बुधवार, 25 मई 2011

कहानी और कहानीपन

बिना कहानी के भी समाज की कल्पना की जा सकती है भला! जिन्हें यह लगता हो कि तब गीत से काम चल जाता तो उन्हें यह पहले सोच लेना चाहिए कि तब गीत होते ही नहीं। गीत, कहानी की कोख से पैदा होते हैं। कहानी जननी है गीतों की। कोई ऐसा गीत किसी को पता भी हो जिसमें कहानी न हो तो हमारा पूरा यकीन है उसे कम से कम गाने के लिये, गानेवाले को गाने लायक बनने के लिए कहानी की ज़रूरत पड़ेगी। यह चमत्कार हो भी जाए कि कहानी से अनजान कंठ गीत गा पाये तो सुनने वाले तब तक नहीं गुन पाएँगे वह गीत जब तक उन्हें कहानी का आसरा नहीं होगा। गीत के कान हैं कहानी और कहानी की आँख हैं गीत।

फिर भी हम सोचे कि कहानी नहीं है हमारे पास तो तुरंत खयाल आ जाता है केवल प्रयोजनमूलक शब्द व्यापार जिंदगी को असंभव बना देगा। कितनी नीरस होगी वह दुनिया जब एक ही छत के नीचे रहनेवाले या परस्पर मिलने वाले लोग केवल काम की बात करेंगे। बातों में स्मृति न हो, कल्पना न हो, फंतासी न हो तो वे बातें भले ही कितनी उपयोगीं हों क्या हृदय में रह पाएँगी? क्या पुराने लोग यों ही कहते आ रहे हैं कि सच बात के लिए भी झूठ के परथन की ज़रूरत होती है। तभी वह सबके गले का हार बनती हैं।

बातें रोचक हों तो जीवन के प्रति लगाव पैदा होता है। इसकी प्रत्यक्ष सिद्धि या गणितीय निष्पत्ति खोजने चलेंगे तो कुछ हाथ नहीं लगेगा। यह नाता वैसा ही है जैसा जीभ का स्वाद से। जब जीभ से स्वाद कम होने लगता है तब जीवनी शक्ति क्षीण होने लगती है। मज़ेदार बात कि जीभ से स्वाद जाने की कहानी होती है तो जीवनी शक्ति क्षीण होने की भी कहानी ही होती है। बातों से जब यादें विदा हो जाती है तो वे उस रसीले गन्ने की तरह ही होती हैं जिनमें मिठास नहीं होती। बिना कल्पना के यथार्थ सूखे आटे जैसा होता है। फंतासी न हो तो कथा बिना रुई की रजाई होती है।

हर किसी की मुराद होती है कि वह कहानी बने। लोग उसके किस्से सुनायें। हम अपने वर्तमान में खूब इसीलिए कमाना चाहते हैं कि भविष्य में जब हम न हों तो हमारे बारे में ढेर स्मृतियाँ हों। यदि कहा जाये कि हर कमाई के बदले हमारी छुपी माँग स्मृति ही होती है तो अत्युक्ति न होगी।

आप सोचिये यदि कहानियाँ न होतीं तो यह दुनिया कैसी होती? मैं तो यह सोच ही नहीं पाता। मुझे लगता है कि कहानी न होती तो हम आसमान से बातें न कर पाते। हरियाली देखते तो खूब उसे समझ न पाते, पेड़ों-चिड़ियों का दुख न जान पाते। पहाड़ों, झरनों, नदियों के दिल के हाल न जानते। हमारा कोई सपना चमकीला न होता, हमारा कोई गीत गाढ़ा न होता। बादलों में आकृतियाँ न बनतीं। सपनों में कोई राजकुमारी या राजकुमार न आते। हमारा इतिहास न होता। इतिहास न होता तो सभ्यता न होती। सभ्यता न होती तो हम उत्तरोत्तर संस्कृत न हो पाते।

कहानी से अपने इतने रिश्ते जानते हुए भी अब अगर आप पूछें कि कहानी से कहानीपन चला जाय तो क्या होगा तो आप ही बताये कोई क्या जवाब देगा?

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