शुक्रवार, 17 मई 2019

वो वक़्त आएगा

- प्रशासन से शिकायत होती है ?
- नहीं। नहीं होती।
- क्यों ?
- अर्थहीन है।
- शिकायत का कोई अर्थ ही नहीं ?
- किसी के लिए हो सकता है। मेरे लिए नहीं है।
- इसकी वजह ?
- प्रशासन अभी शैशवावस्था में है।
- क्या मतलब ?
- यह अभी मातहत से कुछ कायदों को मनवा लेने और अपने पद से संबंधित कुछ कायदों को मानते हुए निजी सुविधाओं, रसूख और यश के उपभोग तक ही पहुंचा है।
- ऐसा तो नहीं। एक से एक अफसर हैं जो मिसाल और लोक प्रशासन की शान हैं। उन्होंने बड़े बड़े काम किये। सुधार कर रहे।
- व्यक्तिगत उदाहरण और अपवाद किसी भी क्षेत्र में मिल सकते हैं।
- आपके कहने का मतलब यह बहुतायत में नहीं ?
- हां। अभी वह यात्रा शुरू होनी है जब राजनीति का उद्देश्य लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, हक़, बराबरी और जन कल्याण तथा प्रशासन का उद्देश्य मनुष्यता एवं लोकसेवा होंगे।
- यह संभव है ?
- जब तक राजनीति जन कल्याणकारी नहीं होगी। फिर बेहतर नहीं होती रहेगी प्रशासन में मनुष्यता नहीं हो सकती।
- फिर जो लोग प्रशासन से असंतुष्ट होते हैं। नाराज़ होते हैं। शिकायती हैं उनका क्या ?
- सम्भव है वे एक दिन समाधान तक पहुँचे। लेकिन वह आंशिक और अल्पकालिक ही होगा। वैसे ज्यादातर लोग प्रशासन में ईमानदारी की कमी की ही शिकायत करते हैं। उनकी शिकायत के बाद अगर कोई दूसरा आता भी है तो दूसरे की ईमानदारी की गारंटी नहीं होती। लेकिन शिकायत करने वाला खुश होता है। मैंने कुछ किया। मेरी शिकायत से कुछ बदला।
- तो क्या भ्रष्टाचार वाकई कोई इश्यू नहीं ?
- हो सकता है। लेकिन ईमानदारी से भी पहले है मनुष्यता। वरना डाकू भी अपने गिरोह में अत्यंत ईमानदार होता है। अगर मनुष्यता ध्येय हो तो कोई इंसान बेईमान नहीं हो सकता। न राजनीति में न प्रशासन में न कहीं और।
- मनुष्यता के अलावा आपका कोई फ़र्ज़ नहीं ?
- मेरा फ़र्ज़ है अपना काम ठीक से, मेहनत से करना। बड़ों की बात सुनना। ग़लती हो जाने पर उसे नहीं दोहराना। शिकायती होकर नहीं जीना। जहां लगे मैं सही हूँ उसे निर्भीक होकर कहना और जरूरत पड़ने पर अच्छाई के लिए लड़ना।
- इससे आपके साथ न्याय होता रहेगा ?
- यह देखना उनका काम है जिन्हें न्याय करना है। कुछ अनसुनी, अन्यायों से इंसान को हार मानकर वैसे ही नहीं हो जाना चाहिए जैसे लोगों वह सही नहीं मानता।
- यही आपका सपना है ?
- नहीं। मेरा सपना है वह दिन देखना। जब राजनीति सामाजिक न्याय, बराबरी और हक़ के लिए होगी और प्रशासन में लोकसेवा और मनुष्यता सर्वोपरि होंगे।
- ऐसा दिन आएगा ?
- ज़रूर आएगा।
- कौन लाएगा ?
- बच्चे।
- आपको यकीन है ?
- मुझे यकीन है।
- आप घोर आदर्शवादी और आशावादी हैं।
- मैं शिक्षक हूँ।


- शशिभूषण

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें