रविवार, 30 अक्तूबर 2011

सरलता के सहारे हत्या की हिकमत

एक सरकारी आदेश आता है और हमारी सारी मानसिकता को बदलकर रख देता है। लोकतंत्र में यह जनभावना साथ साथ चलती है कि सरकार ने अगर कोई निर्णय लिया है तो वह पूरी तरह ग़लत नहीं हो सकता। फिर सुधार और विकास के कवर में तो कोई भी मसौदा चल जाता है। ऐसे में उस तबके को ही समझाने में असफलता ही हाथ लगती है जो कथित रूप से बुद्धिजीवी माना जाता है। फिर जनमानस निर्माण का ख्वाब कैसे देखें? उसके बारे में तो कहा ही जाता है कि जैसे कितनी भी बारिश हो कुआँ नहीं उफनता वैसे ही जनता लोकतांत्रिक निर्णयों के खिलाफ़ नहीं जाती चाहे वह संस्कृति संबंधी फैसला ही क्यों न हो। भाषा के संबंध में सतर्क जागरूकता तो वैसे भी कम पायी जाती है। प्रभु जोशी जी का यह लेख ऐसे समय में हमारे सामने है जब सरकारी तौर पर कामकाज की हिंदी में अंग्रेज़ी के शब्दों के खुलकर प्रयोग की वकालत की जा रही है। और इसे केवल वकालत ही क्यों कहें यह तो आदेश है कि ऐसा हो। इसे ग़ौर से पढ़ें और अगर किसी खतरे की आहट सुनते हैं तो यों ही टालने की कोशिश न करें। -शशिभूषण

भारत-सरकार का ‘गृह-मंत्रालय’, जिसको पता नहीं अतीत में जाने क्या सोच कर देश में ‘राष्ट्रभाषा‘ के व्यापक प्रचार-प्रसार का जिम्मा सौंप दिया गया था, पिछले दिनों एकाएक नींद से जागा और जाग कर उसने देश के साथ, आजादी के बाद का सबसे ‘क्रूरतम’ मजाक किया कि वह राजभाषा हिन्दी को ‘आमजन‘ की भाषा’ बनाने का फरमान जारी कर दिया। यह इसलिए कि वह ‘कठिन‘ और ‘अबोधगम्य‘ है। पिछली लगभग आधी सदी से जो शब्द परिचित चले आ रहे थे पता नहीं किस इलहाम के चलते वे तमाम शब्द अचानक ‘अबोधगम्य’ व ‘कठिन’ हो उठे। उसने अपनी तरफ से काफी चतुराई-भरा ‘परिपत्र‘ जारी करते हुए, सममस्या-समाधान के लिये गालिबन सलाह दी जा रही हो कि हिन्दी में ‘उर्दू-फारसी-तुर्की‘ के शब्दों का सहारा लिया जाये और साथ ही साथ आवश्यकता अनुसार ‘अंग्रेजी‘ के शब्दों को भी शामिल किया जाये। अंग्रेजी को सबसे पीछे, उर्दू-फारसी की आड़ में खड़ा कर दिया गया। लेकिन मूलतः यह मंसूबा, साफ-साफ दिखायी दे रहा था कि देश के ‘खास-आदमी‘ की दृष्टि से ‘आम-आदमी‘ के लिए भाषा की छल-योजित ‘पुनर्रचना‘ की जा रही है, इससे उनके भाषा-विवेक की वर्गीय पहचान तो प्रकट हो ही रही है, बल्कि यह भी पता चल रहा है ‘वित्त-बुध्दि’ की सरकार, सांस्कृतिक-समझ के स्तर पर कितनी कंगली है।

परिपत्र में बताया गया है कि मंत्रालय की ‘केन्द्रीय हिन्दी समिति‘ की प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सम्पन्न होने वाली बैठक के बाद यह निर्णय किया गया। छोटे पर्दे की खबरों में कभी भी हिन्दी में बोलते नहीं दिखायी देने वाले प्रधानमंत्री की हिन्दी बैठक की सिर्फ कल्पना भर की जा सकती है, कि वह कैसी होती होगी। बहरहाल, इसमें देश की ‘राजभाषा‘ को सरल सुगम बनाये जाने के लिए कोई निश्चित ‘प्रतिमान‘ तो नहीं बनाया गया है कि ‘सरल‘ बनाते समय अंग्रेजी शब्दों का प्रतिशत क्या होगा, लेकिन बतौर ‘प्रतिमानीकरण‘ के लिए ‘सरल‘ और ‘कठिन‘ शब्दों की पहचान करते हुए ‘समिति‘ ने पता नहीं देश के किस स्थान से प्रकाशित होने वाली कौन-सी पत्रिकाओं से उदाहरण दिया, वह निश्चय ही स्पष्ट रूप से बताता है कि उसकी दृष्टि में ‘भोजन‘ की जगह ‘लंच‘, ‘क्षेत्र‘ की जगह ‘एरिया‘, ‘महाविद्यालय‘ के बजाय ‘कॉलेज‘, ‘वर्षा-जल‘ के बजाय ‘रेन-वॉटर‘, ‘नियमित‘ की जगह ‘रेगुलर‘, ‘श्रेष्ठतम पांच‘ के स्थान पर ‘बेस्ट फाइव‘ ‘आवेदन‘ की जगह ‘अप्लाई‘, छात्रों के बजाय ‘स्टूडेण्ट्स‘, ‘उच्च शिक्षा‘ के बजाय ‘हायर-एजुकेशन‘ आदि-आदि का प्रयोग भाषा के सरलीकरण में सहयोगी होगा। आप यह पढ़ कर स्वयं स्पष्ट कर लें कि हिन्दी के शब्दों की तुलना में जो शब्द अंग्रेजी के बताये गये हैं, वे ‘सरल‘ हैं और आमजन को आसानी से समझ में आ जायेंगे।

उनका यह भी कहना है कि इससे भाषा में ‘प्रवाह‘ बना रहेगा। अब आप बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि यह प्रवाह अंततः भाषा को किस दिशा में ले जायेगा। परिपत्र में बहुत बुद्धिमानी के साथ यह ‘सत्य‘ भी उद्घाटित किया गया, जो हिन्दी के साहित्यकारों की समझ में भी इजाफा करेगा कि ‘साहित्यिक भाषा के इस्तेमाल से उस भाषा-विशेष की ओर से आम-आदमी का रूझान कम हो जाता है और उसके प्रति मानसिक-विरोध बढ़ता है।‘ खैर यह नेक सलाह हिन्दी के साहित्यकार जानें, जो पिछले बीस बरसों से, इसी झंझट से ही बाहर नहीं आ पा रहे हैं कि किसकी कविता को ‘प्रगतिशील’ बतायें और किसकी को ‘प्रतिक्रियावादी’।

बहरहाल, इस ऐतिहासिक ‘परिपत्र‘ में भाषा की ‘कठिनता‘ की समस्या का समाधान खोजते हुए पहले काफी बड़ी भूमिका भी बांधी गयी और ‘उर्दू-फारसी-तुर्की‘ के शब्दों के प्रयोग की बात कुछ ऐसे सदाशयी अंदाज में पूरे भोलेपन के साथ कही गयी है कि जैसे वे कोई नयी बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि बस ‘गांधी-नेहरू‘ वाली ‘बोलचाल‘ की भाषा की बात को ही फिर से दोहरा रहे हैं।

लेकिन, मित्रो, हकीकत ये है कि ‘उर्दू-फारसी-तुर्की‘ के शब्दों के शामिल किये जाने की बात से तो सिर्फ बहाना है, जबकि बुनियादी रूप से उनका मंसूबा सिर्फ अंग्रेजी के शब्दों को शामिल करने का ही है। क्योंकि, उन्होंने ‘परिपत्र‘ में जो अनुकरणीय उदाहरण दिया है, उनकी असली इच्छा ‘भाषा‘ को उसी ‘रूप‘ की ओर हांकने की ही है, जिसको उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पाते ही धन्धों में धुत्त हो चुके अखबारों से ही उठा कर उसे उदाहरण के रूप में रखा है। और पिछले वर्षों से हिन्दी के अखबारों के महानगरीय संस्करणों में यह रूप चलाया जा रहा है। , लेकिन वे साफ-साफ ‘हिंग्लिश’ नहीं कहना नहीं चाहते। जबकि वे हिन्दी को ‘हिंग्लिश’ में बदलने का संकल्प ले चुके हैं और ऐसा करना उनके लिये इसलिए भी जरूरी है कि उनकी यह विवशता है,। चूंकि भारत में विदेश से हासिल होने वाली आवारा पूंजी की यह अघोषित शर्त है। यह पूंजी, केवल पूंजी की तरह नहीं आती, वह सांस्कृतिक माल के लिये जगह बनाती हुई आती है।

