुछ हो रहा है। अपने-अपने गुट को चमकाने की कोशिशें जारी हैं। किसी लेखक को कहानीकार के रुप में चमकाने की कोशिशें हो रही हैं तो किसी को कवि बनाने के लिये मारकेटिंग चलाई जा रही है। इसलिए विमर्श पर भी बाज़ार का प्रभाव इसी रुप में देखा जा सकता है।

8- एक दो अपवादों को अगर छोड़ दें तो कहानियाँ विमर्शों पर केन्द्रित नहीं हैं और ही ऐसी किसी योजना के तहत लिखी जा रही हैं। कहानीकार जो भी समाज में आस-पास घटते देखता है वही उसकी संवेदना और अनुभव में पकता है। बिना भोगे हुए यथार्थ के यदि कहानी लिखी जा रही होती तो उसके परखच्चे उड़ते देर नहीं लगती। पर ऐसा नहीं हो रहा है। चाहे नये कथाकार हों या पुराने जमे हुए उनकी सृजित कहानियाँ अपनी ज़मीन पर खड़ी हैं और इनके लिये दावे के साथ कहा जा सकता है कि वे विमर्शों की देन नहीं हैं। हो ही नहीं सकती। कहीं अगर अपवाद देखने को मिलता भी है तो उनका आलोचना की अच्छी और ईमानदार कसौटी ही मूल्याकंन करेगी।

जैसा कि मैंने ऊपर कहा है कि कुछ चुके हुए कहानीकार जो अब संपादक बन गये हैं इन विमर्शों और आंदालनों के केन्द्र में हैं और वही ये परचम लहरा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि विमर्शों की आवश्यकता नहीं है। इससे रचना पर चर्चाएँ होती हैं। पर ये विमर्श ऐसी क्लिष्ट भाषा में सम्बोधित होते हैं मेरे जैसे अदना कहानीकारों के ऊपर से निकल जाते हैं। आखिर ऐसी भाषा का क्या मतलब हो सकता है जो सम्प्रेषणीय ही हो। अथवा जिसको समझने के लिये माथा पच्ची करनी पड़े। फिर वे मंतव्य जो विमर्शकार कहना चाहता है किसी के पल्ले नहीं पड़ेंगें।

विमर्शों का सच यही है कि उनके भीतर तात्विकता की कमी है और वे किसी नैतिक और सामाजिक सरोकारों के तहत कम चलाये जा रहे है। उनमें गुटबन्दी और चर्चा में बने रहने के निहितार्थ बहुत ज्यादा है। कहानी का कोई भला इन विमर्शों और आंदोलनों से होने वाला नहीं है। हाँ इनके माध्यम से अपने पीछे चलने वाली और आपका परचम लहराने वाली कहानीकारों की भीड़ अवश्य लग जाएगी। जैसा कि मैंने कहा विमर्श कहानी की दिशा तय नहीं करते, कहानी की दशा अवश्य दयनीय कर देते हैं।

9- मुझे याद नहीं कि कहानी ने कोई विमर्श पैदा किये हैं और उस विमर्श-विशेष पर चर्चाएँ होती रही हैं। कुछ महिला लेखिकाओं की वजह से स़्त्री विर्मश शुरू हुआ जो शायद उनकी कहानियों के विषय को लेकर नहीं था। पहले तो स्त्री और पुरुष लेखन की भिन्नता और यह विचार ही भ्रामक है। स्त्री लेखक भी समाज से वही विषय उठा रही हैं जो पुरुष लेखक उठा रहे हैं। अब केवल घर को ही केन्द्रित कर कहानियाँ नहीं लिखी जा रही हैं। स्त्री लेखन में बहुत व्यापकता गयी है। विभिन्न पहलुओं को शक्ति और सार्थकता से उन्होंने उठाया है। कोई भी विर्मश हो वह समाज से ही उठाया जाता है। यह बात दूसरी है कि किसी कहानी में उसका स्वर काफी स्पष्ट और तीखा होता है।

अब दलित विमर्श को ही लें। यह जो दलित विमर्श है किसी कहानी की धारा की वजह से अस्तित्व में नहीं आया है। यह दरअस्ल राजनीतिक विषय है। साहित्य में यह दलित लेखक की कुंठा से प्रारम्भ हुआ है। दलित लेखक ने यह घोषणा कर दी कि दलित लेखन केवल दलित लेखक ही कर सकता है। लीजिये दलित विर्मश प्रारम्भ हो गया। बाकी लेखकों ने जो दलित लेखन किया वह सच्चा नहीं है। पहली बात तो यह कि दलित और सवर्ण लेखन की अवधारणा ही ग़लत है। लेखन को किसी खाँचे में नहीं बाँधा जा सकता है। लेखन निर्बाध और निर्बन्ध होता है। अब क्या प्रेमचंद का लेखन जो उन्होंने किसानों और मजदूरों और समाज के सबसे छोटे तबके पर जो कहानियाँ लिखी हैं वे इस वजह से झूठी हैं कि प्रेमचंद तो किसान थे और मजदूर और ही दलित। दरअसल इस दलित विमर्श के सबसे बड़े स्यंवभू पैरोकार राजेन्द्र यादव है जो कहानी लेखन से विरत होकर और समय द्वारा कूड़े सा तज दिये जाने के कारण दलित मसीहाई वाले अंदाज़ में हैं। स्त्री विमर्श के रुप में उनकी सबसे बड़ी देन मैत्रेयी पुष्पा हैं। राजेन्द्र यादव चाहते हैं कि स्त्री विमर्श के नाम पर कहानी में स्त्री सैक्सुअलिटी का समावेश हो और कामुक किस्म की कहानियाँ लिखी जायें। इसके लिये उन्होने लेखकों-पाठकों की एक फौज भी बना ली है। उनको आज भी मलाल है कि प्रेमचंद ने स्त्री कामुकता पर एक भी कहानी नहीं लिखी। इसलिए अधिकतर मामलों में ये विमर्श कंठाओं के पोषण के माध्यम बन गये हैं।

पर ऐसा भी नहीं कि इन विमर्शों का कोई महत्व नहीं है। एक दिशा-निर्दंश मिलता है और गति मिलती है। लिखने का उत्साह पैदा होता हैं। चर्चा में रहने का अवसर मिलता है। दूसरे लेखकों से सहज ही मिलना हो जाता है। विचारों का आदान-प्रदान होता है।

