रविवार, 10 जनवरी 2010

भगवान ढोती पीठ




प्रगतिशील या अप्रगतिशील की बात थोड़ी देर के लिए छोड़ दें तो आज भी त्याग,सहयोग,समर्पण तथा बलिदान के उदाहरण ज्यादा धर्म में ही देखे जाते हैं.
भूख सहना,कठिन यात्राएँ करना,पीड़ा भोगना धर्म में आम बात हैं.अगर लोग अपनी सुविधा का सबसे कम खयाल करते हैं,तकलीफ़ों की सबसे कम शिक़ायत करते हैं तो वह धर्म का ही क्षेत्र है.लोग किसी भी धर्म के हों अगर संकल्प धार्मिक है तो उसे पूरा करने में कोई समझौता नहीं करते.
सब के अनुभव का हिस्सा है यह कि धर्म का सवाल हो तो लोगों को एकजुट होने में देर नहीं लगती.मगर अनुशासन धर्म की बजाय दूसरा हो तो बहाने बढ़ते बढ़ते मांगो में बदल जाते है.
यह कहना गलत नहीं होगा कि वैज्ञानिक उपलब्धियों ने धर्म का ही रास्ता आसान किया है.तीर्थों की ओर जानेवाली ट्रेने या सड़के कभी सूनी नहीं हुईं.आपदा हों या अपराध धार्मिक समूहों को डिगा नहीं पाते
साठ साल के गणतांत्रिक भारत में संविधान की किताब कुछ चुने हुए लोग ही पढ़ते हैं जबकि धार्मिक किताबें अनपड़ों को भी याद होती हैं.वे उन्हें ही आचरण में लाते हैं.
आखिर क्या कारण हैं कि अब तक कोई आह्वान धर्म की पुकार से बड़ा साबित नहीं हुआ? लोग क्रांतियों के बाद भी धर्म में ही जीते मरते रहते हैं.

ये सवाल असंख्य बार पूछे जा चुके है.पूछनेवाले अच्छे भी नहीं माने गए.मेरी जिज्ञासा है कि क्या यह पूछना बंद भी हो पाएगा?

बहरहाल,जिस बहाने से मैं यह लिख रहा हूँ,उसे आप चित्रों में देख रहे हैं.सचमुच इसे देखना रोंगटे खड़े कर देता है.

ये तमिल श्रद्धालु हैं.

अपनी मांगी मुराद पूरी होने की खुशी में मुरुगन भगवान(कार्तिकेय) का रथ खींचकर मंदिर तक ले जा रहे हैं.पीठ की विशेष नस में लोहे के हुक फँसाए गए हैं.(यहाँ हुक फँसाने पर खून नहीं निकलता.दर्द के बारे में आप ही सोचिए.).रस्से रथ से बँधे हैं.

मैं इस जानकारी से दहल गया कि आज यह रथ खींचना काफ़ी आसान हो गया है क्योंकि सड़क चिकनी हैं और रथ के पहिए आधुनिक हैं.
किसी वक़्त में यह सवारी पगडंडियों,कच्ची सड़कों से गुज़रती रही है.कुछ जगहों में अब भी वही स्थिति है
.
इतना ही नहीं तमिल भक्त ऐसे ही हुक से बिंधे हुए बाँस से लटकते हुए भी मंदिर तक पहुँचते हैं
.
यह तमिलनाडु की बात है.अलग अलग रूपों में भारत के लोगों की तपस्या इसी रूप में दिखती है.

मैं जानना चाहता हूँ ये कैसी पीठ हैं जिन्हें भगवान ही ढोना है चाहे कैसा भी युग हो?

भगवानों को खींचनेवाली अपराजेय जनता के बीच मनुस्यता की सारी आस्थाएँ धर्म के मुक़ाबले दोयम क्यों हैं?

इसे कौन सा आविष्कार सुलझाएगा?

8 टिप्‍पणियां:

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  2. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

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  3. भगवान एक बहाना है निकम्मेपन के लिए, कमा कर खाने से बचने के लिए. यह वामानों का व्यवसाय है और आम आदमी की मूर्खता.

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  4. कभी कर्मकांडों की उत्‍पत्ति धर्म के मूल आधारों की रक्षा के लिए हुई होगी .. पर धर्म के मूल को न समझकर जब कर्मकांडों को ही सत्‍य समझ लिया जाता है .. वहीं से धर्म का एक भौडा रूप सामने आता है .. जिसका समय के साथ समाधान आवश्‍यक है .. पर किसी की बात जनता माने तब न!!

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  5. हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अगर समुदायिक चिट्ठाकारी में रूचि हो तो यहाँ पधारें http://www.janokti.blogspot.com . और पसंद आये तो हमारे समुदायिक चिट्ठे से जुड़ने के लिए मेल करें janokti@gmail.com
    --
    जयराम "विप्लव"
    Editor
    http://www.janokti.com/

    आपकी इस पोस्ट का मुद्दा बेहद गंभीर है .

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  6. dear babu,
    sawal darawane or zinda hain.mitra ye vo peeth hai jo har haal main dhone ke liya bani hai.ab isse kya farak padta hai ki wo insan ko dhoti hai ya bhagwan ko.or kam se kam dhone ke mamle main to kuch or dhone ki bajay bhagwan ko dhona theek hai. vase bhi mitra har insan ka prayas bhagwan banne ka hota hai.itihas or vartman dono main hi aise insani bhagwan mojood hain.bat kevel bhaar ki hoti to kam bhi karte.kya aap or ham bhi kisi ghandhi, marks, gautam, ambedakar ya or kisi bhagwan ko nahin dho rahe....? kya aap in gareebon se inka ye sahara bhi cheen lena chahte hain....? bhagwan ki dharana koi andhviswas ya murkhata nahin hai babu ye insani vikas ki ab tak ki sabse badi khoz ya kahun aaviskar hai......r k swami.

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