कहने की जरूरत नहीं कि अंग्रेजी के अखबारों ने उनके इस नेक इरादे को इसीलिए तुरन्त पढ़ लिया और उनकी बांछें खिल गयीं। उन्हांेने इस ‘परिपत्र‘ के स्वागत के उत्साह में ‘प्रथम-पृष्ठ‘ की खबर बनाते हुए कहा कि सरकार ने ‘देर आयद दुरूस्त आयद‘ की तरह खुद को ‘अमेण्ड‘ किया और आखिरकार देश के विकास के पक्ष में ‘हिंग्लिश‘ के लिए रास्ता खोल दिया है।‘ हिंग्लिश गेन्स रेस्पेक्टैबिलिटी।’ ‘ हिंग्लिश गेन्स ग्राउण्ड इन इण्डिया’। ‘हिंग्लिश विल बी द ऑफिशियल लैंग्विज ऑव इंण्डिया।’

बहरहाल, यह सच अब किसी से भीे छिपा नहीं रह गया है कि बहुराष्ट्रीय-निगमों की ‘सांस्कृतिक-अर्थनीति‘ के दलालों द्वारा भारत में ‘भूमण्डलीकरण’ के शुरू होते ही लगातार इस बात की वकालत की जाती रही है कि भारत में ‘अंग्रेजी‘ किसी भी तरह देश की प्रथम भाषा का ‘वैध‘ स्थान प्राप्त कर ले। इसके लिए उन्होंने ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन’ की तर्ज पर उससे भी कहीं ज्यादा धूम-धड़ाके वाला एक आयोजन, जो ‘माइका’ द्वारा प्रायोजित था, मुम्बई में किया, जिसमें गिरहबान पकड़ कर भारतीयों को बताया जाता रहा कि ‘भारत का भविष्य हिन्दी नहीं, ‘हिंग्लिश‘ में है’ और इससे नाक-भौंह सिकोड़ने की जरूरत नहीं, क्योंकि इसमें भी शेक्सपीयर पैदा हो जायेगा, और तीस वषों बाद यह दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा होगी। ये बात वे किसे बता रहे हैं ? कौन नहीं जानता कि संख्या के आधार के कारण भारतीय जो भी भाषा बोलने लगेंगे वह दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा कह लायेगी ही। दूसरी बात ये कि जो अंग्रेजी दूसरा शेक्सपीयर पैदा नहीं कर पायी, वह हिंग्लिश पैदा कर देगी ? फिर क्या भविष्य के एक काल्पनिक शेक्सपीयर के भारत में पैदा हो जाय इसके लालच में उस भाषा को मार दें, जिसने वह यात्रा मात्र चौसठ वषों में पूरी कर ली, जिसे पूरी करने में अंग्रेजों को पांच सौ वर्ष लगे ?

बहरहाल पेंगुइन प्रकाशन ने इस पूरे प्रायोजित अभियान पर केन्द्रित एक बड़ी-सी लगभग दो-सौ पृष्ठों की एक पुस्तक भी छापी है, ताकि भारत के उन काले अंग्रेजों को तर्कों के वे तमाम धारदार अस्त्र मिल जायें, जिनका वे जरूरत पड़ने पर अचूक इस्तेमाल जहां-तहां बहस-मुबाहिसों में कर सकें, क्योंकि निश्चय ही आगे-पीछे ‘गोबरपट्टी बनाम काऊबेल्ट‘ के लद्धड़ लोग एक दिन ‘राष्ट्रभाषा‘ के नाम पर एकजुट हो कर हो हल्ला मचायेंगे, तब सार्वजनिक-मंचों और छोटे पर्दे पर भाषा को लेकर होने वाली मुठभेड़ों में उन्हें विजयी बनाने मंे ये तर्क ही इमदाद करेंगे।

दूसरी ओर ‘धंधे में धुत्त‘ हिन्दी के सामान्य से अखबारों ने भी आमतौर पर तथा उन अखबारों ने, जिन्होंने ‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश‘ पर अपना साम्राज्य खड़ा किया है, खासतौर पर ठीक ऐसी ‘छुपाये न छुपने वाली‘ खुशी के साथ परिपत्र की ‘अगुवाई‘ की जैसे भारत और अमेरिका के बीच परमाणु सौदा सुलट गया है। बड़े-बड़े और लम्बे सम्पादकीय रगड़ते हुए उन्होंने अपने पाठकों को बताया कि जो काम इस सरकार ने कर दिखाया, वह उसकी शक्तिशाली राजनीतिक इच्छा का प्रमाण है। यह एक बहुप्रतीक्षित और अनिवार्य कदम था। हालांकि, उन्होंने इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा कि उनकी टिप्पणी में भूले से भी कहीं ‘हिंग्लिश’ शब्द ना आ जाये।