10- बहुत आशाजनक नहीं कहा जा सकता है। विमर्श चलते रहेंगे और कहानी अपने विकास क्रम में सहज स्फूर्त भाव से चलती रहेगी। जो कहानियाँ विमर्शों का ठप्पा लगा कर लिखी जाएँगी, उनमें आरोपण अधिक होगा वे अनुभव-सिद्ध और संवेदना के स्तर पर सपाटता लिये ज्यादा होंगी। कुछ दिनों चर्चा में रह कर वे स्वतः काल के प्रवाह में डूब जाएँगी। कोई भी कहानी इन हाव-भावों के मद्देनज़र लिखी जाती है, अथवा किसी नारे के बतौर प्रकाश में आती है उसमें तात्कालिकता तो होगी पर दीर्घकालिकता नहीं। ऐसी कहानियों में तत्काल भुना लेने की प्रवृत्ति होती और यही इनकी सबसे बड़ी कमजोरी होती है। कहानी हृदय की धड़कन और संवेदना और अनुभव संपन्नता से लिखी जाती है किसी लेवल के चिपका लेने से नहीं। इसलिए जो कहानियाँ केवल विमर्श को लक्ष्य कर लिखी जा रही हैं वे भटका रही हैं। उनका कोई भविष्य नहीं है। संसार की जितनी सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ हैं उनके पीछे उनकी सहजता है कोई नारेबाजी नहीं और उनकी प्रासंगिकता आज भी बनी है और आगे भी बनी रहेगी। वैसे भी लेखक का काम है कहानी लिखना विवादों और विमर्शों से परे।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

नये साल में बच्चों और उनकी शिक्षा के लिए बड़ी जगह पैदा होनी चाहिए।



गुरू-शिष्य के संबंधों पर सभी भाषाओं और समाजों में साहित्य भरा पड़ा है। वह पूरा साहित्य न मैं अब तक पढ़ पाया हूँ न ही पूरे साहित्य से अनजान हूँ। वह विगत और अनवरत साहित्य आज अध्यापन में कितनी सहायता करता है यह भी मेरे लिए गुत्थी ही है। मैं अनुभव से कई ग़लतियों के बाद सीख सीखकर ही सिखाने वाला अध्यापक हूँ।

मैं जब विद्यार्थी था इस रिश्ते को निभाने लायक मिथकीय शिष्यों जैसा कृतज्ञ नहीं रहा। न अब गुरू होते कभी खुद को ईश्वर की जगह देख पाता हूँ। सीखने और सिखाये जाने की पारस्परिकता में ही जो मुझसे हो सका वह मेरा शिष्य धर्म था और मेरे अध्यापको ने जो किया वह उनका कर्तव्य। इस निर्वहन से कभी समाज को दिक्कत नहीं हुई सो कह सकते हैं मेरे गुरुजनों का चरित्र उत्तम था और मेरे चरित्र में भी निर्माण से लेकर अब तक खोट नहीं है।

आज अपने भावलोक और आदर्शों से बाहर निकलता हूँ, शैक्षिक अपेक्षाओं से थककर घर लौटते हुए जब बाहर टेबल पर रखे रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता हूँ और घड़ी देखकर समय डालता हूँ तो अपने आपको अध्यापन की नौकरी करते हुए पाता हूँ।

एक कठिन नौकरी। नौकरी के मूल स्वभाव से हटकर जो हर साल इसलिए भी कठिनतर होती जा रही है कि बच्चे बच्चों जैसे नहीं रहे। इसके कारणों में उँगली के इशारे जैसी यह वजह कि कॉलोनी इतनी घनी हो गई कि गलियों में खेलने की जगह नहीं बची, मैदान नहीं बचा, तालाब-नदी नहीं बचे। कामकाज की आपा-धापी में माँ-बाप बच्चों के लिए नहीं बचे। घर में अकेले टीवी, कम्प्यूटर, मोबाइल से घिरे छोटे-छोटे आदमजात कितना बच्चा बचेंगे? घर से लेकर स्कूल तक उसके इतने गाइड हैं कि स्कूल बस में ही सयाना हो चुका जो बच्चा कक्षा में पहुँचता है उस पर किसी बात का असर ही नहीं होता।

वह इसी सप्ताह रिलीज होनेवाली फिल्म का वयस्क गाना गाना चाहता है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स में चैट करना चाहता है। स्कूल बैग में पड़ा उसका मोबाइल एसएमएस के आगमन से घूँ-घूँ काँपता है तो वह रिप्लाई न कर पाने की खीज में शिक्षक को शैतान समझ बैठता है। उसकी मानसिक लड़ाई अपने शिक्षक से उसी समय शुरू हो जाती है। अगली किसी डाँट पर वह माँ-बाप से केवल टीचर की शिकायत करना चाहता है।

पिछले दो तीन साल से नये शैक्षिक प्रयोग के बीच यह भी खूब सुन रहा हूँ कि “शिक्षक केवल विद्यार्थियों के लिए हैं। चुनौतियाँ कार्पोरेट सेक्टर जैसी। मुख्य है टार्गेट। विद्यार्थी अब शिष्य नहीं विद्यालय के उपभोक्ता हैं। यदि वे संतुष्ट नहीं, पैरेंट्स शिकायत करते हैं, आप टार्गेट में पीछे रहे तो हमें आपकी ज़रूरत नहीं।”

मैं और मेरे जैसे कई घर से हज़ारों किलोमीटर दूर डर जाते हैं। नौकरी गयी तो जीवन कैसे बचेगा? हम जितना डरते हैं माहौल उतना ही अच्छा होता माना जाता है।

आये दिन नये-नये डरावने बयान- “शिक्षक, विद्यार्थियों को पागल, गधा, मूर्ख नहीं कह सकते। चाँटा मारा तो कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही। अगर लहज़े में भी सख्ती दिखी और विद्यार्थी को इस वजह से तनाव हुआ उसने शिकायत की तो शिक्षक अपराधी। कोई नहीं बचा पाएगा।”

