शनिवार, 10 दिसंबर 2016

क्या विश्वविद्यालय सचमुच विवश हैं?

"आज खुद को बहुत बेबस महसूस कर रही हूँ। पिछले बार के अन्तर्विश्वविद्यालयीन युवा उत्सव में मैं नेशनल से इंटरनेशनल प्रतियोगिता के लिए सेलेक्ट हुई।

अब जब अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में जाने की बारी आई तो एक महिला एस्कॉर्ट नहीं मिल रही हैं। पिछली बार भी इसी कारण मेरा पार्लियामेंट ट्रिप रद्द हो गया था।

ये कैसी व्यवस्था है कि जहाँ प्रतिभा प्रतियोगिता में एस्कॉर्ट के चलते भाग लेने से रह जाती हैं?

और प्रतियोगिता होती तो खुद को बहला लेती पर यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर है और अपने देश का प्रतिनिधित्व करने जैसा गौरव कहीं नहीं प्राप्त हो सकता!!!"
-काव्या ठाकुर, फेसबुक वाल

आज अभी काव्या का यह स्टेटस पढ़कर मन बहुत बेचैन हो गया है।

काव्या, विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांति निकेतन में बी ए ऑनर्स, हिंदी की स्टूडेंट हैं। प्रतिभाशाली और अद्वितीय वक्ता।

मैं विद्यालयीन शिक्षा में कक्षा 10 में काव्या का कक्षाध्यापक रह चुका हूँ। तबसे हमेशा काव्या कोई शानदार बात से ही सूचित करती रही हैं। काव्या को कई साल से जानता हूँ। उसके माँ पिता पूर्वोत्तर के नागालैंड में रहते हैं। वहीं उसका छोटा भाई पढता है। बचपन से जानता हूँ। काव्या, मेरी बेटी जैसी हैं।

आज उसकी इस विवशता ने सचमुच दुखी कर दिया। क्या हम सचमुच कुछ नहीं कर सकते? क्या विश्वविद्यालय के बालिग विद्यार्थियों को भी एस्कॉर्ट की अनुपलब्धता के कारण कहीं जाने से रोका जा सकता है? मैं सचमुच जानना चाहता हूँ कि इसका क्या हल हो सकता है?

क्या एक विश्वविद्यालय, अपने अधीन किसी महाविद्यालय या अन्य विश्वविद्यालय से ही एस्कॉर्ट प्रतिनियुक्ति पर नहीं मांग सकता?

क्या हमारे देश में प्रोफेसर, केवल व्याख्यान देने या किसी कोर्स में ही यात्रा कर सकते हैं? वे किसी विद्यार्थी की एस्कोर्टिंग नहीं कर सकते?

प्रतियोगिता इंदौर, म.प्र. में है। यदि विश्वविद्यालय अनुमति प्रदान करे तो यह सहज हल कर लेनेवाली विवशता है।

शशिभूषण

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