लेकिन, भाषा की ‘ऐतिहासिक-‘सामाजिक-सांस्कृतिक’ और आर्थिक भूमिका के परिप्रेक्ष्य को अपेक्षित गहराई से समझने वाले दूरदृष्टा लोग, इस परिपत्र को किसी सरकारी कार्यालय के कारिन्दे द्वारा गाहे-ब-गाहे जारी कर दिया जाने वाला रस्मी ‘कागद‘ नहीं, बल्कि भारतीय-भाषाओं के क्षेत्र में परमाणु सौदे से भी ज्यादा उलटफेर करने वाला ‘अस्त्र’ मान रहे हैं। तीन-सौ वर्षों के गुलामी के दौर में भारतीय भाषाओं का जितना नुकसान अंग्रेजों ने नहीं किया, उससे ज्यादा बड़ा नुकसान भारत-सरकार का गृह-मंत्रालय इस परिपत्र के जरिये करने वाला है। क्योंकि वे जानते हैं कि यह हिन्दी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं को भी जल्दी ही विघटित कर देगा। क्योंकि उन राज्यों की वे क्षेत्रीय भाषाएं, संविधान की आठवीं अनुसूची वाली भाषाएं हैं। निश्चय ही वहां भी यह फरमान तमिल को ‘तमलिश’ बांग्ला को ‘बांग्लिश’ बनाने का काम करेगा । वैसे इन भाषाओं के अखबार भी ये काम शुरू कर ही चुके हैं। यहां यह याद रखा जाना चाहिए कि दक्षिण की भाषाएं अपनी वैकल्पिक-शब्दावलि की तलाश में उर्दू-फारसी-तुर्की की तरफ नहीं जातीं। चूंकि वे अपना रक्त-संबंध संस्कृत से ही बनाती आयी हैं। लेकिन इनके बोलने वालों के भीतर छुपे अंग्रेजी के दलालों की फौज दलीलें देने के लिए आगे आयेगी कि जब भारत-सरकार द्वारा हिन्दी को ‘हिंग्लिश’ बनाया जा रहा है, तब तमिल को ‘तमिलिश’ बनाने का अविलम्ब रास्ता खोल दिया जाना चाहिये, ताकि उसका भी ‘आम-आदमी’ के हित में ‘सरलीकरण’ हो सके। दरअस्ल हिन्दी के संस्कृतनिष्ठ-रूप का आग्रह तो दक्षिण ही सबसे ज्यादा करता रहा आया है।

कुल मिलाकर, इस महाद्वीप की सारी की सारी भाषाओं के निर्विघ्न विसर्जन का एकमात्र हथियार बनने वाला सिद्ध होगा, यह परिपत्र। एक से अनेक को निपटाने का कारगर हथियार। प्रकारान्तर से यही वही औपनिवेशिक विचार का एक किस्म का अप्रकट ‘डिवाइन-इण्टरवेंशन’ है, जिसके चलते कहा गया था कि ‘प्रोलिफरेशन ऑव लैंग्विज इज पेनल्टी ऑन ह्यूमेनिटी।’ भाषा-बहुलता मानवता पर दण्ड है। अतः सभी भाषाएं खत्म हों और केवल एक पवित्र अंग्रेजी भाषा ही बची रहे। हिन्दुस्तान अपनी भाषा की बहुलता के कारण वैसे ही पाप की काफी बड़ी गठरी अपने सिर पर उठाये चला आ रहा है। बहरहाल, भाषा सम्बन्धी ऐसी ‘पवित्र- वैचारिकी‘ भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय के प्रति स्वयं को निश्चय ही बहुत कृतज्ञ अनुभव कर रही होगी।