शिक्षकीय जीवन की एकदम शुरुआत में ही एक भली, कर्मठ शिक्षिका ने बताया था “यह ऐसा समाज है जिसमें शिक्षक की कोई नहीं सुनता” तो हँसी आ गयी थी। डरपोक। हम इंसान गढ़ने आये हैं। निर्माता हैं। हमें गुहार क्यों लगानी पड़ेगी? समाज हमसे खुद पूछेगा कोई तकलीफ़ तो नहीं। मैडम के लहज़े में रिटायर होने तक न मिटनेवाला डर साफ़ दिख रहा था। “सर, बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है। बच्चे सब नाबालिग हैं उनकी हर ग़लती का दोषी टीचर है। क्योंकि अभिभावक अपनी ग़लती मानेगा नहीं। स्टूडेंट, पैरेंट्स, प्रिंसिपल सबसे बचकर रहना पड़ता है टीचर को।”

उनकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गयी थी जब वे बोलीं- “सर, आप मेरे छोटे भाई जैसे हैं लेकिन नये हैं इसलिए कह रही हूँ गर्ल चाइल्ड को तो डाँटना भी मत कभी। कुछ ग़लत करते देखो तो किसी लेडी टीचर को समझाने के लिए बोलो। कभी स्कार्ट ड्यूटी हो तो लड़कियाँ लेकर बाहर मत जाओ। बच्ची की शिकायत को कुछ हथियार बनाते हैं। सीधे इंक्वायरी बैठती है और ऊपर तक कोई नहीं सुनता।”

इतने साल बाद लगता है कि ये सलाहें बड़ी व्यावहारिक थीं। फिर किन्हें और कैसे पढ़ाएँ? सोचकर साँस लेने को हवा कम पड़ती प्रतीत होती है।

सालों से घुट रहे पर सफल माने जानेवाले कुछ शिक्षक साथी कहते हैं “काहे की शिक्षा और काहे के स्कूल। सब नाटक है। जब ऊपर से नीचे तक ग़लत ही हो रहा है। तो बच्चे क्या सीखेंगे? सीखे हुए ईमानदार विद्यार्थी कहाँ, किस भविष्य में जाएँ?”

सुना था कि नौकरी तो बाप की भी बुरी। लेकिन शिक्षक भी नौकर ही है सोचकर रूह काँप जाती है। घर से, सबसे इतनी दूर, मन में इतने समर्पण, बच्चों से इतनी ममता, समाज की अपेक्षा मनुष्यता की सेवा और ओहदा नौकर का। आत्मा गवाही नहीं देती। नहीं, नौकर होकर नहीं पढ़ाया जा सकता!

तब उन बच्चों की शक्लें आँखों के आगे घूम जाती है जो रोकते-रोकते पैर छू लेते हैं सर, आपके मार्गदर्शन और आशीर्वाद से यह सफलता मिली। मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ। यदि ये बच्चे पढ़ेंगे नहीं तो कुछ नहीं कर पायेंगे। उन्हें इंसान भी नहीं माना जाएगा दुनिया में। विद्या ही उन्हें सर उठाकर जीने लायक बनाएगी। वे पढ़ रहे हैं। पेट में कुछ नहीं ऐसा जिससे दिमाग़ मज़बूत होता है। घर भर का खाना बनाकर ही वे अपने बस्ते में पौष्टिक खाना नहीं रख पा रहीं। बराबर रौशनी भी नहीं पर वे किताबों में नज़र गड़ाए हुए हैं। सबकी गालियाँ खा रही हैं पर पेन-कापी नहीं रख रहीं। चुपचाप रात दिन मेहनत करते हुए, कम कपड़ों में सर्दी का विद्यार्थी जीवन बिताते जब इन बच्चों को देखता हूँ और अपने से गहरे जुड़ा पाता हूँ तब भी मन नहीं कहता कि नौकर हूँ। भीतर से आवाज़ आती है शिक्षक हूँ और पुण्य का काम है पढ़ाना।

अभी यह लिखते हुए जान रहा हूँ कि कुछ ही घंटो में यह साल बीत जाएगा। आज़ादी के बाद अपने देश में इतने साल गुज़र चुके हैं कि इसके बीत जाने को भी कितना महत्व दूँ? लेकिन सभी आशावादी लोगों की तरह मेरी भी एक आशा है कि नये साल में हमारे देश में बच्चों और उनकी शिक्षा के लिए बड़ी जगह पैदा हो। शिक्षक अपने काम को सेवा समझें और इसके लिए कोई उन्हें ताना न मारे।

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

सरलता के सहारे हत्या की हिकमत

एक सरकारी आदेश आता है और हमारी सारी मानसिकता को बदलकर रख देता है। लोकतंत्र में यह जनभावना साथ साथ चलती है कि सरकार ने अगर कोई निर्णय लिया है तो वह पूरी तरह ग़लत नहीं हो सकता। फिर सुधार और विकास के कवर में तो कोई भी मसौदा चल जाता है। ऐसे में उस तबके को ही समझाने में असफलता ही हाथ लगती है जो कथित रूप से बुद्धिजीवी माना जाता है। फिर जनमानस निर्माण का ख्वाब कैसे देखें? उसके बारे में तो कहा ही जाता है कि जैसे कितनी भी बारिश हो कुआँ नहीं उफनता वैसे ही जनता लोकतांत्रिक निर्णयों के खिलाफ़ नहीं जाती चाहे वह संस्कृति संबंधी फैसला ही क्यों न हो। भाषा के संबंध में सतर्क जागरूकता तो वैसे भी कम पायी जाती है। प्रभु जोशी जी का यह लेख ऐसे समय में हमारे सामने है जब सरकारी तौर पर कामकाज की हिंदी में अंग्रेज़ी के शब्दों के खुलकर प्रयोग की वकालत की जा रही है। और इसे केवल वकालत ही क्यों कहें यह तो आदेश है कि ऐसा हो। इसे ग़ौर से पढ़ें और अगर किसी खतरे की आहट सुनते हैं तो यों ही टालने की कोशिश न करें। -शशिभूषण

