मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

जिन बच्चों की ज़िंदगी से पिता घट जाए उनकी खातिर दुआ है फ़िल्म 'पा'

मैंने भी पा  देख ली. अच्छी फ़िल्म है. बड़ी सरल और सादी कहानी है फ़िल्म की. फ़िल्म में ऐसा कुछ नहीं जो देखते हुए सोचते जाने से अलग हो. आगे क्या होगा के सारे अनुमान सच होते जाते हैं. फ़िल्म के बारे में काफ़ी पढ़ने में आ गया था पहले ही;  हो सकता है फ़िल्म इसलिए भी सहज लगी हो.

लेकिन फ़िल्म मुझे जिन वजहों से पसंद आई उन्हें साहित्यिक ही कहना सही होगा. बड़ी-बड़ी बातें रखने की बजाय पहले ही स्वीकार कर लूँ कि मैं किसी देखी हुई फ़िल्म पर तभी बात कर सकता हूँ जब कहानी और गानों को केंद्र में रखूँ. फ़िल्म की तकनीकि समझ मुझे नहीं है. मसलन मेकअप, सेट, पार्श्व संगीत, सिनेमेटोग्राफ़ी आदि-आदि. मुझे यक़ीन है इन अपेक्षाओं के लिए बहुत से समीक्षकों को ही माफ़ किया जाता रहा है तो मुझ बातूनी दर्शक को भी माफ़ कर ही दिया जाएगा. मुझे पता भी है अपने यहाँ बौद्धिक जगत में जो आसानी से मिल जाए वह माफ़ी ही है.

खैर, जब मैंने फ़िल्म देखना शुरू किया तो जैसे ही अरू(यही बच्चा कहानी के केंद्र में है) को देखा तो मुझे झट से लगा कि यह बच्चा अब पूरी फ़िल्म में असाधारण व्यवहार करेगा. अपनी विलक्षणताओं से सबको चकित करेगा. मेरे ऐसा सोच लेने की वजह आप सोच सकते हैं कि मुझे थोड़ा जल्दी ही हमारे समय के महत्वपूर्ण अत्यंत लोकप्रिय कथाकार उदय प्रकाश की मशहूर कहानी 'मैंगोसिल' जिसे पढ़ लेने के बाद शायद ही कोई भूल पाए याद आ गई होगी.

लेकिन जैसे ही फ़िल्म आगे बढ़ी कहानी 'मैंगोसिल' एक कौंध सी तिरोहित हो गई. फ़िल्म का बच्चा जैसा कि उसे होना चाहिए लाचार, असमर्थ ही रहा आया अंत तक. अरु की ज़िद कि अपने लब्धप्रतिष्ठ सफल राजनेता पिता को नहीं बताना कि मैं आपका ही बेटा हूँ जिन विवशताओं से गुज़रती है वे बड़ी कारुणिक हैं. इस त्रासदी को जो सहने लायक बनाए वह मां द्वारा अपना ली गई युक्ति भी कि किसी की हिचकी नहीं बनना बड़ी मार्मिक है. एक बच्चा, वास्तव में बीमार बच्चा इसे जिस खुद्दारी से अपनाता है वह फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता मुझे लगी. पिता जो कदाचित आदर्श नेता है एक नि:शक्त बच्चे के इस प्रण को भांप तक नहीं पाता. यहीं फ़िल्म का गीत हिचकी हिचकी..... भीतर तक छू जाता है. कह सकते हैं कि इस बिंदु पर एक स्त्री अपनी ममता, स्वावलंबन के बल पर पुरुष को बराबरी से जवाब देती है, प्रतिरोध का उदाहरण बनती है.