कहना न होगा कि हिन्दी की भलाई करने का मुखौटा लगा कर सत्ता में बैठे ये लोग, निश्चय ही काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और यह बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि भाषाएं कैसे मरती हैं और उन्हें क्यों और किसी फायदे के लिए मारा जाता है। बीसवीं सदी में अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं का खात्मा करके उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित करने की रणनीति क्या थी? यह सब इनको बखूबी पता है और वही कुचाल उन्होंने यहां चली और वे अब सफलता के करीब हैं। जी हां वह रणनीति थी ‘स्ट्रेटजी ऑव लैंग्विज-शिफ्ट।‘ इसके तहत सबसे पहले चरण में शुरू किया जाये-‘डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात् स्थानीय भाषा के प्रचलित शब्दों को वर्चस्ववादी अंग्रेजी भाषा के शब्दों से ‘विस्थापित’ किया जाये। ध्यान रखें कि ‘डिस्लोकेशन शुड बी क्वाइट स्मूथ।’ अन्यथा उस भाषा के लोगों में विरोध पैदा होना शुरू हो सकता है। अतः यह काम धीरे-धीरे हो। इसको कहा जाता है- ‘काण्टा-ग्रेजुअलिज्म’। शब्दों का ‘विस्थापन’ करते हुए , इसका प्रतिशत सत्तर और तीस का कर दिया जाये। यानी सत्तर प्रतिशत शब्द अंग्रेजी के हो जाएं तथा तीस प्रतिशत स्थानीय भाषा के रह जायें। एक सावधानी यह भी रखी जाये कि इसके लिये सिर्फ एक ही पीढ़ी को अपने एजेण्डे का हिस्सा बनायें। जब उस समाज की परम्परागत-सांस्कृतिक शब्दावलि जिससे उसकी भावना जुड़ी हो, और यदि उसे ‘डिस्लाकेट’ या कहें अपदस्थ करने पर उस समाज में इस नीति के प्रति कोई प्रतिरोध नहीं उठे तो मान लीजिए कि ‘दे आर रेडी फॉर लैंग्विज शिफ्ट’। इसके बाद ‘वॉल्टेण्टअरली दे विल गिव्ह-अप देअर लैंग्विजेज’।

बस, इसी निर्णायक समय में उसकी मूल-लिपि को हटाकर उस लिपि की जगह ‘रोमन- -लिपि’ कर दीजिए। ‘दिस विल वी द फाइनल असाल्ट ऑन लैंग्विज’। यानी भाषा की अंतिम कपाल क्रिया। हालांकि, इन दिनों विज्ञापन व्यवसाय व मीडिया और इसी के साथ उन समाजों और राष्ट्रों की सरकारों पर ‘विश्व-व्यापार संघ’, ’अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ जैसे वित्तीय संस्थानों से दबाव डाला जाता है कि ‘रोल ऑफ योर गव्हर्मेण्ट आर्गेनाइजेशंस शुड बी इनक्रीज्ड इन प्रमोशन ऑफ इंग्लिश लैंग्विज।‘

कहने की जरूरत नहीं कि इनके साथ हमारा प्रिण्ट और इलेक्टॉनिक मीडिया गठजोड़ करता हुआ, यह बताता भी आ रहा है कि देवनागरी को छोड़कर रोमन-लिपि अपना ली जाय। लोगों ने अपनाना भी शुरू कर दी है। यह अंग्रेजी के उस गुण की याद दिला रहा है, जिसके बारे में शायद बर्नार्ड शॉ ने कहा था कि ‘अंग्रेजों की सबसे बड़ी विशेषता ही यह है कि वह आपको इस बात के लिए राजी कर सकते हैं कि आपके हित में आपका मरना जरूरी है।’

बहरहाल, विश्व बैंक द्वारा ‘सर्वशिक्षा-अभियान’ के नाम पर डॉलर में दिये गये ऋण का ही दबाव है, जो अपने निहितार्थ में ‘एजुकेशन फॉर आल’ नहीं, -इंग्लिश फॉर आल’ का ही एजेण्डा है। इसी लिये बेचारे गरीब सैम पित्रोदा कहते आ रहे हे कि ‘पहली कक्षा से ही अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू कर दी जाये’। चूंकि इससे लैंग्विज-शिफ्ट में आसानियां बढ़ जायेगीं।
यह भारत-सरकार का वही नया पैंतरा है, और जो भाषा की राजनीति जानते हैं वह बतायेंगे कि यह वही ‘लिंग्विसिज्म’ है, जिसके तहत भाषा को ‘फ्रेश-लिंग्विस्टिक’ लाइफ देने के नाम पर उसे भीतर से बदला जाता है। पूरी बीसवीं शताब्दी में इन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप की भाषाओं को इसी तरह खत्म किया। वहां भी शुरूआत एफ,एम, रेडियो के जरिये वहां के संगीत और मनोरंजन में घुसकर की गई थी। उन्होंने वहां पहले फ्रांस की तर्ज पर रेडियो के जरिये भाषा-ग्राम अर्थात् लैंग्विज-विलेज बनाये जिसमें स्थानीय भाषाओं में अंग्रेजी के ’मिक्स’ से भाषा-रूप बनाया और वहां की युवा-पीढ़ी को उसका दीवाना बना दिया। ये अफ्रीकी भाषाओं की पुनर्रचना का अभियान था। जी हां, रि-लिंग्विफिकेशन, जिसकी शुरूआत हमारे यहां भी एफ-एम रेडियो में अपनायी गयी प्रसारण-नीति से शुरु की गई।