भारत-सरकार का ‘गृह-मंत्रालय’, जिसको पता नहीं अतीत में जाने क्या सोच कर देश में ‘राष्ट्रभाषा‘ के व्यापक प्रचार-प्रसार का जिम्मा सौंप दिया गया था, पिछले दिनों एकाएक नींद से जागा और जाग कर उसने देश के साथ, आजादी के बाद का सबसे ‘क्रूरतम’ मजाक किया कि वह राजभाषा हिन्दी को ‘आमजन‘ की भाषा’ बनाने का फरमान जारी कर दिया। यह इसलिए कि वह ‘कठिन‘ और ‘अबोधगम्य‘ है। पिछली लगभग आधी सदी से जो शब्द परिचित चले आ रहे थे पता नहीं किस इलहाम के चलते वे तमाम शब्द अचानक ‘अबोधगम्य’ व ‘कठिन’ हो उठे। उसने अपनी तरफ से काफी चतुराई-भरा ‘परिपत्र‘ जारी करते हुए, सममस्या-समाधान के लिये गालिबन सलाह दी जा रही हो कि हिन्दी में ‘उर्दू-फारसी-तुर्की‘ के शब्दों का सहारा लिया जाये और साथ ही साथ आवश्यकता अनुसार ‘अंग्रेजी‘ के शब्दों को भी शामिल किया जाये। अंग्रेजी को सबसे पीछे, उर्दू-फारसी की आड़ में खड़ा कर दिया गया। लेकिन मूलतः यह मंसूबा, साफ-साफ दिखायी दे रहा था कि देश के ‘खास-आदमी‘ की दृष्टि से ‘आम-आदमी‘ के लिए भाषा की छल-योजित ‘पुनर्रचना‘ की जा रही है, इससे उनके भाषा-विवेक की वर्गीय पहचान तो प्रकट हो ही रही है, बल्कि यह भी पता चल रहा है ‘वित्त-बुध्दि’ की सरकार, सांस्कृतिक-समझ के स्तर पर कितनी कंगली है।

परिपत्र में बताया गया है कि मंत्रालय की ‘केन्द्रीय हिन्दी समिति‘ की प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सम्पन्न होने वाली बैठक के बाद यह निर्णय किया गया। छोटे पर्दे की खबरों में कभी भी हिन्दी में बोलते नहीं दिखायी देने वाले प्रधानमंत्री की हिन्दी बैठक की सिर्फ कल्पना भर की जा सकती है, कि वह कैसी होती होगी। बहरहाल, इसमें देश की ‘राजभाषा‘ को सरल सुगम बनाये जाने के लिए कोई निश्चित ‘प्रतिमान‘ तो नहीं बनाया गया है कि ‘सरल‘ बनाते समय अंग्रेजी शब्दों का प्रतिशत क्या होगा, लेकिन बतौर ‘प्रतिमानीकरण‘ के लिए ‘सरल‘ और ‘कठिन‘ शब्दों की पहचान करते हुए ‘समिति‘ ने पता नहीं देश के किस स्थान से प्रकाशित होने वाली कौन-सी पत्रिकाओं से उदाहरण दिया, वह निश्चय ही स्पष्ट रूप से बताता है कि उसकी दृष्टि में ‘भोजन‘ की जगह ‘लंच‘, ‘क्षेत्र‘ की जगह ‘एरिया‘, ‘महाविद्यालय‘ के बजाय ‘कॉलेज‘, ‘वर्षा-जल‘ के बजाय ‘रेन-वॉटर‘, ‘नियमित‘ की जगह ‘रेगुलर‘, ‘श्रेष्ठतम पांच‘ के स्थान पर ‘बेस्ट फाइव‘ ‘आवेदन‘ की जगह ‘अप्लाई‘, छात्रों के बजाय ‘स्टूडेण्ट्स‘, ‘उच्च शिक्षा‘ के बजाय ‘हायर-एजुकेशन‘ आदि-आदि का प्रयोग भाषा के सरलीकरण में सहयोगी होगा। आप यह पढ़ कर स्वयं स्पष्ट कर लें कि हिन्दी के शब्दों की तुलना में जो शब्द अंग्रेजी के बताये गये हैं, वे ‘सरल‘ हैं और आमजन को आसानी से समझ में आ जायेंगे।

उनका यह भी कहना है कि इससे भाषा में ‘प्रवाह‘ बना रहेगा। अब आप बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि यह प्रवाह अंततः भाषा को किस दिशा में ले जायेगा। परिपत्र में बहुत बुद्धिमानी के साथ यह ‘सत्य‘ भी उद्घाटित किया गया, जो हिन्दी के साहित्यकारों की समझ में भी इजाफा करेगा कि ‘साहित्यिक भाषा के इस्तेमाल से उस भाषा-विशेष की ओर से आम-आदमी का रूझान कम हो जाता है और उसके प्रति मानसिक-विरोध बढ़ता है।‘ खैर यह नेक सलाह हिन्दी के साहित्यकार जानें, जो पिछले बीस बरसों से, इसी झंझट से ही बाहर नहीं आ पा रहे हैं कि किसकी कविता को ‘प्रगतिशील’ बतायें और किसकी को ‘प्रतिक्रियावादी’।

बहरहाल, इस ऐतिहासिक ‘परिपत्र‘ में भाषा की ‘कठिनता‘ की समस्या का समाधान खोजते हुए पहले काफी बड़ी भूमिका भी बांधी गयी और ‘उर्दू-फारसी-तुर्की‘ के शब्दों के प्रयोग की बात कुछ ऐसे सदाशयी अंदाज में पूरे भोलेपन के साथ कही गयी है कि जैसे वे कोई नयी बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि बस ‘गांधी-नेहरू‘ वाली ‘बोलचाल‘ की भाषा की बात को ही फिर से दोहरा रहे हैं।

लेकिन, मित्रो, हकीकत ये है कि ‘उर्दू-फारसी-तुर्की‘ के शब्दों के शामिल किये जाने की बात से तो सिर्फ बहाना है, जबकि बुनियादी रूप से उनका मंसूबा सिर्फ अंग्रेजी के शब्दों को शामिल करने का ही है। क्योंकि, उन्होंने ‘परिपत्र‘ में जो अनुकरणीय उदाहरण दिया है, उनकी असली इच्छा ‘भाषा‘ को उसी ‘रूप‘ की ओर हांकने की ही है, जिसको उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पाते ही धन्धों में धुत्त हो चुके अखबारों से ही उठा कर उसे उदाहरण के रूप में रखा है। और पिछले वर्षों से हिन्दी के अखबारों के महानगरीय संस्करणों में यह रूप चलाया जा रहा है। , लेकिन वे साफ-साफ ‘हिंग्लिश’ नहीं कहना नहीं चाहते। जबकि वे हिन्दी को ‘हिंग्लिश’ में बदलने का संकल्प ले चुके हैं और ऐसा करना उनके लिये इसलिए भी जरूरी है कि उनकी यह विवशता है,। चूंकि भारत में विदेश से हासिल होने वाली आवारा पूंजी की यह अघोषित शर्त है। यह पूंजी, केवल पूंजी की तरह नहीं आती, वह सांस्कृतिक माल के लिये जगह बनाती हुई आती है।

