शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

क्या एमएफ़ हुसैन बहादुरशाह जफ़र से ज़्यादा बदनसीब हैं?

दुनिया भर में मशहूर भारतीय चित्रकार एमएफ़ हुसैन ने भारत की नागरिकता छोड़ दी.उनके क़रीबी लोगों का कहना है कि हुसैन भारत से निकले हैं उनके भीतर से भारतीयता को नहीं निकाला जा सकता.इस पर कौन गर्व करेगा? निश्चितरूप से कुछ उत्साही,उद्धरणशील भारतीय जिन्हें भारत की विभूतियों को सलाम करते रहना ही आपद धर्म लगता है.भारत छोड़ चुके रत्नों को जिन्हें भारत की ही उपज बताने में खासा आनंद मिलता है.वे इस अतिरेक में वास्तविक कमी को भूल ही जाते हैं

इस घटना से हुसैन के समर्थकों को भारत में मौजूद हिंदू चरमपंथ को कोसने का बड़ा मौक़ा मिल गया है.वे इस घटना को हो सकता है भविष्य में भारत के मुसलमानों में पल रही असुरक्षा की भावना को बढ़ानेवाला घोषित कर दें.यह आशंका जताने लगें कि आगे और कलाकार पलायन करने को मजबूर होंगे.यह होना भी चाहिए क्योंकि हिंदू विघटनकारी ताक़तों ने फिदा हुसैन का भारत रहना मुश्किल कर दिया.उन्हें डर के साये में भारत से दूर रहने-जीने को मजबूर किया.उनकी कलाकृतियों को नष्ट करने की लगातार कोशिशें की.

पर सवाल ये भी उठता है कि हुसैन दुबई या लंदन की नागरिकता की अपील भी तो कर सकते थे जहाँ वे लंबे समय से रहते रहे हैं और क्या पता क़तर के नागरिक हुसैन आगे भी इन्हीं देशों में से ही कहीं रहें.

क़तर एक इस्लामिक देश है.वहाँ अट्ठानवे प्रतिशत सुन्नी संप्रदाय के लोग हैं.शासन प्रणाली राजतंत्र है.हुसैन पर आरोप रहे हैं कि वे हिंदू देवी देवताओं के अश्लील चित्र बनाते हैं.अब वे एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश छोड़कर क़तर के नागरिक बन गए हैं तो क्या इसे एक चरमपंथ से भागकर दूसरी अतिवादी स्थितियों में जाना नहीं कहेंगे?यह अप्रत्यक्ष रूप से चरमपंथ की ही जीत नहीं है?

इस बात से किसे इंकार होगा कि बड़े से बड़ा कलाकार भी नॉस्टैल्जिया से मुक्त नहीं होता .सारा जीवन घर-गाँव से भागते रहनेवाले विद्रोही भी अंत में अपने पैत्रिक श्मशान ही जाना चाहते हैं.मुझे लगता है जब हुसैन के इस क़दम को उनके हिंदू देवी देवताओं के अशोभन चित्र निर्माण से जोड़कर देखा जाएगा तब हुसैन की कला का वो नुकसान होगा जो अब तक नहीं हुआ है.

मुझे पता नहीं बहादुरशाह जफ़र के बारे में हुसैन के क्या विचार हैं? पर आज उनसे पूछने का मन हो रहा है-हे!चित्रकार श्रेष्ठ क्या आपके दुख भारत का नेतृत्व कर रहे इस बादशाह से बड़े रहे हैं?क्या आप दिल ही दिल में इकबाल को अपने क़रीब महसूस करते हैं?

हुसैन साहब,आप स्वेच्छा से भारतीय नहीं है तो इस बात से हमें धक्का पहुँचा है.आपकी सलामती हम हमेशा चाहेंगे पर हमारा आपके प्रति प्रेम बेशक़ कम हो गया है.आपने हमें जो सज़ा दी है उससे खुद ही यह हक़ खो दिया है कि अब हम आपकी किसी प्रकार की वकालत करें.हम आपकी निंदा नहीं करते पर आपके इस क़दम पर अफ़सोस जाहिर करते हैं.


7 टिप्‍पणियां:

  1. मूंग दल गया, बस ! अगर मुझे सामने मिल जाए तो पहले बुढाऊ के थोबड़े पर एक थप्पड़ जमाऊंगा और फिर पूछुंगा कि अगर इतना ही निष्पक्ष महान कलाकार था तो पैगम्बर मुहमद का भी वैसा ही चित्र बनाया होता जैसा उस धर्म के देवी देवताओं का बनाया जिसकी छत्र छाया में ९०-९५ साल ऐश किये , उसे यहाँ तक पहुँचने में मदद की !

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  2. आप और आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ...nice

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  3. बहादुर शाह निश्चित बदनसीब थे लेकिन हमें गर्व है उन पर।

    हुसैन जैसा ठरकी केवल "तथा-कथित" कलावादियों और "तथाकथित" बुद्धिजीवियों के लिये "वैचारिक बकवास" का मुद्दा है। दोगलेपन की इन संतानों के भाषण को दूर से नमस्कार करते हुए हुसैन से यह भी कहना चाहूँगा कि मुझे निजी तौर पर प्रसन्नता है कि अब कम से कम तुम जैसा विक्षित भारतीय तो नहीं कहलायेगा।

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  4. मुझे भी निजी तौर पर इसलिये प्रसन्नता है कि बुढ़ऊ इस देश में वापस आते तो खामखा पुलिस पर काम का बोझ और बढ़ाते…। मीडिया द्वारा चने के झाड़ पर चढ़ाये गये "कथित महान कलाकार"(?) वहीं जा पहुँचे जहाँ से आजीवन वैचारिक करीबी पाते रहे… :)

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  5. यह लम्पट बुढ़ऊ भारत आकर इस पवित्र भूमि को अपवित्र ना करें तो ही अच्छा है |

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  6. मैं भी बहुत खुश हूँ कि यह भारत से चला गया | अब यह मुहम्मद साहब के ऊपर एक लाइन तक खींच के दिखाए??

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