दरअस्ल, हकीकत ये है कि चीन की भाषा मंदारिन के बाद दुनिया की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा हिन्दी से डरी हुई, अपनी अखण्ड उपनिवेश बनाने वाली अंग्रेजी ने ब्रिटिश कौंसिल के अमेरिकी मूल के जोशुआ फिशमेन की बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए, उदारीकरण के शुरू किये जाने के बस कुछ ही समय पहले एक सिद्धान्तिकी तैयार की थी, जो ढाई-दशक से गुप्त थीं, लेकिन इण्टरनेटी युग में वह सामने आ गयी। इसका ही नाम था रि-लिंग्विफिकेशन। अर्थात् भाषा की पुनर्रचना।
अंग्रेज शुरू से भारतीय भाषाओं को पूर्ण भाषा न मानकर उन्हें वर्नाकुलर कहा करते थे। वे अपने बारे में कहा करते थे वी आर अ नेशन विथ लैंग्विज, व्हेयर एज दे आर ट्राइब्स विद डॉयलेक्ट्स। फिर हिन्दी को तो तब खड़ी बोली ही कहा जा रहा था। लेकिन दुर्भाग्यवश एक गुजराती-भाषी मोहनदास करमचंद गांधी ने इसे अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई में देश भर में प्रतिरोध की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा बना दिया और नतीजतन एक जन-इच्छा पैदा हो गयी कि इसे हम ‘राष्ट्रभाषा’ बनाएं और कह सकें वी आर अ नेशन विद लैंग्विज। लेकिन औपनिवेशिक दासता से दबे दिमागों के कारण यह ‘राष्ट्रभाषा’ के बजाय केवल ‘राजभाषा’ बन कर ही रह गयी। गांधी जी के ठीक उलट, नेहरू का रूझान शुरू से ही अंग्रेजी की तरफ ही था। चौदह अगस्त की रात में जब वे बीःबीःसी के सम्वाददाता को वे कह रहे थे कि ‘संसार को कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है’ तो यह एक भाषा-समर की घोषणा थी, जबकि नेहरु एक नव-स्वतन्त्र राष्ट की संसद में अंग्रेजी में भाषण दे रहे थे। लेकिन गांधी ने हिन्दी को राष्टभाषा बनाने की बात कर के उसे भारतीय-राजनीति का हमेंशा के लिये सालते रहने वाला कांटा बना दिया।
बहरहाल, चौंसठ वर्षों से सालते रहने वाले उस पुराने कांटे को अब निकाला जा सका है।

बहरहाल ,अभी पांच साल पहले तक हिन्दी में जो शब्द, चिर-परिचित थे। अचानक ‘अबोधगम्य’ और ‘कठिन’ हो गये। एक और दिलचस्प बात यह कि हममें ‘राजभाषा’ के अधिकारियों की भर्त्सना की बड़ी पुरानी लत है ओर उसमें हम बहुत आनन्द लेते हैं, जबकि हकीकतन वह सरकारी केन्द्रीय कार्यालयों का सर्वाधिक लतियाता जाता रहने वाला नौकर होता है। उससे ज्यादातर दफ्तरों में जनसम्पर्क के काम में जोत कर रखा जाता है। कार्यालय प्रमुख की कुर्सी पर बैठा अधिकारी उसे सिर्फ हिन्दी पखवाड़े में पूछता ह और जब ‘संसदीय राजभाषा समिति’, जो दशकों से खानापूर्ति के लिए आती रही है, के सामने बलि का बकरा बना दिया जाता है। यह परिपत्र भी उन्हीं के सिर पर ठीकरा फोडते हुए बता रहा है कि हिन्दी के जो शब्द कठिन है इनकी ही अकर्मण्यता के कारण है। और जबकि, इतने वर्षों में कभी पारिभाषिक शब्दावलि का मानकीकरण सरकार द्वारा खुद ही नहीं किया गया। हर बार बजट का रोना रोया जाता रहा।

