सोमवार, 4 अक्तूबर 2021

भारतीय मीडिया फ़ासीवादी प्रचारतंत्र ही है

वर्तमान भारतीय मीडिया का लक्ष्य जनता को जन-संहार का मूकदर्शक बनाना है। भारत में मीडिया और सोशल मीडिया पिछले कुछ सालों से धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, समाजवाद, जाति और धर्म के ख़िलाफ़ नफ़रत का पूँजीवादी संगठित-सुनियोजित तंत्र है। संपूर्ण प्रचारतंत्र जो धार्मिक-सामाजिक नफ़रत बोकर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का रास्ता तैयार कर रहा है। भारत में मौजूदा मीडिया और सोशल मीडिया का लक्ष्य नागरिकों को दूसरे नागरिकों के मानवाधिकारों, आज़ादी, संवैधानिक उपचारों से विमुख-उदासीन करना है। जनता की मानवीय आँखों को अपने कल्पित विकास की लालची-अंधी आँखों में बदलकर हनन, दमन, बेदखली तथा भावी जनसंहार के समय मूक दर्शक बने रहने की मानसिकता का निर्माण करना है।

भारत में मीडिया सोशल मीडिया फ़ासीवादी सत्ता के लिए नाज़ीवादी जनमत निर्माता है। यह बिलकुल उसी धुन पर काम कर रहा है जैसे नाज़ीवादी दौर के जर्मनी में मीडिया काम करता था। यह बेख़ौफ़ बेलगाम उन्माद, धार्मिक राष्ट्रवाद, सामाजिक घृणा-हिंसा का प्रस्तावक, प्रसारक और पोषक है। यह कभी बेपर्दा शब्दों में तो कभी अच्छे शब्दों के वस्त्रों में प्रचार का खेल खेलता है। इस मीडिया को केवल सांप्रदायिक या जातिवादी या कार्पोरेट रूप में देखना इसके वृहत्तर विनाशकारी मक़सद से आँखे चुराना है। कहना दुखद है लेकिन कहना ही होगा भारत में मीडिया सोशल मीडिया धार्मिक-जातीय आधार पर देश के बहुसंख्यकों को भावी जनसंहार का अभ्यस्त बनाने में सफल भी हो रहा है। यह बेरोक-टोक गृह युद्ध की पूर्वपीठिका तैयार कर पा रहा है। इसके पीछे सत्ता और महा पूँजी है। इस मीडिया को एक ही जवाब हो सकता है भले यह कितना ही अपर्याप्त हो देश का धर्मनिरपेक्ष, मानवतावादी, पढ़ा-लिखा वर्ग और एकजुट विपक्ष जन-शिक्षण की भूमिका में अविलंब आ जाये।

धन और धर्म की एकीकृत शक्ति से लड़ाई बेहद मुश्किल होती है। यह लड़ाई विपक्ष और जनता की साझी लड़ाई बने तब भी जीतनी आसान नहीं होती। आज धर्म-पूँजी के संगठित प्रचारतंत्र सत्ता मीडिया से निपटने का और कोई रास्ता नहीं दिखता है। सामाजिक सदभाव, वैज्ञानिक चेतना, लोकतांत्रिक समाजवाद में अटूट आस्था और जन-शिक्षण इन्हीं में उम्मीद है। इनमें ही नये जन पक्षधर मीडिया की भी आशा अंतर्निहित है। कल लखीमपुर में जिस प्रकार आंदोलनकारी किसानों की गाड़ी से कुचलकर हत्या की गयी आज उन किसानों को कुछ मीडिया समूह द्वारा उपद्रवी कहना बानगी भर है। इस मीडिया को फ़ासीवादी प्रचारतंत्र ही कहा जाना चाहिए है जो भारत में अपनी जड़ें गहरी जमा चुका है।

शशिभूषण
4 अक्तूबर 2021



5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-10-2021) को चर्चा मंच         "पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप"    (चर्चा अंक-4209)     पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

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  2. सामयिक आलेख। पढ कर अच्‍छा लगा।

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  3. हकीकत को बयां करता बहुत बहुत बहुत ही उम्दा आलेख!

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  4. सामायिक चिंतन देता आलेख।
    विस्तृत भाव ।

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