यहीं मुझे फिर एक कहानी याद आती है. प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति की कई साल पहले लिखी गयी कहानी सिरी उपमा जोग. इस कहानी में भी एक लड़का है जो शहर दूसरी शादी कर लेने वाले पिता से मिलने आता है. उसके हाथ में एक चिट्ठी है मां की. माँ ने अपनी मुसीबतों के हवाले से चिट्ठी में जो लिखवाया है वह संक्षेप में यह है कि अब अपने इस बेटे की ज़िम्मेदारी सम्हाल लें, बेटी भी व्याह के काबिल हो गई है. यहाँ गाँव में मैं इस लायक नहीं रही अब. कमाल यह है कि यह चिट्ठी बेटा पिता को ही देता है सौंतेली माँ या उसके बच्चों के द्वारा बहुत पूछने पर भी मुह नहीं खोलता. इस कहानी में बेटे को देखकर चिट्ठी पढ़कर बाप केवल परेशान होता है, पिछले दिन याद करता है और बेटे को खाली हाथ ही लौट जाने देता है. बच्चे को कुछ नहीं मिलता. प्यार, अधिकार तो दूर अपने पिता का आत्मीय परिचय भी नहीं. इस तुलना में अरू का फ़िल्मी पिता काफ़ी भला मानुष है. फ़िल्म की कहानी को आदर्शवादी, सुखांत निर्वाह जो मिला है.

यहाँ तक जब बात आ ही गई है तो मैं साहस करके कहूँ फ़िल्म की कहानी दरअसल शिवमूर्ति की ही कहानी है. यहाँ यह क़तई न समझें कि मैं नकल या चोरी का सस्ता आरोप लगाने जा रहा हूँ. बस पा की कहानी में जो औरत है वह बदली हुई है. आज़ादी के इतने दिनों में औरते ही हैं जो कुछ कुछ बदली हैं. समाज और पुरुष वैसे ही हैं. मैं जब कह रहा हूँ कि पा  की कहानी शिवमूर्ति की ही कहानी है तो साथ में यह भी कह रहा हूँ कि सिरी उपमा जोग  भी शिवमूर्ति की ही कहानी नहीं भारतीय समाज की कहानी है.

हमारे यहाँ ऐसे कितने बच्चे हैं जिन्हें अपने बाप का पता नहीं? अब यदि किसी बच्चे की ज़िंदगी से पिता की पहचान तक घट जाए तो उसे कौन सी बीमारी हो जाएगी कोई नहीं बता सकता. मुझे पूरी फ़िल्म में यही लगता रहा कि अरू की अजीबो गरीब बीमारी फ़िल्म में कहानी को बढ़ाने का उपकरण है. इसके आधुनिक संदर्भ भी हैं इसलिए सब सटीक बैठते हैं. फ़िल्म वास्तव में उन बच्चों के लिए है जिनकी ज़िंदगी में पिता की पहचान नहीं. और माँ का कोई वजूद नहीं. कभी-कभार कुछ माँएं जो यह गुहार लगाती भी हैं कि अमुक रईस या नेता मेरे बेटे का पिता है तो उनपर लोग कैसे हँसते हैं; वे कैसे हारकर अपने अँधेरों में लौट जाती हैं सबको पता है.

सच मानिए मुझे यह फ़िल्म इसी रूप में भली लगी. चूँकि यह फ़िल्म समाज के काम की है इसलिए इसके नायक नेता का आदर्शवादी होना किसी तरह की सीमा का परिचायक नहीं है. अंतत: कुछ अच्छा करनेवालों को आदर्श का दामन पकड़ना ही पड़ता है. रही बात अमिताभ बच्चन और विद्या बालन की तो ये दोनों पूरे वही लगे जो रोल किया है. अभिनय के बारे में इससे ज़्यादा अभी मैं नहीं कह सकता. फ़िल्म देखने की पहली गुज़ारिश मैंने शिवमूर्ति जी से की थी. आपसे भी करता हूँ.

शशिभूषण

3 टिप्‍पणियां:

  1. देखे न तुमने सुदूर चेन्न्ई में ये फिल्म देख ली और हम अबतक आजकल आजकल कर रहे हैं। शिवमूर्ति की कहानी मैंने भी पढ़ी है तुम सही कह रहे हो।

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