कहने की जरूरत नहीं कि यह इस तथाकथित भारत-सरकार (जबकि गव्हर्मेण्ट ऑफ इण्डिया सरल शब्द है) का इस आधी शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन है, जो देश के एक अरब बीस करोड़ लोगों को अंग्रेजी सिखाने की महा-खर्चीली योजना का संकल्प लेती है, लेकिन साठ साल में वह देश को मुश्किल से हिन्दी के हजार-डेढ़ हजार शब्द नहीं सिखा पायी ? और उसे उन्हें सरल बनाने के लिए अंग्रेजी के सामने धक्का देना पड़ा है।
दरअस्ल, सरल-सरल का खेल खेलती हुई किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है ? वह ‘राजभाषा’ के नाम पर देश के साथ सबसे बड़ा छल कर रही थी।

यह बहुत नग्न-सचाई है कि यह देश, अपने कल्याणकारी राज्य की गरदन कभी का मरोड़ चुका है और कार्पोरेटी संस्कृति के सोच को अपना अभीष्ट मानने वाले अरबों के आर्थिक घोटालों से घिरे सत्ता के कर्णधारों को केवल घटती बढ़ती दर के अलावा कुछ नहीं दिखता। भाषा और भूगोल दोनों उनकी चिंता के दायरे से बाहर हैं। निश्चय ही इस अभियान में हमारा पूरा मीडिया भी शामिल है, जिसने नव-उपनिवेशवादी मंसूबों के इशारों पर सुनियोजित ढंग से ‘यूथ-कल्चर’ का राष्ट्रव्यापी मिथ खड़ किया और अंग्रेजी और पश्चिम के सांस्कृतिक-उद्योग में ही उन्हें उनका भविष्य बताने में जुट गये। यह मीडिया द्वारा अपनाई गई दृष्टि उसी रॉयल चार्टर का नीति का कार्यान्वयन है, जो कहता है, दे शुड नॉट रिजेक्ट अवर लैंग्विज एण्ड कल्चर इन फेवर ऑफ देअर ट्रेडिशनल वैल्यूज। देअर स्ट्रांग एडहरेन्स टू मदर टंग हैज टू बी रप्चर्ड। इसलिए उनमें एक ‘अविवेकवाद’ पैदा किया गया ताकि वे भारतीय भाषाओं को विदा करने में देश की तरक्की के सपने देखने लगें।

कहना न होगा कि ‘लैंग्विजेज शुड बी किल्ड विथ काइण्डनेस’ की रणनीति का यह प्रतिफल है, परिपत्र। इसे हिन्दी के ताबूत में आखिरी कील समझा जाना चाहिए और इसकी चौतरफा तीखी आलोचना और भर्त्सना तक की जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि वे इसे अविलम्ब वापस लें। क्योंकि सरकार की नीति का खोट खुलकर सामने आ चुका है। अंग्रेजी अखबार जिसे पढ़ कर साफ-साफ बता रहे हैंए वहीं हिन्दी के अखबार उसे छुपा रहे हैं। ऐसा करते हुए वे आग के आगे पर्दा खींच रहे हैं। यह निश्चय ही राष्ट के साथ पत्रकारिता का सबसे बड़ा धोखा कहा जायेगाा। हम इस लांछन के साथ इस संसार से बिदा नहीं होना चाहेंगे कि प्रतिरोध की सर्वाधिक चिंतनशील भाषा का एक सांस्कृतिक-रूप से अपढ़ सत्ता ने हमारे सामने गला घोंटा और हम चुपचाप तमाशबीनों की तरह देखते रहे और कोई प्रतिरोध नहीं किया। जबकि, इस परिपत्र के सहारे तमाम भारतीय भाषाओं की पीठ में नश्तर उतार दिया जाना है। यह ‘सरलता के सहार’े चुपचाप तमाम भारतीय भाषाओं की हत्या के लिए की जा रही जघन्य हिकमत है।