कहने की जरूरत नहीं कि अंग्रेजी के अखबारों ने उनके इस नेक इरादे को इसीलिए तुरन्त पढ़ लिया और उनकी बांछें खिल गयीं। उन्हांेने इस ‘परिपत्र‘ के स्वागत के उत्साह में ‘प्रथम-पृष्ठ‘ की खबर बनाते हुए कहा कि सरकार ने ‘देर आयद दुरूस्त आयद‘ की तरह खुद को ‘अमेण्ड‘ किया और आखिरकार देश के विकास के पक्ष में ‘हिंग्लिश‘ के लिए रास्ता खोल दिया है।‘ हिंग्लिश गेन्स रेस्पेक्टैबिलिटी।’ ‘ हिंग्लिश गेन्स ग्राउण्ड इन इण्डिया’। ‘हिंग्लिश विल बी द ऑफिशियल लैंग्विज ऑव इंण्डिया।’

बहरहाल, यह सच अब किसी से भीे छिपा नहीं रह गया है कि बहुराष्ट्रीय-निगमों की ‘सांस्कृतिक-अर्थनीति‘ के दलालों द्वारा भारत में ‘भूमण्डलीकरण’ के शुरू होते ही लगातार इस बात की वकालत की जाती रही है कि भारत में ‘अंग्रेजी‘ किसी भी तरह देश की प्रथम भाषा का ‘वैध‘ स्थान प्राप्त कर ले। इसके लिए उन्होंने ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन’ की तर्ज पर उससे भी कहीं ज्यादा धूम-धड़ाके वाला एक आयोजन, जो ‘माइका’ द्वारा प्रायोजित था, मुम्बई में किया, जिसमें गिरहबान पकड़ कर भारतीयों को बताया जाता रहा कि ‘भारत का भविष्य हिन्दी नहीं, ‘हिंग्लिश‘ में है’ और इससे नाक-भौंह सिकोड़ने की जरूरत नहीं, क्योंकि इसमें भी शेक्सपीयर पैदा हो जायेगा, और तीस वषों बाद यह दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा होगी। ये बात वे किसे बता रहे हैं ? कौन नहीं जानता कि संख्या के आधार के कारण भारतीय जो भी भाषा बोलने लगेंगे वह दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा कह लायेगी ही। दूसरी बात ये कि जो अंग्रेजी दूसरा शेक्सपीयर पैदा नहीं कर पायी, वह हिंग्लिश पैदा कर देगी ? फिर क्या भविष्य के एक काल्पनिक शेक्सपीयर के भारत में पैदा हो जाय इसके लालच में उस भाषा को मार दें, जिसने वह यात्रा मात्र चौसठ वषों में पूरी कर ली, जिसे पूरी करने में अंग्रेजों को पांच सौ वर्ष लगे ?

बहरहाल पेंगुइन प्रकाशन ने इस पूरे प्रायोजित अभियान पर केन्द्रित एक बड़ी-सी लगभग दो-सौ पृष्ठों की एक पुस्तक भी छापी है, ताकि भारत के उन काले अंग्रेजों को तर्कों के वे तमाम धारदार अस्त्र मिल जायें, जिनका वे जरूरत पड़ने पर अचूक इस्तेमाल जहां-तहां बहस-मुबाहिसों में कर सकें, क्योंकि निश्चय ही आगे-पीछे ‘गोबरपट्टी बनाम काऊबेल्ट‘ के लद्धड़ लोग एक दिन ‘राष्ट्रभाषा‘ के नाम पर एकजुट हो कर हो हल्ला मचायेंगे, तब सार्वजनिक-मंचों और छोटे पर्दे पर भाषा को लेकर होने वाली मुठभेड़ों में उन्हें विजयी बनाने मंे ये तर्क ही इमदाद करेंगे।

दूसरी ओर ‘धंधे में धुत्त‘ हिन्दी के सामान्य से अखबारों ने भी आमतौर पर तथा उन अखबारों ने, जिन्होंने ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश‘ पर अपना साम्राज्य खड़ा किया है, खासतौर पर ठीक ऐसी ‘छुपाये न छुपने वाली‘ खुशी के साथ परिपत्र की ‘अगुवाई‘ की जैसे भारत और अमेरिका के बीच परमाणु सौदा सुलट गया है। बड़े-बड़े और लम्बे सम्पादकीय रगड़ते हुए उन्होंने अपने पाठकों को बताया कि जो काम इस सरकार ने कर दिखाया, वह उसकी शक्तिशाली राजनीतिक इच्छा का प्रमाण है। यह एक बहुप्रतीक्षित और अनिवार्य कदम था। हालांकि, उन्होंने इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा कि उनकी टिप्पणी में भूले से भी कहीं ‘हिंग्लिश’ शब्द ना आ जाये।

लेकिन, भाषा की ‘ऐतिहासिक-‘सामाजिक-सांस्कृतिक’ और आर्थिक भूमिका के परिप्रेक्ष्य को अपेक्षित गहराई से समझने वाले दूरदृष्टा लोग, इस परिपत्र को किसी सरकारी कार्यालय के कारिन्दे द्वारा गाहे-ब-गाहे जारी कर दिया जाने वाला रस्मी ‘कागद‘ नहीं, बल्कि भारतीय-भाषाओं के क्षेत्र में परमाणु सौदे से भी ज्यादा उलटफेर करने वाला ‘अस्त्र’ मान रहे हैं। तीन-सौ वर्षों के गुलामी के दौर में भारतीय भाषाओं का जितना नुकसान अंग्रेजों ने नहीं किया, उससे ज्यादा बड़ा नुकसान भारत-सरकार का गृह-मंत्रालय इस परिपत्र के जरिये करने वाला है। क्योंकि वे जानते हैं कि यह हिन्दी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं को भी जल्दी ही विघटित कर देगा। क्योंकि उन राज्यों की वे क्षेत्रीय भाषाएं, संविधान की आठवीं अनुसूची वाली भाषाएं हैं। निश्चय ही वहां भी यह फरमान तमिल को ‘तमलिश’ बांग्ला को ‘बांग्लिश’ बनाने का काम करेगा । वैसे इन भाषाओं के अखबार भी ये काम शुरू कर ही चुके हैं। यहां यह याद रखा जाना चाहिए कि दक्षिण की भाषाएं अपनी वैकल्पिक-शब्दावलि की तलाश में उर्दू-फारसी-तुर्की की तरफ नहीं जातीं। चूंकि वे अपना रक्त-संबंध संस्कृत से ही बनाती आयी हैं। लेकिन इनके बोलने वालों के भीतर छुपे अंग्रेजी के दलालों की फौज दलीलें देने के लिए आगे आयेगी कि जब भारत-सरकार द्वारा हिन्दी को ‘हिंग्लिश’ बनाया जा रहा है, तब तमिल को ‘तमिलिश’ बनाने का अविलम्ब रास्ता खोल दिया जाना चाहिये, ताकि उसका भी ‘आम-आदमी’ के हित में ‘सरलीकरण’ हो सके। दरअस्ल हिन्दी के संस्कृतनिष्ठ-रूप का आग्रह तो दक्षिण ही सबसे ज्यादा करता रहा आया है।

कुल मिलाकर, इस महाद्वीप की सारी की सारी भाषाओं के निर्विघ्न विसर्जन का एकमात्र हथियार बनने वाला सिद्ध होगा, यह परिपत्र। एक से अनेक को निपटाने का कारगर हथियार। प्रकारान्तर से यही वही औपनिवेशिक विचार का एक किस्म का अप्रकट ‘डिवाइन-इण्टरवेंशन’ है, जिसके चलते कहा गया था कि ‘प्रोलिफरेशन ऑव लैंग्विज इज पेनल्टी ऑन ह्यूमेनिटी।’ भाषा-बहुलता मानवता पर दण्ड है। अतः सभी भाषाएं खत्म हों और केवल एक पवित्र अंग्रेजी भाषा ही बची रहे। हिन्दुस्तान अपनी भाषा की बहुलता के कारण वैसे ही पाप की काफी बड़ी गठरी अपने सिर पर उठाये चला आ रहा है। बहरहाल, भाषा सम्बन्धी ऐसी ‘पवित्र- वैचारिकी‘ भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय के प्रति स्वयं को निश्चय ही बहुत कृतज्ञ अनुभव कर रही होगी।

कहना न होगा कि हिन्दी की भलाई करने का मुखौटा लगा कर सत्ता में बैठे ये लोग, निश्चय ही काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और यह बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि भाषाएं कैसे मरती हैं और उन्हें क्यों और किसी फायदे के लिए मारा जाता है। बीसवीं सदी में अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं का खात्मा करके उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित करने की रणनीति क्या थी? यह सब इनको बखूबी पता है और वही कुचाल उन्होंने यहां चली और वे अब सफलता के करीब हैं। जी हां वह रणनीति थी ‘स्ट्रेटजी ऑव लैंग्विज-शिफ्ट।‘ इसके तहत सबसे पहले चरण में शुरू किया जाये-‘डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात् स्थानीय भाषा के प्रचलित शब्दों को वर्चस्ववादी अंग्रेजी भाषा के शब्दों से ‘विस्थापित’ किया जाये। ध्यान रखें कि ‘डिस्लोकेशन शुड बी क्वाइट स्मूथ।’ अन्यथा उस भाषा के लोगों में विरोध पैदा होना शुरू हो सकता है। अतः यह काम धीरे-धीरे हो। इसको कहा जाता है- ‘काण्टा-ग्रेजुअलिज्म’। शब्दों का ‘विस्थापन’ करते हुए , इसका प्रतिशत सत्तर और तीस का कर दिया जाये। यानी सत्तर प्रतिशत शब्द अंग्रेजी के हो जाएं तथा तीस प्रतिशत स्थानीय भाषा के रह जायें। एक सावधानी यह भी रखी जाये कि इसके लिये सिर्फ एक ही पीढ़ी को अपने एजेण्डे का हिस्सा बनायें। जब उस समाज की परम्परागत-सांस्कृतिक शब्दावलि जिससे उसकी भावना जुड़ी हो, और यदि उसे ‘डिस्लाकेट’ या कहें अपदस्थ करने पर उस समाज में इस नीति के प्रति कोई प्रतिरोध नहीं उठे तो मान लीजिए कि ‘दे आर रेडी फॉर लैंग्विज शिफ्ट’। इसके बाद ‘वॉल्टेण्टअरली दे विल गिव्ह-अप देअर लैंग्विजेज’।

बस, इसी निर्णायक समय में उसकी मूल-लिपि को हटाकर उस लिपि की जगह ‘रोमन- -लिपि’ कर दीजिए। ‘दिस विल वी द फाइनल असाल्ट ऑन लैंग्विज’। यानी भाषा की अंतिम कपाल क्रिया। हालांकि, इन दिनों विज्ञापन व्यवसाय व मीडिया और इसी के साथ उन समाजों और राष्ट्रों की सरकारों पर ‘विश्व-व्यापार संघ’, ’अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ जैसे वित्तीय संस्थानों से दबाव डाला जाता है कि ‘रोल ऑफ योर गव्हर्मेण्ट आर्गेनाइजेशंस शुड बी इनक्रीज्ड इन प्रमोशन ऑफ इंग्लिश लैंग्विज।‘

कहने की जरूरत नहीं कि इनके साथ हमारा प्रिण्ट और इलेक्टॉनिक मीडिया गठजोड़ करता हुआ, यह बताता भी आ रहा है कि देवनागरी को छोड़कर रोमन-लिपि अपना ली जाय। लोगों ने अपनाना भी शुरू कर दी है। यह अंग्रेजी के उस गुण की याद दिला रहा है, जिसके बारे में शायद बर्नार्ड शॉ ने कहा था कि ‘अंग्रेजों की सबसे बड़ी विशेषता ही यह है कि वह आपको इस बात के लिए राजी कर सकते हैं कि आपके हित में आपका मरना जरूरी है।’