भाषा मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार है। सम्प्रेषण के साथ ही संस्कृतीकरण के मार्ग को इसी ने प्रशस्त किया। जिस राष्ट्र के पास अपनी कोई भाषा नहीं, वह सांस्कृतिक रूप से अनाथ ही होगा। ‘अपनी भाषा में ही अपना भविष्य’ खोजने वाले चीन और जापान, जिनकी भाषाएं ढाई हजार चिन्हों की चित्रात्मक लिपि है, उसी में उन्होंने बीसवीं शताब्दी का सारा ज्ञान-विज्ञान विकसित और आज वह सभी क्षेत्रों से लगभग निर्विवाद रूप से अपराजेय है। कन्नड़ सीख कर चपरासी की भी नौकरी नहीं मिल सकती का तर्क देकर भाषा को खत्म करने के लिए लोग हिन्दी के भी बारे में यही बात बोलते हुए उसके संहार के सरंजाम जुटा रहे हैं, जबकि हिन्दी में यदि हम अपने पड़ोसियों से ही व्यापार-व्यवसाय शुरू करने लगे तो हिन्दी अच्छी खासी कमाने वाली भाषा बन सकती है। भाषा का अर्थशास्त्र खंगालकर यह बताया जा सकता है कि जब मनोरंजन के कारोबार में वह कमा रही है तो वह दूसरे क्षेत्रों में भी उतनी ही कमाऊ सिद्ध हो सकती है। लेकिन, दुर्भाग्य यह कि हमने पूरे भारतीय समाजं को कभी भी अंग्रेजी के औपनिवेशक शिकंजे से मुक्त होने ही नहीं दिया या हमें हमारी सत्ताओं ने नहीं होने दिया। नेहरू ने अपनी असावधानी के क्षणों में, जो बात यू ए एन राजनय जॉन ग्रालब्रेथ के सामने लगभग पश्चात के स्वर में कही थी कि ‘आयम द लास्ट इंग्लिश प्राइम मिनिस्टर अू रूल इण्डिया’। पर इन्हें कहां मालूम था कि नेहरू जो तुम गांव गांव धूल धक्कड़ खाते हुए हिन्दी में ही बोलते बतियाते प्रधानमंत्री थे, लेकिन अब देश के पास बाकायदा अंग्रेज तो नहीं, पर अंग्रेजी प्राइममिनिस्टर तो है ही , जो संसद और अपनी पत्रकार वार्ताओं में भूल से भी हिन्दी शब्द नहीं बोलता। उसके पास हिन्दी लाल किले की सीढ़ियों पर अपने रेडिमेड रूप में आती है। वहां हिन्दी देश का गौरव नहीं, राजनीति का रौरव है।

अन्त में, मैं सारे ही देशवासियों से कहना चाहता हूं कि ये मसला केवल हिन्दी भाषा-भाषियों का नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय भाषाओं का है। क्योंकि बकौल राहुल देव के हमें ये अच्छी तरह से ये जान लेना चाहिये कि हमारा भविष्य हमारी भाषाओं में ही है। इसलिये इस नीति का खुल कर विरोध करें। और राजभाषा विभाग को अपनी असहमति प्रकट करते हुए ई-मेल करें।

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-प्रभु जोशी
303, गुलमोहर निकेतन, वसंत-विहार
(शांति निकेतन के पास)
इन्दौर-10

1 टिप्पणी:

  1. प्रभु जी से पूरी तरह सहमत।

    मगर, कानूनी तौर पर उस परिपत्र का कोई मूल्य नहीं है। पहला, यह संविधान के उपबंधों के विपरीत है और इसलिए उसका कोई कानूनी आधार नहीं है। यदि कोई हिन्दी प्रेमी वकील इसे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में चुनौती दे तो तुरंत उस परिपत्र को खारिज कर दिया जाएगा। ऐसा मेरा मत है।

    राजभाषा हिन्दी का जो स्वरूप अब तक भारत सरकार के कामकाज में प्रचलित रहा है, वह संविधान के अनुरूप है। बिना संविधान संशोधन किए उस परिपत्र के जरिए उस स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

    दूसरा, उस परिपत्र का अनुपालन राजभाषा विभाग के अंतर्गत आने वाले जिन अनुवादकों और अधिकारियों के माध्यम से होना है, जो इसे कतई नहीं मानेंगे। जब इतने वर्षों में राजभाषा विभाग अधिकारियों को हिन्दी में काम करना नहीं सीखा सका तो वह अपने ही अधिकारियों-कर्मचारियों से हिंगलिश में काम करना कैसे सीखा देगा।

    बात जहां तक समाचार पत्रों और विज्ञापनों में प्रयोग होने वाली भाषा का है तो वह बाजार के खेल से प्रभावित होती है। उसके बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं।

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