बहरहाल, विश्व बैंक द्वारा ‘सर्वशिक्षा-अभियान’ के नाम पर डॉलर में दिये गये ऋण का ही दबाव है, जो अपने निहितार्थ में ‘एजुकेशन फॉर आल’ नहीं, -इंग्लिश फॉर आल’ का ही एजेण्डा है। इसी लिये बेचारे गरीब सैम पित्रोदा कहते आ रहे हे कि ‘पहली कक्षा से ही अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू कर दी जाये’। चूंकि इससे लैंग्विज-शिफ्ट में आसानियां बढ़ जायेगीं।
यह भारत-सरकार का वही नया पैंतरा है, और जो भाषा की राजनीति जानते हैं वह बतायेंगे कि यह वही ‘लिंग्विसिज्म’ है, जिसके तहत भाषा को ‘फ्रेश-लिंग्विस्टिक’ लाइफ देने के नाम पर उसे भीतर से बदला जाता है। पूरी बीसवीं शताब्दी में इन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप की भाषाओं को इसी तरह खत्म किया। वहां भी शुरूआत एफ,एम, रेडियो के जरिये वहां के संगीत और मनोरंजन में घुसकर की गई थी। उन्होंने वहां पहले फ्रांस की तर्ज पर रेडियो के जरिये भाषा-ग्राम अर्थात् लैंग्विज-विलेज बनाये जिसमें स्थानीय भाषाओं में अंग्रेजी के ’मिक्स’ से भाषा-रूप बनाया और वहां की युवा-पीढ़ी को उसका दीवाना बना दिया। ये अफ्रीकी भाषाओं की पुनर्रचना का अभियान था। जी हां, रि-लिंग्विफिकेशन, जिसकी शुरूआत हमारे यहां भी एफ-एम रेडियो में अपनायी गयी प्रसारण-नीति से शुरु की गई।

दरअस्ल, हकीकत ये है कि चीन की भाषा मंदारिन के बाद दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा हिन्दी से डरी हुई, अपनी अखण्ड उपनिवेश बनाने वाली अंग्रेजी ने ब्रिटिश कौंसिल के अमेरिकी मूल के जोशुआ फिशमेन की बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए, उदारीकरण के शुरू किये जाने के बस कुछ ही समय पहले एक सिद्धान्तिकी तैयार की थी, जो ढाई-दशक से गुप्त थीं, लेकिन इण्टरनेटी युग में वह सामने आ गयी। इसका ही नाम था रि-लिंग्विफिकेशन। अर्थात् भाषा की पुनर्रचना।
अंग्रेज शुरू से भारतीय भाषाओं को पूर्ण भाषा न मानकर उन्हें वर्नाकुलर कहा करते थे। वे अपने बारे में कहा करते थे वी आर अ नेशन विथ लैंग्विज, व्हेयर एज दे आर ट्राइब्स विद डॉयलेक्ट्स। फिर हिन्दी को तो तब खड़ी बोली ही कहा जा रहा था। लेकिन दुर्भाग्यवश एक गुजराती-भाषी मोहनदास करमचंद गांधी ने इसे अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई में देश भर में प्रतिरोध की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा बना दिया और नतीजतन एक जन-इच्छा पैदा हो गयी कि इसे हम ‘राष्ट्रभाषा’ बनाएं और कह सकें वी आर अ नेशन विद लैंग्विज। लेकिन औपनिवेशिक दासता से दबे दिमागों के कारण यह ‘राष्ट्रभाषा’ के बजाय केवल ‘राजभाषा’ बन कर ही रह गयी। गांधी जी के ठीक उलट, नेहरू का रूझान शुरू से ही अंग्रेजी की तरफ ही था। चौदह अगस्त की रात में जब वे बीःबीःसी के सम्वाददाता को वे कह रहे थे कि ‘संसार को कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है’ तो यह एक भाषा-समर की घोषणा थी, जबकि नेहरु एक नव-स्वतन्त्र राष्ट की संसद में अंग्रेजी में भाषण दे रहे थे। लेकिन गांधी ने हिन्दी को राष्टभाषा बनाने की बात कर के उसे भारतीय-राजनीति का हमेंशा के लिये सालते रहने वाला कांटा बना दिया।
बहरहाल, चौंसठ वर्षों से सालते रहने वाले उस पुराने कांटे को अब निकाला जा सका है।

बहरहाल ,अभी पांच साल पहले तक हिन्दी में जो शब्द, चिर-परिचित थे। अचानक ‘अबोधगम्य’ और ‘कठिन’ हो गये। एक और दिलचस्प बात यह कि हममें ‘राजभाषा’ के अधिकारियों की भर्त्सना की बड़ी पुरानी लत है ओर उसमें हम बहुत आनन्द लेते हैं, जबकि हकीकतन वह सरकारी केन्द्रीय कार्यालयों का सर्वाधिक लतियाता जाता रहने वाला नौकर होता है। उससे ज्यादातर दफ्तरों में जनसम्पर्क के काम में जोत कर रखा जाता है। कार्यालय प्रमुख की कुर्सी पर बैठा अधिकारी उसे सिर्फ हिन्दी पखवाड़े में पूछता ह और जब ‘संसदीय राजभाषा समिति’, जो दशकों से खानापूर्ति के लिए आती रही है, के सामने बलि का बकरा बना दिया जाता है। यह परिपत्र भी उन्हीं के सिर पर ठीकरा फोडते हुए बता रहा है कि हिन्दी के जो शब्द कठिन है इनकी ही अकर्मण्यता के कारण है। और जबकि, इतने वर्षों में कभी पारिभाषिक शब्दावलि का मानकीकरण सरकार द्वारा खुद ही नहीं किया गया। हर बार बजट का रोना रोया जाता रहा।

कहने की जरूरत नहीं कि यह इस तथाकथित भारत-सरकार (जबकि गव्हर्मेण्ट ऑफ इण्डिया सरल शब्द है) का इस आधी शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन है, जो देश के एक अरब बीस करोड़ लोगों को अंग्रेजी सिखाने की महा-खर्चीली योजना का संकल्प लेती है, लेकिन साठ साल में वह देश को मुश्किल से हिन्दी के हजार-डेढ़ हजार शब्द नहीं सिखा पायी ? और उसे उन्हें सरल बनाने के लिए अंग्रेजी के सामने धक्का देना पड़ा है।
दरअस्ल, सरल-सरल का खेल खेलती हुई किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है ? वह ‘राजभाषा’ के नाम पर देश के साथ सबसे बड़ा छल कर रही थी।

यह बहुत नग्न-सचाई है कि यह देश, अपने कल्याणकारी राज्य की गरदन कभी का मरोड़ चुका है और कार्पोरेटी संस्कृति के सोच को अपना अभीष्ट मानने वाले अरबों के आर्थिक घोटालों से घिरे सत्ता के कर्णधारों को केवल घटती बढ़ती दर के अलावा कुछ नहीं दिखता। भाषा और भूगोल दोनों उनकी चिंता के दायरे से बाहर हैं। निश्चय ही इस अभियान में हमारा पूरा मीडिया भी शामिल है, जिसने नव-उपनिवेशवादी मंसूबों के इशारों पर सुनियोजित ढंग से ‘यूथ-कल्चर’ का राष्ट्रव्यापी मिथ खड़ किया और अंग्रेजी और पश्चिम के सांस्कृतिक-उद्योग में ही उन्हें उनका भविष्य बताने में जुट गये। यह मीडिया द्वारा अपनाई गई दृष्टि उसी रॉयल चार्टर का नीति का कार्यान्वयन है, जो कहता है, दे शुड नॉट रिजेक्ट अवर लैंग्विज एण्ड कल्चर इन फेवर ऑफ देअर ट्रेडिशनल वैल्यूज। देअर स्ट्रांग एडहरेन्स टू मदर टंग हैज टू बी रप्चर्ड। इसलिए उनमें एक ‘अविवेकवाद’ पैदा किया गया ताकि वे भारतीय भाषाओं को विदा करने में देश की तरक्की के सपने देखने लगें।

कहना न होगा कि ‘लैंग्विजेज शुड बी किल्ड विथ काइण्डनेस’ की रणनीति का यह प्रतिफल है, परिपत्र। इसे हिन्दी के ताबूत में आखिरी कील समझा जाना चाहिए और इसकी चौतरफा तीखी आलोचना और भर्त्सना तक की जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि वे इसे अविलम्ब वापस लें। क्योंकि सरकार की नीति का खोट खुलकर सामने आ चुका है। अंग्रेजी अखबार जिसे पढ़ कर साफ-साफ बता रहे हैंए वहीं हिन्दी के अखबार उसे छुपा रहे हैं। ऐसा करते हुए वे आग के आगे पर्दा खींच रहे हैं। यह निश्चय ही राष्ट के साथ पत्रकारिता का सबसे बड़ा धोखा कहा जायेगाा। हम इस लांछन के साथ इस संसार से बिदा नहीं होना चाहेंगे कि प्रतिरोध की सर्वाधिक चिंतनशील भाषा का एक सांस्कृतिक-रूप से अपढ़ सत्ता ने हमारे सामने गला घोंटा और हम चुपचाप तमाशबीनों की तरह देखते रहे और कोई प्रतिरोध नहीं किया। जबकि, इस परिपत्र के सहारे तमाम भारतीय भाषाओं की पीठ में नश्तर उतार दिया जाना है। यह ‘सरलता के सहार’े चुपचाप तमाम भारतीय भाषाओं की हत्या के लिए की जा रही जघन्य हिकमत है।

भाषा मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार है। सम्प्रेषण के साथ ही संस्कृतीकरण के मार्ग को इसी ने प्रशस्त किया। जिस राष्ट्र के पास अपनी कोई भाषा नहीं, वह सांस्कृतिक रूप से अनाथ ही होगा। ‘अपनी भाषा में ही अपना भविष्य’ खोजने वाले चीन और जापान, जिनकी भाषाएं ढाई हजार चिन्हों की चित्रात्मक लिपि है, उसी में उन्होंने बीसवीं शताब्दी का सारा ज्ञान-विज्ञान विकसित और आज वह सभी क्षेत्रों से लगभग निर्विवाद रूप से अपराजेय है। कन्नड़ सीख कर चपरासी की भी नौकरी नहीं मिल सकती का तर्क देकर भाषा को खत्म करने के लिए लोग हिन्दी के भी बारे में यही बात बोलते हुए उसके संहार के सरंजाम जुटा रहे हैं, जबकि हिन्दी में यदि हम अपने पड़ोसियों से ही व्यापार-व्यवसाय शुरू करने लगे तो हिन्दी अच्छी खासी कमाने वाली भाषा बन सकती है। भाषा का अर्थशास्त्र खंगालकर यह बताया जा सकता है कि जब मनोरंजन के कारोबार में वह कमा रही है तो वह दूसरे क्षेत्रों में भी उतनी ही कमाऊ सिद्ध हो सकती है। लेकिन, दुर्भाग्य यह कि हमने पूरे भारतीय समाजं को कभी भी अंग्रेजी के औपनिवेशक शिकंजे से मुक्त होने ही नहीं दिया या हमें हमारी सत्ताओं ने नहीं होने दिया। नेहरू ने अपनी असावधानी के क्षणों में, जो बात यू ए एन राजनय जॉन ग्रालब्रेथ के सामने लगभग पश्चात के स्वर में कही थी कि ‘आयम द लास्ट इंग्लिश प्राइम मिनिस्टर अू रूल इण्डिया’। पर इन्हें कहां मालूम था कि नेहरू जो तुम गांव गांव धूल धक्कड़ खाते हुए हिन्दी में ही बोलते बतियाते प्रधानमंत्री थे, लेकिन अब देश के पास बाकायदा अंग्रेज तो नहीं, पर अंग्रेजी प्राइममिनिस्टर तो है ही , जो संसद और अपनी पत्रकार वार्ताओं में भूल से भी हिन्दी शब्द नहीं बोलता। उसके पास हिन्दी लाल किले की सीढ़ियों पर अपने रेडिमेड रूप में आती है। वहां हिन्दी देश का गौरव नहीं, राजनीति का रौरव है।

अन्त में, मैं सारे ही देशवासियों से कहना चाहता हूं कि ये मसला केवल हिन्दी भाषा-भाषियों का नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय भाषाओं का है। क्योंकि बकौल राहुल देव के हमें ये अच्छी तरह से ये जान लेना चाहिये कि हमारा भविष्य हमारी भाषाओं में ही है। इसलिये इस नीति का खुल कर विरोध करें। और राजभाषा विभाग को अपनी असहमति प्रकट करते हुए ई-मेल करें।

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-प्रभु जोशी
303, गुलमोहर निकेतन, वसंत-विहार
(शांति निकेतन के पास)
इन्दौर-10